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कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी "तब यूहन्ना ने उस से कहा, हे गुरु, हम ने एक मनुष्य को तेरे नाम से दुष्टात्माएँ निकालते देखा, और हम ने उसे रोकना चाहा, क्योंकि वह हमारे पीछे नहीं चलता। परन्तु यीशु ने कहा,
1. पिछली आयतों में हम पढ़ते हैं कि जब बारहों में इस बात पर विवाद हो चुका था कि "उन में बड़ा कौन है," तब यीशु ने एक छोटे बालक को लेकर उनके बीच में खड़ा किया, और उसे गोद में लेकर उनसे कहा, "जो कोई मेरे नाम से इन छोटे बालकों में से किसी एक को ग्रहण करता है, वह मुझे ग्रहण करता है; और जो कोई मुझे ग्रहण करता है, वह मुझे नहीं" केवल, "वरन् मेरे भेजनेवाले को ग्रहण करता है।" तब "यूहन्ना ने उत्तर दिया," अर्थात् हमारे प्रभु ने जो अभी कहा था उसके सन्दर्भ में बोला, "हे गुरु, हम ने एक मनुष्य को तेरे नाम से दुष्टात्माएँ निकालते देखा, और हम ने उसे रोका, क्योंकि वह हमारे पीछे नहीं चलता।" मानो उसने कहा हो, "क्या हमें उसे ग्रहण करना चाहिए था? उसे ग्रहण करने में क्या हम तुझे ग्रहण करते? क्या हमें उसे रोकना ही उचित न था? क्या हम ने इसमें भला नहीं किया?" "परन्तु यीशु ने कहा, उसे मत रोको।"
2. यही प्रसंग सन्त लूका ने भी लगभग उन्हीं शब्दों में दिया है। परन्तु यह पूछा जा सकता है, "इससे हमारा क्या सम्बन्ध, जब आज कोई मनुष्य दुष्टात्माएँ नहीं निकालता? क्या यह सामर्थ्य बारह या चौदह सौ वर्षों से कलीसिया से उठा नहीं ली गई? तब यहाँ प्रस्तुत घटना, या उसके विषय में हमारे प्रभु के निर्णय, से हमारा क्या वास्ता?"
3. शायद उससे कहीं अधिक, जितना सामान्यतः सोचा जाता है; क्योंकि जो घटना यहाँ प्रस्तुत है वह कोई असाधारण घटना नहीं है। इससे हम पूरा लाभ उठा सकें, इसके लिए मेरा विचार है कि पहले यह दिखाऊँ कि किस अर्थ में मनुष्य अब भी दुष्टात्माएँ निकाल सकते हैं और निकालते हैं; दूसरे, "वह हमारे पीछे नहीं चलता" से हम क्या समझ सकते हैं। तीसरे, मैं हमारे प्रभु के निर्देश "उसे मत रोको" की व्याख्या करूँगा; और अन्त में सम्पूर्ण विषय से एक निष्कर्ष निकालूँगा।
I. 1. सबसे पहले मुझे यह दिखाना है कि किस अर्थ में मनुष्य अब भी दुष्टात्माएँ निकाल सकते हैं और निकालते हैं।
इसे अत्यन्त स्पष्ट रूप से देखने के लिए हमें स्मरण रखना चाहिए कि (पवित्रशास्त्र के वर्णन के अनुसार) जैसे परमेश्वर ज्योति की सन्तानों में वास करता और कार्य करता है, वैसे ही शैतान अन्धकार की सन्तानों में वास करता और कार्य करता है। जैसे पवित्र आत्मा भले मनुष्यों के प्राणों में निवास करता है, वैसे ही दुष्ट आत्मा दुष्टों के प्राणों में निवास करती है। इसी कारण प्रेरित उसे "इस संसार का ईश्वर" कहता है, क्योंकि सांसारिक मनुष्यों पर उसका अनियंत्रित अधिकार है। इसी कारण हमारे धन्य
प्रभु उसे "इस संसार का सरदार" कहते हैं; इस पर उसका प्रभुत्व इतना पूर्ण है। और इसी कारण सन्त यूहन्ना कहता है: "हम जानते हैं कि हम परमेश्वर से हैं, और" जो परमेश्वर से नहीं हैं, वे सब, "सारा संसार," "en toi poneroi keitai" [अर्थात् "उस दुष्ट में पड़ा है"], —दुष्टता में नहीं पड़ा है, परन्तु "उस दुष्ट में पड़ा है"; वह उसी में जीता और चलता-फिरता है, जैसे वे जो संसार के नहीं हैं, परमेश्वर में जीते हैं।
2. क्योंकि शैतान को केवल "गर्जनेवाले सिंह के समान, जो इस खोज में रहता है कि किसे फाड़ खाए" ही नहीं समझना चाहिए; और न ही केवल एक चतुर शत्रु, जो बेचारे प्राणों पर अचानक आ पड़ता है, और कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी "उन्हें अपनी इच्छा से बन्दी बना लेता है"; परन्तु उसे वैसा समझना चाहिए जो उनमें निवास करता है और उनमें चलता-फिरता है; जो इस संसार के अन्धकार अथवा दुष्टता पर (सांसारिक मनुष्यों और उनकी सब अन्धकारमय योजनाओं और कार्यों पर) उनके हृदयों पर अधिकार जमाए रखकर, वहाँ अपना सिंहासन स्थापित करके, और हर विचार को अपने अधीन करके शासन करता है। इस प्रकार "बलवन्त हथियार बाँधे हुए अपने घर की रखवाली करता है"; और यदि कभी वह "अशुद्ध आत्मा" "मनुष्य में से निकल भी जाती है," तो अकसर "अपने से भी बुरी सात आत्माओं को साथ लेकर लौट आती है, और वे उसमें प्रवेश करके वहाँ वास करती हैं।" और वह अपने निवास में निष्क्रिय भी नहीं रह सकता। वह निरन्तर इन "आज्ञा न माननेवाली सन्तानों में" "कार्य करता" रहता है। वह उनमें सामर्थ्य से, प्रबल शक्ति से कार्य करता है, उन्हें अपने ही स्वरूप में ढालता है, परमेश्वर के स्वरूप के सब अवशेषों को मिटा देता है, और उन्हें हर बुरी बात और बुरे काम के लिए तैयार करता है।
3. इसलिए यह निर्विवाद सत्य है कि इस संसार का ईश्वर और सरदार अब भी उन सब पर अधिकार रखता है जो परमेश्वर को नहीं जानते। केवल उनपर अधिकार रखने का ढंग अब उस ढंग से भिन्न है जैसा प्राचीन काल में था। तब वह प्रायः उनके शरीरों को भी और प्राणों को भी सताता था, और वह भी खुलेआम, बिना किसी आवरण के; अब वह (कुछ विरल अवस्थाओं को छोड़कर) केवल उनके प्राणों को सताता है, और वह भी यथासम्भव छिपकर। इस भेद का कारण स्पष्ट है: तब उसका लक्ष्य मनुष्यों को अन्धविश्वास की ओर धकेलना था; इसलिए वह जितना हो सके खुलकर कार्य करता था। परन्तु अब उसका लक्ष्य हमें अविश्वास की ओर धकेलना है; इसलिए वह जितना हो सके गुप्त रूप से कार्य करता है; क्योंकि वह जितना अधिक छिपा रहता है, उतना ही अधिक सफल होता है।
4. फिर भी, यदि हम इतिहासकारों पर विश्वास करें, तो आज भी ऐसे देश हैं जहाँ वह पहले की भाँति खुलकर कार्य करता है। "परन्तु केवल जंगली और असभ्य देशों में ही क्यों? इटली,
फ्रांस, या इंग्लैंड में क्यों नहीं?" इसका कारण बहुत स्पष्ट है: वह अपने लोगों को जानता है, और जानता है कि प्रत्येक के साथ उसे क्या करना है। लैपलैंड के लोगों के सामने वह निर्लज्ज होकर प्रकट होता है; क्योंकि उसे उन्हें अन्धविश्वास और घोर मूर्तिपूजा में जमाना है। परन्तु तुम्हारे साथ वह एक भिन्न लक्ष्य के पीछे है। उसे तुमसे तुम्हारी ही मूर्तिपूजा करवानी है; तुम्हें अपनी दृष्टि में परमेश्वर से, परमेश्वर की सब वाणियों से भी अधिक बुद्धिमान बनाना है। अब, ऐसा करने के लिए उसे अपने असली रूप में प्रकट नहीं होना चाहिए: इससे उसकी योजना विफल हो जाएगी। नहीं: वह अपनी सारी चतुराई लगाता है कि तुम उसके अस्तित्व को ही नकार दो, जब तक कि वह तुम्हें अपने स्थान में सुरक्षित न कर ले।
5. इसलिए, यद्यपि भिन्न रीति से, फिर भी वह एक देश में उतना ही पूर्ण रूप से राज्य करता है जितना दूसरे में। रंगीन-मिजाज़ इतालवी अविश्वासी उसके दाँतों में उतना ही निश्चित है जितना जंगली तातारी। परन्तु वह सिंह के मुँह में गहरी नींद सो रहा है, जो उसे नींद से जगाने के लिए बहुत चतुर है। इसलिए वह अभी तो उसके साथ केवल खेलता है, और जब चाहेगा, उसे निगल लेगा!
इस संसार का ईश्वर अपने अंग्रेज़ उपासकों को भी लैपलैंड के उपासकों जितनी ही मज़बूती से पकड़े हुए है। परन्तु उन्हें डराना उसका उद्देश्य नहीं, कहीं ऐसा न हो कि वे स्वर्ग के परमेश्वर की ओर भाग जाएँ। इसलिए अन्धकार का सरदार इन अपनी इच्छुक प्रजा पर शासन करते हुए प्रकट नहीं होता। विजेता अपने बन्दियों को इसीलिए अधिक सुरक्षित रखता है कि वे स्वयं को स्वतन्त्र समझते हैं।
इस प्रकार "बलवन्त हथियार बाँधे हुए अपने घर की रखवाली करता है, और उसकी सम्पत्ति कुशल से रहती है"; न तो देववादी और न नाममात्र का मसीही यह सन्देह करता है कि वह वहाँ है: इसलिए वह और वे एक-दूसरे के साथ पूर्ण शान्ति में हैं।
कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी 6. इस सारे समय वह उनमें सामर्थ्य से कार्य करता रहता है। वह उनकी समझ की आँखों को अन्धा कर देता है, जिससे मसीह के तेजोमय सुसमाचार का प्रकाश उन पर नहीं चमक सकता। वह उनके प्राणों को उनकी अपनी नीच अभिलाषाओं की जंजीरों से पृथ्वी और नरक की ओर जकड़े रखता है। संसार के प्रेम, धन के प्रेम, सुख के प्रेम, प्रशंसा के प्रेम के द्वारा वह उन्हें पृथ्वी से बाँधे रखता है। और अभिमान, डाह, क्रोध, घृणा, बदले की भावना के द्वारा वह उनके प्राणों को नरक के निकट खींच लाता है; और वह और भी निश्चिन्त और निर्बाध होकर कार्य करता है, क्योंकि वे जानते ही नहीं कि वह कार्य कर भी रहा है।
7. परन्तु परिणामों से कारण को हम कितनी सरलता से जान सकते हैं! ये परिणाम कभी-कभी स्थूल और प्रत्यक्ष होते हैं। अन्यजातियों में सबसे परिष्कृत जातियों में भी ऐसा ही था। केवल प्रशंसित और सद्गुणी रोमियों तक ही जाओ; और तुम पाओगे कि उनके विद्या और वैभव के शिखर पर भी वे "सब प्रकार के अधर्म, व्यभिचार, दुष्टता, लोभ, बैर-भाव से भरे हुए; डाह, हत्या, झगड़े, छल और कुटिलता से भरपूर; कानाफूसी करनेवाले, बदनाम करनेवाले, अपमान करनेवाले, अभिमानी, डींग मारनेवाले, माता-पिता की आज्ञा न माननेवाले, वाचा तोड़नेवाले, स्वाभाविक स्नेह से रहित, कठोर और निर्दय" थे।
8. इस वर्णन के सबसे कठोर अंशों की पुष्टि एक ऐसे व्यक्ति से होती है जिसे कुछ लोग अधिक निर्विवाद साक्षी मान सकते हैं। मेरा आशय उनके ही अन्यजाति भाई दियो कासियस से है; जो देखता है कि कैसर के गॉल से लौटने से पहले न केवल हर प्रकार की पेटूपन और लम्पटता खुली और निर्लज्ज थी; न केवल सार्वजनिक न्यायालयों में तथा निजी परिवारों में झूठ, अन्याय और निर्दयता की भरमार थी; बल्कि रोम के सब भागों में अत्यन्त भयंकर लूट-पाट, डकैतियाँ और हत्याएँ इतनी बार होती थीं कि थोड़े ही लोग वसीयत बनाए बिना घर से बाहर निकलते थे, क्योंकि वे नहीं जानते थे कि जीवित लौटेंगे या नहीं!
9. आधुनिक अन्यजातियों में से बहुतों में (यदि सभी में नहीं) शैतान के कार्य उतने ही स्थूल और प्रत्यक्ष हैं। क्रीक, चेरोकी, चिकासॉ और हमारी दक्षिणी बस्तियों से लगे सब अन्य इण्डियनों का स्वाभाविक धर्म (कुछ एक व्यक्तियों का नहीं, वरन् सम्पूर्ण जातियों का) यह है कि अपने सब बन्दियों को सुबह से रात तक यातना देते हैं, जब तक कि अन्त में उन्हें भून-भूनकर मार न डालें; और ज़रा-सी अनजाने में हुई उत्तेजना पर भी अपने ही देशवासियों को पीछे से आकर गोली मार देते हैं! हाँ, उनमें यह सामान्य बात है कि पुत्र, यदि वह सोचे कि उसका पिता बहुत जी चुका, तो उसका सिर फोड़ दे; और माता, यदि वह अपने बच्चों से थक जाए, तो उनके गले में पत्थर बाँधकर तीन-चार को एक-एक करके नदी में फेंक दे!
10. यह कामना की जा सकती थी कि अन्यजातियों के अतिरिक्त किसी ने शैतान के ऐसे स्थूल और प्रत्यक्ष कार्य न किए होते। परन्तु हम ऐसा कहने का साहस नहीं कर सकते। क्रूरता और रक्तपात में भी मसीही उनसे कितने कम पीछे रहे हैं! और केवल स्पेनी या पुर्तगाली ही नहीं, जिन्होंने दक्षिण अमेरिका में हज़ारों का वध किया: केवल डच ही नहीं जिन्होंने ईस्ट इण्डीज़ में, या फ्रांसीसी जिन्होंने उत्तर
अमेरिका में स्पेनियों के कदम-कदम पर चलते हुए ऐसा किया: हमारे अपने देशवासियों ने भी रक्त बहाने में उन्माद दिखाया है और सम्पूर्ण जातियों का सर्वनाश किया है; जिससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि वह कौन-सी आत्मा है जो आज्ञा न माननेवाली सन्तानों में वास करती और कार्य करती है।
11. ये दैत्य हमें लगभग उन शैतानी कार्यों को अनदेखा करा सकते हैं जो हमारे अपने देश में किए जाते हैं। परन्तु हाय! यहाँ भी हम अपनी आँखें खोलें तो उन्हें चारों ओर देखे बिना नहीं रह सकते। क्या यह उसकी सामर्थ्य का छोटा प्रमाण है कि आम गाली देनेवाले, पियक्कड़,
कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी व्यभिचारी, परस्त्रीगामी, चोर, डाकू, पुरुषगामी, हत्यारे हमारे देश के हर भाग में अब भी पाए जाते हैं? इन सब आज्ञा न माननेवाली सन्तानों में इस संसार का सरदार कितने विजयी रूप में राज्य करता है!
12. कम खुले रूप में, परन्तु कम प्रभावशाली नहीं, वह कपटियों, चुगलखोरों, झूठों, निन्दकों में; अत्याचारियों और जबरन वसूली करनेवालों में, झूठी शपथ खानेवालों में, और अपने मित्र, अपने सम्मान, अपने विवेक, अपने देश को बेच देनेवालों में कार्य करता है। फिर भी ये लोग अब तक धर्म या विवेक की, सम्मान, सद्गुण और लोक-हित की बातें कर सकते हैं! परन्तु वे शैतान को उसी प्रकार धोखा नहीं दे सकते जैसे परमेश्वर को नहीं दे सकते। वह भी अपनों को जानता है: और वे बहुत बड़ी भीड़ हैं, हर जाति और लोग में से, जिन पर आज उसका पूरा अधिकार है।
13. यदि तुम इस पर विचार करो, तो यह देखे बिना न रहोगे कि किस अर्थ में मनुष्य आज भी दुष्टात्माएँ निकाल सकते हैं: हाँ, और मसीह का हर सेवक उन्हें निकालता है, यदि उसके प्रभु का कार्य उसके हाथ में सफल होता है।
अपने वचन के साथ रहनेवाली परमेश्वर की सामर्थ्य से वह इन पापियों को पश्चात्ताप तक पहुँचाता है; अर्थात् सब बुराई से सब भलाई की ओर एक पूर्ण आन्तरिक तथा बाहरी परिवर्तन। और यही, सही अर्थ में, दुष्टात्माओं को उन प्राणों में से निकालना है जिनमें वे अब तक वास करती थीं। बलवन्त मनुष्य अब अपना घर नहीं सँभाल सकता। उससे बलवन्त एक उस पर चढ़ आया है, और उसे निकाल बाहर किया है, और उस पर अधिकार कर लिया है, और उसे अपने आत्मा के द्वारा परमेश्वर का निवास बना दिया है। यहाँ, तब, शैतान की सामर्थ्य का अन्त होता है, और परमेश्वर का पुत्र "शैतान के कामों को नष्ट करता है।" पापी की समझ अब प्रकाशित हो जाती है, और उसका हृदय मधुरता से परमेश्वर की ओर खिंच जाता है। उसकी अभिलाषाएँ शुद्ध हो जाती हैं, उसकी भावनाएँ पवित्र हो जाती हैं; और पवित्र आत्मा से परिपूर्ण होकर वह अनुग्रह में बढ़ता जाता है, जब तक कि वह न केवल हृदय में, वरन् सम्पूर्ण आचरण में पवित्र नहीं हो जाता।
14. यह सब वास्तव में परमेश्वर का ही कार्य है। केवल परमेश्वर ही शैतान को निकाल सकता है। परन्तु वह साधारणतया यह कार्य मनुष्य को अपने हाथ का साधन बनाकर करने में प्रसन्न होता है: जिसके विषय में तब कहा जाता है कि वह उसके नाम से, उसकी सामर्थ्य और अधिकार से दुष्टात्माएँ निकालता है। और वह जिसे चाहता है उसे इस महान कार्य के लिए भेजता है; परन्तु प्रायः ऐसे को जिसके विषय में मनुष्य ने कभी सोचा भी न होता: क्योंकि "न तो उसके मार्ग हमारे मार्गों के समान हैं, और न उसके विचार हमारे विचारों के समान।" इसलिए वह निर्बलों को चुनता है कि बलवानों को लज्जित करे; मूर्खों को चुनता है कि बुद्धिमानों को लज्जित करे; इसका स्पष्ट कारण यह है कि महिमा अपने ही लिए सुरक्षित रखे; कि "कोई प्राणी उसके सामने घमण्ड न करे।"
II. 1. परन्तु क्या हम ऐसे व्यक्ति को न रोकें जो इस प्रकार "दुष्टात्माएँ निकालता है," यदि "वह हमारे पीछे नहीं चलता"?
ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेरित का यही निर्णय और आचरण था, जब तक उसने यह प्रसंग अपने स्वामी के सामने नहीं रखा। वह कहता है, "हम ने उसे रोका, क्योंकि वह हमारे पीछे नहीं चलता!" जिसे उसने बहुत पर्याप्त कारण माना। "वह हमारे पीछे नहीं चलता," इस कथन से हम क्या समझ सकते हैं, यह अगली बात है जिस पर विचार करना है।
इससे हम जो सबसे साधारण अर्थ समझ सकते हैं वह यह है कि उसका हमसे कोई बाहरी सम्बन्ध नहीं है। हम एक-दूसरे के साथ मिलकर परिश्रम नहीं करते। वह सुसमाचार में हमारा सहकर्मी नहीं है। और वास्तव में जब कभी हमारे प्रभु अपनी फसल काटने के लिए बहुत से मजदूर भेजने में प्रसन्न होते हैं, तो वे सब एक-दूसरे के अधीन, या एक-दूसरे से जुड़कर कार्य नहीं कर सकते। वरन् वे एक-दूसरे से व्यक्तिगत रूप से परिचित भी नहीं हो सकते, यहाँ तक कि एक-दूसरे को जानते भी नहीं। फसल के भिन्न-भिन्न भागों में बहुत
कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी से ऐसे अवश्य होंगे कि उनमें आपस में कोई मेलजोल नहीं होगा, और वे एक-दूसरे के लिए ऐसे पूर्ण अजनबी होंगे मानो वे भिन्न युगों में जीए हों। और इनमें से जिन्हें हम नहीं जानते, उनके विषय में हम निस्सन्देह कह सकते हैं, "वह हमारे पीछे नहीं चलता।"
2. इस कथन का दूसरा अर्थ यह हो सकता है, —वह हमारे दल का नहीं है। यरूशलेम की शान्ति के लिए प्रार्थना करनेवाले सब लोगों के लिए यह बहुत समय से शोकपूर्ण चिन्तन का विषय रहा है कि उन लोगों में, जो सब मसीही कहलाते हैं, अब भी इतने भिन्न-भिन्न दल बने हुए हैं। यह विशेष रूप से हमारे अपने देशवासियों में देखा गया है, जो ऐसी बातों पर जिनका कोई महत्त्व नहीं, और बहुधा ऐसी बातों पर जिनसे धर्म का कोई सरोकार नहीं था, निरन्तर एक-दूसरे से अलग होते रहे हैं। अत्यन्त तुच्छ परिस्थितियों से भिन्न-भिन्न दल उत्पन्न हुए हैं, जो कई पीढ़ियों तक चलते रहे हैं; और इनमें से प्रत्येक दूसरी ओर के किसी व्यक्ति पर यह आपत्ति करने को तैयार रहता, "वह हमारे पीछे नहीं चलता।"
3. तीसरे, उस कथन का यह अर्थ हो सकता है, —वह धार्मिक मतों में हमसे भिन्न है।
एक समय था जब सब मसीही एक मन के थे और एक हृदय के भी, जब वे पहली बार पवित्र आत्मा से परिपूर्ण हुए थे और उन सब पर बड़ा अनुग्रह था! परन्तु यह आशीष कितने थोड़े समय तक बनी रही! वह एकमतता कितनी जल्दी खो गई! और मसीह की कलीसिया में भी मतभेद फिर उठ खड़े हुए, —और वह भी नाममात्र के नहीं, वरन् वास्तविक
मसीहियों में; वरन् उनमें जो सबसे प्रमुख थे, स्वयं प्रेरितों में! और ऐसा नहीं दिखता कि जो मतभेद तब आरम्भ हुआ वह कभी पूरी तरह दूर हुआ। हम नहीं पाते कि परमेश्वर के मन्दिर के वे स्तम्भ भी, जब तक वे पृथ्वी पर रहे, कभी एक जैसा सोचने, एक मन के होने तक पहुँचे, विशेषकर रीति-विधि की व्यवस्था के विषय में। इसलिए यह किसी प्रकार आश्चर्य की बात नहीं कि अब मसीही कलीसिया में मतों की अनन्त विविधताएँ पाई जाती हैं। इसका एक अत्यन्त सम्भावित परिणाम यह है कि जब कभी हम किसी को "दुष्टात्माएँ निकालते" देखें, तो वह ऐसा होगा जो इस अर्थ में "हमारे पीछे नहीं चलता" —अर्थात् हमारे मत का नहीं है। यह कल्पना करना कठिन है कि वह सब बातों में, यहाँ तक कि धर्म की बातों में भी, हमारे समान विचार रखेगा। वह बहुत सम्भव है कि कई महत्त्वपूर्ण विषयों पर हमसे भिन्न रीति से सोचे; जैसे नैतिक व्यवस्था का स्वरूप और उपयोग, परमेश्वर की अनन्त नियतियाँ, उसके अनुग्रह की पर्याप्तता और प्रभावकारिता, और उसकी सन्तानों की स्थिरता।
4. चौथे, वह हमसे केवल मत में ही नहीं, वरन् आचरण की किसी बात में भी भिन्न हो सकता है। हो सकता है कि वह परमेश्वर की उपासना की उस रीति को स्वीकार न करे जो हमारी मण्डली में प्रचलित है, और उस रीति को अपने प्राण के लिए अधिक लाभकारी समझे जिसका आरम्भ कैल्विन या मार्टिन लूथर से हुआ। उसे उस प्रार्थना-विधि पर बहुत आपत्तियाँ हो सकती हैं जिसे हम सब से बढ़कर पसन्द करते हैं; कलीसिया-शासन के उस रूप के विषय में उसे बहुत सन्देह हो सकते हैं जिसे हम प्रेरितिक और पवित्रशास्त्रीय दोनों मानते हैं। सम्भव है कि वह हमसे और आगे चला जाए: वह विवेक के सिद्धान्त से उन बातों में से कई से दूर रहे जिन्हें हम मसीह की विधियाँ मानते हैं। अथवा यदि हम दोनों इस पर सहमत हों कि वे परमेश्वर द्वारा ठहराई गई हैं, तब भी हमारे बीच भेद रह सकता है, या तो उन विधियों के सम्पन्न करने की रीति में, या उन व्यक्तियों में जिन्हें वे दी जानी चाहिए। अब इन भेदों में से किसी का भी अपरिहार्य परिणाम यह होगा कि जो हमसे इस प्रकार भिन्न है, उसे इन बातों के विषय में हमारी
कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी सोसाइटी से अलग होना पड़ेगा। इस दृष्टि से, इसलिए, "वह हमारे पीछे नहीं चलता": वह (जैसा हम कहते हैं) "हमारी कलीसिया का" नहीं है।
5. परन्तु इससे कहीं अधिक प्रबल अर्थ में "वह हमारे पीछे नहीं चलता," जो केवल भिन्न कलीसिया का ही नहीं, वरन् ऐसी कलीसिया का है जिसे हम बहुत बातों में पवित्रशास्त्र-विरोधी और मसीह-विरोधी मानते हैं,
—ऐसी कलीसिया जिसे हम अपनी शिक्षाओं में सर्वथा मिथ्या और भ्रमित, और अपने आचरण में अत्यन्त खतरनाक रूप से गलत मानते हैं; जो घोर अन्धविश्वास और मूर्तिपूजा की दोषी है, —ऐसी कलीसिया जिसने उस विश्वास में, जो पवित्र लोगों को एक ही बार सौंपा गया था, बहुत से अनुच्छेद जोड़ दिए हैं; जिसने परमेश्वर की एक पूरी आज्ञा छोड़ दी है और अपनी परम्पराओं से शेष कई आज्ञाओं को व्यर्थ कर दिया है; और जो प्राचीन कलीसिया के प्रति सर्वोच्च श्रद्धा और कठोरतम अनुरूपता का दिखावा करते हुए भी, न प्राचीनता और न पवित्रशास्त्र के किसी प्रमाण के बिना, असंख्य नवीनताएँ ले आई है। अब, निश्चय ही, "वह हमारे पीछे नहीं चलता," जो हमसे इतनी दूरी पर खड़ा है।
6. और फिर भी इससे भी अधिक बड़ा भेद हो सकता है। जो मत या आचरण में हमसे भिन्न है, वह सम्भवतः मत की अपेक्षा स्नेह में हमसे अधिक दूरी पर खड़ा हो। और यह वास्तव में दूसरे का बहुत स्वाभाविक और बहुत सामान्य परिणाम है। जो भेद मतों की बातों में आरम्भ होते हैं, वे कदाचित् ही वहीं समाप्त होते हैं। वे प्रायः भावनाओं में फैल जाते हैं, और तब घनिष्ठ मित्रों को भी अलग कर देते हैं। और कोई शत्रुताएँ इतनी गहरी और अमिट नहीं होतीं जितनी वे जो धर्म में असहमति से उत्पन्न होती हैं। इसी कारण मनुष्य के सबसे कटु शत्रु उसके अपने घराने के लोग होते हैं। इसी कारण पिता अपनी सन्तान के विरुद्ध और सन्तान पिता के विरुद्ध उठ खड़ी होती है; और सम्भवतः मृत्यु तक एक-दूसरे को सताती है, और सारे समय यह समझती है कि वह परमेश्वर की सेवा कर रही है। इसलिए यदि वे जो धार्मिक मतों या आचरण में हमसे भिन्न हैं, शीघ्र ही हमारे प्रति कठोरता, वरन् कटुता पाल लें, तो यह हमारी अपेक्षा से अधिक कुछ नहीं; यदि वे हमारे विरुद्ध अधिकाधिक पूर्वाग्रह से भरते जाएँ, यहाँ तक कि हमारे व्यक्तियों के विषय में भी उतना ही बुरा मत बना लें जितना हमारे सिद्धान्तों के विषय में। इसका लगभग अनिवार्य परिणाम यह होगा कि वे हमारे विषय में वैसा ही बोलेंगे जैसा हमारे विषय में सोचते हैं। वे हमारा विरोध करेंगे, और जहाँ तक उनसे हो सके हमारे कार्य में बाधा डालेंगे; क्योंकि उन्हें वह परमेश्वर का नहीं, वरन् या तो मनुष्य का या शैतान का कार्य प्रतीत होता है। जो इस प्रकार सोचता, बोलता और कार्य करता है, वह सर्वोच्च अर्थ में "हमारे पीछे नहीं चलता।"
7. मैं यह नहीं मानता कि जिस व्यक्ति की चर्चा प्रेरित पाठ में करता है (यद्यपि उसका कोई विशेष वृत्तान्त न सन्दर्भ में है, न पवित्रशास्त्र के किसी अन्य भाग में) वह इस सीमा तक गया हो। हमारे पास यह मानने का कोई आधार नहीं कि उसमें और प्रेरितों में कोई गम्भीर भेद था, और उनके स्वामी या उनके विरुद्ध उसका कोई पूर्वाग्रह होने की तो बात ही दूर है। ऐसा प्रतीत होता है कि हम इतना तो हमारे प्रभु के उन्हीं शब्दों से समझ सकते हैं जो पाठ के तुरन्त बाद आते हैं: "ऐसा कोई नहीं जो मेरे नाम से सामर्थ्य का काम करे, और शीघ्र मेरी निन्दा कर सके।" परन्तु मैंने जानबूझकर इस प्रसंग को सबसे प्रबल रूप में रखा है, और उन सब परिस्थितियों को जोड़ा है जिनकी भली-भाँति कल्पना की जा सकती है, ताकि परीक्षा के उसके पूरे बल के विषय में पहले से चेताए जाकर हम किसी भी अवस्था में उसके आगे न झुकें, और परमेश्वर से न लड़ें।
कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी III. 1. मान लो, तब, कि किसी मनुष्य का हमसे कोई मेलजोल नहीं, मान लो कि वह हमारे दल का नहीं, मान लो कि वह हमारी कलीसिया से अलग है, वरन् मत, आचरण और स्नेह तीनों में हमसे बहुत भिन्न है; फिर भी यदि हम इस मनुष्य को भी "दुष्टात्माएँ निकालते" देखें, तो यीशु कहता है, "उसे मत रोको।" हमारे प्रभु के इस महत्त्वपूर्ण निर्देश की व्याख्या मुझे तीसरे स्थान पर करनी है।
2. यदि हम इस मनुष्य को दुष्टात्माएँ निकालते देखें: परन्तु यह भी अच्छा होगा यदि ऐसी अवस्था में हम अपनी आँखों से जो देखें उसी पर विश्वास कर लें, यदि हम अपनी ही इन्द्रियों को झूठा न ठहराएँ। जो मानव स्वभाव से थोड़ा भी परिचित है, वह तुरन्त जान लेगा कि हम इस पर विश्वास करने में कितने अत्यन्त अनिच्छुक होंगे कि कोई मनुष्य दुष्टात्माएँ निकालता है, जबकि वह ऊपर बताए गए सब या अधिकांश अर्थों में "हमारे पीछे नहीं चलता": मैं तो कहने को था कि किसी भी अर्थ में, क्योंकि हम अपने ही हृदय में जो होता है उसी से सरलता से सीख सकते हैं कि जो सब बातों में स्वयं से सहमत नहीं हैं, उनमें कोई भी भली बात मानने में मनुष्य कितने अनिच्छुक होते हैं।
3. "परन्तु इसका क्या पर्याप्त, उचित प्रमाण है कि कोई मनुष्य (ऊपर बताए अर्थ में) दुष्टात्माएँ निकालता है?" उत्तर सरल है। क्या पूरा प्रमाण है, (1) कि हमारे सामने का एक व्यक्ति पहले घोर, खुला पापी था? (2) कि वह अब वैसा नहीं है? कि उसने अपने पाप छोड़ दिए हैं और मसीही जीवन जीता है? और (3) कि यह परिवर्तन इस मनुष्य का प्रचार सुनने से आया? यदि ये तीन बातें स्पष्ट और अकाट्य हैं, तो तुम्हारे पास पर्याप्त, उचित प्रमाण है, ऐसा जिसका विरोध तुम जानबूझकर पाप किए बिना नहीं कर सकते, कि यह मनुष्य दुष्टात्माएँ निकालता है।
4. तब "उसे मत रोको।" सावधान रहो कि तुम अपने अधिकार, या तर्कों, या समझाने-बुझाने से उसे रोकने का यत्न न करो। किसी भी प्रकार से उसे उस सारी सामर्थ्य का उपयोग करने से रोकने का प्रयास मत करो जो परमेश्वर ने उसे दी है। यदि तुम्हारा उस पर अधिकार है, तो उस अधिकार को परमेश्वर के कार्य को रोकने में प्रयोग मत करो। उसे ऐसे कारण मत दो कि वह फिर यीशु के नाम में न बोले। यदि तुम उसमें उसका साथ दो, तो शैतान उसे ये कारण देने में चूकेगा नहीं। उसे इस कार्य से हट जाने के लिए मत समझाओ। यदि वह शैतान को और तुम्हें स्थान दे, तो बहुत से प्राण अपने अधर्म में नाश हो सकते हैं, परन्तु उनके लहू का लेखा परमेश्वर तुम्हारे हाथ से माँगेगा।
5. "परन्तु क्या हो, यदि वह केवल साधारण जन है, जो दुष्टात्माएँ निकालता है! क्या तब मुझे उसे नहीं रोकना चाहिए?"
क्या तथ्य स्वीकार किया गया है? क्या उचित प्रमाण है कि इस मनुष्य ने दुष्टात्माएँ निकाली हैं या निकालता है?
यदि है, तो उसे मत रोको; नहीं, अपने प्राण की जोखिम पर भी नहीं। क्या परमेश्वर जिसके द्वारा चाहे कार्य न करे? कोई मनुष्य ये कार्य नहीं कर सकता जब तक परमेश्वर उसके साथ न हो; जब तक परमेश्वर ने उसे इसी कार्य के लिए न भेजा हो। परन्तु यदि परमेश्वर ने उसे भेजा है, तो क्या तुम उसे वापस बुलाओगे? क्या तुम उसे जाने से रोकोगे?
6. "परन्तु मैं नहीं जानता कि वह परमेश्वर का भेजा हुआ है।" "इसी में तो आश्चर्य की बात है" (उसके भेजे जाने की कोई भी मुहर कह सकती है, कोई भी जिसे उसने शैतान से परमेश्वर की ओर लाया है), "कि तुम नहीं जानते कि यह कहाँ का है, और उसने मेरी आँखें खोल दीं। यदि यह मनुष्य परमेश्वर की ओर से न होता, तो कुछ नहीं कर सकता।" यदि तुम तथ्य पर सन्देह करते हो, तो उस मनुष्य के माता-पिता को बुलवाओ; उसके भाइयों, मित्रों, परिचितों को बुलवाओ। परन्तु यदि तुम इस पर सन्देह नहीं कर सकते, यदि तुम्हें मानना ही पड़े कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी "कि एक प्रसिद्ध चिन्ह दिखाया गया है," तो किस विवेक से, किस मुँह से, तुम उसे जिसे परमेश्वर ने भेजा है, यह आज्ञा दे सकते हो कि "वह फिर उसके नाम में कुछ न बोले"?
7. मैं मानता हूँ कि यह अत्यन्त उचित है कि जो कोई उसके नाम में प्रचार करे, उसकी बाहरी बुलाहट भी हो और भीतरी भी, परन्तु यह कि यह नितान्त आवश्यक है, इसे मैं नहीं मानता।
"नहीं, क्या पवित्रशास्त्र स्पष्ट नहीं कहता? 'कोई इस आदर को अपने आप नहीं लेता, जब तक कि हारून के समान परमेश्वर की ओर से न बुलाया जाए'" (इब्रानियों 5:4)।
इस अवसर पर यह पाठ अनगिनत बार उद्धृत किया गया है, मानो इसमें इस पक्ष का सारा बल हो; परन्तु निश्चय ही इससे अधिक अनुपयुक्त उद्धरण कभी नहीं हुआ। क्योंकि, पहला, हारून प्रचार करने के लिए तो बुलाया ही नहीं गया था: वह "भेंट और पापबलि चढ़ाने" के लिए बुलाया गया था। यही उसका विशेष कार्य था। दूसरा, ये लोग कोई बलि नहीं चढ़ाते, केवल प्रचार करते हैं; जो हारून ने नहीं किया। इसलिए सारे बाइबल में ऐसा एक भी पाठ मिलना सम्भव नहीं जो इससे अधिक विषय से दूर हो।
8. "परन्तु प्रेरितिक युग का आचरण क्या था?" तुम इसे प्रेरितों के काम में सरलता से देख सकते हो। आठवें अध्याय में हम पढ़ते हैं, "यरूशलेम की कलीसिया पर बड़ा उपद्रव उठा; और प्रेरितों को छोड़ सब यहूदिया और सामरिया के देशों में तितर-बितर हो गए" (आयत 1)। "इसलिए जो तितर-बितर हुए थे, वे जगह-जगह वचन सुनाते फिरे" (आयत 4)। अब, क्या ये सब बाहरी रूप से प्रचार के लिए बुलाए गए थे? कोई भी होश-हवास वाला मनुष्य ऐसा नहीं सोच सकता। तब यहाँ अकाट्य प्रमाण है कि प्रेरितिक युग का आचरण क्या था। यहाँ तुम एक नहीं, वरन् साधारण जन प्रचारकों की भीड़ देखते हो, ऐसे मनुष्य जो केवल परमेश्वर के भेजे हुए थे।
9. वास्तव में, प्रेरितिक युग का आचरण हमें यह सोचने की ओर झुकाने से इतना दूर है कि अभिषिक्त होने से पहले प्रचार करना अनुचित था, कि हमारे पास यह मानने का कारण है कि तब इसे आवश्यक समझा जाता था। निश्चय ही प्रेरित पौलुस का आचरण और निर्देश यह था कि किसी मनुष्य को अभिषिक्त करने से पहले उसे परखा जाए। वह कहता है, "इन" (सेवकों) "को पहले परखा जाए; तब यदि वे निर्दोष निकलें तो सेवक का काम करें" (1 तीमुथियुस 3:10)। कैसे परखा जाए? उन्हें यूनानी का एक वाक्य समझाने को कहकर और कुछ साधारण प्रश्न पूछकर? ओह, मसीह के सेवक की कैसी आश्चर्यजनक परख! नहीं; परन्तु एक स्पष्ट, खुली परीक्षा करके (जैसा यूरोप की अधिकांश प्रोटेस्टेंट कलीसियाओं में अब भी किया जाता है) न केवल यह कि उनका जीवन पवित्र और निर्दोष है या नहीं, वरन् यह भी कि उनमें वे वरदान हैं या नहीं जो मसीह की कलीसिया की उन्नति के लिए नितान्त और अपरिहार्य रूप से आवश्यक हैं।
10. परन्तु यदि किसी मनुष्य में ये वरदान हों, और उसने पापियों को पश्चात्ताप तक पहुँचाया हो, फिर भी बिशप उसे अभिषिक्त न करे? तब बिशप उसे दुष्टात्माएँ निकालने से रोकता है। परन्तु मैं उसे रोकने का साहस नहीं कर सकता: मैंने अपने कारण सारे संसार के सामने प्रकाशित कर दिए हैं। फिर भी यह आग्रह किया जाता है कि मुझे ऐसा करना चाहिए। तुम जो इस पर आग्रह करते हो, उन कारणों का उत्तर दो। मैं नहीं जानता कि अब तक किसी ने यह किया, या करने का प्रयास भी किया। केवल कुछ ने उन्हें बहुत कमज़ोर और तुच्छ कहा है: और यह काफ़ी चतुराई थी; क्योंकि किसी तर्क का उत्तर देने की अपेक्षा उसकी उपेक्षा करना, या कम से कम उपेक्षा करने का दिखावा करना, कहीं अधिक सरल है। फिर भी जब तक यह नहीं किया जाता, मुझे यह कहना ही होगा कि जब मेरे पास उचित प्रमाण हो
कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी कि कोई मनुष्य दुष्टात्माएँ निकालता है, तो दूसरे चाहे जो करें, मैं उसे रोकने का साहस नहीं कर सकता, ऐसा न हो कि मैं परमेश्वर से लड़ता हुआ पाया जाऊँ।
11. और तुम जो कोई भी हो जो परमेश्वर का भय मानते हो, "उसे मत रोको, न सीधे और न परोक्ष रूप से।
ऐसा करने के बहुत से ढंग हैं। तुम उसे परोक्ष रूप से रोकते हो, यदि तुम उस कार्य को जो परमेश्वर ने उसके हाथों से किया है, या तो पूर्णतः नकारते हो, या उसकी उपेक्षा करते और उसे तुच्छ समझते हो। तुम उसे परोक्ष रूप से रोकते हो, जब तुम उसके कार्य में उसे हतोत्साहित करते हो, उसे उस विषय में विवादों में खींचकर, उसके विरुद्ध आपत्तियाँ उठाकर, या उसे ऐसे परिणामों से डराकर जो बहुत सम्भव है कभी होंगे ही नहीं। तुम उसे रोकते हो जब तुम भाषा या व्यवहार में उसके प्रति कोई अनुदारता दिखाते हो; और इससे भी अधिक तब जब तुम दूसरों से उसके विषय में अनुदार या तिरस्कारपूर्ण ढंग से बोलते हो; जब तुम उसे किसी के सामने घृणित या तुच्छ रूप में प्रस्तुत करने का यत्न करते हो। जितनी देर तुम उसकी बुराई कर रहे हो, या उसके परिश्रम को कुछ नहीं गिन रहे हो, उतनी देर तुम उसे रोक रहे हो। ओह, इनमें से किसी भी रीति से उसे मत रोको; और न दूसरों को उसकी सुनने से रोककर, —पापियों को उस वचन को सुनने से हतोत्साहित करके जो उनके प्राणों को बचाने में समर्थ है!
12. हाँ, यदि तुम हमारे प्रभु के निर्देश को उसके पूरे अर्थ और विस्तार में मानना चाहते हो, तो उनके वचन को स्मरण रखो: "जो हमारे विरोध में नहीं, वह हमारी ओर है" और "जो मेरे साथ नहीं बटोरता, वह बिखेरता है": जो मनुष्यों को परमेश्वर के राज्य में नहीं बटोरता, वह निश्चय ही उन्हें उससे बिखेरता है। क्योंकि इस युद्ध में कोई तटस्थ नहीं हो सकता। हर एक या तो परमेश्वर की ओर है, या शैतान की ओर। क्या तुम परमेश्वर की ओर हो? तब तुम दुष्टात्माएँ निकालनेवाले किसी मनुष्य को न केवल नहीं रोकोगे, वरन् अपनी पूरी सामर्थ्य से उसे उस कार्य में आगे बढ़ाने का परिश्रम करोगे। तुम परमेश्वर के कार्य को तत्परता से स्वीकार करोगे और उसकी महानता को मानोगे। तुम जहाँ तक हो सके उसके मार्ग की सब कठिनाइयाँ और आपत्तियाँ दूर करोगे। तुम सब मनुष्यों के सामने उसकी आदरपूर्वक चर्चा करके, और जो कुछ तुमने देखा और सुना है उसे स्वीकार करके उसके हाथ दृढ़ करोगे। तुम दूसरों को प्रोत्साहित करोगे कि वे उसके वचन में उपस्थित हों, और उसे सुनें जिसे परमेश्वर ने भेजा है। और तुम कोमल प्रेम का कोई भी वास्तविक प्रमाण देने से नहीं चूकोगे, जो परमेश्वर तुम्हें उसे दिखाने का अवसर दे।
IV. 1. यदि हम इन बातों में से किसी में जानबूझकर चूकते हैं, यदि हम उसे सीधे या परोक्ष रूप से रोकते हैं, "क्योंकि वह हमारे पीछे नहीं चलता," तो हम कट्टर हैं। जो कुछ कहा गया है उससे मैं यही निष्कर्ष निकालता हूँ। परन्तु "कट्टरता" शब्द, मुझे भय है, जितनी बार प्रयोग होता है, उतना ही कम समझा जाता है जितना "उन्मादवाद"। यह अपने ही दल, मत, कलीसिया और धर्म के प्रति अत्यधिक लगाव अथवा मोह है। इसलिए वह कट्टर है जो इनमें से किसी से इतना मोह रखता है, इनसे इतना दृढ़ता से जुड़ा है, कि दुष्टात्माएँ निकालनेवाले को इसलिए रोकता है कि वह इन सब या किन्हीं बातों में उससे भिन्न है।
2. तुम इससे सावधान रहो। ध्यान रखो (1) कि तुम इस बात में अपने को कट्टरता का दोषी न ठहराओ कि तुम यह मानने को तैयार नहीं होते कि कोई मनुष्य जो तुमसे भिन्न है, दुष्टात्माएँ निकालता है। और यदि तुम यहाँ तक निर्दोष हो, यदि तुम तथ्य को स्वीकार करते हो, तो अपने आप को परखो, (2) क्या मैं इसमें कट्टरता का दोषी नहीं ठहरता, कि मैं उसे सीधे या परोक्ष रूप से रोकता हूँ? क्या मैं उसे सीधे इस आधार पर नहीं रोकता कि वह मेरे दल का नहीं है, कि वह मेरे
कट्टरता के विरुद्ध चेतावनी मतों से सहमत नहीं होता, या कि वह परमेश्वर की उपासना उस धर्म-पद्धति के अनुसार नहीं करता जो मुझे अपने पूर्वजों से मिली है?
3. अपने आप को परखो, क्या मैं कम से कम परोक्ष रूप से उसे इन आधारों में से किसी पर नहीं रोकता?
क्या मुझे इस बात का खेद नहीं होता कि परमेश्वर ऐसे भ्रमपूर्ण मत रखनेवाले मनुष्य को इस प्रकार अपनाए और आशीष दे? क्या मैं उसे इसलिए हतोत्साहित नहीं करता कि वह मेरी कलीसिया का नहीं है, उससे उस विषय में विवाद करके, आपत्तियाँ उठाकर, और दूर के परिणामों से उसके मन को उलझाकर?
क्या मैं अपने शब्दों या कार्यों में किसी प्रकार का क्रोध, तिरस्कार या अनुदारता नहीं दिखाता?
क्या मैं उसकी पीठ पीछे उसके (वास्तविक या कल्पित) दोषों —उसकी कमियों या दुर्बलताओं की चर्चा नहीं करता?
क्या मैं पापियों को उसका वचन सुनने से नहीं रोकता? यदि तुम इनमें से कुछ भी करते हो, तो आज तक तुम कट्टर हो।
4. "हे प्रभु, मुझे जाँच और परख। मेरे मन और हृदय को परख! देख कि मुझ में कट्टरता का कोई मार्ग तो नहीं, और मुझे अनन्त मार्ग में ले चल।" अपने आप को भली-भाँति जाँचने के लिए इस प्रसंग को सबसे प्रबल रूप में रखा जाए। क्या हो यदि मैं किसी पोप-भक्त, किसी एरियस-मतावलम्बी, किसी सोसीनियस-मतावलम्बी को दुष्टात्माएँ निकालते देखूँ? यदि देखूँ, तो मैं उसे भी रोक नहीं सकता, बिना अपने को कट्टरता का दोषी ठहराए। हाँ, यदि यह मान लिया जाए कि मैं किसी यहूदी, देववादी, या तुर्क को यही करते देखूँ, और उसे सीधे या परोक्ष रूप से रोकूँ, तो मैं तब भी कट्टर से बेहतर नहीं ठहरूँगा।
5. ओह, इससे दूर रहो! परन्तु दुष्टात्माएँ निकालनेवाले किसी को न रोकने मात्र से संतुष्ट न हो जाओ।
यहाँ तक जाना अच्छा है; परन्तु यहीं मत रुको। यदि तुम सब प्रकार की कट्टरता से बचना चाहते हो, तो आगे बढ़ो। इस प्रकार के हर उदाहरण में, साधन जो भी हो, परमेश्वर की उँगली को स्वीकार करो। और केवल स्वीकार ही नहीं, वरन् उसके कार्य में आनन्दित हो, और धन्यवाद के साथ उसके नाम की स्तुति करो। जिसे भी परमेश्वर काम में लाने को प्रसन्न हो, उसे प्रोत्साहित करो कि वह अपने आप को पूर्ण रूप से उसमें लगा दे। जहाँ कहीं तुम हो, उसकी अच्छी बातें कहो; उसके चरित्र और उसकी भेजी जाने की बुलाहट का बचाव करो। जहाँ तक हो सके उसके कार्यक्षेत्र को बढ़ाओ; शब्द और कर्म में उसके प्रति सब प्रकार की दयालुता दिखाओ; और उसके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करना न छोड़ो, कि वह अपने आप को और उन्हें भी जो उसकी सुनते हैं, बचाए।
6. मुझे केवल एक चेतावनी और जोड़नी है: यह मत सोचो कि दूसरे की कट्टरता तुम्हारी अपनी कट्टरता का कोई बहाना है। यह असम्भव नहीं कि जो स्वयं दुष्टात्माएँ निकालता है, वह तुम्हें ऐसा करने से रोके।
तुम देख सकते हो कि पाठ में बताई गई घटना ठीक यही है। प्रेरितों ने दूसरे को वह करने से रोका जो वे स्वयं करते थे। परन्तु पलटकर उत्तर देने से सावधान रहो। बुराई के बदले बुराई करना तुम्हारा कार्य नहीं। दूसरे का हमारे प्रभु के निर्देश का पालन न करना, तुम्हारे उसकी उपेक्षा करने का कोई कारण नहीं है। नहीं, वरन् उसे सारी कट्टरता अपने ही पास रखने दो। यदि वह तुम्हें रोके, तो तुम उसे मत रोको।
बल्कि उसके प्रति अपने प्रेम को दृढ़ करने के लिए और भी अधिक परिश्रम करो, जागते रहो और प्रार्थना करो। यदि वह तुम्हारे विषय में सब प्रकार की बुराई कहे, तो तुम उसके विषय में सब प्रकार की भलाई कहो (जो सत्य हो)। इस विषय में एक महान पुरुष के उस महिमामय कथन का अनुकरण करो (ओह, कि उसने सदा उसी आत्मा में साँस ली होती!), "लूथर मुझे सौ शैतान कहे; तब भी मैं उसे परमेश्वर का एक दूत मानकर आदर करूँगा।"
