व्याख्यान 204 (253 में से)

कि इस उद्धृत वाक्यांश में वह सिद्ध पवित्रीकरण की बात कर रहा है, बल्कि सिद्ध

यह हिन्दी संस्करण मशीन-सहायता से अनुवादित है और समीक्षा की प्रक्रिया में है। अध्ययन के लिए अंग्रेज़ी मूल पाठ ही प्रामाणिक है। कोई त्रुटि दिखे तो [email protected] पर लिखें।

कि इस उद्धृत वाक्यांश में वह सिद्ध पवित्रीकरण की बात कर रहा है, बल्कि सिद्ध ज्ञान की।

और प्रेरित यूहन्ना अपने विषय में ऐसे बोलता है मानो वह परमेश्वर से सिद्ध प्रेम रखता था। परन्तु प्रेरितों के वास्तविक चरित्र के विषय में सच्चाई चाहे जो भी हो, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि क्योंकि वे सिद्ध नहीं थे, इसलिए कोई और भी सिद्ध नहीं हो सकता। वे स्पष्ट रूप से इसे एक कर्तव्य घोषित करते हैं, और यह भी कि वे इसी का लक्ष्य रखकर चल रहे थे, ठीक ऐसे मानो वे इसे इसी जीवन में प्राप्त कर लेने की आशा रखते थे। और वे हमें भी ऐसा ही करने की आज्ञा देते हैं।

5. “परन्तु क्या हमारा यह सोचना ढिठाई नहीं कि हम प्रेरितों और आदिम मसीहियों से भी अच्छे हो सकते हैं?”

उत्तर। इसमें ढिठाई क्या है? क्या यह तथ्य नहीं कि धार्मिक अनुभव के लिए हमें आदिम कलीसियाओं की तुलना में कहीं अधिक सुविधाएँ प्राप्त हैं? उनके अनुभव का लाभ, सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र, संसार की दशा, सहस्राब्दी राज्य का निकट आना — ये सब हमें आदिम विश्वासियों की अपेक्षा अधिक लाभ की स्थिति में रखते हैं। क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि कलीसिया धार्मिक अनुभव के विषय में सदा जहाँ की तहाँ खड़ी रहेगी, और किसी भी बात में कभी आगे नहीं बढ़ेगी? इसके लिए पवित्रशास्त्र का कौन-सा प्रमाण है? कलीसिया सदा अधिक अच्छी क्यों न होती जाए? ऐसा लगता है कि प्रचलित धारणा यह है कि कलीसिया को सदा पीछे मुड़कर आदिम पवित्र लोगों को ही मानदण्ड के रूप में देखते रहना है। मेरा विचार है कि इसका उलटा ही कर्तव्य है, और हमें सदा उनके मानदण्ड से कहीं ऊँचे मानदण्ड का लक्ष्य रखना चाहिए। मेरा विश्वास है कि सहस्राब्दी राज्य के आने से पहले कलीसिया को आदिम

मसीहियों से बहुत आगे निकल जाना होगा। प्रेरितों को मैं इस विचार से अलग रखता हूँ, क्योंकि यह स्पष्ट रूप से नहीं दिखता कि वे पूरी तरह पवित्र न हो गए हों।

6. “परन्तु इतने सारे लोग सिद्ध होने का दावा करते हैं जो वास्तव में सिद्ध नहीं हैं, कि मैं इस जीवन में सिद्धता पर विश्वास नहीं कर सकता।”

उत्तर। कितने ही लोग धनी होने का दावा करते हैं जो धनी नहीं हैं; तो क्या आप इस कारण यह कहेंगे कि आप विश्वास नहीं कर सकते कि कोई भी धनी है? क्या खूब तर्क है!

7. “सिद्धता का दावा करनेवालों में से इतने सारे लोग भ्रम और धर्मोन्माद में पड़ गए हैं कि मुझे इसके विषय में सोचने से भी डर लगता है।”

उत्तर। इतिहास में मैं पाता हूँ कि आज तक जितनी भी बड़ी और व्यापक जागृतियाँ हुई हैं, उनमें से हर एक में से सिद्धतावादियों का एक पंथ निकल खड़ा हुआ है। और जागृति के प्रभावों को निष्फल करने के लिए यही तो शैतान की सबसे निपुण चालों में से एक है। वह जानता है कि यदि कलीसिया पवित्रता के उचित मानदण्ड तक पहुँचा दी जाए, तो यह पृथ्वी पर उसकी शक्ति के लिए शीघ्र ही प्राणघातक चोट सिद्ध होगी; और भक्ति के मानदण्ड को ऊँचा उठाने के लिए कलीसिया के प्रयासों को विफल करने के लिए वह यह मार्ग अपनाता है कि डराकर

मसीहियों को ठीक उस बिन्दु तक सीधे आगे बढ़ने से, और परमेश्वर की इच्छा के पूर्णतः अनुरूप जीवन जीने का लक्ष्य रखने से रोक दे। और वह इसमें इतना सफल हुआ है कि जिस क्षण आप कलीसिया पर ज़ोर डालने लगते हैं कि वह पवित्र बने और अपने सब पापों को छोड़ दे, उसी क्षण कोई न कोई चिल्ला उठेगा, “अरे, यह तो सिद्धतावाद की ओर ले जाता है!” और इस प्रकार वे उसे बदनाम करके दबा देते हैं।

8. “परन्तु क्या आप सचमुच सोचते हैं कि इस संसार में कभी कोई पूर्णतः पवित्र हुआ है?”

उत्तर। मेरे पास यह विश्वास करने का कारण है कि ऐसे बहुत-से लोग हुए हैं। इसकी बहुत अधिक सम्भावना है कि हनोक और एलिय्याह संसार से उठा लिए जाने से पहले पाप से मुक्त थे। और कलीसिया के विभिन्न

↑