ग्रन्थ-सूची

तीसरी पुस्तक

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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तीसरी पुस्तक

43. हम छुड़ानेवाले मसीह को पवित्र आत्मा की सामर्थ से ग्रहण करते हैं, जो हमें मसीह से जोड़ता है; और इसलिए वह पवित्रीकरण और लेपालकपन का आत्मा, हमारे उद्धार का बयाना और मुहर, जल, तेल, सोता, आग और परमेश्वर का हाथ कहलाता है।

44. विश्वास आत्मा का हाथ है, जो उसी पवित्र आत्मा की सामर्थ से उस मसीह को ग्रहण करता है जो सुसमाचार में हमें अर्पित किया गया है।

45. विश्वास का सामान्य कार्य यह है कि परमेश्वर जब भी, जो भी और जिस रीति से भी बोले, उसके सत्य पर सहमति दे; पर उसका विशेष कार्य है मसीह में परमेश्वर की इच्छा को, उसकी दया को, अनुग्रह की प्रतिज्ञाओं को देखना, जिनके पूरे निश्चय के लिये पवित्र आत्मा हमारे मनों को प्रकाशित और हमारे हृदयों को दृढ़ करता है।

46. इसलिए विश्वास हमारे प्रति ईश्वरीय कृपा का स्थिर और निश्चित ज्ञान है, जो मसीह के द्वारा अनुग्रहपूर्ण प्रतिज्ञा पर आधारित है, और पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे मनों पर प्रकट किया और हमारे हृदयों पर मुहरबन्द किया जाता है।

47. विश्वास के प्रभाव चार हैं: 1. पश्चाताप; 2. मसीही जीवन; 3. धर्मी ठहराया जाना; 4. प्रार्थना।

48. सच्चा पश्चाताप दो भागों से बना है: 1. शरीर को मारना, जो पाप की स्वीकृति और परमेश्वर की अप्रसन्नता की वास्तविक अनुभूति से उत्पन्न होता है; 2. जिलाना, जिसके फल हैं—परमेश्वर के प्रति भक्ति, पड़ोसी के प्रति प्रेम, अनन्त जीवन की आशा, जीवन की पवित्रता। इस सच्चे पश्चाताप के विपरीत झूठा पश्चाताप रखा गया है, जिसके भाग हैं: मन का टूटना, पाप-स्वीकार और प्रायश्चित्त। पहले दो सच्चे पश्चाताप में गिने जा सकते हैं, बशर्ते कि पाप की स्वीकृति के कारण हृदय का टूटना हो और वह मसीह के द्वारा क्षमा की आशा से अलग न हो; और बशर्ते कि पाप-स्वीकार या तो केवल परमेश्वर के सामने निजी हो, या कलीसिया के पासबानों के सामने स्वेच्छा से और सान्त्वना पाने के उद्देश्य से किया जाए, अपराधों की गिनती कराने और विवेक पर यातना लाने के लिये नहीं; या सार्वजनिक हो, जो सारी कलीसिया के सामने, या सारी कलीसिया की उपस्थिति में किसी एक या अनेक व्यक्तियों के सामने किया जाता है। जिसे पहले कलीसियाई प्रायश्चित्त कहा जाता था, अर्थात् पश्चाताप और पापों के सार्वजनिक अंगीकार के कारण कलीसिया की उन्नति के लिये जो किया जाता था, उसे विद्वत्तावादियों ने परमेश्वर को देय बताकर चलाया; इसी से इस संसार में क्षमा-पत्रों के पूरक और मृत्यु के बाद शोधन-स्थान की आग उत्पन्न हुई। परन्तु विद्वत्तावादियों का वह मन का टूटना, और कर्ण-पाप-स्वीकार (जैसा वे उसे कहते हैं), और वास्तविक कर्म द्वारा प्रायश्चित्त पापों की मुफ़्त क्षमा के विरुद्ध हैं।

49. मसीही जीवन के दो भाग बताए गए हैं: 1. धार्मिकता का प्रेम; कि हम पवित्र हों, क्योंकि परमेश्वर पवित्र है, और क्योंकि हम उससे जुड़े हैं और उसके लोगों में गिने गए हैं;

2. कि हमारे लिये एक नियम ठहराया जाए, जो हमें धार्मिकता के मार्ग में भटकने न दे, और कि हम मसीह के अनुरूप बनें। इसका एक नमूना हमारे सामने रखा गया है, जिसकी हमें अपने सारे जीवन में नकल करनी चाहिए। इसके बाद परमेश्वर की आशीषों का उल्लेख है, जिनका बदला हम न चुकाएँ तो यह अत्यन्त कृतघ्नता का प्रमाण होगा।

50. मसीही जीवन का सार अपना इनकार करना है।

51. इस आत्म-त्याग के उद्देश्य चार हैं। 1. कि हम अपने आपको जीवित बलिदान के रूप में परमेश्वर को समर्पित करें। 2. कि हम अपनी वस्तुओं को नहीं, वरन् उन्हें खोजें जो परमेश्वर और हमारे पड़ोसी की हैं। 3. कि हम धीरज से क्रूस उठाएँ, जिसके फल हैं—अपनी दुर्बलता की स्वीकृति, अपने धीरज की परीक्षा, दोषों का सुधार, अधिक गम्भीर प्रार्थना, अनन्त जीवन पर अधिक आनन्दपूर्ण मनन। 4. कि हम जानें कि वर्तमान जीवन और उसकी सहायताओं का आवश्यकता और आनन्द के लिये किस रीति से उपयोग करें। आवश्यकता माँगती है कि हम सब वस्तुओं को ऐसे रखें मानो हमारे पास हैं ही नहीं; कि हम निर्धनता को नम्रता से और बहुतायत को संयम से सहें; कि हम तृप्ति, भूख और अभाव को धीरज से सहना जानें; कि हम अपने पड़ोसी का ध्यान रखें, क्योंकि हमें अपनी भण्डारीगिरी का लेखा देना है; और कि सब कुछ हमारी बुलाहट के अनुरूप हो। परमेश्वर की कृपा की स्तुति करने का आनन्द हमारे लिये अधिक सशक्त तर्क होना चाहिए।

52. धर्मी ठहराए जाने पर विचार करते हुए, जो विश्वास का तीसरा प्रभाव है, सबसे पहले शब्द की व्याख्या आती है। जो परमेश्वर के न्याय में धर्मी गिना जाता है, वही धर्मी ठहराया गया कहलाता है। वह कर्मों से धर्मी ठहरता है जिसका जीवन परमेश्वर के सामने शुद्ध और निष्कलंक हो; और मसीह को छोड़ ऐसा कोई कभी नहीं हुआ। वे विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, जो कर्मों की धार्मिकता से बाहर किए जाकर मसीह की धार्मिकता को ग्रहण करते हैं। ऐसे ही परमेश्वर के चुने हुए लोग हैं।

53. इससे सबसे दृढ़ सान्त्वना मिलती है; क्योंकि कठोर न्यायी के स्थान पर हमारा सबसे दयालु पिता है। मसीह में धर्मी ठहराए जाकर और शान्ति पाकर, उसकी सामर्थ पर भरोसा रखते हुए हम पवित्रता का प्रयत्न करते हैं।

54. इसके बाद मसीही स्वतन्त्रता आती है, जो तीन भागों में है। 1. कि विश्वासियों के विवेक व्यवस्था से ऊपर उठें, और व्यवस्था की सारी धार्मिकता को भूल जाएँ। 2. कि व्यवस्था के जूए से मुक्त विवेक आनन्द से परमेश्वर की इच्छा का पालन करे। 3. कि वे उदासीन बातों के विषय में परमेश्वर के सामने किसी धार्मिक संकोच से बँधे न हों। परन्तु यहाँ हमें दो खड्डों से बचना चाहिए।

1. कि हम परमेश्वर के दानों का दुरुपयोग न करें। 2. कि हम ठोकर देने और ठोकर खाने से बचें।

55. विश्वास का चौथा प्रभाव प्रार्थना है; जिसमें उसके फल, नियम, दोष और निवेदन विचारे जाते हैं।

56. प्रार्थना का फल पाँच प्रकार का है। 1. जब हम परमेश्वर की शरण में जाने के अभ्यस्त हो जाते हैं, तो हमारा हृदय उसे खोजने, उससे प्रेम रखने और उसकी आराधना करने की और प्रबल इच्छा से भड़क उठता है। 2. हमारा हृदय किसी दुष्ट लालसा का शिकार नहीं होता, जिसके लिये परमेश्वर को साक्षी बनाते हुए हमें लज्जा आती। 3. हम उसके उपकारों को धन्यवाद के साथ ग्रहण करते हैं। 4. कोई दान पाकर हम परमेश्वर की भलाई पर और गम्भीरता से मनन करते हैं। 5. अनुभव हमारे लिये परमेश्वर की भलाई, विधान और सच्चाई को दृढ़ करता है।

57. नियम चार हैं। 1. कि हमारा हृदय वैसा ढला हो जैसा परमेश्वर से बातचीत करनेवालों को शोभा देता है; और इसलिए हाथ उठाना, हृदय ऊपर उठाना और दृढ़ बने रहना सुझाया गया है। 2. कि हम अपनी आवश्यकताओं को अनुभव करें। 3. कि हम अपनी महिमा का हर विचार त्याग दें, और सारी महिमा परमेश्वर को दें। 4. कि जब हम भारी विपत्तियों के बीच दण्डवत् पड़े हों, तब भी सफलता की निश्चित आशा से उत्साहित हों, क्योंकि हम परमेश्वर की आज्ञा और प्रतिज्ञा पर भरोसा रखते हैं।

58. वे भूल करते हैं जो इस जीवन से परे गए हुए सन्तों को पुकारते हैं। 1. क्योंकि पवित्रशास्त्र सिखाता है कि प्रार्थना केवल परमेश्वर से की जानी चाहिए, जो अकेला जानता है कि हमारे लिये क्या आवश्यक है। वह उपस्थित रहना चुनता है, क्योंकि उसने प्रतिज्ञा की है। वह ऐसा कर सकता है, क्योंकि वह सर्वशक्तिमान है। 2. क्योंकि वह चाहता है कि उससे विश्वास में बात की जाए, जो उसके वचन और प्रतिज्ञा पर टिका है। 3. क्योंकि विश्वास इस नियम से हटते ही बिगड़ जाता है। परन्तु सन्तों को पुकारने में न कोई वचन है, न कोई प्रतिज्ञा; और इसलिए कोई विश्वास नहीं; और न सन्त स्वयं सुन सकते हैं या सहायता कर सकते हैं।

59. प्रार्थना का सार, जो प्रभु मसीह के द्वारा हमें दिया गया है, एक भूमिका और दो पटियाओं में समाया है।

60. भूमिका में परमेश्वर की भलाई प्रकट है, क्योंकि वह हमारा पिता कहलाता है। इससे यह निकलता है कि हम उसकी सन्तान हैं, और किसी दूसरी ओर से सहायता ढूँढ़ना परमेश्वर पर या तो कंगाली का या क्रूरता का आरोप लगाना होगा; कि पाप हमें नम्रता से दया की बिनती करने से न रोकें; और कि हमारे बीच भाईचारे के प्रेम की भावना होनी चाहिए। इस भूमिका में परमेश्वर की सामर्थ भी प्रकट है, क्योंकि वह स्वर्ग में है। इससे हम निष्कर्ष निकालते हैं कि परमेश्वर सर्वत्र उपस्थित है, और जब हम उसे खोजें, तो हमें शरीर और आत्मा की धारणाओं से ऊपर उठना चाहिए; कि वह परिवर्तन या भ्रष्टता के सब खतरे से बहुत परे है; कि वह सारे ब्रह्माण्ड को अपनी मुट्ठी में रखता है और अपनी सामर्थ से उस पर शासन करता है।

61. पहली पटिया पूरी तरह परमेश्वर की महिमा को समर्पित है, और उसमें तीन निवेदन हैं। 1. कि परमेश्वर का नाम, अर्थात् उसकी सामर्थ, भलाई, बुद्धि, न्याय और सत्य, पवित्र माना जाए; अर्थात् मनुष्य परमेश्वर के विषय में गहरी श्रद्धा के सिवा न बोलें, न सोचें। 2. कि परमेश्वर अपने आत्मा की क्रिया से शरीर की सब भ्रष्ट लालसाओं को सुधारे; हमारे सब विचारों को अपने अधिकार की आज्ञाकारिता में लाए; अपने बच्चों की रक्षा करे; और दुष्टों के प्रयासों को विफल करे। इस निवेदन का उपयोग तिहरा है। (1) यह हमें संसार की भ्रष्टताओं से अलग करता है। (2) यह हमें शरीर को मारने की इच्छा से भड़काता है। (3) यह हमें क्रूस सहने के लिये उत्साहित करता है। 3. तीसरा निवेदन परमेश्वर की गुप्त इच्छा से नहीं, वरन् उससे सम्बन्ध रखता है जो पवित्रशास्त्र के द्वारा प्रकट की गई है, और जिसका प्रतिरूप स्वैच्छिक आज्ञाकारिता है।

62. दूसरी पटिया में शेष तीन निवेदन हैं, जो हमसे और हमारे पड़ोसियों से सम्बन्ध रखते हैं। 1. इसमें वह सब माँगा जाता है जिसकी शरीर को इस चन्द्रमा के नीचे की दशा में आवश्यकता है; क्योंकि हम अपने आपको परमेश्वर की देखभाल और विधान को सौंपते हैं कि वह हमें खिलाए, पाले और सुरक्षित रखे। 2. हम वे बातें माँगते हैं जो आत्मिक जीवन में सहायक हैं, अर्थात् पापों की क्षमा, जिसमें पाप का दण्ड चुकाना निहित है, और जिसमें यह शर्त जोड़ी गई है कि जब हमारे विरुद्ध कर्म या वचन से अपराध किया गया हो, तब भी हम उन्हें उनके अपराध क्षमा करें। 3. हम परीक्षाओं से छुटकारा माँगते हैं, अर्थात् कि हम कवच से सज्जित और ईश्वरीय सुरक्षा से बचाए जाएँ, ताकि जय पा सकें। परीक्षाएँ अपने कारण में भिन्न होती हैं, क्योंकि परमेश्वर, शैतान, संसार और शरीर परखते हैं; अपने विषय में, क्योंकि हम दाहिनी ओर धन, सम्मान, सुन्दरता, इत्यादि के विषय में, और बाईं ओर निर्धनता, अवमानना और क्लेशों के विषय में परखे जाते हैं; और अपने उद्देश्य में, क्योंकि परमेश्वर भक्तों को भलाई के लिये परखता है, पर शैतान, शरीर और संसार उन्हें बुराई के लिये परखते हैं।

63. विश्वास के ये चारों प्रभाव हमें चुनाव की और अन्तिम पुनरुत्थान की निश्चयता तक पहुँचाते हैं।

64. चुनाव के कारण ये हैं। निमित्त कारण है—परमेश्वर की मुफ़्त दया, जिसे हमें दीनता और धन्यवाद के साथ स्वीकार करना चाहिए। उपादान कारण है—मसीह, प्रिय पुत्र। अन्तिम कारण है—कि अपने उद्धार के निश्चय के कारण, क्योंकि हम परमेश्वर के लोग हैं, हम इस जीवन में और आनेवाले जीवन में सदा-सर्वदा उसकी महिमा करें। प्रभाव, चाहे बहुतों के विषय में हों या किसी एक व्यक्ति के विषय में, इस प्रकार हैं कि कुछ को चुनकर और दूसरों को न्यायपूर्वक त्यागकर। चुने हुए लोग वचन के प्रचार और पवित्र आत्मा के प्रकाश से बुलाए जाते हैं, धर्मी ठहराए जाते हैं और पवित्र किए जाते हैं, कि अन्त में महिमा पाएँ।

65. अन्तिम पुनरुत्थान होगा। 1. क्योंकि किसी और मान्यता पर हम सिद्ध रूप से महिमावान नहीं हो सकते। 2. क्योंकि मसीह हमारे ही शरीर में जी उठा। 3. क्योंकि परमेश्वर सर्वशक्तिमान है।

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