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सांसारिक मूर्खता के विषय में "परन्तु परमेश्वर ने उससे कहा, हे मूर्ख!"
परन्तु इन मूर्खों में से एक सामान्यतः अपनी ही दृष्टि में "उन सात मनुष्यों से अधिक बुद्धिमान होता है जो ठीक उत्तर दे सकते हैं।" यदि किसी मसीही के लिए, उसके लिए जिसमें वही मन है जो मसीह में था, किसी को तुच्छ समझना सम्भव होता, तो वह उन लोगों को हृदय से तुच्छ समझता जो यह मान बैठते हैं कि "लोग तो बस हम ही हैं, और बुद्धि हमारे ही साथ मर जाएगी।" ऐसे ही एक मनुष्य का हू-ब-हू चित्र आप पद से पहले की आयतों में देख सकते हैं। हमारे धन्य प्रभु कहते हैं, "किसी धनवान की भूमि में बड़ी उपज हुई।" (लूका 12:16।) "तब वह अपने मन में विचार करने लगा, मैं क्या करूँ, क्योंकि मेरे यहाँ जगह नहीं जहाँ अपनी उपज इकट्ठी करूँ? और उसने कहा, मैं यह करूँगा: मैं अपनी खत्तियाँ तोड़कर उनसे बड़ी बनाऊँगा; और वहाँ अपना सब अन्न और अपना माल रखूँगा। और अपने प्राण से कहूँगा, प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत-सा माल इकट्ठा है; चैन कर, खा, पी, मौज कर। परन्तु परमेश्वर ने उससे कहा, हे मूर्ख!" परमेश्वर की सहायता से मेरा प्रस्ताव है कि
I. इन थोड़े परन्तु अर्थपूर्ण शब्दों को खोलकर समझाऊँ; और II. उन्हें आपके विवेक पर लागू करूँ।
I. 1. इन्हें खोलकर समझाना। इससे कुछ पहले, हमारे प्रभु एक व्यक्ति को, जिसने उनसे अपनी विरासत बाँटने की बात कही थी, गम्भीर चेतावनी दे रहे थे। "लोभ से चौकस रहो; क्योंकि किसी का जीवन" अर्थात् उसका सुख, "उसकी सम्पत्ति की बहुतायत से नहीं होता।" इस गम्भीर सत्य को प्रमाणित करने और स्पष्ट करने के लिए हमारे प्रभु यह उल्लेखनीय कथा सुनाते हैं। सम्भव है कि यह कोई ऐसी घटना थी जो हाल ही में घटी थी और वहाँ उपस्थित कुछ लोगों की स्मृति में ताज़ा थी। "किसी धनवान की भूमि में बड़ी उपज हुई।" प्राचीन काल के लोगों का धन मुख्यतः भूमि की उपज में ही होता था। "और वह अपने मन में कहने लगा, मैं क्या करूँ?" यह तो अभाव और संकट की ही भाषा है! यह किसी पीड़ित, अपने बोझ तले कराहते हुए मनुष्य की आवाज़ है। तू क्या करेगा? क्यों, क्या वे तेरे द्वार पर नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर ने ठहराया है कि तेरे बचे हुए को ग्रहण करें? तू क्या करेगा? क्यों, चारों ओर बाँट दे और कंगालों को दे। भूखों को खिला। नंगों को पहना। अनाथों का पिता और विधवाओं का पति बन। तूने सेंतमेंत पाया है, सेंतमेंत दे।
नहीं, नहीं! वह इससे कहीं अधिक बुद्धिमान है; वह इससे बेहतर जानता है।
2. "और उसने कहा, मैं यह करूँगा;" — परमेश्वर की अनुमति माँगे बिना, या उसके विषय में इस प्रकार सोचे बिना मानो स्वर्ग में या पृथ्वी पर कोई परमेश्वर है ही नहीं; — "मैं अपनी खत्तियाँ तोड़कर उनसे बड़ी बनाऊँगा; और वहाँ अपना सब माल और अपना सब अन्न रखूँगा।" मेरा अन्न! वह उतना ही तेरा है जितने तेरे सिर के ऊपर उड़ते बादल! उतना ही जितनी तेरे चारों ओर बहती हवाएँ; जिन्हें निःसन्देह तू अपनी मुट्ठी में पकड़ सकता है! "और मैं अपने प्राण से कहूँगा, प्राण,
13 [1872 के संस्करण से पाठ] सांसारिक मूर्खता के विषय में तेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत-सा माल इकट्ठा है!" "प्राण, तेरे पास बहुत-सा माल है!" तो क्या अनाज, दाखमधु और तेल एक अमर आत्मा की सम्पत्ति हैं? "बहुत वर्षों के लिए इकट्ठा!" तुझसे यह किसने कहा? उसका विश्वास मत कर; वह आरम्भ से झूठा है। यदि वह चाहे भी तो तेरा जीवन बढ़ा नहीं सकता। (जीवन और मृत्यु का देनेवाला केवल परमेश्वर है।) और यदि वह बढ़ा सकता भी, तो न बढ़ाता; वरन् तुरन्त तुझे घसीटकर अपने दुःखद निवास में ले जाता। "प्राण, चैन कर; खा, पी, मौज कर!" इस अद्भुत स्वगत-कथन का एक-एक अंश कितनी मूर्खता और पागलपन से भरा है!
"खा और पी?" क्या तेरी आत्मा खाएगी और पिएगी? हाँ, परन्तु पृथ्वी के भोजन में से नहीं। तू शीघ्र ही जलती ज्वाला खाएगा और गन्धक से जलती आग की झील में से पिएगा। परन्तु क्या तब तू पीकर मौज करेगा? नहीं, उन भयानक छायाओं में कोई आनन्द नहीं होगा; उन गुफाओं में कोई संगीत नहीं गूँजेगा, "केवल रोना, विलाप करना और दाँत पीसना!"
3. परन्तु जब वह अपनी ही बुद्धि की सराहना कर रहा था, तभी "परमेश्वर ने उससे कहा, हे मूर्ख! इसी रात तेरा प्राण तुझसे ले लिया जाएगा। तब जो कुछ तूने इकट्ठा किया है वह किसका होगा?"
4. आइए, उसके शब्दों पर थोड़ा और ध्यान से विचार करें। उसने अपने मन में कहा, "मैं क्या करूँ?" क्या उत्तर तैयार नहीं है? भलाई कर। जितनी भलाई कर सकता है, कर। अपनी बहुतायत से अपने पड़ोसी की आवश्यकताएँ पूरी कर; और तेरे पास करने को कुछ न कुछ सदा रहेगा। क्या तुझे कोई ऐसा नहीं मिलता जिसे जीवन की आवश्यक वस्तुओं की कमी हो, जो ठण्ड या भूख से पीड़ित हो; कोई ऐसा जिसके पास पहनने को वस्त्र या सिर टिकाने को जगह न हो; कोई ऐसा जो घुला देनेवाली बीमारी से क्षीण हो रहा हो; कोई ऐसा जो बन्दीगृह में सूख रहा हो? यदि तुम हमारे प्रभु के इन वचनों पर ठीक से विचार करते, "कंगाल तुम्हारे पास सदा रहते हैं," तो फिर यह न पूछते, "मैं क्या करूँ?"
5. इस बेचारे पागल का मनसूबा कितना भिन्न था! "मैं अपनी खत्तियाँ तोड़कर उनसे बड़ी बनाऊँगा; और वहाँ अपना सब माल रखूँगा।" तू उन्हें धरती में गाड़ दे या समुद्र में फेंक दे, वह भी उतना ही ठीक है। जिस उद्देश्य से परमेश्वर ने तुझे वह सौंपा है, वह इससे भी उतना ही पूरा होगा।
6. परन्तु आइए, उसके संकल्प के शेष भाग को भी थोड़ा और जाँचें। "मैं अपने प्राण से कहूँगा, प्राण, तेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत-सा माल इकट्ठा है; चैन कर, खा, पी, मौज कर।" क्या ये कभी न मरनेवाली आत्मा की सम्पत्ति हैं? जैसे तेरा शरीर क्षणिक हवा पर पल नहीं सकता, वैसे ही तेरी आत्मा सांसारिक उपज पर नहीं पल सकती। ऐसी आत्मा को खाने-पीने की सलाह देना कितनी उत्तम सलाह है! उस आत्मा को, जो स्वर्गदूतों के समान बनाई गई है, जो महिमामय परमेश्वर का अविनाशी प्रतिरूप है, कि वह नाशवान वस्तुओं पर नहीं, वरन् जीवन के वृक्ष के फल पर पले, जो परमेश्वर के स्वर्गलोक के बीच में लगा है।
7. तो फिर यह कोई आश्चर्य नहीं कि परमेश्वर उससे कहे, "हे मूर्ख!" यदि और कोई कारण न होता, तो भी इस भयानक कारण से: "इसी रात तेरा प्राण तुझसे ले लिया जाएगा!"
और क्या तू मरने के लिए जन्मा है, इस देह को त्यागने के लिए?
और क्या तेरी काँपती आत्मा को अनजाने देश में उड़ जाना होगा?
सांसारिक मूर्खता के विषय में — एक ऐसा देश जहाँ गहनतम छाया है, जिसे मानव-विचार भेद नहीं पाता; मृतकों के वे उदास प्रदेश, जहाँ सब कुछ भुला दिया जाता है?
"तो जो कुछ तूने इकट्ठा किया है वह सब किसका होगा?"
II. 1. दूसरी बात जिसका मैंने प्रस्ताव रखा था, यह थी कि इन विचारों को लागू किया जाए; जो निश्चय ही उन विचारों में से हैं जो मनुष्य के हृदय में आ सकनेवाले विचारों में सबसे महत्वपूर्ण हैं। एक अर्थ में तो वे पहले ही लागू किए जा चुके हैं; क्योंकि जो कुछ कहा गया है वह सब लागू करना ही रहा है। परन्तु मैं चाहता हूँ कि जो कोई इन वचनों को पढ़े या सुने, वह उन्हें सीधे अपनी ही आत्मा पर लागू करे।
2. क्या यह हर सुननेवाले से सम्बन्ध नहीं रखता कि — "किसी धनवान की भूमि में बड़ी उपज हुई," — वह यह पूछे, "क्या मेरे साथ कभी ऐसा हुआ है? क्या मुझे अब या पहले कभी मेरी आवश्यकता से अधिक सांसारिक धन दिया गया है? और उस अवसर पर मेरे विचार क्या थे? क्या मैंने अपने हृदय में कहा, मैं क्या करूँ? क्या अपनी बहुतायत से मैं व्याकुल हुआ?
क्या मैंने सोचा, 'मेरे पास बहुत वर्षों के लिए बहुत-सा माल इकट्ठा है?'" बहुत वर्ष! हाय! तेरा जीवन क्या है, चाहे वह अपनी अधिकतम सीमा तक बढ़ जाए? क्या वह भाप नहीं, जो थोड़ी देर दिखाई देती है और फिर लोप हो जाती है? इसलिए यह न कह, मैं अपनी खत्तियाँ तोड़ूँगा; वरन् अपने हृदय के एकान्त में परमेश्वर से कह,
"'हे प्रभु, बचा, नहीं तो मैं नाश हुआ!' देख, मेरा धन बढ़ता जा रहा है; मुझे उस पर अपना मन लगाने न दे! तू देखता है कि मैं फिसलनेवाली भूमि पर खड़ा हूँ; तू मेरा जिम्मा ले!
हे उद्धारकर्ता, मुझे थाम, नहीं तो मैं गिरता हूँ!
अहा, अपना अनुग्रहकारी हाथ मेरी ओर बढ़ा!
सहायता के लिए मैं केवल तुझे पुकारता हूँ, केवल तुझ पर विश्वास से मैं खड़ा हूँ।
हे प्रभु, देख, मेरी सम्पत्ति कितनी बढ़ रही है! तेरी सर्वशक्तिमान सामर्थ्य से कम कुछ भी मुझे उस पर मन लगाने और कब्र से भी नीचे कुचले जाने से नहीं रोक सकता!"
3. "हे प्रभु, मैं तुझसे पूछता हूँ, 'मैं क्या करूँ?'" सबसे पहले, अपने संकट का गहरा बोध रखने का प्रयत्न कर; और इसे गम्भीर और निरन्तर प्रार्थना का विषय बना कि तू उस बोध को कभी न खोए। प्रार्थना कर कि तू सदा अपने को किसी खड़ी चट्टान के कगार पर खड़ा अनुभव करे।
इस बीच तेरे हृदय की भाषा यह हो, "अधिक साधन होने पर मैं परमेश्वर के अनुग्रह से पहले से कहीं अधिक भलाई करूँगा। जो अतिरिक्त धन परमेश्वर ने कृपा करके मेरे हाथों में दिया है, उस सबको मैंने ठान लिया है कि पूरे परिश्रम से दया के अतिरिक्त कार्यों में लगाऊँगा। और इस प्रकार मैं 'अपने लिए एक अच्छी नींव डालूँगा, कि अनन्त जीवन को पकड़ लूँ।'"
4. तू अब अपने माल या अपनी उपज की बात नहीं करता, क्योंकि जानता है कि वे तेरे नहीं, परमेश्वर के हैं। पृथ्वी और उसकी भरपूरी प्रभु की है: वही स्वर्ग और पृथ्वी का स्वामी है। वह अपनी महिमा से अलग नहीं हो सकता; जो कुछ है उस सबका प्रभु और अधिकारी वही होगा। उसने केवल अपने माल का एक भाग तेरे हाथों में छोड़ा है, उन कामों के लिए जो उसने निर्दिष्ट किए हैं।
सांसारिक मूर्खता के विषय में वह कब तक उन्हें तेरे पास रखना चाहेगा, यह तू अभी नहीं जानता; सम्भव है केवल कल तक, या आज रात तक। इसलिए बहुत वर्षों की न बात कर, न सोच। क्या तू नहीं जानता कि तू एक दिन का प्राणी है, जो कीड़े से भी पहले कुचला जाता है; कि तेरे नथनों में जो साँस है वह क्षण-भर की सूचना पर ले ली जा सकती है; कि जिसने उसे दिया है वह उसे उस समय वापस ले सकता है जब तू उसकी सोचता भी नहीं? तू क्या जाने कि अगली बार जब तू अपने बिछौने पर लेटेगा, तब तू यह सुने, "इसी रात तेरा प्राण तुझसे ले लिया जाएगा?"
5. क्या तेरा जीवन बादल के समान अस्थिर नहीं, पानी पर बुलबुले के समान डगमगाता नहीं? वह छाया के समान भागता है और कभी एक सा नहीं ठहरता। "बहुत वर्ष!" एक दिन का भी भरोसा किसे है?
और क्या यह परमेश्वर की बुद्धि और भलाई का एक प्रमाण नहीं कि वह तेरी साँस अपने ही हाथ में रखता है और क्षण-क्षण करके उसे देता है, ताकि तू सदा स्मरण रखे कि "हर दिन ऐसे जी जैसे वह अन्तिम हो?" और सूर्य के नीचे जो थोड़े दिन तू बिताएगा, उसके बाद कितनी शीघ्र यह कहा जाएगा,
तेरा बस मुट्ठी-भर धूल ही शेष है; वही तू है, और वही सब घमण्डी होंगे!
6. फिर उस कथन की उत्कृष्ट मूर्खता पर विचार कर, "प्राण, तेरे पास बहुत-सा माल है।" तो क्या पृथ्वी की उपज स्वर्ग से जन्मी आत्मा का भोजन है? क्या मिट्टी और पानी का ऐसा कोई मिश्रण है, चाहे उसमें हवा और आग भी मिला दी जाएँ, जो उन उच्चतर श्रेणी के प्राणियों को पोषण दे सके? उन आकाशीय आत्माओं और मिट्टी के इन तुच्छ ढेलों में क्या समानता है? इस बुद्धिमान स्वगत-कथन के शेष भाग को परख और देख कि वह तुझ पर कैसे लागू होता है।
"प्राण, चैन कर!" हाय, व्यर्थ आशा! क्या आत्मा के लिए चैन भूमि से उग सकता है? मान लो भूमि कितनी ही उपजाऊ बना दी जाए, क्या वह ऐसी फसल दे सकती है? "खा, पी, मौज कर!" क्या! क्या तेरी आत्मा खा-पी सकती है? हाँ, ऐसा मन्ना जैसा स्वर्गदूत खाते हैं, आत्माओं के योग्य शुद्ध आनन्द।
परन्तु ये सांसारिक भूमि पर नहीं उगते; ये केवल परमेश्वर के स्वर्गलोक में ही मिलते हैं।
7. परन्तु मान लो कि जीवन और मृत्यु की आज्ञा देनेवाली वाणी यह कहे, "इसी रात तेरा प्राण तुझसे ले लिया जाएगा; तब जो कुछ तूने इकट्ठा किया है वह सब किसका होगा?" हाय, वे तेरे नहीं हैं! सूर्य के नीचे की किसी भी वस्तु में अब तेरा कोई भाग या अंश नहीं। तब पृथ्वी की इन वस्तुओं में तेरा उतना भी हिस्सा नहीं जितना तब होता जब पृथ्वी और उसके सब कार्य जलकर भस्म हो गए होते। तू अपनी माँ के गर्भ से नंगा निकला और नंगा ही लौटेगा। तूने बहुत कुछ ढेर लगाया; पर किसलिए? कि सब कुछ पीछे छोड़ जाए! बेचारी छाया! अब तू सब कुछ से वंचित कर दिया गया है: आशा तक नहीं बची।
8. उस पूरी घटना पर हमारे प्रभु ने जो टिप्पणी छोड़ी है उस पर ध्यान दो: "ऐसा ही वह मनुष्य है जो अपने लिए धन बटोरता है, और परमेश्वर की दृष्टि में धनी नहीं," — ऐसा मूर्ख, ऐसा घोर पागल, जिसे व्यक्त करना भाषा की सामर्थ्य से परे है! वह अपनी दृष्टि में चाहे कितना ही बुद्धिमान
सांसारिक मूर्खता के विषय में हो, और सम्भवतः अपने पड़ोसी की दृष्टि में भी, वास्तव में वह स्वर्ग के नीचे सबसे बड़ा मूर्ख है, जो उन वस्तुओं का ढेर लगाता है जिनसे उसे शीघ्र ही सदा के लिए अलग होना है:
और जो कोई नाशवान वस्तुओं में सुख खोज रहा है, वह अपने लिए धन बटोर रहा है।
यह "परमेश्वर की ओर धनी होने" (या यों कहें, बढ़ते जाने) से, इस पवित्रशास्त्रीय आज्ञा का पालन करने से बिलकुल मेल नहीं खाता, — "हे मेरे पुत्र, अपना मन मुझे दे।" जो परमेश्वर की सन्तान है, वह सच्चाई से कह सकता है, — मेरा सारा धन ऊपर है; मेरा सारा खज़ाना तेरा प्रेम है:
वह गवाही दे सकता है, "मेरी सारी अभिलाषा तेरी ओर और तेरे नाम के स्मरण की ओर है!"
9. जो कोई इन वचनों को पढ़े, वह अपने हृदय को ध्यान से जाँचे। तूने अब तक अपना धन कहाँ इकट्ठा किया है? अब तू उसे कहाँ इकट्ठा कर रहा है? क्या तू परमेश्वर की ओर धनी होने के लिए परिश्रम कर रहा है, या सांसारिक माल इकट्ठा करने के लिए? तेरे विचारों का बड़ा भाग किसमें लगता है? तू जो बाहरी बातों की चिन्ता करता है, भलाई करने में परिश्रमी है और बाहरी कर्तव्यों में सटीक है, — लोभ से चौकस रह; धन के शिष्ट, प्रतिष्ठित प्रेम से; और पृथ्वी पर धन बटोरने की इच्छा से। स्वर्ग में धन बटोर! थोड़े दिनों बाद तू अन्धकार के देश में प्रवेश करेगा; जहाँ सांसारिक उपज किसी काम की न होगी; जहाँ तू खाने-पीने या अपनी किसी इन्द्रिय को तृप्त करने योग्य न होगा। तब इस संसार में जो कुछ तूने इकट्ठा किया है उस सबसे तुझे क्या लाभ होगा? जो कुछ तूने जमा किया है, जो कुछ तू अपने पीछे छोड़ गया है, उस सबमें क्या सन्तोष? तेरे पीछे छूट गया! क्या! तो क्या तू अनन्त निवासों में अपने साथ कुछ भी न ले जा सकता था? तो फिर यहाँ से जाने से पहले वह धन बटोर जो नाश नहीं होता। बालहम में प्रचारित, 19 फरवरी, 1790
