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माता-पिता की आज्ञाकारिता पर माता-पिता की आज्ञाकारिता पर "हे बच्चो, सब बातों में अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करो।"
1. यह बात बहुत वर्षों से विवाद का विषय रही है कि मनुष्य के मन में जन्मजात सिद्धान्त होते भी हैं या नहीं। परन्तु सब यह मानते हैं कि यदि आत्मा में स्वभावतः रोपे गए कोई व्यावहारिक सिद्धान्त हैं, तो "हमें अपने माता-पिता का आदर करना चाहिए" यह सिद्धान्त लगभग सबसे पहले इस श्रेणी में गिना जाएगा। प्राचीनतम लेखकों ने इसे सार्वभौमिक सिद्धान्तों में गिना है, और यह निस्सन्देह अत्यन्त बर्बर जातियों के जंगली लोगों में भी पाया जाता है। हम इसे यूरोप और एशिया के सारे विस्तार में, अफ्रीका के वीरानों में और अमेरिका के वनों में खोज सकते हैं। और यह सबसे सभ्य जातियों में कम नहीं, बल्कि और अधिक दिखाई देता है। संसार के पूर्वी भागों में, जो अनेक युगों तक साम्राज्य, विद्या और शिष्टाचार के साथ-साथ धर्म का भी केन्द्र रहे, पहले ऐसा ही था। फिर यूनान के सब राज्यों में और पूरे रोमी साम्राज्य में भी ऐसा ही रहा। इस विषय में यह स्पष्ट है कि जिनके पास लिखित "व्यवस्था नहीं है, वे अपने लिए आप ही व्यवस्था हैं," और वे "व्यवस्था की बातें," अर्थात् उसका सार, "अपने हृदयों में लिखा हुआ" दिखाते हैं।
2. और जहाँ-जहाँ परमेश्वर ने मनुष्य पर अपनी इच्छा प्रकट की है, वहाँ यह व्यवस्था उस प्रकाशन का एक भाग रही है। इसमें यह नए सिरे से खोली गई, काफ़ी विस्तृत की गई और अत्यन्त दृढ़ता से लागू की गई। यहूदी प्रकाशन में इसके कुख्यात उल्लंघनकर्ता प्राणदण्ड के भागी थे।
और यह उन व्यवस्थाओं में से एक थी जिन्हें हमारे धन्य प्रभु नष्ट करने नहीं, पूरा करने आए थे।
इसी कारण उसने शास्त्रियों और फरीसियों को इसलिए कड़ाई से डाँटा कि उन्होंने अपनी परम्पराओं के द्वारा इसे व्यर्थ ठहरा दिया था; और स्पष्ट दिखाया कि इसका बन्धन सब युगों पर लागू है। इसी का सार सन्त पौलुस इफिसियों को देता है (इफिसियों 6:1): "हे बच्चो, प्रभु में अपने माता-पिता के आज्ञाकारी बनो;" और कुलुस्सियों से भी इन शब्दों में कहता है, "हे बच्चो, सब बातों में अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करो।" [कुलुस्सियों 3:20] 3. ध्यान देने योग्य है कि प्रेरित इस कर्तव्य पर तीन प्रकार के प्रोत्साहन के साथ बल देता है:
पहला, इफिसियों से वह कहता है, "क्योंकि यह उचित है:" यह न्याय का भी और दया का भी उदाहरण है।
यह उनका हक़ ही है: जो अस्तित्व हमें उनसे मिला है, उसी के कारण हम पर यह उनका ऋण है। दूसरा, "यह प्रभु को भाता है;" मनुष्यों और स्वर्गदूतों के महान पिता को यह विशेष रूप से प्रिय है कि हम अपने शरीर के पिताओं का आदर करें और उनकी आज्ञा मानें। तीसरा, यह "प्रतिज्ञा सहित पहली आज्ञा है;" पहली वह आज्ञा जिसके पालन के साथ एक विशेष प्रतिज्ञा जुड़ी है: "कि तेरा भला हो, और जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उसमें तू बहुत दिन जीवित रहे।" इस प्रतिज्ञा का अर्थ सामान्यतः यह समझा गया है कि इसमें दीर्घायु के साथ-साथ स्वास्थ्य और सांसारिक आशीषें भी सम्मिलित हैं। और हमने
41 [1872 के संस्करण से पाठ] माता-पिता की आज्ञाकारिता पर अनगिनत प्रमाण देखे हैं कि यह यहूदी व्यवस्था की तरह मसीही व्यवस्था से भी सम्बन्ध रखती है: आज के दिन भी इसकी पूर्ति के अनेक उल्लेखनीय उदाहरण मिलते हैं।
परन्तु इन शब्दों का क्या अर्थ है, "हे बच्चो, सब बातों में अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करो"? मैं परमेश्वर की सहायता से पहले इनकी व्याख्या करने का, और फिर इन्हें लागू करने का प्रयत्न करूँगा।
I. 1. पहले, मैं इन शब्दों की व्याख्या करने का प्रयत्न करूँगा; और इसलिए भी कि इन्हें इतने कम लोग समझते दिखाई देते हैं। संसार में चारों ओर देखो, अन्यजातियों के नहीं बल्कि मसीही संसार में, वरन् उसके सुधारवादी भाग में; उनके बीच देखो जिनके पास अपनी ही भाषा में पवित्रशास्त्र है; और कौन है जिसने इसके विषय में सुना भी प्रतीत होता हो? कहीं-कहीं कोई बच्चा भय के कारण, या शायद स्वाभाविक स्नेह के कारण माता-पिता की आज्ञा मानता है। परन्तु कितने बच्चे ऐसे मिलेंगे जो परमेश्वर के प्रति कर्तव्य-बोध से अपने पिता और माता की आज्ञा मानते हों? और कितने माता-पिता ऐसे मिलेंगे जो अपने बच्चों के मन में यह कर्तव्य ठीक रीति से बैठाते हों? मुझे सन्देह है कि माता-पिता और बच्चे, दोनों का बहुत बड़ा बहुमत इस सारे विषय से सर्वथा अनजान है। इन्हीं के लिए मैं इसे यथासम्भव स्पष्ट करूँगा: फिर भी मैं भली-भाँति जानता हूँ कि जो लोग कायल होना नहीं चाहते, वे मेरी बात उतनी ही समझेंगे जितनी तब समझते यदि मैं यूनानी या इब्रानी भाषा में बोल रहा होता।
2. तुम सरलता से देख लोगे कि प्रेरित "माता-पिता" से पिता और माता दोनों का अर्थ लेता है, क्योंकि वह हमें पाँचवीं आज्ञा की ओर संकेत करता है, जिसमें दोनों का नाम है। और मनुष्यों के नियम इस विषय में चाहे जैसे भिन्न हों, परमेश्वर की व्यवस्था कोई भेद नहीं करती; वह हम पर दोनों की आज्ञा मानने का एक-सा दायित्व डालती है।
3. परन्तु इससे पहले कि हम विचार करें कि हमें अपने माता-पिता की आज्ञा कैसे माननी है, यह पूछा जा सकता है कि कब तक माननी है। क्या बच्चों को केवल तब तक आज्ञा माननी है जब तक वे अकेले दौड़ने न लगें, जब तक पाठशाला न जाने लगें, जब तक लिखना-पढ़ना न सीख लें, या जब तक वे अपने माता-पिता के बराबर लम्बे न हो जाएँ, अथवा समझदारी की अवस्था को न पहुँच जाएँ?
नहीं, यदि वे केवल [इसलिए कि वे विवश हैं, केवल इसलिए] आज्ञा मानते हैं कि उन्हें पिटने का डर है, या इसलिए कि अन्यथा उन्हें भोजन और वस्त्र नहीं मिल सकते, तो ऐसी आज्ञाकारिता से क्या लाभ? केवल वे ही जो तब माता-पिता की आज्ञा मानते हैं जब वे उनके बिना जी सकते हैं, और जब वे उनसे न कुछ आशा रखते हैं, न कोई भय, परमेश्वर की ओर से प्रशंसा पाएँगे।
4. "परन्तु क्या वयस्क पुरुष, या विवाहित स्त्री, पर माता-पिता की आज्ञा मानने का कोई और दायित्व है?" विवाह के विषय में, यद्यपि यह सच है कि मनुष्य को अपने माता-पिता को छोड़कर अपनी पत्नी से मिला रहना है; और समान तर्क से स्त्री को भी अपने माता-पिता को छोड़कर अपने पति से मिला रहना है (जिसके परिणामस्वरूप कुछ विशेष अवसर ऐसे हो सकते हैं जहाँ पति-पत्नी का कर्तव्य सन्तान-कर्तव्य का [स्थान] ले लेगा); तो भी मैं न पवित्रशास्त्र से, न तर्क से यह जान पाता हूँ कि विवाह सन्तान-कर्तव्य के सामान्य दायित्व को रद्द करता है या घटाता है। इससे भी कम यह प्रतीत होता है कि इक्कीस वर्ष जी लेने से वह रद्द या कम हो जाता है। अपने विषय में मैंने इसे कभी ऐसा नहीं समझा। जब मैं तीस वर्ष से ऊपर का हो चुका था, तब भी मैं अपने आपको अपने पिता के सम्बन्ध में ठीक उसी स्थिति में मानता था जैसा दस वर्ष की आयु में था। और जब मैं चालीस और पचास के बीच था, तब भी मैं अपने आपको अपनी माता की हर उचित बात में उतना ही आज्ञा मानने को बाध्य समझता था जितना तब, जब मैं अंगुली पकड़कर चलाए जाने की अवस्था में था [या लटकती आस्तीन का कोट पहनता था]।
माता-पिता की आज्ञाकारिता पर 5. परन्तु "हे बच्चो, सब बातों में अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करो" का क्या आशय है? निश्चय ही आज्ञाकारिता का पहला बिन्दु यह है कि जो कुछ तुम्हारे पिता या माता मना करें, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, उसे मत करो। इससे अधिक स्पष्ट कुछ नहीं कि माता-पिता का निषेध हर विवेकशील बच्चे को बाँधता है; अर्थात्, सिवाय तब जब निषिद्ध बात परमेश्वर की ओर से स्पष्ट रूप से आज्ञापित हो। और केवल इतना ही नहीं; बात को थोड़ा और आगे ले जाया जा सकता है: कोमल हृदय माता-पिता किसी बात को पूरी तरह अनुचित मान सकते हैं, फिर भी उसे सीधे-सीधे मना करना न चाहें। ऐसी स्थिति में बच्चे का कर्तव्य क्या है? उस अस्वीकृति का कितना ध्यान रखा जाए? चाहे वह निषेध के बराबर हो या न हो, जो व्यक्ति निर्दोष विवेक रखना चाहता है, उसे निश्चय ही सुरक्षित पक्ष में रहना चाहिए और उससे बचना चाहिए जो शायद बुरा हो। निश्चय ही यह अधिक उत्तम मार्ग है कि तुम वह कुछ न करो जिसे तुम जानते हो कि तुम्हारे माता-पिता अस्वीकार करते हैं। अन्यथा करना एक प्रकार की अवज्ञा का संकेत देता प्रतीत होता है, जिससे कोमल विवेक वाला व्यक्ति बचना चाहेगा।
6. इस निर्देश में निहित दूसरी बात यह है: जो कुछ तुम्हारे पिता या माता कहें, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, उसे करो, बशर्ते वह परमेश्वर की किसी आज्ञा के विरुद्ध न हो। इसमें
परमेश्वर ने माता-पिता को वह अधिकार दिया है जो सम्प्रभु राजाओं के पास भी नहीं है। उदाहरण के लिए, इंग्लैंड का राजा एक सम्प्रभु राजा है; फिर भी उसे यह अधिकार नहीं कि वह मुझसे ज़रा-सा भी कुछ करने को कहे, जब तक देश की व्यवस्था मुझसे वैसा करने की माँग न करे; क्योंकि उसके पास व्यवस्था को लागू करने के सिवाय कोई अधिकार नहीं। राजा की इच्छा प्रजा के लिए व्यवस्था नहीं है। परन्तु माता-पिता की इच्छा बच्चे के लिए व्यवस्था है, जो विवेक से उसके अधीन होने को बाध्य है, जब तक वह परमेश्वर की व्यवस्था के विरुद्ध न हो।
7. यह आत्माओं के पिता की अद्भुत बुद्धिमत्ता है कि उसने यह निर्देश दिया है, ताकि जैसे माता-पिता का बल बच्चों के बल की कमी को, और माता-पिता की समझ बच्चों की समझ की कमी को पूरा करता है, जब तक उनके अपने बल और समझ न हों; वैसे ही माता-पिता की इच्छा उनके बच्चों की इच्छा का मार्गदर्शन करे [करनी चाहिए], जब तक उनमें स्वयं का मार्गदर्शन करने की बुद्धि और अनुभव न आ जाए। इसलिए यही वह पहली बात है जो बच्चों को सीखनी है — कि उन्हें अपने माता-पिता की आज्ञा माननी है, सब बातों में उनकी इच्छा के अधीन रहना है। और वे इसके कारण को समझने से बहुत पहले, वरन् धर्म के किसी भी सिद्धान्त को समझने के योग्य होने से बहुत पहले, इसके अभ्यस्त हो सकते हैं। इसी कारण सन्त पौलुस सब माता-पिताओं को निर्देश देता है कि अपने बच्चों का पालन-पोषण "प्रभु की शिक्षा और अनुशासन में" करें। क्योंकि उचित अनुशासन से उनकी इच्छा शैशव की आरम्भिक अवस्था में भी तोड़ी जा सकती है; जबकि शिक्षा पाने के योग्य होने में उसके बाद काफ़ी समय लगना ही है। इसलिए सबसे पहली बात यही है: बुद्धि की पहली किरण से ही उनकी इच्छाओं को झुका दो; और उन्हें अपनी इच्छा के अधीन होने का अभ्यस्त करके उन्हें अपने स्वर्गीय पिता की इच्छा के अधीन होने के लिए तैयार करो।
8. परन्तु हम छः या आठ वर्ष के बच्चों में भी कितने कम पाते हैं जो इसमें से कुछ भी समझते हों! वस्तुतः वे कैसे समझें, जब उन्हें सिखाने वाला कोई है ही नहीं?
क्या उनके माता-पिता, पिता भी और माता भी, इस विषय में उन्हीं के समान अनजान नहीं हैं?
धार्मिक लोगों में भी तुम किसे पाते हो जिसे इसकी थोड़ी भी धारणा हो? क्या तुमने इसका प्रमाण अपनी आँखों से नहीं देखा? क्या तुम कभी वहाँ उपस्थित नहीं रहे जब पिता या माता ने कहा, "बेटा, ऐसा या वैसा करो"? और बच्चे ने बिना किसी लिहाज़ के
माता-पिता की आज्ञाकारिता पर दो टूक उत्तर दिया, "मैं नहीं करूँगा।" और माता-पिता चुपचाप उसे बिना और ध्यान दिए जाने देते हैं। और क्या वह या वह यह नहीं देखती कि इस क्रूर लाड़-प्यार से वे अपने बच्चे को माता-पिता के विरुद्ध खुले विद्रोह के द्वारा परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह के लिए तैयार कर रहे हैं? फलस्वरूप वे उसे उस अनन्त आग के लिए तैयार कर रहे हैं जो शैतान और उसके दूतों के लिए तैयार की गई है! यदि वे इस पर ठीक से विचार करें, तो वे न खाएँगे, न पीएँगे, न सोएँगे, जब तक उसे एक अच्छा पाठ न सिखा दें और उसे पूरी तरह भयभीत न कर दें कि वह फिर कभी वह शैतानी उत्तर दे।
9. परमेश्वर का भय माननेवाले तुम माता-पिताओं से मैं इस मामले पर थोड़ा और तर्क करूँ। यदि तुम सचमुच परमेश्वर का भय मानते हो, तो एक वर्ष से बड़े बच्चे को यह कहने देने का साहस तुम कैसे करते हो कि तुम जिसे मना करते हो उसे "मैं करूँगा," या जिसे करने को कहते हो उसे "मैं नहीं करूँगा," और वह बिना दण्ड के रह जाए? तुम उसे तुरन्त क्यों नहीं रोकते, ताकि वह फिर कभी ऐसा कहने का साहस न करे? क्या तुम्हारे भीतर कोई ममता, अपने बच्चे के लिए कोई करुणा नहीं है? उसके उद्धार या विनाश की कोई चिन्ता नहीं? क्या तुम उसे अपने सामने कोसने या शपथ खाने दोगे और उस पर ध्यान न दोगे? सच तो यह है कि आज्ञा न मानना विनाश का उतना ही निश्चित मार्ग है जितना कोसना और शपथ खाना। उसे रोको, आरम्भ में ही रोको, परमेश्वर के नाम में। "छड़ी को न बचाओ कि बच्चा बिगड़ जाए।" यदि तुम्हारा हृदय बाघ का सा नहीं है, तो अपने बच्चे को उसकी अपनी इच्छा के हवाले मत करो, अर्थात् शैतान के हवाले। चाहे यह तुम्हारे लिए पीड़ादायक हो, तो भी अपनी सन्तान को सिंह के दाँतों से खींच निकालो। उन्हें झुकाओ, ताकि वे नष्ट न हों। उनकी इच्छा को तोड़ो, ताकि तुम उनकी आत्मा को बचा सको।
10. मुझे नहीं सूझता कि इस बात पर कैसे पर्याप्त बल दूँ। इसे तुम्हारे मन पर और दृढ़ता से जमाने के लिए मुझे इस विषय पर कुछ वर्ष पहले छपे एक पत्र का एक अंश जोड़ने की अनुमति दो: —
"बच्चों के मन को गढ़ने के लिए सबसे पहले उनकी इच्छा को जीतना चाहिए। उनकी समझ को शिक्षित करना समय का काम है, और धीरे-धीरे ही आगे बढ़ सकता है; परन्तु इच्छा को वश में करना ऐसा काम है जो एक ही बार में कर देना चाहिए; और जितना शीघ्र हो उतना अच्छा।
क्योंकि समय पर सुधार की उपेक्षा करने से उनमें ऐसा हठ आ जाता है जिसे जीतना लगभग असम्भव है, और जिसे उस कठोरता के बिना कभी नहीं जीता जा सकता जो हमारे लिए उतनी ही पीड़ादायक होगी जितनी बच्चों के लिए। इसलिए मैं उन माता-पिताओं को क्रूर कहता हूँ जो दयालु और लाड़-प्यार करनेवाले माने जाते हैं; जो अपने बच्चों को ऐसी आदतें पड़ने देते हैं जिन्हें वे जानते हैं कि बाद में तोड़ना ही पड़ेगा।
"मैं बच्चों की इच्छा को समय रहते जीतने पर बल देता हूँ; क्योंकि धार्मिक शिक्षा की यही एकमात्र नींव है। जब यह भली-भाँति हो चुका हो, तब बच्चा अपने माता-पिता की बुद्धि द्वारा संचालित होने के योग्य हो जाता है, जब तक कि उसकी अपनी समझ परिपक्व न हो जाए।
"मैं अभी इस विषय को छोड़ नहीं सकता। जैसे स्वेच्छाचार सब पाप और दुःख की जड़ है, वैसे ही जो कुछ बच्चों में इसे पोसता है, वह उनके आगे के दुर्भाग्य और अधार्मिकता को निश्चित करता है; और जो कुछ इसे रोकता और दबाता है, वह उनके भावी सुख और भक्ति को बढ़ावा देता है। यह और भी स्पष्ट हो जाता है यदि हम विचार करें कि धर्म और कुछ नहीं, बल्कि परमेश्वर की इच्छा पर चलना है, अपनी इच्छा पर नहीं; और स्वेच्छाचार हमारे सांसारिक और अनन्त सुख की सबसे बड़ी बाधा है, इसलिए उसके प्रति कोई छूट तुच्छ नहीं हो सकती; उसका कोई निषेध निष्फल नहीं। स्वर्ग या नरक केवल इसी पर निर्भर है। अतः जो माता-पिता अपने बच्चों में इसे वश में करने का यत्न करता है, वह एक आत्मा के बचाने में परमेश्वर का सहकर्मी है। जो माता-पिता इसे प्रश्रय देता है, वह शैतान का काम करता है, धर्म को अव्यावहारिक और उद्धार को अप्राप्य बना देता है;
माता-पिता की आज्ञाकारिता पर और अपनी सारी सामर्थ्य से अपने बच्चे को शरीर और आत्मा सहित सदा के लिए नाश करने का प्रयत्न करता है!
"इसलिए मैं इसे गम्भीरता से दोहराए बिना नहीं रह सकता, — उनकी इच्छाओं को समय रहते तोड़ो; यह महान कार्य तब आरम्भ करो जब वे अकेले दौड़ न सकें, साफ़ बोल न सकें, या शायद बोल भी न सकें।
इसमें जितना भी कष्ट हो, उनका हठ जीत लो: इच्छा तोड़ दो, यदि तुम बच्चे को नाश नहीं करना चाहते। मैं तुम्हें शपथ दिलाता हूँ कि इसकी उपेक्षा न करो, इसमें देर न करो! इसलिए, (1.) बच्चे को एक वर्ष की आयु से छड़ी से डरना और धीरे-धीरे रोना सिखाया जाए। इसके लिए, (2.) जिस चीज़ के लिए वह रोए, वह उसे न मिले; बिल्कुल कुछ भी नहीं, बड़ी हो या छोटी; नहीं तो तुम अपना ही किया-कराया बिगाड़ दोगे। (3.) हर हाल में, उस आयु से उससे वही करवाओ जो कहा जाए, चाहे इसके लिए उसे लगातार दस बार कोड़े लगाने पड़ें। कोई तुम्हें यह न समझाए कि ऐसा करना क्रूरता है; ऐसा न करना क्रूरता है। अभी उसकी इच्छा तोड़ दो, तो उसकी आत्मा जीवित रहेगी, और वह सम्भवतः अनन्तकाल तक तुम्हें धन्य कहेगा।
11. इसके विपरीत, उस शापित कोमलता के परिणाम कितने भयानक हैं जो बच्चों को उनकी अपनी इच्छा पर छोड़ देती है और उनकी गर्दन शैशव से ही नहीं झुकाती! मुख्यतः इसी के कारण इतने धार्मिक माता-पिता ऐसे बच्चों को पालते हैं जिनमें कोई धर्म ही नहीं है; ऐसे बच्चे जो बड़े होकर उनका कोई आदर नहीं करते, शायद उन्हें तुच्छ जानते हैं, और उनकी आँखें निकाल लेने को तैयार रहते हैं! यह क्यों, सिवाय इसके कि आरम्भ में उनकी इच्छा नहीं तोड़ी गई? — क्योंकि उन्हें शैशव से ही सब बातों में अपने माता-पिता की आज्ञा मानने और उनकी इच्छा के अधीन ऐसे रहने का अभ्यास नहीं कराया गया जैसे परमेश्वर की इच्छा के अधीन? — क्योंकि उन्हें बुद्धि की पहली किरण से ही यह नहीं सिखाया गया कि माता-पिता की इच्छा उनके लिए परमेश्वर की इच्छा है; कि उसका विरोध करना परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह है, और सब अभक्ति का द्वार?
II. 1. पाठ की व्याख्या के लिए इतना पर्याप्त हो; अब मैं इसके अनुप्रयोग की ओर बढ़ता हूँ।
और मुझे अनुमति दो कि पहले मैं तुम पर लागू करूँ जो माता-पिता हो, और इस नाते अपने बच्चों को सिखाने के उत्तरदायी हो। क्या तुम स्वयं ये बातें जानते हो? क्या तुम इन महत्त्वपूर्ण सत्यों के विषय में पूरी तरह कायल हो? क्या तुमने इन्हें हृदय में रखा है? और क्या तुमने इन्हें अपने बच्चों के सम्बन्ध में व्यवहार में उतारा है? क्या तुमने उन्हें शिक्षा पाने के योग्य होने से पहले अनुशासन का अभ्यस्त किया? क्या तुमने उनकी इच्छाओं को उनके प्रारम्भिक शैशव से तोड़ा है; और क्या तुम स्वभाव और रीति दोनों के विरोध में आज भी ऐसा करते आ रहे हो? क्या तुमने जैसे ही उनकी समझ खुलने लगी, उन्हें समझाया कि तुम ऐसा क्यों करते हो? क्या तुमने उन्हें परमेश्वर की इच्छा को हर बुद्धिमान प्राणी की एकमात्र व्यवस्था के रूप में दिखाया; और उन्हें बताया कि परमेश्वर की इच्छा है कि वे सब बातों में तुम्हारी आज्ञा मानें? क्या तुम इसे बार-बार तब तक सिखाते हो जब तक वे इसे भली-भाँति समझ न लें? हे, प्रेम के इस परिश्रम से कभी न थको! और तुम्हारा परिश्रम सदा व्यर्थ नहीं जाएगा।
2. कम से कम, उन्हें अवज्ञा का प्रतिफल देकर अवज्ञा करना मत सिखाओ। स्मरण रखो! तुम यह हर बार करते हो जब उन्हें कुछ इसलिए दे देते हो कि वे उसके लिए रोए। और इसमें वे चतुर शिष्य हैं: यदि तुम रोने का प्रतिफल दोगे, तो वे निश्चय ही फिर रोएँगे। इसलिए इसका कोई अन्त नहीं, जब तक तुम इसे पवित्र नियम न बना लो कि जिस चीज़ के लिए वे रोएँ वह उन्हें न दो। और ऐसा करने का सबसे छोटा मार्ग यह है कि उन्हें कभी ज़ोर से रोने न दो। उन्हें इस एक बात में आज्ञाकारिता सिखाओ, तो तुम उन्हें अन्य बातों में भी सरलता से आज्ञाकारी बना लोगे। तुम माता-पिता की आज्ञाकारिता पर आज ही आरम्भ क्यों न करो? निश्चय ही तुम देखते हो कि सबसे उत्तम मार्ग क्या है; तुम्हारे बच्चे के लिए भी सर्वोत्तम, और तुम्हारी अपनी आत्मा के लिए भी। तो फिर तुम अवज्ञा क्यों करते हो? क्योंकि तुम कायर हो; क्योंकि तुम में दृढ़ संकल्प की कमी है। और निस्सन्देह [इसे आरम्भ करने और इसमें बने रहने के लिए कम दृढ़ संकल्प नहीं चाहिए। निश्चय ही इसके लिए] कम धैर्य नहीं चाहिए, उससे अधिक जितना स्वभाव ने कभी दिया। परन्तु परमेश्वर का अनुग्रह तुम्हारे लिए पर्याप्त है; तुम मसीह के द्वारा जो तुम्हें सामर्थ्य देता है सब कुछ कर सकते हो। यह अनुग्रह तुम्हें संकल्प के साथ-साथ परिश्रम भी देने के लिए पर्याप्त है; नहीं तो आलस्य भी उतनी ही बड़ी बाधा होगा जितनी कायरता। क्योंकि बहुत परिश्रम के बिना तुम जीत नहीं सकते: ढीले हाथ से कुछ नहीं हो सकता; लगे रहो; कभी न थको, पंक्ति पर पंक्ति रखते जाओ, जब तक धैर्य का सिद्ध काम पूरा न हो जाए।
3. परन्तु एक और बाधा है जिसे जीतना आलस्य या कायरता से कम कठिन नहीं। इसे मोह कहते हैं, और प्रायः प्रेम समझ लिया जाता है: परन्तु, हे, यह उससे कितना भिन्न है! यह वास्तव में घृणा है; और सबसे हानिकारक प्रकार की घृणा, जो शरीर और आत्मा दोनों को नरक में नष्ट कर देती है! हे, अब और इसके आगे झुको मत, एक क्षण के लिए भी नहीं। अपनी पूरी शक्ति से इसके विरुद्ध लड़ो! परमेश्वर के प्रेम के लिए; अपने बच्चों के प्रेम के लिए; अपनी ही आत्मा के प्रेम के लिए!
4. माता-पिता से, विशेषकर माताओं से, मुझे एक बात और कहनी है। यदि प्रेरित के सब कहने पर भी तुम अपने उदाहरण से अपने बच्चों को "सोने, या मोतियों, या बहुमूल्य वस्त्रों से" अपने आपको "सँवारने" के लिए प्रोत्साहित करती हो, तो तुम और वे दोनों साथ-साथ गड्ढे में गिरोगे। परन्तु यदि तुम उन्हें अच्छा उदाहरण देती हो, फिर भी वे ऐसा करते हैं, तब भी यह उनका ही नहीं, तुम्हारा भी दोष है; क्योंकि यदि तुमने अपने नन्हे बच्चे को कोई ऐसा आभूषण नहीं पहनाया जो तुम स्वयं न पहनो (जो पूरी विक्षिप्तता होती, और उसे अपनी बाँहों या सिर पर पहनने से कहीं अधिक अक्षम्य), तो भी तुमने उन्हें शैशव से अपनी आज्ञा मानने का अभ्यस्त नहीं किया, और कम से कम दो वर्ष की आयु से उन्हें इसका कर्तव्य नहीं सिखाया। नहीं तो वे तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध, बड़ी या छोटी, कोई बात करने का साहस नहीं करते। इसलिए जब कभी मैं सादे वस्त्र पहननेवाली माता की सजी-धजी बेटी को देखता हूँ, तो मुझे तुरन्त दिखाई देता है कि माता में या तो ज्ञान की या धर्म की कमी है।
या तो वह अपने या अपने बच्चे के कर्तव्य से अनजान है, या उसने जो जानती है उस पर अमल नहीं किया।
5. मैं अभी इस विषय को छोड़ नहीं सकता। धार्मिक माता-पिता को अपने बच्चों को वस्त्र-सज्जा की उसी मूर्खता में दौड़ने देते देख मैं निरन्तर व्यथित होता हूँ, मानो उनमें कोई धर्म ही न हो। परमेश्वर के नाम में, तुम उन्हें अपने उदाहरण से बाल भर भी हटने क्यों देते हो? "अरे, वे तो ऐसा करेंगे ही?" वे करेंगे! यह किसका दोष है? तुमने उनकी इच्छा शैशव से क्यों नहीं तोड़ी? कम से कम अब तो करो; देर से भली, न करने से। यह उनके दो वर्ष की आयु के होने से पहले हो जाना चाहिए था: यह आठ या दस वर्ष में भी हो सकता है, यद्यपि कहीं अधिक कठिनाई से। फिर भी, अब करो; और उस कठिनाई को अपनी बीती उपेक्षा का उचित प्रतिफल मानकर स्वीकार करो। अब, कम से कम, अपनी बात मनवाओ, चाहे जो भी कीमत चुकानी पड़े। मीठी बातें मत करो; मूर्ख एली की तरह यह मत कहो, "नहीं, मेरे पुत्रो, जो समाचार मैं तुम्हारे विषय में सुनता हूँ वह अच्छा नहीं," जबकि तुम्हें बलपूर्वक उन्हें रोकना चाहिए; परन्तु (जितनी शान्ति से हो सके, फिर भी) दृढ़ता और निर्णायक ढंग से कहो, "मैं ऐसा ही चाहता हूँ;" और जैसा कहो वैसा करो। उनके मन में सादे वस्त्रों के प्रति प्रेम और दिखावे के प्रति घृणा परिश्रम से बैठाओ।
उन्हें अपनी सादगी का कारण दिखाओ, और दिखाओ कि यह उनके लिए भी उतना ही उचित है। आलस्य, कायरता और मूर्खतापूर्ण मोह को चुनौती दो, और हर हाल में
माता-पिता की आज्ञाकारिता पर अपनी बात मनवाओ; यदि तुम उनकी आत्माओं से प्रेम करते हो, तो उन्हें बिल्कुल अपने जैसा सादा बनाओ और बनाए रखो। और हे नानियों-दादियों, मैं परमेश्वर के सामने तुम्हें आदेश देता हूँ, इसमें अपनी बेटियों में बाधा मत डालो। बच्चे को कोई ऐसी चीज़ देने का साहस मत करो जिसे माता मना करती है। बच्चों का पक्ष लेकर उनके माता-पिता का विरोध कभी मत करो; उनके सामने उसे कभी दोषी मत ठहराओ। यदि तुम उसके अधिकार को, जैसा करना चाहिए, दृढ़ नहीं करतीं, तो कम से कम उसे कमज़ोर तो मत करो; परन्तु यदि तुम में समझ या भक्ति कुछ भी बची है, तो सच्ची भलाई के इस काम में उसकी सहायता करो। 6. अब मुझे अनुमति दो कि मैं तुमसे, बच्चो, विशेषकर तुमसे जो धार्मिक माता-पिता की सन्तान हो, बात करूँ। यदि तुम्हारी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं है, तो अभी मुझे तुमसे कोई सरोकार नहीं; परन्तु यदि है, यदि तुम सचमुच परमेश्वर का भय मानते हो और उसे प्रसन्न करने की इच्छा रखते हो, तो तुम उसकी सब आज्ञाओं को समझना चाहते हो, विशेषकर पाँचवीं को। क्या तुमने इसे कभी समझा है? क्या तुम अब समझते हो कि अपने पिता और माता के प्रति तुम्हारा कर्तव्य क्या है? क्या तुम जानते हो, या कम से कम विचार करते हो कि ईश्वरीय नियुक्ति से उनकी इच्छा तुम्हारे लिए व्यवस्था है? क्या तुमने कभी विचार किया है कि परमेश्वर माता-पिता की किस सीमा तक आज्ञाकारिता माँगता है?
"हे बच्चो, सब बातों में अपने माता-पिता की आज्ञा का पालन करो।" अनुचित बातों के सिवाय कोई अपवाद नहीं। क्या तुमने अपना कर्तव्य इस सीमा तक निभाया है? क्या तुमने कभी इसका इरादा भी किया?
7. अपनी आत्माओं के साथ ईमानदारी से व्यवहार करो। क्या इस विषय में अब तुम्हारा विवेक साफ़ है? क्या तुम कुछ भी ऐसा नहीं करते जिसे तुम जानते हो कि वह तुम्हारे पिता या माता की इच्छा के विरुद्ध है?
क्या तुम कभी कुछ ऐसा नहीं करते (चाहे उसकी ओर कितना ही झुकाव हो) जिसे वे मना करते हैं? क्या तुम हर उस बात से दूर रहते हो जो उन्हें अप्रिय है, जहाँ तक विवेक से कर सकते हो? दूसरी ओर, क्या तुम माता-पिता जो भी कहें उसे करने में सावधान रहते हो? क्या तुम सोचते और उपाय करते हो कि उन्हें कैसे प्रसन्न करो, उनके जीवन को यथासम्भव सुखद और सरल बनाओ? तुम जो कोई भी हो, जो सब बातों में परमेश्वर को प्रसन्न करने की अपनी सामान्य चिन्ता में इसे भी जोड़ता है, तू प्रभु की ओर से धन्य है! "जो देश तेरा परमेश्वर यहोवा तुझे देता है उसमें तू बहुत दिन जीवित रहेगा।"
8. परन्तु तुम जो इस विषय की बहुत परवाह नहीं करते, जो सब बातों में अपने माता-पिता की आज्ञा मानना विवेक का प्रश्न नहीं बनाते, बल्कि कभी जैसा संयोग हो मानते हो और कभी नहीं; जो प्रायः वह करते हो जो वे मना करते या अस्वीकार करते हैं, और वह उपेक्षित छोड़ते हो जो वे तुम्हें करने को कहते हैं; मान लो तुम नींद से जाग उठे, तुम अपने आपको पापी अनुभव करने लगे, और परमेश्वर से दया की पुकार करने लगे, तो क्या आश्चर्य कि तुम्हें कोई उत्तर नहीं मिलता, जब तुम अपश्चात्तापी पाप के दोष के अधीन हो? जब तक तुम अपने माता-पिता की आज्ञा नहीं मानते, तुम परमेश्वर से दया की आशा कैसे कर सकते हो? परन्तु मान लो कि तुमने दया के किसी असाधारण चमत्कार से परमेश्वर के क्षमा करनेवाले प्रेम का स्वाद चख लिया है, तो क्या यह आशा की जा सकती है, यद्यपि तुम धार्मिकता के, परमेश्वर के सिद्ध प्रेम के भूखे और प्यासे हो, कि तुम कभी उसे पा सको, कभी उससे तृप्त हो सको, जब तक तुम बाहरी पाप में, परमेश्वर की एक ज्ञात व्यवस्था के जानबूझकर उल्लंघन में, अपने माता-पिता की अवज्ञा में जीते हो? क्या यह आश्चर्य की बात नहीं कि उसने तुमसे अपना पवित्र आत्मा नहीं हटा लिया? कि तुम्हारे निरन्तर उसके आत्मा को शोकित करने पर भी वह अब तक तुम्हारे साथ प्रयत्नशील है? हे, अब उसे और शोकित मत करो! परमेश्वर के अनुग्रह से, इसी क्षण से सब बातों में उनकी आज्ञा मानो! जैसे ही घर आओ, जैसे ही द्वार के भीतर पैर रखो, एक बिल्कुल नया मार्ग आरम्भ करो! अपने पिता और माता को नई आँखों से देखो; उन्हें अपने उस पिता के प्रतिनिधि के रूप में देखो जो
माता-पिता की आज्ञाकारिता पर स्वर्ग में है: सब बातों में उन्हें प्रसन्न करने, उनकी सहायता करने और उनकी आज्ञा मानने का यत्न करो, चिन्ता करो, आनन्दित रहो: केवल उनकी सन्तान की तरह नहीं, बल्कि मसीह के कारण उनके सेवक की तरह व्यवहार करो। हे, तब तुम एक-दूसरे से कैसे प्रेम करोगे! ऐसे ढंग से जो पहले अज्ञात था। परमेश्वर तुम्हें उनके लिए और उन्हें तुम्हारे लिए आशीष का कारण बनाएगा: आस-पास सब अनुभव करेंगे कि सचमुच परमेश्वर तुम्हारे साथ है। बहुत लोग इसे देखेंगे और परमेश्वर की स्तुति करेंगे; और इसका फल तब भी बना रहेगा जब तुम और वे दोनों इब्राहीम की गोद में पहुँच चुके होंगे।
