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अपने पति के सम्बन्ध में वह कोई सद्गुण न होता। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम रखता है, तो जैसे ही वह जान लेता है कि परमेश्वर की इच्छा क्या है, वह उसे इसलिये करेगा कि वह परमेश्वर की इच्छा है। सिद्ध प्रेम सर्वव्यापी आज्ञाकारिता की ओर, अर्थात् सब बातों में परमेश्वर की इच्छा पूरी करने की ओर ले जाएगा, क्योंकि वह परमेश्वर की इच्छा है।
3. जो व्यक्ति सिद्ध प्रेम रखता है, वह संसार के लिये मरा हुआ होगा।
इससे मेरा अर्थ यह है कि वह सांसारिक विचारों के प्रभाव से कटकर अलग हो जाएगा।
सिद्ध प्रेम स्वार्थ को इस प्रकार मिटा देगा कि परमेश्वर की इच्छा को छोड़ उसकी कोई इच्छा न रहेगी, और परमेश्वर की महिमा को छोड़ उसका कोई हित न रहेगा। वह जनमत से, या यह या वह मनुष्य क्या कहेगा या सोचेगा, इससे प्रभावित न होगा। उस स्त्री को देखिए! अपने पति के प्रति स्वाभाविक स्नेह के कारण ऐसा क्या है जो वह करने को तैयार नहीं? वह अपने सब मित्रों से ऐसे नाता तोड़ लेने को तैयार है मानो वह उनके लिये मर चुकी हो, और वे जो कुछ कहें उसकी तनिक भी परवाह न करने को, और वे जो कुछ धन, और सम्मान, और सुख-विलास दे सकते हैं, उन सब को छोड़ देने को तैयार है, ताकि उस व्यक्ति से जा मिले जिससे वह प्रेम करती है, और उसके साथ दरिद्रता में, अपमान में, और निर्वासन में रहे। उसका स्नेह इतना महान है कि वह यह आनन्द से करती है, और एक महल से निकलकर पृथ्वी पर किसी भी झोंपड़ी या गुफा में जाने, और पूरी तरह सुखी रहने को तैयार है। और उसके मित्र उसके प्रिय पुरुष के विरुद्ध जो कुछ कह सकते हैं, उसका उसके मन पर तनिक भी प्रभाव नहीं पड़ता, सिवाय इसके कि वह उससे और भी दृढ़ता से लिपट जाती है। इस एक सर्वग्रासी स्नेह ने वास्तव में उन सब प्रभावों को मार डाला है जो पहले उस पर काम करते थे। ऐसी बातों के द्वारा उसे प्रभावित करने का प्रयत्न व्यर्थ है। उसके मन तक पहुँचने का केवल एक ही मार्ग है, केवल एक ही प्रकार की प्रेरणाएँ उसे प्रेरित करती हैं, और वह है उसके स्नेह के पात्र के द्वारा।
जहाँ तक मन के दर्शन-शास्त्र का सम्बन्ध है, परमेश्वर का सिद्ध प्रेम भी इसी प्रकार कार्य करता है। जो मन सिद्ध प्रेम से भरा है, जब तक वह प्रेम क्रियाशील रहता है, उसे परमेश्वर से हटाना असम्भव है। उसकी सांसारिक सम्पत्ति, उसके मित्र, उसका सुनाम, उसकी सन्तान छीन लीजिए, उसे बन्दीगृह में भेज दीजिए, उसे कोड़ों से पीटिए, उसे जलाने के खूँटे से बाँध दीजिए, उसके शरीर को चीड़ की राल-भरी लकड़ी की खपच्चियों से भर दीजिए और उनमें आग लगा दीजिए; और फिर उसके लिये उसका परमेश्वर छोड़ दीजिए, और वह सुखी है। उसका प्रबल स्नेह उसे अन्य सब बातों के प्रति संवेदनहीन बना सकता है। वह अपने परमेश्वर को छोड़ सारे संसार के लिये मानो मरा हुआ है। ऐसे शहीदों की घटनाएँ ज्ञात हैं, जो, जब उनके शरीर खूँटे पर भुन रहे थे, परमेश्वर में इतने पूर्ण रूप से सुखी थे कि उन्हें पीड़ा का बोध ही न रहा।
ऐसे व्यक्ति को नरक में, आग और गन्धक की झील में डाल दीजिए, और जब तक वह परमेश्वर का आनन्द लेता है, और परमेश्वर का प्रेम उसकी आत्मा को भरे रहता है, वह सुखी है।
किसने स्नेह की ऐसी घटनाएँ नहीं देखीं या सुनीं, जो मात्रा में उस तक पहुँचती हों जिसका मैंने वर्णन किया है, जिनमें कोई व्यक्ति वास्तव में अन्य सब बातों के लिये मरा हुआ होता है, और केवल अपने प्रिय पात्र के लिये जीता है। आप कितनी बार ऐसे स्नेही माता-पिता देखते हैं जो अपनी इकलौती सन्तान के लिये जीते हैं, और जब वह सन्तान मर जाती है, तो चाहते हैं कि वे भी मर जाते। कभी-कभी पति और पत्नी में एक-दूसरे के प्रति ऐसा सर्वग्रासी स्नेह होता है कि वे और किसी बात के लिये नहीं जीते; और यदि पति मर जाता है, तो पत्नी भी घुल-घुलकर मर जाती है। जिस प्राण-ग्रासी पात्र के लिये वह जीती थी, वह चला गया, तो फिर वह और क्यों जीए? इसी प्रकार, जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के सिद्ध प्रेम से भर जाता है, तो वह केवल परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी सेवा करने के लिये ही जीना चाहता है; वह संसार के लिये मरा हुआ है, अपनी प्रतिष्ठा के लिये मरा हुआ है, और उसकी यहाँ, या स्वर्ग में, या विश्व में कहीं भी, किसी और कारण से जीने की कोई इच्छा नहीं,
