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ताप किए बिना बुलाता और बचाता है, बल्कि यह कि जब परमेश्वर एक बार किसी प्राणी के उद्धार का बीड़ा उठा लेता है, तो वह अपना मन कभी नहीं बदलता। मैं जानता हूँ कि कुछ लोग यह सिखाना बहुत खतरनाक शिक्षा समझते हैं कि विश्वासी निरन्तर धर्मी ठहराए हुए रहते हैं, क्योंकि, वे कहते हैं, इससे मनुष्यों को पाप करने का हियाव मिलेगा। अच्छा! एक ऐसे मनुष्य से, जिसने सचमुच पाप से पश्चाताप किया है, और हृदय से पाप को त्याग दिया है, और सच्चे मन से पाप से मुक्त होना चाहता है, यह कहना कि परमेश्वर उसकी सहायता करेगा और निश्चय ही उसे पाप पर जय देगा — इससे उसे पाप करने का हियाव मिलेगा! कैसा विचित्र तर्क है यह! यदि यह शिक्षा किसी मनुष्य को पाप करने का हियाव देती है, तो इससे केवल यही प्रकट होता है कि उसने कभी पश्चाताप किया ही नहीं; कि उसने कभी पाप से घृणा नहीं की, और कभी परमेश्वर से स्वयं परमेश्वर के लिए प्रेम नहीं किया, बल्कि केवल पश्चाताप का दिखावा किया, और यदि उसने परमेश्वर से प्रेम किया भी तो वह केवल स्वार्थी प्रेम था, क्योंकि वह सोचता था कि परमेश्वर उस पर कोई कृपा करने जा रहा है। यदि वह सचमुच पाप से घृणा करता था, तो यह विचार कि उसकी सारी अयोग्यता के होते हुए भी परमेश्वर ने उसे सन्तान के रूप में ग्रहण किया है, और उसके साथ सन्तान का सा व्यवहार करेगा, ठीक वही बात है जो उसे तोड़ डालेगी और उसके हृदय को परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होनेवाले गहरे शोक में पिघला देगी। ओह, परमेश्वर की सन्तान कितनी बार परमेश्वर की इस भलाई पर आराधना-भरे आश्चर्य में पिघल गई है कि उसे, जैसा वह योग्य था, नरक में भेजने के बदले, परमेश्वर ने उसे वापस लाने के लिए साधनों का उपयोग किया! कौन-सा विचार उसे इससे अधिक धूल में झुका सकता है कि परमेश्वर ने उसके लिए जो कुछ किया, और जो अनुग्रहपूर्ण सहायता परमेश्वर उसे देने के लिए सदा तैयार था, उस सबके होते हुए भी, वह फिर भटक गया, जबकि उसका नाम मेम्ने की जीवन की पुस्तक में लिखा हुआ था!
6. यह वाचा की ताड़ना को निश्चित करता है। परमेश्वर ने वचन दिया है कि यदि मसीह के लोगों में से कोई भटक जाए, तो वह वाचा की ताड़ना का उपयोग करेगा, और उन्हें वापस ले आएगा।
नवासीवें भजन में, दाऊद को मसीह के स्थान पर रखकर, परमेश्वर कहता है, “यदि उसके वंश के लोग मेरी व्यवस्था को छोड़ें और मेरे नियमों के अनुसार न चलें, यदि वे मेरी विधियों का उल्लंघन करें, और मेरी आज्ञाओं को न मानें, तो मैं उनके अपराध का दण्ड सोंटे से, और उनके अधर्म का दण्ड कोड़ों से दूँगा।
परन्तु मैं अपनी करुणा उस पर से पूरी रीति से न हटाऊँगा, और न अपनी सच्चाई को टलने दूँगा। मैं अपनी वाचा न तोड़ूँगा, और जो मेरे मुँह से निकल चुका है, उसे न बदलूँगा।”
इस प्रकार आप देखते हैं कि धर्म का अंगीकार करनेवाले, यदि वे मार्ग से हट जाएँ, तो वे सदा यह आशा रख सकते हैं कि पश्चाताप न करनेवालों की अपेक्षा उन पर परमेश्वर के दण्ड अधिक शीघ्रता से आएँगे। पापी मोटा-ताज़ा हो सकता है, धन-सम्पत्ति में जीवन बिता सकता है, और उसकी मृत्यु में कोई वेदना न हो — यह सब परमेश्वर के शासन के स्थापित सिद्धान्तों के अनुसार ही है। परन्तु परमेश्वर की कोई सन्तान अपने परमेश्वर को छोड़कर धन या किसी और सांसारिक वस्तु के पीछे जाए, तो जितना निश्चित यह है कि वह उसकी सन्तान है, उतना ही निश्चित यह है कि परमेश्वर उसे अपने सोंटे से मारेगा। और जब वह मार खाकर वापस लाया जाएगा, तो वह भजनकार के साथ कहेगा, “मुझे जो दुःख हुआ वह मेरे लिए भला ही हुआ है, जिससे मैं तेरी विधियों को सीख सकूँ। उससे पहले कि मैं दुःखित हुआ, मैं भटकता था; परन्तु अब मैं तेरे वचन को मानता हूँ।” शायद आप में से कुछ लोग जानते हैं कि इस प्रकार दुःख उठाना, और यह अनुभव करना कि यह भला था, क्या होता है।
7. सुसमाचार के अनुसार धर्मी ठहराए जाने का एक और प्रभाव यह है कि वह पवित्रीकरण को निश्चित करता है। वह न केवल पवित्रीकरण के सारे साधनों को निश्चित करता है, बल्कि उस कार्य के वास्तविक रूप से पूरा होने को भी, यहाँ तक कि जिस व्यक्ति का सचमुच मन-परिवर्तन हुआ है, वह निश्चय ही आज्ञापालन में स्थिर बना रहेगा, जब तक कि वह स्वर्ग के योग्य न बन जाए और वास्तव में उद्धार न पा ले।
