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सेवकाई का पद सेवकाई का पद 8 9 "कोई व्यक्ति यह आदर आप ही आप नहीं ले लेता, जब तक कि वह हारून के समान परमेश्वर की ओर से बुलाया न जाए।"
1. पवित्र शास्त्र के बहुत कम ऐसे पद हैं जिन्हें उन सामान्य जनों के विरुद्ध, जो न याजक हैं न डीकन, फिर भी प्रचार करने का काम अपने ऊपर ले लेते हैं, इससे अधिक बार प्रस्तुत किया गया हो। बहुतों ने पूछा है, "कोई भी 'यह आदर अपने आप कैसे ले ले, जब तक कि वह हारून के समान परमेश्वर की ओर से बुलाया न गया हो?'" और कुछ वर्ष पहले एक भक्त और समझदार पादरी ने इन्हीं शब्दों पर एक उपदेश प्रकाशित किया, जिसमें उसने यह दिखाने का प्रयत्न किया कि प्रचार करने के लिए भीतर से परमेश्वर की ओर से बुलाया जाना पर्याप्त नहीं है, जैसा कि बहुत से लोग अपने विषय में मान लेते हैं, जब तक कि वे बाहर से भी उन मनुष्यों द्वारा न बुलाए जाएँ जिन्हें परमेश्वर ने इसी उद्देश्य से भेजा है, जैसे हारून को परमेश्वर की ओर से मूसा के द्वारा बुलाया गया था।
2. परन्तु जब-जब यह तर्क प्रस्तुत किया गया है, इसमें एक गंभीर दोष रहा है। "हारून के समान परमेश्वर की ओर से बुलाया गया!" परन्तु हारून ने तो प्रचार किया ही नहीं; उसे इसके लिए न परमेश्वर ने बुलाया था, न मनुष्य ने। हारून को पवित्र बातों में सेवा करने के लिए बुलाया गया था; प्रार्थनाएँ और बलिदान चढ़ाने के लिए; याजक का पद निभाने के लिए। परन्तु उसे कभी प्रचारक होने के लिए नहीं बुलाया गया।
3. प्राचीन समय में याजक का पद और प्रचारक का पद सर्वथा अलग-अलग माने जाते थे। और जो कोई आरम्भ से इस विषय की निष्पक्ष खोज करेगा, उसे यह बात मान लेनी पड़ेगी। आदम से नूह तक सभी मानते हैं कि प्रत्येक परिवार का जेठा 7 [1872 के संस्करण का पाठ] 8 [अर्थात् भविष्यद्वक्ता और याजक (द्विशताब्दी संस्करण में उपदेश 121)]
9 [इस उपदेश के विषय में श्री मूर ने अपनी "श्री वेस्ली का जीवन," खण्ड 2, पृष्ठ 339 में यह जानकारी दी है: — "जब श्री वेस्ली ने वह उपदेश प्रकाशित किया, तब मैं लंदन में उनके साथ था। उन्होंने मुझे एक ही पुस्तक का मनुष्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया था; और उन्होंने बार-बार मुझे आमन्त्रित किया था कि जो भी आपत्ति मुझे उनकी किसी प्रकाशित बात पर हो, उसे मैं पूरी तरह कह दूँ। मुझे लगा कि उस प्रवचन में कुछ बातें उस पुस्तक में नहीं पाई जातीं; और मैंने निश्चय किया कि पहला अवसर मिलते ही उनसे यह कहूँगा। अवसर शीघ्र ही आ गया। मैंने आदरपूर्वक कहा कि मैं उनसे सहमत हूँ कि प्रभु ने सदा, जिसके द्वारा चाहा, उसी के द्वारा मनुष्यों के पास शिक्षा, ताड़ना और धार्मिकता में सुधार भेजा है; और यह कि पुराने नियम में भविष्यद्वक्ता और याजक के पद में, तथा नए नियम में भविष्यद्वक्ता और पास्टर के पद में, वास्तविक भेद है; (जहाँ हमारे प्रभु के पौरोहित्य को छोड़ किसी और पौरोहित्य का उल्लेख नहीं है;) परन्तु मैं यह नहीं सोच सका कि उन्होंने सुसमाचार प्रचारकों और पास्टरों, अर्थात् बिशपों के विषय में जो कहा था, वह वहाँ जो हम पढ़ते हैं उसके अनुसार है; अर्थात् यह कि बाद वाले को संस्कार सम्पन्न कराने का अधिकार है, जो पहले वालों को प्राप्त नहीं था। मैंने कहा, 'महोदय, आप जानते हैं कि सुसमाचार प्रचारकों तीमुथियुस और तीतुस को प्रेरित ने आज्ञा दी थी कि वे हर जगह बिशप नियुक्त करें; और निश्चय ही वे उन्हें ऐसा अधिकार नहीं दे सकते थे जो स्वयं उनके पास नहीं था।'
उन्होंने कुछ समय तक मेरी ओर गम्भीरता से देखा, परन्तु अप्रसन्नता से नहीं। उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया, और शीघ्र ही दूसरा विषय छेड़ दिया। मैंने और कुछ नहीं कहा। एक पुस्तक का मनुष्य उसके विरुद्ध विवाद नहीं करता। मेरा विश्वास है कि उन्होंने देख लिया था कि कलीसिया के प्रति उनका प्रेम, जिससे वे कभी अनावश्यक रूप से नहीं हटे, इस अवसर पर उन्हें थोड़ा अधिक दूर ले गया था।" — सम्पादक।]
सेवकाई का पद उस परिवार में अपने ज्येष्ठाधिकार के कारण याजक होता था। परन्तु इससे उसे प्रचारक, या (पवित्र शास्त्र की भाषा में) भविष्यद्वक्ता होने का कोई अधिकार नहीं मिलता था। यह पद प्रायः परिवार की सबसे छोटी शाखा को मिलता था। क्योंकि इस विषय में परमेश्वर ने सदा यह अधिकार जताया कि वह जिसके द्वारा चाहे, उसी के द्वारा भेजे।
4. नूह के समय से लेकर मूसा के समय तक भी यही बात देखी जा सकती है। परिवार का सबसे बड़ा याजक होता था, परन्तु कोई भी दूसरा भविष्यद्वक्ता हो सकता था। हम देखते हैं कि याजक का यह पद एसाव को जेठे के अधिकार के कारण मिला था, जब तक कि उसने अभक्ति से उसे एक कटोरे दाल के बदले याकूब के हाथ बेच न दिया। और यही वह था जिसे वह फिर कभी न पा सका, "यद्यपि उसने उसे आँसू बहा-बहाकर यत्न से ढूँढ़ा।"
5. वास्तव में मूसा के समय याजकपद के विषय में एक बहुत बड़ा परिवर्तन किया गया। तब परमेश्वर ने ठहराया कि हर घराने के जेठे के स्थान पर एक पूरा गोत्र उसके लिए समर्पित किया जाए; और जो भी आगे चलकर याजक के रूप में उसकी सेवा करें, वे उसी गोत्र के हों। इस प्रकार हारून लेवी के गोत्र का था। और मूसा भी वैसा ही था। परन्तु वह याजक नहीं था, यद्यपि वह उन सब भविष्यद्वक्ताओं में सबसे महान था जो परमेश्वर के अपने पहिलौठे को जगत में लाने से पहले हुए। इस बीच, लेवियों में से बहुत कम भविष्यद्वक्ता थे। और यदि कोई थे भी, तो वह केवल संयोग की बात थी। वे इसलिए भविष्यद्वक्ता नहीं थे कि वे उस गोत्र के थे। (जैसा कि प्राचीन यहूदी लेखकों से हमें ज्ञात होता है) अधिकांश भविष्यद्वक्ता, यदि सब नहीं तो बहुतेरे, शिमोन के गोत्र के थे। और कुछ बिन्यामीन या यहूदा के गोत्र के थे, और सम्भवतः अन्य गोत्रों के भी।
6. परन्तु हमारे पास यह मानने का कारण है कि हर युग में दो प्रकार के भविष्यद्वक्ता होते थे। एक असाधारण, जैसे नातान, यशायाह, यिर्मयाह और बहुत से अन्य, जिन पर पवित्र आत्मा असाधारण रीति से उतरा। विशेषकर आमोस ऐसा ही था, जो अपने विषय में कहता है: "मैं न तो भविष्यद्वक्ता था, और न भविष्यद्वक्ता का बेटा; मैं तो चरवाहा था: और यहोवा ने मुझसे कहा,
जा, मेरी प्रजा इस्राएल से भविष्यद्वाणी कर।" साधारण वे थे जिन्होंने "भविष्यद्वक्ताओं के विद्यालयों" में शिक्षा पाई थी, जिनमें से एक रामा में था, जिसके अध्यक्ष शमूएल थे। (1 शमूएल
19:18।) ये लोगों को शिक्षा देने के लिए प्रशिक्षित किए जाते थे, और अपने आराधनालयों में साधारण प्रचारक थे। नए नियम में इन्हें प्रायः शास्त्री, या नोमिकोई, अर्थात् "व्यवस्था के व्याख्याता" कहा गया है। परन्तु इनमें से यदि कोई थे भी, तो बहुत थोड़े ही याजक थे। ये सदा से एक भिन्न वर्ग के थे।
7. बहुत से विद्वानों ने विस्तार से दिखाया है कि हमारे प्रभु ने स्वयं और उसके सब प्रेरितों ने मसीही कलीसिया को यथासम्भव यहूदी कलीसिया की रूपरेखा पर ही बनाया। इसलिए हमारे अंगीकार के महान महायाजक ने सारे जगत को सुसमाचार सुनाने के लिए प्रेरितों और सुसमाचार प्रचारकों को भेजा; और फिर पास्टरों, प्रचारकों और शिक्षकों को, कि जो मण्डलियाँ बनें उन्हें विश्वास में दृढ़ करें। परन्तु मुझे कहीं नहीं मिलता कि सुसमाचार प्रचारक का पद कभी उस पास्टर के पद के समान रहा हो, जिसे प्रायः बिशप कहा जाता है। वह झुण्ड का अगुवा होता था, और संस्कार सम्पन्न कराता था: पहला उसका सहायक होता था, और एक या अधिक मण्डलियों में परमेश्वर का वचन सुनाता था। मैं नए नियम के किसी भी भाग से, या प्रथम तीन शताब्दियों के किसी भी लेखक से, यह सिद्ध नहीं कर सकता कि सुसमाचार प्रचारक के पद ने किसी मनुष्य को पास्टर
सेवकाई का पद या बिशप के रूप में कार्य करने का अधिकार दिया। मेरा विश्वास है कि कॉन्स्टेन्टाइन के समय तक ये पद एक-दूसरे से बिलकुल अलग माने जाते थे।
8. वास्तव में उस बुरी घड़ी में, जब महान कॉन्स्टेन्टाइन ने अपने आपको मसीही कहा और मसीहियों पर सम्मान और धन की वर्षा कर दी, स्थिति बहुत बदल गई। शीघ्र ही यह आम हो गया कि एक ही मनुष्य किसी मण्डली का पूरा भार अपने ऊपर ले ले, ताकि सारा वेतन अपने ही हाथ में रख सके। इस प्रकार वही व्यक्ति याजक और भविष्यद्वक्ता, पास्टर और सुसमाचार प्रचारक दोनों का काम करने लगा।
और यह धीरे-धीरे सारी मसीही कलीसिया में अधिकाधिक फैलता गया। फिर भी आज के दिन भी, यद्यपि एक ही व्यक्ति सामान्यतः इन दोनों पदों का निर्वाह करता है, तथापि सुसमाचार प्रचारक या शिक्षक के पद में उस पास्टर का पद निहित नहीं है, जिसका विशेष कार्य संस्कारों का सम्पन्न कराना है; न प्रेस्बिटेरियनों में, न इंग्लैंड के कलीसिया में, न रोमन कैथोलिकों में भी। यह सर्वविदित है कि सब प्रेस्बिटेरियन कलीसियाएँ, विशेषकर स्कॉटलैंड की, उस सारे राज्य में लोगों को अभिषिक्त किए जाने से पहले ही प्रचार करने की अनुमति दे देती हैं। और यह कभी नहीं समझा जाता कि प्रचार करने की इस नियुक्ति से उन्हें संस्कार सम्पन्न कराने का कोई अधिकार मिल जाता है। इसी प्रकार हमारी अपनी कलीसिया में भी ऐसे लोगों को प्रचार करने का अधिकार दिया जा सकता है, वरन् वे धर्मशास्त्र के डॉक्टर भी हो सकते हैं, (जैसे ऑक्सफ़ोर्ड में डॉ. एलवुड थे, जब मैं वहाँ रहता था,) जो बिलकुल अभिषिक्त नहीं हुए हैं, और इसलिए जिन्हें प्रभु भोज सम्पन्न कराने का कोई अधिकार नहीं है। यहाँ तक कि रोम की कलीसिया में भी, यदि कोई सामान्य भाई यह मानता है कि उसे, जैसा कि कहा जाता है, मिशन पर जाने के लिए बुलाया गया है, तो उसे भेज दिया जाता है, यद्यपि वह न याजक है न डीकन, कि वह वही काम करे, दूसरा नहीं।
9. परन्तु क्या यह नहीं सोचा जा सकता कि जो मामला अब हमारे सामने है, वह इन सबसे भिन्न है?
निस्सन्देह कई बातों में वह भिन्न है। ऐसी एक घटना अब सामने आई है जैसी मसीही जगत में पहले नहीं हुई, कम से कम बहुत युगों तक नहीं। दो जवानों ने परमेश्वर का वचन न केवल कलीसियाओं में बोया, वरन् सचमुच "मार्ग के किनारे" भी; और वास्तव में हर उस स्थान पर जहाँ उन्होंने खुला द्वार देखा, जहाँ पापियों के सुनने के लिए कान थे। वे इंग्लैंड के कलीसिया के सदस्य थे, और उससे अलग होने का उनका कोई विचार नहीं था। और उन्होंने उन सबको, जो उसके थे, सलाह दी कि वे उसी में बने रहें, चाहे वे मेथोडिस्ट सोसाइटी में सम्मिलित हो जाएँ; क्योंकि इसका अर्थ अपनी पहली मण्डली को छोड़ना नहीं था, केवल अपने पापों को छोड़ना था। कलीसिया के लोग अब भी कलीसिया जा सकते थे; प्रेस्बिटेरियन, अनाबैप्टिस्ट, क्वेकर अब भी अपने-अपने विचार रख सकते थे, और अपनी-अपनी मण्डलियों में जा सकते थे। आनेवाले क्रोध से भागने की सच्ची इच्छा ही उनसे अपेक्षित एकमात्र शर्त थी। इसलिए जो कोई
"परमेश्वर का भय मानता और धार्मिकता का काम करता था," वह इस सोसाइटी के योग्य था।
10. इसके कुछ ही समय बाद, एक जवान, थॉमस मैक्सफ़ील्ड, सुसमाचार में पुत्र के समान उनकी सेवा करने आया। और फिर एक और, थॉमस रिचर्ड्स, और कुछ समय बाद तीसरा, थॉमस
वेस्टेल। भली-भाँति ध्यान दिया जाए कि हमने इन्हें किन शर्तों पर स्वीकार किया, अर्थात् भविष्यद्वक्ताओं के रूप में, याजकों के रूप में नहीं। हमने इन्हें केवल और केवल प्रचार करने के लिए स्वीकार किया; संस्कार सम्पन्न कराने के लिए नहीं। और जो लोग मानते हैं कि ये पद अविभाज्य रूप से जुड़े हैं, वे सारी यहूदी तथा मसीही कलीसिया की रचना से पूर्णतः अनजान हैं। न रोमी, न अंग्रेज़ी,
सेवकाई का पद न प्रेस्बिटेरियन कलीसियाओं ने इन्हें कभी ऐसा माना। नहीं तो हम श्री मैक्सफ़ील्ड, रिचर्ड्स या वेस्टेल की सेवा कभी स्वीकार न करते।
11. 1744 में सब मेथोडिस्ट प्रचारकों का पहला सम्मेलन हुआ। परन्तु उनमें से किसी ने स्वप्न में भी नहीं सोचा कि प्रचार करने के लिए बुलाए जाने से उन्हें संस्कार सम्पन्न कराने का कोई अधिकार मिल जाता है। और जब यह प्रश्न रखा गया, "हमें अपने आपको किस रूप में देखना चाहिए?" तो उत्तर दिया गया, "असाधारण दूतों के रूप में, जो साधारण दूतों को डाह दिलाने के लिए खड़े किए गए हैं।"
इसी उद्देश्य से हमारे पहले नियमों में से एक, जो प्रत्येक प्रचारक को दिया गया, यह था, "तुम्हें काम का वह भाग करना है जो हम ठहराएँ।" परन्तु यह कौन-सा काम था? क्या हमने कभी तुम्हें संस्कार सम्पन्न कराने के लिए, याजकीय पद निभाने के लिए ठहराया? ऐसी कोई योजना हमारे मन में कभी आई ही नहीं; यह हमारे विचारों से सबसे दूर थी: और यदि किसी प्रचारक ने ऐसा कदम उठाया होता, तो हम उसे इस नियम का स्पष्ट उल्लंघन, और इसलिए हमारे सम्बन्ध का परित्याग मानते।
12. क्योंकि मान लीजिए (जिसका मैं पूर्णतः खण्डन करता हूँ) कि तुम्हें प्रचारक के रूप में ग्रहण करने से साथ ही संस्कार सम्पन्न कराने का अधिकार भी मिल गया; तब भी उसने तुम्हें इसे, या और कुछ भी, करने का अधिकार केवल वहीं दिया जहाँ मैं ठहराऊँ। परन्तु मैंने तुम्हें यह करने के लिए कहाँ ठहराया? कहीं भी नहीं। इसलिए इसी नियम से तुम इसे करने से वर्जित हो। और इसे करके तुम मेथोडिज़्म के पहले सिद्धान्त को त्याग देते हो, जो केवल और केवल सुसमाचार का प्रचार करना था।
13. हमारी सोसाइटी बनने के कई वर्ष बाद तक इस प्रकार का कोई प्रयास नहीं हुआ। मेरी समझ में पहला प्रयास नॉर्विच में हुआ। हमारे वहाँ के एक प्रचारक ने कुछ लोगों के आग्रह के आगे झुककर उनके बच्चों को बपतिस्मा दे दिया। परन्तु जैसे ही यह ज्ञात हुआ, उसे बताया गया कि यह नहीं होना चाहिए, जब तक कि वह हमारा सम्बन्ध छोड़ने का इरादा न रखता हो। उसने वचन दिया कि वह फिर ऐसा नहीं करेगा; और मेरा अनुमान है कि उसने अपना वचन निभाया।
14. अब, जब तक मेथोडिस्ट इस योजना पर बने रहते हैं, वे कलीसिया से अलग नहीं हो सकते। और यही हमारा विशेष गौरव है। यह पृथ्वी पर नई बात है। कलीसिया के सारे इतिहास को आरम्भिक युगों से देख जाइए, तो आप पाएँगे कि जब कभी किसी नगर या जाति में परमेश्वर का कोई बड़ा कार्य हुआ, उस कार्य के पात्रों ने शीघ्र ही अपने पड़ोसियों से कह दिया,
"अपने आप ही रहो, क्योंकि हम तुमसे अधिक पवित्र हैं!" जैसे ही उन्होंने अपने आपको अलग किया, वे या तो जंगलों में चले गए, या धार्मिक भवन बना लिए; या कम से कम ऐसे दल बना लिए जिनमें केवल वही प्रवेश पाता था जो उनके मत और आचरण दोनों पर हस्ताक्षर करे। परन्तु मेथोडिस्टों के साथ बात बिलकुल भिन्न है: वे कोई सम्प्रदाय या दल नहीं हैं; वे उस धार्मिक समुदाय से अलग नहीं होते जिससे वे पहले जुड़े थे। वे अब भी कलीसिया के सदस्य हैं; — वे वैसे ही जीना और मरना चाहते हैं। और मेरा विश्वास है कि परमेश्वर मेरा जीवन इतने लम्बे समय तक बनाए रखने से प्रसन्न है, उसका एक कारण यह है कि वे अपने वर्तमान निश्चय में दृढ़ रहें, कि कलीसिया से अलग न हों।
15. परन्तु इसके होते हुए भी बहुत से उत्साही लोग कहते हैं, "नहीं, पर तुम कलीसिया से अलग हो ही जाते हो।" दूसरे उतने ही उत्साह से इसलिए कहते हैं कि मैं अलग नहीं होता। मैं बात को जैसी है वैसी साफ़-साफ़ बता दूँगा।
सेवकाई का पद मैं इंग्लैंड के कलीसिया के सब सिद्धान्तों को मानता हूँ। मैं उसकी प्रार्थना-विधि से प्रेम करता हूँ। मैं उसकी अनुशासन-योजना का समर्थन करता हूँ, और केवल यही चाहता हूँ कि वह कार्यान्वित हो सके। मैं जानबूझकर कलीसिया के किसी नियम से भिन्न नहीं चलता, केवल उन थोड़े-से अवसरों को छोड़कर जहाँ मैं समझता हूँ, और जहाँ तक समझता हूँ, कि पूर्ण आवश्यकता है।
उदाहरण के लिए: (1.) चूँकि कम ही पादरी मेरे लिए अपने गिरजाघर खोलते हैं, मुझे बाहर प्रचार करने की आवश्यकता है।
(2.) चूँकि मैं ऐसी कोई विधि नहीं जानता जो सब अवसरों के अनुकूल हो, मुझे प्रायः तत्काल प्रार्थना करने की आवश्यकता पड़ती है।
(3.) मसीह के झुण्ड को विश्वास और प्रेम में दृढ़ करने के लिए, मुझे उन्हें एक साथ जोड़ने और छोटी-छोटी टोलियों में बाँटने की आवश्यकता है, ताकि वे एक-दूसरे को प्रेम और भले कामों में उसकाएँ।
(4.) ताकि मैं और मेरे सहकर्मी अपने प्राणों और अपने सुननेवालों के प्राणों के उद्धार में एक-दूसरे की अधिक प्रभावी सहायता कर सकें, मैं आवश्यक समझता हूँ कि प्रचारकों से, या कम से कम उनके अधिकांश से, वर्ष में एक बार मिलूँ।
(5.) उन सम्मेलनों में हम आगामी वर्ष के लिए सब प्रचारकों के स्थान निश्चित करते हैं।
परन्तु यह सब कलीसिया से अलग होना नहीं है। इतना ही नहीं, जब कभी मुझे अवसर मिलता है, मैं स्वयं कलीसिया की आराधना में उपस्थित होता हूँ, और अपनी सब सोसाइटियों को भी ऐसा ही करने की सलाह देता हूँ।
16. तथापि साधारणतः धार्मिक लोग भी, जो मेरे कार्य करने के उद्देश्यों को नहीं समझते, और जो एक ओर मुझसे यह घोषणा सुनते हैं कि मैं कलीसिया से अलग नहीं होऊँगा, और दूसरी ओर यह कि मैं इन अवसरों पर उससे भिन्न चलता हूँ, वे स्वाभाविक रूप से सोचेंगे कि मैं अपने ही से असंगत हूँ। और वे ऐसा सोचे बिना रह भी नहीं सकते, जब तक कि वे मेरे दो सिद्धान्तों पर ध्यान न दें: एक यह कि मैं कलीसिया से अलग होने का साहस नहीं करता, मेरा विश्वास है कि ऐसा करना पाप होगा; दूसरा यह कि मेरा विश्वास है कि ऊपर बताई बातों में उससे भिन्न न चलना पाप होगा। मैं कहता हूँ, इन दोनों सिद्धान्तों को साथ रखिए, पहला, मैं कलीसिया से अलग नहीं होऊँगा; फिर भी, दूसरा, आवश्यकता की स्थिति में मैं उससे भिन्न चलूँगा (जिन दोनों को मैंने पचास वर्ष से अधिक समय से निरन्तर और खुले रूप से स्वीकार किया है,) तो असंगति मिट जाती है। मैं 1730 से आज तक अपने अंगीकार पर सच्चा रहा हूँ।
17. "परन्तु क्या डबलिन में कलीसिया के समय पर सभा की अनुमति देना आपके अंगीकार के विपरीत नहीं है? इसकी क्या आवश्यकता है? या इससे कौन-सा भला उद्देश्य पूरा होता है?" मेरा विश्वास है कि इससे कई भले उद्देश्य पूरे होते हैं, जो किसी और रीति से इतनी अच्छी तरह पूरे नहीं हो सकते। पहला यह है, (चाहे सुनने में कितना ही अजीब लगे,) कि कलीसिया से अलगाव को रोका जाए। हमारी सोसाइटी के बहुत से लोग कलीसिया से पूरी तरह अलग हो चुके थे; वे उसमें कभी जाते ही नहीं थे। परन्तु अब वे हर महीने के पहले रविवार को नियम से कलीसिया में जाते हैं। "परन्तु क्या उनके लिए हर सप्ताह जाना बेहतर नहीं होता?"
हाँ; परन्तु उन्हें इसके लिए कौन मना सकता है? मैं नहीं। मैंने बीस या तीस वर्ष तक ऐसा करने का प्रयत्न किया, परन्तु व्यर्थ। दूसरा यह है कि उन्हें असहमत मण्डलियों की सभाओं में जाने से छुड़ाया जाए, जिनमें उनमें से बहुत से नित्य जाते थे, परन्तु अब पूरी तरह छोड़ चुके हैं। तीसरा यह है कि वे निरन्तर वह खरा सिद्धान्त सुनते रहें जो उनके प्राणों का उद्धार करने में समर्थ है।
सेवकाई का पद 18. मैं चाहता हूँ कि तुम सब, जो साधारण बोलचाल में मेथोडिस्ट कहलाते हो, जो कुछ कहा गया है उस पर गम्भीरता से विचार करो। और विशेषकर तुम, जिन्हें परमेश्वर ने पापियों को पश्चात्ताप के लिए बुलाने का आदेश दिया है। इससे किसी भी प्रकार यह नहीं निकलता कि तुम्हें बपतिस्मा देने, या प्रभु भोज सम्पन्न कराने का आदेश मिला है। प्रचार आरम्भ करने के दस या बीस वर्ष तक तुमने इसका स्वप्न भी नहीं देखा। तब तुमने कोरह, दातान और अबीराम के समान "याजकपद भी नहीं चाहा।" तुम जानते थे, "कोई व्यक्ति यह आदर आप ही आप नहीं ले लेता, जब तक कि वह हारून के समान परमेश्वर की ओर से बुलाया न जाए।" हे, अपनी ही सीमाओं के भीतर रहो; सुसमाचार का प्रचार करने से सन्तुष्ट रहो; "सुसमाचार प्रचारक का काम करो;" सारे जगत में हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर की करुणा का प्रचार करो; सबको घोषणा करो, "स्वर्ग का राज्य निकट आ गया है: मन फिराओ, और सुसमाचार पर विश्वास करो!" मैं गम्भीरता से तुम्हें सलाह देता हूँ, अपने स्थान पर बने रहो; अपने ही पद पर रहो। तुम में से जो पचास वर्ष पहले मेथोडिस्ट प्रचारक थे, तुम परमेश्वर के असाधारण दूत थे, अपनी इच्छा से जानेवाले नहीं, वरन् बाहर निकाले गए, साधारण दूतों का स्थान लेने के लिए नहीं, वरन् उन्हें "डाह दिलाने" के लिए। परमेश्वर के नाम से, वहीं रुक जाओ! अपने प्रचार और अपने उदाहरण दोनों से उन्हें प्रेम और भले कामों के लिए उकसाओ। तुम पृथ्वी पर एक नई घटना हो, — ऐसे लोगों का समुदाय जो किसी सम्प्रदाय या दल के न होकर सब दलों के मित्र हैं, और हृदय के धर्म में, परमेश्वर और मनुष्य के ज्ञान और प्रेम में, सबको आगे बढ़ाने का प्रयत्न करते हैं। तुम स्वयं आरम्भ में इंग्लैंड के कलीसिया में बुलाए गए थे; और यद्यपि तुम्हारे सामने उसे छोड़ने और अपना अलग स्थान बनाने के हज़ार प्रलोभन हैं और होंगे, उनकी परवाह मत करो। अब भी इंग्लैंड के कलीसिया के जन बने रहो; उस विशेष गौरव को मत फेंको जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है, और प्रभु की व्यवस्था के उस उद्देश्य को विफल मत करो जिसके लिए परमेश्वर ने तुम्हें खड़ा किया।
19. मैं उन गम्भीर लोगों से भी कुछ शब्द कहना चाहूँगा जो मेथोडिस्टों से जुड़े नहीं हैं; जिनमें से बहुत से हमारी अपनी कलीसिया, अर्थात् इंग्लैंड के कलीसिया के हैं। और तुम हमसे अप्रसन्न क्यों हो? हम तुम्हारी कोई हानि नहीं करते; हम किसी बात में तुम्हें ठेस पहुँचाने का इरादा या इच्छा नहीं रखते; हम तुम्हारे सिद्धान्तों को मानते हैं; हम तुम्हारे नियमों का पालन राज्य के अधिकांश लोगों से अधिक करते हैं। तुम में से कुछ पादरी हैं। और सब लोगों में तुम ही हमसे अप्रसन्न क्यों हो? हम न तुम्हारे चरित्र पर आक्रमण करते हैं, न तुम्हारी आय पर; हम "तुम्हारे काम के कारण" तुम्हारा आदर करते हैं! यदि हमें कुछ बातें दिखाई देती हैं जिन्हें हम स्वीकार नहीं करते; तो हम उन्हें प्रकाशित नहीं करते; हम उन पर चादर डाल देते हैं, और जिसकी प्रशंसा नहीं कर सकते उसे छिपा लेते हैं। जब तुम हमारे साथ निर्दयता या अन्याय का व्यवहार करते हो, तो हम सह लेते हैं। "गाली खाकर हम आशीष देते हैं;" हम गाली के बदले गाली नहीं देते। हे, हम पर हाथ न उठाओ!
20. तुम जो इस संसार में धनी हो, हमें अपना शत्रु मत समझो क्योंकि हम तुम्हें सच बताते हैं, और, सम्भव है, दूसरों की अपेक्षा अधिक पूर्ण और सशक्त रीति से, जैसा कोई और न करेगा न करने का साहस करेगा। इसलिए तुम्हें हमारी आवश्यकता है, अकथनीय आवश्यकता। ऐसे मित्र तुम किसी मूल्य पर नहीं खरीद सकते। तुम्हारा सारा सोना-चाँदी ऐसे मित्र नहीं मोल ले सकता। जब तक अवसर है हमसे लाभ उठाओ। यदि सम्भव हो, तो ऐसे लोगों से कभी रहित न रहो जो हृदय से सच बोलेंगे। नहीं तो तुम अपने पापों में बूढ़े हो सकते हो; तुम अपने प्राणों से कह सकते हो, "शान्ति, शान्ति!" जबकि शान्ति है ही नहीं! तुम सोते रह सकते हो, और स्वप्न देख सकते हो कि तुम स्वर्ग के मार्ग पर हो, जब तक कि अनन्त आग में न जाग उठो।
सेवकाई का पद 21. परन्तु चाहे तुम सुनो, चाहे न सुनो, हम परमेश्वर के अनुग्रह से अपने मार्ग पर चलते रहते हैं; स्वयं अब भी इंग्लैंड के कलीसिया के सदस्य हैं, जैसे आरम्भ से थे, परन्तु हर कलीसिया में उन सबको जो परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, अपना भाई, बहन और माता मानकर ग्रहण करते हैं। और उनके हमारे साथ मिलने के लिए हम न विचारों में, न आराधना की रीतियों में एकता माँगते हैं, केवल यह कि वे "परमेश्वर का भय मानें और धार्मिकता का काम करें," जैसा कि कहा गया। अब यह बिलकुल नई बात है, जो किसी अन्य मसीही समुदाय में सुनी नहीं गई। मसीही जगत में और किस कलीसिया या मण्डली में इन शर्तों पर, बिना किसी और शर्त के, सदस्य लिए जा सकते हैं? जो कोई बता सके, ऐसी कोई बताए। मैं यूरोप, एशिया, अफ्रीका या अमेरिका में किसी को नहीं जानता! यही मेथोडिस्टों का गौरव है, और केवल उन्हीं का!
वे स्वयं कोई विशेष सम्प्रदाय या दल नहीं हैं; परन्तु वे सब दलों के उन लोगों को ग्रहण करते हैं जो "न्याय से काम करने, और कृपा से प्रीति रखने, और अपने परमेश्वर के साथ नम्रता से चलने" का प्रयत्न करते हैं। कॉर्क, 4 मई,
