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झूठी कलीसिया और सच्ची कलीसिया की तुलना
अध्याय 2।
झूठी कलीसिया और सच्ची कलीसिया की तुलना।
इस अध्याय के विभाजन ये हैं,—I. पोप-तन्त्र से मिलती-जुलती एक नकली कलीसिया का वर्णन, जो व्यक्तिगत उत्तराधिकार का घमण्ड करती है; उसका खण्डन साथ जोड़ा गया है। खण्ड 1-4। II. पोप के अनुयायियों द्वारा लगाए गए झूठी शिक्षा और फूट के आरोपों का रूढ़िवादी कलीसियाओं की ओर से उत्तर। वर्तमान में पोप-तन्त्र के अधीन विद्यमान कलीसियाओं का वर्णन।
खण्ड।
1. पिछले अध्याय में विचारे गए विषयों का सारांश। वर्तमान अध्याय का सार—अर्थात् जहाँ झूठ और मिथ्या का बोलबाला है, वहाँ कोई कलीसिया नहीं। जहाँ भी मसीह की शुद्ध शिक्षा प्रबल नहीं, वहाँ मिथ्या है।
2. यह मिथ्या पोप-तन्त्र के अधीन प्रबल है। इसलिए पोप-तन्त्र कलीसिया नहीं है। तो भी पोप के अनुयायी अपनी कलीसिया की बड़ाई करते हैं, और जो उससे असहमत हैं उन पर झूठी शिक्षा और फूट का आरोप लगाते हैं। वे अपने घमण्ड को व्यक्तिगत उत्तराधिकार के नाम से सँभालने का प्रयत्न करते हैं। वह उत्तराधिकार जो मसीह के सत्य को त्याग देता है, सिद्ध किया गया कि कुछ महत्त्व नहीं रखता।
3. इस प्रमाण की पुष्टि, 1. पवित्रशास्त्र के उदाहरणों और अंशों से; 2. तर्क और अगस्तीन के अधिकार से।
4. पोप के अनुयायी कुछ भी दिखावा करें, जहाँ परमेश्वर का वचन प्रकट नहीं होता वहाँ कोई कलीसिया नहीं।
5. व्यक्तिगत उत्तराधिकार की आपत्ति और झूठी शिक्षा तथा फूट के आरोप का, पवित्रशास्त्र और अगस्तीन दोनों से, खण्डन।
6. यही बात सिप्रियन के अधिकार से पुष्ट। पोप के अनुयायियों के श्राप का कोई महत्त्व नहीं।
7. पोप के अनुयायियों की कलीसियाएँ उन इस्राएली कलीसियाओं की दशा में हैं जो यारोबाम के अधीन अन्धविश्वास और मूर्तिपूजा में जा गिरीं।
8. उन इस्राएली कलीसियाओं का स्वरूप।
9. इसलिए पोप के अनुयायी अन्याय करते हैं जब वे हमें अपनी कलीसिया की सहभागिता के लिए विवश करना चाहते हैं। उनकी दो माँगें। पहली का उत्तर। प्रश्न का सार। हम पोप के अनुयायियों की बाहरी आराधना में भाग क्यों नहीं ले सकते।
10. पोप के अनुयायियों की दूसरी माँग का उत्तर।
11. यद्यपि पोप-तन्त्र को उचित रीति से कलीसिया नहीं कहा जा सकता, तो भी स्वयं मसीह-विरोधी की इच्छा के विरुद्ध पोप-तन्त्र में कलीसिया का कुछ चिह्न बचा है, जैसे बपतिस्मा और कुछ अन्य अवशेष।
12. पोप-तन्त्र को कलीसिया का नाम नहीं दिया जाता, यद्यपि उसके प्रभुत्व में किसी प्रकार की कलीसियाएँ रही हैं। इसमें पौलुस की उस भविष्यद्वाणी की पूर्ति है कि मसीह-विरोधी परमेश्वर के मन्दिर में बैठेगा। ऐसी कलीसियाओं की शोचनीय दशा। अध्याय का सारांश।
1. वचन और संस्कारों की सेवा का हमारे लिए कितना महत्त्व होना चाहिए, और उसके प्रति आदर कहाँ तक जाना चाहिए ताकि वह कलीसिया को पहचानने का सदा का चिह्न ठहरे, यह समझाया जा चुका है; क्योंकि हमने पहले यह दिखाया है कि जहाँ वह पूर्ण और अखण्डित रूप में है, वहाँ आचरण की कोई भूल और कोई दोष हमें कलीसिया का नाम देने से न रोके;534 और दूसरे, कि इस सेवकाई में छोटी-मोटी भूलें हमें उसे अवैध मानने का कारण न बनें। इसके अतिरिक्त हमने दिखाया है कि जिन भूलों को इस प्रकार क्षमा किया जाना चाहिए, वे वे हैं जिनसे धर्म के मूल सिद्धान्त को हानि नहीं पहुँचती, और जिनसे धर्म के वे अंश दबाए नहीं जाते जिन पर सब विश्वासियों को सहमत होना चाहिए, और संस्कारों के विषय में वे दोष ऐसे हैं जो उनके स्थापित करनेवाले की वैध विधि को न नष्ट करते हैं न बिगाड़ते हैं।535 परन्तु जैसे ही मिथ्या धर्म के गढ़ में घुस आती है, जैसे ही आवश्यक सिद्धान्त का सार उलट दिया जाता है और संस्कारों का प्रयोग नष्ट कर दिया जाता है, वैसे ही कलीसिया की मृत्यु निश्चय हो जाती है, जैसे मनुष्य का जीवन तब नष्ट हो जाता है जब उसका गला बेध दिया जाए या उसके मर्मस्थान पर घातक चोट लगे। यह पौलुस के उन शब्दों से स्पष्ट है जब वह कहता है कि कलीसिया “प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की नींव पर बनी है, और मसीह यीशु स्वयं उसके कोने का सिरे का पत्थर है” (इफिसियों 2:20)। यदि कलीसिया प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा पर स्थापित है, जिसके द्वारा विश्वासियों को आज्ञा दी जाती है कि वे अपना उद्धार केवल मसीह में रखें, तो यदि वह शिक्षा नष्ट कर दी जाए, तो कलीसिया कैसे खड़ी रह सकती है? जब धर्म का वह सार जो अकेला उसे थाम सकता है, हट जाता है, तब कलीसिया का गिरना अनिवार्य है। फिर, यदि सच्ची कलीसिया “सत्य का खम्भा और नींव” है (1 तीमुथियुस 3:15), तो यह निश्चित है कि जहाँ झूठ और मिथ्या ने प्रभुत्व जमा लिया है, वहाँ कोई कलीसिया नहीं।
534 फ्रेंच में, “Secondement, qu’encore il y ait quelques petites fautes, ou en la doctrine ou aux sacremens qu’icelui ne laisse point d’avoir sa vigeur.”—दूसरे, कि यद्यपि शिक्षा में या संस्कारों में कुछ छोटे दोष हों, तो भी कलीसिया का बल जाता नहीं रहता।
2. चूँकि पोप-तन्त्र के अधीन बातें इस दशा में हैं, इसलिए हम समझ सकते हैं कि वहाँ कलीसिया का कितना भाग बचा है।536 वहाँ वचन की सेवा के स्थान पर एक बिगड़ा हुआ शासन प्रचलित है, जो झूठ से बना है, ऐसा शासन जो शुद्ध ज्योति को कुछ तो बुझाता है और कुछ दबाता है। प्रभु-भोज के स्थान पर सबसे घिनौनी ईशनिन्दा आ घुसी है, परमेश्वर की आराधना असहनीय अन्धविश्वासों के नाना ढेर से कुरूप कर दी गई है; शिक्षा (जिसके बिना मसीही धर्म टिकता ही नहीं) पूरी तरह दफना दी गई और ठुकरा दी गई है, सार्वजनिक सभाएँ मूर्तिपूजा और अभक्ति की पाठशालाएँ हैं। इसलिए ऐसी दुष्टता में प्राणघातक सहभागिता से इनकार करने में हमें मसीह की कलीसिया से कट जाने का कोई जोखिम नहीं। कलीसिया की सहभागिता इसलिए स्थापित नहीं की गई थी कि वह हमें मूर्तिपूजा, अभक्ति, परमेश्वर के अज्ञान और अन्य प्रकार की बुराइयों में बाँधनेवाली जंजीर बने, परन्तु इसलिए कि हमें परमेश्वर के भय और सत्य की आज्ञाकारिता में बनाए रखे। वे सचमुच अपनी कलीसिया की ऊँची डींग हाँकते हैं,537 मानो संसार में और कोई कलीसिया है ही नहीं; और फिर मानो बात समाप्त हो गई हो, वे यह ठहरा देते हैं कि जो कोई उस कलीसिया की आज्ञाकारिता से, जिसका वे इस प्रकार चित्रण करते हैं, अलग हो जाते हैं वे सब फूट डालनेवाले हैं, और जो कोई उसकी शिक्षा के विरुद्ध फुसफुसाने का साहस करते हैं वे सब झूठी शिक्षा देनेवाले हैं (देखिए खण्ड 5)। परन्तु वे किन तर्कों से यह सिद्ध करते हैं कि सच्ची कलीसिया उन्हीं के पास है? वे उन प्राचीन अभिलेखों का हवाला देते हैं जो पहले इटली, फ्रांस और स्पेन में थे, और दावा करते हैं कि उनकी उत्पत्ति उन पवित्र जनों से है जिन्होंने खरी शिक्षा के द्वारा कलीसियाओं की नींव डाली और उन्हें खड़ा किया, शिक्षा को पक्का किया, और अपने लहू से कलीसिया का भवन उठाया; वे दावा करते हैं कि इस प्रकार आत्मिक वरदानों और शहीदों के लहू से पवित्र की गई कलीसिया बिशपों के निरन्तर उत्तराधिकार के द्वारा विनाश से बची रही। वे उस महत्त्व पर बल देते हैं जो आइरेनियस, टर्टुलियन, ओरिजन, अगस्तीन और अन्य लोगों ने इस उत्तराधिकार को दिया (देखिए खण्ड 3)। ये दलीलें कितनी निस्सार और स्पष्टतः हास्यास्पद हैं, यह मैं हर उस मनुष्य को, जो थोड़ी देर मेरे साथ इस विषय पर विचार करेगा, बिना किसी कठिनाई के समझा दूँगा। यदि मुझे आशा होती कि मैं शिक्षा देकर अपने विरोधियों को लाभ पहुँचा सकूँगा, तो मैं उन्हें भी गम्भीर ध्यान देने का आग्रह करता; परन्तु क्योंकि उन्होंने सत्य के सब विचार को एक ओर रख दिया है, और जैसे भी बन पड़े अपने ही स्वार्थ को साधना अपना एकमात्र उद्देश्य बना लिया है, इसलिए मैं केवल थोड़ी-सी बातें कहूँगा जिनसे भले और सत्यप्रेमी मनुष्य उनकी कुतर्कों से अपने आप को छुड़ा सकें। पहले, मैं उनसे पूछता हूँ कि वे अफ़्रीका, मिस्र और सारे एशिया का हवाला क्यों नहीं देते, इसलिए कि उन सब क्षेत्रों में उस पवित्र उत्तराधिकार का, जिसकी सहायता से वे कलीसियाओं के बने रहने का घमण्ड करते हैं, अन्त हो गया। इसलिए वे इस दावे की ओर लौट आते हैं कि सच्ची कलीसिया उन्हीं के पास है, क्योंकि जब से वह अस्तित्व में आई तब से वह बिशपों से कभी रहित नहीं रही, क्योंकि वे अटूट शृंखला में एक के बाद एक आते गए। परन्तु यदि मैं उनके सामने यूनान को ले आऊँ तो? इसलिए मैं फिर उनसे पूछता हूँ, वे क्यों कहते हैं कि कलीसिया यूनानियों के बीच नष्ट हो गई, जिनके बीच बिशपों के उत्तराधिकार में कभी कोई रुकावट नहीं हुई—वह उत्तराधिकार जो उनके मत में कलीसिया का एकमात्र रखवाला और रक्षक है? वे यूनानियों को फूट डालनेवाले ठहराते हैं। क्यों? इसलिए कि प्रेरितीय आसन से विद्रोह करके उन्होंने अपना विशेषाधिकार खो दिया। क्या कहा? क्या जो मसीह से विद्रोह करते हैं वे उसे खो देने के कहीं अधिक योग्य नहीं? इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि उत्तराधिकार का दिखावा व्यर्थ है, यदि वंशज मसीह के उस सत्य को, जो उन्हें अपने पूर्वजों से सुरक्षित और अबिगड़ा हुआ मिला था, थामे न रहें और उसमें बने न रहें।
535 यहाँ कैल्विन इस प्रश्न का उत्तर देते हैं, “(दृश्य) कलीसिया कहाँ तक भूल में जा सकती है कि फिर भी वह इस नाम के योग्य बनी रहे?” छोटे दोष या तुच्छ भूलें, चाहे शिक्षा में हों चाहे आचरण में, कलीसिया को उस सीमा तक नहीं पहुँचातीं। परन्तु यदि धर्म के मूल सिद्धान्तों को हानि पहुँचे या वे दबा दिए जाएँ, और संस्कारों के आवश्यक तत्त्व नष्ट हो जाएँ, तो कलीसिया मर जाती है और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाता है।
536 देखिए अध्याय 1 खण्ड 10; 2 खण्ड 10; 8 खण्ड 12।
537 फ्रेंच में, “Je say bien que les flatteurs du Pape magnifient grandement leur Eglise.”—मैं भली-भाँति जानता हूँ कि पोप के चापलूस अपनी कलीसिया की बड़ी बड़ाई करते हैं।
3. इसलिए आज के दिन रोमन-पन्थियों का दिखावा ठीक वही है जो प्राचीन काल में यहूदियों का था, जब प्रभु के भविष्यद्वक्ता उन पर अन्धेपन, अभक्ति और मूर्तिपूजा का दोष लगाते थे। क्योंकि जैसे यहूदी अपने मन्दिर, विधियों और याजकपद का घमण्ड करते थे, जिनके द्वारा वे, जैसा वे मानते थे, प्रबल कारण से कलीसिया को नापते थे, वैसे ही कलीसिया के स्थान पर रोमन-पन्थी हमारे सामने कुछ बाहरी मुखौटे रखते हैं, जो प्रायः कलीसिया से कोसों दूर होते हैं, और जिनके बिना कलीसिया भली-भाँति रह सकती है। इसलिए उनका खण्डन करने के लिए हमें उस तर्क के अतिरिक्त किसी और तर्क की आवश्यकता नहीं जिससे यिर्मयाह ने यहूदियों के मूर्खतापूर्ण भरोसे का सामना किया—अर्थात्, “तुम धोखा देनेवाली बातों पर भरोसा मत रखो, कि यह यहोवा का मन्दिर है, यहोवा का मन्दिर है, यहोवा का मन्दिर है” (यिर्मयाह 7:4)। प्रभु किसी वस्तु को तब तक अपनी नहीं मानता जब तक उसका वचन सुना और श्रद्धा से माना न जाए। इसलिए यद्यपि परमेश्वर का तेज करूबों के बीच पवित्रस्थान में विराजमान था (यहेजकेल 10:4), और उसने प्रतिज्ञा की थी कि वह वहाँ अपना नियत निवास रखेगा, फिर भी जब याजकों ने बिगड़े अन्धविश्वासों से उसकी आराधना को भ्रष्ट कर दिया, तब उसने उसे कहीं और हटा लिया, और उस स्थान को बिना किसी पवित्रता के छोड़ दिया। यदि वह मन्दिर, जो परमेश्वर के स्थायी निवास के लिए पवित्र किया हुआ प्रतीत होता था, परमेश्वर द्वारा त्यागा जा सकता और अपवित्र हो सकता था, तो रोमन-पन्थियों के पास यह दिखावा करने का कोई आधार नहीं कि परमेश्वर व्यक्तियों या स्थानों से ऐसा बँधा है, और बाहरी विधियों से ऐसा जुड़ा है, कि उसे उन्हीं के साथ रहना पड़े जिनके पास केवल कलीसिया का नाम और रूप है। यही वह प्रश्न है जिसकी चर्चा पौलुस रोमियों की पत्री में नौवें से बारहवें अध्याय तक करता है। निर्बल विवेक बहुत विचलित हुए, जब वे लोग जो परमेश्वर के लोग प्रतीत होते थे, सुसमाचार की शिक्षा को केवल ठुकराते ही नहीं, वरन् उस पर अत्याचार भी करते थे। इसलिए शिक्षा समझाने के पश्चात् वह इस कठिनाई को दूर करता है, यह कहकर कि वे यहूदी, जो सत्य के शत्रु थे, कलीसिया नहीं थे, यद्यपि उनमें कलीसिया के बाहरी रूप के लिए और कुछ चाहने योग्य नहीं रह गया था। उसके इनकार का आधार यह है कि उन्होंने मसीह को ग्रहण नहीं किया। गलातियों की पत्री में, जब वह इश्माएल की तुलना इसहाक से करता है, तब और भी स्पष्ट रूप से कहता है कि कलीसिया में बहुत-से लोग स्थान रखते हैं जिनका उत्तराधिकार से कोई सम्बन्ध नहीं, क्योंकि वे स्वतंत्र माता की सन्तान नहीं थे। इसी से वह दो यरूशलेमों की तुलना करने लगता है, क्योंकि जैसे व्यवस्था सीनै पर्वत पर दी गई, पर सुसमाचार यरूशलेम से निकला, वैसे ही बहुत-से जो दासत्व में जन्मे और पले हैं, निडर होकर घमण्ड करते हैं कि वे परमेश्वर और कलीसिया के पुत्र हैं; वरन् आप स्वयं भ्रष्ट होते हुए भी परमेश्वर के सच्चे पुत्रों को अभिमान से तुच्छ जानते हैं। इसी प्रकार हम भी, जब सुनते हैं कि स्वर्ग से एक बार यह घोषणा हुई थी, “दासी और उसके पुत्र को निकाल दे,” तो इस अटल आज्ञा पर भरोसा करें, और उनके निरर्थक घमण्ड को निडर होकर तुच्छ जानें। क्योंकि यदि वे बाहरी अंगीकार पर इतराते हैं, तो इश्माएल का भी खतना हुआ था; यदि वे प्राचीनता पर आधार रखते हैं, तो वह पहलौठा था; तो भी हम देखते हैं कि वह निकाल दिया गया। यदि कारण पूछा जाए, तो पौलुस उसे बताता है (रोमियों 9:6), कि केवल वे ही पुत्र गिने जाते हैं जो शिक्षा के शुद्ध और वैध बीज से जन्मे हैं। इसी आधार पर परमेश्वर घोषणा करता है कि वह अभक्त याजकों से बँधा हुआ नहीं था, यद्यपि उसने उनके पिता लेवी के साथ वाचा बाँधी थी कि वह उनका दूत, या व्याख्याता होगा (मलाकी 2:4); वरन् वह उस झूठे घमण्ड को उन्हीं पर उलट देता है जिससे वे भविष्यद्वक्ताओं के विरुद्ध उठा करते थे—अर्थात् यह कि याजकपद की गरिमा को विशेष आदर से माना जाए। यह बात वह स्वयं प्रसन्नता से मानता है: और वह उनके साथ इस आधार पर विवाद करता है कि वह वाचा को पूरा करने को तैयार है, जबकि वे अपनी ओर से उसे पूरा न करने के कारण त्याग दिए जाने के योग्य हैं। तो यहाँ उत्तराधिकार का मूल्य यह है जब वह अनुकरण और तदनुरूप आचरण से जुड़ा न हो: वंशज, जैसे ही वे अपने मूल से विद्रोह करने के दोषी ठहरते हैं, सब सम्मान से वंचित हो जाते हैं; जब तक कि हम यह कहने को तैयार न हों कि काइफा, क्योंकि वह बहुत-से भक्त याजकों के पश्चात् आया (वरन् हारून से उस तक शृंखला अटूट रही), उस श्रापित सभा को कलीसिया का नाम पाने का अधिकार था। सांसारिक शासनों में भी कोई यह देखना सह न सकेगा कि कैलिगुला, नीरो, हेलियोगाबालुस और ऐसों के अत्याचार को गणराज्य की सच्ची दशा बताया जाए, क्योंकि वे ब्रूटस, सिपियो और कैमिलस जैसे पुरुषों के पश्चात् आए।538 कलीसिया के शासन में विशेषकर इससे अधिक असंगत कुछ नहीं कि शिक्षा की उपेक्षा की जाए और उत्तराधिकार व्यक्तियों में रखा जाए। और वास्तव में उन पवित्र शिक्षकों के अभिप्राय से, जिन्हें वे झूठे ढंग से हम पर थोपते हैं, इससे अधिक दूर कुछ नहीं था कि वे स्पष्टतः यह सिखाएँ कि जहाँ-जहाँ बिशपों के बाद बिशप निरन्तर आते गए, वहाँ कलीसियाएँ मानो वंशानुगत अधिकार से विद्यमान हैं। परन्तु जब बिना विवाद के यह बात थी कि आरम्भ से लेकर उनके दिन तक शिक्षा में कोई परिवर्तन नहीं हुआ, तब उन्होंने यह मान लिया कि उनकी सब भूलों के खण्डन के लिए इतना ही पर्याप्त है कि वे उस शिक्षा के विरुद्ध थीं जो प्रेरितों तक ने निरन्तर और एकमत होकर मानी थी। इसलिए अब उनके पास कलीसिया के उस नाम को, जिसका हम उचित आदर करते हैं, बहाना बनाने का कोई आधार नहीं रहा; परन्तु जब हम परिभाषा पर आते हैं, तो न केवल (प्रचलित कहावत के अनुसार) पानी उनसे चिपक जाता है, वरन् वे अपने ही कीचड़ में अटक जाते हैं, क्योंकि वे मसीह की पवित्र दुल्हिन के स्थान पर एक नीच वेश्या को रख देते हैं। ताकि यह अदला-बदली हमें धोखा न दे, हम अन्य चेतावनियों के साथ अगस्तीन की यह चेतावनी भी ध्यान में रखें। कलीसिया के विषय में वह कहता है, “वह स्वयं कभी-कभी ठोकरों की भीड़ से धुँधली और मानो बादलों से ढकी हो जाती है; कभी शान्ति के समय में वह शान्त और स्वतंत्र दिखाई देती है; कभी वह क्लेश और परीक्षा की लहरों से ढकी और उछाली जाती है।”—(August. ad Vincent. Epist. 48)। उदाहरण के रूप में वह बताता है कि कलीसिया के सबसे दृढ़ खम्भों ने अकसर विश्वास के लिए निर्वासन को साहस से सहा, या सारे संसार में छिपे रहे।
538 फ्रेंच में, “Or tant s’en faut que cela ait lieu, que mesmes aux gouvernemens terrestres il ne seroit point supportable. Comme il n’y a nul propos de dire que la tyrannie de Caligula, Neron, Heliogabale, et leurs semblables soit le vrai etat de la cité de Rome, pourcequ’ils ont succedé aux bons governeurs qui etoient establis par le peuple.”—अब यह बात ऐसी होने से इतनी दूर है कि सांसारिक शासनों में भी यह सहने योग्य न होती। जैसे यह कहने का कोई आधार नहीं कि कैलिगुला, नीरो, हेलियोगाबालुस और उनके समान लोगों का अत्याचार रोम नगर की सच्ची दशा है, इसलिए कि वे उन अच्छे शासकों के पश्चात् आए जो प्रजा द्वारा ठहराए गए थे।
4. इसी प्रकार रोमन-पन्थी आज हम पर आक्रमण करते हैं, और कलीसिया के नाम से अनजान लोगों को डराते हैं, जबकि वे मसीह के प्राणघातक शत्रु हैं। इसलिए यद्यपि वे एक मन्दिर, एक याजकपद, और ऐसे ही अन्य मुखौटे दिखाते हैं, तो भी वह खोखली चमक जिससे वे सीधे-सादे लोगों की आँखें चौंधियाते हैं, हमें रत्ती भर भी यह मानने की ओर न झुकाए कि जहाँ परमेश्वर का वचन प्रकट नहीं होता वहाँ कोई कलीसिया है। प्रभु ने हमें कभी न चूकनेवाली कसौटी दी है जब उसने कहा, “जो कोई सत्य का है वह मेरी आवाज़ सुनता है” (यूहन्ना 18:37)। फिर, “अच्छा चरवाहा मैं हूँ; मैं अपनी भेड़ों को जानता हूँ, और मेरी भेड़ें मुझे जानती हैं।” “मेरी भेड़ें मेरी आवाज़ सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं।” इससे कुछ पहले उसने कहा था कि जब चरवाहा “अपनी भेड़ों को बाहर निकालता है, तो उनके आगे आगे चलता है, और भेड़ें उसके पीछे पीछे हो लेती हैं, क्योंकि वे उसका शब्द पहचानती हैं। परन्तु वे पराये के पीछे नहीं जाएँगी, वरन् उससे भागेंगी, क्योंकि वे परायों का शब्द नहीं पहचानतीं” (यूहन्ना 10:14, 4, 5)। तब हम अपनी ही इच्छा से कलीसिया का ऐसा मूर्खतापूर्ण अनुमान क्यों बनाएँ, जबकि मसीह ने उसे ऐसे चिह्न से बताया है जिसमें रत्ती भर भी अस्पष्टता नहीं, ऐसा चिह्न जो सर्वत्र दिखाई देता है, जिसका होना निश्चय ही कलीसिया के होने को प्रमाणित करता है, जबकि उसका न होना उस सब के न होने को प्रमाणित करता है जो उचित रूप से कलीसिया का नाम पाता है? पौलुस घोषणा करता है कि कलीसिया न मनुष्यों के निर्णयों पर स्थापित है, न याजकपद पर, परन्तु प्रेरितों और भविष्यद्वक्ताओं की शिक्षा पर (इफिसियों 2:20)। वरन् यरूशलेम को बाबुल से, मसीह की कलीसिया को शैतान के षड्यंत्र से, उसी भेद करनेवाली कसौटी से पहचाना जाना है जो हमारे उद्धारकर्ता ने उन पर लगाई, “जो परमेश्वर की ओर से होता है, वह परमेश्वर की बातें सुनता है; तुम इसलिए नहीं सुनते कि परमेश्वर की ओर से नहीं हो” (यूहन्ना 8:47)। संक्षेप में, चूँकि कलीसिया मसीह का राज्य है, और वह केवल अपने वचन से राज्य करता है, तो क्या उन कथनों के झूठ होने में कोई सन्देह हो सकता है जिनसे मसीह का राज्य उसके राजदण्ड के बिना, अर्थात् उसके पवित्र वचन के बिना, चित्रित किया जाता है?
5. उनके इस आरोप के विषय में कि हम झूठी शिक्षा और फूट के दोषी हैं, क्योंकि हम भिन्न शिक्षा का प्रचार करते हैं, उनके नियमों के अधीन नहीं होते, और प्रार्थना, बपतिस्मा, प्रभु-भोज के संचालन तथा अन्य पवित्र विधियों के लिए उनसे अलग इकट्ठे होते हैं, यह वास्तव में बहुत गम्भीर आरोप है, पर ऐसा नहीं जिसके लिए लम्बे और कठिन बचाव की आवश्यकता हो। झूठी शिक्षा देनेवाले और फूट डालनेवाले का नाम उन पर लगाया जाता है जो कलीसिया से असहमत होकर उसकी सहभागिता को नष्ट करते हैं। यह सहभागिता दो जंजीरों से बँधी है—अर्थात् खरी शिक्षा में एकमत होना और भाईचारे का प्रेम। इसी से अगस्तीन झूठी शिक्षा देनेवालों और फूट डालनेवालों में यह भेद करता है कि पहले झूठे सिद्धान्तों से विश्वास की शुद्धता को बिगाड़ते हैं, जबकि दूसरे कभी-कभी उसी विश्वास को थामे रहते हुए भी मेल के बन्धन को तोड़ देते हैं (August. Lib. Quæst. in Evang. Mt.)। परन्तु ध्यान देने की बात यह है कि प्रेम की यह एकता विश्वास की एकता पर इतनी निर्भर है कि उसी में उसका आरम्भ, उसका अन्त, और अन्ततः उसका एकमात्र नियम है। इसलिए हम स्मरण रखें कि जब-जब कलीसियाई एकता की हमें सिफारिश की जाती है, तब-तब माँग यह होती है कि जब हमारे मन मसीह में सहमत हों, तब हमारी इच्छाएँ भी मसीह में पारस्परिक सद्भावना से एक हों। इसीलिए पौलुस, जब हमें इसके लिए समझाता है, तो अपना मूल सिद्धान्त यह लेता है कि “एक ही प्रभु, एक ही विश्वास, एक ही बपतिस्मा” है (इफिसियों 4:5)। वरन् जब वह हमें “एक चित्त और एक मन” होने को कहता है, तो तुरन्त जोड़ता है, “जैसा मसीह यीशु का स्वभाव था वैसा ही तुम्हारा भी स्वभाव हो” (फिलिप्पियों 2:2, 5); जिससे वह संकेत करता है कि जहाँ प्रभु का वचन नहीं, वहाँ वह विश्वासियों का मेल नहीं, वरन् अभक्तों का गुट है।
6. सिप्रियन भी पौलुस का अनुसरण करते हुए कलीसियाई एकता का स्रोत मसीह की एक ही अध्यक्षता में ढूँढ़ते हैं, और फिर जोड़ते हैं, “कलीसिया एक है, जो उर्वरता की वृद्धि से बढ़कर अधिक भीड़ तक फैल जाती है, जैसे सूर्य की किरणें बहुत हैं पर प्रकाश एक है, और वृक्ष की डालियाँ बहुत हैं पर तना एक है जो दृढ़ जड़ पर टिका है। जब बहुत-सी धाराएँ एक ही सोते से बहती हैं, तो यद्यपि स्रोत की प्रचुरता के उमड़ने से बहुतायत फैली हुई दिखाई देती है, तो भी उद्गम में एकता बनी रहती है। सूर्य की देह से एक किरण तोड़ लो, तो एकता में कोई विभाजन नहीं होता। वृक्ष से एक डाली तोड़ दो, तो वह डाली अंकुरित न होगी। सोते से एक धारा काट दो, तो जो काट ली गई है वह सूख जाती है। इसी प्रकार प्रभु की ज्योति से व्याप्त कलीसिया सारे भूमण्डल पर फैली हुई है, और फिर भी वह ज्योति जो सर्वत्र फैली है एक ही है” (Cyprian, de Simplicit. Prælat.)। मसीह के सब अंगों का एक दूसरे से जो अटूट सम्बन्ध है, उसे इससे अधिक सुन्दर शब्दों में नहीं कहा जा सकता। हम देखते हैं कि वह हमें निरन्तर सिर की ओर बुलाता है। इसलिए वह कहता है कि जब झूठी शिक्षाएँ और फूट उत्पन्न होती हैं, तो इसका कारण यह होता है कि मनुष्य सत्य के उद्गम की ओर नहीं लौटते, सिर को नहीं ढूँढ़ते, और स्वर्गीय गुरु की शिक्षा को नहीं थामे रहते। अब वे जाएँ और हमारे विरुद्ध झूठी शिक्षा देनेवाले कहकर चिल्लाएँ कि हम उनकी कलीसिया से अलग हो गए, जबकि हमारे अलग होने का एकमात्र कारण यह है कि वे सत्य के शुद्ध अंगीकार को सह नहीं सकते। मैं इसकी चर्चा नहीं करता कि उन्होंने हमें श्रापों और धिक्कारों से निकाल दिया है। यह तथ्य हमें निर्दोष ठहराने के लिए पर्याप्त से अधिक है, जब तक वे प्रेरितों को भी, जिनके साथ हमारा साझा मामला है, फूट डालनेवाले न ठहराएँ। मैं कहता हूँ, मसीह ने अपने प्रेरितों को पहले ही चेताया था, “वे तुम्हें सभा-घरों से निकाल देंगे” (यूहन्ना 16:2)। जिन सभा-घरों की वह बात करता है, वे उस समय वैध कलीसियाएँ मानी जाती थीं। इसलिए जब यह निश्चित है कि हम निकाल दिए गए, और हम यह दिखाने को तैयार हैं कि यह मसीह के नाम के कारण हुआ, तो हमारे पक्ष या विपक्ष में कोई निर्णय देने से पहले कारण की जाँच की जानी चाहिए। परन्तु यदि वे चाहें, तो मैं इसे उन्हीं पर छोड़ने को तैयार हूँ; मेरे लिए इतना पर्याप्त है कि हमें उनसे अलग होना ही पड़ा ताकि हम मसीह के निकट आ सकें।
7. उन सब कलीसियाओं को, जिन पर रोमी मूर्ति के अत्याचार ने अधिकार जमा लिया है, कौन-सा स्थान देना चाहिए, यह तब और स्पष्ट होगा जब हम उनकी तुलना प्राचीन इस्राएली कलीसिया से करें, जैसा भविष्यद्वक्ताओं ने उसका चित्रण किया है। जब तक यहूदी और इस्राएली वाचा की व्यवस्थाओं में बने रहे, तब तक उनके बीच सच्ची कलीसिया थी; अर्थात् परमेश्वर की कृपा से उन्हें कलीसिया के लाभ प्राप्त थे। व्यवस्था में सच्ची शिक्षा थी, और उसकी सेवा भविष्यद्वक्ताओं और याजकों को सौंपी गई थी। वे खतने के चिह्न से धर्म में दीक्षित किए गए थे, और अन्य संस्कारों से विश्वास में प्रशिक्षित और दृढ़ किए गए थे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जिन उपाधियों से प्रभु ने अपनी कलीसिया को सम्मानित किया वे उनके समाज पर लागू होती थीं। जब उन्होंने प्रभु की व्यवस्था को छोड़ दिया और मूर्तिपूजा तथा अन्धविश्वास में गिर गए, तो उन्होंने वह विशेषाधिकार कुछ-कुछ खो दिया। क्योंकि कौन उन्हें कलीसिया का नाम देने से इनकार करने का साहस करेगा जिनके पास प्रभु ने अपने वचन का प्रचार और अपने भेदों का पालन रखा था? दूसरी ओर, कौन उस सभा को बिना किसी रोक-टोक के कलीसिया का नाम देने का साहस कर सकता है जिसके द्वारा परमेश्वर का वचन खुले आम और दण्डमुक्त होकर पैरों तले रौंदा जाता है—जहाँ उसकी सेवा, जो उसका मुख्य आधार और कलीसिया की प्राणस्वरूप है, नष्ट कर दी गई है?
8. तब क्या? (कोई कहेगा); क्या मूर्तिपूजा में गिरने की तिथि से यहूदियों के पास कलीसिया का एक कण भी नहीं रहा? उत्तर सरल है। पहले, मैं कहता हूँ कि उस पतन में ही कई सीढ़ियाँ थीं; क्योंकि हम यह नहीं मान सकते कि यहूदा और इस्राएल दोनों जिन चूकों से परमेश्वर की शुद्ध आराधना से हटे वे एक ही थीं। यारोबाम ने, जब उसने परमेश्वर की स्पष्ट मनाही के विरुद्ध बछड़े गढ़े और आराधना के लिए अवैध स्थान ठहराया, तो धर्म को पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया। यहूदी बाहरी धार्मिक रूप में कोई अनुचित परिवर्तन करने से पहले आचरण और अन्धविश्वासी मतों में बिगड़ चुके थे। क्योंकि यद्यपि उन्होंने रहबाम के अधीन बहुत-सी बिगड़ी हुई विधियाँ अपना ली थीं, तो भी जब तक व्यवस्था की शिक्षा, याजकपद और वे विधियाँ जो परमेश्वर ने ठहराई थीं यरूशलेम में बनी रहीं, तब तक भक्तों के पास सहने योग्य दशा में कलीसिया थी। इस्राएलियों के विषय में, वे बातें जो अहाब के समय तक निश्चय ही सुधारी नहीं गई थीं, तब और बिगड़ गईं। जो उसके बाद आए, राज्य के उलट जाने तक, वे कुछ तो उसी के समान थे, और कुछ (जब वे कुछ अच्छा होना चाहते थे) यारोबाम के उदाहरण पर चले, जबकि सब के सब, बिना किसी अपवाद के, दुष्ट और मूर्तिपूजक थे। यहूदिया में समय-समय पर भिन्न-भिन्न परिवर्तन होते रहे, कुछ राजा झूठी और अन्धविश्वासी कल्पनाओं से परमेश्वर की आराधना को भ्रष्ट करते रहे, और कुछ उसे सुधारने का प्रयत्न करते रहे, यहाँ तक कि अन्त में स्वयं याजकों ने परमेश्वर के मन्दिर को अपवित्र और घृणित रीतियों से अशुद्ध कर दिया।
9. अब पोप के अनुयायी अपने दोषों को यथासम्भव हलका करने के लिए, यदि कर सकें तो इनकार करें कि उनके यहाँ धर्म की दशा उतनी ही बिगड़ी और भ्रष्ट है जितनी यारोबाम के अधीन इस्राएल के राज्य में थी। उनकी मूर्तिपूजा और अधिक स्थूल है, और शिक्षा में वे रत्ती भर भी अधिक शुद्ध नहीं; वरन् सम्भवतः और भी अशुद्ध हैं। परमेश्वर, वरन् साधारण विवेक रखनेवाले भी मेरे साक्षी होंगे, और बात इतनी स्पष्ट है कि मुझे उसे बढ़ाकर कहने की आवश्यकता नहीं। जब वे हमें अपनी कलीसिया की सहभागिता के लिए विवश करना चाहते हैं, तो हम से दो माँगें करते हैं—पहली, कि हम उनकी प्रार्थनाओं, उनके बलिदानों और उनकी सब रीतियों में सम्मिलित हों; और दूसरी, कि जो कुछ आदर, सामर्थ्य और अधिकार मसीह ने अपनी कलीसिया को दिया है, वही हम उनकी कलीसिया को मानें। पहली के विषय में, मैं मानता हूँ कि वे सब भविष्यद्वक्ता जो यरूशलेम में थे, जब वहाँ की दशा बहुत बिगड़ी हुई थी, न अलग बलिदान चढ़ाते थे न प्रार्थना के लिए अलग सभाएँ करते थे। क्योंकि उनके पास परमेश्वर की आज्ञा थी जो उन्हें सुलैमान के मन्दिर में इकट्ठे होने को कहती थी, और वे जानते थे कि लेवीय याजक, जिन्हें प्रभु ने पवित्र कार्यों पर नियुक्त किया था, और जो अभी निकाले नहीं गए थे, उस आदर के कितने ही अयोग्य क्यों न हों, फिर भी उसे धारण करने के अधिकारी थे उसे539 (निर्गमन 24:9)। परन्तु सारे प्रश्न का मुख्य बिन्दु यह है कि वे किसी अन्धविश्वासी आराधना के लिए विवश नहीं किए गए थे, वरन् उन्होंने वही कुछ किया जो परमेश्वर ने ठहराया था। परन्तु इन लोगों में, मेरा मतलब पोप के अनुयायियों से है, समानता कहाँ है? हम उनके साथ कोई सभा शायद ही कर सकते हैं कि खुली मूर्तिपूजा से अपने आप को अशुद्ध न करें। उनकी सहभागिता का मुख्य बन्धन निश्चय ही मिस्सा में है, जिसे हम सबसे बड़ी ईशनिन्दा समझकर घृणा करते हैं। यह उचित रीति से किया गया है या उतावली से, यह अन्यत्र देखा जाएगा (देखिए अध्याय 18; तथा पुस्तक 2, अध्याय 15, खण्ड 6)। अभी इतना दिखाना पर्याप्त है कि हमारी दशा भविष्यद्वक्ताओं की दशा से भिन्न है, जो जब अभक्तों के पवित्र अनुष्ठानों में उपस्थित होते थे, तो उन्हें उन रीतियों के अतिरिक्त और कोई रीति देखने या बरतने की विवशता नहीं थी जो परमेश्वर ने ठहराई थीं। परन्तु यदि हम हर बात में समान उदाहरण चाहें, तो इस्राएल के राज्य से लें। यारोबाम की व्यवस्था के अधीन खतना बना रहा, बलिदान चढ़ाए जाते रहे, व्यवस्था पवित्र मानी गई, और उस परमेश्वर की आराधना होती रही जिसे उन्होंने अपने पितरों से पाया था; परन्तु गढ़ी हुई और वर्जित आराधना-रीतियों के कारण वहाँ जो कुछ किया गया, परमेश्वर ने उस सब को अस्वीकार और निन्दित ठहराया। मुझे एक भी भविष्यद्वक्ता या भक्त जन दिखाओ जिसने बेतेल में कभी आराधना की या बलिदान चढ़ाया हो। वे जानते थे कि वे किसी न किसी प्रकार की ईशनिन्दा से अपने आप को अशुद्ध किए बिना ऐसा नहीं कर सकते। इसलिए हमारा मत है कि कलीसिया की सहभागिता को भक्तों के द्वारा इतनी दूर तक नहीं निभाया जाना चाहिए कि जब वह अपवित्र और दूषित रीतियों में बिगड़ चुकी हो तब भी उसका अनुसरण करना उनकी विवशता बन जाए।
10. दूसरे विषय में हमारी आपत्तियाँ और भी प्रबल हैं। क्योंकि जब कलीसिया को उस विशेष दृष्टि से कलीसिया के रूप में देखा जाए जिसके निर्णय का हमें आदर करना, जिसके अधिकार को स्वीकार करना, जिसकी चेतावनियों को मानना, जिसकी फटकारों से डरना, और जिसकी सहभागिता को हर बात में श्रद्धा से निभाना है, तो हम यह नहीं मान सकते कि उनके पास कलीसिया है, जब तक कि हम अपने आप को अधीनता और आज्ञाकारिता में न बाँध लें। फिर भी हम वही मानने को तैयार हैं जो भविष्यद्वक्ताओं ने अपने समय के यहूदियों और इस्राएलियों को माना, जब उनके यहाँ बातें वैसी ही, या उससे भी अच्छी दशा में थीं। क्योंकि हम देखते हैं कि वे सदा उनकी सभाओं के विरुद्ध यह कहकर चिल्लाते हैं कि वे अपवित्र गुट हैं, जिन पर सहमत होना उनके लिए परमेश्वर का इनकार करने से अधिक उचित नहीं (यशायाह 1:14)। और निश्चय यदि वे कलीसियाएँ थीं, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि इस्राएल में एलिय्याह, मीकायाह और अन्य, तथा यहूदा में यशायाह, यिर्मयाह, होशे और उनके समान चरित्रवाले लोग, जिनसे उनके समय के भविष्यद्वक्ता, याजक और लोग अपरिचित खतनारहित लोगों से भी अधिक घृणा और धिक्कार करते थे, परमेश्वर की कलीसिया से बाहर के परदेशी थे। यदि वे कलीसियाएँ थीं, तो फिर कलीसिया सत्य का खम्भा न रही, वरन् झूठ का सहारा; जीवित परमेश्वर का तम्बू न रही, वरन् मूर्तियों का पात्र। इसलिए उनके लिए उनकी सभाओं को सहमति देने से इनकार करना अनिवार्य था, क्योंकि सहमति परमेश्वर के विरुद्ध अभक्त षड्यंत्र के सिवाय और कुछ न थी। इसी कारण यदि कोई आज की उन सभाओं को, जो मूर्तिपूजा, अन्धविश्वास और अभक्त शिक्षा से दूषित हैं, ऐसी कलीसियाएँ माने जिनके साथ मसीही को पूर्ण सहभागिता इस हद तक रखनी चाहिए कि शिक्षा में भी उनसे सहमत हो जाए, तो वह बहुत भूल करेगा।
539 फ्रेंच में, “Ils savoient que les pretres Levitiques, combien qu’ils fussent indignes d’un tel office, neantmoins pourcequ’ils avoient eté ordonnez de Dieu, et n’etoient point encore deposés, devoient etre recognus pour ministres legitimes, ayant le degré de pretrise.”—वे जानते थे कि लेवीय याजक, यद्यपि वे ऐसे पद के अयोग्य थे, तो भी इसलिए कि वे परमेश्वर द्वारा ठहराए गए थे और अभी पदच्युत नहीं किए गए थे, वैध सेवक के रूप में पहचाने जाने चाहिए थे, याजकपद की पदवी रखते हुए।
क्योंकि यदि वे कलीसियाएँ हैं, तो कुंजियों का अधिकार उन्हीं का है, जबकि कुंजियाँ उस वचन से अटूट रूप से जुड़ी हैं जिसे उन्होंने भगा दिया है। फिर, यदि वे कलीसियाएँ हैं, तो वे मसीह की इस प्रतिज्ञा पर दावा कर सकती हैं, “जो कुछ तुम बाँधोगे,” इत्यादि; जबकि इसके विपरीत वे अपनी सहभागिता से उन सब को निकाल देती हैं जो सच्चाई से अपने आप को मसीह के सेवक कहते हैं। इसलिए या तो मसीह की प्रतिज्ञा व्यर्थ है, या कम से कम इस दृष्टि से वे कलीसियाएँ नहीं हैं। अन्ततः, वचन की सेवा के स्थान पर उनके पास अभक्ति की पाठशालाएँ और हर प्रकार की भूल के गड्ढे हैं। इसलिए इस दृष्टि से या तो वे कलीसियाएँ नहीं हैं, या ऐसा कोई चिह्न न रहेगा जिससे विश्वासियों की वैध सभाओं को तुर्कों की सभाओं से अलग पहचाना जा सके।
11. फिर भी, जैसे प्राचीन काल में यहूदियों के बीच कलीसिया के कुछ विशेष विशेषाधिकार बचे रहे, वैसे ही आज भी हम पोप के अनुयायियों से कलीसिया के उन चिह्नों से इनकार नहीं करते जिन्हें प्रभु ने उनके बीच उस बिखराव में बचा रहने दिया है। जब प्रभु ने यहूदियों के साथ एक बार वाचा बाँधी, तो वह उनके द्वारा इतना नहीं जितना अपने ही बल से सुरक्षित रही, जिसके सहारे वह उनकी अभक्ति के सामने टिकी रही। इसलिए ईश्वरीय भलाई की ऐसी निश्चितता और स्थिरता है कि प्रभु की वाचा वहाँ बनी रही और उसका विश्वास उनके विश्वासघात से मिटाया न जा सका; और खतना उनके अशुद्ध हाथों से इतना अपवित्र न हो सका कि वह फिर भी उसकी वाचा का सच्चा चिह्न और संस्कार न रहे। इसी से उन्हें जो सन्तानें उत्पन्न हुईं, उन्हें प्रभु ने अपनी कहा (यहेजकेल 16:20), यद्यपि विशेष आशीष को छोड़ वे किसी भी रीति से उसकी नहीं थीं। इसी प्रकार जब गॉल, इटली, जर्मनी, स्पेन और इंग्लैंड में उसने अपनी वाचा रखी थी, और ये देश मसीह-विरोधी के अत्याचार से दबे हुए थे, तब उसने, ताकि उसकी वाचा अटल बनी रहे, पहले वहाँ बपतिस्मा को वाचा के प्रमाण के रूप में सुरक्षित रखा;—वह बपतिस्मा, जो उसके मुख से पवित्र किया गया है, मानवीय भ्रष्टता के होते हुए भी अपनी सामर्थ्य बनाए रखता है; दूसरे, उसने अपने विधान से यह भी प्रबन्ध किया कि कुछ और अवशेष भी रहें ताकि कलीसिया सर्वथा नष्ट न हो जाए। परन्तु जैसे भवनों को गिराते समय नींवें और खण्डहर अकसर रहने दिए जाते हैं, वैसे ही उसने मसीह-विरोधी को न तो अपनी कलीसिया को उसकी नींव से उलट देने दिया, न उसे भूमि के बराबर कर देने दिया (यद्यपि उन मनुष्यों की कृतघ्नता को दण्ड देने के लिए, जिन्होंने उसके वचन को तुच्छ जाना, उसने भयानक हिलाए जाने और टूट-फूट होने की अनुमति दी), परन्तु उसे यह भाता था कि उजाड़ के बीच भवन खड़ा रहे, चाहे आधा खण्डहर ही क्यों न हो।
12. इसलिए यद्यपि हम पोप के अनुयायियों को केवल कलीसिया का नाम देना नहीं चाहते, तो भी हम इनकार नहीं करते कि उनके बीच कलीसियाएँ हैं। जो प्रश्न हम उठाते हैं वह केवल कलीसिया के सच्चे और वैध गठन से सम्बन्ध रखता है, जिसका अर्थ है पवित्र विधियों में सहभागिता, जो अंगीकार के चिह्न हैं, और विशेषकर शिक्षा में।540 दानिय्येल और पौलुस ने पहले से कहा कि मसीह-विरोधी परमेश्वर के मन्दिर में बैठेगा (दानिय्येल 9:27; 2 थिस्सलुनीकियों 2:4); हम रोमी महायाजक को उस दुष्ट और घृणित राज्य का नेता और ध्वजावाहक मानते हैं।541 अपना आसन परमेश्वर के मन्दिर में रखने से यह संकेत मिलता है कि उसका राज्य ऐसा न होगा कि मसीह के नाम को या उसकी कलीसिया के नाम को नष्ट कर दे। इसलिए इससे यह स्पष्ट है कि हम बिलकुल इनकार नहीं करते कि उसके अत्याचार के अधीन कलीसियाएँ बची हैं; परन्तु ऐसी कलीसियाएँ जिन्हें उसने ईशनिन्दक अभक्ति से अपवित्र किया है, क्रूर प्रभुत्व से दबाया है, विषैले पेयों के समान बुरी और घातक शिक्षाओं से भ्रष्ट किया है और लगभग मार डाला है; ऐसी कलीसियाएँ जहाँ मसीह आधा दफनाया पड़ा है, सुसमाचार दबा दिया गया है, भक्ति भगा दी गई है, और परमेश्वर की आराधना लगभग मिटा दी गई है; जहाँ, संक्षेप में, सब कुछ ऐसी अव्यवस्था में है कि परमेश्वर के पवित्र नगर की नहीं, बल्कि बाबुल की छवि दिखाई देती है। एक शब्द में, मैं उन्हें कलीसियाएँ इसलिए कहता हूँ कि प्रभु वहाँ अपने लोगों के कुछ अवशेषों को, चाहे वे दयनीय रूप से फटे और बिखरे हों, आश्चर्यजनक रीति से बचाए रखता है, और इसलिए भी कि कलीसिया के कुछ चिह्न अब भी बने हैं—विशेषकर वे चिह्न जिनकी सामर्थ्य को न शैतान की चालाकी नष्ट कर सकती है, न मानवीय भ्रष्टता। परन्तु दूसरी ओर, चूँकि वे चिह्न, जिन पर इस चर्चा में हमें विशेष ध्यान देना चाहिए, मिट गए हैं, इसलिए मैं कहता हूँ कि सारी देह, और हर एक सभा भी, वैध कलीसिया के स्वरूप से रहित है।
540 फ्रेंच में, “Mais nous contendons seulement du vrai etat de l’Eglise, qui emporte communion, tant en doctrine, qu’en tout qui appartient à la profession de notre Chretienté;”—परन्तु हम केवल कलीसिया की सच्ची दशा के लिए विवाद करते हैं, जिसका अर्थ है सहभागिता, शिक्षा में भी और उस सब में भी जो हमारी मसीही प्रजा के अंगीकार से सम्बन्ध रखता है। 541 फ्रेंच में यह जोड़ा गया है, “pour le moins en l’Eglise Occidentale;”—कम से कम पश्चिमी कलीसिया में।
