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सच तो यह है कि मसीही बाइबल की बहुत-सी बातों पर वास्तव में विश्वास नहीं करते। अब, मान लीजिए आप परमेश्वर से मिलें, और आप जानते हों कि स्वयं परमेश्वर ही आपसे बात कर रहा है, और वह अपने हाथ में एक पुस्तक लेकर आपकी ओर बढ़ाए, और आपसे कहे कि यह पुस्तक ले लो, और कि इस पुस्तक में बहुत ही बड़ी और बहुमूल्य प्रतिज्ञाएँ हैं, उन सब बातों की जिनकी आपको परीक्षा का सामना करने, पाप पर जय पाने, और आपको पूर्णतः पवित्र बनाने, और स्वर्ग के योग्य बनाने के लिए आवश्यकता है, या कभी आवश्यकता हो सकती है; और फिर वह आपसे कहे कि जब कभी आपको इस उद्देश्य के लिए किसी वस्तु की आवश्यकता हो, तो आपको केवल उसके उपयुक्त प्रतिज्ञा लेकर किसी भी समय उसके सामने प्रस्तुत करनी है, और वह उसे पूरा करेगा। अब, यदि आपको ऐसी पुस्तक सीधे परमेश्वर के हाथ से मिलती, और आप जानते कि परमेश्वर ने उसे अपने ही हाथ से आपके लिए लिखा है, तो क्या आप उस पर विश्वास न करते? और क्या आप उसे उससे कहीं अधिक न पढ़ते जितना आप अब बाइबल पढ़ते हैं? आप यह जानने के लिए कितने उत्सुक होते कि उसमें क्या-क्या लिखा है? और आवश्यकता के समय प्रतिज्ञाओं को काम में लाने के लिए कितने तत्पर रहते! आप चाहते कि उसे पूरा कण्ठस्थ कर लें, और बार-बार आरम्भ से अन्त तक दोहराते रहें, ताकि आपका मन उसकी बातों से परिचित बना रहे और आप जो प्रतिज्ञाएँ पढ़ते हैं उन्हें काम में लाने के लिए सदा तैयार रहें! अब, सच्चाई यह है कि बाइबल ही वह पुस्तक है। वह ठीक इसी प्रकार लिखी गई है और ठीक ऐसी ही प्रतिज्ञाओं से भरी है; ताकि मसीही सही प्रतिज्ञा को थामकर, और उसी के आधार पर विनती करके, अपने आत्मिक लाभ के लिए जिस किसी वस्तु की उसे आवश्यकता हो, वह सब सदा पा सके।
मसीह एक पूर्ण उद्धारकर्ता है। परमेश्वर की सब प्रतिज्ञाएँ उसी में हैं। हाँ, और उसी में आमीन, परमेश्वर पिता की महिमा के लिये। अर्थात् परमेश्वर ने त्रिएकता के दूसरे व्यक्ति में, यीशु मसीह के व्यक्तित्व में, प्रतिज्ञा की है, और उसी के द्वारा उन सब को निश्चित कर दिया है। अब, आवश्यकता इस बात की है कि मसीही इन प्रतिज्ञाओं को समझें, और उन पर विश्वास करें, और आवश्यकता की हर परिस्थिति में पवित्रीकरण के लिए उन्हें काम में लाएँ। मान लीजिए उनमें ज्ञान की घटी है। तो वे परमेश्वर के पास जाएँ, और उस प्रतिज्ञा के आधार पर विनती करें। मान लीजिए वे पवित्रशास्त्र को समझ नहीं सकते, या कर्तव्य का मार्ग स्पष्ट नहीं है। प्रतिज्ञा तो काफ़ी स्पष्ट है, उसी को थाम लीजिए। ज्ञान, धार्मिकता, पवित्रीकरण और छुटकारे में उन्हें जो भी घटी हो, वे केवल विश्वास के साथ परमेश्वर के पास जाएँ, और प्रतिज्ञा को थाम लें, और यदि वह झूठा सिद्ध नहीं होता, तो जिस किसी वस्तु की उन्हें आवश्यकता है, वह सब उन्हें निश्चय ही मिलेगी।
4.) बहुत-से लोग मसीह को उसके सब सम्बन्धों में ग्रहण नहीं करते, इसका एक और कारण यह है कि वे इतने घमण्डी हैं कि अपने आप पर सारी निर्भरता को, या अपनी ही बुद्धि और अपनी ही इच्छा पर भरोसे को त्याग नहीं सकते।
मनुष्य के घमण्डी हृदय के लिए अपनी ही बुद्धि, और ज्ञान, और इच्छा, और सब कुछ परमेश्वर को सौंप देना कितनी बड़ी बात है। मैंने इसे सब कठिनाइयों में सबसे बड़ी कठिनाई पाया है।
निःसन्देह सब इसे ऐसा ही पाते हैं। आम तौर पर यह दलील दी जाती है, “हमारी तर्कबुद्धि हमें इसलिए दी गई है कि धर्म में उसका प्रयोग किया जाए; परन्तु यदि हम उस पर भरोसा न करें, या उसके पीछे न चलें, तो उसका क्या लाभ?” परन्तु यहाँ एक महत्वपूर्ण भेद करना आवश्यक है, जिसे बहुत-से लोग अनदेखा कर देते हैं। हमारी तर्कबुद्धि हमें धर्म में प्रयोग करने के लिए दी गई है; परन्तु तर्कबुद्धि का उचित क्षेत्र यह पूछना नहीं कि जो परमेश्वर कहता है वह तर्कसंगत है या नहीं, बल्कि हमें यह दिखाना है कि यह विश्वास करना असीम रूप से तर्कसंगत है कि जो कुछ परमेश्वर कहता है वह सब अवश्य सत्य है, चाहे हम अपनी अज्ञानता और अन्धेपन में उसकी तर्कसंगतता को देख सकें या नहीं। और यदि हम इससे आगे जाते हैं, तो हम तर्कबुद्धि के उचित क्षेत्र से बाहर चले जाते हैं। परन्तु मनुष्य का घमण्डी हृदय अपनी सारी व्यर्थ बुद्धि को एक ओर रखने, और एक छोटे बालक के समान बनने के लिए कितना अनिच्छुक है,
