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इस प्रकार आप देखते हैं कि व्यवस्था और सुसमाचार दोनों निःस्वार्थ परोपकार की माँग करते हैं, उस एकमात्र शर्त के रूप में जिस पर मनुष्य प्रसन्न हो सकता है।
3. सच्चे समर्पण में परमेश्वर की व्यवस्था के दण्ड में सहमति सम्मिलित है।
मैं फिर उस अन्तर की ओर ध्यान दिलाता हूँ जो मैं पहले बता चुका हूँ। इस संसार में हम केवल निरी व्यवस्था के शासन के अधीन नहीं हैं। यह संसार यहोवा के साम्राज्य का एक प्रान्त है, जो परमेश्वर के शासन से एक विशेष सम्बन्ध रखता है। इसने विद्रोह किया है, और एक नया और विशेष प्रबन्ध किया गया है, जिसके द्वारा परमेश्वर हमारे सामने दया प्रस्तुत करता है। शर्तें ये हैं कि हम व्यवस्था की आज्ञाओं का पालन करें, और दण्ड के न्यायसंगत होने को स्वीकार करें। यह व्यवस्था का शासन है, जिसके साथ सुसमाचार जोड़ा गया है। सुसमाचार भी व्यवस्था के समान ही आज्ञाकारिता की माँग करता है। वह पाप की दण्ड-योग्यता को बनाए रखता है, और पापी से माँग करता है कि वह दण्ड के न्यायसंगत होने में सहमति दे। यदि पापी केवल व्यवस्था के अधीन होता, तो वह उससे यह माँग करती कि वह दण्ड दिए जाने के आगे झुक जाए। परन्तु मनुष्य केवल व्यवस्था के शासन के अधीन नहीं है, और पतन के बाद से कभी रहा भी नहीं, वरन् उसने सदा, कम या अधिक स्पष्टता से, जाना है कि दया प्रस्तुत की गई है। इसलिये यह कभी माँग नहीं की गई कि मनुष्य दण्ड पाने को तैयार रहें। इसी बात में सुसमाचारीय समर्पण व्यवस्था-सम्बन्धी समर्पण से भिन्न है। निरी व्यवस्था के अधीन, समर्पण दण्ड पाने को तैयार रहने में होता। इस संसार में, समर्पण दण्ड के न्यायसंगत होने में सहमति देने में, और अपने आप को परमेश्वर के अनन्त क्रोध के योग्य समझने में है।
4. सच्चे समर्पण में परमेश्वर की प्रभुसत्ता में सहमति सम्मिलित है।
हर एक सम्राट का यह कर्तव्य है कि वह देखे कि उसकी सारी प्रजा उसके शासन के आधीन रहे।
और उसका कर्तव्य है कि वह ऐसे नियम बनाए कि यदि हर व्यक्ति पूरी तरह उनका पालन करे, तो वह अधिक से अधिक सम्भव मात्रा में सार्वजनिक भलाई को बढ़ाए। और तब, यदि कोई पालन करने से इनकार करे, तो उसका कर्तव्य है कि वह उस व्यक्ति को बलपूर्वक पकड़े, और एक विद्रोही प्रजा से जितनी अच्छी रीति से सम्भव हो, उससे सार्वजनिक हित की सेवा करवाए। यदि वह स्वेच्छा से सार्वजनिक भलाई की सेवा नहीं करेगा, तो उससे अनिच्छा से ऐसा करवाया जाना चाहिए। शासन को या तो उसे फाँसी देनी होगी, या बन्द करना होगा, या किसी प्रकार उसे दुःख भोगने का एक उदाहरण बनाना होगा; या यदि सार्वजनिक भलाई दया की अनुमति देती है, तो वह ऐसी रीति से दया दिखा सकता है जिससे सामान्य हित की सबसे अच्छी सेवा हो। अब
परमेश्वर एक प्रभुसत्ता-सम्पन्न शासक है, और जो समर्पण वह माँगता है वह ठीक वही है जिसे माँगने के लिये वह बाध्य है। यदि वह इसकी माँग न करता तो वह शासक के रूप में अपने कर्तव्य की उपेक्षा करता। और क्योंकि आपने इस माँग को मानने से इनकार किया है, इसलिये अब आप बाध्य हैं कि अपने आप को उसके हाथों में सौंप दें, ताकि वह समय और अनन्तकाल के लिये आपके विषय में उस रीति से निर्णय करे जो विश्व के हितों को सबसे अधिक बढ़ाए। आपने विश्व की प्रसन्नता में किसी भी भाग पर, या परमेश्वर की कृपा पर, अपना सारा अधिकार खो दिया है। और अब आपसे जो माँगा जाता है वह यह है कि क्योंकि आप बीते समय के लिये आज्ञाकारिता नहीं दे सकते, इसलिये आप उसकी व्यवस्था के न्याय को स्वीकार करें, और अपने भावी भाग्य को, समय और अनन्तकाल दोनों के लिये, पूरी तरह और बिना किसी शर्त के उसके हाथ में छोड़ दें। जो कुछ आपके पास है और जो कुछ आप हैं, वह सब आपको उसके आधीन कर देना चाहिए। आपने न्यायोचित रूप से सब कुछ खो दिया है, और आप बाध्य हैं कि उसके राज्य के हितों को बढ़ाने के लिये, वह जिस किसी रीति से माँगे, उसकी आज्ञा पर सब कुछ दे दें।
