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हज़ार सफ़ाइयों और बहानों से ढाँप देगा, उन पर लीपापोती करने और उनकी भयानकता को घटाकर दिखाने का प्रयत्न करेगा। यदि वह अपने पिछले आचरण की बात करता है, तो सदा सबसे कोमल और सबसे अनुकूल शब्दों में करता है। आप उसमें अपने पाप को ढाँपने की निरन्तर प्रवृत्ति देखते हैं। यह पश्चाताप मृत्यु की ओर ले जाता है। यह उससे एक पाप को ढाँपने के लिए दूसरा पाप करवाता है। संवेदना और स्पष्टवादिता के उस निष्कपट, खुले मन से फूट पड़ने के बजाय, आप चिकनी-चुपड़ी, मीठी-मीठी बातें बनानेवाली, आधे मन से नपी-तुली कही गई कोई ऐसी बात देखते हैं जो पाप-स्वीकार का काम देने के लिए होती है, और फिर भी जिसमें कुछ भी स्वीकार नहीं किया जाता।
आपके साथ यह कैसा है? क्या आपको इस बात से लज्जा आती है कि कोई व्यक्ति आपसे आपके पापों के विषय में बात करे?
तो आपका शोक केवल सांसारिक शोक है, और मृत्यु उत्पन्न करता है। आप कितनी बार पापियों को अपने पापों के विषय में बातचीत से बचने के लिए कतराते देखते हैं, और फिर भी वे अपने आप को चिन्तित खोजी कहते हैं, और उसी रीति से मसीही बन जाने की आशा रखते हैं। इसी प्रकार का शोक नरक में पाया जाता है। निस्सन्देह अथाह कुण्ड के वे सब अभागे निवासी परमेश्वर की आँख से दूर भाग जाना चाहते हैं। स्वर्ग में पवित्र लोगों के बीच ऐसा शोक नहीं पाया जाता। उनका शोक खुला, निष्कपट, भरपूर और हार्दिक है। ऐसा शोक सच्चे आनन्द के विरुद्ध नहीं है। पवित्र लोग आनन्द से भरपूर हैं, और फिर भी पाप के लिए गहरे, बिना छिपाए, और उमड़ते हुए शोक से भरपूर हैं। परन्तु यह सांसारिक शोक अपने आप पर लज्जित होता है, ओछा और दयनीय होता है, और मृत्यु उत्पन्न करता है।
3. झूठा पश्चाताप आचरण का केवल आंशिक सुधार उत्पन्न करता है।
सांसारिक शोक से जो सुधार उत्पन्न होता है, वह केवल उन्हीं बातों तक पहुँचता है जिनके विषय में व्यक्ति को गहरा बोध हुआ है। मन नहीं बदला है। आप उसे केवल उन मुख्य पापों से बचते देखेंगे जिनके विषय में वह बहुत व्याकुल रहा है।
उस नए विश्वासी को देखिए। यदि वह धोखे में है, तो आप पाएँगे कि उसके आचरण में केवल आंशिक परिवर्तन हुआ है। कुछ बातों में वह सुधर गया है, परन्तु बहुत सी बातें हैं जो गलत हैं और जिन्हें वह करता ही जाता है।
यदि आप उससे घनिष्ठ परिचय कर लें, तो उसे हर कहीं पाप के प्रति काँपती हुई सजगता से भरा, और सुसमाचार की आत्मा के विरुद्ध हर बात में उसे झट पहचान लेनेवाला पाने के बजाय, आप उसे शायद कुछ बातों के विषय में कठोर और पैनी दृष्टिवाला, परन्तु दूसरी बातों में अपने आचरण में ढीला और अपने विचारों में शिथिल पाएँगे, और सब पापों के विषय में मसीही आत्मा प्रकट करने से बहुत दूर पाएँगे।
4. साधारणतः, झूठे शोक से उत्पन्न सुधार उन बातों में भी अस्थायी होता है जिनमें सुधार हुआ है।
वह व्यक्ति बार-बार अपने पुराने पापों में फिर गिरता रहता है। इसका कारण यह है कि पाप करने की प्रवृत्ति गई नहीं, वह केवल भय के द्वारा रोकी और दबाई गई है, और ज्यों ही उसे आशा मिल जाती है और वह कलीसिया में आ जाता है और ऐसा सहारा पा लेता है कि उसके भय शान्त हो जाते हैं, आप उसे धीरे-धीरे पीछे खिसकते, और थोड़े ही समय में अपने पुराने पापों की ओर लौटते देखते हैं। इस्राएल के घराने की यही कठिनाई थी, जिसके कारण वे इतनी बार अपनी मूर्तिपूजा और अन्य पापों की ओर लौट जाते थे। उनमें केवल सांसारिक शोक था। आप इसे अब कलीसिया में हर कहीं देखते हैं। लोग कुछ समय के लिए सुधर जाते हैं, और कलीसिया में ले लिए जाते हैं, और फिर अपने पुराने पापों में जा गिरते हैं। वे इसे धर्म में ठण्डे पड़ जाना, और पीछे हटना, और ऐसे ही नाम देना पसन्द करते हैं। परन्तु सच्चाई यह है कि वे सदा से
