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भले स्वर्गदूतों के विषय में "क्या वे सब सेवा टहल करनेवाली आत्माएँ नहीं, जो उद्धार पानेवालों के लिये सेवा करने को भेजी जाती हैं?"
1. प्राचीन अन्यजातियों में से बहुतों को (संभवतः परम्परा से) भले और बुरे स्वर्गदूतों की कुछ धारणा थी। उन्हें मनुष्यों और परमेश्वर के बीच के प्राणियों की किसी उच्चतर श्रेणी का कुछ विचार था, जिन्हें यूनानी सामान्यतः "डेमन" (जानकार) कहते थे, और रोमी लोग "जीनी" कहते थे।
इनमें से कुछ को वे दयालु और उपकारी मानते थे, जो भलाई करने में आनन्दित होते हैं; और दूसरों को द्वेषी और क्रूर, जो बुराई करने में आनन्दित होते हैं। परन्तु इन दोनों के विषय में उनकी धारणाएँ कच्ची, अधूरी और उलझी हुई थीं; वे सत्य के केवल टुकड़े थीं, जो कुछ तो उनके पूर्वजों से चली आई थीं और कुछ परमेश्वर-प्रेरित पवित्रशास्त्र से उधार ली गई थीं।
2. इनमें से पहली, अर्थात् उपकारी श्रेणी का, सुकरात का प्रसिद्ध "डेमन" प्रतीत होता है; जिसके विषय में आगामी युगों में इतने और ऐसे भिन्न-भिन्न अनुमान लगाए गए हैं। उसने कहा, "यह मुझे प्रतिदिन प्रातः उस हर बुराई की सूचना देता है जो उस दिन मुझ पर आनेवाली हो।" एक पिछले लेखक ने (मेरे विचार में ऐसे व्यक्ति ने जो स्वर्गदूत या आत्मा, दोनों में से किसी के अस्तित्व को शायद ही मानता हो) वास्तव में एक निबन्ध प्रकाशित किया है, जिसमें वह यह सिद्ध करने का प्रयास करता है कि सुकरात का डेमन केवल उसकी बुद्धि थी। परन्तु सुकरात की रीति ऐसे अस्पष्ट और द्वि-अर्थी शब्दों में बोलने की नहीं थी। यदि उसका अभिप्राय अपनी बुद्धि से होता, तो वह निस्सन्देह यही कहता। परन्तु यह उसका अभिप्राय नहीं हो सकता था: क्योंकि यह असम्भव था कि उसकी बुद्धि उसे प्रतिदिन प्रातः उस दिन आनेवाली हर बुराई की सूचना दे। भविष्य की अनिश्चित घटनाओं की ऐसी सूचना देना बुद्धि के क्षेत्र में नहीं आता। और यह विचित्र व्याख्या उस निष्कर्ष से भी किसी रीति से मेल नहीं खाती जो वह स्वयं इससे निकालता है। वह कहता है, "मेरे डेमन ने
आज प्रातः मुझे ऐसी किसी बुराई की सूचना नहीं दी जो आज मुझ पर आनेवाली थी। इसलिए मैं अपने प्राणदण्ड पाने को कोई बुराई नहीं मान सकता।" निस्सन्देह यह कोई आत्मिक प्राणी था: सम्भवतः इन्हीं सेवक आत्माओं में से कोई एक।
3. एक प्राचीन कवि ने, जो सुकरात से कई युग पहले हुआ, इस विषय पर अधिक निश्चित रूप से कहा है। हेसियोड कहने में नहीं हिचकिचाता,
आत्मिक प्राणियों के लाखों जीव अदृश्य रहकर पृथ्वी पर विचरते हैं।
सम्भवतः इसी से उनके अर्ध-देवताओं के कारनामों की अनगिनत कथाएँ उत्पन्न हुईं:
Minorum Gentium [लघु देवगण]। इसी से उनके सैटर, फॉन, और हर प्रकार की अप्सराएँ आईं, जिनसे वे समुद्र और थल दोनों को भरा हुआ मानते थे। परन्तु उनके दिए हुए सब वर्णन कितने खोखले, बचकाने और असंतोषजनक हैं
17 [text from the 1872 edition] भले स्वर्गदूतों के विषय में उनके दिए वर्णन! जैसा कि टूटी-फूटी और अनिश्चित परम्परा पर टिके वर्णनों के साथ होना स्वाभाविक ही है।
4. इस कमी को केवल प्रकाशन (परमेश्वर का प्रकाशित वचन) ही पूरा कर सकता है: केवल वही हमें उनका स्पष्ट, तर्कसंगत और संगत वर्णन देता है जिन्हें हमारी आँखों ने नहीं देखा, न कानों ने सुना; अर्थात् भले और बुरे दोनों स्वर्गदूतों का। मेरा विचार इस समय केवल पहले प्रकार के विषय में बोलने का है; जिनका पूरा, यद्यपि संक्षिप्त वर्णन इन शब्दों में हमारे पास है: "क्या वे सब सेवा टहल करनेवाली आत्माएँ नहीं, जो उद्धार पानेवालों के लिये सेवा करने को भेजी जाती हैं?"
I. 1. प्रेरित की रीति के अनुसार यह प्रश्न एक दृढ़ पुष्टि के तुल्य है। और इससे हम सबसे पहले यह सीखते हैं कि अपने सार, अर्थात् स्वभाव के विषय में वे सब आत्माएँ हैं; भौतिक प्राणी नहीं; हमारे समान मांस और लहू से बोझिल नहीं; परन्तु यदि उनकी कोई देह है भी, तो वह हमारी देह के समान स्थूल और पार्थिव नहीं, वरन् अधिक सूक्ष्म पदार्थ की है; इन निचले तत्वों में से किसी भी अन्य की अपेक्षा आग या ज्वाला से अधिक मिलती-जुलती। और क्या भजनकार के इन शब्दों में कुछ ऐसा ही संकेत नहीं मिलता: "जो अपने दूतों को पवन, और अपने सेवकों को धधकती आग बनाता है?" (भजन संहिता 104:4।) आत्माओं के रूप में उसने उन्हें समझ, इच्छा अथवा भावनाओं से सम्पन्न किया है,
(जो वास्तव में एक ही बात है; क्योंकि भावनाएँ इच्छा के ही विभिन्न रीतियों से प्रकट होने का नाम हैं,) और स्वतन्त्रता से। और क्या समझ, इच्छा और स्वतन्त्रता आत्मा के लिए अनिवार्य नहीं हैं, यदि वे स्वयं आत्मा का सार नहीं हैं?
2. परन्तु मनुष्यों की सन्तानों में कौन समझ सकता है कि स्वर्गदूत की समझ कैसी है? कौन समझ सकता है कि उनकी दृष्टि कहाँ तक पहुँचती है? यह मनुष्यों की दृष्टि के समान है, पर वही नहीं; परन्तु मानवीय भाषा की दरिद्रता के कारण हमें इसी प्रकार कहना पड़ता है।
सम्भवतः केवल पृथ्वी के एक गोलार्द्ध पर ही नहीं; वरन् इस पार्थिव लोक की लम्बाई से दसगुनी, या सौर मण्डल तक ही नहीं; वरन् इतनी दूर तक कि वे सृष्टि के सम्पूर्ण विस्तार को एक ही दृष्टि में समेट लें! और हम उनके बोध में कोई त्रुटि, न उनकी समझ में कोई भूल सोच सकते हैं। परन्तु वे अपनी समझ का प्रयोग किस प्रकार करते हैं? हमें किसी भी प्रकार यह कल्पना नहीं करनी चाहिए कि वे उस धीमी विधि से, जिसे हम तर्क कहते हैं, एक सत्य से दूसरे सत्य तक रेंगते हैं। निस्सन्देह वे जो भी सत्य उनकी समझ के सामने रखा जाए, उसे एक ही दृष्टि में देख लेते हैं; और उसी निश्चयता और स्पष्टता से जिससे हम नश्वर मनुष्य किसी स्वयंसिद्ध सिद्धान्त को देखते हैं। तब कौन उनके ज्ञान का विस्तार सोच सकता है? केवल परमेश्वर के स्वभाव, गुणों और कार्यों का ही नहीं, चाहे वे सृष्टि के हों या प्रबन्ध के; परन्तु मनुष्यों की परिस्थितियों, कार्यों, वचनों, स्वभावों, वरन् विचारों का भी। क्योंकि यद्यपि केवल "परमेश्वर" ही "सब मनुष्यों के मन को जानता है," ("जिसको अपने सब कार्य ज्ञात हैं,") और उन परिवर्तनों को भी जिनसे वे गुज़रते हैं,
"जगत की उत्पत्ति से;" तौभी हम इसमें सन्देह नहीं कर सकते कि उसके स्वर्गदूत उन लोगों के मन को जानते हैं जिनकी वे अधिक सीधे सेवा करते हैं। और इसमें तो और भी कम सन्देह हो सकता है कि वे किसी विशेष समय में हमारे मनों के विचारों को जानते हैं। उन्हें उठते ही देख लेने से उन्हें कौन रोक सकता है? मांस और लहू का पतला परदा तो नहीं। क्या ये किसी आत्मा की दृष्टि को रोक सकते हैं? कदापि नहीं,
भले स्वर्गदूतों के विषय में दीवार के भीतर दीवारें भी उसके मार्ग को और नहीं रोकतीं, जितना कि तरल वायु का बिना बाधा वाला विस्तार।
तब जितनी सरलता और जितनी सम्पूर्णता से हम किसी मनुष्य के विचार उसके चेहरे पर पढ़ लेते हैं, उससे कहीं अधिक सरलता और सम्पूर्णता से ये चतुर प्राणी हमारे विचारों को ठीक तब पढ़ लेते हैं जब वे हमारे मन में उठते हैं; क्योंकि वे अपनी सजातीय आत्मा को उससे अधिक स्पष्टता से देखते हैं जितना हम देह को देखते हैं। यदि यह किसी को विचित्र लगे जिसने पहले इस पर ध्यान न दिया हो, तो वह केवल यह सोचे: मान लो मेरी आत्मा देह से बाहर होती, तो क्या कोई स्वर्गदूत मेरे विचारों को, मेरे कोई शब्द बोले बिना भी, नहीं देख सकता? (यदि आत्माओं के जगत में शब्दों का प्रयोग होता है।) और क्या वह सेवक आत्मा अब, जब मैं देह में हूँ, उन्हें उतनी ही भली-भाँति नहीं देख सकती? इसलिए यह एक निर्विवाद सत्य प्रतीत होता है, (चाहे सामान्यतः इस पर ध्यान न दिया गया हो,) कि स्वर्गदूत जिनकी सेवा करते हैं, उनके केवल शब्दों और कार्यों को ही नहीं, वरन् विचारों को भी जानते हैं। और वास्तव में इस ज्ञान के बिना वे अपनी सेवा के विविध भागों को निभाने के लिए बहुत अयोग्य होते।
3. और अपनी अद्भुत क्षमताओं के प्रयोग से, उस ज्ञान के अतिरिक्त जिससे वे आरम्भ में सम्पन्न किए गए थे, छः हज़ार से अधिक वर्षों के बीच उन्होंने कितनी अकल्पनीय बुद्धि प्राप्त कर ली होगी! (कि वे इतने समय से हैं, इसका हमें निश्चय है; क्योंकि जब पृथ्वी की नींव डाली गई तब उन्होंने "मिलकर जयजयकार किया।") इतने लम्बे समय में उनकी बुद्धि कितनी अपार बढ़ी होगी, न केवल मनुष्यों की क्रमागत पीढ़ियों के मनों और चाल-चलन को देखने से, वरन् परमेश्वर के कार्यों को देखने से, उसकी सृष्टि के कार्यों, उसके प्रबन्ध के कार्यों, उसके अनुग्रह के कार्यों को देखने से; और सबसे बढ़कर, "अपने स्वर्गीय पिता के मुँह को निरन्तर देखते रहने" से!
4. इस अथाह सागर से उन्होंने बुद्धि के साथ-साथ पवित्रता की भी कितनी मात्रा पाई होगी!
एक असीम, अथाह गहराई, जिसकी न कोई तली है न किनारा!
क्या इसी कारण वे विशेष रूप से पवित्र स्वर्गदूत नहीं कहलाते? उसके दाहिने हाथ की उन नदियों से उन्होंने कितनी भलाई, कितनी मानव-प्रीति, मनुष्य के लिए कितना प्रेम ग्रहण किया है!
ऐसा प्रेम जिसके विषय में हम नहीं सोच सकते कि उसे हमारे उद्धारकर्ता परमेश्वर के प्रेम को छोड़ कोई और पार कर सकता है। और वे इस "जीवते जल के सोते" से अब भी और अधिक प्रेम पी रहे हैं।
5. परमेश्वर के स्वर्गदूतों का ज्ञान और बुद्धि ऐसी है, जैसा हम उसके अपने वचनों से सीखते हैं। उनकी पवित्रता और भलाई ऐसी है। और उनकी शक्ति कितनी विस्मयकारी है! एक गिरा हुआ स्वर्गदूत भी एक प्रेरित लेखक द्वारा "आकाश के अधिकार का हाकिम" कहा गया है। अचानक उस आँधी को उठाकर, जिसने "घर के चारों कोनों को मारा" और अय्यूब की सब सन्तानों को एक साथ नष्ट कर दिया, उसने इस शक्ति का कितना भयंकर प्रमाण दिया! (अय्यूब 1।) कि यह उसी का काम था, यह हम उस आज्ञा से सहज ही जान सकते हैं कि "उसका प्राण बचाए रखना।" परन्तु उसने अपनी शक्ति का इससे कहीं अधिक भयंकर प्रमाण दिया, (यदि हम यह मान लें कि वह "यहोवा का दूत" एक बुरा स्वर्गदूत था, जो असम्भव नहीं है,) जब उसने एक ही रात में, वरन् सम्भवतः एक ही घण्टे में, यदि एक क्षण में नहीं, एक लाख पचासी हजार अश्शूरियों को मृत्यु से मार डाला। भले स्वर्गदूतों के विषय में फिर भी इससे कहीं अधिक शक्ति उस स्वर्गदूत ने लगाई होगी (चाहे वह ज्योति का स्वर्गदूत था या अन्धकार का; जो पाठ से निश्चित नहीं होता) जिसने एक ही घण्टे में "मिस्र के सब पहिलौठों को, क्या मनुष्य क्या पशु," मार डाला। क्योंकि मिस्र देश के विस्तार, उसकी अपार जनसंख्या, और घरों में पाले जाने तथा उपजाऊ खेतों में चरनेवाले असंख्य पशुओं को देखते हुए, उस रात मारे गए मनुष्य और पशु कई लाख रहे होंगे! और यदि यह मान लिया जाए कि वह कोई बुरा स्वर्गदूत था, तो क्या एक भले स्वर्गदूत को उससे कम बलवान नहीं, वरन् अधिक बलवान नहीं होना चाहिए? क्योंकि निश्चय ही किसी भी भले स्वर्गदूत में उस प्रधान स्वर्गदूत से भी अधिक सामर्थ्य होगी जो नष्ट हो गया। और प्रकाशितवाक्य के उन "चार स्वर्गदूतों" में कितनी सामर्थ्य होगी जो "पृथ्वी की चारों हवाओं को थामे रखने" के लिए ठहराए गए थे! इसलिए यह मानने में कोई अतिशयोक्ति नहीं दिखती कि यदि परमेश्वर अनुमति देना चाहे, तो ज्योति के स्वर्गदूतों में से कोई भी पृथ्वी और सब ग्रहों को उनकी कक्षाओं से उखाड़ सकता है; वरन् वह इन सब तत्वों से स्वयं को सुसज्जित करके सृष्टि के सम्पूर्ण ढाँचे को चूर-चूर कर सकता है। वास्तव में हम परमेश्वर की इन पहलौठी सन्तानों की शक्ति की कोई सीमा बाँधना नहीं जानते।
6. और यद्यपि उनके महान सृष्टिकर्ता के सिवा कोई सर्वव्यापी नहीं है; यद्यपि उसके सिवा और कोई यह नहीं पूछ सकता, "क्या मैं स्वर्ग और पृथ्वी में समाया हुआ नहीं हूँ?" तौभी निस्सन्देह उसने सृजी हुई आत्माओं को कार्य का एक विशाल (यद्यपि असीम नहीं) क्षेत्र दिया है। "फारस के राज्य का प्रधान,"
(जिसका उल्लेख दानिय्येल 10:13 में है,) यद्यपि सम्भवतः एक बुरा स्वर्गदूत था, तथापि प्रतीत होता है कि उसके ज्ञान और सामर्थ्य दोनों का कार्यक्षेत्र उस विशाल साम्राज्य जितना ही व्यापक था; और जिस भले स्वर्गदूत का उसने इक्कीस दिन तक सामना किया, उसके लिए हम उचित रूप से उतना ही, यदि उससे अधिक नहीं, कार्यक्षेत्र मान सकते हैं।
7. परमेश्वर के स्वर्गदूतों को विशेष रूप से मानव देह पर बड़ी सामर्थ्य प्राप्त है; पीड़ा और रोग उत्पन्न करने या दूर करने की, मार डालने या चंगा करने की सामर्थ्य। हम किससे बने हैं, यह वे भली-भाँति समझते हैं; वे इस अद्भुत यन्त्र की सब कमानियों को जानते हैं, और निस्सन्देह परमेश्वर की अनुमति से उनमें से किसी को छूकर इसकी गति को रोक या फिर चला सकते हैं। एक बुरे स्वर्गदूत में भी इस सामर्थ्य का स्पष्ट उदाहरण हमें अय्यूब के विषय में मिलता है; जिसे उसने "पाँव के तलवे से सिर की चोटी तक" बुरे फोड़ों से "मारा।" और उस क्षण निस्सन्देह वह उसे मार डालता, यदि परमेश्वर ने उसका प्राण न बचाया होता। और दूसरी ओर, स्वर्गदूतों के चंगा करने की सामर्थ्य का एक उल्लेखनीय उदाहरण दानिय्येल के विषय में है। भविष्यद्वक्ता ने कहा, "मुझ में बल नहीं रहा, और मुझ में साँस भी न रही।" "तब किसी ने मुझे छूकर कहा, हे प्रिय पुरुष, मत डर; तुझे शान्ति मिले; दृढ़ हो, हाँ, दृढ़ हो। और जब उसने मुझसे ऐसा कहा, तब मैंने बल पाया।" (दानिय्येल 10:17।) दूसरी ओर, जब उन्हें ऊपर से आज्ञा मिले, तो क्या वे मानव जीवन का अन्त नहीं कर सकते?
डॉक्टर पार्नेल ने जो माना है कि स्वर्गदूत ने साधु से बालक की मृत्यु के विषय में कहा, उसमें कुछ भी असम्भव नहीं है: — तुम्हें छोड़ सबको वह दौरों में जाता दिखा:
और वह प्रहार करना मेरी ही सेवा थी।
भले स्वर्गदूतों के विषय में इसी महान सत्य से सम्भवतः अन्यजाति कवियों ने यह कल्पना ली कि आइरिस को स्वर्ग से भेजा जाता था कि वह प्राणों को देह से छुड़ा दे। और सम्भव है कि परमेश्वर की बहुत-सी सन्तानों की आकस्मिक मृत्यु किसी स्वर्गदूत की सेवा के कारण होती हो।
II. परमेश्वर के स्वर्गदूत अपने उच्च पद के लिए ऐसे सर्वथा योग्य हैं। अब यह पूछना शेष है कि वे अपने पद को कैसे निभाते हैं। वे उद्धार के वारिसों की सेवा कैसे करते हैं?
1. मैं यह नहीं कहूँगा कि जो अपनी हठीली अपश्चात्ताप और अविश्वास के कारण अपने आप को राज्य से वंचित कर लेते हैं, उनकी वे कुछ भी सेवा नहीं करते। यह जगत दया का जगत है, जिसमें परमेश्वर बुरों और अकृतज्ञों पर भी बहुत सी दया बरसाता है। और इनमें से बहुत सी, सम्भवतः, उन तक भी स्वर्गदूतों की सेवा के द्वारा पहुँचती हैं; विशेष रूप से जब तक उन्हें परमेश्वर का कोई विचार या उसका कोई भय अपनी आँखों के सामने रहता है। परन्तु उनका प्रिय कार्य, उनका विशेष पद, उद्धार के वारिसों की सेवा करना है; उनकी, जो अब "विश्वास के द्वारा उद्धार पाए हुए" हैं, या कम से कम सच्चाई से परमेश्वर को खोज रहे हैं।
2. क्या उनकी पहली चिन्ता हमारी आत्माओं की सेवा करना नहीं है? परन्तु हमें यह आशा नहीं करनी चाहिए कि यह प्रत्यक्ष रूप से होगा; इस प्रकार कि हम उनके कार्य को अपने ही मन के कार्यों से स्पष्ट पहचान सकें। इसकी अपेक्षा करने का हमारे पास उतना ही कारण है जितना उनके किसी दृश्य रूप में प्रकट होने की अपेक्षा करने का। इसके बिना भी वे हज़ार रीतियों से हमारी समझ तक पहुँच सकते हैं। वे सत्य की हमारी खोज में हमारी सहायता कर सकते हैं, अनेक सन्देह और कठिनाइयाँ दूर कर सकते हैं, जो पहले अन्धकारमय और धुँधला था उस पर प्रकाश डाल सकते हैं, और भक्ति के अनुसार जो सत्य है उसमें हमें दृढ़ कर सकते हैं। वे हमें भेस बदले हुए बुराई से चेता सकते हैं; और जो भला है उसे स्पष्ट, प्रबल प्रकाश में रख सकते हैं। वे हमारी इच्छा को कोमलता से प्रेरित कर सकते हैं कि वह जो भला है उसे अपनाए और जो बुरा है उससे भागे। वे बहुत बार हमारी सुस्त भावनाओं को जगा सकते हैं, हमारी पवित्र आशा या सन्तान-सा भय बढ़ा सकते हैं, और उससे अधिक उत्साह से प्रेम करने में हमारी सहायता कर सकते हैं जिसने पहले हमसे प्रेम किया। वरन् वे परमेश्वर की ओर से भेजे जा सकते हैं कि वह पूरी प्रार्थना सुन लें जो भक्त बिशप केन ने हमारे मुँह में डाली है: —
हे प्रभु, जब मैं सोऊँ, तेरे स्वर्गदूत मेरे बिछौने के चारों ओर पहरा दें; अपना स्वर्गदूतीय प्रेम मुझमें भरें, और बुराई का हर मार्ग बन्द कर दें!
वे स्वर्गीय आनन्दों का वर्णन करें, और विचार से विचार मिलाकर मुझसे बातें करें!
यद्यपि जब तक हम देह में रहते हैं, इसकी रीति हम समझा नहीं पाएँगे।
3. क्या वे हमारी देह के विषय में भी हज़ार रीतियों से हमारी सेवा नहीं कर सकते जिन्हें हम अब नहीं समझते? वे हमें अनेक ऐसे संकटों में गिरने से रोक सकते हैं जिनका हमें बोध भी नहीं; और अनेक अन्य संकटों से हमें छुड़ा सकते हैं, यद्यपि हम नहीं जानते कि हमारा छुटकारा कहाँ से आया। कितनी बार हम अचानक और संकटपूर्ण गिरने पर विचित्र और अकथनीय रीति से बचाए गए हैं! और भला होगा यदि हमने उस बचाव को संयोग, या अपनी बुद्धि या बल का परिणाम न माना हो। ऐसा नहीं: यह परमेश्वर ने अपने स्वर्गदूतों को हमारे विषय में आज्ञा दी, और उन्होंने हाथों हाथ हमें उठा लिया। वास्तव में संसार के लोग ऐसे छुटकारों को सदा
भले स्वर्गदूतों के विषय में दुर्घटना या गौण कारणों का परिणाम ठहराएँगे। सम्भव है कि उनमें से कुछ ने सिंहों की मांद में दानिय्येल के बचाए जाने को भी इन्हीं का परिणाम ठहराया होता। परन्तु वह स्वयं उसे सच्चे कारण का बताता है: "मेरे परमेश्वर ने अपना दूत भेजकर सिंहों के मुँह बन्द कर दिए हैं।" (दानिय्येल 6:22।)
4. जब कोई भयंकर रोग, जिसे असाध्य माना गया हो, अचानक और पूरी तरह दूर हो जाता है, तब यह किसी स्वर्गदूत की सेवा से हुआ हो, इसमें कुछ भी असम्भव नहीं। और सम्भव है कि इसी कारण से रोगी को, या उसकी सेवा में लगे किसी व्यक्ति को, अकथनीय रीति से ऐसा उपचार सूझ जाता है जिससे वह पूर्णतः चंगा हो जाता है।
प्रतीत होता है कि जिन्हें सामान्यतः ईश्वरीय स्वप्न कहा जाता है, उन्हें अनेक बार स्वर्गदूतों का कार्य माना जा सकता है।
इस प्रकार का एक उल्लेखनीय उदाहरण एक ऐसे व्यक्ति ने बताया है जिसे शायद ही कोई उन्मादवादी माना जाए; क्योंकि वह एक अन्यजाति, एक दार्शनिक और एक सम्राट था: मेरा अभिप्राय मार्कस ऑन्तोनीनस से है।
"अपने 'मेडिटेशन्स' (चिन्तन) में वह गम्भीरता से परमेश्वर का धन्यवाद करता है कि जब वह कायेता में था, तब उसने उसे स्वप्न में वह बात प्रकट की जिससे उसका खूनी पेचिश पूरी तरह चंगा हो गया; जिसे उसके कोई भी वैद्य चंगा न कर सके थे।" और हम यह क्यों न मानें कि परमेश्वर ने उसे यह सूचना किसी स्वर्गदूत की सेवा के द्वारा दी?
6. और परमेश्वर कितनी बार अपने स्वर्गदूतों की सेवा के द्वारा हमें बुरे मनुष्यों से छुड़ाता है! उनके क्रोध, या द्वेष, या चतुराई ने हमारे विरुद्ध जो भी रचा हो, उसे उलट देता है। ये उनके बिछौने के आसपास, उनके मार्ग के आसपास रहते हैं, और उनकी सब गुप्त योजनाओं के जानकार हैं; और निस्सन्देह उनमें से बहुतों को वे ऐसे उपायों से निष्फल कर देते हैं जिनका हमें ध्यान भी नहीं आता। कभी वे उनकी प्रिय योजनाओं को आरम्भ में ही नष्ट कर देते हैं; कभी तब जब वे कार्यान्वित होने को बिलकुल तैयार होती हैं।
और यह वे हज़ार उपायों से कर सकते हैं जिनका हमें पता नहीं। वे उन्हें बीच दौड़ में रोक सकते हैं, उनका साहस या बल छीनकर; उनकी कमर में निर्बलता भरकर, या उनकी बुद्धि को मूर्खता में बदलकर। कभी वे अन्धकार की छिपी बातों को उजाले में ले आते हैं, और हमारे पाँवों के लिए बिछाए गए फन्दे हमें दिखा देते हैं। इन और अन्य अनेक रीतियों से वे दुष्टों के जालों को टुकड़े-टुकड़े कर डालते हैं।
7. उनकी सेवा की एक और बड़ी शाखा यह है कि वे बुरे स्वर्गदूतों के कार्य को निष्फल करें; जो निरन्तर घूमते रहते हैं, न केवल गरजनेवाले सिंह के समान, कि किसे फाड़ खाएँ, वरन् और भी अधिक खतरनाक रीति से ज्योति के स्वर्गदूतों के रूप में, कि किसे धोखा दें। और उनकी संख्या कितनी बड़ी है! क्या वे गिनती में आकाश के तारों के समान नहीं हैं? उनकी चतुराई कितनी बड़ी है! जो छः हज़ार से अधिक वर्षों के अनुभव से पक चुकी है। उनकी शक्ति कितनी बड़ी है! केवल परमेश्वर के स्वर्गदूतों से कम। मनुष्यों की सन्तानों में सबसे बलवान भी उनके सामने टिड्डों के समान हैं। और केवल इस एक बात से कि वे अदृश्य हैं, उनका हम पर कितना बड़ा लाभ है! जैसे उनके बल को रोकने की शक्ति हममें नहीं, वैसे ही उससे बचने की कुशलता भी हममें नहीं। परन्तु दयालु प्रभु ने हमें हमारे शत्रुओं की इच्छा पर नहीं छोड़ दिया: "उसकी आँखें," अर्थात् उसके पवित्र स्वर्गदूत, "सारी पृथ्वी पर दौड़ती रहती हैं।" और यदि हमारी आँखें खुल जाएँ, तो हम देखेंगे कि "जो हमारे साथ हैं, वे उनसे अधिक हैं जो हमारे विरुद्ध हैं।" हम देखेंगे,
एक रक्षक दल साथ चलता है, अदृश्य मित्रों की एक सेवक सेना।
भले स्वर्गदूतों के विषय में और जब कभी वे आत्मा या देह में हम पर आक्रमण करें, तब ये हमारी रक्षा करने में समर्थ, इच्छुक और तैयार हैं; जो कम से कम उतने ही बलवान, उतने ही बुद्धिमान और उतने ही सतर्क हैं। और जब हमारी ओर स्वर्गदूतों की सेनाएँ और स्वर्गदूतों का परमेश्वर है, तब हमें कौन हानि पहुँचा सकता है?
8. और हम एक सामान्य टिप्पणी कर सकते हैं: परमेश्वर मनुष्यों के द्वारा मनुष्यों को जो भी सहायता देता है, वही, और प्रायः उससे ऊँचे स्तर पर, वह उन्हें स्वर्गदूतों के द्वारा देता है। क्या वह मनुष्यों के द्वारा हमें अन्धकार में प्रकाश, उदासी में आनन्द, संकट में छुटकारा, रोग या पीड़ा में चैन और स्वास्थ्य देता है? इसमें सन्देह नहीं हो सकता कि वह प्रायः यही आशीषें स्वर्गदूतों की सेवा के द्वारा भी पहुँचाता है: इतनी प्रत्यक्षता से तो नहीं, परन्तु उतने ही प्रभावी रूप से; यद्यपि सन्देशवाहक दिखाई नहीं देते। क्या वह प्रायः मनुष्यों के द्वारा हमें हमारे शत्रुओं की हिंसा और चतुराई से छुड़ाता है? बहुत बार वह वही छुटकारा उन अदृश्य कर्ताओं के द्वारा करता है। ये मानवी सिंहों के मुँह बन्द कर देते हैं, ताकि उन्हें हमें हानि पहुँचाने की सामर्थ्य न रहे। और प्रायः वे हमारे मानवी मित्रों के साथ मिल जाते हैं, (यद्यपि न वे और न हम इसे जानते हैं,) उन्हें बुद्धि, साहस या बल देकर, जिसके बिना हमारे लिए उनका सारा परिश्रम निष्फल रहता। इस प्रकार वे असंख्य अवसरों पर उद्धार के वारिसों की गुप्त रूप से सेवा करते हैं; जबकि हम केवल मनुष्यों के स्वर सुनते हैं, और अपने चारों ओर मनुष्यों के सिवा किसी को नहीं देखते।
9. परन्तु क्या पवित्रशास्त्र यह नहीं सिखाता, "पृथ्वी पर जो उद्धार के काम होते हैं, उन्हें परमेश्वर आप ही करता है"? निश्चय ही वह करता है। और वह उसे अपनी सीधी सामर्थ्य से करने में समर्थ है। उसे स्वर्ग या पृथ्वी में किसी साधन के प्रयोग की आवश्यकता ही नहीं। अपनी इच्छा की सम्पूर्ण योजना को पूरा करने के लिए उसे न स्वर्गदूतों की, न मनुष्यों की आवश्यकता है। परन्तु उसे इस प्रकार कार्य करना भाता नहीं।
उसने कभी ऐसा नहीं किया; और हम उचित रूप से मान सकते हैं कि वह कभी नहीं करेगा। उसने सदा ऐसे साधनों के द्वारा कार्य किया है जैसे उसे भाए: फिर भी काम करनेवाला स्वयं परमेश्वर ही है। इसलिए जो भी सहायता हमें स्वर्गदूतों या मनुष्यों के द्वारा मिलती है, वह उतनी ही परमेश्वर का कार्य है जैसे यदि वह अपनी सर्वशक्तिमान भुजा बढ़ाकर बिना किसी साधन के कार्य करता। परन्तु उसने जगत के आरम्भ से उनका प्रयोग किया है: सब युगों में उसने मनुष्यों और स्वर्गदूतों दोनों की सेवा का उपयोग किया है। और इसी से विशेष रूप से "कलीसिया में परमेश्वर का नाना प्रकार का ज्ञान" देखा जाता है। इसी बीच उसकी वही महिमा होती है, जैसे यदि उसने किसी साधन का प्रयोग ही न किया होता।
10. परमेश्वर मनुष्यों की सहायता सीधे स्वयं करने के बजाय मनुष्यों के द्वारा करना क्यों चाहता है, इसका मुख्य कारण निस्सन्देह यह है कि इन परस्पर भलाइयों के द्वारा हम एक-दूसरे के प्रिय बनें, ताकि समय और अनन्तकाल दोनों में हमारा सुख बढ़े। और क्या इसी कारण परमेश्वर अपने स्वर्गदूतों को हमारे विषय में आज्ञा देना नहीं चाहता? अर्थात् इसलिए कि वह हमें और उन्हें एक-दूसरे का प्रिय बना दे; कि उनके प्रति हमारे प्रेम और कृतज्ञता के बढ़ने से, जब हम अपने पिता के राज्य में मिलें, तब हमारे सुख में उसी अनुपात में वृद्धि पाएँ। इस बीच, यद्यपि हम उनकी उपासना नहीं कर सकते, (उपासना केवल हमारे सर्वसामान्य सृष्टिकर्ता का अधिकार है,) तौभी हम "उनके काम के कारण प्रेम से उन्हें बहुत ही आदर के योग्य समझ" सकते हैं। और हम सब पवित्रता में उनका अनुकरण कर सकते हैं; अपने जीवन को उस प्रार्थना के अनुसार ढालते हुए जो हमारे प्रभु ने स्वयं सिखाई; पृथ्वी पर उसकी इच्छा पूरी करने का प्रयत्न करते हुए, जैसे स्वर्गदूत स्वर्ग में करते हैं।
भले स्वर्गदूतों के विषय में मैं इस प्रवचन का समापन हमारी कलीसिया की उस सराहनीय संग्रह-प्रार्थना से बेहतर नहीं कर सकता:
— "हे सनातन परमेश्वर, तूने स्वर्गदूतों और मनुष्यों की सेवाओं को आश्चर्यजनक रीति से ठहराया और स्थापित किया है; ऐसा कर कि जैसे तेरे पवित्र स्वर्गदूत स्वर्ग में सदा तेरी सेवा करते हैं, वैसे ही तेरी नियुक्ति से वे पृथ्वी पर हमारी सहायता और रक्षा करें, हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा।"
