व्याख्यान 178 (253 में से)

मानव स्वभाव में प्रस्तुत करता है। यह उसकी निःस्वार्थता को प्रकट करता है। जिस रीति से शैतान हमारे पहले

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मानव स्वभाव में प्रस्तुत करता है। यह उसकी निःस्वार्थता को प्रकट करता है। जिस रीति से शैतान हमारे पहले माता-पिता पर प्रबल हुआ, वह यह थी कि वह उन्हें परमेश्वर की निःस्वार्थता पर सन्देह करने की ओर ले गया। सुसमाचार सत्य को प्रमाणित करता है, और इस झूठ का सुधार करता है।

व्यवस्था परमेश्वर को पापी के ऐसे शत्रु के रूप में दिखाती है जो कभी नहीं पसीजता, जो सिद्ध रीति से आज्ञा माननेवाले सब लोगों के लिए सुख सुनिश्चित करता है, परन्तु आज्ञा न माननेवाले सब लोगों पर क्रोध की गर्जना बरसाता है। सुसमाचार परमेश्वर के चरित्र के ऐसे नए पहलू प्रकट करता है जो पहले ज्ञात न थे। निःसन्देह सुसमाचार सब पवित्र प्राणियों के प्रेम को बढ़ाता है, और स्वर्ग के स्वर्गदूतों को और भी अधिक आनन्द देता है, और जब वे दोषियों के प्रति परमेश्वर की अद्भुत करुणा और सहनशीलता को देखते हैं, तो उनका प्रेम, भरोसा और प्रशंसा बहुत बढ़ जाती है। व्यवस्था ने दुष्टात्माओं को नरक में धकेल दिया, और उसी ने आदम और हव्वा को अदन की वाटिका से निकाल दिया। परन्तु जब धन्य आत्माएँ उसी पवित्र परमेश्वर को विद्रोहियों की प्रतीक्षा करते हुए देखती हैं, हाँ, उनके लिए अपनी गोद खोलते हुए, और उनके लिए अपने प्रिय पुत्र को देते हुए, और हज़ारों वर्षों से पापियों को बचाने के लिए ऐसा अथक परिश्रम करते हुए देखती हैं, तो क्या आप सोचते हैं कि इसका उनके मनों में आज्ञाकारिता और प्रेम के उद्देश्यों को दृढ़ करने पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता?

शैतान, जो पूरी तरह स्वार्थी प्राणी है, सदा दूसरों पर स्वार्थी होने का दोष लगाता रहता है। उसने अय्यूब पर यही दोष लगाया: “क्या अय्यूब परमेश्वर का भय बिना लाभ के मानता है?” उसने हमारे पहले माता-पिता के सामने परमेश्वर पर स्वार्थी होने का दोष लगाया, और कहा कि ज्ञान के वृक्ष का फल खाने से उन्हें मना करने का एकमात्र कारण यह भय था कि कहीं वे भी उतना ही न जान लें जितना वह स्वयं जानता है। सुसमाचार दिखाता है कि

परमेश्वर कैसा है। यदि वह स्वार्थी होता, तो वह उन लोगों को बचाने के लिए ऐसा परिश्रम न करता जिन्हें वह पूरी सरलता से कुचलकर नरक में डाल सकता था। स्वार्थी लोगों को उनके स्वार्थ पर लज्जित करने के लिए इससे बढ़कर और कुछ नहीं कि वे दूसरों में निःस्वार्थ परोपकार देखें। इसी कारण दुष्ट लोग सदा निःस्वार्थ दिखाई देने का प्रयत्न करते रहते हैं। जिस स्वार्थी मनुष्य में कुछ भी हृदय है, वह दूसरों में सच्चा परोपकार देखे, तो यह उसके सिर पर आग के अंगारों के समान होता है। बुद्धिमान पुरुष ने यह बात समझी थी, जब उसने कहा, “यदि तेरा बैरी भूखा हो तो उसको रोटी खिलाना; और यदि वह प्यासा हो तो उसे पानी पिलाना; क्योंकि ऐसा करने से तू उसके सिर पर आग के अंगारों का ढेर लगाएगा।” किसी शत्रु को झुकाने, और उसे जीत लेने, और उसे मित्र बना लेने के लिए इससे बढ़कर और कुछ नहीं।

सुसमाचार पापियों के साथ यही करता है। यह दिखाता है कि उन्होंने परमेश्वर के साथ जो कुछ भी किया है, उस सब के होते हुए भी परमेश्वर अब भी उनके प्रति निःस्वार्थ प्रेम रखता है। जब पापी परमेश्वर को उसे बचाने के लिए स्वर्ग से नीचे झुकते हुए देखता है, और समझता है कि यह सचमुच सत्य है, तो ओह, यह किस प्रकार हृदय को पिघलाकर तोड़ देता है, स्वार्थ पर मृत्यु का प्रहार करता है, और उसे असीम भरोसे और पवित्र प्रेम की ओर जीत लेता है! परमेश्वर ने मन की रचना ऐसी की है कि वह अनिवार्य रूप से सद्गुण के आगे सिर झुकाता है। जब तक उसमें नैतिक कर्तृत्व की शक्तियाँ बनी रहती हैं, तब तक उसे ऐसा करना ही पड़ता है। यह बात नरक में भी उतनी ही सत्य है जितनी स्वर्ग में। शैतान भी इसे अनुभव करता है। जब कोई व्यक्ति देखता है कि परमेश्वर का उसे दोषी ठहराने में कोई स्वार्थपूर्ण उद्देश्य नहीं है, जब वह देखता है कि परमेश्वर विश्वास के द्वारा उद्धार को केवल एक सेंत-मेंत के दान के रूप में प्रस्तुत करता है, तो वह परमेश्वर के परोपकार के प्रति प्रशंसा अनुभव किए बिना नहीं रह सकता। उसका स्वार्थ कुचल दिया जाता है, व्यवस्था अपना काम कर चुकी होती है, वह देखता है कि उसके सारे स्वार्थी प्रयत्नों से कुछ भी भला नहीं हुआ; और अगला कदम यह होता है कि उसका हृदय निःस्वार्थ प्रेम में उमड़ पड़े।

मान लीजिए कि कोई मनुष्य राजद्रोह के कारण मृत्युदण्ड की आज्ञा के अधीन था, और उसने शासन की दृष्टि में अपने आप को अच्छा ठहराने के लिए बहुत से उपाय आज़माए थे, परन्तु असफल रहा, क्योंकि वे सब के सब खोखले हृदय से

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