व्याख्यान 180 (253 में से)

II. यह सोचना मूर्खता है कि सुसमाचार के प्रस्ताव

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II. यह सोचना मूर्खता है कि सुसमाचार के प्रस्ताव स्वार्थी आशा उत्पन्न करने की प्रवृत्ति रखते हैं।

कुछ लोग पापी के मन के सामने परमेश्वर का सम्पूर्ण चरित्र रखने से डरते हैं; और वे उसे निराशा में गिराकर परमेश्वर के अधीन कराने का प्रयत्न करते हैं। यह न केवल सुसमाचार के विरुद्ध है, वरन् अपने आप में भी मूर्खता है। यह सोचना मूर्खता है कि किसी पापी के स्वार्थ को नष्ट करने के लिए आपको उससे यह ज्ञान छिपाना चाहिए कि परमेश्वर उससे कितना प्रेम करता है और उस पर कितनी दया करता है, और उसने उसे बचाने के लिए कितने बड़े बलिदान किए हैं।

III. यह बात सच होने से कोसों दूर है कि यदि पापियों को परमेश्वर की सच्ची करुणा जानने दी जाए तो उनके झूठी आशाएँ पा लेने का खतरा है; वरन् जब तक आप इसे छिपाए रखते हैं, तब तक उसे झूठी आशा के सिवाय और कोई आशा देना असम्भव है।

जो पापी पाप के बोध के नीचे तड़प रहा है, उससे यह तथ्य रोक रखना कि परमेश्वर ने उद्धार का प्रबन्ध केवल एक सेंत-मेंत के दान के रूप में किया है, उसके स्वार्थ को पक्का करने का ठीक वही मार्ग है; और यदि उसे कोई आशा मिलती भी है, तो वह अवश्य झूठी ही होगी। केवल व्यवस्था के द्वारा उस पर अधीनता का दबाव डालना, उसे एक स्व-धार्मिक नींव बनाने में लगा देना है।

IV. जहाँ तक हम देख सकते हैं, अनुग्रह के द्वारा उद्धार, जो किसी भी अंश में हमारे अपने कामों के कारण नहीं दिया जाता, स्वार्थी प्राणियों को सुधारकर वापस लाने का एकमात्र सम्भव मार्ग है।

मान लीजिए कि उद्धार पूरी तरह सेंत-मेंत न होता, वरन् कुछ अंश तक भले कामों को भी हिसाब में लिया जाता, और उन भले कामों के कारण हम आंशिक रूप से धर्मी ठहराए जाते, तो जितना यह विचार मन में रहता, उतना ही स्वार्थ को उत्तेजना मिलती। आपको पापी को यह दिखाना होगा कि वह पूरी तरह सेंत-मेंत के अनुग्रह पर निर्भर है, और यह कि विश्वास के पहले ही कार्य पर पूर्ण और सम्पूर्ण रूप से धर्मी ठहराया जाना केवल एक सेंत-मेंत के दान के रूप में दिया जाता है, और उसका कोई भी भाग उसके किसी काम के बदले में नहीं दिया जाता। केवल यही बात स्वार्थ के प्रभाव को गला देती है, और पवित्र आचरण को सुनिश्चित करती है।

V. यदि यह सब सत्य है, तो पापियों को उद्धार की सम्पूर्ण योजना से, जितनी पूरी रीति से सम्भव हो और जितनी शीघ्रता से हो सके, परिचित कराया जाना चाहिए।

उन्हें व्यवस्था को, और अपने दोष को, और यह भी दिखाया जाना चाहिए कि उनके पास अपने आप को बचाने का कोई मार्ग नहीं है; और तब परमेश्वर के प्रेम की सारी लम्बाई, और चौड़ाई, और ऊँचाई, और गहराई जितनी पूरी रीति से खोली जाएगी, उतनी ही प्रभावशाली रीति से आप उसके स्वार्थ को कुचल डालेंगे, और उसके प्राण को परमेश्वर के प्रति प्रेम में वश में कर लेंगे। पापियों से बातचीत करते समय उद्धार की सम्पूर्ण योजना को दिखाने से, और परमेश्वर की असीम करुणा का जितना पूरा प्रदर्शन सम्भव हो उतना करने से मत डरिए। उसे दिखाइए कि उसके दोष के होते हुए भी परमेश्वर का पुत्र द्वार खटखटा रहा है और उससे विनती कर रहा है कि वह परमेश्वर से मेल कर ले।

VI. आप देखते हैं कि पाप का बोध पाए हुए इतने सारे पापी इतने लम्बे समय तक सीनै पर्वत के चारों ओर क्यों चक्कर लगाते रहते हैं, और अपने ही कामों के द्वारा अपने आप को बचाने के लिए स्व-धार्मिक प्रयत्न करते रहते हैं।

कितनी ही बार आप पापियों को अधिक भावना पाने का प्रयत्न करते हुए पाते हैं, या इस बात की प्रतीक्षा करते हुए कि वे और अधिक प्रार्थनाएँ कर लें और और बड़े प्रयत्न कर लें, और यह आशा करते हुए कि वे परमेश्वर के सामने अपने आप को

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