व्याख्यान 164 (253 में से)

धर्मी ठहराया जाना विश्वास से है। परन्तु यह ध्यान में रखना चाहिए कि पौलुस जिस भूल का खंडन कर रहा था, वह

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धर्मी ठहराया जाना विश्वास से है। परन्तु यह ध्यान में रखना चाहिए कि पौलुस जिस भूल का खंडन कर रहा था, वह उन यहूदियों की भूल थी जो व्यवस्था का पालन करके धर्मी ठहरने की आशा रखते थे। इस भूल के विरोध में पौलुस इस बात पर ज़ोर देता है कि धर्मी ठहराया जाना व्यवस्था के कामों के बिना, विश्वास से है। उसका यह अर्थ नहीं कि धर्मी ठहराए जाने के लिए भले कामों की कोई आवश्यकता नहीं, बल्कि यह कि व्यवस्था के काम भले काम नहीं हैं, क्योंकि वे व्यवस्था-सम्बन्धी विचारों से, अर्थात आशा और भय से, उत्पन्न होते हैं, न कि उस विश्वास से जो प्रेम के द्वारा प्रभाव डालता है। परन्तु जब दूसरी ओर से एक झूठा सिद्धान्त कलीसिया में घुस आया, तो याकूब ने इस विषय को उठाया, और उन्हें दिखाया कि उन्होंने पौलुस को गलत समझा है। और यह दिखाने के लिए वह अब्राहम का उदाहरण लेता है: “जब हमारे पिता अब्राहम ने अपने पुत्र इसहाक को वेदी पर चढ़ाया, तो क्या वह कर्मों से धर्मी न ठहरा था? सो तू ने देख लिया कि विश्वास ने उसके कामों के साथ मिलकर प्रभाव डाला है, और कर्मों से विश्वास सिद्ध हुआ। और पवित्रशास्त्र का यह वचन पूरा हुआ कि अब्राहम ने परमेश्वर की प्रतीति की, और यह उसके लिए धार्मिकता गिना गया, और वह परमेश्वर का मित्र कहलाया। सो तुम ने देख लिया कि मनुष्य केवल विश्वास से ही नहीं, वरन कर्मों से भी धर्मी ठहरता है।” यह समझा गया कि यह पत्री पौलुस का खंडन करती है, और इसी कारण कुछ प्राचीन कलीसियाओं ने इसे अस्वीकार कर दिया। परन्तु उन्होंने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया कि पौलुस एक प्रकार के कामों की बात कर रहा था, और याकूब दूसरे प्रकार के कामों की। पौलुस उन कामों की बात कर रहा था जो व्यवस्था-सम्बन्धी उद्देश्यों से किए जाते हैं। परन्तु उसने हर जगह इस बात पर ज़ोर दिया है कि विश्वास से उत्पन्न होनेवाले भले काम, अर्थात विश्वास की धार्मिकता, उद्धार के लिए अनिवार्य हैं।

वह केवल इस बात का इनकार करता है कि व्यवस्था के कामों का, अर्थात व्यवस्था-सम्बन्धी उद्देश्यों पर आधारित कामों का, धर्मी ठहराए जाने के विषय में कोई भाग है। और याकूब भी यही बात सिखाता है, जब वह यह सिखाता है कि मनुष्य न तो कामों से और न केवल विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, बल्कि विश्वास और विश्वास के कामों, दोनों के द्वारा; या जैसा पौलुस इसे व्यक्त करता है, उस विश्वास के द्वारा जो प्रेम के द्वारा प्रभाव डालता है। आप यह ध्यान में रखें कि मैं सुसमाचार के अनुसार धर्मी ठहराए जाने की बात कर रहा हूँ, जो व्यवस्था के अनुसार धर्मी ठहराए जाने से बहुत भिन्न है।

4. सुसमाचार के अनुसार धर्मी ठहराया जाना, अर्थात विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराया जाना, क्षमा और परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाने में है।

जब हम कहते हैं कि मनुष्य विश्वास और पवित्रता के द्वारा धर्मी ठहराए जाते हैं, तो हमारा यह अर्थ नहीं कि वे व्यवस्था के आधार पर ग्रहण किए जाते हैं, बल्कि यह कि उनके विश्वास और विश्वास के कामों के कारण उनके साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है मानो वे धर्मी हों। यही वह रीति है जिसे परमेश्वर किसी पापी को धर्मी ठहराने में अपनाता है।

इसका यह अर्थ नहीं कि विश्वास धर्मी ठहराए जाने की नींव है। नींव तो मसीह में है। परन्तु पापियों को क्षमा किए जाने, ग्रहण किए जाने और धर्मी ठहराए जाने की रीति यह है कि यदि वे पश्चाताप करें, विश्वास करें और पवित्र बन जाएँ, तो मसीह के कारण उनके पिछले पाप क्षमा किए जाएँगे।

यहाँ यह दिखाई देगा कि सुसमाचार के अधीन धर्मी ठहराया जाना व्यवस्था के अधीन धर्मी ठहराए जाने से किस प्रकार भिन्न है। व्यवस्था के अनुसार धर्मी ठहराया जाना वास्तविक निर्दोषता और दोष से मुक्ति की घोषणा है।

सुसमाचार के अनुसार धर्मी ठहराया जाना क्षमा और ग्रहण किया जाना है, मानो वह व्यक्ति धर्मी हो, परन्तु उसकी अपनी आज्ञाकारिता से भिन्न आधारों पर। जब प्रेरित कहता है, “व्यवस्था के कामों से कोई प्राणी धर्मी नहीं ठहरेगा, तो वह धर्मी ठहराए जाने शब्द का प्रयोग एक वकील की भाँति, पूर्णतः कानूनी अर्थ में करता है।” परन्तु जब वह विश्वास के द्वारा धर्मी ठहराए जाने की बात करता है, तो वह व्यवस्था के अनुसार धर्मी ठहराए जाने की नहीं, बल्कि इस बात की चर्चा करता है कि किसी व्यक्ति के साथ ऐसा व्यवहार किया जाए मानो वह धर्मी हो।

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