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परमेश्वर की दाख की बारी के विषय में "मेरी दाख की बारी के लिये और क्या करना रह गया जो मैं ने उसके लिये न किया हो? फिर जब मैं ने उस से अच्छे अंगूरों की आशा की थी, तो उस में जंगली अंगूर क्यों लगे?"
प्रभु की दाख की बारी, यदि इस शब्द को उसके व्यापकतम अर्थ में लें, तो सारे संसार को समेट सकती है। पृथ्वी के सब निवासियों को किसी अर्थ में "प्रभु की दाख की बारी" कहा जा सकता है; "उसने मनुष्यों की सब जातियों को एक ही मूल से बनाकर सारी पृथ्वी पर बसाया, ताकि वे प्रभु को ढूँढ़ें, कदाचित् टटोलकर उसे पा जाएँ।" परन्तु संकुचित अर्थ में प्रभु की दाख की बारी का आशय मसीही जगत हो सकता है; अर्थात् वे सब जो मसीह का नाम लेते हैं और उसके वचन का पालन करने का दावा करते हैं। और भी संकुचित अर्थ में इसे मसीही कलीसिया के उस भाग के विषय में समझा जा सकता है जिसे सुधारवादी कहा जाता है। सबसे संकुचित अर्थ में कोई इस वाक्यांश, "प्रभु की दाख की बारी", से उन लोगों के समूह को समझ सकता है जो सामान्यतः कहलाते हैं
मेथोडिस्ट। इसी अर्थ में मैं इसे अभी समझता हूँ, और इससे केवल उसी सोसाइटी का आशय लेता हूँ जो सन् 1729 में ऑक्सफ़ोर्ड में आरम्भ हुई और आज तक संगठित है। इस शब्द को इसी अर्थ में समझते हुए मैं वही प्रश्न दोहराता हूँ जो परमेश्वर भविष्यद्वक्ता के सामने रखता है: "मेरी दाख की बारी के लिये और क्या करना रह गया जो मैं ने उसके लिये न किया हो? फिर जब मैं ने उस से अच्छे अंगूरों की आशा की थी, तो उस में जंगली अंगूर क्यों लगे?"
परमेश्वर अपनी इस दाख की बारी में और क्या कर सकता था (मान लें कि उसका प्रयोजन यह था कि वह बड़ी-बड़ी डालियाँ निकाले और पृथ्वी पर फैल जाए), जो उसने उसमें नहीं किया,
I. सिद्धान्त के विषय में?
II. आत्मिक सहायताओं के विषय में?
III. अनुशासन के विषय में? और IV. बाहरी सुरक्षा के विषय में?
इन बातों पर विचार कर लेने के बाद मैं संक्षेप में यह पूछूँगा, "जब उसने आशा की कि वह अंगूर लाए, तो उसमें जंगली अंगूर क्यों लगे?"
I. 1. पहला। इस उसकी दाख की बारी में ऐसा और क्या किया जा सकता था जो परमेश्वर ने उसमें नहीं किया? सिद्धान्त के विषय में और क्या किया जा सकता था? बिलकुल आरम्भ से, उस समय से जब चार युवक एक साथ संगठित हुए, उनमें से हर एक homo unius libri [एक ही पुस्तक का मनुष्य] था, —
"एक ही पुस्तक का मनुष्य।" परमेश्वर ने उन सबको सिखाया कि वे उसके "वचन को अपने पाँवों के लिये दीपक और अपने सब मार्गों के लिये उजियाला" बनाएँ। उनके सब स्वभावों, शब्दों और कार्यों के विषय में उनके पास निर्णय का एक ही नियम था, और केवल एक ही; अर्थात् परमेश्वर के वचन। वे सब के सब बाइबल-मसीही बनने को दृढ़ थे। इसी बात के लिये उनकी निरन्तर निन्दा होती रही; कुछ उन्हें उपहास में बाइबल-कट्टरपन्थी कहते थे; और कुछ बाइबल-पतंगे; वे कहते थे कि ये बाइबल को वैसे ही खाते हैं जैसे पतंगे कपड़े को खाते हैं। और सचमुच, आज तक उनका निरन्तर प्रयास यही है कि वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार सोचें और बोलें।
परमेश्वर की दाख की बारी के विषय में 2. यह सच है कि एक विद्वान पुरुष, डॉ. ट्रैप ने, उनके आरम्भ करने के कुछ ही समय बाद, उनके विषय में बहुत भिन्न वर्णन दिया। डॉक्टर ने कहा, "जब मैं ने ये दो पुस्तकें देखीं, 'मसीही सिद्धता पर निबन्ध' और 'पवित्र जीवन के लिये गम्भीर बुलाहट', तो मैं ने सोचा, ये पुस्तकें निश्चय ही हानि करेंगी। और वैसा ही हुआ; क्योंकि तुरन्त बाद मेथोडिस्ट उठ खड़े हुए। इस प्रकार वे (श्री लॉ) उनके जनक थे।" यद्यपि यह पूरी तरह सच नहीं था, फिर भी इसमें कुछ सच्चाई थी। सभी मेथोडिस्टों ने इन पुस्तकों को ध्यान से पढ़ा और उनसे बहुत लाभ पाया। फिर भी वे किसी भी प्रकार इनसे नहीं उपजे, परन्तु पवित्रशास्त्र से उपजे; वे "परमेश्वर के जीवित और सदा अटल रहनेवाले वचन के द्वारा नया जन्म पाए हुए" थे, जैसा सन्त पतरस कहता है।
3. एक और विद्वान पुरुष, स्वर्गीय बिशप वारबर्टन, साफ़ कहते हैं कि "वे श्री लॉ और काउण्ट ज़िन्ज़ेनडॉर्फ़ दोनों की सन्तान थे।" परन्तु यह इससे भी बड़ी भूल थी। क्योंकि वे कई वर्ष पहले एक साथ मिल चुके थे, इससे पहले कि काउण्ट ज़िन्ज़ेनडॉर्फ़ से उनकी तनिक भी जान-पहचान हुई, या वे यह भी जानते कि संसार में ऐसा कोई व्यक्ति है। और जब वे उन्हें जान गए, तो यद्यपि वे प्रेम में उनका बहुत आदर करते थे, फिर भी उन्होंने पवित्रशास्त्र की अनुमति से एक पग भी आगे उनका अनुसरण करने का साहस नहीं किया।
4. जिस पुस्तक ने पवित्रशास्त्र के बाद, विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के महान विषय में उनका मत स्थिर करने में सबसे अधिक काम दिया, वह होमिलीज़ (उपदेशों) की पुस्तक थी। वे इस बात के विषय में पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुए कि हम केवल विश्वास से ही धर्मी ठहराए जाते हैं, जब तक उन्होंने इनसे ध्यानपूर्वक परामर्श न किया और इनकी तुलना पवित्र लेखों से, विशेषकर सन्त पौलुस की रोमियों की पत्री से, न की। और कलीसिया का कोई भी सेवक शिष्टता के साथ इनका विरोध नहीं कर सकता; क्योंकि अपने अभिषेक के समय उसने कलीसिया की छत्तीसवीं धारा पर हस्ताक्षर करके इन पर हस्ताक्षर किए हैं।
5. यह बात प्रायः देखी गई है कि बहुत थोड़े लोग धर्मी ठहराए जाने और पवित्रीकरण, दोनों के विषय में अपने मत में स्पष्ट थे। बहुतों ने, जिन्होंने धर्मी ठहराए जाने के विषय में अत्यन्त उत्तम रीति से कहा और लिखा, पवित्रीकरण के सिद्धान्त की कोई स्पष्ट धारणा नहीं रखी, वरन् उससे पूरी तरह अनजान थे। केवल विश्वास से धर्मी ठहराए जाने पर मार्टिन लूथर से अधिक सामर्थ्य के साथ किसने लिखा है? और पवित्रीकरण के सिद्धान्त से उनसे अधिक अनजान, या उसके विषय में उनसे अधिक उलझी धारणाओं वाला कौन था? इस बात के पूरे निश्चय के लिये, कि पवित्रीकरण के विषय में वे पूरी तरह अनजान थे, बस इतना ही चाहिए कि बिना पूर्वाग्रह के गलातियों की पत्री पर उनकी प्रसिद्ध टीका को पढ़ लिया जाए। दूसरी ओर, रोमी कलीसिया के कितने ही लेखकों ने (विशेषकर फ़्रांसिस डी सेल्स और हुआन डे कास्तानीज़ा ने) पवित्रीकरण पर सामर्थी और पवित्रशास्त्रीय ढंग से लिखा है, फिर भी वे धर्मी ठहराए जाने के स्वरूप से बिलकुल अनजान थे! यहाँ तक कि ट्रेन्ट की महासभा में उनके सारे धर्मविज्ञानियों ने अपनी Catechismus ad Parochos [पल्ली-पुरोहितों के लिये धर्मशिक्षा] में (यह वह धर्मशिक्षा है जो हर पल्ली-पुरोहित को अपने लोगों को सिखानी है) पवित्रीकरण और धर्मी ठहराए जाने को पूरी तरह एक में मिला दिया है। परन्तु परमेश्वर ने मेथोडिस्टों को दोनों का पूरा और स्पष्ट ज्ञान, और उन दोनों के बीच का बड़ा अन्तर, देने की कृपा की है।
6. वे वास्तव में जानते हैं कि जिस समय मनुष्य धर्मी ठहराया जाता है, उसी समय पवित्रीकरण उचित रूप से आरम्भ होता है। क्योंकि जब वह धर्मी ठहराया जाता है, तब वह "नया जन्म पाता है," "ऊपर से जन्म पाता है," "आत्मा से जन्म पाता है;" जो, यद्यपि (जैसा कुछ लोग मानते हैं) पवित्रीकरण की सारी प्रक्रिया नहीं है, तथापि निस्सन्देह उसका
परमेश्वर की दाख की बारी के विषय में द्वार है। इसका भी परमेश्वर ने उन्हें पूरा दर्शन दिया है। वे जानते हैं कि नया जन्म उस मनुष्य की आत्मा में, जो "आत्मा से जन्मा" है, उतना ही बड़ा परिवर्तन दर्शाता है जितना उसकी देह में तब हुआ था जब वह स्त्री से जन्मा था: केवल बाहरी परिवर्तन नहीं, जैसे मतवालेपन से संयम में, या लूट अथवा चोरी से ईमानदारी में (यह उन लोगों की तुच्छ, नीरस और दयनीय धारणा है जो सच्चे धर्म के विषय में कुछ नहीं जानते); परन्तु एक भीतरी परिवर्तन, सब अपवित्र स्वभावों से सब पवित्र स्वभावों में, — घमण्ड से दीनता में, क्रोधी स्वभाव से नम्रता में, चिड़चिड़ेपन और असन्तोष से धीरज और समर्पण में; एक शब्द में, सांसारिक, इन्द्रियासक्त, शैतानी मन से उस मन में जो मसीह यीशु में था।
7. यह सच है कि एक हाल के अत्यन्त प्रतिष्ठित लेखक अपने विचित्र "पुनर्जन्म पर निबन्ध" में पूरी तरह इसी मान्यता पर चलते हैं कि वह पवित्रीकरण की सारी क्रमिक प्रगति है। नहीं; वह तो केवल पवित्रीकरण की देहली है, उसमें पहला प्रवेश। और जैसे स्वाभाविक जन्म में मनुष्य एक ही बार में जन्म लेता है, और फिर धीरे-धीरे बड़ा और बलवन्त होता जाता है; वैसे ही आत्मिक जन्म में मनुष्य एक ही बार में जन्म लेता है, और फिर धीरे-धीरे आत्मिक कद और बल में बढ़ता है। इसलिये नया जन्म पवित्रीकरण का पहला बिन्दु है, जो पूर्ण दिन तक अधिक से अधिक बढ़ता जा सकता है।
8. तब यह इन लोगों को दिया गया एक बड़ा आशीर्वाद है कि जैसे वे धर्मी ठहराए जाने के विषय में इस प्रकार न सोचते हैं और न बोलते हैं कि पवित्रीकरण का स्थान ले ले, वैसे ही वे पवित्रीकरण के विषय में भी इस प्रकार न सोचते हैं और न बोलते हैं कि धर्मी ठहराए जाने का स्थान ले ले। वे ध्यान रखते हैं कि दोनों को अपने-अपने स्थान पर रखें, और दोनों पर समान बल दें। वे जानते हैं कि परमेश्वर ने इन्हें जोड़ा है, और मनुष्य को इन्हें अलग करना उचित नहीं: इसलिये वे समान उत्साह और परिश्रम से, एक ओर मुफ़्त, पूर्ण और वर्तमान धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त को, और दूसरी ओर मन और जीवन दोनों के सम्पूर्ण पवित्रीकरण को थामे रहते हैं; भीतरी पवित्रता को किसी भी रहस्यवादी जितना, और बाहरी को किसी भी फरीसी जितना दृढ़ता से पकड़े हुए।
9. तब परमेश्वर ने इन लोगों को जो ज्योति दी है, उसके अनुसार मसीही कौन है? वह जो "विश्वास से धर्मी ठहराया जाकर अपने प्रभु यीशु
मसीह के द्वारा परमेश्वर के साथ मेल रखता है;" और साथ ही "नया जन्म पाया हुआ," "ऊपर से जन्मा हुआ," "आत्मा से जन्मा हुआ" है; जो भीतर से शैतान के स्वरूप से बदलकर "परमेश्वर के उस स्वरूप" में आ गया है "जिसमें वह रचा गया था:"
वह जो पवित्र आत्मा के द्वारा, जो उसे दिया गया है, परमेश्वर का प्रेम अपने हृदय में उण्डेला हुआ पाता है; और जिसे यह प्रेम मधुरता से विवश करता है कि वह अपने पड़ोसी, हर मनुष्य, से अपने समान प्रेम करे:
वह जिसने अपने प्रभु से सीखा है कि मन में नम्र और दीन रहे, और हर दशा में सन्तुष्ट रहे:
वह जिसमें वह पूरा मन है, वे सारे स्वभाव हैं, जो मसीह यीशु में भी थे: वह जो अपने कार्यों में हर प्रकार की बुराई से दूर रहता है, और अपनी जीभ से अपराध नहीं करता: वह जो परमेश्वर की सब आज्ञाओं और सब विधियों पर निर्दोष चलता है: वह जो मनुष्यों के साथ अपने सारे व्यवहार में दूसरों के साथ वैसा ही करता है जैसा वह चाहता है कि वे उसके साथ करें; और अपने सारे जीवन और चाल-चलन में, चाहे खाए या पिए, या जो कुछ भी करे, सब कुछ परमेश्वर की महिमा के लिये करता है।
अब, इस उसकी दाख की बारी के लिये परमेश्वर और क्या कर सकता था जो उसने उसमें नहीं किया, सिद्धान्त के विषय में? हमें पूछना है,
परमेश्वर की दाख की बारी के विषय में II. दूसरा, आत्मिक सहायताओं के विषय में ऐसा और क्या किया जा सकता था जो उसने उसमें नहीं किया?
1. आइए, इस विषय पर बिलकुल आरम्भ से विचार करें। दो युवा पादरियों ने, जो किसी भी प्रकार विशेष उल्लेखनीय नहीं थे, मध्य आयु के थे, और जिनका स्वास्थ्य ठीक-ठाक था, यद्यपि बलवान होने से अधिक दुर्बल था, लगभग पचास वर्ष पहले पापियों को पश्चात्ताप के लिये बुलाना आरम्भ किया। कुछ समय तक उन्होंने यह लंदन और उसके आस-पास के अनेक गिरजाघरों में किया। परन्तु दो कठिनाइयाँ उठीं: पहली।
गिरजाघर इतने भर जाते थे कि बहुत-से पल्ली-निवासी भीतर नहीं आ पाते थे। दूसरी।
उन्होंने नए सिद्धान्त सुनाए, — कि हम विश्वास से उद्धार पाते हैं, और कि "बिना पवित्रता के कोई प्रभु को न देखेगा।" इन्हीं कारणों में से किसी एक या दूसरे के कारण उन्हें गिरजाघरों में अधिक समय तक प्रचार करने नहीं दिया गया। तब उन्होंने मूरफ़ील्ड्स, केनिंगटन-कॉमन और अन्य अनेक सार्वजनिक स्थानों में प्रचार किया। उनके प्रचार का फल शीघ्र ही दिखाई दिया। बहुत-से पापी मन और जीवन दोनों में बदल गए। परन्तु ऐसा लगता था कि यह अधिक समय तक नहीं चल सकता; क्योंकि हर कोई स्पष्ट देखता था कि ये प्रचारक शीघ्र ही अपने आप को थका डालेंगे; और कोई पादरी उनकी सहायता करने का साहस नहीं करता था। परन्तु शीघ्र ही एक के बाद एक, यद्यपि अभिषिक्त नहीं थे, उनकी सहायता करने को आगे आए। परमेश्वर ने उनके वचन पर विशेष आशीष दी। बहुत-से पापी पाप के विषय में पूरी तरह कायल हुए, और बहुत-से सचमुच परमेश्वर की ओर फिरे। उनके सहायक संख्या में भी और अपने परिश्रम की सफलता में भी बढ़ते गए। उनमें से कुछ विद्वान थे; कुछ अविद्वान। अधिकतर युवा थे; कुछ मध्य आयु के। उनमें से कुछ दुर्बल थे; कुछ, इसके विपरीत, असाधारण रूप से प्रबल बुद्धि के। परन्तु परमेश्वर ने सबको अपनाना चाहा; यहाँ तक कि अधिक से अधिक लोग जलती आग में से निकाले गए।
2. यह देखा जा सकता है कि इन पादरियों के पास इस सारे समय कोई योजना बिलकुल नहीं थी। वे केवल इधर-उधर जाते रहे, जहाँ कहीं उन्हें प्राणों को मृत्यु से बचाने की आशा दिखती थी। परन्तु जब अधिक से अधिक लोगों ने पूछा, "उद्धार पाने के लिये मुझे क्या करना चाहिए?" तो उनसे कहा गया कि सब एक साथ मिला करें।
पहले बृहस्पतिवार की रात बारह आए; अगले में चालीस; शीघ्र ही सौ। और वे बढ़ते गए, यहाँ तक कि तीन-चार और बीस वर्ष पहले लंदन की सोसाइटी लगभग 2,800 की हो गई।
3. "परन्तु इस इतनी बड़ी भीड़ को एक साथ कैसे रखा जाए? और यह कैसे जाना जाए कि वे अपने दावे के योग्य चलते हैं?" जब वे किसी और बात पर विचार कर रहे थे, अर्थात् सार्वजनिक ऋण चुकाने पर, तब उन्हें परमेश्वर की व्यवस्था से यह मार्ग मिला कि सब लोगों को उनके निवास-स्थानों के अनुसार छोटी-छोटी टोलियों, या वर्गों, में बाँट दिया जाए, और हर वर्ग में एक व्यक्ति ठहराया जाए जो प्रति सप्ताह बाकी सबसे मिले। इस उपाय से शीघ्र ही पता चल जाता था कि उनमें से कोई किसी ज्ञात पाप में तो नहीं जी रहा। यदि वे जी रहे होते, तो पहले उन्हें चेतावनी दी जाती; और जब वे सुधारे न जा सकनेवाले ठहरते, तो सोसाइटी से निकाल दिए जाते।
4. लोगों का यह विभाजन, और अव्यवस्थित चलनेवालों का, बिना किसी के पक्षपात के, निकाला जाना, ऐसी सहायताएँ थीं जो बहुत कम अन्य समुदायों के पास थीं। जैसे-जैसे सोसाइटियाँ बढ़ीं, इनमें शीघ्र ही एक और जोड़ी गई। हर क्षेत्र की सोसाइटियों के भण्डारियों से कहा गया कि वे प्रति तिमाही किसी केन्द्रीय स्थान पर प्रचारकों से मिलें, और अपनी-अपनी सोसाइटियों की आत्मिक और सांसारिक दशा का लेखा दें। इन तिमाही सभाओं की उपयोगिता
परमेश्वर की दाख की बारी के विषय में शीघ्र ही अत्यन्त बड़ी पाई गई; इसी कारण वे धीरे-धीरे राज्य की सब सोसाइटियों में फैला दी गईं।
5. प्रचारकों के बीच, और साथ ही लोगों के बीच, एकता बढ़ाने के लिये उनसे कहा गया कि सब एक साथ लंदन में मिलें; और कुछ समय बाद उनमें से चुने हुए कुछ। फिर, अधिक सुविधा के लिये, वे बारी-बारी से लंदन, ब्रिस्टल और लीड्स में मिलने लगे।
वे इस साधारण सम्मेलन में कुछ दिन एक साथ बिताते थे, यह विचार करते हुए कि सर्वसाधारण की भलाई के लिये सबसे अधिक क्या सहायक होगा। उसका परिणाम तुरन्त उनके सब भाइयों को बता दिया जाता था। और उन्होंने शीघ्र ही पाया कि जो बात सन्त पौलुस सारी कलीसिया के विषय में कहता है, वह कुछ अंश में उसके हर भाग पर लागू हो सकती है: "सारी देह हर एक जोड़ की सहायता से एक साथ जुड़कर और गठकर, अपने आप को प्रेम में बढ़ाती है और उसकी उन्नति होती है।" (इफिसियों 4:6।) 6. इसे और भी प्रभावशाली रीति से करने के लिये उनके पास एक और उत्तम सहायता है, प्रचारकों का निरन्तर बदला जाना; उनका नियम है कि कोई प्रचारक एक ही सर्किट में लगातार दो वर्ष से अधिक न रहे, और उनमें से बहुत कम एक वर्ष से अधिक रहते हैं। कुछ ने सचमुच यह मान लिया है कि यह परमेश्वर के कार्य में बाधा है: परन्तु राज्य के हर भाग में लम्बे अनुभव ने इसके विपरीत सिद्ध किया है। इसने सदा यह दिखाया है कि लोगों को किसी एक व्यक्ति से उतना लाभ नहीं होता जितना प्रचारकों की विविधता से; जबकि वे
हर एक को दिए गए वरदानों का उपयोग करते हैं, जो परमेश्वर की कला से सन्तुलित हैं।
7. इन सहायताओं के साथ, जो उनकी अपनी सोसाइटी की विशेषता हैं, उन्हें वे सब भी प्राप्त हैं जिनका आनन्द इंग्लैंड के कलीसिया के अन्य सदस्य मिलकर उठाते हैं। सचमुच, उन पर बहुत समय से उससे अलग हो जाने का दबाव डाला जाता रहा है; जिसके लिये उन्हें हर प्रकार की परीक्षाएँ मिली हैं। परन्तु वे नहीं कर सकते, वे साहस नहीं करते, वे नहीं करेंगे, उससे अलग होना, जब तक वे उसमें शुद्ध विवेक के साथ रह सकते हैं। यह सच है कि यदि सहभागिता की कोई पापमय शर्तें उन पर लादी जातीं, तो वे अलग होने को विवश हो जाते; परन्तु जब इस समय ऐसा नहीं है, तो हम उसमें बने रहने में आनन्दित हैं।
8. तब इस उसकी दाख की बारी के लिये परमेश्वर और क्या कर सकता था जो उसने उसमें नहीं किया, आत्मिक सहायताओं के विषय में? उसने मसीही जगत में किसी अन्य लोगों से शायद ही ऐसा व्यवहार किया है। यदि यह कहा जाए, "वह उन्हें मोरावियन भाइयों के समान एक अलग लोग बना सकता था;" तो मैं उत्तर देता हूँ, यह उनके उठाए जाने के उसके सारे प्रयोजन का सीधा खण्डन होता; अर्थात् पूरे देश में, हर सम्प्रदाय के लोगों के बीच, पवित्रशास्त्रीय धर्म फैलाना, और हर एक को अपने मत पर बने रहने और अपनी उपासना-पद्धति पर चलने के लिये छोड़ देना। यह प्रभावशाली रीति से केवल तभी हो सकता था जब इन बातों को जैसा वे थीं वैसा ही रहने दिया जाए, और सारे राष्ट्र को उस "विश्वास" के खमीर से, "जो प्रेम के द्वारा कार्य करता है," खमीरा करने का प्रयत्न किया जाए।
III. 1. ऐसी आत्मिक सहायताएँ हैं जो परमेश्वर ने अपनी इस दाख की बारी को खुले हाथ से दी हैं। अनुशासन को इन्हीं में गिना जा सकता था; परन्तु हम परमेश्वर की दाख की बारी के विषय में उसके विषय में अलग शीर्षक के अन्तर्गत भी कह सकते हैं। यह निश्चित है कि इस विषय में मेथोडिस्ट अत्यन्त कृपापात्र लोग हैं।
मेथोडिस्ट अनुशासन से अधिक सरल, उससे अधिक विवेकपूर्ण कुछ नहीं हो सकता: यह पूरी तरह सामान्य बुद्धि पर आधारित है, और विशेष रूप से पवित्रशास्त्र के सामान्य नियमों को लागू करता है।
कोई भी व्यक्ति जो अपने प्राण को बचाने के लिये दृढ़ हो, उनके साथ जुड़ सकता है (केवल यही एक शर्त है)। परन्तु यह इच्छा तीन चिह्नों से प्रमाणित होनी चाहिए: सब ज्ञात पाप से बचना; अपनी सामर्थ्य भर भलाई करना; और परमेश्वर की सब विधियों में उपस्थित रहना। तब उसे ऐसे वर्ग में रखा जाता है जो उसके लिये सुविधाजनक हो, जहाँ वह सप्ताह में लगभग एक घण्टा बिताता है। और अगली तिमाही में, यदि उस पर कोई आपत्ति न हो, तो वह सोसाइटी में प्रवेश पाता है: और उसमें वह तब तक बना रह सकता है जब तक वह अपने भाइयों से मिलता रहता है और अपने दावे के अनुसार चलता है।
2. उनकी सार्वजनिक सभा प्रातः पाँच बजे, और सायं छह या सात बजे होती है, ताकि उनके सांसारिक काम में बाधा न पड़े। केवल रविवार को वह नौ और दस के बीच आरम्भ होती है, और प्रभु-भोज पर समाप्त होती है। रविवार की सन्ध्या को सोसाइटी मिलती है; परन्तु ध्यान रखा जाता है कि उन्हें जल्दी विदा कर दिया जाए, ताकि परिवारों के सब मुखियाओं को अपने-अपने घरानों को सिखाने का समय मिले। प्रति तिमाही हर सर्किट का प्रमुख प्रचारक उसकी सोसाइटियों के हर सदस्य की जाँच करता है। इस उपाय से, यदि किसी का आचरण दोषपूर्ण हो, जिसकी इतने बड़े समूह में प्रायः आशा की जा सकती है, तो वह सरलता से पकड़ में आ जाता है, और समय रहते या तो अपराध या अपराधी हटा दिया जाता है।
3. जब कभी किसी अव्यवस्थित सदस्य को सोसाइटी से निकालना आवश्यक हो, तो यह अत्यन्त शान्त और अनाक्रामक रीति से किया जाता है; केवल तिमाही निरीक्षण में उसका टिकट नवीन न करके। परन्तु कुछ मामलों में, जहाँ अपराध बड़ा है और सार्वजनिक कलंक का खतरा है, यह आवश्यक समझा जाता है कि जब सब सदस्य उपस्थित हों तब घोषणा की जाए, "क. ख. अब हमारी सोसाइटी का सदस्य नहीं है।" अब, इस सरल अनुशासन से अधिक विवेकपूर्ण या पवित्रशास्त्रीय क्या हो सकता है; जिसके साथ आरम्भ से अन्त तक न कोई कष्ट है, न खर्च, न देरी?
IV. 1. परन्तु क्या यह सम्भव था कि ये सब बातें बिना विरोध की बाढ़ के हो जातीं? इस संसार का सरदार न मरा था, न सोया था: और क्या वह लड़ता नहीं कि उसका राज्य सौंप न दिया जाए? यदि प्रेरित का वचन सब युगों और जातियों में सच पाया जाता है, "जितने मसीह यीशु में भक्ति के साथ जीवन बिताना चाहते हैं वे सब सताए जाएँगे;" यदि यह हर अकेले मसीही के विषय में सच है, तो उन मनुष्यों के समूहों के विषय में कितना अधिक, जो उसके राज्य को उलट देने के खुले उद्देश्य से दृश्य रूप में एक साथ जुड़े हैं! और वह उस सताव को, जो वह एक दीन, असहाय, तुच्छ ठहराए गए लोगों के विरुद्ध, जिनके पास कोई दृश्य सहायता नहीं, न धन, न शक्ति, न मित्र, अवश्य भड़काता, कौन रोक सकता?
2. सच तो यह है कि इस संसार का ईश्वर सोया नहीं था। न ही वह निष्क्रिय था। वह लड़ा, और अपनी सारी शक्ति से लड़ा, कि उसका राज्य सौंप न दिया जाए। उसने "अपनी सारी सेनाएँ युद्ध के लिये निकालीं।" पहले। उसने लोगों में के पशुओं को उभारा। वे सिंहों की नाईं गरजे; उन्होंने छोटे और असहाय लोगों को चारों ओर से घेर लिया। और आँधी ऊँची से ऊँची उठती गई, जब तक छुटकारा ऐसी रीति से न आया जिसकी किसी को आशा नहीं थी। परमेश्वर ने हमारे स्वर्गीय कृपालु
सम्राट् के मन को उभारा कि वह अपने न्यायाधीशों को ऐसे आदेश दे जो, कार्यान्वित होने पर, लोगों के उन्माद को प्रभावशाली रीति से शान्त कर दें। उसी समय के लगभग एक बड़े व्यक्ति ने स्वयं जाकर
परमेश्वर की दाख की बारी के विषय में महामहिम से विनती की कि वे कृपा करके "इन घुमक्कड़ प्रचारकों को रोकने का उपाय करें।" महामहिम ने उसकी ओर कठोर दृष्टि से देखते हुए, बिना औपचारिकता के, एक राजा की नाईं उत्तर दिया,
"मैं तुमसे कहता हूँ, जब तक मैं सिंहासन पर बैठा हूँ, किसी मनुष्य को विवेक के कारण नहीं सताया जाएगा।"
3. परन्तु इसकी अवहेलना करके, महामहिम के अधिकार-पत्र को धारण करनेवाले कई लोगों ने समय-समय पर उन्हें सताया है; और वह भी विधि की आड़ में; उस विधि का लाभ उठाते हुए जिसे कॉन्वेन्टिकल एक्ट कहा जाता है: विशेष रूप से केन्ट में एक व्यक्ति ने, जिसने कुछ वर्ष पहले एक प्रचारक और उसके कई सुननेवालों पर जुर्माना लगाने का साहस किया। परन्तु उन्होंने महामहिम के किंग्स बेंच न्यायालय में अपील करना अपना कर्तव्य समझा। मुक़द्दमा वादियों के पक्ष में दिया गया; और तब से उन्हें अपने विवेक के अनुसार परमेश्वर की उपासना करने की अनुमति रही है।
4. मेरा विश्वास है कि यह बात पूरी तरह बेमिसाल है। मुझे कलीसिया के किसी युग में, पिन्तेकुस्त के दिन से आज तक, इसका कोई दूसरा उदाहरण नहीं मिलता। हर मत, सही और ग़लत, लगभग हर युग और जाति में सहा गया है। उपासना की हर पद्धति सही गई है, चाहे वह कितनी ही अन्धविश्वासी या बेतुकी हो। परन्तु मैं नहीं जानता कि सच्चे, जीवित, पवित्रशास्त्रीय धर्म को पहले कभी सहा गया हो। इसके लिये मेथोडिस्ट कहलानेवाले लोगों के पास
परमेश्वर की स्तुति करने के भरपूर कारण हैं। उनके पक्ष में उसने पृथ्वी पर एक नई बात की है: उसने शत्रु और बदला लेनेवाले को चुप करा दिया है। इसलिये उन्हें इसे उसी के नाम करना चाहिए, जो उनकी बाहरी और भीतरी शान्ति का कर्ता है।
V. 1. सचमुच परमेश्वर इस उसकी दाख की बारी के लिये और क्या कर सकता था जो उसने उसमें नहीं किया? यह विस्तार से दिखाया जा चुका; अब हम उस सशक्त और कोमल उलाहने की ओर बढ़ सकते हैं: "जो कुछ मैं ने किया उस सबके बाद, क्या मैं सर्वोत्तम अंगूरों की आशा नहीं कर सकता था? तो फिर उसमें जंगली अंगूर क्यों लगे? क्या मैं विश्वास और प्रेम की, धार्मिकता और सच्ची पवित्रता की, वरन् आत्मा के फल की, — प्रेम, आनन्द, मेल, धीरज, कृपा, भलाई, विश्वासयोग्यता, नम्रता, संयम की — सामान्य वृद्धि की आशा नहीं कर सकता था?" क्या यह आशा करना उचित नहीं था कि ये फल उसकी सारी
कलीसिया में फैल जाते? सचमुच, जब मैं ने देखा कि चालीस और पचास वर्ष पहले परमेश्वर ने अपने लोगों के बीच क्या किया था; जब मैं ने उन्हें अपने पहले प्रेम में उत्साही, प्रभु की बड़ाई करते और अपने उद्धारकर्ता परमेश्वर में आनन्दित होते देखा; तो मैं इससे कम कुछ आशा नहीं कर सकता था कि वे सब यहाँ नीचे स्वर्गदूतों के समान जिएँगे; कि वे उसे जो अदृश्य है निरन्तर देखते हुए चलेंगे; पिता और पुत्र के साथ निरन्तर सहभागिता रखते हुए, अनन्तता में जीते और अनन्तता में चलते हुए।
मैं आशा रखता था कि अपने सारे चाल-चलन में वे "चुनी हुई जाति, राजकीय याजकों का समाज, पवित्र लोग और परमेश्वर की निज प्रजा" दिखाई देंगे; और "उसके गुण प्रगट करेंगे, जिसने उन्हें अन्धकार में से अपनी अद्भुत ज्योति में बुलाया है।"
2. परन्तु इसके स्थान पर, उसमें जंगली अंगूर लगे, — बिलकुल विपरीत प्रकृति का फल।
उसमें दस हज़ार रूपों में भ्रम उत्पन्न हुआ, जिसने बहुत-से सरल लोगों को मार्ग से भटका दिया।
उसमें उन्मादवाद उत्पन्न हुआ, काल्पनिक प्रेरणा, जिसने सर्वज्ञानी परमेश्वर पर एक उत्तेजित कल्पना के सारे उद्दण्ड, बेतुके, स्वयं-विरोधी स्वप्न आरोपित किए। उसमें घमण्ड उत्पन्न हुआ, जिसने हर अच्छे वरदान के दाता को उसके नाम के योग्य आदर से वंचित किया। उसमें पूर्वाग्रह, बुरी शंका, दोष-दृष्टि, एक-दूसरे पर दोष लगाना और दण्ड ठहराना उत्पन्न हुआ; — ये सब पूरी तरह उस
परमेश्वर की दाख की बारी के विषय में भाईचारे के प्रेम के विनाशक हैं जो मसीही दावे का सच्चा चिह्न है; जिसके बिना जो कोई जीता है वह परमेश्वर के सामने मरा हुआ गिना जाता है। उसमें क्रोध, घृणा, द्वेष, बदला, और हर बुरा वचन और कर्म उत्पन्न हुआ; — सब भयंकर फल, पवित्र आत्मा के नहीं, परन्तु अथाह कुण्ड के!
3. उसमें बहुतों में, विशेषकर उनमें जो धन में बढ़ गए हैं, प्राणों का वह महान विष, संसार का प्रेम, भी उत्पन्न हुआ; और वह भी अपनी सब शाखाओं सहित: "शरीर की अभिलाषा;" अर्थात् इन्द्रिय-सुखों में आनन्द खोजना; — "आँखों की अभिलाषा;" अर्थात् पहनावे में, या कल्पना के किसी भी सुख में आनन्द खोजना; — और "जीविका का घमण्ड;" अर्थात् मनुष्यों की प्रशंसा में, या उसमें जो इन सबकी सेवा करता है, पृथ्वी पर धन जमा करके आनन्द खोजना। उसमें हर प्रकार की स्वेच्छाचारिता, नाज़ुकपन, स्त्रैणता, कोमलता उत्पन्न हुई; परन्तु वह कोमलता सही प्रकार की नहीं जो मनुष्य के दुःख पर पिघलती है। उसमें ऐसी नीच, भूमि पर रेंगनेवाली लालसाएँ, ऐसी गहरी सांसारिकता उत्पन्न हुई, जैसी बेचारे अन्यजातियों की थी, जिसके कारण उनके अपने कवि ने उन पर विलाप किया, — O curvae in terras animae et coelestium inanes! [हे पृथ्वी की ओर झुकी हुई और स्वर्गीय बातों से रिक्त आत्माओ!] — "हे पृथ्वी की ओर झुकी हुई और परमेश्वर से रिक्त आत्माओ!"
4. हे धन के स्वामियो, एक बार फिर प्रभु का वचन सुनो! तुम जो इस संसार में धनी हो, जिनके पास खाने को भोजन, पहनने को वस्त्र, और कुछ बचा हुआ भी है, क्या तुम संसार से प्रेम करने के शाप से मुक्त हो? क्या तुम अपने खतरे को समझते हो? क्या तुम अनुभव करते हो, "धनवानों को परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना कैसा कठिन है?" क्या तुम आग के बीच में अनजले बने रहते हो? क्या तुम संसार के प्रेम से अछूते हो? क्या तुम शरीर की अभिलाषा, आँखों की अभिलाषा और जीविका के घमण्ड से मुक्त हो? क्या तुम भोजन करने बैठते समय "अपने गले पर छुरी रखते हो," कि कहीं तुम्हारी मेज़ तुम्हारे लिये फन्दा न बन जाए? क्या तुम्हारा पेट तुम्हारा ईश्वर नहीं है? क्या खाना-पीना, या इन्द्रियों का कोई और सुख, तुम्हारा सबसे बड़ा सुख नहीं है? क्या तुम पहनावे, साज-सामान, चित्रों, बगीचों, या आँख को भानेवाली किसी भी और वस्तु में आनन्द नहीं खोजते? क्या तुम नाज़ुक और कोमल नहीं होते जा रहे; ठण्ड, गर्मी, हवा या वर्षा सहने में असमर्थ, जैसे तुम तब सह लेते थे जब तुम निर्धन थे? क्या तुम धन में बढ़ते हुए पृथ्वी पर धन जमा नहीं कर रहे; परमेश्वर को कंगालों में लौटाने के बदले, इतना या उतना नहीं, परन्तु वह सब जो तुम बचा सकते हो? निश्चय ही, "सूई के नाके में से ऊँट का निकल जाना धनवान के परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करने से सहज है!"
5. परन्तु तुम अब भी जंगली अंगूर क्यों लाते हो? तुम क्या बहाना कर सकते हो? क्या परमेश्वर की ओर से कोई कमी रही? क्या तुम्हें बार-बार चेतावनी नहीं दी गई? क्या तुम्हें "वचन का निर्मल दूध" नहीं पिलाया गया? क्या परमेश्वर का सारा वचन तुम्हें बिना किसी भ्रम की मिलावट के नहीं सौंपा गया? क्या मुफ़्त, पूर्ण और वर्तमान धर्मी ठहराए जाने के मूल सिद्धान्त, और साथ ही क्रमिक और तात्कालिक दोनों प्रकार के पवित्रीकरण के सिद्धान्त, तुम्हें नहीं सौंपे गए? क्या भीतरी और बाहरी पवित्रता की हर शाखा स्पष्ट रूप से खोली और गम्भीरता से लागू नहीं की गई; और वह भी हर प्रकार के प्रचारकों द्वारा, युवा और वृद्ध, विद्वान और अविद्वान?
परन्तु यह अच्छा है यदि तुम में से कुछ ने उन सहायताओं को तुच्छ न जाना हो जो परमेश्वर ने तुम्हारे लिये तैयार की थीं।
शायद तुम पादरियों के सिवा किसी की न सुनते; या कम से कम विद्वानों के सिवा किसी की नहीं। तो क्या तुम परमेश्वर को अपने दूत चुनने की अनुमति नहीं दोगे? कि जिसके हाथ चाहे भेजे?
यह अच्छा है यदि यह बुरी बुद्धि तुम्हारे जंगली अंगूर लाने का एक कारण न रही हो!
6. क्या इसका एक और कारण यह नहीं था कि तुमने उस उत्कृष्ट सहायता, किसी मसीही सोसाइटी के साथ एकता, को तुच्छ जाना? क्या तुमने यह नहीं पढ़ा, "अकेला कैसे गर्म हो सकता है?" और, "हाय उस पर जो अकेला हो और गिर पड़े?" परन्तु तुम्हारे पास साथी तो बहुत हैं। शायद आवश्यकता से अधिक; उनसे अधिक जो तुम्हारे प्राण के लिये सहायक हैं। परन्तु क्या तुम्हारे पास ऐसे साथी पर्याप्त हैं जो परमेश्वर के प्यासे हैं, और तुम्हें वैसा बनाने का परिश्रम करते हैं? क्या तुम्हारे पास ऐसे साथी पर्याप्त हैं जो तुम्हारे प्राण की रखवाली करते हैं, उनके समान जिन्हें लेखा देना है; और यदि तुम कोई गलत पग उठाओ, या ऐसा करने के संकट में हो, तो खुलकर और विश्वासयोग्यता से तुम्हें चेतावनी देते हैं? मुझे भय है कि तुम्हारे पास ऐसे साथी थोड़े हैं, नहीं तो तुम उत्तम फल लाते!
7. यदि तुम सोसाइटी के सदस्य हो, तो क्या तुम अपने विशेषाधिकार का पूरा उपयोग करते हो? क्या तुम कभी अपने वर्ग में आना नहीं चूकते; और वह भी केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, परन्तु इस आशा के साथ कि जब तुम उसके नाम में इकट्ठे होते हो तो तुम्हारा प्रभु तुम्हारे बीच में होगा? क्या तुम उस अद्भुत विवेक-स्वतन्त्रता के लिये सचमुच कृतज्ञ हो जो तुम्हें और तुम्हारे भाइयों को दी गई है; ऐसी जैसी तुम्हारी परिस्थिति के लोगों को पहले कभी नहीं मिली? और क्या तुम सच्चे धर्म के सामान्य प्रसार के लिये हर अच्छे वरदान के दाता के प्रति कृतज्ञ हो? निश्चय ही, तुम इन सब आशीषों के लिये, जो तुम पर इतनी प्रचुरता से बरसाई गई हैं, कभी
परमेश्वर की स्तुति पर्याप्त नहीं कर सकते, जब तक तुम स्वर्गदूतों और प्रधान स्वर्गदूतों और स्वर्ग की सारी मण्डली के साथ उसकी स्तुति न करो!
