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विश्वास द्वारा उद्धार 1 "अनुग्रह ही से विश्वास के द्वारा तुम्हारा उद्धार हुआ है।"
1. वे सब आशीषें जो परमेश्वर ने मनुष्य को दी हैं, केवल उसके अनुग्रह, उदारता या कृपा से हैं; उसकी निःशुल्क, अनर्जित कृपा; ऐसी कृपा जो सर्वथा अनर्जित है; क्योंकि मनुष्य का उसकी छोटी-से-छोटी दया पर भी कोई अधिकार नहीं है। यह निःशुल्क अनुग्रह ही था जिसने "मनुष्य को भूमि की मिट्टी से रचा, और उसके नथनों में जीवन का श्वास फूँका," और उस प्राण पर परमेश्वर का स्वरूप अंकित किया, और "सब कुछ उसके पाँवों तले कर दिया।" वही निःशुल्क अनुग्रह आज भी हमें जीवन, श्वास और सब कुछ प्रदान करता चला आ रहा है। क्योंकि हम जो कुछ हैं, या हमारे पास जो कुछ है, या हम जो कुछ करते हैं, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं जो परमेश्वर के हाथ से छोटी-से-छोटी वस्तु पाने के योग्य ठहराए। "हे परमेश्वर, हमारे सब काम तू ही ने हमारे लिये किए हैं।" इसलिए ये सब भी निःशुल्क दया के और अनेक उदाहरण हैं; और मनुष्य में जो कोई धार्मिकता पाई जाए, वह भी परमेश्वर का दान है।
2. तब एक पापी मनुष्य अपने छोटे-से-छोटे पाप का भी प्रायश्चित्त किस वस्तु से करे? अपने ही कामों से? नहीं। वे चाहे कितने ही अधिक या पवित्र हों, वे उसके अपने नहीं, परमेश्वर के हैं। परन्तु सच तो यह है कि वे स्वयं भी सब अपवित्र और पापमय हैं, इसलिए उनमें से प्रत्येक को नए प्रायश्चित्त की आवश्यकता है।
बिगड़े हुए वृक्ष पर केवल बिगड़ा हुआ फल ही लगता है। और उसका हृदय सर्वथा बिगड़ा हुआ और घृणित है; वह "परमेश्वर की महिमा से रहित" हो गया है, अर्थात् उस महिमामय धार्मिकता से, जो आरम्भ में उसके महान सृजनहार के स्वरूप के अनुसार उसके प्राण पर अंकित की गई थी। इसलिए जब उसके पास प्रस्तुत करने को न धार्मिकता है, न कर्म, तो परमेश्वर के सामने उसका मुँह पूरी तरह बन्द हो जाता है।
3. यदि तब पापी मनुष्य परमेश्वर की दृष्टि में अनुग्रह पाते हैं, तो यह "अनुग्रह पर अनुग्रह" है! यदि परमेश्वर अब भी हम पर नई आशीषें उँडेलने की कृपा करता है, बल्कि सब आशीषों में सबसे बड़ी, अर्थात् उद्धार, तो इन बातों के विषय में हम और क्या कहें सिवाय इसके कि, "परमेश्वर का उसके अकथनीय दान के लिए धन्यवाद हो!" और ऐसा ही है। इसी में
"परमेश्वर हम पर अपने प्रेम की भलाई इस रीति से प्रगट करता है कि जब हम पापी ही थे तभी मसीह हमारे लिये मरा" ताकि हमें बचाए। "अनुग्रह ही से" तब "विश्वास के द्वारा तुम्हारा उद्धार हुआ है।" अनुग्रह उद्धार का स्रोत है, और विश्वास उसकी शर्त।
अब, ताकि हम परमेश्वर के अनुग्रह से वंचित न रह जाएँ, हमारे लिए यह आवश्यक है कि हम सावधानी से पूछताछ करें, — I. वह कौन-सा विश्वास है जिसके द्वारा हमारा उद्धार होता है।
II. वह उद्धार क्या है जो विश्वास के द्वारा होता है।
III. कुछ आपत्तियों का उत्तर हम कैसे दे सकते हैं।
I. वह कौन-सा विश्वास है जिसके द्वारा हमारा उद्धार होता है।
1. और, पहले, यह केवल अन्यजाति का विश्वास नहीं है।
अब, परमेश्वर अन्यजाति से यह माँग करता है कि वह विश्वास करे, "कि परमेश्वर है; और वह अपने खोजनेवालों को प्रतिफल देता है;" और यह कि उसे इस प्रकार खोजना चाहिए कि उसे परमेश्वर जानकर उसकी महिमा की जाए, उसे
1 यह उपदेश 18 जून, 1738 को ऑक्सफ़ोर्ड के सेंट मैरी में विश्वविद्यालय के सामने दिया गया।
विश्वास द्वारा उद्धार सब बातों के लिए धन्यवाद दिया जाए, और अपने संगी प्राणियों के प्रति नैतिक सद्गुण, न्याय, दया और सत्य का सावधानी से पालन किया जाए। इसलिए एक यूनानी या रोमी, बल्कि एक सीथियन या भारतीय भी, यदि इतना विश्वास न करता, अर्थात् परमेश्वर के अस्तित्व और गुणों का, प्रतिफल और दण्ड की भावी दशा का, और नैतिक सद्गुण की बाध्यकारी प्रकृति का, तो वह निरुत्तर नहीं था। क्योंकि यह केवल अन्यजाति का विश्वास है।
2. दूसरे, यह शैतान का विश्वास भी नहीं है, यद्यपि यह अन्यजाति के विश्वास से बहुत आगे जाता है। क्योंकि शैतान न केवल यह विश्वास करता है कि एक बुद्धिमान और सामर्थी परमेश्वर है, जो प्रतिफल देने में कृपालु और दण्ड देने में न्यायी है; बल्कि यह भी कि यीशु परमेश्वर का पुत्र, मसीह, जगत का उद्धारकर्ता है। इसलिए हम उसे स्पष्ट शब्दों में यह कहते पाते हैं, "मैं तुझे जानता हूँ तू कौन है; तू परमेश्वर का पवित्र
जन है" (लूका 4:34)। और हम इसमें सन्देह नहीं कर सकते कि वह अभागा आत्मा उन सब वचनों पर विश्वास करता है जो उस पवित्र जन के मुँह से निकले, और वह सब कुछ भी जो प्राचीन काल के उन पवित्र जनों द्वारा लिखा गया, जिनमें से दो के विषय में उसे वह महिमामय गवाही देनी पड़ी,
"ये मनुष्य परमप्रधान परमेश्वर के दास हैं, जो तुम्हें उद्धार के मार्ग की कथा सुनाते हैं।"
इतना ही परमेश्वर और मनुष्य का वह बड़ा शत्रु विश्वास करता है, और विश्वास करके थरथराता है, — कि परमेश्वर शरीर में प्रगट हुआ; कि वह "सब शत्रुओं को अपने पाँवों तले कर देगा;" और यह कि "सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र परमेश्वर की प्रेरणा से रचा गया है।" शैतान का विश्वास यहीं तक जाता है।
3. तीसरे, जिस विश्वास के द्वारा हमारा उद्धार होता है, शब्द के उस अर्थ में जो आगे समझाया जाएगा, वह केवल वही नहीं है जो प्रेरितों में तब था जब मसीह अभी पृथ्वी पर था; यद्यपि उन्होंने उस पर ऐसा विश्वास किया था कि "सब कुछ छोड़कर उसके पीछे हो लिए;" यद्यपि तब उन्हें चमत्कार करने की सामर्थ थी, कि "हर प्रकार की बीमारी और दुर्बलता को दूर करें;" बल्कि उन्हें तब "सब दुष्टात्माओं पर शक्ति और अधिकार" भी था; और, जो इन सबसे बढ़कर है, उनके स्वामी ने उन्हें "परमेश्वर के राज्य का प्रचार करने" को भेजा था।
4. तो फिर वह कौन-सा विश्वास है जिसके द्वारा हमारा उद्धार होता है? पहले, सामान्य रूप से, इसका उत्तर यह हो सकता है कि यह मसीह में विश्वास है: मसीह, और मसीह के द्वारा परमेश्वर, इसके उचित विषय हैं। इसलिए इसी बात में यह प्राचीन या आधुनिक अन्यजातियों के विश्वास से पर्याप्त और पूर्ण रूप से भिन्न है। और शैतान के विश्वास से यह इसमें पूर्णतः भिन्न है: कि यह केवल एक सैद्धान्तिक, बौद्धिक वस्तु, एक ठंडी और निर्जीव सहमति, या मस्तिष्क में विचारों की एक शृंखला नहीं है; बल्कि हृदय की एक अवस्था भी है। क्योंकि पवित्रशास्त्र यों कहता है, "मन से विश्वास करने पर धार्मिकता प्राप्त होती है;" और, "यदि तू अपने मुँह से यीशु को प्रभु जानकर अंगीकार करे, और अपने मन से विश्वास करे कि परमेश्वर ने उसे मरे हुओं में से जिलाया, तो तू उद्धार पाएगा।"
5. और इसी बात में यह उस विश्वास से भिन्न है जो प्रेरितों में तब था जब हमारा प्रभु पृथ्वी पर था, कि यह उसकी मृत्यु की आवश्यकता और उसकी योग्यता को, और उसके पुनरुत्थान की सामर्थ को स्वीकार करता है। यह उसकी मृत्यु को मनुष्य को अनन्त मृत्यु से छुड़ाने का एकमात्र पर्याप्त उपाय मानता है, और उसके पुनरुत्थान को हम सबकी जीवन और अमरता में पुनःस्थापना मानता है; क्योंकि वह "हमारे अपराधों के लिये पकड़वाया गया, और हमारे धर्मी ठहरने के लिये जिलाया भी गया।"
तब मसीही विश्वास केवल मसीह के सम्पूर्ण सुसमाचार के प्रति सहमति ही नहीं, बल्कि मसीह के लहू पर पूर्ण भरोसा भी है; उसके जीवन, मृत्यु और पुनरुत्थान की योग्यता पर भरोसा; उस पर टेक लगाना, जो हमारे प्रायश्चित्त और हमारे जीवन के रूप में हमारे लिये दिया गया और हम में जीवित है; और इसके परिणामस्वरूप
विश्वास द्वारा उद्धार उससे मिल जाना और उससे लिपटे रहना, जो हमारे लिये "ज्ञान, धार्मिकता, पवित्रता और छुटकारा" है, या एक शब्द में, हमारा उद्धार।
II. यह विश्वास जिस उद्धार तक पहुँचाता है, वह क्या है, यह दूसरी बात है जिस पर विचार करना है।
1. और, पहले, उसमें और जो कुछ भी निहित हो, यह एक वर्तमान उद्धार है। यह कुछ ऐसा है जो इस विश्वास के सहभागियों को पृथ्वी पर प्राप्य है, बल्कि वास्तव में प्राप्त हो चुका है। क्योंकि प्रेरित इफिसुस के विश्वासियों से, और उनके द्वारा सब युगों के विश्वासियों से, यों कहता है, यह नहीं कि तुम उद्धार पाओगे
(यद्यपि यह भी सच है), परन्तु, "विश्वास के द्वारा तुम्हारा उद्धार हुआ है।"
2. तुम्हारा उद्धार हुआ है (सब कुछ एक शब्द में समेटने के लिए) पाप से। यही वह उद्धार है जो विश्वास के द्वारा होता है। यही वह महान उद्धार है जिसकी भविष्यवाणी स्वर्गदूत ने तब की थी जब परमेश्वर अपने पहलौठे को जगत में लाने पर था: "तू उसका नाम यीशु रखना; क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा।" और न यहाँ, न पवित्र शास्त्र के अन्य भागों में, किसी प्रकार की सीमा या प्रतिबन्ध है। उसके सब लोगों को, या जैसा कि अन्यत्र कहा गया है, "उन सब को जो उस पर विश्वास करते हैं," वह उनके सब पापों से बचाएगा; मूल और कर्मगत, बीते हुए और वर्तमान पाप से, "शरीर और आत्मा" के पाप से। उस पर जो विश्वास है, उसके द्वारा वे उसके दोष और उसकी सामर्थ दोनों से बचाए जाते हैं।
3. पहला। बीते हुए सब पापों के दोष से: क्योंकि जबकि सारा संसार परमेश्वर के सामने दोषी है, यहाँ तक कि यदि वह "अधर्म का लेखा लेने लगे, तो कोई भी ठहर न सकेगा;" और जबकि "व्यवस्था के द्वारा" केवल "पाप की पहचान" होती है, परन्तु उससे छुटकारा नहीं, ताकि "व्यवस्था के कामों" को पूरा करने "से कोई प्राणी उसके सामने धर्मी न ठहरेगा": अब,
"परमेश्वर की वह धार्मिकता, जो यीशु मसीह पर विश्वास करने से मिलती है, उन सब पर प्रगट हुई है जो विश्वास करते हैं।" अब, "उसके अनुग्रह से, उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, वे सेंत-मेंत धर्मी ठहराए जाते
हैं।" "उसे परमेश्वर ने उसके लहू के कारण विश्वास करने के द्वारा प्रायश्चित्त ठहराया, ताकि जो पाप पहले किए गए थे उनके क्षमा किए जाने के कारण वह अपनी धार्मिकता प्रगट करे।" अब मसीह ने "व्यवस्था के श्राप" को दूर कर दिया है, "क्योंकि वह हमारे लिये श्रापित बना।" उसने "वह दस्तावेज़ जो हमारे विरुद्ध था मिटा डाला, और उसे क्रूस पर कीलों से जड़कर सामने से हटा दिया।" "अतः अब जो मसीह यीशु में" विश्वास करते हैं, "उन पर दण्ड की आज्ञा नहीं।"
4. और दोष से बचाए जाकर वे भय से भी बचाए जाते हैं। निश्चय ही अपराध करने के सन्तानोचित भय से नहीं; परन्तु सब दासत्व के भय से; उस भय से जिसमें पीड़ा होती है; दण्ड के भय से; परमेश्वर के क्रोध के भय से, जिसे वे अब कठोर स्वामी नहीं, बल्कि कृपालु पिता मानते हैं। "तुम को दासत्व की आत्मा नहीं मिली कि फिर भयभीत हो, परन्तु लेपालकपन की आत्मा मिली है, जिससे हम अब्बा, हे पिता, कहकर पुकारते हैं: आत्मा आप ही हमारी आत्मा के साथ गवाही देता है कि हम परमेश्वर की सन्तान हैं।" वे परमेश्वर के अनुग्रह से गिर जाने और बड़ी और बहुमूल्य प्रतिज्ञाओं से वंचित रह जाने के भय से भी बचाए जाते हैं, यद्यपि उसकी सम्भावना से नहीं। इस प्रकार उन्हें "अपने प्रभु यीशु मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल" मिलता है।
वे परमेश्वर की महिमा की आशा पर आनन्द करते हैं। और परमेश्वर का प्रेम पवित्र आत्मा के द्वारा, जो उन्हें दिया गया है, उनके हृदय में डाला गया है।" और इसी से उन्हें निश्चय होता है (यद्यपि शायद सब समय नहीं, और न एक ही सी पूर्ण निश्चयता के साथ), कि "न मृत्यु, न उद्धार विश्वास द्वारा जीवन, न वर्तमान, न भविष्य, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्टि, उन्हें परमेश्वर के उस प्रेम से, जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी।"
5. फिर: इस विश्वास के द्वारा वे पाप के दोष से ही नहीं, उसकी सामर्थ से भी बचाए जाते हैं। इसलिए प्रेरित घोषणा करता है, "तुम जानते हो कि वह पापों को हर ले जाने के लिये प्रगट हुआ; और उसमें कोई पाप नहीं। जो कोई उसमें बना रहता है वह पाप नहीं करता" (1 यूहन्ना 3:5 आदि)। फिर, "हे बालको, किसी के भरमाने में न आना। जो पाप करता है वह शैतान की ओर से है। जो कोई विश्वास करता है वह परमेश्वर से जन्मा है। और जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; क्योंकि उसका बीज उसमें बना रहता है: और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह परमेश्वर से जन्मा है।" एक बार और: "हम जानते हैं कि जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; परन्तु जो परमेश्वर से उत्पन्न हुआ, उसे वह सुरक्षित रखता है, और वह दुष्ट उसे छूने नहीं पाता" (1 यूहन्ना 5:18)।
6. जो विश्वास के द्वारा परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता (1.) किसी आदतन पाप के द्वारा; क्योंकि सब आदतन पाप राज्य करता हुआ पाप है: परन्तु विश्वास करनेवाले में पाप राज्य नहीं कर सकता। और न (2.) किसी जानबूझकर किए गए पाप के द्वारा: क्योंकि उसकी इच्छा, जब तक वह विश्वास में बना रहता है, सब पाप के पूर्णतः विरुद्ध है, और वह उससे घातक विष के समान घृणा करती है। और न (3.) किसी पापमय अभिलाषा के द्वारा; क्योंकि वह निरन्तर परमेश्वर की पवित्र और सिद्ध इच्छा की अभिलाषा रखता है। और किसी अपवित्र अभिलाषा की ओर किसी भी झुकाव को वह परमेश्वर के अनुग्रह से जन्म लेते ही दबा देता है।
और न (4.) वह दुर्बलताओं के द्वारा पाप करता है, चाहे वे कर्म में हों, वचन में, या विचार में; क्योंकि उसकी दुर्बलताओं में उसकी इच्छा की सहमति नहीं होती; और इसके बिना वे वास्तव में पाप नहीं हैं। इस प्रकार, "जो परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता": और यद्यपि वह यह नहीं कह सकता कि उसने पाप नहीं किया है, फिर भी अब
7. तो यही वह उद्धार है जो विश्वास के द्वारा, इसी वर्तमान जगत में भी, मिलता है: पाप से और पाप के परिणामों से उद्धार, जो दोनों प्रायः धर्मी ठहराए जाने (औचित्य) शब्द में व्यक्त किए जाते हैं; जो, व्यापकतम अर्थ में लिया जाए, तो उस पापी की आत्मा पर मसीह के प्रायश्चित्त के वास्तविक रूप से लागू होने के द्वारा, जो अब उस पर विश्वास करता है, दोष और दण्ड से छुटकारे को, और उसके हृदय में मसीह के रचे जाने के द्वारा पाप की सामर्थ से छुटकारे को सूचित करता है। इसलिए जो इस प्रकार धर्मी ठहराया गया है, या विश्वास से बचाया गया है, वह वास्तव में नया जन्म पाया हुआ है। वह आत्मा से एक नए जीवन के लिये नया जन्म पाता है, जो "मसीह के साथ परमेश्वर में छिपा हुआ है।" और नवजात शिशु के समान वह आनन्द से अदोलोन (adolon) [शुद्ध], अर्थात् "वचन का निर्मल दूध," ग्रहण करता है, "और उसके द्वारा बढ़ता है;" अपने परमेश्वर प्रभु की सामर्थ में विश्वास से विश्वास में, अनुग्रह से अनुग्रह में, आगे बढ़ता हुआ, जब तक कि अन्त में वह "सिद्ध मनुष्य न बन जाए, और मसीह के पूरे डील-डौल तक न पहुँच जाए।"
III. इसके विरुद्ध पहली सामान्य आपत्ति यह है, 1. कि केवल विश्वास से उद्धार या धर्मी ठहराए जाने का प्रचार करना पवित्रता और भले कामों के विरुद्ध प्रचार करना है। इसका संक्षिप्त उत्तर यह दिया जा सकता है: "ऐसा होता, यदि हम, जैसे कुछ लोग करते हैं, ऐसे विश्वास की बात करते जो इनसे अलग हो; परन्तु हम ऐसे विश्वास की बात करते हैं जो ऐसा नहीं है, बल्कि सब भले कामों और सारी पवित्रता को उत्पन्न करनेवाला है।"
2. परन्तु इस पर और विस्तार से विचार करना उपयोगी हो सकता है; विशेषकर इसलिए कि यह कोई नई आपत्ति नहीं, बल्कि सन्त पौलुस के समय जितनी पुरानी है। क्योंकि तब भी पूछा गया था, "तो क्या हम विश्वास के द्वारा व्यवस्था को व्यर्थ ठहराते हैं?" हम पहले यह उत्तर देते हैं कि वे सब जो विश्वास का प्रचार नहीं करते, स्पष्टतः व्यवस्था को व्यर्थ ठहराते हैं; या तो सीधे और स्थूल रूप से, ऐसी सीमाओं और टीकाओं के द्वारा जो वचन की सारी आत्मा को खा जाती हैं;
विश्वास द्वारा उद्धार या परोक्ष रूप से, उस एकमात्र साधन को न बताकर जिसके द्वारा उसका पालन करना सम्भव है।
जबकि, दूसरे, "हम व्यवस्था को स्थिर करते हैं," दोनों प्रकार से: उसके पूरे विस्तार और आत्मिक अर्थ को दिखाकर; और सब को उस जीवित मार्ग की ओर बुलाकर, जिसके द्वारा "व्यवस्था की विधि उनमें पूरी की जाए।" ये लोग, जबकि वे केवल मसीह के लहू पर भरोसा रखते हैं, उन सब विधियों का प्रयोग करते हैं जो उसने ठहराई हैं, वे सब "भले काम करते हैं जिन्हें परमेश्वर ने पहले से हमारे करने के लिये तैयार किया," और सब पवित्र और स्वर्गीय स्वभावों का आनन्द लेते और उन्हें प्रकट करते हैं, अर्थात् वही मन जो मसीह यीशु में था।
3. परन्तु क्या इस विश्वास का प्रचार करना मनुष्यों को घमण्ड की ओर नहीं ले जाता? हम उत्तर देते हैं, संयोगवश ऐसा हो सकता है: इसलिए हर विश्वासी को महान
प्रेरित के इन शब्दों में गम्भीरता से चेताया जाना चाहिए: "वे डालियाँ अविश्वास के कारण तोड़ी गईं, और तू विश्वास से स्थिर है। घमण्ड न कर, परन्तु भय मान। क्योंकि जब परमेश्वर ने स्वाभाविक डालियों को न छोड़ा, तो तुझे भी न छोड़ेगा। इसलिए परमेश्वर की कृपा और कड़ाई को देख! जो गिर गए, उन पर कड़ाई; परन्तु तुझ पर कृपा, यदि तू उसकी कृपा में बना रहे; नहीं तो तू भी काट डाला जाएगा।" और जब तक वह उसमें बना रहता है, वह सन्त पौलुस के उन शब्दों को स्मरण रखेगा, जिन्होंने इसी आपत्ति को पहले से देखकर उसका उत्तर दिया (रोमियों 3:27), "तो घमण्ड करना कहाँ रहा? उसका तो लोप हो गया। किस व्यवस्था के कारण? क्या कर्मों की? नहीं, परन्तु विश्वास की व्यवस्था के कारण।" यदि मनुष्य अपने कामों से धर्मी ठहरता, तो उसके पास घमण्ड करने को कुछ होता। परन्तु उसके लिये घमण्ड का कोई स्थान नहीं "जो काम नहीं करता, परन्तु भक्तिहीन को धर्मी ठहरानेवाले पर विश्वास करता है" (रोमियों 4:5)। पाठ से पहले और बाद के शब्द भी इसी आशय के हैं (इफिसियों 2:4 आदि): "परमेश्वर ने जो दया का धनी है, जब हम अपराधों के कारण मरे हुए थे, तब हमें मसीह के साथ जिलाया (अनुग्रह ही से तुम्हारा उद्धार हुआ है), ताकि वह आनेवाले समयों में अपने अनुग्रह का अत्यधिक धन उस कृपा के द्वारा दिखाए जो मसीह यीशु में हम पर है। क्योंकि अनुग्रह ही से विश्वास के द्वारा तुम्हारा उद्धार हुआ है; और यह तुम्हारी ओर से नहीं।" न तुम्हारा विश्वास, न तुम्हारा उद्धार तुम्हारी ओर से आता है: "यह परमेश्वर का दान है;" निःशुल्क, अनर्जित दान; वह विश्वास जिसके द्वारा तुम्हारा उद्धार हुआ है, और वह उद्धार भी जिसे वह अपनी ही सुइच्छा से, अपनी केवल कृपा से, उसके साथ जोड़ देता है। कि तुम विश्वास करते हो, यह उसके अनुग्रह का एक उदाहरण है; कि विश्वास करके तुम बचाए जाते हो, यह दूसरा। "न कर्मों के कारण, ऐसा न हो कि कोई घमण्ड करे।"
क्योंकि हमारे सब काम, हमारी सारी धार्मिकता, जो हमारे विश्वास करने से पहले थी, परमेश्वर से दण्ड के सिवाय और कुछ पाने के योग्य न थी; वे विश्वास के योग्य होने से इतनी दूर थीं, इसलिए विश्वास, जब भी दिया जाए, कर्मों से नहीं होता। और न उद्धार उन कामों से होता है जो हम विश्वास करने पर करते हैं, क्योंकि तब
हम में कार्य करनेवाला परमेश्वर ही है: और इसलिए यह कि वह हमें उस कार्य का प्रतिफल देता है जिसे वह स्वयं करता है, केवल अपनी दया के धन की प्रशंसा करता है, परन्तु हमारे पास घमण्ड करने को कुछ नहीं छोड़ता।
4. "फिर भी, क्या परमेश्वर की दया के विषय में यों कहना, कि वह केवल विश्वास से सेंत-मेंत बचाती या धर्मी ठहराती है, मनुष्यों को पाप में प्रोत्साहित नहीं कर सकता?" निश्चय कर सकता है, और करेगा: बहुत-से "पाप में बने रहेंगे कि अनुग्रह बढ़े:" परन्तु उनका लहू उन्हीं के सिर पर है। परमेश्वर की भलाई उन्हें पश्चात्ताप की ओर ले जानेवाली होनी चाहिए; और जिनका हृदय सच्चा है उन्हें वह ले जाएगी भी। जब वे जानेंगे कि उसके पास अब भी क्षमा है, तो वे ऊँचे स्वर से पुकारेंगे कि वह यीशु में जो विश्वास है उसके द्वारा उनके पाप भी मिटा दे। और यदि वे उत्कटता से पुकारें और हियाव न छोड़ें, यदि वे उसे उन सब साधनों में खोजें जो उसने ठहराए हैं; यदि वे तब तक शान्ति पाने से इनकार करें जब तक वह न आए; तो "वह
विश्वास द्वारा उद्धार आएगा और देर न करेगा।" और वह थोड़े समय में बहुत कार्य कर सकता है। प्रेरितों के काम में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जब परमेश्वर ने मनुष्यों के हृदयों में यह विश्वास स्वर्ग से गिरती बिजली के समान उत्पन्न किया। इस प्रकार जिस घड़ी पौलुस और सीलास ने प्रचार करना आरम्भ किया, उसी घड़ी जेलर ने पश्चात्ताप किया, विश्वास किया और बपतिस्मा लिया; जैसे पिन्तेकुस्त के दिन सन्त पतरस द्वारा तीन हज़ार ने लिया, जिन्होंने उसके पहले ही प्रचार में पश्चात्ताप किया और विश्वास किया। और परमेश्वर का धन्यवाद हो, अब भी बहुत-से जीवित प्रमाण हैं कि वह अब भी "बचाने में सामर्थी" है।
5. फिर भी इसी सत्य पर, एक और दृष्टि से, एक बिलकुल विपरीत आपत्ति उठाई जाती है: "यदि मनुष्य अपने सब किए से नहीं बचाया जा सकता, तो यह मनुष्यों को निराशा में धकेल देगा।" सच है, अपने ही कामों, अपनी ही योग्यता या धार्मिकता से बचाए जाने की ओर से निराश होने के लिये। और ऐसा होना भी चाहिए; क्योंकि कोई भी मसीह की योग्यता पर भरोसा नहीं कर सकता जब तक वह अपनी योग्यता को पूरी तरह त्याग न दे। जो "अपनी धार्मिकता स्थापित करने" में लगा है, वह परमेश्वर की धार्मिकता को ग्रहण नहीं कर सकता। जो धार्मिकता विश्वास से है, वह उसे नहीं दी जा सकती जब तक वह उस पर भरोसा रखता है जो व्यवस्था से है।
6. परन्तु कहा जाता है कि यह एक असान्त्वनादायक शिक्षा है। शैतान ने अपने ही स्वभाव के अनुसार बात की, अर्थात् बिना सत्य के और बिना लज्जा के, जब उसने मनुष्यों को यह सुझाने का साहस किया कि यह ऐसी है। यही एकमात्र सान्त्वनादायक शिक्षा है, यह उन सब पापियों के लिये, जो अपने आप से निराश और अपने आप को दोषी ठहरा चुके हैं, "सान्त्वना से भरपूर" है।
कि "जो कोई उस पर विश्वास करेगा, वह लज्जित न होगा; क्योंकि वही प्रभु सब का प्रभु है, और अपने सब नाम लेनेवालों के लिये उदार है": यहाँ स्वर्ग जितनी ऊँची, मृत्यु से अधिक सामर्थी सान्त्वना है! क्या!
सब के लिये दया? जक्काई के लिये, जो खुला लुटेरा था? मरियम मग्दलीनी के लिये, जो एक साधारण वेश्या थी?
मुझे लगता है कि मैं किसी को कहते सुन रहा हूँ, "तो मैं भी, मैं भी, दया की आशा कर सकता हूँ!" और हाँ, तू कर सकता है, हे दुःखी जन, जिसे किसी ने सान्त्वना नहीं दी! परमेश्वर तेरी प्रार्थना को नहीं ठुकराएगा। बल्कि शायद वह अगले ही घड़ी कह दे, "ढाढ़स बाँध, तेरे पाप क्षमा हुए;" ऐसे क्षमा हुए कि वे फिर तुझ पर राज्य न करेंगे; हाँ, और कि "पवित्र आत्मा तेरी आत्मा के साथ गवाही देगा कि तू परमेश्वर की सन्तान है।" हे शुभ समाचार! बड़े आनन्द का समाचार, जो सब लोगों के लिये भेजा गया है! "अरे सब प्यासे लोगो, पानी के पास आओ: आओ, बिना रुपये और बिना दाम के मोल लो।" तुम्हारे पाप चाहे जैसे हों, "चाहे लाल रंग के समान" हों, चाहे तुम्हारे सिर के बालों से भी अधिक हों, "यहोवा की ओर फिरो, तो वह तुम पर दया करेगा, और हमारे परमेश्वर की ओर, क्योंकि वह पूरी रीति से क्षमा करेगा।"
7. जब और आपत्तियाँ नहीं रहतीं, तब हमें सीधे यह बताया जाता है कि केवल विश्वास से उद्धार का प्रचार पहली शिक्षा के रूप में नहीं किया जाना चाहिए, या कम-से-कम बिलकुल नहीं किया जाना चाहिए। परन्तु पवित्र आत्मा क्या कहता है? "उस नींव को छोड़ जो पड़ी है, अर्थात् यीशु
मसीह, कोई दूसरी नींव नहीं डाल सकता।" तो फिर यह कि "जो कोई उस पर विश्वास करेगा वह उद्धार पाएगा," हमारे सारे प्रचार की नींव है, और होनी ही चाहिए; अर्थात् इसका प्रचार सबसे पहले होना चाहिए। "अच्छा, पर सब से नहीं।" तो फिर किससे हम इसका प्रचार न करें? किसको हम छोड़ दें? गरीबों को? नहीं; उन्हें तो विशेष अधिकार है कि उन्हें सुसमाचार सुनाया जाए। अनपढ़ों को? नहीं। परमेश्वर ने ये बातें आरम्भ से अनपढ़ और साधारण मनुष्यों पर प्रगट की हैं। जवानों को? कदापि नहीं।
"इन्हें" हर प्रकार से "मेरे पास आने दो, और मना न करो।" पापियों को? सबसे कम। "वह धर्मियों को नहीं, परन्तु पापियों को पश्चात्ताप के लिये बुलाने आया।" तो फिर, यदि किसी को छोड़ना है, तो हमें
विश्वास द्वारा उद्धार धनवानों, विद्वानों, प्रतिष्ठित लोगों और नैतिक मनुष्यों को छोड़ना चाहिए। और यह सच है कि वे स्वयं भी प्रायः अपने आप को सुनने से अलग रखते हैं; फिर भी हमें अपने प्रभु के शब्द बोलने ही हैं। क्योंकि हमारे आदेश का सार यही है, "जाकर सारी सृष्टि को सुसमाचार प्रचार करो।" यदि कोई इसे, या इसके किसी भाग को, अपने विनाश के लिये तोड़-मरोड़े, तो उसे अपना बोझ आप उठाना होगा। परन्तु फिर भी, "यहोवा के जीवन की शपथ, जो कुछ यहोवा हमसे कहेगा, वही हम कहेंगे।"
8. इस समय विशेष रूप से हम यह कहेंगे कि "अनुग्रह ही से विश्वास के द्वारा तुम्हारा उद्धार हुआ है": क्योंकि इस शिक्षा को स्थापित रखना कभी भी इतना समयोचित नहीं था जितना आज के दिन है।
हमारे बीच रोमी भ्रम की वृद्धि को प्रभावी रूप से रोकने के लिये इसके सिवाय और कुछ नहीं है। उस कलीसिया की सब भूलों पर एक-एक करके आक्रमण करना अनन्त काम है। परन्तु विश्वास से उद्धार जड़ पर प्रहार करता है, और जहाँ यह स्थापित है वहाँ सब एक साथ गिर पड़ता है। यही वह शिक्षा थी, जिसे हमारा
कलीसिया उचित रूप से मसीही धर्म की दृढ़ चट्टान और नींव कहता है, जिसने पोपवाद को पहले-पहल इन राज्यों से निकाल बाहर किया; और केवल यही उसे बाहर रख सकती है। उस अनैतिकता को रोकने के लिये इसके सिवाय और कुछ नहीं है, जो "बाढ़ के समान देश पर छा गई है।" क्या तुम महासागर को बूँद-बूँद करके खाली कर सकते हो? तब तुम विशेष दुर्गुणों के विरुद्ध उपदेशों से हमारा सुधार कर सकते हो। परन्तु "वह धार्मिकता जो परमेश्वर की ओर से विश्वास के द्वारा है, भीतर लाई जाए, तब उसकी घमण्डी लहरें थम जाएँगी। इसके सिवाय और कुछ उन लोगों का मुँह बन्द नहीं कर सकता जो "अपनी लज्जा पर घमण्ड करते हैं, और उस प्रभु का, जिसने उन्हें मोल लिया, खुले आम इनकार करते हैं।" वे व्यवस्था के विषय में उतनी ही उच्च बातें कर सकते हैं जितनी वह जिसके हृदय में परमेश्वर ने उसे लिखा है। इस विषय पर उन्हें बोलते सुनकर कोई सोच सकता है कि वे परमेश्वर के राज्य से दूर नहीं हैं: परन्तु उन्हें व्यवस्था से सुसमाचार में ले आओ; विश्वास की धार्मिकता से, मसीह से आरम्भ करो, जो "हर एक विश्वास करनेवाले के लिये व्यवस्था का अन्त है;" और जो अभी लगभग, यदि पूरी तरह नहीं तो, मसीही प्रतीत होते थे, वे नाश के पुत्र प्रकट हो जाते हैं; जीवन और उद्धार से उतनी ही दूर (परमेश्वर उन पर दया करे!) जितनी नरक की गहराई स्वर्ग की ऊँचाई से।
9. इसी कारण शत्रु इतना क्रोधित होता है जब भी जगत में "विश्वास से उद्धार" की घोषणा की जाती है: इसी कारण उसने पृथ्वी और नरक को उभारा कि उन्हें नष्ट करे जिन्होंने पहले-पहल इसका प्रचार किया।
और इसी कारण, यह जानते हुए कि केवल विश्वास ही उसके राज्य की नींवें उलट सकता है, उसने अपनी सारी सेनाएँ बुलाईं, और झूठ और निन्दा की अपनी सब चालें लगाईं, कि
मार्टिन लूथर को इसे पुनर्जीवित करने से डराकर रोके। और इसमें हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए; क्योंकि, जैसा कि परमेश्वर के उस जन ने कहा है, "एक घमण्डी, बलवान, सशस्त्र मनुष्य को कितना क्रोध आएगा, जब एक छोटा बालक हाथ में सरकण्डा लिए उसके सामने आए और उसे रोक दे और तुच्छ कर दे!" विशेषकर जब वह जानता था कि वह छोटा बालक निश्चय ही उसे गिरा देगा और उसे पाँवों तले रौंद देगा। हाँ, ऐसा ही हो, प्रभु यीशु! इस प्रकार तेरी सामर्थ सदा "निर्बलता में सिद्ध होती" रही है! तो आगे बढ़, हे छोटे बालक जो उस पर विश्वास करता है, और उसका "दाहिना हाथ तुझे भयानक बातें सिखाएगा!" यद्यपि तू दिनों के शिशु के समान असहाय और निर्बल है, वह बलवान तेरे सामने खड़ा न रह सकेगा।
तू उस पर प्रबल होगा, और उसे वश में करेगा, और उसे गिराएगा और अपने पाँवों तले रौंदेगा। तू अपने उद्धार के महान सेनापति के अधीन "जय करता हुआ और जय पाने को" कूच करेगा, जब तक कि तेरे सब शत्रु नाश न हो जाएँ, और "मृत्यु जय में निगल ली जाए।"
विश्वास द्वारा उद्धार अब परमेश्वर का धन्यवाद हो, जो हमारे प्रभु यीशु मसीह के द्वारा हमें जय देता है; जिसकी, पिता और पवित्र आत्मा के साथ, धन्यवाद, महिमा, बुद्धि, स्तुति, आदर, सामर्थ और शक्ति युगानुयुग होती रहे। आमीन
