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टिप्पणियाँ।
1. जो कुछ कहा गया है, उससे हम एक कारण सीखते हैं कि कलीसिया में इतना अधिक रह-रहकर उभरनेवाला धर्म क्यों है।
उन्होंने पाप के बोध को मन-परिवर्तन समझ लिया है, और संसार के शोक को वह परमेश्वर-भक्ति का शोक समझ बैठे हैं जो ऐसा पश्चाताप उत्पन्न करता है जिसका परिणाम उद्धार है और जिससे फिर पछताना नहीं पड़ता। वर्षों के अवलोकन के बाद मुझे निश्चय हो गया है कि सारे देश में कलीसिया की वर्तमान शोचनीय दशा का सच्चा कारण यही है।
2. हम देखते हैं कि पाप के बोध में पड़े पापी क्यों ऐसा अनुभव करते हैं मानो मसीही बनना एक बड़ा क्रूस हो। वे अपने भक्तिहीन साथियों को छोड़ना और अपने पापों को छोड़ना एक बड़ी कठिन परीक्षा समझते हैं। परन्तु यदि उनमें सच्चा पश्चाताप होता, तो वे अपने पापों को छोड़ना कोई क्रूस न समझते। मुझे स्मरण है कि जब मैंने पहले-पहल युवा लोगों को मसीही बनते और कलीसिया में सम्मिलित होते देखा, तो मैं कैसा अनुभव करता था। मैं सोचता था कि कुल मिलाकर धर्म रखना एक अच्छी बात है, क्योंकि वे अपने प्राणों को बचा लेंगे और स्वर्ग पहुँच जाएँगे। परन्तु उस समय के लिए यह मुझे बड़ी दुःखभरी बात लगती थी। तब मैंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि ये युवा लोग अभी, इसी समय, सचमुच सुखी हो सकते हैं। मेरा विश्वास है कि जो लोग जानते हैं कि धर्म कुल मिलाकर अच्छा है, और अन्त में अच्छा है, उनमें यह सोचना बहुत आम है कि वे धर्म में सुखी नहीं रह सकते। यह सब पश्चाताप के सच्चे स्वरूप के विषय में भूल के कारण है। वे यह नहीं समझते कि सच्चा पश्चाताप उन बातों के प्रति घृणा उत्पन्न करता है जिनसे पहले प्रेम किया जाता था। पापी यह नहीं देखते कि जब उनके युवा मित्र सच्चे मसीही बन जाते हैं, तो वे अपनी नृत्य-सभाओं और दावतों, और पापमय मनोरंजनों और मूर्खताओं से घृणा करने लगते हैं, कि इन बातों का प्रेम क्रूस पर चढ़ा दिया गया है।
मैं एक बार एक युवती को जानता था जिसका परमेश्वर की ओर मन-परिवर्तन हुआ था। उसका पिता बड़ा घमण्डी और संसारी मनुष्य था। वह पहले पहनावे-ओढ़ावे की, नृत्य-पाठशाला की और नृत्य-सभाओं की बड़ी शौकीन थी। उसके मन-परिवर्तन के बाद उसका पिता उसे ज़बरदस्ती नृत्य-पाठशाला में भेजता था। वह स्वयं उसके साथ जाता था, और उसे खड़ी होकर नाचने के लिए विवश करता था। वह वहाँ जाती और रोती, और कभी-कभी जब वह नाचने के लिए फ़र्श पर खड़ी होती, तो घृणा और शोक की भावनाएँ उस पर ऐसी छा जातीं कि वह मुँह फेर लेती और फूट-फूटकर रोने लगती। यहाँ आप इस सब का कारण देखते हैं। उसने इन बातों से सचमुच पश्चाताप किया था, ऐसे पश्चाताप से जिस पर फिर पछताना नहीं पड़ता।
हाय, ऐसा दृश्य एक मसीही के मन में कितनी स्मृतियाँ जगा देता! अपनी पुरानी रंगीली सहेलियों के लिए कैसी करुणा, उनकी चंचल हँसी-ठिठोली के प्रति कैसी घृणा! वह प्रार्थना-सभा में होने के लिए कैसी लालायित रहती थी; वह वहाँ सुखी कैसे रह सकती थी? पश्चाताप न करनेवाले, या वे जिनमें केवल सांसारिक शोक है, सच्चे मसीही के सुख के विषय में ऐसी ही भूल कर बैठते हैं।
