व्याख्यान 158 (253 में से)

एक-दो दिन तक भी, अपने उद्धार के विषय में सोचे बिना, परमेश्वर में आनन्द से भरा रह सकता है। आप उससे पूछिए

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एक-दो दिन तक भी, अपने उद्धार के विषय में सोचे बिना, परमेश्वर में आनन्द से भरा रह सकता है। आप उससे पूछिए कि क्या उसे आशा है, तो उसने इस विषय में कभी सोचा ही नहीं। उसका आनन्द इस बात पर विश्वास करने पर निर्भर नहीं करता कि उसे क्षमा मिल गई है, वरन् वह मन की एक ऐसी दशा में है जो परमेश्वर के शासन को स्वीकार कर लेती है। मन की ऐसी दशा में वह सुखी हुए बिना रह ही नहीं सकता।

अब मैं पूछूँ कि आपका धर्म कौन-सा है? यदि आप सच्चे धर्म का आचरण करते हैं, तो मान लीजिए कि परमेश्वर आपको नरक में डाल दे, और वहाँ आपको परमेश्वर से सर्वोपरि प्रेम, और अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रखने दे, तो वह अपने आप में मन की एक ऐसी दशा है जो दुखी होने से मेल नहीं खाती।

मैं चाहता हूँ कि यह बात पूरी तरह समझ ली जाए। आशा के ये खोजी सदा निराश होंगे। यदि आप आशा के पीछे दौड़ते हैं, तो आपको कभी ऐसी आशा न मिलेगी जो किसी काम की हो। परन्तु यदि आप पवित्रता का पीछा करें, तो आशा, और शान्ति, और आनन्द अपने आप आ जाएँगे।

क्या आपका धर्म पवित्रता का प्रेम है, परमेश्वर का और आत्माओं का प्रेम है? या वह केवल एक आशा है?

IX. आप देखते हैं कि ऐसा क्यों है कि चिन्तित पापियों को शान्ति नहीं मिलती।

वे अपने ही दोष और अपने ही संकट को देख रहे हैं। वे परमेश्वर को एक पलटा लेनेवाले के रूप में देख रहे हैं, और उसके भयानक कामों से सिकुड़ रहे हैं। इस कारण उनके लिए कभी शान्ति तक पहुँचना असम्भव हो जाएगा।

जब तक वे परमेश्वर के उस क्रोध को देखते रहते हैं जो उन्हें मुरझा देता और कँपा देता है, तब तक वे उससे प्रेम नहीं कर सकते, वे उससे छिपते हैं। हे चिन्तित पापियो, मैं आपको एक भेद की बात बताता हूँ। यदि आप परमेश्वर के चरित्र के उसी एक पहलू को देखते रहेंगे, तो वह आपको निराशा में धकेल देगा, और निराशा सच्चे समर्पण से मेल नहीं खाती। आपको उसके सम्पूर्ण चरित्र को देखना चाहिए, और वे कारण देखने चाहिए जिनके कारण आपको उससे प्रेम करना चाहिए, और बिना किसी संकोच और बिना किसी अविश्वास के अपने आप को उस पर डाल देना चाहिए; और उससे सिकुड़ने के स्थान पर, सीधे उसके पास आकर कहना चाहिए, “हे स्वर्ग में रहनेवाले पिता, तू कठोर नहीं है, तू सर्वोच्च प्रभु है, परन्तु तू भला है, मैं तेरे शासन के अधीन होता हूँ, और अपने आप को, अपना सब कुछ और जो कुछ मैं हूँ, देह और प्राण समेत, समय और अनन्तकाल के लिए तुझे सौंपता हूँ।”

अगले व्याख्यान का विषय होगा, व्यवस्था-सम्बन्धी समर्पण और सुसमाचार-सम्बन्धी समर्पण के बीच का भेद, अर्थात् व्यवस्था के धर्म और विश्वास के धर्म के बीच का भेद। और यहाँ मैं यह भी कह दूँ कि जब मैंने धर्म में स्वार्थ के विषय पर प्रचार करना आरम्भ किया, तो मैंने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि कोई इसे विवादास्पद विषय समझेगा। मुझे विवाद का कोई शौक नहीं है, और मैं इस विषय को विवादास्पद कहने की बात उतनी ही सोच सकता हूँ जितनी परमेश्वर के अस्तित्व के सिद्धान्त को विवादास्पद विषय कहने की। यह प्रश्न सबसे बड़े महत्त्व का है, और हमें तर्कों को तौलना चाहिए, और परमेश्वर के वचन के अनुसार निर्णय करना चाहिए। शीघ्र ही हम सब एक साथ परमेश्वर के न्यायासन के सामने जाएँगे, और आपको यह निश्चय करना होगा कि आप वहाँ अपने हृदयों में स्वार्थ लेकर जाएँगे, या उस निःस्वार्थ परोपकार के साथ जो अपनी भलाई नहीं चाहता।

क्या आप अब ईमानदार होंगे? क्योंकि जैसे परमेश्वर सच्चा है, वैसे ही यह सच है कि यदि आप अपना ही हित खोज रहे हैं, तो जब तक आप पश्चाताप न करें, आप शीघ्र ही नरक में होंगे। ओह, ईमानदार बनिए! और पूर्वाग्रह को एक ओर रख दीजिए, और अनन्तकाल को ध्यान में रखकर काम कीजिए।

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