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हों, और उसे बड़े संकट में पड़ा एक भिखारी मिले, और वह उसे छः डॉलर दे दे, और केवल एक अपने लिए रख ले; और वह भिखारी यह देखकर कि उसने एक डॉलर अपने पास रख लिया है, लौटकर वह भी उससे लूट ले; तो क्या हर हृदय उसकी नीचता से घृणा न करेगा?” आप देखते हैं, इसमें यह विचार समाया हुआ है कि सब्त को तोड़ना बड़ी कृतघ्नता है, क्योंकि परमेश्वर ने मनुष्यों को छः दिन उनके अपने लिए, अपनी सेवा करने के लिए दे दिए हैं, और केवल सब्त को अपने लिए रखा है, और परमेश्वर से सातवाँ दिन लूट लेना नीच कृतघ्नता है।
आप जो ऐसा करते हैं, परमेश्वर की सेवा बिलकुल नहीं करते। यदि आप सप्ताह भर स्वार्थी हैं, तो आप पूरी तरह स्वार्थी हैं। यह मान लेना कि आपमें कोई वास्तविक भक्ति है, इस बात का संकेत होगा कि आपका हर
सब्त को मन-परिवर्तन होता है और हर सोमवार को आप फिर बिना मन-परिवर्तन के हो जाते हैं। यदि कोई मनुष्य सारे सप्ताह अपनी सेवा करे और सब्त के दिन वास्तव में धर्म रखे, तो उसके लिए उसका मन-परिवर्तन होना आवश्यक है। परन्तु क्या सब्त का यही अर्थ है, कि वह दूसरे दिनों को छोड़कर परमेश्वर की सेवा करने का दिन है? क्या परमेश्वर को अपना काम चलाए रखने के लिए सब्त के दिन आपकी सेवाओं की आवश्यकता है?
परमेश्वर छः दिनों में भी आपकी सारी सेवाएँ उतनी ही चाहता है जितनी सब्त के दिन, केवल उसने सब्त को विशेष कर्तव्यों के लिए अलग कर दिया है, और यह माँग की है कि उसे शारीरिक परिश्रम से, और उन थकानेवाली चिन्ताओं और परिश्रमों से जो इस वर्तमान संसार से सम्बन्ध रखते हैं, विश्राम के दिन के रूप में माना जाए।
परन्तु क्योंकि परमेश्वर अपने उद्देश्यों को पूरा करने में साधनों का उपयोग करता है, और मनुष्यों के पास प्राणों के साथ-साथ शरीर भी हैं, और सुसमाचार को इस संसार की वस्तुओं के द्वारा फैलाया और सम्भाला जाना है, इसलिए
परमेश्वर माँग करता है कि आप छहों दिन अपने सांसारिक कामों में परिश्रम करें। परन्तु वह सब उसी की सेवा के लिए है, उतना ही जितनी सब्त की आराधना। सब्त परमेश्वर की सेवा के लिए सोमवार से अधिक नहीं दिया गया। सोमवार को अपनी सेवा करने का आपको उससे अधिक अधिकार नहीं जितना सब्त के दिन है। यदि आप में से किसी ने इस विषय को इस प्रकार समझा है, और यह कल्पना की है कि सप्ताह के छः दिन आपका अपना समय हैं, तो यह दिखाता है कि आप सर्वोपरि रूप से स्वार्थी हैं। मैं आपसे विनती करता हूँ कि यह न समझें कि प्रार्थना में और सब्त के दिन आप परमेश्वर की सेवा कर रहे हैं, यदि बाकी समय आप अपनी सेवा करनेवाले माने जाते हैं। आपने प्रभु की सेवा करने के मूल सिद्धान्त को कभी जाना ही नहीं।
5. वे लोग अपनी, या अपने देवताओं की, सेवा कर रहे हैं जो धर्म में अपने व्यक्तिगत आराम और सुख का कोई भी त्याग नहीं करेंगे।
उदाहरण के लिए, बहुत से लोग मुफ़्त बैठकोंवाली कलीसियाओं पर इस आधार पर आपत्ति करते हैं कि उनमें व्यक्तिगत सुख-सुविधा का त्याग करना पड़ता है। वे इस प्रकार बात करते हैं: “हम अपने परिवारों के साथ बैठना चाहते हैं;” या, “हम चाहते हैं कि हमारी बैठकों पर गद्दियाँ हों,” या “हम सदा एक ही स्थान पर बैठना पसन्द करते हैं।”
वे मानते हैं कि इस नगर में नरक की ओर जा रहे हज़ारों लोगों के लिए सुसमाचार को सुलभ बनाने के लिए मुफ़्त बैठकोंवाली कलीसियाएँ आवश्यक हैं। परन्तु वे पश्चाताप न करनेवाले पापियों की इस भीड़ के लिए परमेश्वर के भवन के द्वार खोल देने के लिए ये छोटे-छोटे त्याग नहीं कर सकते।
ये छोटी बातें प्रायः मनुष्यों के हृदयों की दशा को सबसे स्पष्ट रूप से प्रकट कर देती हैं। मान लीजिए आपका सेवक यह कहे, “मैं यह नहीं कर सकता,” या “मैं वह नहीं कर सकता,” क्योंकि उससे उसके व्यक्तिगत आराम और सुख में बाधा पड़ती है। वह यह नहीं कर सकता क्योंकि उसे गद्दी पर बैठकर काम करना पसन्द है।
या वह वह नहीं कर सकता क्योंकि उससे वह डेढ़ घंटे के लिए अपने परिवार से अलग हो जाएगा।
क्या! क्या यह सेवा करना है? जब कोई मनुष्य सेवा में प्रवेश करता है, तो वह अपना आराम और सुख
