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परमेश्वर द्वारा दुष्टों के साधन का उपयोग, जबकि वह हर कलंक से मुक्त बना रहता है
अध्याय 18।
परमेश्वर द्वारा दुष्टों के साधन का उपयोग, जबकि वह हर कलंक से मुक्त बना रहता है।
138 देखिए कैल्विन, adv. Libertinos के अध्याय 15, 16, और अगस्तीन, de Ordine, Lib. 1 और 2, जहाँ वह इस प्रश्न की उत्कृष्ट विवेचना करता है: क्या परमेश्वर के विधान का क्रम सब भले और बुरे को समेटता है?
पहली पुस्तक का यह अन्तिम अध्याय तीन भागों से बना है: I. ऊपर यह कहा जा चुका है कि परमेश्वर सब त्यागे हुए लोगों को, यहाँ तक कि स्वयं शैतान को भी, अपनी इच्छा के अनुसार मोड़ता है; इस पर तीन आपत्तियाँ उठाई जाती हैं। पहली यह कि ऐसा परमेश्वर की अनुमति से होता है, उसकी इच्छा से नहीं। इस आपत्ति के दो उत्तर हैं: एक यह कि स्वर्गदूत और मनुष्य, भले और बुरे, वही करते हैं जो परमेश्वर द्वारा ठहराया गया है; दूसरा यह कि सब गतिविधियाँ परमेश्वर की गुप्त प्रेरणा से गुप्त रूप में अपने अन्त की ओर निर्देशित होती हैं, खण्ड 1, 2। II. दूसरी आपत्ति यह है कि यदि वह गुप्त युक्ति से वह ठहराता है जिसे अपनी व्यवस्था में खुले रूप से मना करता है, तो परमेश्वर में दो परस्पर विरोधी इच्छाएँ हुईं। इस आपत्ति का खण्डन, खण्ड 3। III. तीसरी आपत्ति यह है कि जब कहा जाता है कि परमेश्वर न केवल दुष्टों के साधन का उपयोग करता है वरन् उनकी युक्तियों और भावनाओं को भी चलाता है, तो वह सब दुष्टता का रचयिता ठहरता है, और इसलिए दुष्टों को अन्यायपूर्वक दण्ड मिलता है। इस आपत्ति का खण्डन अन्तिम खण्ड में।
खण्ड।
1. शारीरिक मन ही उन आपत्तियों का स्रोत है जो परमेश्वर के विधान के विरुद्ध उठाई जाती हैं। पहली आपत्ति, जो परमेश्वर की अनुमति और इच्छा में भेद करती है, का खण्डन। स्वर्गदूत और मनुष्य, भले और बुरे, वही करते हैं जो परमेश्वर द्वारा ठहराया गया है। यह उदाहरणों से प्रमाणित।
2. सब गुप्त गतिविधियाँ परमेश्वर की अदृश्य किन्तु धर्ममय प्रेरणा से अपने अन्त की ओर निर्देशित होती हैं। उदाहरण, आपत्तियों के उत्तरों सहित।
3. ये आपत्तियाँ अभिमान और निन्दा की आत्मा से उत्पन्न होती हैं। यह आपत्ति कि परमेश्वर में दो परस्पर विरोधी इच्छाएँ होनी चाहिए, खण्डित। परमेश्वर की एक सरल इच्छा हमें अनेक रूपों की क्यों प्रतीत होती है।
4. यह आपत्ति कि परमेश्वर पाप का रचयिता है, उदाहरणों से खण्डित। अगस्तीन का उत्तर और चेतावनी।
1. अन्य अंशों से, जिनमें कहा गया है कि परमेश्वर स्वयं शैतान को और सब त्यागे हुए लोगों को अपनी इच्छा की ओर खींचता या मोड़ता है, एक और कठिन प्रश्न उठता है। क्योंकि शारीरिक मन यह कठिनाई से ही समझ पाता है कि उनके द्वारा कार्य करते हुए भी वह उनकी अशुद्धता से कोई कलंक कैसे नहीं पाता, वरन् साझे कार्य में भी वह सब दोष से कैसे मुक्त रहता है और अपने ही सेवकों को न्यायसंगत दण्ड कैसे दे सकता है। इसी कारण करने और अनुमति देने के बीच एक भेद गढ़ लिया गया है, क्योंकि बहुतों को यह सर्वथा अव्याख्येय प्रतीत हुआ कि शैतान और सब दुष्ट परमेश्वर के हाथ और अधिकार के ऐसे अधीन कैसे हैं कि वह उनके बैर को जिस अन्त की ओर चाहे निर्देशित करता है और उनके अधर्म को अपने न्याय-दण्डों के निष्पादन में लगाता है। जो लोग निरर्थकता के आभास से इस प्रकार घबरा जाते हैं, उनकी विनम्रता शायद क्षम्य मानी जाती, यदि वे एक असत्य का बचाव करके परमेश्वर के न्याय को हर कलंक की छाया से बचाने का प्रयत्न न करते। यह बात निरर्थक-सी लगती है कि मनुष्य परमेश्वर की इच्छा और आज्ञा से अन्धा किया जाए, और फिर अपने अन्धेपन के लिए तुरन्त दण्ड पाए। इसलिए यह बहाना ढूँढ़ा जाता है कि यह केवल परमेश्वर की अनुमति से होता है, उसकी इच्छा से भी नहीं। परन्तु वह स्वयं खुल्लमखुल्ला घोषणा करता है कि वह यह करता है, और इस प्रकार इस बहाने को ठुकरा देता है। कि मनुष्य परमेश्वर की गुप्त प्रेरणा के बिना कुछ नहीं करते, और जिस किसी बात पर सोच-विचार करते हैं उसी पर करते हैं जिसे उसने पहले से अपने मन में ठहरा रखा है और अपने गुप्त निर्देशन से पूरा करवाता है—यह पवित्रशास्त्र के असंख्य स्पष्ट अंशों से प्रमाणित है। हमने पहले भजन संहिता से जो उद्धृत किया कि वह जो कुछ चाहता है वही करता है, वह निश्चय ही मनुष्यों के सब कामों पर लागू होता है। यदि परमेश्वर शान्ति और युद्ध का निर्णायक है, जैसा वहाँ कहा गया है, और वह भी बिना किसी अपवाद के, तो कौन कहने का साहस करेगा कि मनुष्य अन्धे आवेग में यों ही बहे जाते हैं, और वह अनजान या निष्क्रिय है? परन्तु विशेष उदाहरणों से यह बात और स्पष्ट हो जाएगी। अय्यूब के पहले अध्याय से हम जानते हैं कि शैतान परमेश्वर के सम्मुख अपनी आज्ञाएँ पाने के लिए उपस्थित होता है, ठीक वैसे ही जैसे वे स्वर्गदूत जो स्वेच्छा से आज्ञा मानते हैं। रीति और उद्देश्य भिन्न हैं, फिर भी तथ्य यह है कि वह परमेश्वर की इच्छा के बिना कुछ भी करने का प्रयत्न नहीं कर सकता। और यद्यपि बाद में उस सन्त को दुःख देने की उसकी शक्ति केवल खुली अनुमति मात्र प्रतीत होती है, तथापि जब यह वचन सत्य है कि “यहोवा ने दिया और यहोवा ने ले लिया; जैसा यहोवा को अच्छा लगा वैसा ही हुआ,” तो हम निष्कर्ष निकालते हैं कि परमेश्वर उस परीक्षा का रचयिता था जिसके शैतान और दुष्ट लुटेरे केवल साधन थे। शैतान का उद्देश्य उस सन्त को निराशा से पागलपन की ओर धकेलना है। शेबाई लोग क्रूरता और दुष्टता से अचानक धावा बोलकर दूसरे का धन लूट लेते हैं। अय्यूब मानता है कि वह अपनी सारी सम्पत्ति से वंचित किया गया और कंगाल बना दिया गया, क्योंकि यही परमेश्वर को भाया। इसलिए मनुष्य या स्वयं शैतान जो कुछ भी रचे, पतवार परमेश्वर के हाथ में रहती है, और वह उनके सब प्रयत्नों को अपने न्याय-दण्डों के निष्पादन में लगा देता है। परमेश्वर चाहता है कि विश्वासघाती अहाब धोखा खाए; शैतान इस काम के लिए अपनी सेवा प्रस्तुत करता है, और निश्चित आज्ञा के साथ भेजा जाता है कि सब भविष्यद्वक्ताओं के मुँह में झूठ बोलनेवाली आत्मा बने (2 राजाओं 22:20)। यदि अहाब का अन्धा और मतिहीन होना परमेश्वर का न्याय-दण्ड है, तो केवल अनुमति की कल्पना का अन्त हो जाता है; क्योंकि यह हास्यास्पद होगा कि न्यायी केवल अनुमति दे, और ठीक उसी समय जब वह अपने सेवकों को उसका निष्पादन सौंपता है, जो वह चाहता है उसे ठहराए भी नहीं। यहूदियों ने मसीह को नष्ट करने की ठानी। पिलातुस और सैनिकों ने उनके उन्माद में उनका साथ दिया; फिर भी चेले गम्भीर प्रार्थना में मानते हैं कि सब दुष्टों ने वही किया जो परमेश्वर के हाथ और युक्ति ने पहले से ठहराया था (प्रेरितों के काम 4:28), जैसा कि पतरस ने पहले अपने भाषण में कहा था कि मसीह परमेश्वर की ठहराई हुई युक्ति और पूर्वज्ञान के अनुसार मृत्यु के लिए सौंपा गया (प्रेरितों के काम 2:23); दूसरे शब्दों में, परमेश्वर ने, जिसे आदि से सब बातें ज्ञात हैं, ठहरा रखा था कि यहूदी क्या करेंगे। वह यही बात अन्यत्र दोहराता है, “जिन बातों को परमेश्वर ने सब भविष्यद्वक्ताओं के मुँह से पहले बताया था कि मसीह दुःख उठाएगा, उन्हें उसने इस रीति से पूरा किया,” (प्रेरितों के काम 4:18)। अबशालोम अपने पिता के बिछौने को व्यभिचार से अपवित्र करके घृणित अपराध करता है। फिर भी परमेश्वर घोषणा करता है कि यह उसका कार्य था; क्योंकि वचन ये हैं, “तू ने तो यह काम छिपकर किया, पर मैं यह काम सारे इस्राएल के सामने और सूर्य के सामने करूँगा।”139 यिर्मयाह यहूदिया में कसदियों की क्रूरताओं को परमेश्वर का कार्य बताता है। इसी कारण नबूकदनेस्सर परमेश्वर का सेवक कहलाता है। परमेश्वर बार-बार पुकारता है कि उसकी सीटी से, उसकी तुरही की ध्वनि से, उसके अधिकार और आज्ञा से दुष्ट लोग युद्ध के लिए उभारे जाते हैं। वह अश्शूरी को अपने क्रोध की छड़ी और अपने हाथ में चलाई जानेवाली कुल्हाड़ी कहता है। नगर के विनाश और मन्दिर के पतन को वह अपना ही कार्य कहता है। दाऊद, परमेश्वर के विरुद्ध कुड़कुड़ाए बिना, वरन् उसे धर्मी न्यायी मानते हुए, स्वीकार करता है कि शिमी के शाप उसी की आज्ञा से कहे जाते हैं। वह कहता है, “यहोवा ने उससे कहा है कि शाप दे।” पवित्र इतिहास में प्रायः जो कुछ घटता है वह प्रभु की ओर से बताया गया है, जैसे दस गोत्रों का विद्रोह, एली के पुत्रों की मृत्यु, और ऐसे ही बहुत-से अन्य प्रसंग। जिन्हें पवित्रशास्त्र का ठीक-ठाक परिचय है वे देखते हैं कि संक्षिप्तता के विचार से मैं बहुत-से अंशों में से केवल थोड़े ही प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिनसे यह पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि परमेश्वर के विधान के स्थान पर केवल अनुमति को रख देना निरी बकवास है, मानो वह किसी प्रहरी-मीनार में बैठा आकस्मिक घटनाओं की बाट जोहता हो और उसके न्याय-दण्ड इस बीच मनुष्य की इच्छा पर निर्भर हों।
2. गुप्त गतिविधियों के विषय में, सुलैमान ने राजा के हृदय के बारे में जो कहा है कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार इधर-उधर फिराया जाता है, वह निश्चय ही सारी मानवजाति पर लागू होता है, और उसका वही बल है मानो उसने कहा हो कि जो कुछ हम अपने मन में सोचते हैं वह परमेश्वर की गुप्त प्रेरणा से अपने अन्त की ओर निर्देशित होता है। और निश्चय यदि वह मनुष्यों के मन में भीतर ही भीतर कार्य न करता, तो यह ठीक ही नहीं कहा जा सकता था कि वह सच्चे लोगों से बोलने की शक्ति और बूढ़ों से समझ छीन लेता है, पृथ्वी के प्रधानों के हृदय से बुद्धि हर लेता है, कि वे भटकाऊ मार्गों में भटकते फिरें।
139 2 शमूएल 12:12; यिर्मयाह 1:25; यशायाह 5:26; 10:5; 19:25; 2 शमूएल 16:10; 1 राजाओं 11:31; 1 शमूएल 2:34।
इसी आशय से हम प्रायः पढ़ते हैं कि जब वह लोगों के हृदय को भय से भर देता है तब वे डर जाते हैं। इसी प्रकार दाऊद शाऊल की छावनी से निकल गया, और किसी को इसका पता न चला, क्योंकि परमेश्वर की ओर से गहरी नींद सब पर पड़ी थी। परन्तु उन अनेक अंशों से अधिक स्पष्ट कुछ नहीं जो घोषणा करते हैं कि वह मनुष्यों के मन अन्धे कर देता है, उन्हें चक्कर से मारता है, उन्हें मूर्छा की आत्मा से मतवाला बना देता है, उन्हें बुद्धिहीन कर देता है और उनके हृदय कठोर कर देता है। इन वचनों को भी बहुत-से लोग केवल अनुमति तक सीमित कर देते हैं, मानो त्यागे हुए लोगों को छोड़कर वह उन्हें शैतान से अन्धा होने देता हो। परन्तु जब पवित्र आत्मा स्पष्ट कहता है कि अन्धापन और बुद्धिहीनता परमेश्वर के न्यायसंगत न्याय-दण्ड से दिए जाते हैं, तो यह समाधान सर्वथा अस्वीकार्य है। कहा गया है कि उसने फ़िरौन का हृदय कठोर किया, उसे और भी कठोर किया, और दृढ़ किया। कुछ लोग इन वाक्यांशों से एक बचकाने कुतर्क के द्वारा बच निकलते हैं, क्योंकि अन्यत्र कहा गया है कि फ़िरौन ने स्वयं अपना हृदय कठोर किया, और इस प्रकार उसकी अपनी इच्छा को ही कठोर होने का कारण ठहराया जाता है; मानो ये दोनों बातें भिन्न-भिन्न अर्थों में पूरी तरह एक-दूसरी से मेल न खाती हों—अर्थात् यह कि मनुष्य, परमेश्वर के द्वारा प्रेरित होता हुआ, साथ ही स्वयं भी कार्य करता है। परन्तु मैं यह आपत्ति उठानेवालों पर ही लौटा देता हूँ। यदि कठोर करने का अर्थ केवल अनुमति देना है, तो हठ ठीक अर्थों में फ़िरौन का न रहेगा। और भला इससे अधिक निर्बल और फीकी बात क्या होगी कि इसकी व्याख्या यों की जाए मानो फ़िरौन ने केवल अपने को कठोर होने दिया? इसमें यह भी जोड़ें कि पवित्रशास्त्र ऐसे कुतर्कों की हर पकड़ ही काट देता है: प्रभु कहता है, “मैं उसका हृदय कठोर करूँगा,” (निर्गमन 4:21)। इसी प्रकार मूसा कनान देश के निवासियों के विषय में कहता है कि वे युद्ध करने को इसलिए निकले क्योंकि यहोवा ने उनके हृदय कठोर कर दिए थे (यहोशू 11:20)। यही बात एक और भविष्यद्वक्ता दोहराता है, “उसने उनके मन को फेर दिया कि वे उसकी प्रजा से बैर रखें,” (भजन संहिता 105:25)। इसी रीति से यशायाह में वह अश्शूरी के विषय में कहता है, “मैं उसको एक भक्तिहीन जाति के विरुद्ध भेजूँगा, और अपने क्रोध के पात्र लोगों के विरुद्ध उसे आज्ञा दूँगा कि वह लूट ले और शिकार छीन ले,” (यशायाह 10:6); इसलिए नहीं कि वह दुष्ट और हठीले मनुष्य को स्वेच्छा से आज्ञा मानना सिखाना चाहता है, परन्तु इसलिए कि वह उन्हें अपने न्याय-दण्डों के निष्पादन के लिए मोड़ता है, मानो उनकी आज्ञाएँ उनके मन पर खुदी हुई हों। और इससे प्रकट होता है कि वे परमेश्वर के निश्चित ठहराव से प्रेरित होते हैं। मैं मानता हूँ कि परमेश्वर प्रायः त्यागे हुए लोगों में शैतान के साधन को बीच में डालकर कार्य करता है; परन्तु इस रीति से कि शैतान स्वयं अपनी भूमिका वैसे ही निभाता है जैसे वह प्रेरित किया जाता है, और उतना ही सफल होता है जितनी उसे अनुमति मिलती है। शाऊल को सतानेवाली बुरी आत्मा के विषय में कहा गया है कि वह यहोवा की ओर से थी (1 शमूएल 16:14), यह जताने के लिए कि शाऊल का उन्माद परमेश्वर का न्यायसंगत दण्ड था। यह भी कहा गया है कि शैतान अविश्वासियों के मन अन्धे कर देता है (2 कुरिन्थियों 4:4)। परन्तु यह कैसे, सिवाय इसके कि भ्रम की आत्मा स्वयं परमेश्वर की ओर से भेजी जाती है, जो सत्य को मानने से इनकार करनेवालों से झूठ पर विश्वास करवाती है? पहले दृष्टिकोण के अनुसार कहा गया है, “यदि भविष्यद्वक्ता बहक जाए और कोई बात कह दे, तो मुझ यहोवा ने उस भविष्यद्वक्ता को बहका दिया है,” (यहेजकेल 14:9)। दूसरे दृष्टिकोण के अनुसार कहा गया है कि उसने लोगों को निकम्मे मन के वश में छोड़ दिया (रोमियों 1:28), क्योंकि वह अपने ही न्यायसंगत बदले का विशेष रचयिता है; जबकि शैतान केवल उसका सेवक है (देखिए कैल्विन की टीका, भजन संहिता 141:4 पर)। परन्तु चूँकि दूसरी पुस्तक में (अध्याय 4, खण्ड 3, 4) मनुष्य की स्वतन्त्रता के प्रश्न की चर्चा में यह विषय फिर विचारा जाएगा, इसलिए अब तक जो थोड़ा कहा गया है वही अवसर की माँग के लिए पर्याप्त प्रतीत होता है। सारी बात का सार यह है—चूँकि परमेश्वर की इच्छा को सब बातों का कारण कहा गया है, इसलिए मनुष्यों की सब युक्तियाँ और कार्य उसके विधान से शासित माने जाने चाहिए; ताकि वह न केवल चुने हुए लोगों में, जो पवित्र आत्मा से चलाए जाते हैं, अपनी सामर्थ्य प्रकट करे, वरन् त्यागे हुए लोगों से भी अपनी सेवा करवाए।
3. मैंने अब तक केवल वही कहा है जो पवित्रशास्त्र में स्पष्ट और निःसन्देह सिखाया गया है; इसलिए जो लोग पवित्र वाणियों की इस शिक्षा पर कलंक लगाने में नहीं झिझकते, वे सावधान रहें कि किस प्रकार की निन्दा का प्रयोग करते हैं। यदि वे अज्ञानता का बहाना करके विनम्रता की प्रशंसा पाना चाहते हैं, तो इससे बड़ा अहंकार क्या सोचा जा सकता है कि परमेश्वर के अधिकार के विरुद्ध एक शब्द भी कहा जाए—जैसे यह कहना, “मैं तो ऐसा नहीं सोचता,”—“मैं नहीं चाहता कि इस विषय को छुआ जाए”? और यदि वे खुल्लमखुल्ला निन्दा करते हैं, तो स्वर्ग पर धावा बोलकर क्या पाएँगे? यह ढिठाई कोई नई नहीं है। सब युगों में दुष्ट और अपवित्र लोग हुए हैं जिन्होंने इस सिद्धान्त की शाखा पर उन्मत्त होकर आक्रमण किया। परन्तु जो बात आत्मा ने प्राचीन काल में दाऊद के मुँह से कही थी (भजन संहिता 51:6), उसे वे अनुभव से सत्य पाएँगे—परमेश्वर जब उसका न्याय किया जाएगा तब जय पाएगा। दाऊद परोक्ष रूप से उन लोगों की मतिहीनता को डाँटता है जिनकी स्वच्छन्दता इतनी बेलगाम है कि अपनी धरती की तुच्छ जगह से वे न केवल परमेश्वर के विरुद्ध मुकदमा लड़ते हैं, वरन् उसकी निन्दा करने का अधिकार भी अपने ऊपर ले लेते हैं। साथ ही वह संक्षेप में जताता है कि जो निन्दाएँ वे स्वर्ग के विरुद्ध उगलते हैं, वे परमेश्वर तक पहुँचने के बजाय, जब उनकी बदनामी की धुंध छँट जाती है, केवल उसके न्याय को ही प्रकाशित करती हैं। हमारा विश्वास भी, परमेश्वर के पवित्र वचन पर आधारित होने के कारण, सारे संसार से ऊपर है और अपनी ऊँचाई से ऐसी धुंध को नीचे देख सकता है।
उनकी पहली आपत्ति—कि यदि परमेश्वर की इच्छा के बिना कुछ नहीं होता तो उसमें दो विरोधी इच्छाएँ होनी चाहिए, जो गुप्त युक्ति से वह ठहराता है जिसे उसने अपनी व्यवस्था में खुले रूप से मना किया है—का निपटारा सरलता से हो जाता है। परन्तु उसका उत्तर देने से पहले मैं अपने पाठकों को फिर स्मरण दिलाता हूँ कि यह कुतर्क मेरे विरुद्ध नहीं, पवित्र आत्मा के विरुद्ध है, जिसने निश्चय ही उस पवित्र जन अय्यूब से यह अंगीकार करवाया, “यहोवा ने दिया और यहोवा ने ले लिया,” जब लुटेरों से लुटने के बाद वह मानता है कि उनका अन्याय और अनिष्ट परमेश्वर की ओर से न्यायसंगत ताड़ना थी। और पवित्रशास्त्र अन्यत्र क्या कहता है? एली के पुत्रों ने “अपने पिता की बात न सुनी, क्योंकि यहोवा की इच्छा उन्हें मार डालने की थी,” (1 शमूएल 2:25)। एक और भविष्यद्वक्ता भी पुकारता है, “हमारा परमेश्वर स्वर्ग में है; उसने जो चाहा वही किया है,” (भजन संहिता 115:3)। मैं पहले ही पर्याप्त स्पष्टता से दिखा चुका हूँ कि परमेश्वर उन सब बातों का रचयिता है जो, इन आपत्ति करनेवालों के अनुसार, केवल उसकी निष्क्रिय अनुमति से होती हैं। वह साक्षी देता है कि वही उजियाले और अन्धकार को रचता है, भलाई और बुराई को बनाता है (यशायाह 45:7); कि कोई विपत्ति ऐसी नहीं होती जो उसने न की हो (आमोस 3:6)। वे मुझे बताएँ कि परमेश्वर अपने न्याय-दण्ड स्वेच्छा से देता है या अनिच्छा से। जैसे मूसा सिखाता है कि जो कुल्हाड़ी के प्रहार से संयोगवश मारा जाता है, उसे परमेश्वर प्रहार करनेवाले के हाथ में सौंप देता है (व्यवस्थाविवरण 19:5), वैसे ही सुसमाचार लूका के मुँह से घोषणा करता है कि हेरोदेस और पुन्तियुस पिलातुस ने मिलकर “वही किया जो तेरे हाथ और तेरी युक्ति ने पहले से ठहराया था कि हो,” (प्रेरितों के काम 4:28)। और सच तो यह है कि यदि मसीह परमेश्वर की इच्छा से क्रूस पर नहीं चढ़ाया गया, तो हमारा छुटकारा कहाँ है? तथापि परमेश्वर की इच्छा अपने से विरोध नहीं करती। उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। वह जो चाहता है उसे न चाहने का दिखावा नहीं करता, परन्तु उसमें इच्छा तो एक और अविभाजित है, किन्तु हमें वह अनेक प्रतीत होती है, क्योंकि अपनी बुद्धि की दुर्बलता के कारण हम यह नहीं समझ सकते कि भिन्न रीति से होते हुए भी वह उसी बात को कैसे चाहता भी है और नहीं भी चाहता। पौलुस अन्यजातियों की बुलाहट को छिपा हुआ भेद कहता है, और थोड़ी ही देर बाद जोड़ता है कि उसी में परमेश्वर की नाना प्रकार की बुद्धि प्रकट हुई (इफिसियों 3:10)। जब हमारी समझ की मन्दता के कारण परमेश्वर की बुद्धि नाना प्रकार की (या, जैसा एक प्राचीन अनुवादक ने रूपान्तर किया, बहुरूपी) प्रतीत होती है, तो क्या इसलिए हम परमेश्वर में किसी परिवर्तन की कल्पना करने लगें, मानो उसने अपनी युक्ति बदल दी हो या अपने ही से असहमत हो? नहीं, जब हम समझ नहीं पाते कि परमेश्वर वह कैसे होना चाहता है जिसे करने से वह हमें मना करता है, तो हम अपनी दुर्बलता को स्मरण करें, और याद रखें कि जिस ज्योति में वह निवास करता है उसे अगम्य कहा जाना अकारण नहीं है (1 तीमुथियुस 6:16), क्योंकि वह अन्धकार से ढँकी है। इसलिए सब भक्त और विनम्र लोग अगस्तीन के इस कथन को सहर्ष मान लेंगे: “मनुष्य कभी-कभी भली इच्छा से कुछ चाहता है जो परमेश्वर नहीं चाहता, जैसे जब कोई भला पुत्र चाहता है कि उसका पिता जीवित रहे, जबकि परमेश्वर की इच्छा उसके मरने की है। फिर, ऐसा भी हो सकता है कि मनुष्य बुरी इच्छा से वह चाहे जो परमेश्वर न्यायपूर्वक चाहता है, जैसे जब कोई बुरा पुत्र चाहता है कि उसका पिता मर जाए, और परमेश्वर की भी यही इच्छा हो। पहला वह चाहता है जो परमेश्वर नहीं चाहता, दूसरा वह चाहता है जो परमेश्वर भी चाहता है। तो भी पहले की पुत्र-सुलभ ममता, भिन्न चाहते हुए भी, परमेश्वर की भली इच्छा से अधिक मेल खाती है, बनिस्बत दूसरे की अस्वाभाविक भावना के, चाहे वह वही चाहता हो; इतना अधिक यह बात कि क्या स्वीकार्य है और क्या दोषपूर्ण, इस पर निर्भर करती है कि मनुष्य के लिए क्या चाहना उचित है और परमेश्वर के लिए क्या, और प्रत्येक की इच्छा का लक्ष्य क्या है। क्योंकि जिन बातों को परमेश्वर न्यायपूर्वक चाहता है, उन्हें वह बुरे लोगों की बुरी इच्छाओं के द्वारा पूरा करता है,”—(August. Enchirid. ad Laurent. cap. 101)। उसने थोड़ा पहले (cap. 100) कहा था कि विद्रोही स्वर्गदूतों ने अपने विद्रोह से, और सब त्यागे हुए लोगों ने, जहाँ तक उनका अपना सम्बन्ध था, वह किया जो परमेश्वर नहीं चाहता था; परन्तु उसकी सर्वसामर्थ्य के विषय में उनके लिए ऐसा करना असम्भव था: क्योंकि जब वे परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध कार्य करते हैं, तब उनमें उसकी इच्छा पूरी होती है। इसीलिए वह पुकार उठता है, “परमेश्वर का कार्य महान है, जो कुछ वह चाहता है उसमें उत्कृष्ट! ऐसा कि एक विस्मयकारी और अवर्णनीय रीति से जो उसकी इच्छा के विरुद्ध किया जाता है वह भी उसकी इच्छा के बिना नहीं किया जाता, क्योंकि यदि वह अनुमति न देता तो वह किया ही न जा सकता; और वह अनुमति अनिच्छा से नहीं, इच्छा से देता है; और वह जो भला है, बुराई को होने न देता, यदि वह बुराई से भलाई निकालने में सर्वशक्तिमान न होता,” (Augustin. in भजन संहिता 111:2)।
4. इसी प्रकार एक और आपत्ति हल हो जाती है, या कहें अपने आप विलीन हो जाती है—अर्थात् यदि परमेश्वर न केवल दुष्टों के साधन का उपयोग करता है वरन् उनकी युक्तियों और भावनाओं को भी चलाता है, तो वह उनके सब पापों का रचयिता है; और इसलिए परमेश्वर ने जो ठहराया है उसे पूरा करने में मनुष्य अन्यायपूर्वक दोषी ठहराए जाते हैं, क्योंकि वे उसकी इच्छा का पालन कर रहे हैं। यहाँ इच्छा को आज्ञा के साथ अनुचित रीति से गड्ड-मड्ड कर दिया गया है, जबकि असंख्य उदाहरणों से प्रकट है कि उन दोनों में सबसे बड़ा अन्तर है।140 जब अबशालोम ने अपने पिता के बिछौने को अपवित्र किया, तो यद्यपि परमेश्वर ने इस प्रकार दाऊद के व्यभिचार का बदला लेना चाहा, फिर भी उसने एक भ्रष्ट पुत्र को व्यभिचार करने की आज्ञा नहीं दी, सिवाय इसके कि शायद दाऊद के सम्बन्ध में, जैसा दाऊद स्वयं शिमी के शापों के विषय में कहता है। क्योंकि जहाँ वह मानता है कि शिमी परमेश्वर की आज्ञा से कार्य करता है, वहाँ वह उसकी आज्ञाकारिता की प्रशंसा किसी भी प्रकार नहीं करता, मानो वह ढीठ कुत्ता किसी ईश्वरीय आदेश का पालन कर रहा हो; परन्तु उसकी जीभ में परमेश्वर का कोड़ा पहचानकर वह धीरज से ताड़ना सहता है। अतः हमें यह मानना चाहिए कि जब परमेश्वर दुष्टों के द्वारा वह पूरा करता है जो उसने गुप्त रूप से ठहराया था, तब वे इस रूप में क्षमा के योग्य नहीं ठहरते मानो वे उसकी आज्ञा का पालन कर रहे हों, जिसे वे अपनी वासना के अनुसार जान-बूझकर भंग करते हैं।
140 फ्रेंच में है: “Car ils meslent perversment le commandement de Dieu avec son vouloir secret, veu qu’il appert par exemples infinis qu’il y a bien longue distance et diversité de l’un à l’autre;” अर्थात् वे परमेश्वर की आज्ञा को उसकी गुप्त इच्छा से विकृत रूप में मिला देते हैं, जबकि असंख्य उदाहरणों से प्रकट है कि दोनों के बीच बहुत बड़ी दूरी और भिन्नता है।
ये बातें, जिन्हें मनुष्य कुटिलता से करते हैं, किस प्रकार परमेश्वर की ओर से हैं और उसके गुप्त विधान से शासित हैं, यह राजा यारोबाम के चुनाव में प्रभावशाली रीति से दिखाया गया है (1 राजाओं 12:20), जिसमें परमेश्वर द्वारा स्वीकृत क्रम को बिगाड़ने और दाऊद के घराने से विश्वासघातपूर्वक विद्रोह करने के कारण लोगों की उतावली और मतिहीनता की कड़ी निन्दा की गई है। फिर भी हम जानते हैं कि परमेश्वर की इच्छा थी कि यारोबाम का अभिषेक हो। इसीलिए होशे के वचनों में प्रकट विरोधाभास है (होशे 8:4; 13:11), क्योंकि जहाँ परमेश्वर ने शिकायत की कि वह राज्य उसकी जानकारी के बिना और उसकी इच्छा के विरुद्ध खड़ा किया गया, वहाँ अन्यत्र वह घोषणा करता है कि उसने राजा यारोबाम को अपने क्रोध में दिया था। हम इन दोनों बातों का मेल कैसे बैठाएँ—कि यारोबाम का राज्य परमेश्वर की ओर से नहीं था, और फिर भी परमेश्वर ने उसे राजा ठहराया? इस प्रकार: लोग दाऊद के घराने से तब तक विद्रोह नहीं कर सकते थे जब तक वे उस जूए को न उतार फेंकते जो परमेश्वर ने उन पर रखा था, और फिर भी परमेश्वर स्वयं सुलैमान की कृतघ्नता को इस प्रकार दण्ड देने की शक्ति से वंचित नहीं था। इसलिए हम देखते हैं कि परमेश्वर, विश्वासघात को न चाहते हुए भी, एक दूसरे दृष्टिकोण से उस विद्रोह को न्यायपूर्वक चाहता है; और इसी कारण यारोबाम को अप्रत्याशित रूप से पवित्र अभिषेक मिलने से राज्य की आकांक्षा करने की प्रेरणा मिलती है। इसी कारण पवित्र इतिहास कहता है कि परमेश्वर ने सुलैमान के पुत्र से राज्य का एक भाग छीनने के लिए एक शत्रु खड़ा किया (1 राजाओं 11:23)। पाठक दोनों बातों पर ध्यानपूर्वक विचार करे: जैसे परमेश्वर की इच्छा थी कि प्रजा पर एक ही राजा का शासन रहे, वैसे उनका दो दलों में फट जाना उसकी इच्छा के विरुद्ध था; और फिर भी यही इच्छा उस विद्रोह का मूल थी। क्योंकि निश्चय ही जब यारोबाम को, जिसके मन में ऐसा विचार न था, भविष्यद्वक्ता वचन से और अभिषेक के तेल से राज्य की आशा रखने को प्रेरित करता है, तो वह बात परमेश्वर की जानकारी के बिना या उसकी इच्छा के विरुद्ध नहीं हुई, जिसने उसकी स्पष्ट आज्ञा दी थी; और फिर भी प्रजा का विद्रोह न्यायसंगत रूप से निन्दित है, क्योंकि दाऊद के वंश से उनका विद्रोह करना परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध था। इसी कारण आगे जोड़ा गया है कि जब रहबाम ने अहंकार से प्रजा की विनती को ठुकरा दिया, तब “यह बात यहोवा की ओर से हुई, कि वह अपना वह वचन पूरा करे जो उसने शीलोवासी अहिय्याह के द्वारा कहा था,” (1 राजाओं 12:15)। देखो, परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध पवित्र एकता भंग हुई, और साथ ही उसकी इच्छा से दस गोत्र सुलैमान के पुत्र से अलग हो गए। इसमें एक और ऐसा ही उदाहरण जोड़ा जा सकता है—अर्थात् अहाब के पुत्रों की हत्या और प्रजा की सहमति से, या कहें सक्रिय भागीदारी से, उसकी सारी सन्तान का नाश। येहू सच कहता है, “यहोवा के उस वचन में से, जो उसने अहाब के घराने के विषय में कहा, कोई भी बात भूमि पर न गिरेगी; क्योंकि यहोवा ने वही किया है जो उसने अपने दास एलिय्याह के द्वारा कहा था,” (2 राजाओं 10:10)। और फिर भी वह उचित कारण से सामरिया के नागरिकों को सहायता देने के लिए फटकारता है: “तुम तो धर्मी हो; देखो, मैंने अपने स्वामी के विरुद्ध षड्यन्त्र करके उसे मार डाला, परन्तु इन सब को किसने मारा?”
यदि मैं भूल नहीं करता, तो मैं पहले ही स्पष्टता से दिखा चुका हूँ कि एक ही कर्म किस प्रकार मनुष्य के दोष को भी प्रकट करता है और परमेश्वर की धार्मिकता को भी। विनम्र मन सदा अगस्तीन के उत्तर से सन्तुष्ट रहेंगे, “जब पिता ने पुत्र को सौंपा, मसीह ने अपनी देह को सौंपा, और यहूदा ने अपने स्वामी को सौंपा, तो ऐसी दशा में परमेश्वर धर्मी और मनुष्य दोषी कैसे है, सिवाय इसके कि जो एक कर्म उन्होंने किया उसमें उनके करने के कारण भिन्न हैं?” (August. Ep. 48, ad Vincentium)। यदि कोई इस व्याख्या से पूरी तरह सन्तुष्ट नहीं—कि परमेश्वर और मनुष्य के बीच कोई मेल नहीं, जब उसकी धर्ममय प्रेरणा से मनुष्य वह करता है जो उसे नहीं करना चाहिए—तो वे उस पर ध्यान दें जो अगस्तीन अन्यत्र कहता है: “उन न्याय-दण्डों पर कौन काँपे बिना रह सकता है, जब परमेश्वर दुष्टों के हृदयों में भी अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करता है, और साथ ही उन्हें उनके कामों के अनुसार बदला भी देता है?” (De Grat. et lib. Arbit. ad Valent. c. 20)। और निश्चय ही यहूदा के विश्वासघात के विषय में अपराध का दोष परमेश्वर पर थोपने का उतना ही कम आधार है, क्योंकि वह प्रसन्न था कि उसका पुत्र मृत्यु के लिए सौंपा जाए, और उसने उसे सौंपा भी, जितना हमारे छुटकारे का श्रेय यहूदा को देने का। इसीलिए अगस्तीन एक और स्थान पर सच कहता है कि जब परमेश्वर जाँच करता है, तब वह यह नहीं देखता कि मनुष्य क्या कर सकते थे, या उन्होंने क्या किया, परन्तु यह कि वे क्या करना चाहते थे, और इस प्रकार उनकी इच्छा और अभिप्राय का लेखा लेता है। जिन्हें यह कठोर लगता है, वे विचार करें कि उनकी छिद्रान्वेषण-प्रवृत्ति कहाँ तक सहन किए जाने के योग्य है, जब वे इस आधार पर कि बात उनकी समझ से परे है, उस बात को ठुकरा देते हैं जो पवित्रशास्त्र में स्पष्ट सिखाई गई है, और उन सत्यों के कथन की शिकायत करते हैं जिनका जानना यदि लाभदायक न होता तो परमेश्वर कभी अपने भविष्यद्वक्ताओं और प्रेरितों को उन्हें सिखाने की आज्ञा न देता। हमारी सच्ची बुद्धि यह है कि पवित्रशास्त्र ने जो कुछ सौंपा है उसे हम नम्र शिक्षणीयता से और बिना किसी आरक्षण के ग्रहण करें। जो लोग अपनी ढिठाई में लगे रहते हैं, ऐसी ढिठाई जो स्पष्टतः परमेश्वर के विरुद्ध है, वे और अधिक खण्डन के योग्य नहीं।
पहली पुस्तक समाप्त।
दूसरी पुस्तक।
परमेश्वर छुड़ानेवाले के ज्ञान के विषय में, मसीह में, जैसा वह पहले पुरखों पर व्यवस्था के अधीन और तत्पश्चात् हम पर सुसमाचार के अधीन प्रकट हुआ।
