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फरीसियों को कपटी कहने का साहस करता है, और हमसे कहता है कि यदि हमारी धार्मिकता उनकी धार्मिकता से बढ़कर न हो, तो हम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाएँगे। उसमें कैसी बुरी आत्मा है।”
आज के दिन कलीसिया का एक बड़ा भाग उसी आत्मा का है, और कलीसिया की आँखें खोलने का, और मसीहियों को यह दिखाने का हर प्रयत्न कि वे इतना नीचा, इतना सांसारिक, इतना कपटियों जैसा जीवन बिताते हैं कि प्रभु का काम आगे बढ़ ही नहीं सकता, केवल दुर्भावना जगाता है और निन्दा का कारण बनता है। “आह,” वे कहते हैं, “वह कैसी बुरी आत्मा दिखाता है, कितना दोष लगानेवाला, और कितना निर्दयी; यह और चाहे कुछ भी हो, परमेश्वर के पुत्र की नम्र, और दयालु, और प्रेमपूर्ण आत्मा तो निश्चय ही नहीं है।” वे भूल जाते हैं कि यीशु मसीह ने उन लोगों के विरुद्ध, जो उस समय सबसे भक्त लोग होने की प्रतिष्ठा रखते थे, कैसे अपने शाप उंडेले थे, इतने कि यहूदिया की पहाड़ियाँ काँप उठें। मानो यीशु मसीह ने कभी किसी से कोई कठोर बात कही ही न हो, बल्कि केवल उनकी चापलूसी करता रहा हो, और उन्हें पुचकारकर अपने राज्य में ले आया हो। कौन नहीं जानता कि वह धर्म का अंगीकार करनेवालों द्वारा दिखाई गई कपटपूर्ण आत्मा ही थी जिसने उसके प्राण को झकझोर दिया और उसके क्रोध को भड़काया, और उसकी निन्दा की जलती हुई धाराओं को बहा दिया।
वह सदा उन्हीं लोगों के विषय में शिकायत करता रहा जिन्हें भक्ति के आदर्श के रूप में खड़ा किया गया था, और उन्हें कपटी कहा, और उनके सिरों पर ये भयानक शब्द गरजकर सुनाए, “तुम नरक के दण्ड से क्योंकर बचोगे!”
जब इतने बहुत-से लोगों को मनुष्यों की प्रशंसा परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जब सत्य बताया जाता है तो उत्तेजना फैल जाए। भक्ति का स्तर जैसा है उससे वे बहुत संतुष्ट हैं, और सोचते हैं कि जब लोग सब्त-स्कूलों, और मिशनों, और ट्रैक्टों के लिए इतना कुछ कर रहे हैं, तो यह काफ़ी अच्छा कर रहे हैं, और वे आश्चर्य करते हैं कि आखिर वह व्यक्ति और क्या चाहता है। हाय! हाय! उनका अंधापन! वे यह जानते हुए प्रतीत नहीं होते कि इस सब के बावजूद धर्म का अंगीकार करनेवाले अधिकांश मसीहियों का जीवन यीशु मसीह के मापदण्ड से लगभग उतना ही भिन्न है जितना ज्योति अंधकार से।
3. वे परमेश्वर की उन माँगों में, जिन्हें जनमत दृढ़ता से लागू करता है, और उन माँगों में जिनकी इस प्रकार रक्षा नहीं होती, भेद करते हैं।
वे उन माँगों को मानने में बहुत सावधान रहते हैं जिनका जनमत स्पष्ट रूप से समर्थन करता है, जबकि उन माँगों को वे आसानी से तुच्छ जानकर टाल देते हैं जिन्हें जनमत लागू नहीं करता। इसके उदाहरण आपके चारों ओर हैं। मैं संयम-सुधार का उल्लेख कर सकता हूँ। कितने ही लोग हैं जो इस विषय में जनमत के आगे वह झुकाव दिखाते हैं जो वे कभी परमेश्वर या मनुष्य के आगे न दिखाते। पहले वे यह देखने के लिए रुके रहे कि ऊँट किस करवट बैठता है। उन्होंने तेज़ शराब छोड़ने का विरोध किया। परन्तु जब वह लोकप्रिय हो गया, और उन्होंने पाया कि दूसरे मादक उत्तेजकों के सहारे उनका काम भली-भाँति चल सकता है, तो उन्होंने उसे छोड़ दिया। परन्तु उन्होंने ठान लिया है कि जनमत उन्हें जितना धकेलेगा, उससे आगे वे बिलकुल नहीं झुकेंगे। वे दिखाते हैं कि संयम-समिति में शामिल होने में उनका उद्देश्य यह नहीं है कि सुधार को पूरा करें, ताकि असंयम नामक दैत्य का वध हो जाए; बल्कि उनका उद्देश्य एक अच्छी साख बनाए रखना है। उन्हें “मनुष्यों की प्रशंसा परमेश्वर की प्रशंसा से अधिक प्रिय लगती है।”
देखिए, कितने व्यक्ति ऐसे हैं जो सब्त को इसलिए नहीं मानते कि वे परमेश्वर से प्रेम करते हैं, बल्कि इसलिए कि ऐसा करना सम्मानजनक है। यह स्पष्ट है, क्योंकि वे उसे तब तक मानते हैं जब तक वे अपने
