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अध्याय 20: मसीही सिद्धता। इसलिये चाहिये कि तुम वैसे ही सिद्ध बनो, जैसा तुम्हारा स्वर्गीय पिता सिद्ध है मत्ती 5:48।
पहले इन शब्दों पर बोलते हुए मैंने निम्नलिखित क्रम अपनाया था।
1. मैंने दिखाया कि सिद्ध होने में क्या-क्या निहित है।
2. मसीही सिद्धता क्या है।
3. कि यह एक कर्तव्य है।
4. कि यह इसी जीवन में प्राप्त की जा सकती है।
5. कुछ आपत्तियों के उत्तर दिए, और फिर कुछ कारण बताए कि इतने सारे लोग सिद्ध क्यों नहीं हैं। आज रात मेरा उद्देश्य कुछ और कारणों का उल्लेख करना है जो मसीहियों के बड़े समूह को सिद्ध पवित्रीकरण प्राप्त करने से रोकते हैं। तथ्य के रूप में हम जानते हैं कि कलीसिया पवित्र की हुई नहीं है, और हमें इसके कारण जानने चाहिए। यदि दोष परमेश्वर में है, तो हमें यह जानना चाहिए। यदि उसने पर्याप्त प्रकाशन नहीं दिया है, या यदि पवित्र
आत्मा की सामर्थ इस संसार में उसके लोगों को पवित्र करने के लिए पर्याप्त नहीं है, तो हमें यह समझ लेना चाहिए, ताकि जो प्राप्त ही नहीं हो सकता उसके पीछे व्यर्थ प्रयत्न करके हम अपने आप को उलझन में न डालें। और यदि दोष हम में है, तो हमें यह जानना चाहिए, और सच्चे कारणों को समझ लेना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि हम किसी रीति से, विचार में भी, यह कल्पना करके परमेश्वर पर मूर्खता से दोष लगाएँ कि उसने हमसे कुछ ऐसा माँगा है जिसे प्राप्त करने के लिए उसने हमें पर्याप्त साधन नहीं दिए।
I. लोगों के पवित्र न किए जाने का पहला सामान्य कारण, जिसका मैं उल्लेख करूँगा, यह है कि वे पवित्रीकरण को “कामों से” खोजते हैं, “विश्वास से” नहीं।
कामों का धर्म बहुत-से भिन्न-भिन्न रूप धारण करता है, और यह देखना रोचक है कि वह कैसे सदा बदलते और खिसकते रहनेवाले रूप अपनाता है:
1. एक रूप वह है जिसमें मनुष्य इस प्रकार जीने का लक्ष्य रखते हैं कि उनका दण्डित किया जाना अन्यायपूर्ण ठहरे। इस स्थिति में इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि वे अपने को मसीही समझते हैं या नहीं, यदि वे वास्तव में इस प्रकार जीने का प्रयत्न कर रहे हैं कि परमेश्वर का उन्हें नरक में भेजना अन्यायपूर्ण ठहरे। यही प्राचीन फरीसियों का धर्म था। और आज के समय में भी ऐसे थोड़े लोग नहीं हैं जिनका धर्म पूरी तरह इसी प्रकार का है। आप बहुधा उन्हें कलीसिया के बाहर पाएँगे, और शायद वे यह मानने को भी तैयार हों कि उनका कभी नया जन्म नहीं हुआ। फिर भी वे अपने कामों के विषय में ऐसे ढंग से बोलते हैं जिससे प्रकट होता है कि वे अपने आप को इतना अधिक अच्छा समझते हैं कि उन्हें दण्ड मिल ही नहीं सकता।
2. कामों के धर्म का एक और रूप वह है जिसमें लोग इतना यह लक्ष्य नहीं रखते कि परमेश्वर का उन्हें दण्ड देना अन्यायपूर्ण ठहरे, बल्कि वे अपने कामों के द्वारा अपने आप को परमेश्वर की दया के योग्य ठहराने का प्रयत्न करते हैं। वे जानते हैं कि वे दण्ड के योग्य हैं, और सदा दण्ड के ही योग्य रहेंगे। परन्तु वे यह भी जानते हैं कि परमेश्वर दयालु है; और वे सोचते हैं कि यदि वे ईमानदारी का जीवन बिताएँ, और कंगालों के प्रति बहुत-से दया के काम करें, तो इससे वे परमेश्वर की सामान्य दया के ऐसे पात्र बन जाएँगे कि वह उनके अधर्म के कामों को उनके लेखे में नहीं गिनेगा, बल्कि उनके पापों को क्षमा करके उन्हें बचा लेगा। यही अधिकांश आधुनिक नैतिकतावादियों का धर्म है। सुसमाचार के अधीन रहते हुए वे जानते हैं कि वे अपने कामों के द्वारा उद्धार नहीं पा सकते, फिर भी वे सोचते हैं कि यदि वे आराधना-सभा में जाएँ, और पादरी के भरण-पोषण में सहायता दें, और यह और वह और तरह-तरह के भले काम करें, तो इससे वे परमेश्वर की दया के इतने पात्र बन जाएँगे कि उनका उद्धार हो जाए। जहाँ तक मैं आधुनिक यूनिटेरियनों की धार्मिक
