व्याख्यान 184 (253 में से)

नैतिक कर्ता वह है जिसमें समझ, इच्छा-शक्ति और विवेक हो। विवेक

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नैतिक कर्ता वह है जिसमें समझ, इच्छा-शक्ति और विवेक हो। विवेक वह शक्ति है जो नैतिक विषयों के बीच के भेद को पहचानती है। इस बात पर विवाद नहीं किया जाएगा कि किसी नैतिक कर्ता को सही और गलत के बीच का भेद देखने तक ले जाया जा सकता है, यहाँ तक कि उसका नैतिक स्वभाव उस बात का समर्थन करे जो सही है। नहीं तो किसी पापी को कभी भी पाप के बोध के अधीन नहीं लाया जा सकता।

यदि उसमें ऐसा नैतिक स्वभाव नहीं है जो परमेश्वर की व्यवस्था को देख सके और उसका पूरा समर्थन कर सके, और दण्ड को न्यायसंगत ठहरा सके, तो उसे पाप का बोध नहीं कराया जा सकता।

क्योंकि पाप का बोध यही है, कि वह उस व्यवस्था की भलाई को देखे जिसे उसने तोड़ा है, और उस दण्ड के न्याय को देखे जिसका वह भागी हुआ है। परन्तु वास्तव में स्वर्ग, पृथ्वी या नरक में ऐसा कोई नैतिक कर्ता नहीं जिसे यह न दिखाया जा सके कि परमेश्वर की व्यवस्था सही है, और जिसका विवेक उस व्यवस्था का समर्थन न करता हो।

5. मनुष्य न केवल व्यवस्था को सही मानकर उसका समर्थन कर सकते हैं, वरन् जब उस पर अमूर्त रूप से, और स्वयं उन पर उसके प्रभाव का ध्यान किए बिना विचार किया जाता है, तो वे प्रायः उस पर मनन करने में सच्चा आनन्द भी ले सकते हैं।

यह आत्म-धोखे का एक बड़ा स्रोत है। मनुष्य परमेश्वर की व्यवस्था को अमूर्त रूप में देखते हैं, और उससे प्रेम करते हैं। जब उसका विरोध करने का कोई स्वार्थी कारण सामने नहीं होता, तो उसे देखने में उन्हें आनन्द मिलता है।

वे अमूर्त रूप में उस बात का समर्थन करते हैं जो सही है, और दुष्टता की निन्दा करते हैं। जब कोई स्वार्थी कारण उन पर दबाव नहीं डाल रहा होता, तब सब मनुष्य ऐसा करते हैं। किसने कभी कोई ऐसा दुष्ट मनुष्य पाया जो अमूर्त रूप में बुराई का समर्थन करता हो? कोई ऐसा नैतिक प्राणी कहाँ कभी पाया गया जिसने शैतान के चरित्र का समर्थन किया हो, या दूसरे ऐसे दुष्ट मनुष्यों का समर्थन किया हो जिनसे उसका अपना कोई सम्बन्ध न था?

कितनी ही बार आप दुष्ट मनुष्यों को दूसरों की घोर दुष्टता के प्रति अत्यन्त घृणा और तिरस्कार प्रकट करते सुनते हैं। यदि उनकी वासनाएँ किसी भी रीति से भूल या अन्याय के पक्ष में न लगी हों, तो मनुष्य सदा उस बात के पक्ष में खड़े होते हैं जो सही है। और जो सही है उसका यह केवल स्वाभाविक-रचनागत समर्थन, जब वे यह नहीं देखते कि सही बात के सम्बन्ध किसी भी रीति से उनके अपने स्वार्थ में बाधा डालते हैं, तो आनन्द की सीमा तक भी पहुँच सकता है।

6. सत्य और परमेश्वर की व्यवस्था के इस स्वाभाविक-रचनागत समर्थन में, और उससे स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होनेवाले आनन्द में, कोई सद्गुण नहीं है।

यह केवल वही है जो मनुष्य के नैतिक स्वभाव से सम्बन्ध रखता है। यह स्वाभाविक रूप से मन की रचना से उत्पन्न होता है। मन अपनी रचना के कारण सद्गुण की सुन्दरता को देखने में समर्थ है। और इसमें कोई सद्गुण होना तो दूर रहा, वास्तव में यह उनकी भ्रष्टता की प्रबलता का और भी स्पष्ट प्रमाण है कि जब वे सही बात को जानते हैं, और उसकी श्रेष्ठता को देखते हैं, तब भी वे उसका पालन नहीं करते। तो बात यह नहीं है कि पश्चाताप न करनेवाले पापियों में कुछ ऐसा है जो पवित्र है। वरन् इसमें उनकी दुष्टता और भी अधिक बड़ी दिखाई देती है। क्योंकि पाप की दुष्टता उस ज्योति के अनुपात में होती है जो प्राप्त है। और जब हम पाते हैं कि मनुष्य न केवल परमेश्वर की व्यवस्था की श्रेष्ठता को देख सकते हैं, वरन् उसका प्रबल समर्थन भी कर सकते हैं और उसमें आनन्द भी ले सकते हैं, और फिर भी उसका पालन नहीं करते, तो यह दिखाता है कि वे कितने अत्यन्त दुष्ट हैं, और पाप को बहुत ही पापमय ठहराता है।

7. भाषा का यह एक सामान्य प्रयोग है कि लोग कहते हैं, “मैं अमुक-अमुक काम करता, परन्तु कर नहीं सकता,” जबकि उनका अभिप्राय केवल इतना होता है कि उन्हें ऐसा चाहनेवाला समझा जाए, न कि वास्तव में ऐसा करना चुननेवाला।

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