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तीव्र घृणा पाएँगे। पृथ्वी पर ऐसा कोई दुष्ट मनुष्य नहीं जो अमूर्त रूप में पाप की निन्दा और उससे घृणा न करे। मन इस प्रकार बना है कि पाप सर्वत्र, स्वाभाविक रूप से और अनिवार्य रूप से सही विवेक-बुद्धि और अन्तःकरण को घृणित लगता है। मन की हर शक्ति पाप से विद्रोह करती है। मनुष्य अधर्म करनेवालों से तभी प्रसन्न होता है, जब उसके पास उनसे वह अधर्म करवाने की इच्छा का कोई स्वार्थपूर्ण कारण होता है। कोई भी विवेकशील प्राणी पाप को, पाप के रूप में, स्वीकार नहीं करता।
परन्तु एक अमूर्त वस्तु के रूप में पाप के प्रति स्वाभाविक अस्वीकृति में, और उस हार्दिक घृणा और विरोध में, जिसकी नींव परमेश्वर के प्रति प्रेम पर है, एक स्पष्ट अन्तर है।
इस विचार को उदाहरण द्वारा समझाने के लिए। उस युवक के लिए यह अनुभव करना कि अमुक कार्य गलत है, एक बात है, और उसे अपने पिता के प्रति अन्याय के रूप में देखना बिलकुल दूसरी बात है। यहाँ उसकी पहली भावना के अतिरिक्त कुछ और है। उसके मन में उस कार्य के गलत होने के कारण केवल क्रोध ही नहीं, बल्कि अपने पिता के प्रति उसका प्रेम एक विशेष प्रकार का शोक भी उत्पन्न करता है। इसी प्रकार जो व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम करता है, वह पाप के प्रति, उसके गलत होने के कारण, केवल तीव्र अस्वीकृति ही अनुभव नहीं करता, बल्कि जब वह उसे परमेश्वर के विरुद्ध किया गया देखता है, तो क्रोध से मिश्रित शोक की भावना भी अनुभव करता है।
तो, यदि आप जानना चाहते हैं कि पाप के प्रति आप कैसा अनुभव करते हैं, तो जब आप पापियों के बीच आते-जाते हैं, और उन्हें परमेश्वर की व्यवस्था तोड़ते देखते हैं, तब आप कैसा अनुभव करते हैं? जब आप उन्हें अपवित्रता से शपथ खाते सुनते हैं, या उन्हें सब्त तोड़ते, या मतवाले होते देखते हैं, तब आप कैसा अनुभव करते हैं? क्या आप वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा भजनकार ने अनुभव किया जब उसने लिखा, “मैं विश्वासघातियों को देखकर उदास हुआ, क्योंकि वे तेरे वचन को नहीं मानते?” इसी प्रकार वह कहता है, “मेरी आँखों से जल की धारा बहती रहती है, क्योंकि लोग तेरी व्यवस्था को नहीं मानते।”
और फिर, “जो दुष्ट तेरी व्यवस्था को छोड़े हुए हैं, उनके कारण मैं क्रोध से जलता हूँ।”
2. आपको अपने ही पापों के प्रति अपने हृदय की दशा को परखना चाहिए।
अपने पिछले पापों पर पीछे दृष्टि डालिए, पुराने समय के अपने आचरण को स्मरण कीजिए, और देखिए कि क्या आप सचमुच हृदय से उसकी निन्दा करते हैं और उससे घिन करते हैं, और क्या आप वैसा ही अनुभव करते हैं जैसा एक स्नेही बालक अनुभव करता है, जब उसे स्मरण आता है कि उसने कैसे अपने प्रिय माता या पिता की आज्ञा नहीं मानी। यह दृढ़ निश्चय अनुभव करना कि आपका पिछला आचरण दुष्टता का था, एक बात है। इस भावना के साथ इस कारण तीव्र शोक की भावनाएँ होना कि वह परमेश्वर के विरुद्ध पाप था, बिलकुल दूसरी बात है। सम्भवतः ऐसे बहुत कम
मसीही होंगे जिन्होंने अपने माता-पिता के प्रति अपने पिछले आचरण पर गहरी भावना के साथ पीछे दृष्टि न डाली हो, और यह न सोचा हो कि उन्होंने कैसे एक प्रिय पिता और एक स्नेही माता की आज्ञा नहीं मानी और उनके साथ अन्याय किया; और जिन्होंने अपने आचरण के प्रति तीव्र अस्वीकृति के अतिरिक्त, शोक की ऐसी गहरी भावना अनुभव न की हो जो रोने के रूप में फूट पड़ना चाहती थी, और शायद सचमुच न रुकनेवाले आँसुओं में फूट पड़ी। यही माता-पिता के प्रति सच्चा पश्चाताप है। और परमेश्वर के प्रति पश्चाताप भी यही बात है, और यदि वह सच्चा है, तो उसकी मात्रा उस ध्यान की तीव्रता के अनुरूप होगी जिसके साथ मन उस विषय पर टिका होता है।
3. आप पश्चाताप न करनेवाले पापियों के प्रति अपनी भावनाओं को परखना चाहते हैं।
तो उनके बीच जाइए, और उनके प्राणों के विषय में उनसे बातचीत कीजिए, उन्हें चेतावनी दीजिए, देखिए कि वे क्या कहते हैं, और कैसा अनुभव करते हैं, और उनके हृदयों की वास्तविक दशा तक पहुँचिए, और तब आप जान लेंगे कि पश्चाताप न करनेवालों के प्रति आप कैसा अनुभव करते हैं। अपनी कोठरी में अपने आप को बन्द करके किसी पश्चाताप न करनेवाले पापी की कल्पना करने का प्रयत्न मत कीजिए। आप कल्पना का ऐसा चित्र खड़ा कर सकते हैं जो आपकी सहानुभूति को छू ले, और आपसे रुलवाए और प्रार्थना करवाए। परन्तु जाइए और अपने हृदय को
