व्याख्यान 105 (253 में से)

6. वह निरी स्वधार्मिकता के कारण अपनी बेईमान प्रवृत्तियों पर अंकुश रख सकता है, और

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6. वह निरी स्वधार्मिकता के कारण अपनी बेईमान प्रवृत्तियों पर अंकुश रख सकता है, और अपने विषय में अपनी अच्छी राय को सहारा देने के लिए बड़ी बातों में ईमानदारी से काम कर सकता है, जबकि छोटी बातों में वह धोखा देगा और धूर्तता करेगा।

मैंने आरम्भ में कहा था कि मेरा यह अर्थ नहीं कि यदि कोई मनुष्य छोटे-छोटे अनुचित लाभ उठाएगा, तो वह निश्चय ही कभी ऊपरी तौर पर खराई से काम नहीं करेगा। प्रायः ऐसा होता है कि जो व्यक्ति छोटे मामलों में बड़ी नीचता और बेईमानी से काम करते हैं, वे इस आधार पर खराई और प्रतिष्ठा से काम करेंगे कि उनकी साख और उनका हित दाँव पर लगा है। बहुत-से मनुष्य, जिन्हें व्यापारियों के बीच एक प्रतिष्ठित व्यापारी माना जाता है, उन लोगों को, जो उनसे अधिक घनिष्ठ परिचय रखते हैं, भली-भाँति ज्ञात होते हैं कि वे छोटी बातों में, या अधिक दीन और अधिक आश्रित व्यक्तियों के साथ अपने व्यवहार में, नीच, धूर्त और दूसरों को ठगनेवाले हैं। यह स्पष्ट है कि ऐसे मनुष्य से उसके अधिक सार्वजनिक लेन-देन में ऊपरी ईमानदारी का काम करानेवाली बात हृदय की सच्ची ईमानदारी नहीं है।

इसी प्रकार मैंने कहा था कि यदि कोई व्यक्ति छोटी-मोटी चोरियाँ करेगा, तो यह निश्चित नहीं कि वह राजमार्ग पर डाका डालेगा। उससे दूर रहने के लिए उसके पास अनेक कारण हो सकते हैं, जबकि उसमें इतनी ईमानदारी का एक कण भी न हो कि वह राजमार्ग पर डाका डालने से, या भीड़ में आपकी जेब काटकर बटुआ उड़ा लेने से रुक जाए।

हो सकता है उस व्यक्ति में राजमार्ग पर डाका डालने का साहस न हो, या पर्याप्त कौशल न हो, या पर्याप्त हिम्मत न हो, या वह क़ानून से डरता हो, या बदनामी से डरता हो, या कोई और कारण हो।

कोई व्यक्ति आदतन अशुद्ध विचारों में लिप्त रह सकता है, और फिर भी कभी वास्तव में व्यभिचार न करे। वह भय से, या अवसर के अभाव से रुका रह सकता है, न कि सिद्धान्त से। यदि वह अशुद्ध विचारों में लिप्त रहता है, तो वह निश्चय ही अशुद्ध आचरण करता, यदि सिद्धान्त की पवित्रता के अलावा कोई और कारण उसे न रोकते।

कोई व्यक्ति लोभी मनोवृत्ति प्रकट कर सकता है, और फिर भी चोरी न करे। परन्तु उसमें वही मनोवृत्ति है जो उसे चोरी की ओर ले जाती, यदि ईमानदारी या सिद्धान्त के अलावा अन्य कारणों से वह रुका न होता।

कोई मनुष्य क्रोधित हो सकता है, और फिर भी उसका क्रोध कभी हत्या के रूप में न फूटे। परन्तु जहाँ तक सिद्धान्त का प्रश्न है, उसकी घृणा उसे ऐसा करने तक ले जाती। और यदि ऐसा नहीं होता, तो यह सच्चे सिद्धान्त के अलावा अन्य कारणों से है।

कोई व्यक्ति अपने संगी मनुष्य पर अत्याचार कर सकता है, उसे दास बना सकता है, उसे शिक्षा से वंचित कर सकता है, और अपने लाभ के लिए उसे बिना मज़दूरी के परिश्रम करने को विवश कर सकता है, और फिर भी हत्या न करे, या दास-व्यापार में लगने के लिए अफ़्रीका न जाए, क्योंकि इससे उसकी प्रतिष्ठा या उसका प्राण ख़तरे में पड़ जाएगा। परन्तु यदि वह अपने घमण्ड को तृप्त करने या अपने हित को बढ़ाने के लिए ऐसा काम करेगा जो जीवन से वह सब छीन लेता है जो उसे वांछनीय बनाता है, तो जो बात उसे, यदि उसका हित ऐसा चाहे, किसी भी सीमा तक जाने से रोकती है, वह न तो परमेश्वर के प्रति प्रेम का और न मनुष्य के प्रति प्रेम का सिद्धान्त हो सकती है। यदि कोई मनुष्य अपने स्वार्थपूर्ण हित के विचार से किसी मनुष्य के प्रति ऐसा मार्ग अपनाएगा जो उसे उस सब से वंचित कर देगा जो जीवन को वांछनीय बनाता है, तो यह देखना सरल है कि जहाँ तक सिद्धान्त का प्रश्न है, जब उसका हित ऐसा चाहे, तब अफ़्रीका के तट पर बलपूर्वक ऐसा करने में, या प्राण ही ले लेने में, उसके मार्ग में कोई बाधा नहीं है।

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