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शरीर के अनुसार मसीह को जानने के विषय में शरीर के अनुसार मसीह को जानने के विषय में "इसलिये अब से हम किसी को शरीर के अनुसार न समझेंगे; और यद्यपि हम ने मसीह को भी शरीर के अनुसार जाना था, तौभी अब से हम उसे ऐसा नहीं जानेंगे।"
1. मैं बहुत समय से चाहता रहा हूँ कि इन वचनों पर स्पष्ट और सुबोध रीति से लिखा हुआ कुछ देखूँ।
निःसन्देह यह कोई छोटे महत्व की बात नहीं है; यह धर्म के स्वभाव की गहराई तक पहुँचती है; फिर भी अंग्रेज़ी भाषा में इस पर कौन-सा ग्रंथ लिखा गया है? सम्भव है कि कोई हो; परन्तु उनमें से कोई मेरे ध्यान में नहीं आया, यहाँ तक कि एक भी उपदेश नहीं।'
2. प्रेरित ने इसे यहाँ बहुत गम्भीर रीति से प्रस्तुत किया है। शब्दार्थ के अनुसार ये वचन इस प्रकार हैं: 'वह सब के लिये मरा, कि जो जीवित हैं', अर्थात् पृथ्वी पर जीवित सब लोग, 'अब से, जिस क्षण से उन्होंने उसे जाना, अपने लिये जीवित न रहें,' अर्थात् अपना ही सम्मान, या लाभ, या सुख न खोजें, "परन्तु उसके लिये," धार्मिकता और सच्ची पवित्रता में। (2 कुरिन्थियों
5:15) "सो अब से हम," अर्थात् हम जो विश्वास के द्वारा उसे जानते हैं, "किसी को" चाहे वह शेष प्रेरित हों, या तुम, या कोई और व्यक्ति, "शरीर के अनुसार नहीं जानते।" यह असाधारण कथन, जिस पर पूरा सिद्धान्त टिका है, सम्भवतः यह अर्थ रखता है कि हम किसी मनुष्य को उसकी पूर्व दशा के अनुसार नहीं देखते, अर्थात् उसके देश, धन, सामर्थ्य या बुद्धि के अनुसार नहीं। हम सब मनुष्यों को केवल उनकी आत्मिक दशा में, और इस दृष्टि से देखते हैं कि वे किसी उत्तम संसार से कैसा सम्बन्ध रखते हैं। 'हाँ, यदि हम ने मसीह को भी शरीर के अनुसार जाना है, (जो निःसन्देह उन्होंने जाना था, क्योंकि वे उसे एक मनुष्य के रूप में स्वाभाविक स्नेह से देखते और प्रेम करते थे,) तौभी अब हम उसे वैसा नहीं जानते। अब हम उसे एक मनुष्य के रूप में, उसके चेहरे, आकृति, वाणी या बातचीत के ढंग से नहीं जानते। अब हम उसके विषय में एक मनुष्य के रूप में नहीं सोचते, और न उस रूप में उससे प्रेम करते हैं।
3. तब इस अत्यन्त अलंकारिक कथन का अर्थ इसके सिवा और कुछ नहीं प्रतीत होता। जब से हम मसीह यीशु में नए सिरे से सृजे गए हैं, तब से हम अपने धन्य प्रभु के विषय में केवल एक मनुष्य के समान न सोचते, न बोलते, न व्यवहार करते हैं। अब हम मसीह के विषय में कोई ऐसा वाक्य प्रयोग नहीं करते जो उस पर न केवल इस रूप में लागू न हो सके कि वह मनुष्य है, परन्तु इस रूप में भी कि वह "सब के ऊपर परमेश्वर, युगानुयुग धन्य है।"
4. सम्भवतः इसे और स्पष्ट प्रकाश में रखने के लिये, और साथ ही खतरनाक भूलों से बचाने के लिये, उनमें से कुछ का उदाहरण देना उचित होगा जो अत्यन्त स्पष्ट और प्रत्यक्ष रीति से "मसीह को शरीर के अनुसार जानते हैं।" इनमें सबसे पहले हम सोसीनियों को गिन सकते हैं; वे जो सीधे-सीधे "उस प्रभु का इन्कार करते हैं जिसने उन्हें मोल लिया;" जो न केवल उसे परम परमेश्वर नहीं मानते, परन्तु उसे किसी भी प्रकार का परमेश्वर होने से इन्कार करते हैं। मेरा विश्वास है कि इनमें से जो सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति इंग्लैंड में, कम से कम वर्तमान शताब्दी में, हुआ, वह एक महान
11 [1872 के संस्करण से पाठ] शरीर के अनुसार मसीह को जानने के विषय में विद्या और असाधारण योग्यता का व्यक्ति था, डॉ. जॉन टेलर, जो अनेक वर्षों तक नॉर्विच के पास्टर रहे, और बाद में वारिंगटन की अकादमी के अध्यक्ष हुए। फिर भी इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि वह हमारे
प्रभु के साथ बड़ी शिष्टता से व्यवहार करता है; वह उसके विषय में बहुत अच्छे शब्द कहता है; वह उसे 'एक अत्यन्त योग्य व्यक्ति' कहता है; हाँ, "परम सद्गुणी मनुष्य"
5. इनके बाद एरियस के अनुयायी आते हैं। परन्तु मैं नहीं चाहूँगा कि इन्हें सोसीनियों की श्रेणी में रखा समझा जाए। दोनों में बड़ा अन्तर है। क्योंकि जहाँ पहले वाले मसीह को किसी भी प्रकार का परमेश्वर होने से इन्कार करते हैं, वहाँ दूसरे ऐसा नहीं करते; वे केवल उसे महान
परमेश्वर होने से इन्कार करते हैं। वे स्वेच्छा से मानते हैं, बल्कि दृढ़ता से कहते हैं, कि वह एक छोटा परमेश्वर है। परन्तु इसके साथ एक विचित्र असुविधा जुड़ी है। यह परमेश्वरत्व की एकता को पूरी तरह नष्ट कर देता है। क्योंकि यदि एक महान
परमेश्वर और एक छोटा परमेश्वर है, तो दो परमेश्वर अवश्य होंगे। परन्तु इसे छोड़कर और अपने सामने के विषय पर रहते हुए: वे सब जो मसीह को पिता से घटकर बताते हैं, चाहे वह कितना ही थोड़ा क्यों न हो, निःसन्देह "उसे शरीर के अनुसार जानते हैं;" वे उसे "पिता के तेज का प्रकाश, और उसके तत्व की छाप;" और "अपनी सामर्थ्य के वचन से सब वस्तुओं को" स्वर्ग और पृथ्वी दोनों में "संभालनेवाला" नहीं जानते, वही सामर्थी वचन जिससे उसने प्राचीन काल में उन सब को अस्तित्व में बुलाया।
6. इनमें से कुछ ने उस महान और भले मनुष्य डॉ.
वॉट्स को अपने ही मत का बताने का साहस किया है; और उसे ऐसा सिद्ध करने के लिये उन्होंने उस सुन्दर आत्मालाप को उद्धृत किया है जो उसकी मरणोपरान्त रचनाओं में प्रकाशित है। फिर भी निष्पक्ष लोग उनके दावे को तब तक नहीं मानेंगे जब तक अब तक प्रस्तुत प्रमाण से अधिक दृढ़ प्रमाण न मिले। परन्तु यदि वह इस आरोप से मुक्त है, तो एक और अर्थ में "मसीह को शरीर के अनुसार जानने" से वह उतना ही मुक्त नहीं है। मुझे इसका ज्ञान नहीं था, और मैं उसकी सब रचनाएँ लगभग समान प्रशंसा के साथ पढ़ता रहा, जब तक कि गहरी भक्ति के साथ विवेक रखनेवाले एक व्यक्ति ने प्रसंगवश यह नहीं कहा कि उसकी Horae
Lyricae में छपे कुछ भजन, जो दिव्य प्रेम को समर्पित हैं, (जैसा उसने कहा) "अत्यधिक प्रेमातुर थे, और एक पापी द्वारा परमप्रधान परमेश्वर को सम्बोधित किए जाने की अपेक्षा एक प्रेमी द्वारा अपने साथी नश्वर को सम्बोधित किए जाने के अधिक योग्य थे।" मुझे सन्देह है कि कुछ अन्य लेखक भी नहीं हैं जो मसीह की ईश्वरीयता में विश्वास करते हुए भी इसी असावधान रीति से बोलते हैं।
7. क्या हम कह सकते हैं कि एक हाल ही के महान पुरुष (जिनकी स्मृति से मैं प्रेम और आदर करता हूँ) द्वारा प्रकाशित भजन इस दोष से मुक्त हैं? क्या वे ऐसे वाक्यांशों से भरे नहीं हैं जिनमें "मसीह को शरीर के अनुसार जानने" की गन्ध प्रबल है? हाँ, और उस से भी अधिक स्थूल रीति से जैसा अंग्रेज़ी भाषा में पहले कभी प्रकाशित हुआ। कितने खेद की बात है कि वे स्थूल वाक्यांश अनेक सचमुच आत्मिक भजनों में दिखाई दें! कितनी बार उत्तम पदों के बीच ऐसी पंक्तियाँ डाल दी गई हैं जो अपने आगे-पीछे की पंक्तियों को कलंकित करती हैं! उस पुस्तक की सब रचनाएँ केवल उतनी ही काव्यमय ही नहीं, परन्तु उतनी ही तर्कसंगत और पवित्रशास्त्र के अनुकूल क्यों न हों जितनी उनमें से अनेक स्वीकार की गई हैं?
8. आज से पचास-साठ वर्ष पहले परमेश्वर की कृपामय व्यवस्था से मेरे भाई और मेरा, अमेरिका की यात्रा में, उन (तथाकथित) मोरावियन
भाइयों से परिचय हुआ। हम ने शीघ्र ही जान लिया कि वे किस आत्मा के लोग हैं, क्योंकि उनमें से छब्बीस लोग हमारे ही जहाज़ में थे। हम में उनके प्रति न केवल बड़ा आदर, परन्तु दृढ़ स्नेह भी उत्पन्न हुआ। शरीर के अनुसार मसीह को जानने के विषय में हम प्रतिदिन उनसे बातचीत करते और हर अवसर पर उनसे परामर्श लेते थे। मैं ने उनके अनेक भजनों का अनुवाद अपनी मण्डलियों के उपयोग के लिये किया। वास्तव में, क्योंकि मैं किसी मनुष्य का अन्धानुकरण करने का साहस नहीं करता था, इसलिये मैं ने वह सब नहीं लिया जो मेरे सामने था, परन्तु उन्हें चुना जिन्हें मैं पवित्रशास्त्र के सबसे अनुकूल और खरे अनुभव के सबसे उपयुक्त समझता था। फिर भी मुझे निश्चय नहीं है कि मैं ने हर अनुचित शब्द या वाक्यांश को छाँट देने में पर्याप्त सावधानी बरती है, अर्थात् हर उस शब्द को जो ऐसी घनिष्ठता के निकट प्रतीत हो जो पृथ्वी के कीड़े के मुँह को स्वर्ग के परमेश्वर से बात करते समय उतनी शोभा नहीं देती। वास्तव में मैं ने विशेष रूप से यत्न किया है कि हमारे धन्य प्रभु को सम्बोधित सब भजनों में हर लाड़-भरे वाक्यांश से बचूँ, और परमप्रधान परमेश्वर से, उससे जो "महिमा में पिता के तुल्य, प्रताप में सह-अनादि" है, बोलने की रीति से बोलूँ।
9. कुछ लोग सम्भवतः सोचेंगे कि मैं एक विशेष शब्द के विषय में अत्यधिक संकोची रहा हूँ, जिसे मैं स्वयं न पद्य में, न गद्य में, न प्रार्थना में, न प्रचार में कभी प्रयोग करता हूँ, यद्यपि रोमी और सुधारवादी दोनों कलीसियाओं के आधुनिक धर्मशास्त्री उसे बहुत बार प्रयोग करते हैं।
वह शब्द है प्रिय (dear)। इनमें से बहुत लोग प्रचार में, प्रार्थना में और धन्यवाद देने में प्रायः कहते हैं, "प्रिय प्रभु," या "प्रिय उद्धारकर्ता;" और मेरे भाई ने अपने अनेक भजनों में, जब तक वह जीवित रहा, इसी का प्रयोग किया। परन्तु क्या मैं पूछ सकता हूँ, क्या यह स्वर्ग और पृथ्वी के महान प्रभु के साथ अत्यधिक घनिष्ठता बरतना नहीं है? क्या कोई पवित्रशास्त्र, पुराने या नए
नियम का कोई अंश है जो बोलने की इस रीति को उचित ठहराता है? क्या कोई प्रेरित लेखक, काव्यात्मक पवित्रशास्त्र में भी, इसका प्रयोग करता है? सम्भव है कुछ लोग उत्तर दें, "हाँ, प्रेरित
पौलुस इसका प्रयोग करता है। वह कहता है, 'परमेश्वर का प्रिय पुत्र।'" मैं उत्तर देता हूँ, पहला, यह बात यहाँ लागू नहीं होती, क्योंकि जिस शब्द का हम "प्रिय" अनुवाद करते हैं, वह यहाँ मसीह को सम्बोधित नहीं है, केवल उसके विषय में कहा गया है।
इसलिये यह हमारे उसे इस शब्द से सम्बोधित करने का न कोई उदाहरण है, न औचित्य। मैं उत्तर देता हूँ, दूसरा, यह वही शब्द नहीं है। शब्दार्थ के अनुसार वाक्य यह नहीं है, उसका प्रिय पुत्र, परन्तु उसके प्रेम का पुत्र, अर्थात् उसका प्रियतम पुत्र। इसलिये मुझे अब भी सन्देह है कि किसी प्रेरित लेखक ने कभी इस शब्द को पिता या पुत्र को सम्बोधित किया है। इसलिये मैं बाइबल के सब प्रेमियों को यही सलाह दिए बिना नहीं रह सकता कि यदि वे इस वाक्यांश का प्रयोग करें ही, तो बहुत कम करें, क्योंकि पवित्रशास्त्र इसके लिये न आज्ञा देता है, न उदाहरण। और निश्चय ही, "यदि कोई बोले," चाहे प्रचार में, चाहे प्रार्थना में, तो उसे "ऐसा बोलना चाहिए मानो परमेश्वर का वचन कह रहा है।"
10. क्या हम अपने धन्य प्रभु के विषय में निजी बातचीत में भी प्रायः इस अपवित्रशास्त्रीय वाक्यांश का प्रयोग नहीं करते? और क्या तब हम विशेष रूप से उसके विषय में केवल एक मनुष्य के समान बोलने की ओर प्रवृत्त नहीं होते? विशेषकर जब हम उसके दुःखों का वर्णन करते हैं, तब हम कितनी सरलता से इसमें फिसल जाते हैं! इस विषय में हमारा सावधान रहना उचित है। यहाँ उष्ण कल्पना को छूट देने का स्थान नहीं है। मैं ने कभी-कभी (अपने भाई के उत्कृष्ट भजन के बीच में भी) गाने में लगभग संकोच किया है,
"वह प्रिय, विकृत मुख," या वह उत्तप्त वाक्यांश, "अपना उष्ण लहू मेरे हृदय पर टपका," कहीं ऐसा न लगे कि मैं यह भूल रहा हूँ कि मैं उस "पुरुष" के विषय में बोल रहा हूँ "जो मेरा
साथी है, सेनाओं के यहोवा की यह वाणी है।" यद्यपि उसने "अपने आप को दीन किया और दास का स्वरूप धारण किया, और मनुष्य की समानता में प्रकट हुआ;" हाँ, यद्यपि वह "यहाँ तक आज्ञाकारी रहा कि मृत्यु, हाँ, क्रूस की मृत्यु भी सह ली;" तौभी यह सदा स्मरण रहे कि उसने इसे "लूट की वस्तु न समझा", शरीर के अनुसार मसीह को जानने के विषय में "कि वह परमेश्वर के तुल्य हो।" और हमारे हृदय सदा पुकारते रहें, "तू अत्यन्त तेजोमय है; तू प्रताप और ऐश्वर्य का वस्त्र पहने हुए है।"
11. सम्भव है कुछ लोग डरें कि इन उष्ण वाक्यांशों से दूर रहना, या उन्हें कोमलता से रोकना भी, हमारी भक्ति की उमंग को रोक देगा। यह बहुत सम्भव है कि वह किसी ऐसी उमंग को रोक दे, या होने ही न दे, जो भक्ति मानी जाती रही है। सम्भवतः वह ऊँचे स्वर की चिल्लाहट, भयानक अस्वाभाविक चीखों, एक ही शब्द को बीस या तीस बार दोहराने, दो-तीन फुट ऊँचा उछलने, और स्त्री-पुरुष दोनों के हाथ-पाँव इधर-उधर फेंकने को रोक दे, जो न केवल धर्म के लिये, परन्तु सामान्य शिष्टता के लिये भी चौंकानेवाला है। परन्तु वह सच्ची, पवित्रशास्त्रीय भक्ति को कभी नहीं रोकेगा, रोकने की तो बात ही क्या। वह उस प्रार्थना को और जीवन्त करेगा जो ठीक रीति से उसे सम्बोधित हो, जो पूरा मनुष्य होकर भी पूरा परमेश्वर था; जो मनुष्य को छुड़ाने के लिये स्त्री से जन्मा, फिर भी "अनादि से और युगानुयुग परमेश्वर" था।
12. और यह न समझा जाए कि मसीह को शरीर के अनुसार जानना, उसे केवल एक मनुष्य मानना, और परिणामस्वरूप सार्वजनिक तथा निजी दोनों रूप से ऐसी भाषा का प्रयोग करना जो उसके विषय में उन धारणाओं के अनुकूल हो, कोई सर्वथा उदासीन बात है, या कम से कम कोई बड़े महत्व की बात नहीं। इसके विपरीत, हमारे सृजनहार, हमारे छुड़ानेवाले, हमारे शासक परमेश्वर के साथ यह अनुचित घनिष्ठता स्वभावतः बहुत बुरे फल उत्पन्न करती है।
और यह न केवल बोलनेवालों में, परन्तु उनमें भी जो उन्हें सुनते हैं। इसकी सीधी प्रवृत्ति यह है कि उनके शासक प्रभु के प्रति जो कोमल श्रद्धा चाहिए, उसे घटा दे। यह अनजाने ही उसे मन्द कर देती है
वह निःशब्द भय जो हिलने का साहस नहीं करता, और प्रेम का वह सारा मौन स्वर्ग। जब तक हम अपने मन में उस बात का जीवन्त बोध बनाए रखते हैं जो इन गम्भीर पंक्तियों में इतने सशक्त रूप से चित्रित की गई है, तब तक यह असम्भव है कि हम अपने सृजनहार के साथ इस घृणित और अशोभनीय घनिष्ठता के आदी हो जाएँ: — अत्यधिक उजियाले से अन्धकारमय उसके वस्त्र-छोर दिखाई देते हैं,
फिर भी स्वर्ग को चकाचौंध करते हैं, कि अति उज्ज्वल सराप उसके निकट नहीं आते, परन्तु दोनों पंखों से अपनी आँखें ढाँप लेते हैं।
13. अब, क्या हर संयमी मसीही सच्चे मन से यह न चाहेगा कि वह अपने छुड़ानेवाले के प्रति सदा ऐसा प्रेम अनुभव करे (क्योंकि वह मनुष्य होने के साथ परमेश्वर भी है) जिसमें स्वर्गदूतों का-सा भय मिला हो? क्या यही स्वभाव नहीं है जिसे भले डॉ. वॉट्स ने इन पंक्तियों में इतनी अच्छी रीति से व्यक्त किया है:
तेरी दया कभी दूर न होगी सच्चे हृदय के मनुष्यों से; तू उन प्राणों को बचाता है जिनका दीन प्रेम पवित्र भय से जुड़ा है?
शरीर के अनुसार मसीह को जानने के विषय में 14. मैं यह नहीं कहता कि मैं ठण्डी, मृत, औपचारिक प्रार्थना की सिफ़ारिश करता हूँ, जिसमें से प्रेम और इच्छा, आशा और भय सब निकाल दिए गए हों। स्वर्गीय बिशप होडली ने जिस "प्रार्थना की शान्त और अविचलित रीति" की इतनी दृढ़ता से सिफ़ारिश की थी, वह ऐसी ही प्रतीत होती है, जिसके कारण कुछ वर्षों तक धार्मिक जगत् में इतना उग्र विवाद रहा। क्या यह सम्भव नहीं कि उस भले अभिप्राय वाले बिशप का कुछ रहस्यवादियों या शान्तिवादियों (जैसे मैडम गुइयों, या कैम्ब्रे के आर्चबिशप [फेनेलोन]) से सामना हुआ हो; और इन बातों का अनुभव न होने के कारण उसने अपना एक सिद्धान्त जोड़-तोड़ कर बना लिया हो जो जहाँ तक हो सके उनके सिद्धान्त से मिलता-जुलता हो? परन्तु यह निश्चित है कि वास्तविक, पवित्रशास्त्रीय भक्ति से अधिक दूर कोई वस्तु उदासीनता से नहीं है। वह हमारी सब उच्चतर भावनाओं को जगाती है, उन्हें अभ्यास कराती है, और उन्हें पूरा क्षेत्र देती है; और केवल उन्हीं को बाहर करती है जो उद्दण्ड, अविवेकी और मनुष्य की गरिमा से नीची हैं।
15. परन्तु तब हम इसका क्या कारण बताएँ कि इतने पवित्र पुरुषों ने, सचमुच उच्च भावनाओं वाले पुरुषों ने, यहाँ तक कि भक्त केम्पिस ने भी, बोलने की इस रीति, इन लाड़-भरे वाक्यांशों का इतनी बार प्रयोग किया है; क्योंकि हम सन्देह नहीं कर सकते कि वे सचमुच भक्त पुरुष थे? यह माना जाता है कि वे थे; परन्तु हम यह नहीं मानते कि उनका विवेक उनकी भक्ति के बराबर था। और इसी कारण उनकी सचमुच अच्छी भावनाएँ विवेक की सीमा से कुछ आगे बढ़ गईं, और उन्हें बोलने की ऐसी रीति में ले गईं जिसे परमेश्वर के वचन का अधिकार प्राप्त नहीं। और निश्चय ही यही हमारी भावनाओं और हमारी भाषा दोनों की सच्ची कसौटी है। परन्तु क्या प्राचीन काल के किसी पवित्र पुरुष ने, पुराने या नए नियम में, कभी ऐसा बोला? क्या दानिय्येल ने, जो "अति प्रिय पुरुष" था, कभी परमेश्वर से अपने आप को इस प्रकार व्यक्त किया? या क्या "वह चेला जिससे
यीशु प्रेम रखता था," और जिसने निःसन्देह अपने स्वामी से अत्यन्त प्रबल स्नेह के साथ प्रेम किया, महिमा की दहलीज़ पर होते हुए भी उसे इस प्रकार सम्बोधित करने का उदाहरण हमारे लिये छोड़ा? तब भी उसके अन्तिम शब्द लाड़-भरे नहीं, परन्तु गम्भीर थे, "हाँ, प्रभु यीशु, आ!"
16. सारांश यह है कि हमें "पुत्र का आदर वैसे ही करना चाहिए जैसे हम पिता का आदर करते हैं।" हमें उसकी वही आराधना करनी चाहिए जो हम पिता की करते हैं। हमें उससे अपने पूरे हृदय और प्राण से प्रेम करना चाहिए; और जो कुछ हमारे पास है और जो कुछ हम हैं, जो कुछ हम सोचते, कहते और करते हैं, सब त्रिएक परमेश्वर, पिता, पुत्र और आत्मा को समर्पित करना चाहिए, युगानुयुग!
प्लिमथ-डॉक, 15 अगस्त, 1789।
