पुस्तक IV · अध्याय 20

नागरिक शासन (भाग 1/2)

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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नागरिक शासन (भाग 1/2)

अध्याय 20।

नागरिक शासन के विषय में।

इस अध्याय के दो प्रधान भाग हैं।—I. नागरिक शासन की आवश्यकता, गरिमा और उपयोगिता पर सामान्य चर्चा, पुनर्बपतिस्मावादियों (एनाबैप्टिस्टों) की उन्मत्त कार्यवाहियों के विरोध में, खण्ड 1-3। II. नागरिक शासन जिन तीन प्रमुख अंगों से बना है, उनकी विशेष व्याख्या, खण्ड 4-32। पहला अंग दण्डाधिकारियों के कार्य का वर्णन करता है, जिनका अधिकार और बुलाहट प्रमाणित की गई है, खण्ड 4-7। इसके बाद नागरिक शासन के तीन रूप जोड़े गए हैं, खण्ड 8। तीसरे, भक्ति और धार्मिकता की दृष्टि से नागरिक दण्डाधिकारी के पद पर विचार। यहाँ पुरस्कार और दण्ड की चर्चा है—अर्थात् दोषियों को दण्ड देना, निर्दोषों की रक्षा करना, उपद्रवियों को दबाना, शान्ति और युद्ध के कार्यों का संचालन, खण्ड 9-13। दूसरा अंग व्यवस्थाओं (कानूनों) का वर्णन करता है—उनकी उपयोगिता, आवश्यकता, रूप, अधिकार, गठन और विस्तार, खण्ड 14-16। अन्तिम अंग प्रजा से सम्बन्ध रखता है, और मसीहियों के सामान्य समाज के लिए व्यवस्थाओं, न्यायालयों और दण्डाधिकारियों के उपयोग को समझाता है, खण्ड 17-21। साधारण जन दण्डाधिकारियों के प्रति जो आदर रखें, और आज्ञाकारिता कहाँ तक निभाई जाए, खण्ड 22-32।

खण्ड।

1. सम्पूर्ण ग्रन्थ का अन्तिम भाग, जो नागरिक शासन की स्थापना से सम्बन्ध रखता है। इस पर विचार करना आवश्यक है। 1. पुनर्बपतिस्मावादियों का खण्डन करने के लिए। 2. राजाओं की चापलूसी करनेवालों का खण्डन करने के लिए। 3. परमेश्वर के प्रति हमारी कृतज्ञता जगाने के लिए। नागरिक शासन मसीही स्वतंत्रता के विरुद्ध नहीं है। नागरिक शासन को मसीह के आत्मिक राज्य से अलग समझना चाहिए।

2. पुनर्बपतिस्मावादियों की आपत्तियाँ। 1. कि नागरिक शासन मसीही मनुष्य के योग्य नहीं है। 2. कि वह मसीही धर्म-अंगीकार के सर्वथा विपरीत है। उत्तर।

3. उत्तर की पुष्टि। चर्चा तीन शीर्षकों में सीमित की गई। 1. व्यवस्थाओं की। 2. दण्डाधिकारियों की। 3. प्रजा की।

4. दण्डाधिकारियों का पद परमेश्वर का ठहराया हुआ है। 1. वे ईश्वर कहलाते हैं। 2. वे परमेश्वर की बुद्धि से नियुक्त हैं। भक्त दण्डाधिकारियों के उदाहरण।

5. नागरिक शासन परमेश्वर ने यहूदियों के लिए ठहराया था, मसीहियों के लिए नहीं। इस आपत्ति का उत्तर।

6. दण्डाधिकारियों की नियुक्ति का ईश्वरीय ठहराव। इसका स्वयं दण्डाधिकारियों पर क्या प्रभाव होना चाहिए।

7. यह विचार पुनर्बपतिस्मावादियों के उन्माद को रोके।

8. नागरिक शासन के तीन रूप—राजतन्त्र, कुलीनतन्त्र, लोकतन्त्र। निरपेक्ष रूप से यह कह पाना असम्भव है कि कौन-सा सर्वोत्तम है।

9. दण्डाधिकारियों के कर्त्तव्य के विषय में। उनकी पहली चिन्ता मसीही धर्म और सच्ची भक्ति की रक्षा हो। इसका प्रमाण।

10. इस मत पर पुनर्बपतिस्मावादियों की आपत्तियाँ। इनका उत्तर।

11. युद्ध की वैधता।

12. इस आपत्ति का उत्तर कि पवित्रशास्त्र में युद्ध की वैधता नहीं सिखाई गई।

13. कर लगाने और राजस्व जुटाने का अधिकार।

14. व्यवस्थाओं के विषय में, उनकी आवश्यकता और उपयोगिता। मूसा की नैतिक, रीति-विधि सम्बन्धी और न्याय-सम्बन्धी व्यवस्था में भेद।

15. नैतिक व्यवस्था का सार और उद्देश्य। रीति-विधि सम्बन्धी और न्याय-सम्बन्धी व्यवस्था के विषय में। निष्कर्ष।

16. सब व्यवस्थाएँ न्यायसंगत होनी चाहिए। मूसा की नागरिक व्यवस्था; वह कहाँ तक लागू है और कहाँ तक रद्द हो चुकी है।

17. प्रजा के विषय में, और व्यक्तियों के सम्बन्ध में व्यवस्थाओं के उपयोग के विषय में।

18. मुकदमेबाज़ी कहाँ तक वैध है।

19. उन पुनर्बपतिस्मावादियों का खण्डन जो सब न्यायिक कार्यवाहियों की निन्दा करते हैं।

20. आपत्ति कि मसीह हमें बुराई का सामना करने से मना करता है। उत्तर।

21. आपत्ति कि पौलुस मुकदमों की सर्वथा निन्दा करता है। उत्तर।

22. दण्डाधिकारियों के प्रति आदर और आज्ञाकारिता के विषय में।

23. इसी विषय की निरन्तरता।

24. अत्याचारियों के प्रति कहाँ तक अधीनता उचित है।

25. इसी की निरन्तरता।

26. पवित्रशास्त्र से प्रमाण।

27. प्रमाण की निरन्तरता।

28. आपत्तियों का उत्तर।

29. अत्याचार के अधीन अधीरता को रोकने के लिए विचार।

30. विचारों पर पुनर्विचार।

31. साधारण जनों द्वारा दी जानेवाली सामान्य अधीनता।

32. आज्ञाकारिता केवल उसी सीमा तक उचित है जहाँ तक वह परमेश्वर के वचन से मेल खाती हो।

1. यह दिखा चुकने के बाद कि मनुष्य में दो प्रकार का शासन है, और उस शासन पर पूरी रीति से विचार कर चुकने के बाद जो आत्मा अर्थात् भीतरी मनुष्य में स्थित होकर अनन्त जीवन से सम्बन्ध रखता है, अब हमें दूसरे के विषय में कुछ कहना है, जो केवल नागरिक संस्थाओं और आचरण के बाहरी नियमन से सम्बन्ध रखता है। क्योंकि यद्यपि यह विषय अपने स्वभाव से विश्वास की उस आत्मिक शिक्षा से असम्बद्ध प्रतीत होता है जिसे बताने का मैंने बीड़ा उठाया है, फिर भी आगे बढ़ने पर दिखाई देगा कि मैंने इन्हें उचित रीति से जोड़ा है; बल्कि मुझे ऐसा करना ही पड़ता है, विशेषकर इसलिए कि एक ओर उन्मत्त और असभ्य लोग परमेश्वर की ठहराई हुई व्यवस्था को उलट देने के लिए क्रोध से भरे प्रयत्न कर रहे हैं, और दूसरी ओर राजाओं के चापलूस उनकी सत्ता की बेहिसाब बड़ाई करते हुए उसे परमेश्वर के शासन के सामने खड़ा करने में भी नहीं हिचकिचाते। यदि हम इन दोनों छोरों का सामना न करें, तो विश्वास की शुद्धता नष्ट हो जाएगी। इसके अतिरिक्त, यह जानना भी हमारे लिए कम महत्त्व की बात नहीं कि परमेश्वर ने यहाँ मानव-जाति की कैसी कृपापूर्वक चिन्ता की है, ताकि भक्ति की उत्कण्ठा हमें अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए और अधिक प्रेरित करे। और पहले, इससे पहले कि हम विषय में प्रवेश करें, उस भेद पर ध्यान देना आवश्यक है जो हम पहले ठहरा चुके हैं (पुस्तक 3 अध्याय 19 खण्ड 16, और ऊपर, अध्याय 10), ऐसा न हो कि जैसा बहुतों के साथ प्रायः होता है, हम असावधानी से इन दो बातों को, जिनका स्वभाव सर्वथा भिन्न है, गड़बड़ा दें। क्योंकि कुछ लोग यह सुनकर कि सुसमाचार में स्वतंत्रता की प्रतिज्ञा की गई है—ऐसी स्वतंत्रता जो मनुष्यों में न किसी राजा को मानती है न किसी दण्डाधिकारी को, परन्तु केवल मसीह की ओर देखती है—यह सोचते हैं कि जब तक अपने ऊपर कोई सत्ता ठहरी देखते हैं, तब तक वे अपनी स्वतंत्रता का कोई लाभ नहीं उठा सकते। इसलिए वे समझते हैं कि जब तक सारा संसार नए रूप में न बदल जाए, तब तक कुछ भी सुरक्षित नहीं, जब न तो न्यायालय होंगे, न व्यवस्थाएँ, न दण्डाधिकारी, और न ऐसी कोई वस्तु जो उनके विचार में उनकी स्वतंत्रता में बाधा डाले। परन्तु जो शरीर और आत्मा के बीच, इस वर्तमान क्षणभंगुर जीवन और उस भावी तथा अनन्त जीवन के बीच भेद करना जानता है, उसे यह समझने में कोई कठिनाई न होगी कि मसीह का आत्मिक राज्य और नागरिक शासन एक-दूसरे से बहुत दूर की बातें हैं। इसलिए, जब मसीह के राज्य को इस संसार की आदि-शिक्षाओं के अधीन ढूँढ़ना और समेटना यहूदी व्यर्थता है, तो आइए, यह विचार करते हुए, जैसा पवित्रशास्त्र स्पष्ट सिखाता है, कि जो आशिषें हमें मसीह से मिलती हैं वे आत्मिक हैं, हम स्मरण रखें कि जो स्वतंत्रता हमें उसमें प्रतिज्ञा की और दी गई है, उसे उसकी उचित सीमाओं के भीतर ही रखें। क्योंकि ऐसा क्यों है कि वही प्रेरित जो हमें आज्ञा देता है कि “जिस स्वतंत्रता के लिये मसीह ने हमें स्वतंत्र किया है उसमें स्थिर रहो, और दासत्व के जूए में फिर से न जुतो” (गलातियों 5:1), किसी दूसरे स्थान पर दासों को उनकी दशा की चिन्ता करने से मना करता है (1 कुरिन्थियों 7:21), सिवाय इसके कि आत्मिक स्वतंत्रता नागरिक दासत्व के साथ पूरी तरह निभ सकती है? इसी अर्थ में ये पद समझे जाने चाहिए: “न कोई यहूदी रहा और न यूनानी; न कोई दास, न स्वतंत्र; न कोई नर, न नारी” (गलातियों 3:28)। फिर, “न तो यूनानी रहा, न यहूदी, न खतना, न खतनारहित, न जंगली, न शकूती, न दास, न स्वतंत्र, केवल मसीह सब कुछ और सब में है” (कुलुस्सियों 3:11)। इससे यह सूचित होता है कि मनुष्यों के बीच तेरी दशा क्या है, और तू किन व्यवस्थाओं के अधीन जीवन बिताता है, इसका कोई महत्त्व नहीं, क्योंकि मसीह का राज्य उनमें बिलकुल नहीं बसा है।

2. फिर भी यह भेद इतनी दूर तक नहीं जाता कि हम यह मान लें कि नागरिक शासन की सारी व्यवस्था अशुद्धता की बात है, जिससे मसीही लोगों का कोई सम्बन्ध नहीं। उन्मत्त लोग, जो बेलगाम स्वच्छन्दता में आनन्द लेते हैं, यह ज़ोर देकर चिल्लाते हैं कि जब हम मसीह के द्वारा इस संसार की आदि-शिक्षाओं के लिए मर चुके हैं, और परमेश्वर के राज्य में पहुँचाए जाकर स्वर्गीय स्थानों में बैठे हैं, तो हमारे लिए यह अशोभनीय है और हमारी गरिमा से बहुत नीचे की बात है कि हम उन अपवित्र और अशुद्ध चिन्ताओं में लगें जो मसीही मनुष्य के लिए पराई बातों से सम्बन्ध रखती हैं। वे कहते हैं कि न्यायालयों और अधिकरणों के बिना व्यवस्थाओं का क्या प्रयोजन? परन्तु मसीही मनुष्य का न्यायालयों से क्या काम? बल्कि, यदि हत्या करना वर्जित है, तो व्यवस्थाओं और न्यायालयों से हमारा क्या लेना-देना? परन्तु जैसा हमने अभी सिखाया कि उस प्रकार का शासन मसीह के आत्मिक और भीतरी राज्य से भिन्न है, वैसे ही हमें यह भी जानना चाहिए कि वे एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। पहला कुछ अंश में स्वर्गीय राज्य को हम में अभी पृथ्वी पर ही आरम्भ कर देता है, और इस नाशमान और क्षणिक जीवन में अमर और अविनाशी आनन्द का आरम्भ करता है; जबकि दूसरे को यह कार्य सौंपा गया है कि जब तक हम मनुष्यों के बीच रहते हैं, तब तक वह परमेश्वर की बाहरी आराधना को पोषित और स्थिर रखे, खरी शिक्षा और कलीसिया की दशा की रक्षा करे, हमारे आचरण को मानव-समाज के अनुकूल बनाए, हमारे चाल-चलन को नागरिक न्याय के अनुसार ढाले, हमें एक-दूसरे से मेल-मिलाप में रखे, और सामान्य शान्ति और चैन को बनाए रखे। मैं मानता हूँ कि ये सब निरर्थक हैं, यदि परमेश्वर का राज्य, जैसा वह अब हम में है, वर्तमान जीवन को ही मिटा दे। परन्तु यदि परमेश्वर की यही इच्छा है कि जब तक हम सच्ची भक्ति की अभिलाषा रखते हैं, तब तक हम पृथ्वी पर परदेशी हैं, और यदि ऐसे परदेशीपन को ऐसे सहारों की आवश्यकता है, तो जो इन्हें मनुष्य से छीन लेते हैं, वे उसकी मनुष्यता छीन लेते हैं। उनके इस दावे के विषय में कि परमेश्वर की कलीसिया में ऐसी सिद्धता होनी चाहिए कि उसका मार्गदर्शन ही व्यवस्था का स्थान ले ले, वे मूर्खता से उसे ऐसी कल्पना करते हैं जैसी वह मनुष्यों के समाज में कभी पाई ही नहीं जा सकती। क्योंकि जब दुष्टों की ढिठाई इतनी बड़ी और उनकी अधर्मिता इतनी हठीली है कि व्यवस्थाओं की किसी भी कठोरता से उसे मुश्किल से ही रोका जा सकता है, तब जिन्हें बल भी कठिनाई से बुराई करने से रोक पाता है, वे यदि अपनी दुष्टता के लिए पूरी छूट देखें तो हम उनसे क्या आशा रखें कि वे क्या करेंगे?

3. परन्तु नागरिक शासन के उपयोग के विषय में बोलने का हमें अधिक उचित अवसर मिलेगा। अभी हम इतना ही समझाना चाहते हैं कि उसे समाप्त करने का विचार करना पूरी असभ्यता है, क्योंकि मनुष्यों में उसका उपयोग रोटी और पानी, प्रकाश और वायु से कम नहीं है, और उसकी गरिमा तो उनसे कहीं अधिक श्रेष्ठ है। उसका उद्देश्य केवल यही नहीं है, जैसा उन वस्तुओं का है, कि मनुष्य साँस ले, खाए, पीए और गरमाई पाए (यद्यपि वह निश्चय ही इन सब को सम्मिलित करता है, क्योंकि वह उन्हें साथ-साथ जीने में समर्थ बनाता है); मैं कहता हूँ कि यही उसका एकमात्र उद्देश्य नहीं है, परन्तु यह भी है कि कोई मूर्तिपूजा, परमेश्वर के नाम के विरुद्ध कोई निन्दा, उसके सत्य के विरुद्ध कोई झूठे आरोप, या धर्म के विरुद्ध अन्य अपराध लोगों के बीच फूट पड़कर फैलने न पाएँ; सार्वजनिक शान्ति भंग न हो; हर मनुष्य की सम्पत्ति सुरक्षित रहे; मनुष्य एक-दूसरे के साथ निर्दोष व्यापार कर सकें; ईमानदारी और शालीनता बढ़े; संक्षेप में, मसीहियों के बीच धर्म का एक सार्वजनिक रूप, और मनुष्यों के बीच मानवता बनी रहे। कोई यह देखकर आश्चर्य न करे कि मैं अब धर्म को ठीक रीति से स्थापित करने का कार्य मानवीय शासन-व्यवस्था को सौंपता हूँ, जबकि ऊपर मैंने उसे मनुष्य की इच्छा से परे रखा प्रतीत होता हूँ; क्योंकि जब मैं उस नागरिक व्यवस्था का समर्थन करता हूँ जो इसी उद्देश्य की ओर निर्देशित है—अर्थात् इस बात को रोकना कि परमेश्वर की व्यवस्था में निहित सच्चा धर्म सार्वजनिक निन्दा से खुलेआम बिना दण्ड के भंग और अपवित्र किया जाए—तब भी, पहले की ही भाँति, मैं मनुष्यों को धर्म और परमेश्वर की आराधना के विषय में अपनी इच्छा से व्यवस्थाएँ बनाने की अनुमति नहीं देता। परन्तु पाठक, एक स्पष्ट क्रम की सहायता से, इसे अच्छी तरह समझ पाएगा कि नागरिक शासन की सम्पूर्ण व्यवस्था के विषय में कैसा दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, यदि हम उसके प्रत्येक अंग की अलग-अलग चर्चा करें। ये अंग तीन हैं: दण्डाधिकारी, जो व्यवस्थाओं का अध्यक्ष और रक्षक है; व्यवस्थाएँ, जिनके अनुसार वह शासन करता है; और प्रजा, जिस पर व्यवस्थाओं का शासन है और जो दण्डाधिकारी की आज्ञा मानती है। तो आइए, पहले यह विचार करें कि दण्डाधिकारी का कार्य क्या है? क्या यह परमेश्वर द्वारा स्वीकृत एक वैध बुलाहट है? उसके कर्त्तव्य का स्वरूप क्या है? उसके अधिकार की सीमा क्या है? दूसरे, वे कौन-सी व्यवस्थाएँ हैं जिनके अनुसार मसीही शासन-व्यवस्था चलनी चाहिए? और अन्त में, प्रजा के सम्बन्ध में व्यवस्थाओं का क्या उपयोग है? और दण्डाधिकारी के प्रति कौन-सी आज्ञाकारिता उचित है?

4. दण्डाधिकारियों के कार्य के विषय में, प्रभु ने न केवल यह घोषित किया है कि वह उसे स्वीकार करता है और उससे प्रसन्न है, वरन् उसे जो अति सम्माननीय उपाधियाँ दी हैं, उनके द्वारा उसने उसे हमारे सामने दृढ़ता से सराहा भी है। कुछ का उल्लेख करें तो।682 जब दण्डाधिकारी का पद धारण करनेवाले ईश्वर कहे जाते हैं, तो कोई यह न समझे कि इस उपाधि का भार थोड़ा है। इससे यह सूचित होता है कि उन्हें परमेश्वर की ओर से आज्ञा मिली है, वे ईश्वरीय अधिकार से सम्पन्न हैं, और वास्तव में परमेश्वर के व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिसके एक प्रकार से स्थानापन्न बनकर वे कार्य करते हैं। यह मेरा कोई कुतर्क नहीं, बल्कि मसीह की ही व्याख्या है। वह कहता है, “यदि उसने उन्हें ईश्वर कहा जिनके पास परमेश्वर का वचन पहुँचा।” इसका अर्थ इसके सिवा और क्या है कि यह कार्य उन्हें परमेश्वर की ओर से सौंपा गया है कि वे अपने पद में उसकी सेवा करें, और (जैसा मूसा और यहोशापात ने उन न्यायियों से कहा जिन्हें वे यहूदा के प्रत्येक नगर पर नियुक्त कर रहे थे) मनुष्य के लिए नहीं, परन्तु परमेश्वर के लिए न्याय करें? इसी अर्थ में बुद्धि सुलैमान के मुख से घोषणा करती है, “मेरे द्वारा राजा राज्य करते हैं, और राजकुमार धर्म से न्याय करते हैं। मेरे ही द्वारा राजकुमार और प्रधान लोग, और पृथ्वी के सब न्यायी शासन करते हैं” (नीतिवचन 8:15, 16)। क्योंकि यह ऐसा ही है मानो कहा गया हो कि पृथ्वी पर सर्वोच्च अधिकार का राजाओं और अन्य शासकों के हाथ में होना मनुष्य की हठ के कारण नहीं, परन्तु ईश्वरीय विधान और उसकी पवित्र आज्ञा से है, जिसे मनुष्यों के कार्यों का ऐसा संचालन करना अच्छा लगा है, क्योंकि वह स्वयं उपस्थित है और व्यवस्थाएँ बनाने तथा न्यायिक समता निभाने में अध्यक्षता भी करता है। यही पौलुस भी स्पष्ट सिखाता है, जब वह शासन के पदों को परमेश्वर के वरदानों में गिनता है, जो अनुग्रह के परिमाण के अनुसार

682 निर्गमन 22:8, 9; भजन संहिता 82:1, 6; यूहन्ना 10:34, 35; व्यवस्थाविवरण 1:16, 17; 2 इतिहास 19:6, 7; नीतिवचन 8:15। भिन्न-भिन्न रीति से बाँटे जाकर मसीह के सेवकों द्वारा कलीसिया की उन्नति के लिए प्रयोग में लाए जाने चाहिए (रोमियों 12:8)। परन्तु उस स्थान पर वह यथार्थ में उन गम्भीर पुरुषों की सभा की बात कर रहा है जो आदिम कलीसिया में सार्वजनिक अनुशासन का भार उठाने के लिए नियुक्त किए गए थे। कुरिन्थियों को लिखी पत्री में वह इस पद को शासन-कार्य कहता है (1 कुरिन्थियों 12:28)। फिर भी, जब हम देखते हैं कि नागरिक अधिकार का भी वही उद्देश्य है, तो इसमें सन्देह नहीं रह जाता कि वह हर प्रकार के न्यायसंगत शासन की सराहना कर रहा है। जब वह इस विषय की यथोचित चर्चा पर आता है, तो बहुत अधिक स्पष्टता से बोलता है। क्योंकि वह कहता है कि “कोई अधिकार ऐसा नहीं जो परमेश्वर की ओर से न हो; जो अधिकार हैं वे परमेश्वर के ठहराए हुए हैं”; कि शासक परमेश्वर के सेवक हैं, “अच्छे कामों के लिये नहीं, परन्तु बुरे कामों के लिये भय का कारण हैं” (रोमियों 13:1, 3)। इसमें हम सन्तों के उदाहरण जोड़ सकते हैं, जिनमें से कुछ ने राजाओं के पद सम्भाले, जैसे दाऊद, योशिय्याह और हिजकिय्याह; कुछ ने राज्यपालों के, जैसे यूसुफ और दानिय्येल; और कुछ ने स्वतंत्र प्रजा के बीच नागरिक दण्डाधिकारियों के, जैसे मूसा, यहोशू और न्यायी। उनके कार्यों को प्रभु ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया। इसलिए कोई इसमें सन्देह नहीं कर सकता कि नागरिक अधिकार परमेश्वर की दृष्टि में न केवल पवित्र और वैध है, वरन् मरणहार जीवन के सब पदों में सबसे पवित्र और अब तक का सबसे अधिक सम्माननीय पद है।

5. जो लोग अराजकता683 लाना चाहते हैं, वे यह आपत्ति करते हैं कि यद्यपि प्राचीन काल में राजा और न्यायी एक असभ्य प्रजा पर अध्यक्षता करते थे, तथापि आज के दिन शासन की वह दासत्वपूर्ण रीति उस सिद्धता से बिलकुल मेल नहीं खाती जिसे मसीह अपने सुसमाचार के साथ लाया। इससे वे न केवल अपनी अज्ञानता, वरन् अपना शैतानी अभिमान भी प्रकट करते हैं, क्योंकि वे अपने लिए उस सिद्धता का दावा करते हैं जिसका सौवाँ अंश भी उनमें दिखाई नहीं देता। परन्तु वे जैसे भी हों, खण्डन सरल है। क्योंकि जब दाऊद कहता है, “इसलिये अब, हे राजाओ, बुद्धिमान बनो; हे पृथ्वी के न्यायियो, शिक्षा ग्रहण करो”; “पुत्र को चूमो, ऐसा न हो कि वह क्रोध करे” (भजन संहिता 2:10, 12), तो वह उन्हें यह आज्ञा नहीं देता कि वे अपना अधिकार त्याग दें और निजी जीवन में लौट जाएँ, परन्तु यह कि जो सामर्थ्य उन्हें सौंपी गई है उसे मसीह के अधीन कर दें, ताकि वह सब पर राज्य करे। इसी प्रकार, जब यशायाह कलीसिया के विषय में भविष्यद्वाणी करता है, “राजा तेरे पालनहार, और उनकी रानियाँ तेरी दूध पिलानेवाली दाइयाँ होंगी” (यशायाह 49:23), तो वह उन्हें अपना अधिकार छोड़ने को नहीं कहता; बल्कि उन्हें परमेश्वर के भक्त आराधकों के संरक्षक की सम्माननीय उपाधि देता है; क्योंकि यह भविष्यद्वाणी मसीह के आगमन से सम्बन्ध रखती है। मैं जान-बूझकर बहुत-से ऐसे अंश छोड़ता हूँ जो सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र में, और विशेषकर भजनों में, आते हैं, जिनमें सब शासकों के उचित अधिकार का समर्थन किया गया है। सबसे प्रसिद्ध अंश वह है जिसमें पौलुस, तीमुथियुस को चेतावनी देता हुआ कि सार्वजनिक सभा में राजाओं के लिए प्रार्थनाएँ की जाएँ, यह कारण जोड़ता है, “जिससे हम पूरी भक्ति और गम्भीरता के साथ चैन और शान्ति का जीवन बिताएँ” (1 तीमुथियुस 2:2)। इन शब्दों में वह कलीसिया की दशा को उनके संरक्षण और अभिभावकत्व में सौंपता है।

6. यह विचार दण्डाधिकारियों के मन में निरन्तर बना रहना चाहिए, क्योंकि यह कर्त्तव्य-पालन के लिए प्रबल प्रेरणा देने और अद्वितीय सान्त्वना प्रदान करने के योग्य है, जिससे उनके पद की कठिनाइयाँ, जो निश्चय ही अनेक और भारी हैं, सरल हो जाती हैं। जो जानते हैं कि वे ईश्वरीय न्याय के सेवक ठहराए गए हैं, उन पर सत्यनिष्ठा, विवेक, नम्रता, संयम और निर्दोषता का कैसा उत्साह प्रबल होना चाहिए! जब उन्हें बताया जाता है कि उनका न्यायासन जीवते परमेश्वर का सिंहासन है, तो वे अधर्म को उसमें स्थान देने का साहस कैसे करेंगे? जिस मुँह को वे ईश्वरीय सत्य का ठहराया हुआ यन्त्र समझते हैं, उससे वे अन्यायपूर्ण दण्डाज्ञा सुनाने का साहस कैसे करेंगे? जिस हाथ को वे जानते हैं कि परमेश्वर के कार्यों को लिखने के लिए नियुक्त किया गया है, उससे वे किस विवेक से अभक्तिपूर्ण आदेशों पर हस्ताक्षर करेंगे? एक शब्द में, यदि उन्हें स्मरण रहे कि वे परमेश्वर के प्रतिनिधि हैं, तो उन्हें पूरी सावधानी, परिश्रम और उद्यम से जागते रहना चाहिए, ताकि वे अपने में ईश्वरीय विधान, संरक्षण, भलाई, उदारता और न्याय की एक प्रकार की छवि प्रकट करें। और वे यह अतिरिक्त विचार भी निरन्तर सामने रखें कि यदि उस पर श्राप सुनाया गया है जो “यहोवा का काम धोखे से करता है,” तो जो धार्मिक बुलाहट में धोखा करता है उस पर इससे कहीं भारी श्राप होना चाहिए। इसलिए जब मूसा और यहोशापात अपने न्यायियों को कर्त्तव्य-पालन के लिए उभारना चाहते थे, तो उनके पास उनके मन को उभारने के लिए उस विचार से अधिक प्रबल कुछ नहीं था जिसका हम पहले उल्लेख कर चुके हैं—“सोचो कि तुम क्या करते हो: क्योंकि तुम मनुष्य के लिये नहीं, परन्तु यहोवा के लिये न्याय करते हो, और वह न्याय करते समय तुम्हारे साथ रहता है। इसलिये अब यहोवा का भय तुम में बना रहे; चौकसी से काम करो, क्योंकि हमारे परमेश्वर यहोवा में न कुछ कुटिलता है, न पक्षपात, और न घूस लेना” (2 इतिहास 19:6, 7, की तुलना व्यवस्थाविवरण 1:16, आदि से कीजिए)। और एक दूसरे स्थान पर कहा गया है, “परमेश्वर ईश्वरीय सभा में खड़ा है; वह ईश्वरों के बीच न्याय करता है” (भजन संहिता 82:1; यशायाह 3:14), ताकि जब वे सुनें कि वे परमेश्वर के राजदूत हैं, जिन्हें एक दिन अपने को सौंपे गए प्रदेश का लेखा देना है, तो वे कर्त्तव्य के लिए उत्साहित हों। यह चेतावनी उन पर सबसे अधिक प्रभाव डालने के योग्य है; क्योंकि यदि वे किसी भी बात में पाप करें, तो न केवल उन मनुष्यों की हानि होती है जिन्हें वे दुष्टता से सताते हैं, वरन् वे स्वयं परमेश्वर का भी अपमान करते हैं, जिसके पवित्र न्यायासनों को वे अशुद्ध करते हैं। दूसरी ओर, जब वे यह विचारते हैं कि वे ऐसे अपवित्र कामों में नहीं लगे हैं जो परमेश्वर के सेवक को शोभा न दें, बल्कि अत्यन्त पवित्र पद पर हैं, क्योंकि वे परमेश्वर के राजदूत हैं, तब उनके पास सान्त्वना का अद्भुत स्रोत होता है।

683 फ्रेंच में, “Ceux qui voudroyent que les hommes vesquissent pesle mesle comme rats en paille;”—अर्थात् वे जो चाहते कि मनुष्य चूहों के समान पुआल में गड्डमड्ड होकर जीवन बिताएँ।

7. जो इन सब पवित्रशास्त्रीय अंशों से भी नहीं रुकते और इस पवित्र सेवकाई को, मानो वह धर्म और मसीही भक्ति से घृणास्पद वस्तु हो, कोसने का दुस्साहस करते हैं, उनके विषय में क्या कहें; वे स्वयं परमेश्वर पर ही आक्रमण करने के सिवा और क्या करते हैं? जब उसके सेवकों का अपमान होता है, तो उसका अपमान हुए बिना नहीं रह सकता। ये लोग न केवल बड़े पदवालों की निन्दा करते हैं, वरन् यह भी नहीं चाहते कि परमेश्वर उन पर राज्य करे (1 शमूएल 7:7)। क्योंकि यदि इस्राएल की प्रजा के विषय में, जब उसने शमूएल के अधिकार को अस्वीकार किया, यह सच कहा गया, तो आज के दिन उन लोगों के विषय में यह कम सच कैसे हो सकता है जो परमेश्वर के ठहराए हुए सब अधिकार के विरुद्ध अपने को छूट देते हैं? परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि जब हमारे प्रभु ने अपने चेलों से कहा, “अन्यजातियों के राजा उन पर प्रभुता करते हैं; और जो उन पर अधिकार रखते हैं, वे उपकारक कहलाते हैं। परन्तु तुम ऐसे न होना; वरन् जो तुम में बड़ा है, वह छोटे के समान और जो प्रधान है, वह सेवक के समान बने” (लूका 22:25, 26); तो उसने इन शब्दों से सब मसीहियों को राजा या शासक बनने से मना कर दिया। चतुर व्याख्याकार! चेलों में यह विवाद उठा था कि उनमें बड़ा कौन होगा। इस व्यर्थ महत्त्वाकांक्षा को दबाने के लिए हमारे प्रभु ने उन्हें सिखाया कि उनकी सेवकाई पृथ्वी के राजाओं की सत्ता के समान नहीं है, जिनमें एक दूसरे से बहुत बढ़कर होता है। मैं पूछता हूँ, इस तुलना में राजकीय गरिमा को नीचा दिखानेवाली क्या बात है? बल्कि यह कुछ भी सिद्ध करती है तो केवल यह कि राजकीय पद प्रेरिताई की सेवकाई नहीं है। इसके अतिरिक्त, यद्यपि दण्डाधिकारी के पदों में स्वयं भिन्न-भिन्न रूप हैं, तथापि इस बात में कोई भेद नहीं कि वे सब हमारे द्वारा परमेश्वर की व्यवस्था के रूप में स्वीकार किए जाने चाहिए। क्योंकि पौलुस सबको एक साथ सम्मिलित करता है जब वह कहता है कि “कोई अधिकार ऐसा नहीं जो परमेश्वर की ओर से न हो,” और जो सबसे कम प्रिय था, उसे सबसे ऊँची साक्षी से सम्मानित किया गया—मेरा अभिप्राय एक व्यक्ति के शासन से है। इसमें सब की सार्वजनिक दासता निहित होने के कारण (उस एक को छोड़कर जिसकी निरंकुश इच्छा के अधीन सब कुछ है), प्राचीन काल में वीर और श्रेष्ठ स्वभाववाले लोग इसे नापसन्द करते थे। परन्तु पवित्रशास्त्र ने इन अन्यायपूर्ण निर्णयों को रोकने के लिए स्पष्ट घोषणा की है कि यह ईश्वरीय बुद्धि से है कि “राजा राज्य करते हैं,” और विशेष आज्ञा दी है कि “राजा का सम्मान करो” (1 पतरस 2:17)।

8. और निश्चय ही निजी व्यक्तियों के लिए यह चर्चा करना बहुत व्यर्थ का काम होगा कि जिस स्थान में वे रहते हैं वहाँ शासन-व्यवस्था का सर्वोत्तम रूप क्या होगा, क्योंकि ये विचार-विमर्श किसी सार्वजनिक विषय के निर्णय पर कोई प्रभाव नहीं डाल सकते। फिर इस बात को निरपेक्ष रूप से बिना दुस्साहस के परिभाषित भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि चर्चा का स्वरूप परिस्थितियों पर निर्भर करता है। और यदि तुम परिस्थितियों का ध्यान किए बिना भिन्न-भिन्न राज्यों की एक-दूसरे से तुलना करो, तो यह निश्चय करना सरल नहीं कि उपयोगिता की दृष्टि से किसे बढ़त है, क्योंकि वे बराबरी की शर्तों पर आमने-सामने आते हैं। राजतन्त्र का झुकाव अत्याचार की ओर होता है। फिर, कुलीनतन्त्र में भी कुछ लोगों के गुट बन जाने की प्रवृत्ति कम नहीं होती, जबकि जनता के प्रभुत्व में विद्रोह की प्रवृत्ति सबसे प्रबल होती है।684 जब शासन के इन तीनों रूपों पर, जिनकी चर्चा दार्शनिक करते हैं, स्वयं में विचार किया जाता है, तो मैं, अपनी ओर से, इससे इनकार करने से बहुत दूर हूँ कि जो रूप दूसरों से बहुत श्रेष्ठ है वह कुलीनतन्त्र है, चाहे वह शुद्ध हो या लोकतन्त्र से संयमित, अपने में नहीं, परन्तु इसलिए कि ऐसा बहुत कम होता है कि राजा अपने ऊपर ऐसा शासन करें कि जो न्यायसंगत और उचित है उससे कभी भिन्न मत न हों, या उनमें इतनी तीक्ष्णता और विवेक हो कि वे सदा ठीक-ठीक देख सकें। इसलिए मनुष्यों के दोषों या कमियों के कारण यह अधिक सुरक्षित और सहने योग्य है कि कई लोग शासन करें, ताकि वे इस प्रकार एक-दूसरे की सहायता, शिक्षा और चेतावनी कर सकें, और यदि कोई सीमा लाँघने पर उतारू हो, तो दूसरे उसकी अति पर रोक लगानेवाले निरीक्षक और स्वामी हों। यह बात पहले ही अनुभव से सिद्ध हो चुकी है, और प्रभु के अपने अधिकार से भी पुष्ट हुई है, जब उसने इस्राएलियों के बीच लोकतन्त्र से सटा हुआ कुलीनतन्त्र स्थापित किया, और उन्हें उसी सर्वोत्तम रूप के अधीन रखा, जब तक कि उसने दाऊद में मसीहा की एक छवि न दिखाई। और जैसे मैं सहर्ष मानता हूँ कि उस शासन से बढ़कर कोई शासन सुखी नहीं जहाँ स्वतंत्रता उचित संयम के साथ गढ़ी गई हो, और ठीक रीति से इस प्रकार स्थापित की गई हो कि टिकाऊ हो, वैसे ही मैं उन लोगों को बहुत सुखी मानता हूँ जिन्हें उस रूप का सुख भोगने की अनुमति मिली है, और मैं मानता हूँ कि जब वे उसे बनाए रखने और सुरक्षित रखने के लिए पूरी शक्ति से और निरन्तर परिश्रम करते हैं, तो अपने कर्त्तव्य के विरुद्ध कुछ नहीं करते। बल्कि स्वयं दण्डाधिकारियों को भी चाहिए कि वे अपनी पूरी शक्ति लगाएँ कि वह स्वतंत्रता, जिसके वे रखवाले ठहराए गए हैं, घटने न पाए, भंग होने की तो बात ही क्या। यदि इसमें वे सुस्त या लापरवाह हों, तो वे अपने पद और अपने देश के विश्वासघाती द्रोही हैं। परन्तु यदि वे लोग जिन्हें प्रभु ने एक रूप का शासन सौंपा है, चिन्तित होकर बदलाव की अभिलाषा करने लगें, तो यह इच्छा न केवल मूर्खतापूर्ण और निरर्थक, वरन् अत्यन्त हानिकारक होगी। यदि तुम केवल एक राज्य पर ही दृष्टि न जमाओ, परन्तु चारों ओर देखो संसार को, या कम से कम एक-दूसरे से बहुत दूर स्थित प्रदेशों की ओर दृष्टि करो, तो तुम देखोगे कि ईश्वरीय विधान ने बिना उचित कारण के यह प्रबन्ध नहीं किया कि भिन्न-भिन्न देशों पर शासन की भिन्न-भिन्न रीतियों से राज्य किया जाए। क्योंकि जैसे केवल असमान तापमानवाले तत्त्व ही आपस में जुड़ते हैं, वैसे ही भिन्न-भिन्न प्रदेशों में शासन के रूप की ऐसी ही असमानता सर्वोत्तम है। फिर भी यह सब उन लोगों से अनावश्यक रूप से कहा जा रहा है जिनके लिए परमेश्वर की इच्छा ही पर्याप्त कारण है। क्योंकि यदि उसे राज्यों पर राजा नियुक्त करना, और स्वतंत्र राज्यों पर सभाएँ या नगराध्यक्ष नियुक्त करना अच्छा लगा है, तो जिन स्थानों में हम रहते हैं वहाँ उसने जो भी रूप ठहराया हो, हमारा कर्त्तव्य आज्ञा मानना और अधीन रहना है।

684 फ्रेंच में, “On conte trois especes de regime civil: c’est assavoir Monarchie, qui est la domination d’un seul, soit qu’on le nomme Roy ou Due, ou autrement: Aristoeratie qui est une domination gouvernee par les principaux et gens d’apparence: et Democratie, qui est une domination populaire, en laquelle chacun du peuple a puissance.”—अर्थात् नागरिक शासन तीन प्रकार के गिने जाते हैं; अर्थात् राजतन्त्र, जो केवल एक व्यक्ति का शासन है, चाहे उसे राजा कहें या ड्यूक, या कुछ और; कुलीनतन्त्र, जो प्रमुख और प्रतिष्ठित लोगों से बना शासन है; और लोकतन्त्र, जो जनता का शासन है, जिसमें प्रजा के प्रत्येक व्यक्ति के पास अधिकार होता है।

9. दण्डाधिकारियों का कर्त्तव्य, उसका स्वरूप जैसा परमेश्वर के वचन में वर्णित है, और वे बातें जिनमें वह निहित है, उन्हें मैं यहाँ चलते-चलते बताऊँगा। कि वह व्यवस्था की दोनों पटियाओं तक फैला है, यह यदि पवित्रशास्त्र न भी सिखाता तो हम लौकिक लेखकों से भी सीख सकते थे; क्योंकि दण्डाधिकारियों के कर्त्तव्य, व्यवस्थाओं के निर्माण और सार्वजनिक कल्याण के विषय में किसी ने भी धर्म और ईश्वरीय आराधना से आरम्भ किए बिना चर्चा नहीं की। इस प्रकार सब ने यह माना है कि कोई शासन-व्यवस्था तब तक सफलतापूर्वक स्थापित नहीं हो सकती जब तक भक्ति उसकी पहली चिन्ता न हो, और वे व्यवस्थाएँ बेतुकी हैं जो परमेश्वर के अधिकारों की उपेक्षा करती हैं और केवल मनुष्यों का ही ध्यान रखती हैं। तो जब दार्शनिकों में धर्म को पहला स्थान दिया गया है, और जातियों की सार्वभौमिक सहमति से यही सदा माना गया है, तो मसीही राजा और दण्डाधिकारी अपनी निष्ठुरता पर लज्जित हों यदि वे इसे अपनी चिन्ता नहीं बनाते। हम पहले दिखा चुके हैं कि यह कार्य परमेश्वर ने विशेष रूप से उन्हें सौंपा है, और सचमुच उचित भी है कि वे उसके सम्मान को स्थापित और सुरक्षित करने का प्रयत्न करें जिसके वे प्रतिनिधि हैं और जिसके अनुग्रह से वे राज्य करते हैं। इसीलिए पवित्रशास्त्र में पवित्र राजाओं की विशेष प्रशंसा की गई है कि उन्होंने बिगड़ी या उलटी हुई परमेश्वर की आराधना को पुनः स्थापित किया, या यह ध्यान रखा कि उनके राज्य में धर्म शुद्धता और सुरक्षा के साथ फूले-फले। दूसरी ओर, पवित्र इतिहास अराजकता को दोषों में गिनता है, जब वह बताता है कि इस्राएल में कोई राजा न था, और इसलिए हर एक मनुष्य जो उसे ठीक लगता था वही करता था (न्यायियों 21:25)। यह उन लोगों की मूर्खता को डाँटता है जो ईश्वरीय बातों की चिन्ता को छोड़कर केवल मनुष्यों के बीच न्याय के प्रशासन में लग जाना चाहते हैं; मानो परमेश्वर ने शासकों को अपने नाम से केवल पार्थिव झगड़ों का निपटारा करने के लिए ठहराया हो, और जो कहीं अधिक महत्त्व की बात थी, यानी उसकी अपनी शुद्ध आराधना, जैसी उसकी व्यवस्था में निर्धारित है, उसे छोड़ दिया हो। ऐसे विचार उपद्रवी लोग अपनाते हैं, जो सब प्रकार के नवाचार बिना दण्ड के करने की उत्सुकता में उन सब को हटा देना चाहते हैं जो भंग की गई भक्ति के पक्ष में खड़े होते हैं। व्यवस्था की दूसरी पटिया के विषय में यिर्मयाह शासकों से कहता है, “यहोवा यों कहता है, न्याय और धर्म के काम करो; और जो लुट गया हो उसको अन्धेर करनेवाले के हाथ से बचाओ; और परदेशी, अनाथ और विधवा के साथ अन्याय या उपद्रव मत करो, और निर्दोष का लहू मत बहाओ” (यिर्मयाह 22:3)। इसी आशय की यह प्रबोधना भजन में है, “कंगाल और अनाथों का न्याय चुकाओ; दीन और दरिद्र के साथ धर्म का व्यवहार करो। कंगाल और निर्धन को बचाओ; दुष्टों के हाथ से उन्हें छुड़ाओ” (भजन संहिता 82:3, 4)। मूसा ने भी उन प्रधानों से कहा जिन्हें उसने अपने स्थान पर ठहराया था, “तुम अपने भाइयों के मुकद्दमे सुना करो, और हर एक के और उसके भाई के बीच, और उस परदेशी के बीच भी जो उसके संग हो, धर्म से न्याय किया करो। न्याय करते समय किसी का पक्ष न करना; जैसे बड़े की वैसे ही छोटे की भी सुनना; किसी मनुष्य का मुँह देखकर न डरना, क्योंकि न्याय परमेश्वर का काम है” (व्यवस्थाविवरण 1:16)। मैं ऐसे अंशों के विषय में कुछ नहीं कहता, जैसे, “वह बहुत घोड़े न रखे, और न प्रजा को मिस्र में लौटा ले जाए;” “और वह बहुत स्त्रियाँ भी न रखे; और न अपने लिये चाँदी-सोना बहुत बढ़ाए;” “वह इस व्यवस्था की एक प्रतिलिपि पुस्तक में लिखवाए;” “और वह उसके पास रहे, और वह उसमें जीवन भर पढ़ा करे, जिससे वह अपने परमेश्वर यहोवा का भय मानना सीखे;” “जिससे उसका मन अपने भाइयों के ऊपर घमण्ड न करे” (व्यवस्थाविवरण 17:16-20)। दण्डाधिकारियों के कर्त्तव्यों को यहाँ समझाने में मेरी व्याख्या का उद्देश्य स्वयं दण्डाधिकारियों को शिक्षा देना उतना नहीं, जितना दूसरों को यह सिखाना है कि दण्डाधिकारी क्यों हैं, और परमेश्वर ने उन्हें किस उद्देश्य से ठहराया है। इसलिए हम कहते हैं कि वे सार्वजनिक निर्दोषता, शालीनता, सम्मान और शान्ति के ठहराए हुए रक्षक और पक्षधर हैं, ताकि उनका एकमात्र ध्यान सामान्य शान्ति और सुरक्षा का प्रबन्ध करने पर हो। इन बातों में दाऊद घोषणा करता है कि जब वह सिंहासन पर बैठेगा तब वह उदाहरण प्रस्तुत करेगा। “टेढ़ा स्वभाव मुझ से दूर रहेगा; मैं बुराई को जानूँगा भी नहीं। जो गुप्त में अपने पड़ोसी की निन्दा करे, उसको मैं नाश करूँगा; जिसकी आँखें चढ़ी हों और जिसका मन घमण्डी हो, उसकी मैं न सहूँगा। मेरी दृष्टि देश के विश्वासयोग्य लोगों पर लगी रहेगी कि वे मेरे संग रहें; जो खरी चाल चलता है वही मेरी सेवा करेगा” (भजन संहिता 101:4-6)। परन्तु शासक यह तब तक नहीं कर सकते जब तक वे भलों की रक्षा बुरों के अत्याचारों से न करें, और पीड़ितों को सहायता और संरक्षण न दें, इसलिए वे प्रकट कुकर्मियों और अपराधियों को दबाने के लिए अधिकार से सज्जित किए गए हैं, जिनके आचरण से सार्वजनिक शान्ति भंग या विचलित होती है। क्योंकि सोलोन के इस कथन की सच्चाई का हमें पूरा अनुभव है कि सब सार्वजनिक बातें पुरस्कार और दण्ड पर निर्भर करती हैं; जहाँ ये नहीं होते, वहाँ राज्यों का सारा अनुशासन डगमगाकर बिखर जाता है। क्योंकि बहुतों के मन में समता और न्याय का प्रेम ठण्डा पड़ जाता है, यदि सद्गुण का उचित सम्मान न किया जाए, और दुष्टों की स्वच्छन्दता कठोर अनुशासन और दण्ड के बिना रोकी नहीं जा सकती। इन दोनों बातों को भविष्यद्वक्ता एक साथ समेटता है जब वह राजाओं और अन्य शासकों को “न्याय और धर्म” के काम करने की आज्ञा देता है (यिर्मयाह 21:12; 22:3)। निर्दोषों की देखभाल करना, उनकी रक्षा करना और उनका बदला लेना, और उन्हें छुड़ाना धार्मिकता (न्याय) है; दुष्टों के दुस्साहस का सामना करना, उनकी हिंसा को दबाना और उनके दोषों को दण्ड देना न्याय-निर्णय है।

10. परन्तु यहाँ एक कठिन, और जैसा प्रतीत होता है, उलझा देनेवाला प्रश्न उठता है। यदि सब मसीहियों को हत्या करने से मना किया गया है, और भविष्यद्वक्ता प्रभु के पवित्र पर्वत, अर्थात् कलीसिया,685 के विषय में भविष्यद्वाणी करता है, “वे न दुःख देंगे और न हानि करेंगे,” तो दण्डाधिकारी एक ही समय में भक्त और फिर भी लहू बहानेवाले कैसे हो सकते हैं? परन्तु यदि हम यह समझ लें कि दण्डाधिकारी दण्ड देते समय अपनी ओर से नहीं करता, वरन् परमेश्वर के ही न्याय-निर्णयों को पूरा करता है, तो हम हर सन्देह से मुक्त हो जाएँगे। प्रभु की व्यवस्था हत्या करने से रोकती है; परन्तु हत्या बिना दण्ड के न रह जाए, इसलिए व्यवस्था देनेवाला स्वयं अपने सेवकों के हाथ में तलवार देता है कि वे उसे सब हत्यारों के विरुद्ध चलाएँ। भक्तों का काम दुःख देना और हानि पहुँचाना नहीं है; परन्तु परमेश्वर की आज्ञा से भक्तों पर हुए अत्याचारों का बदला लेना न दुःख देना है और न हानि पहुँचाना।686 मैं चाहता हूँ कि यह हमारे मन में सदा बना रहे कि यहाँ कुछ भी मनुष्य की उतावली से नहीं किया जाता, वरन् सब कुछ परमेश्वर के अधिकार की आज्ञाकारिता में किया जाता है। जब वह मार्गदर्शक है, तब हम कभी ठीक मार्ग से नहीं भटकते, जब तक कि ईश्वरीय न्याय को बाँधकर रखना और उसे अपराधों पर दण्ड न देने देना न ठहराया जाए। परन्तु यदि हम उसे व्यवस्था देने का साहस नहीं करते, तो उसके सेवकों पर दोष क्यों लगाएँ? पौलुस कहता है, “वह तलवार व्यर्थ ही नहीं लिये हुए है, क्योंकि वह परमेश्वर का सेवक है, कि बुरे काम करनेवाले को दण्ड देने के लिये क्रोध करनेवाला ठहरा है” (रोमियों 13:4)। इसलिए यदि राजा और अन्य शासक जानते हैं कि परमेश्वर को उनकी आज्ञाकारिता से बढ़कर कुछ भी अधिक प्रिय न होगा, तो यदि वे परमेश्वर के प्रति अपनी भक्ति, न्याय और सत्यनिष्ठा को बढ़ाना चाहते हैं, तो वे अपने को इस सेवा में लगाएँ। मूसा687 की भी यही भावना थी जब, अपने को प्रभु की सामर्थ्य से अपनी प्रजा को छुड़ाने के लिए ठहराया हुआ जानकर, उसने मिस्री पर हिंसक हाथ उठाया, और बाद में परमेश्वर के प्रति अपवित्रता के कारण प्रजा से बदला लिया, उनमें से तीन हज़ार को एक ही दिन में मारकर। दाऊद की भी यही भावना थी, जब उसने अपने जीवन के अन्त के निकट अपने पुत्र सुलैमान को आज्ञा दी कि योआब और शिमी को मार डाले। इसी कारण राजा के गुणों की गणना में एक यह भी है कि वह दुष्टों को पृथ्वी पर से नाश करे, और सब अनर्थ करनेवालों को परमेश्वर के नगर से निकाल दे। इसी आशय की वह प्रशंसा है जो सुलैमान की गई है, “तू ने धार्मिकता से प्रेम और दुष्टता से बैर रखा है।” यह कैसे हुआ कि मूसा का नम्र और कोमल स्वभाव इतना क्रुद्ध हो गया कि अपने भाइयों के लहू से सना और लथपथ होकर वह छावनी में दौड़ता हुआ नया संहार करता फिरे? यह कैसे हुआ कि दाऊद, जिसने अपने सारे जीवन में इतनी कोमलता दिखाई, अपने अन्तिम साँस के निकट अपने पुत्र के पास यह रक्तरंजित वसीयत छोड़ गया कि योआब और शिमी के पके बाल शान्ति से कब्र में न जाने दिए जाएँ? दोनों ने अपनी कठोरता से उन हाथों को पवित्र ठहराया जिन्हें वे दया दिखाकर अपवित्र कर लेते, क्योंकि उन्होंने वह बदला पूरा किया जो परमेश्वर ने उन्हें सौंपा था। सुलैमान कहता है,688 “राजाओं को दुष्टता करने से घृणा आती है, क्योंकि उनका सिंहासन धर्म ही से स्थिर रहता है।” फिर, “राजा जो न्याय-सिंहासन पर बैठता है, वह अपनी दृष्टि ही से सब बुराई को छान लेता है।” फिर, “बुद्धिमान राजा दुष्टों को फटकता है, और उन पर दाँवने का पहिया फिराता है।” फिर, “चाँदी में से मैल दूर करने पर वह सुनार के लिये बर्तन बन जाती है। वैसे ही राजा के आगे से दुष्ट को हटा देने पर उसका सिंहासन धर्म के द्वारा स्थिर होगा।” फिर, “जो दुष्ट को निर्दोष और जो धर्मी को दोषी ठहराता है, उन दोनों से यहोवा घृणा करता है।” फिर, “बुरा मनुष्य दंगे ही का यत्न करता है, इसलिये उसके पास क्रूर दूत भेजा जाएगा।” फिर, “जो दुष्ट से कहता है, तू निर्दोष है, उसको तो हर कोई शाप देगा, और जाति-जाति के लोग उससे बुरा मानेंगे।” अब यदि उनके लिए यह सच्चा न्याय है कि वे दोषियों और अभक्तों का खींची हुई तलवार से पीछा करें, तो जब दुष्ट लोग हत्या और संहार में डूबे हों तब तलवार को म्यान में रखना और अपने हाथों को लहू से शुद्ध रखना उनकी भलाई और न्याय की प्रशंसा का कारण होना तो दूर, घोर अभक्ति का दोष अपने ऊपर लेना होगा; बशर्ते वे सदा उतावली और क्रूर कठोरता से, और उस न्यायासन से बचे रहें जिसे ठीक ही एक चट्टान कहा जा सकता है जिस पर अभियुक्त का टकराकर नष्ट होना निश्चित है। क्योंकि मैं उनमें से नहीं हूँ जो असमय की कठोरता का पक्ष लें, या यह समझें कि कोई न्यायासन

685 निर्गमन 20:13; व्यवस्थाविवरण 5:17; मत्ती 5:21; यशायाह 11:9; 65:25।

686 फ्रेंच में यह जोड़ा गया है, “Pourtant il est facile de conclure, qu’en cette partie il ne sont sujets a la loy commune; par laquelle combien que le Seigneur lie les mains de tous les hommes, toutes fois il ne lie pas sa justice laquelle il exerce par les mains des magistrats. Tout ainsi que quand un prince defend à tou sses sujets de porter baston ou blesser aucun, il n’empeehe pas neantmoins ses officiers d’executer la justice, laquelie il leur a specialement commise.”—अर्थात् इसलिए यह निष्कर्ष निकालना सरल है कि इस विषय में वे सामान्य व्यवस्था के अधीन नहीं हैं, जिसके द्वारा, यद्यपि प्रभु सब मनुष्यों के हाथ बाँध देता है, तथापि वह अपने न्याय को नहीं बाँधता, जिसे वह दण्डाधिकारियों के हाथों से चलाता है। ठीक वैसे ही जैसे जब कोई राजा अपनी सब प्रजा को किसी को मारने या चोट पहुँचाने से मना करता है, तब भी वह अपने अधिकारियों को उस न्याय को चलाने से नहीं रोकता जो उसने विशेष रूप से उन्हें सौंपा है।

687 निर्गमन 2:12; प्रेरितों के काम 7:21; निर्गमन 32:26; 1 राजाओं 2:5; भजन संहिता 101:8; 45:8।

688 नीतिवचन 16:12; 20:26; 25:4, 5; 17:15; 17:14; 24:24। भी न्यायपूर्ण गिना जा सकता है जिसमें दया अध्यक्षता न करती हो, जो राजाओं की सबसे उत्तम और सबसे निश्चित सलाहकार है, और, जैसा सुलैमान घोषित करता है, “सिंहासन को सम्भालनेवाली” (नीतिवचन 20:28) है। जैसा प्राचीन काल के किसी एक ने सच कहा था, यही राजाओं का प्रमुख गुण होना चाहिए। दण्डाधिकारी को दोनों छोरों से बचना चाहिए; न तो अत्यधिक कठोरता से वह चंगा करने के बजाय घायल करे, और न दया के अन्धविश्वासपूर्ण दिखावे से अत्यन्त क्रूर अमानवीयता में पड़े, कोमल और ढीली छूट देकर बहुतों के विनाश का कारण बने। नर्वा के साम्राज्य में रहनेवाले किसी व्यक्ति ने ठीक ही कहा था, ऐसे राजा के अधीन जीना सचमुच बुरा है जिसके साथ कुछ भी उचित नहीं ठहरता, पर उससे कहीं बुरा है ऐसे राजा के अधीन जीना जिसके साथ सब कुछ उचित ठहरता है।

11. चूँकि राजाओं और राज्यों के लिए कभी-कभी सार्वजनिक दण्ड देने के लिए शस्त्र उठाना आवश्यक हो जाता है, इसलिए जो कारण बताया गया है वही हमें यह आँकने का साधन देता है कि इस प्रकार किए गए युद्ध कहाँ तक वैध हैं। क्योंकि यदि उन्हें अपनी प्रजा की शान्ति बनाए रखने, उपद्रवियों के विद्रोही आन्दोलनों को दबाने, हिंसा से सताए गए लोगों की सहायता करने और अपराधों को दण्ड देने की सामर्थ्य दी गई है, तो क्या वे उसका प्रयोग इससे अधिक उचित अवसर पर कर सकते हैं कि उस मनुष्य के उन्माद को दबाएँ जो व्यक्तियों के चैन और सब की सामान्य शान्ति दोनों को भंग करता है; जो विद्रोही उपद्रव भड़काता है और हिंसक अत्याचार तथा घोर अन्याय करता है? यदि व्यवस्थाओं के रखवाले और पक्षधर होना उन्हें शोभा देता है, तो उन्हें उन सब के प्रयत्नों को समान रूप से दबाना चाहिए जिनके अपराधपूर्ण आचरण से व्यवस्थाओं का अनुशासन बिगड़ता है। बल्कि, यदि वे उन लुटेरों को न्यायपूर्वक दण्ड देते हैं जिनके अत्याचार केवल थोड़े ही लोगों पर पड़े हैं, तो क्या वे समूचे देश को बिना दण्ड के लुटने और उजड़ने देंगे? चूँकि इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि जिस प्रदेश पर उनका कोई अधिकार नहीं है उस पर शत्रुतापूर्ण और विनाशकारी आक्रमण राजा करे या प्रजा का सबसे निचला व्यक्ति, इसलिए सब को एक-समान लुटेरा समझा और दण्ड दिया जाना चाहिए। इसलिए स्वाभाविक समता और कर्त्तव्य माँग करते हैं कि राजा न केवल निजी अपराधों को न्यायिक दण्ड से दबाने के लिए, वरन् अपने संरक्षण में सौंपी गई प्रजा की रक्षा करने के लिए भी, जब कभी उन पर शत्रुतापूर्ण आक्रमण हो, शस्त्र से सज्जित हों। ऐसा करना पवित्र आत्मा ने भी पवित्रशास्त्र के अनेक अंशों में वैध ठहराया है।

12. परन्तु यदि यह आपत्ति की जाए कि नए नियम में कोई ऐसा अंश या उदाहरण नहीं जो सिखाए कि मसीहियों के लिए युद्ध वैध है, तो मैं उत्तर देता हूँ, पहला, कि युद्ध करने का जो कारण प्राचीन काल में था वह आज भी है, और दूसरी ओर, दण्डाधिकारियों को अपनी प्रजा की रक्षा करने से रोकने का कोई आधार नहीं है; दूसरा, कि प्रेरितों के लेखों में हमें इन बातों की स्पष्ट व्याख्या नहीं ढूँढ़नी चाहिए, क्योंकि उनका उद्देश्य नागरिक शासन-व्यवस्था गढ़ना नहीं, वरन् मसीह के आत्मिक राज्य को स्थापित करना था; अन्त में, कि वहाँ भी चलते-चलते यह संकेत दिया गया है कि हमारे उद्धारकर्ता ने अपने आगमन से इस विषय में कोई परिवर्तन नहीं किया। क्योंकि (अगस्तीन के शब्दों में) “यदि मसीही अनुशासन सब युद्धों की निन्दा करता, तो जब सैनिकों ने उद्धार के मार्ग के विषय में सलाह पूछी, तो उनसे कहा जाता कि अपने हथियार फेंक दो और सैन्य सेवा से पूरी तरह हट जाओ। जबकि कहा गया (लूका 3:14), किसी पर उपद्रव न करो, किसी की हानि न करो, अपने वेतन पर सन्तोष करो। जिन्हें वह अपने वेतन पर सन्तोष करने की आज्ञा देता है, उन्हें वह सेवा करने से निश्चय ही नहीं रोकता” (August. Ep. 5 ad Marcell.)। परन्तु यहाँ सब दण्डाधिकारियों को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए कि वे ज़रा भी अपनी वासनाओं के वश में न हों। बल्कि, चाहे दण्ड देना हो, उन्हें क्रोध से अन्धाधुन्ध नहीं बहना चाहिए, न घृणा से बह जाना चाहिए, न अटल कठोरता से जलना चाहिए; उन्हें, जैसा अगस्तीन कहता है (De Civit. Dei. Lib. 5 cap. 24), “उस व्यक्ति में भी, जिसके एक दोष को वे दण्ड देते हैं, सामान्य मानव-स्वभाव पर तरस खाना चाहिए;” या चाहे उन्हें किसी शत्रु, अर्थात् शस्त्रधारी लुटेरे के विरुद्ध शस्त्र उठाना पड़े, तो उन्हें अवसर को सहज ही नहीं पकड़ना चाहिए, बल्कि अवसर मिलने पर भी उसे नहीं लेना चाहिए, जब तक अत्यन्त प्रबल आवश्यकता विवश न करे। क्योंकि यदि हमें उस अन्यजाति से कहीं अधिक करना है जो चाहता था कि युद्ध वांछित शान्ति के लिए ही दिखाई दे, तो शस्त्र का सहारा लेने से पहले निश्चय ही अन्य सब उपाय आज़माए जाने चाहिए। संक्षेप में, दोनों अवस्थाओं में, उन्हें किसी निजी भावना से बह जाने नहीं देना चाहिए, वरन् केवल सार्वजनिक हित के विचार से चलना चाहिए। अन्यथा वे उस सामर्थ्य का दुरुपयोग करते हैं जो उन्हें अपने लाभ के लिए नहीं, वरन् दूसरों की भलाई और सेवा के लिए दी गई थी। इस युद्ध के अधिकार पर सैन्य टुकड़ियों, सन्धियों और अन्य नागरिक रक्षा-साधनों का अधिकार निर्भर है। सैन्य टुकड़ियों से मेरा अभिप्राय उनसे है जो सीमाओं की रक्षा के लिए राज्यों में तैनात की जाती हैं; सन्धियों से, उन मैत्री-सम्बन्धों से जो पड़ोसी राजाओं के बीच इस आधार पर बनाए जाते हैं कि यदि उनके राज्यों में कोई उपद्रव उठे, तो वे एक-दूसरे की सहायता करेंगे और मानव-जाति के सामान्य शत्रुओं को खदेड़ने के लिए अपनी सेनाएँ मिलाएँगे; और नागरिक रक्षा-साधनों में मैं सैन्य-कला से सम्बन्ध रखनेवाली हर बात को सम्मिलित करता हूँ।

13. अन्त में, हम यह जोड़ना उचित समझते हैं कि कर और महसूल राजाओं की वैध आय हैं, जिन्हें वे मुख्यतः अपने पद के सार्वजनिक भार को सम्भालने में लगाएँ। फिर भी वे इन्हें अपने घराने की देखरेख के लिए भी काम में ला सकते हैं, जो एक प्रकार से उस अधिकार की गरिमा से जुड़ी है जो वे चलाते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि दाऊद, हिजकिय्याह, योशिय्याह, यहोशापात और अन्य पवित्र राजाओं ने, और यूसुफ तथा दानिय्येल ने भी, अपने सम्भाले हुए पद के अनुपात में, भक्ति को ठेस पहुँचाए बिना सार्वजनिक धन से उदारतापूर्वक खर्च किया; और हम यहेजकेल में पढ़ते हैं कि राजाओं को भूमि का बहुत बड़ा भाग सौंपा गया था (यहेजकेल 48:21)। उस अंश में वह वास्तव में मसीह के आत्मिक राज्य का चित्रण कर रहा है, फिर भी वह अपना चित्र मनुष्यों के बीच के वैध राज्य से उधार लेता है। फिर भी राजाओं को अपनी ओर से स्मरण रखना चाहिए कि उनकी आय निजी तिजोरियाँ नहीं, वरन् समस्त प्रजा के भण्डार हैं (इसकी साक्षी पौलुस देता है, रोमियों 13:6), जिन्हें वे प्रकट अन्याय के बिना उड़ा या बरबाद नहीं कर सकते; या बल्कि यह कि वे प्रजा का लगभग लहू ही हैं, जिसे न बचाना अत्यन्त कठोर अमानवीयता होगी। उन्हें यह भी विचारना चाहिए कि उनकी उगाही और चन्दे, और अन्य प्रकार के कर, केवल सार्वजनिक आवश्यकता के सहायक साधन हैं, और बिना कारण उनसे दीन प्रजा को सताना अत्याचारी लूट है। इन बातों का उद्देश्य राजाओं को फ़िज़ूलखर्ची और विलासी व्यय के लिए उकसाना नहीं है (उनकी वासनाओं को भड़काने की निश्चय ही कोई आवश्यकता नहीं, जब वे अपने आप ही आवश्यकता से अधिक भड़की हुई हैं), परन्तु चूँकि यह अत्यन्त महत्त्व की बात है कि जो कुछ वे करने का साहस करें, उसे शुद्ध विवेक से करें, इसलिए उन्हें सिखाना आवश्यक है कि वे वैध रीति से कहाँ तक जा सकते हैं, ऐसा न हो कि अभक्तिपूर्ण आत्मविश्वास से वे परमेश्वर की अप्रसन्नता मोल लें। यह शिक्षा निजी व्यक्तियों के लिए भी अनावश्यक नहीं, ताकि वे राजाओं के व्यय को, चाहे वह सामान्य सीमा से अधिक भी हो, उतावली और चिड़चिड़ाहट से कलंकित न करें।

14. राज्यों में दण्डाधिकारियों के बाद सबसे महत्त्वपूर्ण वस्तु व्यवस्थाएँ हैं, जो शासन की सबसे सबल नसें हैं, या, जैसा सिसरो प्लेटो के पीछे उन्हें कहता है, आत्मा, जिसके बिना दण्डाधिकारी का पद टिक नहीं सकता; जैसे दूसरी ओर दण्डाधिकारी के बिना व्यवस्थाओं में कोई बल नहीं। इसलिए इससे अधिक सच्ची बात नहीं कही जा सकती कि व्यवस्था मूक दण्डाधिकारी है और दण्डाधिकारी जीवित व्यवस्था। चूँकि मैंने उन व्यवस्थाओं का वर्णन करने का बीड़ा उठाया है जिनसे मसीही शासन-व्यवस्था चलनी चाहिए, इसलिए मुझसे सर्वोत्तम प्रकार की व्यवस्थाओं पर लम्बी चर्चा की आशा करने का कोई कारण नहीं है। विषय का विस्तार बहुत बड़ा है, और वह इस स्थान का नहीं। मैं केवल संक्षेप में, चलते-चलते, यह बताऊँगा कि वे कौन-सी व्यवस्थाएँ हैं जिनका परमेश्वर के सम्बन्ध में भक्तिपूर्वक उपयोग किया जा सकता है और मनुष्यों के बीच उचित रीति से चलाया जा सकता है। इसे मैं चुपचाप छोड़ देना ही पसन्द करता, यदि मैं न जानता कि यहाँ बहुत-सी खतरनाक भूलें की जाती हैं। क्योंकि कुछ लोग हैं जो इनकार करते हैं कि कोई राज्य ठीक रीति से गठित है जो मूसा की व्यवस्था की उपेक्षा करता है और जातियों की सामान्य व्यवस्था से शासित होता है। ये विचार कितने जोखिम-भरे और विद्रोहकारी हैं, यह दूसरे देखें: मेरे लिए इतना दिखा देना पर्याप्त है कि वे मूर्खतापूर्ण और झूठे हैं। हमें उस सुप्रसिद्ध विभाजन पर ध्यान देना चाहिए जो परमेश्वर की सारी व्यवस्था को, जैसी वह मूसा के द्वारा प्रकाशित की गई, नैतिक, रीति-विधि सम्बन्धी और न्याय-सम्बन्धी व्यवस्था में बाँटता है, और हमें इनमें से प्रत्येक भाग पर ध्यान देना चाहिए, ताकि हम समझ सकें कि वे हम से कहाँ तक सम्बन्ध रखते हैं और कहाँ तक नहीं। इस बीच, कोई इस विचार से विचलित न हो कि न्याय-सम्बन्धी और रीति-विधि सम्बन्धी व्यवस्थाएँ नैतिकता से सम्बन्ध रखती हैं। क्योंकि जिन प्राचीनों ने यह विभाजन अपनाया, यद्यपि वे अनजान नहीं थे कि पिछले दो वर्गों का नैतिकता से सम्बन्ध है, फिर भी उन्होंने उन्हें नैतिक नाम नहीं दिया, क्योंकि नैतिकता को प्रभावित किए बिना उन्हें बदला और रद्द किया जा सकता था। वे यह नाम विशेष रूप से पहले वर्ग को देते हैं, जिसके बिना जीवन की सच्ची पवित्रता और आचरण का अटल नियम अस्तित्व में नहीं रह सकता।

15. तब नैतिक व्यवस्था (उससे आरम्भ करें तो), जो दो शीर्षकों में समाई है, जिनमें से एक सीधे हमें आज्ञा देता है कि हम परमेश्वर की आराधना शुद्ध विश्वास और भक्ति से करें, और दूसरा यह कि हम मनुष्यों को सच्चे स्नेह से गले लगाएँ, वह धार्मिकता का सच्चा और सनातन नियम है, जो सब जातियों और सब समयों के उन मनुष्यों के लिए निर्धारित है जो अपना जीवन परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ढालना चाहते हैं। क्योंकि उसकी सनातन और अटल इच्छा यही है कि हम सब उसकी आराधना करें और परस्पर प्रेम रखें। यहूदियों की रीति-विधि सम्बन्धी व्यवस्था एक संरक्षक-शिक्षा थी जिसके द्वारा प्रभु ने मानो उस प्रजा के बचपन को अनुशासित करना चाहा, जब तक कि समय की पूर्णता न आ जाए, जब वह जगत पर अपनी बुद्धि को पूरी रीति से प्रकट करे, और उन बातों की वास्तविकता दिखाए जिनका उस समय आकृतियों के द्वारा केवल आभास दिया गया था (गलातियों 3:24; 4:4)। न्याय-सम्बन्धी व्यवस्था, जो उन्हें एक प्रकार की शासन-व्यवस्था के रूप में दी गई, ने समता और न्याय के कुछ रूप सौंपे, जिनके द्वारा वे निर्दोषता और शान्ति से साथ-साथ रह सकें। और जैसे रीति-विधियों का वह अभ्यास यथार्थ में भक्ति की शिक्षा से सम्बन्ध रखता था, क्योंकि वह यहूदी कलीसिया को परमेश्वर की आराधना और धर्म में बनाए रखता था, फिर भी स्वयं भक्ति से अलग पहचाना जा सकता था, वैसे ही न्याय का रूप, यद्यपि वह केवल उस प्रेम को सुरक्षित रखने की सर्वोत्तम रीति की ओर देखता था जिसकी आज्ञा परमेश्वर की सनातन व्यवस्था देती है, फिर भी प्रेम की आज्ञा से कुछ भिन्न वस्तु था। इसलिए जैसे रीति-विधियाँ भक्ति में तनिक भी बाधा डाले बिना रद्द की जा सकती थीं, वैसे ही जब ये न्याय-सम्बन्धी व्यवस्थाएँ हटा दी जाएँ, तब भी प्रेम के कर्त्तव्य और आज्ञाएँ सदा बनी रह सकती हैं। परन्तु यदि यह सच है कि प्रत्येक जाति को स्वतंत्रता छोड़ी गई है कि वह जो व्यवस्थाएँ लाभकारी समझे उन्हें बनाए, तो भी उन्हें सदा प्रेम के नियम की कसौटी पर परखा जाना चाहिए, ताकि रूप में भिन्न होने पर भी वे एक ही सिद्धान्त पर चलें। उदाहरण के लिए, वे असभ्य और जंगली व्यवस्थाएँ जो चोरों को सम्मान देती थीं, स्त्री-पुरुषों के अनियन्त्रित सम्बन्धों की अनुमति देती थीं, और उनसे भी अधिक घिनौनी और बेतुकी बातें करती थीं, मेरे विचार में व्यवस्थाएँ कहलाने के योग्य नहीं हैं, क्योंकि वे न केवल न्याय से, वरन् मानवता और सभ्य जीवन से भी सर्वथा घृणास्पद हैं।

16. जो मैंने कहा है वह स्पष्ट हो जाएगा, यदि हम उन दो बातों पर, जैसा करना चाहिए, ध्यान दें जो सब व्यवस्थाओं से जुड़ी हैं—अर्थात् व्यवस्था का निर्माण, और वह समता जिस पर वह निर्माण आधारित है और टिका है। समता, क्योंकि वह स्वाभाविक है, सब में एक-सी नहीं हो सकती, और इसलिए सब व्यवस्थाओं द्वारा बनाई जानेवाली वस्तु के स्वभाव के अनुसार ही प्रस्तावित की जानी चाहिए। चूँकि संविधानों की कुछ परिस्थितियाँ होती हैं जिन पर वे अंशतः निर्भर करते हैं, इसलिए उनकी भिन्नता को रोकने की कोई बात नहीं, बशर्ते वे सब समान रूप से समता को अपना लक्ष्य बनाएँ। अब, चूँकि यह प्रकट है कि परमेश्वर की व्यवस्था, जिसे हम नैतिक कहते हैं, स्वाभाविक व्यवस्था की साक्षी और उस विवेक की साक्षी के सिवा और कुछ नहीं जिसे परमेश्वर ने मनुष्यों के मन में अंकित किया है, इसलिए समता का वह सम्पूर्ण स्वरूप जिसकी हम अभी चर्चा कर रहे हैं, उसी में निर्धारित है। इसलिए केवल वही सब व्यवस्थाओं का लक्ष्य, नियम और उद्देश्य होना चाहिए। जहाँ कहीं व्यवस्थाएँ इस नियम के अनुसार गढ़ी जाती हैं, इसी लक्ष्य की ओर निर्देशित होती हैं, और इसी उद्देश्य तक सीमित रहती हैं, वहाँ हमारे द्वारा उन्हें अस्वीकार करने का कोई कारण नहीं, चाहे वे यहूदी व्यवस्था से या एक-दूसरे से कितनी ही भिन्न हों (August. de Civit. Dei, Lib. 19 c. 17)। परमेश्वर की व्यवस्था चोरी करने से रोकती है। यहूदियों की नागरिक शासन-व्यवस्था में चोरी के लिए जो दण्ड ठहराया गया था, वह निर्गमन 22 में देखा जा सकता है। अन्य जातियों की अत्यन्त प्राचीन व्यवस्थाएँ चोरी को चुराई गई वस्तु का दुगुना वसूल करके दण्ड देती थीं, जबकि बाद की व्यवस्थाओं ने प्रकट और अप्रकट चोरी में भेद किया। अन्य व्यवस्थाएँ निर्वासन या दागने के दण्ड तक चली गईं, और कुछ ने मृत्युदण्ड ठहराया। यहूदियों में झूठे गवाह का दण्ड यह था कि “तुम उसके साथ वही करना जो उसने अपने भाई के साथ करने का विचार किया था” (व्यवस्थाविवरण 19:19)। कुछ देशों में दण्ड अपमान है, कुछ में फाँसी, कुछ में क्रूस पर चढ़ाना। सब व्यवस्थाएँ हत्या का बदला लहू से लेती हैं, परन्तु मृत्यु के प्रकार भिन्न हैं। कुछ देशों में व्यभिचार को अधिक कठोरता से दण्ड दिया जाता था, कुछ में अधिक नरमी से। फिर भी हम देखते हैं कि इस विविधता के बीच वे सब एक ही लक्ष्य की ओर जाती हैं। क्योंकि वे सब एक मुख से उन अपराधों के विरुद्ध घोषणा करती हैं जो परमेश्वर की सनातन व्यवस्था में दोषी ठहराए गए हैं—अर्थात् हत्या, चोरी, व्यभिचार और झूठी गवाही; यद्यपि दण्ड की रीति पर वे सहमत नहीं। यह आवश्यक नहीं, और न ही उचित है। कोई ऐसा देश हो सकता है जो यदि हत्या को भयंकर दण्डों से न चुकाए तो तुरन्त लूट और संहार का शिकार हो जाए। कोई ऐसा युग हो सकता है जिसमें दण्डों की कठोरता बढ़ाना आवश्यक हो। यदि राज्य संकट की अवस्था में हो, तो जिन बातों से प्रायः उपद्रव उठते हैं, उन्हें नए आदेशों से सुधारना पड़ता है। युद्ध के समय शस्त्रों के शोर में सभ्यता लुप्त हो जाती, यदि मनुष्य दण्ड की किसी असाधारण कठोरता से डराए न जाते। अकाल और महामारी में, यदि कठोर अनुशासन न बरता जाए, तो सब कुछ और बिगड़ जाता। कोई जाति किसी विशेष दोष की ओर और अधिक झुकी हो सकती है, यदि उसे अत्यन्त कठोरता से न दबाया जाए। इस विविधता से, जो परमेश्वर की व्यवस्था के पालन को बनाए रखने के लिए अद्भुत रीति से उपयुक्त है, नाराज़ होना कितनी द्वेषपूर्ण और सार्वजनिक भलाई से ईर्ष्या करनेवाली बात होगी। यह दावा कि मूसा के द्वारा दी गई परमेश्वर की व्यवस्था का अपमान किया जाता है, जहाँ वह रद्द की जाती है और उसकी जगह अन्य नई व्यवस्थाओं को वरीयता दी जाती है, अत्यन्त बेतुका है। अन्य व्यवस्थाओं को वरीयता नहीं दी जाती जब वे निरपेक्ष रूप से नहीं, वरन् समय और स्थान और प्रजा की दशा को ध्यान में रखकर अधिक स्वीकार की जाती हैं, या जब वे बातें रद्द की जाती हैं जो कभी हमारे लिए ठहराई ही नहीं गई थीं। प्रभु ने उसे मूसा के हाथ से इसलिए नहीं दिया था कि वह सब देशों में प्रकाशित की जाए और हर जगह लागू की जाए; परन्तु यहूदी जाति को अपनी विशेष देखरेख, संरक्षण और अभिभावकत्व में लेकर उसने विशेष रूप से उसका व्यवस्थापक होना चाहा, और जैसा एक बुद्धिमान व्यवस्थापक को शोभा देता है, उसने व्यवस्थाएँ बनाते समय उसी का विशेष ध्यान रखा।

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