पुस्तक I · अध्याय 2

परमेश्वर को जानना क्या है—इस ज्ञान की प्रवृत्ति

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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परमेश्वर को जानना क्या है—इस ज्ञान की प्रवृत्ति

अध्याय 2।

परमेश्वर को जानना क्या है,—इस ज्ञान की प्रवृत्ति।

खण्ड।

1. सृष्टिकर्ता परमेश्वर के ज्ञान की परिभाषा। इस ज्ञान का सार और इसका उपयोग।

2. इस उपयोग का और स्पष्टीकरण, साथ ही व्यर्थ जिज्ञासा की आवश्यक फटकार और एपिकूरियों का खण्डन। भक्त मन को परमेश्वर का जो स्वरूप दिखाई देता है, उसकी तुलना एपिकूरियों के बेतुके विचारों से। धर्म की परिभाषा।

1. परमेश्वर के ज्ञान से मैं वह ज्ञान समझता हूँ जिससे हम न केवल यह मानते हैं कि कोई परमेश्वर है, वरन् यह भी ग्रहण करते हैं कि हमारे हित में क्या है, उसकी महिमा के लिए क्या सहायक है, संक्षेप में उसके विषय में जानना क्या उचित है। क्योंकि ठीक-ठीक कहें तो जहाँ धर्म या भक्ति नहीं है, वहाँ यह नहीं कह सकते कि परमेश्वर जाना गया। मैं अभी उस प्रकार के ज्ञान की बात नहीं कर रहा जिससे मनुष्य, जो अपने आप में खोए हुए और श्रापित हैं, मध्यस्थ मसीह में परमेश्वर को छुड़ानेवाले के रूप में ग्रहण करते हैं। मैं केवल उस सरल और आदिम ज्ञान की बात कर रहा हूँ जिस तक प्रकृति का साधारण क्रम ही हमें पहुँचाता, यदि आदम सीधा खड़ा रहता। क्योंकि यद्यपि मानव जाति के वर्तमान विनाश में कोई मनुष्य तब तक परमेश्वर को न पिता के रूप में, न उद्धार के कर्ता के रूप में, न किसी भी रीति से कृपालु के रूप में जान सकेगा जब तक मसीह हमारा मेल कराने के लिए बीच में न आए; फिर भी यह एक बात है कि हम जानें कि हमारा सृजनहार परमेश्वर अपनी सामर्थ्य से हमें सम्भालता है, अपने विधान से हम पर शासन करता है, अपनी भलाई से हमारा पालन-पोषण करता है और हर प्रकार की आशिषों से हमारी सुधि लेता है, और दूसरी बात है मसीह में हमें दिए गए मेल-मिलाप के अनुग्रह को अपनाना। सो, क्योंकि प्रभु पहले जगत की सृष्टि में और पवित्रशास्त्र की सामान्य शिक्षा में केवल सृष्टिकर्ता के रूप में प्रकट होता है, और तब मसीह में छुड़ानेवाले के रूप में,—इसलिए उसका एक दोहरा ज्ञान उत्पन्न होता है: इनमें से पहले पर अब विचार करना है, दूसरा आगे अपने क्रम में आएगा। परन्तु यद्यपि हमारा मन परमेश्वर की कल्पना बिना उसकी कुछ आराधना किए नहीं कर सकता, तो भी केवल इतना मानना पर्याप्त न होगा कि वही एकमात्र सत्ता है जिसकी सबको उपासना और आराधना करनी चाहिए, जब तक कि हमें यह भी निश्चय न हो कि वही समस्त भलाई का सोता है, और हमें सब कुछ उसी में खोजना चाहिए, और किसी और में नहीं। मेरा अर्थ यह है: हमें न केवल यह निश्चय होना चाहिए कि जैसे उसने एक बार जगत को रचा, वैसे ही वह अपनी असीम सामर्थ्य से उसे थामे रहता है, अपनी बुद्धि से उस पर शासन करता है, अपनी भलाई से उसकी रक्षा करता है, विशेष रूप से मानव जाति पर धार्मिकता और न्याय से राज्य करता है, दया से उन्हें सहता है, और अपनी सुरक्षा से उनकी ओट बनता है; वरन् यह भी कि प्रकाश, या बुद्धि, या धार्मिकता, या सामर्थ्य, या सीधाई, या सच्चे सत्य का एक कण भी कहीं ऐसा न मिलेगा जो उसी से न निकला हो, और जिसका वह कारण न हो; इस रीति से हमें सब कुछ उसी से आशा रखना और माँगना सीखना चाहिए, और जो कुछ पाएँ उसका धन्यवाद के साथ श्रेय उसी को देना चाहिए। क्योंकि ईश्वरीय सिद्धताओं का यह बोध ही भक्ति सिखाने के लिए उचित गुरु है, जिससे धर्म उपजता है। भक्ति से मेरा अर्थ परमेश्वर के प्रति श्रद्धा और प्रेम का वह मेल है जो उसके उपकारों के ज्ञान से उत्पन्न होता है। क्योंकि जब तक मनुष्य यह अनुभव न करें कि वे सब कुछ परमेश्वर के ऋणी हैं, कि उसकी पितृवत् देखभाल से उनका पालन होता है, और कि वही उनकी सब आशिषों का कर्ता है, यहाँ तक कि उससे परे कुछ भी आशा रखने योग्य नहीं, तब तक वे कभी स्वेच्छा की आज्ञाकारिता में उसके अधीन न होंगे; वरन् जब तक वे अपना सम्पूर्ण सुख उसी में न रखें, तब तक वे कभी सच्चाई और निष्कपटता से अपने को पूरी रीति से उसे न सौंपेंगे।

2. इसलिए जो लोग इस प्रश्न पर विचार करते हुए यह जाँचना चाहते हैं कि परमेश्वर का सार क्या है, वे हमें केवल नीरस कल्पनाओं से भरमाते हैं,—क्योंकि हमारे हित में कहीं अधिक यह है कि हम जानें कि परमेश्वर किस प्रकार का है, और उसके स्वभाव के अनुकूल क्या-क्या है। क्योंकि एपिकूरियों के साथ ऐसे किसी परमेश्वर को मान लेने से क्या लाभ, जिसने जगत की चिन्ता त्याग दी है और केवल विश्राम में आनन्दित रहता है? संक्षेप में, ऐसे परमेश्वर को जानने से क्या मिलता है जिससे हमारा कोई सरोकार ही नहीं? हमारे ज्ञान का फल तो यह होना चाहिए कि पहले, वह हमें श्रद्धा और भय सिखाए; और दूसरे, उसके मार्गदर्शन और शिक्षा के अधीन हमें प्रेरित करे कि हम उससे हर अच्छी वस्तु माँगें, और जब वह मिल जाए तो उसका श्रेय उसी को दें। क्योंकि परमेश्वर का विचार तुम्हारे मन में आते ही तुरन्त यह विचार कैसे न उठे कि चूँकि तुम उसकी रचना हो, इसलिए सृष्टि की व्यवस्था के अनुसार ही तुम उसके अधिकार के अधीन रहने को बाध्य हो?—कि तुम्हारा जीवन उसी का ऋणी है?—कि तुम जो कुछ करो वह उसी के सम्बन्ध में होना चाहिए? यदि ऐसा है, तो निःसन्देह यही निष्कर्ष निकलता है कि तुम्हारा जीवन शोचनीय रीति से बिगड़ा हुआ है यदि वह उसकी आज्ञाकारिता में नहीं ढला, क्योंकि उसकी इच्छा ही हमारे जीवनों की व्यवस्था होनी चाहिए। दूसरी ओर, यदि तुम उसे समस्त भलाई का उद्गम और सोता नहीं मानते, तो उसके स्वभाव की तुम्हारी धारणा स्पष्ट नहीं है। इससे उसमें भरोसा भी उत्पन्न होता, और उससे लिपटे रहने की इच्छा भी, यदि मानव मन की भ्रष्टता उसे खोज के उचित मार्ग से भटका न देती।

क्योंकि सबसे पहले तो भक्त मन अपने लिए किसी प्रकार का परमेश्वर नहीं गढ़ता, वरन् केवल एक सच्चे परमेश्वर की ओर देखता है; न वह उसके लिए अपनी इच्छा से कोई स्वभाव कल्पित करता है, वरन् उसे उसी स्वभाव में पाकर सन्तुष्ट रहता है जिसमें वह स्वयं को प्रकट करता है, और बड़े यत्न से सदा इस बात से सावधान रहता है कि उसकी इच्छा का उल्लंघन न करे और साहसी धृष्टता से सही मार्ग से न भटके। जिसने परमेश्वर को इस रीति से जाना है, वह यह देखकर कि वह सब कुछ पर कैसे शासन करता है, उसे अपना रक्षक और रखवाला मानकर उस पर भरोसा रखता है और अपने को पूरी रीति से उसकी विश्वासयोग्यता पर डाल देता है,—उसे हर आशिष का स्रोत जानकर, यदि वह किसी संकट में हो या कोई अभाव अनुभव करे, तो तुरन्त उसकी सुरक्षा की शरण लेता है और उसकी सहायता पर भरोसा रखता है,—यह निश्चय रखते हुए कि वह भला और दयालु है, वह दृढ़ भरोसे के साथ उस पर टिका रहता है, और इसमें सन्देह नहीं करता कि ईश्वरीय करुणा में उसकी हर आवश्यकता के समय के लिए उपाय जुटाया जाएगा,—उसे अपना पिता और अपना प्रभु मानकर वह अपने को बाध्य समझता है कि सब बातों में उसके अधिकार का आदर करे, उसकी प्रतापमय महिमा के प्रति श्रद्धा रखे, उसकी महिमा को बढ़ाने का लक्ष्य रखे, और उसकी आज्ञाओं का पालन करे,—उसे एक धर्मी न्यायी के रूप में देखकर, जो अपराधों को दण्ड देने के लिए कठोरता से सुसज्जित है, वह न्याय के आसन को सदा अपनी दृष्टि में रखता है। उसका आदर करते हुए वह अपने को रोके रखता है और उसके क्रोध को भड़काने से डरता है। फिर भी, वह न्याय के भय से इतना भयभीत नहीं होता कि चाहे बच निकलने का उपाय सामने भी हो, तो भी अपने को उससे दूर कर लेना चाहे; वरन् वह उसे दुष्टता का बदला लेनेवाले के रूप में भी उतना ही अपनाता है जितना धर्मियों को प्रतिफल देनेवाले के रूप में; क्योंकि वह देखता है कि एक के लिए दण्ड और दूसरे के लिए अनन्त जीवन सँजोकर रखना समान रूप से उसकी महिमा से सम्बन्ध रखता है। इसके अतिरिक्त, केवल दण्ड का भय ही उसे पाप से नहीं रोकता। परमेश्वर से पिता के रूप में प्रेम और आदर करते हुए, और स्वामी के रूप में उसका सम्मान और आज्ञापालन करते हुए, चाहे नरक होता ही नहीं, तब भी वह उसे ठेस पहुँचाने के विचार मात्र से ही पीछे हट जाता।

यही शुद्ध और सच्चा धर्म है, अर्थात् गम्भीर भय के साथ जुड़ा हुआ परमेश्वर में भरोसा—ऐसा भय जिसमें स्वेच्छा की श्रद्धा भी सम्मिलित है, और जो व्यवस्था द्वारा निर्धारित उचित आराधना भी अपने साथ लाता है। और इस पर और अधिक ध्यान देना चाहिए कि सब मनुष्य बिना भेद के परमेश्वर का सम्मान करते हैं, परन्तु बहुत थोड़े ही सचमुच उसका आदर करते हैं। चारों ओर दिखावटी रीति-रिवाजों की बहुतायत है, परन्तु मन की निष्कपटता दुर्लभ है।

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