व्याख्यान 30 (253 में से)

अपने पड़ोसी को अवश्य डाँटना, और उस पर पाप न रहने देना। लैव्यव्यवस्था 19:17।

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अध्याय 4: डाँटना — एक मसीही कर्तव्य।

अपने पड़ोसी को अवश्य डाँटना, और उस पर पाप न रहने देना। लैव्यव्यवस्था 19:17।

पूरा पद इस प्रकार है: “अपने मन में अपने भाई के प्रति बैर न रखना; अपने पड़ोसी को अवश्य डाँटना, और उस पर पाप न रहने देना।” हाशिये में, जैसा कि आप में से वे लोग देख सकते हैं जिनकी बाइबलों में हाशिये की टिप्पणियाँ हैं, पद के अन्तिम शब्दों का अनुवाद यों किया गया है, “कि तू उसके कारण पाप का भार न उठाए।” और मुझे निश्चय है कि यही सही अनुवाद है। विचार यह है कि मनुष्य अपने पड़ोसियों को उनके पाप के लिए डाँटने के लिए बाध्य हैं, ऐसा न हो कि वे उनके साथ सहभागी बन जाएँ, या उनके पाप में सहअपराधी ठहरें।

इन शब्दों पर बोलते हुए, मैं निम्नलिखित क्रम अपनाना चाहता हूँ:

I. पद में और पद के द्वारा दिए गए नियम के कारणों को दिखाना। II. दिखाना कि यह नियम किन पर लागू होता है। III. उन कई अपवादों का उल्लेख करना जो परमेश्वर ने इस नियम में रखे हैं, अर्थात् उन प्रकार के लोगों का जिन्हें उनके पापों के लिए डाँटना नहीं है। IV. इस कर्तव्य को पूरा करने की रीति। V. स्थापित सिद्धान्तों के कई विशेष प्रयोग।

I. मुझे इस नियम के कारण दिखाने हैं।

1. परमेश्वर के प्रति प्रेम स्पष्ट रूप से इसकी माँग करता है।

यदि हम सचमुच परमेश्वर से प्रेम करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से हम अपने आप को उन लोगों को डाँटने के लिए बाध्य अनुभव करेंगे जो उससे बैर रखते हैं, उसका अनादर करते हैं और उसकी आज्ञाओं को तोड़ते हैं। यदि मैं अपने देश की सरकार से प्रेम करता हूँ, तो क्या मैं उस मनुष्य को नहीं डाँटूँगा और झिड़कूँगा जो सरकार का अपमान करे या उसकी निन्दा करे! यदि कोई बालक अपने माता-पिता से प्रेम करता है, तो क्या वह स्वाभाविक रूप से उस मनुष्य को नहीं डाँटेगा जो उसके सुनते हुए उसके माता-पिता का अपमान करता है?

2. समस्त विश्व के प्रति प्रेम भी यही करवाएगा।

यदि कोई मनुष्य समस्त विश्व से प्रेम करता है, यदि वह सार्वभौमिक परोपकार से प्रेरित है, तो वह जानता है कि पाप विश्व की सर्वोच्च भलाई से मेल नहीं खाता, और यदि उसका प्रतिरोध न किया जाए तो वह सम्पूर्ण को हानि पहुँचाने और नष्ट करने वाला है; कि उसकी सीधी प्रवृत्ति विश्व की व्यवस्था को उलट देने और उसके सुख को नष्ट कर देने की है। और इसलिए, यदि वह इसे होते देखता है, तो उसका परोपकार उसे इसे डाँटने और इसका विरोध करने के लिए प्रेरित करेगा।

3. जिस समाज में आप रहते हैं उसके प्रति प्रेम एक और कारण है।

केवल सामान्य रूप से समस्त विश्व के प्रति प्रेम ही नहीं, बल्कि उन विशेष लोगों के प्रति प्रेम भी जिनसे आप जुड़े हुए हैं, आपको पाप को डाँटने के लिए प्रेरित करना चाहिए। पाप किसी भी जाति के लिए कलंक है, और जो कोई उसे करता है वह समाज की ऐसी दशा उत्पन्न करने में योग देता है जो हर भली बात के लिए हानिकारक है। उसके उदाहरण की प्रवृत्ति समाज को भ्रष्ट करने, उसकी शान्ति को नष्ट करने, और अव्यवस्था और विनाश लाने की होती है, और समाज से प्रेम करनेवाले हर व्यक्ति का कर्तव्य है कि वह उसका विरोध करे और उसे डाँटे।

4. अपने पड़ोसी के प्रति प्रेम इसकी माँग करता है।

यहाँ पड़ोसी का अर्थ है कोई भी व्यक्ति जो आपके प्रभाव की पहुँच के भीतर पाप करता है; केवल आपकी उपस्थिति में ही नहीं, बल्कि आपके आस-पड़ोस में, यदि आपका प्रभाव उस तक पहुँच सकता है, या आपके राष्ट्र में, या संसार में। यदि वह पाप करता है तो वह अपने आप को हानि पहुँचाता है, और इसलिए यदि हम उससे प्रेम करते हैं तो हम उसके पापों के लिए उसे डाँटेंगे। मतवाले के प्रति प्रेम हमें प्रेरित करता है कि हम उसे उसकी चाल के परिणामों से सावधान करें। मान लीजिए हम अपने पड़ोसी को किसी सांसारिक विपत्ति के संकट में देखें, मान लीजिए उसका घर जल रहा है।

सच्चा प्रेम हमें प्रेरित करेगा कि हम उसे सावधान करें और उसे लपटों में नष्ट होने के लिए न छोड़ दें, विशेषकर यदि हम देखें कि वह अपनी चाल पर अड़े रहने और जलते हुए घर में ठहरे रहने की ओर झुका हुआ है, तो हम

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