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कलीसिया के अनुशासन के विषय में, और फटकार तथा बहिष्कार में उसके मुख्य प्रयोग के विषय में
अध्याय 12।
कलीसिया के अनुशासन के विषय में, और फटकार तथा बहिष्कार में उसके मुख्य प्रयोग के विषय में।
इस अध्याय के दो भाग हैं:—I. कलीसियाई अनुशासन का पहला भाग, जो लोगों से सम्बन्ध रखता है और सामान्य कहलाता है, दो अंशों में बँटा है: पहला अंश कुंजियों की सामर्थ्य पर निर्भर है, जिस पर खण्ड 1-14 में विचार किया गया है; दूसरा अंश उपवास और प्रार्थना के लिए समय ठहराने में है, खण्ड 14-21। II. कलीसियाई अनुशासन का दूसरा भाग, जो पादरी-वर्ग से सम्बन्ध रखता है, खण्ड 22-28।
खण्ड।
1. कुंजियों की सामर्थ्य, अर्थात् कलीसिया के सामान्य अनुशासन के विषय में। इस अनुशासन की आवश्यकता और अत्यन्त बड़ी उपयोगिता।
2. इसके अनेक चरण। 1. निजी चेतावनी। 2. गवाहों के सामने डाँट। 3. बहिष्कार।
3. अपराध की भिन्न-भिन्न श्रेणियाँ। दोनों प्रकार की ताड़ना में अपनाई जानेवाली रीतियाँ।
4. दोषों और घोर दुष्टता में भेद करना होगा। बाद वाली को अधिक कठोर दण्ड मिलना चाहिए।
5. इस अनुशासन के उद्देश्य। 1. ताकि दुष्ट लोग प्रभु-भोज की मेज़ पर आकर मसीह का अपमान न करें। 2. ताकि वे दूसरों को भ्रष्ट न करें। 3. ताकि वे स्वयं पश्चाताप करें।
6. प्रकट तथा गुप्त पापों को किस रीति से सुधारना चाहिए। छोटे और गम्भीर अपराध।
590 Lib. 1 Ep. 43; Lib. 4 Ep. 32, 34; Lib. 7 Ep. 39.
7. कोई भी मनुष्य, यहाँ तक कि राजा भी, इस अनुशासन से मुक्त नहीं। इसे किनके द्वारा और किस रीति से चलाया जाए।
8. अनुशासन किस भावना से चलाया जाए। प्राचीन मसीहियों में से कुछ ने किस बात में इसे अत्यधिक कठोरता से चलाया। यह उन्होंने अपने मन के भावों के अनुसार कम, और रीति के कारण अधिक किया। यह सिप्रियन, क्राइसोस्टम और अगस्तीन से प्रमाणित किया गया है।
9. संयम केवल सारी कलीसिया को ही नहीं, वरन् प्रत्येक सदस्य को भी रखना चाहिए।
10. बाँधने और खोलने के विषय में हमारे उद्धारकर्ता के वचन, यदि किसी और रीति से समझे जाएँ, तो तोड़-मरोड़े जाते हैं। अनात्थेमा और बहिष्कार में भेद। अनात्थेमा का प्रयोग यदि कभी हो भी, तो बहुत ही कम होना चाहिए।
11. अत्यधिक कठोरता से निजी लोगों को भी बचना चाहिए और पासबानों को भी।
12. इस विषय में दोनातवादी सबसे गम्भीर भूल में पड़े, जैसे आज के दिन पुनर्बपतिस्मावादी भी पड़े हैं। अगस्तीन द्वारा उनका चित्रण।
13. संयम विशेष रूप से तब रखना चाहिए जब कुछ ही लोग नहीं, वरन् लोगों का बड़ा समूह भटक गया हो।
14. सामान्य अनुशासन का दूसरा भाग, जो उपवास, प्रार्थना और अन्य पवित्र साधनाओं से सम्बन्ध रखता है। इन्हें दोनों व्यवस्थाओं के अधीन विश्वासी काम में लाते रहे। ये किन उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त हुए। उपवास के विषय में।
15. उपवास के तीन उद्देश्य। पहला विशेष रूप से निजी उपवास से सम्बन्ध रखता है। दूसरा और तीसरा उद्देश्य।
16. किसी बड़ी आपत्ति के समय पासबानों द्वारा सार्वजनिक उपवास और प्रार्थना ठहराई जाती है।
17. व्यवस्था के अधीन इसके उदाहरण।
18. उपवास मुख्यतः तीन बातों में है—अर्थात् समय, भोजन का स्वरूप, और उसका संयमित प्रयोग।
19. अन्धविश्वास को रोकने के लिए तीन बातें सिखानी चाहिए। 1. मन फाड़ा जाए, वस्त्र नहीं। 2. उपवास को पुण्य का कार्य या परमेश्वर की आराधना का कोई रूप न समझा जाए। 3. परहेज़ की अत्यधिक प्रशंसा न की जाए।
20. इसी प्रकार की अति के कारण चालीसा का पालन ठहराया गया। यह अन्धविश्वासपूर्ण रीति तीन तर्कों से खण्डित होती है। प्राचीन लोग उसे अवश्य मानते थे, पर भिन्न आधारों पर।
21. आगे चलकर भोजन के चुनाव को नियन्त्रित करने के लिए नियम बने। जेरोम के समय में भी अनेक दुरुपयोग। व्यवहार में पोप-तन्त्र में कोई सामान्य कलीसियाई अनुशासन है ही नहीं।
22. अनुशासन का दूसरा भाग, जो पादरी-वर्ग से सम्बन्ध रखता है। उसका स्वरूप क्या है, और पहले वह कितना कठोर था। आज के दिन वह कितनी दयनीय रीति से उपेक्षित है। एक उदाहरण जो पोप के अनुयायियों के लिए उपयुक्त हो।
23. याजकों के अविवाहित रहने के विषय में, जिसमें पोप के अनुयायी कलीसियाई अनुशासन का सारा बल रखते हैं। इस अधर्मी अत्याचार का पवित्रशास्त्र से खण्डन। पोप के अनुयायियों की एक आपत्ति का निपटारा।
24. याजकों के अविवाहित रहने के पक्ष में एक तर्क का उत्तर।
25. एक और तर्क का उत्तर।
26. एक और तर्क का उत्तर।
27. कुँवारेपन की प्रशंसा को विवाह से श्रेष्ठ ठहराने से निकला एक तर्क। उत्तर।
28. अविवाहित रहने के विषय का समापन। इस भूल का समर्थन सब प्राचीन लेखक नहीं करते।
1. कलीसिया का अनुशासन, जिस पर विचार अब तक टाला गया था, संक्षेप में समझाना होगा, ताकि हम अन्य विषयों की ओर बढ़ सकें। अब अनुशासन बहुत बड़ी सीमा तक कुंजियों की सामर्थ्य और आत्मिक अधिकार-क्षेत्र पर निर्भर है। इसे सरलता से समझने के लिए हम कलीसिया को दो मुख्य वर्गों में बाँट लें—अर्थात् पादरी-वर्ग और लोग। पादरी-वर्ग शब्द का प्रयोग मैं सामान्य अर्थ में उनके लिए करता हूँ जो कलीसिया में सार्वजनिक सेवा करते हैं।591
591 फ्रेंच: “J’use de ce mot de Cleres pource qu’il est commun, combien qu’il soit impropre; par lequel j’entens ceux qui ont office et ministere en l’Eglise.”—मैं “पादरी-वर्ग” शब्द का प्रयोग इसलिए करता हूँ कि यह प्रचलित है, यद्यपि अनुचित है; इससे मेरा अभिप्राय उनसे है जिनके पास कलीसिया में कोई पद और सेवकाई है।
हम पहले उस सामान्य अनुशासन की चर्चा करेंगे जिसके अधीन सबको रहना चाहिए, और फिर पादरी-वर्ग की ओर बढ़ेंगे, जिनके लिए उस सामान्य अनुशासन के अतिरिक्त एक विशेष अनुशासन भी है। परन्तु कुछ लोग अनुशासन से घृणा के कारण इसके नाम से ही दूर भागते हैं; उनके लिए हम यह कहते हैं,—यदि कोई समाज, वरन् साधारण परिवार वाला कोई घर भी, अनुशासन के बिना ठीक दशा में नहीं रखा जा सकता, तो कलीसिया में तो यह और भी अधिक आवश्यक है, जिसकी दशा यथासम्भव सबसे सुव्यवस्थित होनी चाहिए। इसलिए जैसे मसीह की उद्धार देनेवाली शिक्षा कलीसिया का प्राण है, वैसे ही अनुशासन मानो उसकी नसें हैं; क्योंकि इसी के कारण देह के अंग एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं, प्रत्येक अपने-अपने स्थान पर। इसलिए जो लोग या तो चाहते हैं कि अनुशासन मिटा दिया जाए, या उसे पुनः स्थापित करने में बाधा डालते हैं, चाहे वे यह जान-बूझकर करें या बिना सोचे-समझे, वे निश्चय ही कलीसिया के पूर्ण विनाश का प्रयत्न करते हैं। क्योंकि यदि हर एक को अपनी इच्छा के अनुसार चलने दिया जाए, तो परिणाम क्या होगा? परन्तु यही होगा, यदि सुसमाचार के प्रचार के साथ निजी चेतावनी, सुधार और ऐसे ही अन्य उपाय न जोड़े जाएँ, जिनसे शिक्षा बनी रहती है और शिथिल नहीं होने पाती। इसलिए अनुशासन एक प्रकार की लगाम है जो उन्हें रोकती और वश में रखती है जो मसीह की शिक्षा से लड़ते हैं; या वह एक प्रकार की अंकुश है जिससे उदासीन लोग जगाए जाते हैं; कभी-कभी वह पिता की छड़ी के समान भी है, जिससे वे लोग, जो किसी अधिक गम्भीर चूक में पड़े हों, मसीह के आत्मा की नम्रता के साथ दया सहित ताड़े जाते हैं। इसलिए जब हम लोगों के संचालन में पूर्ण असावधानी और अव्यवस्था के कारण कलीसिया में एक भयानक विनाश के कुछ आरम्भ पहले से देख रहे हैं, तब आवश्यकता स्वयं पुकार-पुकारकर कहती है कि उपचार चाहिए। अब एकमात्र उपचार वही है जिसकी आज्ञा मसीह ने दी, और जिसे भक्त लोग सदा काम में लाते रहे हैं।
2. अनुशासन की पहली नींव यह है कि निजी चेतावनी की व्यवस्था हो; अर्थात् यदि कोई अपना कर्तव्य स्वेच्छा से नहीं निभाता, या उद्दण्डता से व्यवहार करता है, या पूरी तरह भली रीति से नहीं रहता, या कोई दोष-योग्य काम करता है, तो उसे चेतावनी पाना स्वीकार करना चाहिए; और हर एक को अपने भाई को, जब अवसर हो, चेतावनी देने का यत्न करना चाहिए। यहाँ विशेष रूप से पासबानों और प्राचीनों की सतर्कता का अवसर है, जिनका कर्तव्य केवल लोगों को उपदेश देना ही नहीं, वरन् घर-घर जाकर समझाना और चेतावनी देना भी है, जब कभी उनके सुननेवाले सामान्य शिक्षा से पर्याप्त लाभ न उठा पाए हों; जैसा पौलुस दिखाता है, जब वह बताता है कि उसने “सब के सामने और घर-घर” सिखाया, और साक्षी देता है कि वह “सब के लहू से निर्दोष” है, क्योंकि उसने “परमेश्वर की सारी मनसा” सुनाने से जी नहीं चुराया (प्रेरितों के काम 20:20, 26, 27)। तब शिक्षा बल और अधिकार पाती है, जब सेवक केवल सब के सामने यह नहीं समझाता कि वे मसीह के प्रति क्या ऋणी हैं, वरन् जिन्हें वह अपनी शिक्षा के प्रति आलसी या अवज्ञाकारी पाए उनसे इसे माँगने का अधिकार और साधन भी रखता है। यदि कोई ऐसी चेतावनियों को हठ से ठुकरा दे, या अपने दोषों में बना रहकर दिखाए कि वह उन्हें तुच्छ जानता है, तो मसीह की आज्ञा यह है कि जब उसे गवाहों के सामने दूसरी बार चेतावनी दी जा चुके, तब उसे कलीसिया की अदालत में, अर्थात् प्राचीनों की सभा के सामने, बुलाया जाए और वहाँ सार्वजनिक अधिकार के साथ उसे और कड़ाई से चेताया जाए, ताकि यदि वह कलीसिया का आदर करे तो झुके और मान ले (मत्ती 18:15, 17)। यदि इस रीति से भी वह वश में न आए, वरन् अपने अधर्म में बना रहे, तो तब कलीसिया को तुच्छ जाननेवाला ठहराकर उसे विश्वासियों की संगति से अलग कर दिया जाए।
3. परन्तु हमारा उद्धारकर्ता वहाँ केवल गुप्त दोषों की बात नहीं कर रहा, इसलिए हमें इस भेद पर ध्यान देना चाहिए कि कुछ पाप निजी हैं और कुछ सार्वजनिक या खुले तौर पर प्रकट। पहले प्रकार के विषय में मसीह हर निजी व्यक्ति से कहता है, “जा, और अकेले में बातचीत करके उसे उसका दोष बता” (मत्ती 18:15)। खुले पापों के विषय में पौलुस तीमुथियुस से कहता है, “जो पाप करते हैं उन्हें सब के सामने समझा दे, ताकि और भी डरें” (1 तीमुथियुस 5:20)। हमारे उद्धारकर्ता ने पहले ये शब्द कहे थे, “यदि तेरा भाई तेरा अपराध करे”। इस वाक्यांश को, यदि तुम बात का बतंगड़ न बनाना चाहो, तो इसके सिवा और किसी रीति से नहीं समझ सकते कि यदि ऐसा तुम्हारे जानते हुए हो और दूसरों को इसकी खबर न हो। पौलुस ने तीमुथियुस को जो आज्ञा दी कि जो खुले रूप से पाप करते हैं उन्हें खुले रूप से डाँटा जाए, उस पर वह स्वयं पतरस के साथ चला (गलातियों 2:14)। क्योंकि जब पतरस ने ऐसा पाप किया कि सब के सामने ठोकर का कारण बना, तब उसने उसे अलग ले जाकर चिताया नहीं, वरन् कलीसिया के सामने खड़ा किया। इसलिए उचित मार्ग यह होगा कि गुप्त दोषों के सुधार में उन्हीं चरणों से चला जाए जो मसीह ने बताए हैं, और खुले पापों में, जिनके साथ सार्वजनिक ठोकर जुड़ी हो, तुरन्त कलीसिया की ओर से गम्भीर सुधार की कार्रवाई की जाए।
4. एक और भेद पर ध्यान देना चाहिए, वह यह कि कुछ पाप केवल चूक हैं, और कुछ अपराध और घोर अधर्म। बाद वाले के सुधार में केवल चेतावनी या डाँट ही नहीं, वरन् कड़ा उपचार काम में लाना आवश्यक है, जैसा पौलुस दिखाता है, जब वह कुरिन्थ के व्यभिचारी को केवल शब्दों से नहीं डाँटता, वरन् उसके अपराध की सूचना मिलते ही बहिष्कार का दण्ड देता है (1 कुरिन्थियों 5:4)। अब हम अच्छी रीति से समझने लगते हैं कि कलीसिया का आत्मिक अधिकार-क्षेत्र, जो प्रभु के वचन के अनुसार पापों का निरीक्षण करता है, एक साथ खरी शिक्षा की सबसे उत्तम सहायता, व्यवस्था की सबसे उत्तम नींव और एकता का सबसे उत्तम बन्धन है। इसलिए जब कलीसिया खुले व्यभिचारियों, लम्पटों, चोरों, डाकुओं, उपद्रवियों, झूठी शपथ खानेवालों, झूठे गवाहों और ऐसे ही अन्य लोगों को अपनी संगति से निकाल देती है; और उन हठीलों को भी, जो हलके दोषों के लिए ठीक रीति से चेताए जाने पर परमेश्वर और उसके न्यायासन की हँसी उड़ाते हैं, तो वह अपने लिए कोई अनुचित अधिकार नहीं जताती, वरन् उस अधिकार-क्षेत्र का प्रयोग करती है जो उसे प्रभु से मिला है। फिर, ताकि कोई कलीसिया के निर्णय को तुच्छ न जाने, या विश्वासियों के मतों द्वारा दोषी ठहराए जाने को छोटी बात न समझे, प्रभु ने घोषित किया है कि यह उसके अपने दण्डादेश की घोषणा के सिवा और कुछ नहीं, और जो वे पृथ्वी पर करते हैं वह स्वर्ग में स्थिर किया जाता है। क्योंकि वे प्रभु के वचन से हठीलों को दोषी ठहराते हैं, और प्रभु के वचन से ही पश्चातापियों को फिर अनुग्रह में ले लेते हैं (यूहन्ना 20:23)। मैं कहता हूँ कि जो यह भरोसा रखते हैं कि कलीसियाएँ अनुशासन के इस बन्धन के बिना देर तक टिकी रह सकती हैं, वे भूल में हैं, जब तक कि हम उस सहायता के बिना निर्दण्ड काम चला सकें जिसे प्रभु ने पहले ही देख लिया था कि आवश्यक होगी। और वास्तव में इस आवश्यकता की महानता उसके अनेक उपयोगों से और अच्छी रीति से समझ में आएगी।
5. कलीसिया के इस प्रकार सुधार करने और बहिष्कार करने में तीन उद्देश्य हैं जिन पर उसकी दृष्टि रहती है। पहला यह कि परमेश्वर का अपमान न हो, जो तब होता है जब लज्जाजनक और घोर दुष्ट जीवन बितानेवालों को मसीही नाम दिया जाता है, मानो उसकी पवित्र कलीसिया दुष्टों और भ्रष्टों की टोली हो। क्योंकि कलीसिया मसीह की देह है, इसलिए वह ऐसे दुर्गन्धित और सड़े हुए अंगों से अशुद्ध नहीं हो सकती, बिना उसके सिर पर कुछ कलंक आए। इसलिए ताकि कलीसिया में कुछ ऐसा न रहे जो उसके पवित्र नाम पर कलंक लाए, जिनकी नीचता उस नाम पर बदनामी डाल सकती है उन्हें उसके परिवार से निकाल देना चाहिए। और यहाँ प्रभु-भोज का भी ध्यान रखना चाहिए, जो बिना भेद के सबको सम्मिलित करने से अपवित्र हो सकता है।592 क्योंकि यह अत्यन्त सत्य है कि जिसे इसके वितरण का भार सौंपा गया है, वह यदि जान-बूझकर और स्वेच्छा से किसी ऐसे अयोग्य व्यक्ति को सम्मिलित करे जिसे वह रोक सकता और रोकना चाहिए, तो वह वैसा ही पवित्र वस्तुओं के अपमान का दोषी है मानो उसने प्रभु की देह कुत्तों के आगे डाल दी हो। इसीलिए क्राइसोस्टम उन याजकों पर कड़वाहट से बरसता है जो बड़े लोगों के भय से किसी को रोकने का साहस नहीं करते। वह कहता है (Hom. 83, in Mt.), “तुम्हारे हाथों से लहू का लेखा लिया जाएगा। यदि तुम मनुष्य से डरोगे, तो वह तुम्हारी हँसी उड़ाएगा; परन्तु यदि तुम परमेश्वर से डरोगे, तो मनुष्यों में भी तुम्हारा आदर होगा। हम राजदण्ड-वाहकों, बैंगनी वस्त्रों या मुकुटों के सामने न काँपें; यहाँ हमारी सामर्थ्य बड़ी है। निश्चय ही मैं अपनी देह को मृत्यु के हाथ सौंप दूँगा और अपना लहू बहने दूँगा, पर उस अशुद्धता का भागी न बनूँगा।” इसलिए, ताकि यह परम पवित्र भेद अनादर के लिए न छोड़ा जाए, इसके वितरण में बड़े चुनाव की आवश्यकता है, और यह कलीसिया के अधिकार-क्षेत्र के बिना नहीं हो सकता। अनुशासन का दूसरा उद्देश्य यह है कि भले लोग, जैसा प्रायः होता है, दुष्टों के साथ निरन्तर मेल-जोल से भ्रष्ट न हो जाएँ। क्योंकि हमारी भटकने की प्रवृत्ति ऐसी है कि बुरे उदाहरण से हमें सही मार्ग से फुसला लेने से सरल कुछ नहीं। अनुशासन के इसी प्रयोग की ओर प्रेरित ने संकेत किया, जब उसने कुरिन्थियों को आज्ञा दी कि व्यभिचारी को अपनी संगति से निकाल दें। “थोड़ा सा खमीर पूरे गूँधे हुए आटे को खमीर कर देता है” (1 कुरिन्थियों 5:6)। और उसने यहाँ इतना खतरा देखा कि उन्हें ऐसे लोगों की संगति रखने से भी मना कर दिया। “यदि कोई भाई कहलाकर व्यभिचारी, या लोभी, या मूर्तिपूजक, या गाली देनेवाला, या पियक्कड़, या अन्धेर करनेवाला हो, तो उस से संगति न रखना; वरन् ऐसे मनुष्य के साथ खाना भी न खाना” (1 कुरिन्थियों 5:11)। अनुशासन का तीसरा उद्देश्य यह है कि पापी लज्जित हो और अपनी नीचता पर पश्चाताप करना आरम्भ करे। इसलिए उन्हीं के हित में भी है कि उनके अधर्म को ताड़ा जाए, ताकि जो ढील पाकर और हठी हो जाते, वे छड़ी से जाग उठें। प्रेरित यही संकेत करता है जब वह यों लिखता है—“यदि कोई हमारी इस पत्री की बात को न माने, तो उस पर दृष्टि रखो; और उस की संगति न करो, जिस से वह लज्जित हो” (2 थिस्सलुनीकियों 3:14)। फिर, जब वह कहता है कि उसने कुरिन्थ के उस मनुष्य को शैतान के हाथ सौंप दिया, “ताकि उस की आत्मा प्रभु यीशु के दिन में उद्धार पाए” (1 कुरिन्थियों 5:5); अर्थात्, जैसी मेरी व्याख्या है, उसने उसे सामयिक दण्ड के हाथ सौंपा, ताकि वह अनन्तकाल के लिए सुरक्षित किया जाए। और वह कहता है कि उसने उसे शैतान को सौंपा क्योंकि शैतान कलीसिया के बाहर है, जैसे मसीह कलीसिया में है। कुछ लोग इसका अर्थ देह पर किसी विशेष दण्ड से लेते हैं, पर यह व्याख्या मुझे अत्यन्त असम्भाव्य लगती है। (August. de Verb. Apostol. Serm. 68)
592 Vide Cyril in Joann. cap. 50, et Luther, de Commun. Populi, tom. 2
6. इन उद्देश्यों के ठहर जाने पर, अब यह देखना बाकी है कि कलीसिया अनुशासन के इस भाग को, जो अधिकार-क्षेत्र में निहित है, किस रीति से पूरा करे। और पहले, उस विभाजन को स्मरण रखें जो ऊपर किया गया, कि कुछ पाप सार्वजनिक हैं और कुछ निजी या गुप्त। सार्वजनिक वे हैं जो एक-दो गवाहों के सामने नहीं, वरन् खुले तौर पर और सारी कलीसिया की ठोकर के लिए किए गए हों। गुप्त से मेरा अभिप्राय उनसे नहीं जो मनुष्यों से बिलकुल छिपे हों, जैसे कपटियों के पाप (क्योंकि वे कलीसिया के निर्णय के अधीन नहीं आते), वरन् उन मध्यम प्रकार के पापों से है जो बिना गवाहों के नहीं हैं, फिर भी सार्वजनिक नहीं हैं। पहले प्रकार को उन भिन्न चरणों की आवश्यकता नहीं जो मसीह ने गिनाए हैं; वरन् जब कभी ऐसा कुछ हो, कलीसिया को अपराधी को बुलाकर और उसके दोष के अनुसार उसे सुधारकर अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। दूसरे प्रकार में, मसीह के नियम के अनुसार, जब तक हठ न हो, बात कलीसिया के सामने नहीं आती। अपराधों की जाँच में दोषों और घोर अधर्मों के भेद पर ध्यान देना आवश्यक है। हलके अपराधों में कठोरता की उतनी आवश्यकता नहीं, वरन् शब्दों से ताड़ना काफी है, और वह भी कोमल और पिता के समान, ताकि अपराधी को खिजाया या घबराया न जाए, वरन् उसे सुध में लाया जाए, कि वह सुधार से दुखी होने के बजाय आनन्दित हो। घोर अधर्मों के लिए कड़ा उपचार चाहिए। जिसने किसी खुले बुरे उदाहरण के कर्म से कलीसिया को गम्भीर रूप से ठेस पहुँचाई हो, उसे केवल शब्दों से डाँटना काफी नहीं; वरन् कुछ समय तक उसे प्रभु-भोज की सहभागिता से वंचित रखा जाए, जब तक कि वह पश्चाताप का प्रमाण न दे। पौलुस कुरिन्थ के उस मनुष्य को केवल शब्दों से नहीं डाँटता, वरन् उसे कलीसिया से निकाल देता है, और कुरिन्थियों को इसके लिए डाँटता है कि उन्होंने उसे इतने समय तक सहा (1 कुरिन्थियों 5:5)। यही रीति प्राचीन और अधिक शुद्ध कलीसिया ने अपनाई, जब उचित शासन बल में था। जब कोई किसी घोर अधर्म का दोषी होता और इससे ठोकर का कारण बनता, तो पहले उसे पवित्र प्रभु-भोज में भाग लेने से रुकने की आज्ञा दी जाती, और फिर यह कि वह परमेश्वर के सामने अपने को दीन करे और कलीसिया के सामने अपना पश्चाताप प्रकट करे। इसके अतिरिक्त गम्भीर रीतियाँ भी थीं, जो पश्चाताप के चिन्ह के रूप में गिरे हुओं के लिए ठहराई जाती थीं। जब पश्चातापी इस प्रकार कलीसिया के प्रति पाप का दण्ड चुका देता, तो हाथ रखकर उसे फिर अनुग्रह में ले लिया जाता। इस पुनः-स्वीकृति को सिप्रियन प्रायः शान्ति का नाम देता है, जो इसका रूप संक्षेप में बताता है।593 “वे कुछ समय तक पश्चातापियों के समान व्यवहार करते हैं, फिर अंगीकार के लिए आते हैं, और अध्यक्ष और पादरी-वर्ग के हाथ रखने से सहभागिता का अधिकार पाते हैं।” यद्यपि अध्यक्ष पादरी-वर्ग के साथ पश्चातापी की पुनः-स्थापना की देखरेख करता था, तथापि साथ ही लोगों की सहमति भी आवश्यक थी, जैसा वह अन्यत्र समझाता है।
7. इस अनुशासन से किसी का मुक्त होना तो दूर, राजा-महाराजा भी अपनी प्रजा के साथ इसके अधीन हुए; और यह उचित भी था, क्योंकि यह मसीह का अनुशासन है, जिसके अधीन सब राजदण्ड और मुकुट होने चाहिए। इसी प्रकार थियोडोसियस ने,594 जब थिस्सलुनीके में किए गए हत्याकाण्ड के कारण अम्ब्रोस ने उसका बहिष्कार किया, तो अपने चारों ओर के सब राजचिन्ह उतार दिए, और कलीसिया में सब के सामने उस पाप पर, जिसमें वह दूसरों के छल से फँस गया था, विलाप किया, कराहते और आँसू बहाते हुए क्षमा की याचना की। बड़े राजाओं को राजाओं के राजा मसीह के सामने दीन होकर गिरना अपने लिए अपमान की बात न समझना चाहिए; न उन्हें कलीसिया से न्याय पाने पर अप्रसन्न होना चाहिए। क्योंकि अपने दरबारों में वे चापलूसी के सिवा बहुत कम कुछ सुनते हैं, इसलिए यह और भी आवश्यक है कि प्रभु उन्हें अपने याजकों के मुँह से सुधारे। वरन् उन्हें चाहिए कि वे याजकों से चाहें कि वे उन्हें न छोड़ें, ताकि प्रभु उन्हें छोड़ दे। यह अधिकार-क्षेत्र किनके द्वारा चलाया जाए, इस विषय में मैं यहाँ कुछ नहीं कहता, क्योंकि यह अन्यत्र कहा जा चुका है (अध्याय 11, खण्ड 5, 6)। मैं केवल इतना जोड़ता हूँ कि बहिष्कार में उचित मार्ग, जैसा पौलुस ने दिखाया, यह नहीं है कि प्राचीन अकेले दूसरों से अलग होकर कार्य करें, वरन् कलीसिया की जानकारी और स्वीकृति से, ताकि लोगों का समूह, कार्रवाई को चलाए बिना, गवाहों और रखवालों के रूप में उसे देखे, और थोड़े लोगों को मनमाने ढंग से कुछ करने से रोके। सारी कार्रवाई में, परमेश्वर के नाम की पुकार के अतिरिक्त, ऐसी गम्भीरता होनी चाहिए जो मसीह की उपस्थिति को प्रकट करे और इसमें सन्देह की कोई गुंजाइश न छोड़े कि वह अपने ही न्यायासन पर विराजमान है।
8. यह भी छोड़ा नहीं जाना चाहिए कि कलीसिया को कठोरता बरतते समय उसके साथ नम्रता की आत्मा भी रखनी चाहिए। क्योंकि, जैसी पौलुस की आज्ञा है, हमें सदा ध्यान रखना चाहिए कि जिस पर अनुशासन चलाया जाता है वह “उदासी में डूब न जाए” (2 कुरिन्थियों 2:7); क्योंकि इस रीति से सुधार के स्थान पर विनाश होगा। संयम का नियम सबसे अच्छी रीति से उस उद्देश्य से प्राप्त होगा जो सामने रखा गया है। क्योंकि बहिष्कार का उद्देश्य पापी को पश्चाताप तक पहुँचाना और बुरे उदाहरण को हटाना है, ताकि मसीह के नाम की निन्दा न हो, और दूसरे उन्हीं बुरे मार्गों के लिए न ललचाएँ: यदि हम इसे ध्यान में रखें, तो सरलता से समझ जाएँगे कि कठोरता कहाँ तक ले जानी चाहिए, और किस बिन्दु पर रुक जानी चाहिए। इसलिए जब पापी कलीसिया को अपने पश्चाताप का प्रमाण दे, और इस प्रमाण से अपनी ओर से अपराध को मिटाने का जो कुछ हो सके करे, तो उस पर किसी भी प्रकार आगे दबाव न डाला जाए। यदि दबाव डाला जाए, तो कठोरता अब उचित सीमा से बढ़ जाती है। इस विषय में प्राचीनों की अत्यधिक कठोरता को क्षमा करना असम्भव है, जो हमारे प्रभु की आज्ञा से सर्वथा विपरीत थी और अजीब रीति से खतरनाक थी। क्योंकि जब वे औपचारिक पश्चाताप की आज्ञा देते और तीन, या चार, या सात वर्ष, या जीवन भर के लिए सहभागिता से बाहर रखते थे, तो इसका परिणाम बड़े कपट या बड़ी निराशा के सिवा और क्या हो सकता था? उसी प्रकार, जब कोई फिर गिर जाता तो उसे दूसरे पश्चाताप का अवसर न देकर जीवन के अन्त तक कलीसिया से निकाल दिया जाता (August. Ep. 54), यह न लाभदायक था, न विवेक के अनुकूल। इसलिए जो कोई इस बात को स्वस्थ विवेक से देखेगा, वह यहाँ विवेक की कमी पर खेद करेगा। फिर भी यहाँ मैं सार्वजनिक रीति को अस्वीकार करता हूँ, उन पर दोष नहीं लगाता जिन्होंने उसका पालन किया। उनमें से कुछ ने निश्चय ही उसे अस्वीकार किया, पर जिसे सुधार न सके उसके अधीन हो गए। सिप्रियन तो स्वयं घोषित करता है कि वह अपनी इच्छा से इतना कठोर नहीं था। वह कहता है (Lib. 1 Ep. 3), “हमारा धीरज, सरलता और मानवीयता हर आनेवाले के लिए तैयार हैं। मैं चाहता हूँ कि सब कलीसिया में लौटा लिए जाएँ; मैं चाहता हूँ कि हमारे सब साथी-योद्धा मसीह की छावनी और पिता परमेश्वर के निवास-स्थानों के भीतर रखे जाएँ। मैं सबको क्षमा करता हूँ; बहुत कुछ पर पर्दा डालता हूँ; भाईचारे को इकट्ठा करने की गहरी अभिलाषा से मैं परमेश्वर के विरुद्ध किए गए सब दोषों की बारीकी से जाँच नहीं करता। मैं स्वयं प्रायः चूकता हूँ, जब अपराधों को उचित से अधिक क्षमा कर देता हूँ। जो पश्चाताप के साथ लौटते हैं, और जो सरल और दीन सन्तोष-प्रदान के साथ अपने पाप मान लेते हैं, उन्हें मैं तत्परता और पूर्ण आनन्द के साथ गले लगाता हूँ।” क्राइसोस्टम, जो कुछ अधिक कठोर है, फिर भी यों कहता है: “यदि परमेश्वर इतना कृपालु है, तो उसका याजक कठोर क्यों दिखना चाहे?” हम यह भी जानते हैं कि अगस्तीन ने दोनातवादियों के साथ कितनी उदारता का व्यवहार किया; जो फूट से लौटते थे उन्हें, ज्यों ही वे पश्चाताप की घोषणा करते, उनके अध्यक्ष-पद में स्वीकार करने में उसे कोई हिचक न थी। परन्तु चूँकि विपरीत रीति चल पड़ी थी, इसलिए उन्हें उसी का अनुसरण करने और अपना निर्णय छोड़ देने को विवश होना पड़ा।
593 सिप्रियन, Lib. 1 Ep. 2; Lib. 3 Ep. 14, 26.
594 Ambros. Lib. 1 Ep. 3; et Oratio habita in Funere Theodosii.
9. परन्तु जैसे कलीसिया की सारी देह से अपेक्षा है कि वह इस प्रकार कोमलता से कार्य करे, और गिरे हुओं के विरुद्ध अपनी कठोरता को चरम सीमा तक न ले जाए, वरन् पौलुस की आज्ञा के अनुसार उनके प्रति प्रेम से व्यवहार करे, वैसे ही हर निजी व्यक्ति को भी अपनी सीमा में इस दया और मानवीयता के अनुकूल बनना चाहिए। इसलिए जो कलीसिया से निकाल दिए गए हैं, उन्हें चुने हुओं की गिनती से मिटा देना, या यह मान लेना कि वे पहले ही खो चुके हैं और उनसे निराश हो जाना, हमारा काम नहीं। हम उन्हें न्यायसंगत रीति से कलीसिया से पराए, और इस प्रकार मसीह से पराए ठहरा सकते हैं, परन्तु केवल उनके बहिष्कार के समय तक। यदि तब भी वे दीनता से अधिक उद्दण्डता का प्रमाण दें, तो भी हम उन्हें प्रभु के न्याय को सौंपें, उनसे वर्तमान में जो देखते हैं उससे भविष्य में अच्छी आशा रखें, और उनके लिए परमेश्वर से प्रार्थना करना न छोड़ें। और (एक शब्द में कहें तो) हम उनके व्यक्ति को, जो केवल प्रभु के हाथ में और उसी के निर्णय के अधीन है, विनाश के लिए न ठहराएँ; वरन् केवल प्रत्येक मनुष्य के कामों के स्वभाव को प्रभु की व्यवस्था के अनुसार आँकें।
इस नियम का पालन करने में हम अपना कोई निर्णय देने के बजाय परमेश्वरीय निर्णय के अधीन बने रहते हैं। यदि हम परमेश्वर की सामर्थ्य को सीमित न करना और उसकी दया को व्यवस्था न देना चाहें, तो हम निर्णय करने में अपने लिए अधिक स्वतन्त्रता न जताएँ। जब कभी उसे भला लगे, निकृष्टतम लोग सर्वोत्तम बना दिए जाते हैं; पराए कलम की तरह जोड़े जाते हैं, और अजनबी कलीसिया में गोद लिए जाते हैं। प्रभु यह इसलिए करता है कि मनुष्यों की कल्पनाओं को निराश करे और उनकी उतावली को लज्जित करे; वह उतावली, जिसे यदि रोका न जाए, तो न्याय करने की ऐसी सामर्थ्य हड़प लेगी जिस पर उसका कोई अधिकार नहीं।
10. क्योंकि जब हमारा उद्धारकर्ता प्रतिज्ञा करता है कि जो कुछ उसके सेवक पृथ्वी पर बाँधेंगे वह स्वर्ग में बँधेगा (मत्ती 18:18), तब वह बाँधने की सामर्थ्य को कलीसिया की फटकार तक सीमित करता है, जो बहिष्कृत लोगों को सदा के विनाश और दण्ड के हवाले नहीं करती, वरन् जब वे अपने जीवन और आचरण को दोषी ठहरते सुनते हैं, तो उन्हें निश्चय दिलाती है कि यदि वे पश्चाताप न करें तो सदा का दण्ड उनके पीछे आएगा। बहिष्कार अनात्थेमा से इसमें भिन्न है कि अनात्थेमा क्षमा को पूरी तरह रोककर व्यक्ति को अनन्त विनाश के लिए ठहराता और समर्पित कर देता है, जबकि बहिष्कार उसके आचरण को डाँटता और उस पर दृष्टि रखता है; और यद्यपि वह भी दण्ड देता है, पर उसे उसके भावी दण्ड की चेतावनी देकर उद्धार तक पहुँचाने के लिए। यदि वह सफल हो, तो मेल-मिलाप और सहभागिता में पुनर्स्थापना देने को तैयार है। इसके अतिरिक्त, अनात्थेमा का प्रयोग यदि कभी हो भी, तो बहुत ही कम होना चाहिए। इसलिए, यद्यपि कलीसियाई अनुशासन हमें बहिष्कृत लोगों के साथ घनिष्ठता और मेल-जोल रखने की अनुमति नहीं देता, तथापि हमें हर सम्भव उपाय से उन्हें अच्छे मन पर लाने और कलीसिया की संगति और एकता में वापस लाने का यत्न करना चाहिए: जैसा प्रेरित भी कहता है, “उसे बैरी न समझो, पर भाई जानकर चितौनी दो” (2 थिस्सलुनीकियों 3:15)। यदि यह मानवीयता निजी रीति से भी और सार्वजनिक रीति से भी न निभाई जाए, तो खतरा यह है कि हमारा अनुशासन बिगड़कर विनाश बन जाएगा।595
11. अनुशासन के संयम के लिए एक और विशेष आवश्यकता यह है, जैसा अगस्तीन दोनातवादियों के विरुद्ध बताता है, कि निजी लोग, जब वे प्राचीनों की सभा द्वारा दोषों को कम सावधानी से सुधारा जाता देखें, तो तुरन्त अपने आप को कलीसिया से अलग न कर लें; और न पासबान स्वयं, जब वे उन सब बातों को उस सीमा तक सुधार न सकें जैसा वे चाहते हैं, अपनी सेवकाई छोड़ दें, या अनोखी कठोरता से सारी कलीसिया में उथल-पुथल मचा दें। अगस्तीन की यह बात पूर्णतः सत्य है: “जो कोई जिसे सुधार सकता है उसे डाँटकर, या मेल के बन्धन को तोड़े बिना सुधारता है, जिसे सुधार नहीं सकता उसे निकाल देता है, या जिसे मेल के बन्धन को तोड़े बिना निकाल नहीं सकता उसे धीरज से सहते हुए अनुचित रूप से दोषी ठहराता है, वह श्राप से मुक्त और बरी है” (August. contra Parmen. Lib. 2 c. 4)। वह अन्यत्र इसका कारण बताता है। “कलीसियाई अनुशासन के हर भक्तिपूर्ण कारण और रीति को सदा मेल के बन्धन में आत्मा की एकता का ध्यान रखना चाहिए। प्रेरित हमें आज्ञा देता है कि एक-दूसरे को सहते हुए इसे बनाए रखें। यदि यह बनाए न रखी जाए, तो अनुशासन की औषधि न केवल निरर्थक, वरन् हानिकारक भी होने लगती है, और इसलिए औषधि रहती ही नहीं” (Ibid. Lib. 3 c. 1)। “जो कोई इन बातों पर ध्यान से विचार करता है, वह न एकता को बनाए रखने में अनुशासन की कठोरता की उपेक्षा करता है, न असंयमित सुधार से समाज का बन्धन तोड़ता है” (Ibid. cap. 2)। वह वास्तव में मानता है कि पासबानों को ही नहीं, वरन् प्रत्येक व्यक्ति को अपनी पूरी सामर्थ्य से कलीसिया से हर दोष को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए; और वह इस बात को नहीं छिपाता कि जो बुरे लोगों को चेताने, उन पर दोष लगाने और उन्हें सुधारने में चूकता है, चाहे वह उनका पक्ष न ले और न उनके साथ पाप करे, तो भी प्रभु के सामने दोषी है; और यदि वह इस रीति से व्यवहार करे कि उन्हें प्रभु-भोज में भाग लेने से रोक सकते हुए भी न रोके, तो वह पाप अब दूसरों का नहीं, वरन् उसका अपना है। केवल वह चाहता है कि वह विवेक काम में लाया जाए जो हमारा प्रभु भी माँगता है, “ऐसा न हो कि जंगली दाने बीनते हुए तुम उन के साथ गेहूँ भी उखाड़ लो” (मत्ती 13:29)। इसलिए वह सिप्रियन से यह निष्कर्ष निकालता है, “इसलिए मनुष्य जिसे सुधार सकता है उसे दया से सुधारे; जिसे सुधार नहीं सकता उसे धीरज से सहे, और प्रेम में शोक और विलाप करे।” वह यह भी मानता है कि पासबानों को कलीसिया से हर दोष हटाने के लिए ही नहीं, वरन् प्रत्येक सदस्य को भी अपनी पूरी सामर्थ्य से ऐसा ही करना चाहिए।
595 फ्रेंच: “Il y a danger, que de discipline nous ne tombions en une maniere de gehene, et que de correcteurs nous ne devenions bourreaux.”—खतरा है कि अनुशासन के स्थान पर हम एक प्रकार की गेहेन्ना में गिर पड़ें, और सुधारकों के स्थान पर जल्लाद बन जाएँ।
12. यह उसने दोनातवादियों की चिड़चिड़ाहट के कारण कहा, जिन्होंने कलीसिया में ऐसे दोष देखे जिन्हें अध्यक्ष शब्दों से तो डाँटते थे, पर बहिष्कार से दण्ड नहीं देते थे (क्योंकि वे नहीं सोचते थे कि इस रीति से कुछ लाभ होगा), तो उन्होंने अध्यक्षों पर अनुशासन के विश्वासघाती होने का कड़वा आरोप लगाया, और एक अधर्मी फूट से अपने आप को मसीह के झुण्ड से अलग कर लिया। आज के दिन पुनर्बपतिस्मावादियों का आचरण भी ऐसा ही है, जो मसीह की किसी ऐसी सभा को नहीं मानते जो सब बातों में स्वर्गदूतों की सी सिद्धता से विशिष्ट न हो, और जोश के बहाने उस सब कुछ को उलट देते हैं जो उन्नति की ओर ले जाता है।596 अगस्तीन (contra Parmen. Lib. 3 c. 4) कहता है, “ऐसे लोग, दूसरों के अधर्म से घृणा के कारण नहीं, वरन् अपने ही विवादों के जोश के कारण, अपने नाम की साख से निर्बलों को फँसाकर उन्हें पूरी तरह खींच ले जाने का, या कम से कम अलग करने का प्रयत्न करते हैं; अभिमान से फूले हुए, उद्दण्डता से उन्मत्त, निन्दा में धूर्त, और विद्रोह में उपद्रवी। ताकि यह न दिखे कि वे सत्य की ज्योति से कितने खाली हैं, वे अपने आप को कठोर कठोरता की छाया से ढाँप लेते हैं: भाई के दोष का सुधार, जिसके विषय में पवित्रशास्त्र में आज्ञा है कि वह संयम के साथ, प्रेम की सच्चाई को हानि पहुँचाए बिना और मेल का बन्धन तोड़े बिना किया जाए, उसे वे अधर्मी फूट और काट डालने के उद्देश्यों में बिगाड़ देते हैं। इस प्रकार शैतान अपने आप को ज्योतिर्मय स्वर्गदूत का रूप बना लेता है (2 कुरिन्थियों 11:14), जब वह उचित कठोरता के बहाने बर्बर क्रूरता के लिए बहकाता है, और इसके सिवा कुछ नहीं चाहता कि एकता और मेल के बन्धन को तोड़े और फाड़ डाले; क्योंकि जब वह बना रहता है, तब उसकी हानि पहुँचाने की सारी सामर्थ्य निर्बल हो जाती है, उसके धूर्त फन्दे टूट जाते हैं, और उसकी उलट-फेर की योजनाएँ लुप्त हो जाती हैं।”
13. एक बात अगस्तीन विशेष रूप से सराहता है—अर्थात् यदि पाप की छूत ने भीड़ को जकड़ लिया हो, तो जीवित अनुशासन के साथ दया भी रहनी चाहिए। “क्योंकि अलग हो जाने की सम्मतियाँ व्यर्थ, अधर्मी और हानिकारक हैं, क्योंकि वे दुष्टतापूर्ण और घमण्डी हैं, और दुष्ट घमण्डियों को सुधारने की अपेक्षा निर्बल भलों को अधिक विचलित करती हैं” (August. Ep. 64)। जो वह दूसरों को आज्ञा देता है उसका उसने स्वयं विश्वासयोग्यता से पालन किया। क्योंकि कार्थेज के अध्यक्ष ऑरेलियस को लिखते हुए वह शिकायत करता है कि पवित्रशास्त्र में इतनी कड़ाई से दोषी ठहराई गई पियक्कड़ी अफ्रीका में निर्दण्ड फैली हुई है, और सलाह देता है कि उपाय के लिए अध्यक्षों की एक सभा बुलाई जाए। वह तुरन्त जोड़ता है, “मेरी सम्मति में ऐसी बातें रूखे, कठोर और रोबदार उपायों से नहीं हटतीं, वरन् आज्ञा देने से अधिक सिखाने से, धमकाने से अधिक चेताने से। क्योंकि अपराधियों की भीड़ के साथ हमें इसी रीति से चलना चाहिए। कठोरता थोड़े लोगों के पापों के विरुद्ध बरती जाए” (August. Ep. 64)। फिर भी उसका यह अर्थ नहीं कि अध्यक्ष आँख मूँद लें या चुप रहें क्योंकि वे सार्वजनिक अपराधों को कड़ाई से दण्ड नहीं दे सकते, जैसा वह स्वयं आगे समझाता है। परन्तु वह सुधार की रीति को इस प्रकार संयमित करना चाहता है कि देह को विनाश के बजाय स्वास्थ्य मिले। और इसलिए वह यों निष्कर्ष निकालता है: “इसलिए हमें प्रेरित की इस आज्ञा की किसी प्रकार उपेक्षा नहीं करनी चाहिए कि दुष्टों से अलग हो जाएँ, जब यह मेल को तोड़ने के जोखिम के बिना किया जा सके, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि यह किसी और रीति से किया जाए (1 कुरिन्थियों 5:13); हमें यह भी यत्न करना चाहिए कि एक-दूसरे को सहते हुए मेल के बन्धन में आत्मा की एकता को बनाए रखें” (इफिसियों 4:2)।
14. अनुशासन का शेष भाग, जो कड़ाई से कहें तो कुंजियों की सामर्थ्य में सम्मिलित नहीं है, वह है जब पासबान समय की आवश्यकता के अनुसार लोगों को उपवास और गम्भीर प्रार्थना की, या दीन होने, पश्चाताप और विश्वास के अन्य साधनों की ओर उभारते हैं; इनका समय, रीति और रूप परमेश्वर के वचन में ठहराया नहीं गया है, वरन् कलीसिया के विवेक पर छोड़ा गया है। जैसे अनुशासन के इस भाग का पालन लाभदायक है, वैसे ही कलीसिया में यह सदा, प्रेरितों के दिनों से भी, काम में लाया जाता रहा। वस्तुतः प्रेरित स्वयं इसके आरम्भकर्ता नहीं थे, वरन् उन्होंने व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं से उदाहरण लिया। क्योंकि हम वहाँ देखते हैं,597 कि जब-जब कोई गम्भीर बात आई, लोग इकट्ठे किए गए, और प्रार्थना-विनती तथा उपवास ठहराए गए। इसमें प्रेरितों ने ऐसा मार्ग अपनाया जो परमेश्वर के लोगों के लिए नया नहीं था, और जिसे उन्होंने पहले से देखा कि लाभदायक होगा। अन्य साधनों का भी ऐसा ही वर्णन किया जा सकता है, जिनसे लोग कर्तव्य के लिए जगाए जा सकते हैं, या कर्तव्य और आज्ञाकारिता में बनाए रखे जा सकते हैं। पवित्र इतिहास में हमें हर जगह उदाहरण मिलते हैं, और उन्हें इकट्ठा करना अनावश्यक है। सामान्यतः हमें यह मानना चाहिए कि जब कभी कोई धार्मिक विवाद उठे, जिसका निर्णय किसी महासभा या कलीसियाई न्यायासन को करना हो;598 जब कभी किसी सेवक को चुनना हो; सारांश यह कि जब कभी कोई कठिन और बड़े महत्व का विषय विचाराधीन हो: दूसरी ओर, जब परमेश्वर के क्रोध के प्रकटीकरण दिखाई दें, जैसे महामारी, युद्ध और अकाल, तब सब युगों की पवित्र और लाभदायक रीति यह रही है कि पासबान लोगों को सार्वजनिक उपवास और विशेष प्रार्थना के लिए उभारें। यदि कोई पुराने नियम के उन अंशों को, जो प्रस्तुत किए जाते हैं, मसीही कलीसिया पर कम लागू होनेवाले मानकर स्वीकार करने से इनकार करे, तो यह स्पष्ट है कि प्रेरितों ने भी ऐसा ही किया; यद्यपि प्रार्थना के विषय में मुझे नहीं लगता कि कोई इस प्रश्न को उठाएगा। इसलिए हम उपवास के विषय में कुछ बातें कहें, क्योंकि बहुत-से लोग, यह न समझकर कि उसमें क्या लाभ हो सकता है, उसे अधिक आवश्यक नहीं समझते, जबकि दूसरे उसे निरर्थक मानकर पूरी तरह ठुकरा देते हैं। जहाँ उसका प्रयोग भली रीति से ज्ञात नहीं, वहाँ अन्धविश्वास में पड़ जाना सरल है।
15. पवित्र और उचित उपवास के तीन उद्देश्य होते हैं। हम उसे या तो शरीर को मारने और वश में करने के लिए प्रयोग करते हैं, कि वह उच्छृंखल न हो; या प्रार्थना और पवित्र मनन के लिए अधिक अच्छी तैयारी करने के लिए; या परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन करने का प्रमाण देने के लिए, जब हम उसके सामने अपना दोष मानना चाहते हैं। पहले उद्देश्य पर सार्वजनिक उपवास में प्रायः ध्यान नहीं दिया जाता, क्योंकि सबकी शारीरिक बनावट एक-सी नहीं होती, न स्वास्थ्य की दशा एक-सी, और इसलिए वह निजी उपवास पर अधिक लागू होता है। दूसरा उद्देश्य दोनों में सामान्य है, क्योंकि प्रार्थना के लिए यह तैयारी सारी कलीसिया के लिए भी आवश्यक है और प्रत्येक सदस्य के लिए भी। यही बात तीसरे के विषय में भी कही जा सकती है। क्योंकि कभी-कभी ऐसा होता है कि परमेश्वर किसी जाति को युद्ध, महामारी या किसी प्रकार की विपत्ति से मारता है। इस सामान्य ताड़ना में पूरे लोगों को अपना दोषी होना स्वीकार करना और अपना दोष मानना चाहिए। यदि प्रभु का हाथ किसी को निजी रूप से मारे, तो वही बात वह अकेला, या उसका परिवार करे। यह बात वास्तव में मन का भाव है। परन्तु जब मन जैसा चाहिए वैसा प्रभावित हो, तो वह बाहरी प्रकटीकरण में अपने को व्यक्त किए बिना नहीं रह सकता, विशेषकर जब वह सामान्य उन्नति की ओर ले जाता हो, कि सब खुले रूप से अपना पाप मानकर परमेश्वर के न्याय की स्तुति करें, और अपने उदाहरण से एक-दूसरे को प्रोत्साहित करें।
597 देखिए एज्रा 8:21 में एक उल्लेखनीय उदाहरण, जहाँ लोगों के बेबीलोन की बन्धुआई से लौटने पर अहवा नदी के तट पर उपवास ठहराया गया।
598 फ्रेंच: “Quand il advient quelque different en Chretienté, qui tire grande consequence.”—जब मसीही जगत् में किसी बड़े परिणाम के विषय में कोई मतभेद उठे।
16. इसलिए उपवास, चूँकि वह दीनता का चिन्ह है, निजी लोगों की अपेक्षा सार्वजनिक रूप से अधिक बार प्रयोग में आता है, यद्यपि, जैसा हम कह चुके हैं, वह दोनों में सामान्य है। इसलिए जिस अनुशासन की हम अब चर्चा कर रहे हैं, उसके विषय में, जब कभी किसी महत्वपूर्ण अवसर पर परमेश्वर से विनती करनी हो, तो उपवास और प्रार्थना के लिए समय ठहराना उचित है। इस प्रकार जब अन्ताकिया के मसीहियों ने बरनबास और पौलुस पर हाथ रखे, ताकि वे अपनी सेवकाई को, जो इतने बड़े महत्व की थी, और अच्छी रीति से परमेश्वर को सौंप सकें, तो उन्होंने उपवास और प्रार्थना को साथ जोड़ा (प्रेरितों के काम 13:3)। इसी प्रकार इन दोनों प्रेरितों ने आगे चलकर, जब उन्होंने कलीसियाओं के लिए सेवक ठहराए, प्रार्थना और उपवास का प्रयोग किया (प्रेरितों के काम 14:23)। सामान्यतः, उपवास में उनका एकमात्र उद्देश्य अपने आप को प्रार्थना के लिए अधिक सजग और बोझ से मुक्त करना था। हम निश्चय ही अनुभव करते हैं कि भरपेट भोजन के बाद मन परमेश्वर की ओर ऐसे नहीं उठता कि प्रार्थना की उत्कट और प्रबल अभिलाषा और प्रार्थना में लगे रहने की दृढ़ता से बहता चला जाए। इसी अर्थ में लूका का वह कथन समझना चाहिए जो उसने हन्नाह के विषय में कहा कि वह “उपवास और प्रार्थना कर करके रात दिन उपासना किया करती थी” (लूका 2:37)। क्योंकि वह परमेश्वर की आराधना को उपवास में नहीं रखता, वरन् संकेत करता है कि इस रीति से उस पवित्र स्त्री ने अपने को प्रार्थना में लगे रहने का अभ्यासी बनाया। नहेमायाह का उपवास ऐसा ही था, जब उसने अपने लोगों के छुटकारे के लिए अधिक उत्कट उत्साह से परमेश्वर से प्रार्थना की (नहेम्याह 1:4)। इसी कारण पौलुस कहता है कि विवाहित विश्वासी कुछ समय के लिए अलग रहें तो भला करते हैं (1 कुरिन्थियों 7:5), ताकि उन्हें प्रार्थना और उपवास के लिए अधिक स्वतन्त्रता मिले; जब वह उपवास के साथ प्रार्थना को सहायता के रूप में जोड़ता है, तो वह हमें स्मरण दिलाता है कि वह अपने आप में कोई महत्व नहीं रखता, सिवाय इसके कि वह इसी उद्देश्य से जुड़ा हो। फिर, जब वह उसी स्थान पर पति-पत्नी को आज्ञा देता है कि एक-दूसरे को उचित कर्तव्य दें, तो स्पष्ट है कि वह दैनिक प्रार्थना की बात नहीं कर रहा, वरन् उन प्रार्थनाओं की जिनमें साधारण से अधिक ध्यान की आवश्यकता है।
17. दूसरी ओर, जब महामारी फैलने लगे, या अकाल या युद्ध, या जब कोई और विपत्ति किसी प्रान्त और जाति पर मँडराती दिखाई दे (एस्तेर 4:16), तब भी पासबानों का कर्तव्य है कि कलीसिया को उपवास के लिए उभारें, कि वह दीन होकर प्रभु के क्रोध को टालने की विनती करे। क्योंकि जब वह संकट को प्रकट होने देता है, तो घोषित करता है कि वह दण्ड देने को तैयार और मानो सशस्त्र है। इसलिए जैसे प्राचीन काल में अभियुक्त लोग न्यायी की दया जगाने के लिए लम्बी दाढ़ी, बिखरे बाल और मोटे वस्त्र धारण करके दीनता से विनती करते थे, वैसे ही जब हम परमेश्वर के न्यायासन के सामने अभियुक्त हैं, तो दीन वेश में उसकी कठोरता को टालने की विनती करना उसकी महिमा और सार्वजनिक उन्नति के लिए भी है, और हमारे अपने लिए भी लाभदायक और हितकारी। और कि यह इस्राएलियों में सामान्य था, यह हम योएल के शब्दों से अनुमान कर सकते हैं। क्योंकि जब वह कहता है, “सिय्योन में नरसिंगा फूँको, उपवास का दिन ठहराओ, महासभा बुलाओ,” आदि (योएल 2:15), तो वह इन्हें ऐसी बातों के रूप में कहता है जो सामान्य रीति से मानी जाती थीं। थोड़ा पहले उसने कहा था कि लोगों की उनकी दुष्टता के लिए जाँच होनी है, और न्याय का दिन निकट है, और उसने उन्हें अपराधियों के रूप में अपना पक्ष रखने को बुलाया था: तब वह पुकारता है कि वे टाट और राख की ओर, रोने और उपवास की ओर दौड़ें; अर्थात् बाहरी प्रकटीकरणों से परमेश्वर के सामने अपने आप को दीन करें। टाट और राख शायद उन दिनों के लिए अधिक उपयुक्त थे, परन्तु सभा, रोना, उपवास और ऐसी ही बातें निःसन्देह हमारे युग पर भी उतनी ही लागू होती हैं, जब कभी हमारी दशा इसकी माँग करे। क्योंकि जब यह पवित्र साधन है कि मनुष्य अपने आप को दीन करें और अपनी दीनता को मानें, तो हम वैसी ही आवश्यकता में इसका प्रयोग पुराने लोगों से कम क्यों करें? हम पढ़ते हैं कि न केवल इस्राएली कलीसिया ने, जो परमेश्वर के वचन से बनी और स्थापित हुई थी, शोक के चिन्ह के रूप में उपवास किया, वरन् नीनवे के लोगों ने भी, जिनकी एकमात्र शिक्षा योना का प्रचार थी।599 तो हम भी ऐसा क्यों न करें? परन्तु यह एक बाहरी रीति है, जो अन्य रीतियों की तरह मसीह में समाप्त हो गई। नहीं, आज के दिन भी यह विश्वासियों के लिए एक उत्तम सहायता है, जैसा सदा रही है, और उन्हें जगाने की एक लाभदायक चेतावनी, कि जब वे प्रभु की छड़ी से ताड़े जाते हैं, तब अत्यधिक निश्चिन्तता और आलस्य से प्रभु को और अधिक क्रोधित न करें। इसलिए जब हमारा उद्धारकर्ता अपने प्रेरितों के उपवास न करने का बचाव करता है, तो वह यह नहीं कहता कि उपवास रद्द हो गया, वरन् उसे विपत्ति के दिनों के लिए सुरक्षित रखता है और शोक के साथ जोड़ता है। “वे दिन आएँगे कि दूल्हा उन से अलग किया जाएगा” (मत्ती 9:15; लूका 5:34)।
18. परन्तु ताकि नाम के विषय में कोई भूल न रहे, हम परिभाषित करें कि उपवास क्या है; क्योंकि उससे हमारा अभिप्राय केवल भोजन का संयमित और कम प्रयोग नहीं, वरन् कुछ और है। भक्तों का जीवन मितव्ययता और संयम से मिला-जुला होना चाहिए, ताकि यथासम्भव जीवन भर एक प्रकार का उपवास दिखाई दे। परन्तु एक और सामयिक उपवास है, जब हम अपने सामान्य जीवन-ढंग से कुछ घटा देते हैं, या तो एक दिन के लिए या किसी निश्चित अवधि के लिए, और उस साधारण भोजन के प्रयोग में अपने ऊपर अधिक कड़ा और कठोर नियन्त्रण ठहरा लेते हैं। यह तीन बातों में है—अर्थात् समय, भोजन का स्वरूप, और उसका संयमित प्रयोग। समय से मेरा अभिप्राय यह है कि उपवास करते हुए हम वे कार्य करें जिनके लिए उपवास ठहराया गया है। उदाहरण के लिए, जब कोई गम्भीर प्रार्थना के कारण उपवास करता है, तो उसे बिना भोजन किए उसमें लगना चाहिए। स्वरूप यह है कि सब विलासिता को एक ओर रखा जाए, और साधारण और निम्न भोजन से सन्तुष्ट रहा जाए, ताकि स्वादिष्ट व्यंजनों से हम अपनी जीभ को न उकसाएँ। मात्रा के विषय में, हमें हलका और कम खाना चाहिए, केवल आवश्यकता के लिए, आनन्द के लिए नहीं।
19. परन्तु सबसे पहले जिस बात से सदा बचना चाहिए वह अन्धविश्वास का घुस आना है, जैसा पहले हुआ, और कलीसिया की बड़ी हानि हुई। उपवास का बिलकुल न होना, उसके सावधानी से पालन किए जाने से कहीं अच्छा होता, यदि साथ ही वह झूठी और हानिकारक धारणाओं से बिगड़ जाए, जिनमें संसार बार-बार गिरता रहता है, जब तक कि पासबान उन्हें अत्यन्त विश्वासयोग्यता और विवेक से रोकें नहीं। पहली बात यह है कि योएल की आज्ञा पर निरन्तर बल दिया जाए, “अपने वस्त्र नहीं, अपने मन ही को फाड़ो” (योएल 2:13); अर्थात् लोगों को स्मरण दिलाना कि उपवास अपने आप में परमेश्वर की दृष्टि में बड़ा मूल्य नहीं रखता, जब तक कि उसके साथ मन का भीतरी भाव, पाप और अपने आप से सच्चा असन्तोष, सच्ची दीनता और परमेश्वर के भय से सच्चा शोक न हो; वरन् यह कि उपवास इसके सिवा और किसी कारण से लाभदायक नहीं कि वह इनके साथ एक गौण सहायता के रूप में जोड़ा जाता है।
599 1 शमूएल 7:6; 31:13; 2 राजाओं 1:12; योना 3:5।
ऐसी कोई बात नहीं जिससे परमेश्वर को अधिक घृणा हो, इससे बढ़कर कि मनुष्य मन की खराई के स्थान पर चिन्हों और बाहरी दिखावे को रखकर अपने आप को ढाँपने का यत्न करें। इसीलिए यशायाह यहूदियों के कपट पर अत्यन्त कड़वाहट से बरसता है, जो यह सोचते थे कि केवल उपवास कर लेने से उन्होंने परमेश्वर को सन्तुष्ट कर दिया, चाहे उनके मन में कैसी भी अभक्ति और अशुद्ध विचार पलते रहें। “क्या ऐसा ही उपवास मैं ने चुना है?” (यशायाह 58:5) आगे जो कहा गया है उसे भी देखिए। इसलिए कपटियों का उपवास न केवल निरर्थक और व्यर्थ थकान है, वरन् सबसे बड़ा घृणित काम है। इसी से मिलती-जुलती एक और बुराई, जिससे बहुत बचना चाहिए, यह है कि उपवास को पुण्य का कार्य और परमेश्वर की आराधना का एक रूप माना जाए। क्योंकि चूँकि वह अपने आप में एक उदासीन बात है, और उन उद्देश्यों के कारण ही उसका कुछ महत्व है जिन पर उसकी दृष्टि रहनी चाहिए, इसलिए उसे उन कामों के साथ गड्ड-मड्ड करना, जिनकी आज्ञा परमेश्वर ने दी है और जो अपने आप में, किसी और बात की अपेक्षा के बिना, आवश्यक हैं, अत्यन्त हानिकारक अन्धविश्वास है। प्राचीन काल में मानीवादियों का यही स्वप्न था, जिनका खण्डन करते हुए अगस्तीन स्पष्ट दिखाता है,600 कि उपवास का मूल्य पूरी तरह उन उद्देश्यों से आँका जाना चाहिए जिन्हें मैंने बताया, और वह परमेश्वर को तभी तक स्वीकार्य हो सकता है जब तक वह उनसे सम्बन्ध रखता हो। एक और भूल, जो इतनी अधर्मी तो नहीं, पर खतरनाक है, यह है कि उसे प्रमुख कर्तव्यों में से एक मानकर अधिक कड़ाई और कठोरता से माँगा जाए, और उसकी ऐसी अत्यधिक प्रशंसा की जाए कि मनुष्य सोचने लगें कि उपवास करके उन्होंने कुछ अद्भुत किया है। इस विषय में मैं प्राचीन लेखकों601 को पूरी तरह निर्दोष ठहराने का साहस नहीं करता कि उन्होंने अन्धविश्वास के कुछ बीज बोए, और उस अत्याचार को अवसर दिया जो आगे उठा। हमें उपवास के विषय में कभी-कभी खरी और विवेकपूर्ण बातें मिलती हैं, परन्तु बार-बार अत्यधिक प्रशंसाएँ भी मिलती हैं, जो उसे प्रमुख गुणों में से एक बताकर सराहती हैं।
20. तब चालीसा का अन्धविश्वासपूर्ण पालन सब जगह फैल गया: क्योंकि साधारण लोग समझते थे कि इसके द्वारा वे परमेश्वर की कोई उत्तम सेवा करते हैं, और पासबान उसे मसीह का पवित्र अनुकरण कहकर सराहते थे; यद्यपि स्पष्ट है कि मसीह ने दूसरों के लिए उदाहरण रखने को उपवास नहीं किया, वरन् इस रीति से सुसमाचार का प्रचार आरम्भ करके यह सिद्ध करना चाहा कि उसकी शिक्षा मनुष्यों की नहीं, वरन् स्वर्ग से आई है। और यह आश्चर्य की बात है कि तीक्ष्ण बुद्धिवाले मनुष्य इस मोटे भ्रम में कैसे पड़ गए, जिसका इतने स्पष्ट कारणों से खण्डन होता है: क्योंकि मसीह ने बार-बार उपवास नहीं किया (जो उसे करना पड़ता यदि वह वार्षिक उपवास के लिए नियम बाँधना चाहता), वरन् केवल एक बार, जब वह सुसमाचार की घोषणा की तैयारी कर रहा था। न ही उसने मनुष्यों की रीति से उपवास किया, जैसा वह करता यदि वह मनुष्यों को अनुकरण के लिए बुलाना चाहता; वरन् वह ऐसा उदाहरण देता है जिससे सब को अपना अनुकरण करने का यत्न करने के बजाय उसकी प्रशंसा करने के लिए उठाए। सारांश यह कि उसके उपवास का स्वभाव उससे भिन्न नहीं जो मूसा ने तब रखा जब उसने प्रभु के हाथ से व्यवस्था पाई (निर्गमन 24:18; 34:28)। क्योंकि चूँकि वह चमत्कार मूसा में व्यवस्था को स्थापित करने के लिए किया गया था, इसलिए मसीह में उसे छोड़ना उचित न था, कि सुसमाचार व्यवस्था से घटकर न दिखाई दे। परन्तु उस दिन से, किसी को कभी यह न सूझा कि मूसा के अनुकरण के बहाने इस्राएलियों में वैसा ही उपवास का रूप खड़ा करे। न ही किसी पवित्र भविष्यद्वक्ता या पूर्वज ने उसका अनुकरण किया, यद्यपि उनमें सब भक्तिपूर्ण साधनों के लिए मन और उत्साह की कमी न थी; क्योंकि यद्यपि एलिय्याह के विषय में कहा गया है कि उसने चालीस दिन बिना भोजन और पानी के बिताए, (1 राजाओं 19:8), तो यह केवल इसलिए था कि लोग पहचानें कि वह व्यवस्था को स्थिर रखने के लिए उठाया गया है, जिससे लगभग सारा इस्राएल विद्रोह कर चुका था। इसलिए यह केवल झूठा उत्साह था, अन्धविश्वास से भरा हुआ, जिसने मसीह के अनुकरण के नाम और बहाने से उपवास खड़ा किया; यद्यपि तब उपवास की रीति में एक अजीब विविधता थी, जैसा कैसियोडोरस ने सुकरात के इतिहास की नौवीं पुस्तक में वर्णन किया है: वह कहता है, “रोमियों के पास केवल तीन सप्ताह थे, परन्तु उनका उपवास प्रभु के दिन और सब्त को छोड़कर लगातार था। यूनानियों और इल्लुरिया के लोगों के पास, कुछ के छः, और कुछ के सात थे, परन्तु उपवास बीच-बीच में रुककर होता था। भोजन के प्रकार में भी वे कम भिन्न नहीं थे: कुछ केवल रोटी और पानी लेते थे, कुछ सब्जियाँ भी जोड़ते थे; कुछ को मछली और पक्षियों से कोई आपत्ति न थी; कुछ अपने भोजन में कोई भेद न रखते थे।” अगस्तीन भी जनुआरियस को अपनी बाद की पत्री में इस भेद का उल्लेख करता है।
600 August de Morib. Manich. Lib. 2 c. 13; et cont. Faustum, Lib. 30
601 देखिए Chrysostom. Homil. sub. initium Quadragesimæ, जहाँ वह उपवास को आत्माओं की चिकित्सा और पापों का प्रक्षालन कहता है।
21. और बुरा समय आया। साधारण लोगों के बेतुके उत्साह में अध्यक्षों की अशिष्टता और अज्ञानता, सत्ता की लालसा और अत्याचारी कठोरता जुड़ गईं। अधर्मी नियम बनाए गए, जिन्होंने विवेक को मृत्युदायक जंजीरों में जकड़ दिया। मांस खाना मना कर दिया गया, मानो मनुष्य उससे अशुद्ध हो जाता हो। अन्धविश्वास से भरी धारणाएँ एक के बाद एक जोड़ी गईं, जब तक सब कुछ भ्रम की खाई न बन गया। और ताकि कोई प्रकार की भ्रष्टता छूट न जाए, उन्होंने परहेज़ के अत्यन्त बेतुके बहाने से परमेश्वर का उपहास करना आरम्भ किया; क्योंकि वे अत्यन्त उत्तम व्यंजनों में उपवास की प्रशंसा खोजते हैं: अब कोई स्वादिष्ट व्यंजन पर्याप्त नहीं; भोजन की इतनी बहुतायत, विविधता और स्वाद कभी न थी। इस भव्य प्रदर्शन में वे सोचते हैं कि वे परमेश्वर की सेवा करते हैं। मैं यह नहीं कहता कि जो उनमें सबसे पवित्र समझे जाना चाहते हैं, वे किसी समय इससे अधिक घिनौनी रीति से लोटते नहीं। सारांश यह कि परमेश्वर की सबसे बड़ी आराधना मांस से परहेज़ करना है, और इस शर्त के साथ हर प्रकार के व्यंजन में लिप्त होना। दूसरी ओर, यह सबसे बड़ी अभक्ति है, ऐसी अभक्ति जिसका प्रायश्चित मृत्यु से भी मुश्किल से होगा, कि कोई अपनी रोटी के साथ सुअर के मांस या बासी मांस का छोटा-सा टुकड़ा भी चख ले। जेरोम, नेपोतियन को लिखते हुए, बताता है कि उसके दिनों में भी कुछ ऐसे लोग थे जो ऐसी मूर्खताओं से परमेश्वर का उपहास करते थे: जो अपने भोजन में तेल भी नहीं डालते थे, वे चारों ओर से सबसे उत्तम व्यंजन मँगवाते थे; वरन् ताकि प्रकृति पर बलात्कार करें, वे पानी पीने से परहेज़ करते और अपने लिए मीठे और बहुमूल्य पेय बनवाते, जिन्हें वे प्याले से नहीं, सीप से पीते थे। जो तब कुछ लोगों का दोष था, वह अब सब धनवानों में सामान्य है: वे इसके सिवा और किसी उद्देश्य से उपवास नहीं करते कि और अधिक समृद्धि और विलासिता से दावत उड़ा सकें। परन्तु मैं ऐसे विषय पर, जिसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता, बहुत शब्द नष्ट करना नहीं चाहता। मैं केवल इतना कहता हूँ कि उपवासों में और अनुशासन के अन्य सब भागों में पोप के अनुयायी इतने दूर हैं कि उनके पास कुछ भी सही, कुछ भी निष्कपट, कुछ भी उचित रीति से रचा और व्यवस्थित नहीं है, कि उन्हें इस पर इतराने का कोई अवसर नहीं कि उनके पास प्रशंसा के योग्य कुछ बचा हुआ है।
22. अब हम अनुशासन के दूसरे भाग पर आते हैं, जो विशेष रूप से पादरी-वर्ग से सम्बन्ध रखता है। वह उन नियमों में निहित है जो प्राचीन अध्यक्षों ने अपने और अपनी श्रेणी के लिए बनाए: उदाहरण के लिए, कोई पादरी अपना समय शिकार, जुए या दावतों में न बिताए; कोई ब्याज या व्यापार में न लगे; कोई कामुक नाचों और ऐसी ही बातों में उपस्थित न हो। नियमों के अधिकार को पुष्टि देने के लिए दण्ड भी जोड़े गए, कि कोई उन्हें निर्दण्ड न तोड़े। इसी उद्देश्य से प्रत्येक अध्यक्ष को अपने पादरी-वर्ग की देखरेख सौंपी गई, कि वह उन्हें नियमों के अनुसार चलाए और उनके कर्तव्य में बनाए रखे। इसी हेतु कुछ वार्षिक निरीक्षण और सभाएँ ठहराई गईं, कि यदि कोई अपने पद में असावधान हो तो उसे चेताया जाए; यदि कोई पाप करे तो उसके दोष के अनुसार दण्ड पाए। अध्यक्षों की भी प्रान्तीय सभाएँ वर्ष में एक बार, प्राचीन काल में दो बार, होती थीं, जिनमें उनकी जाँच होती थी कि उन्होंने अपने कर्तव्य के विरुद्ध कुछ किया तो नहीं। क्योंकि यदि कोई अध्यक्ष अपने पादरी-वर्ग के साथ बहुत कठोर या हिंसक रहा हो, तो सभा में अपील की जा सकती थी, चाहे शिकायत करनेवाला एक ही व्यक्ति हो। सबसे कठोर दण्ड पद से हटाना और कुछ समय के लिए सहभागिता से बाहर रखना था। परन्तु जब यही नियमित व्यवस्था थी, तो कोई सभा तब तक नहीं उठती थी जब तक अगली सभा का समय और स्थान ठहरा न लिया जाए। सार्वभौमिक महासभा बुलाना अकेले सम्राट का काम था, जैसा सब प्राचीन आह्वान प्रमाणित करते हैं। जब तक यह कठोरता बल में रही, पादरी-वर्ग ने लोगों से शब्द में उससे अधिक नहीं माँगा जितना वे स्वयं कर्म और उदाहरण से निभाते थे; वरन् वे अपने विरुद्ध साधारण लोगों से अधिक कठोर थे; और वास्तव में यह उचित भी है कि लोगों पर अधिक कोमल, और, यदि मैं ऐसा कह सकूँ, अधिक ढीले अनुशासन से शासन किया जाए; कि पादरी-वर्ग अपनी फटकारों में अधिक कठोर हो, और अपने प्रति दूसरों की अपेक्षा कम उदार। यह सारी कार्रवाई कैसे अप्रचलित हो गई, यह बताना अनावश्यक है, क्योंकि आज के दिन इस श्रेणी से अधिक उच्छृंखल और बेलगाम कुछ कल्पना नहीं की जा सकती, जिसकी स्वच्छन्दता इतनी चरम पर है कि सारा संसार चिल्ला रहा है। मैं मानता हूँ कि प्राचीनता से बिलकुल अनजान न दिखने के लिए वे कुछ छायाओं से सीधे-सादे लोगों की आँखों को धोखा देते हैं; परन्तु ये प्राचीन रीतियों से उतना ही मेल खाती हैं जितना बन्दर की नकल उस काम से मेल खाती है जो मनुष्य विवेक और सलाह से करते हैं। ज़ेनोफ़ोन में एक स्मरणीय अंश है, जिसमें वह बताता है कि जब फारसी लोग अपने पूर्वजों की रीतियों से लज्जाजनक रूप से गिर गए थे, और कठोर जीवन-ढंग से विलासिता और कोमलता में पड़ गए थे, तब भी, अपनी लज्जा छिपाने के लिए, वे प्राचीन रीतियों का सावधानी से पालन करते रहे (Cyrop. Lib. 8)। क्योंकि जब कुस्रू के समय संयम और मिताचार ऐसा फला-फूला कि किसी फारसी को नाक पोंछने की आवश्यकता नहीं पड़ती थी, और ऐसा करना लज्जा की बात भी समझी जाती थी, तो उनके वंशजों में यह धर्म की बात के रूप में बना रहा कि नासिका से मल न निकालें, यद्यपि उन्हें भीतर, यहाँ तक कि सड़ने तक, वे दुर्गन्धित द्रव पालने की छूट थी जो उन्होंने पेटूपन से जमा किए थे। उसी प्रकार, प्राचीन रीति के अनुसार मेज़ पर प्याले काम में लाना अनुचित था; परन्तु दाखमधु इस प्रकार निगल जाना कि नशे में उठाकर ले जाना पड़े, यह पूर्णतः सहन किया जाता था। आज्ञा थी कि दिन में केवल एक बार भोजन किया जाए: इन भले उत्तराधिकारियों ने इसे रद्द नहीं किया, परन्तु दोपहर से आधी रात तक अपना अतिभोजन जारी रखा। दिन की यात्रा पूरी करने के लिए, जैसा व्यवस्था ने ठहराया था, उपवास करना सर्वसामान्य रीति थी; परन्तु थकान से बचने के लिए यात्रा को दो घण्टे तक सीमित रखना अनुमत और प्रचलित रीति थी। जब-जब पतित पोप के अनुयायी अपने नियम थोपते हैं ताकि पवित्र पूर्वजों से अपनी समानता दिखाएँ, तब-तब यह उदाहरण उनके हास्यास्पद अनुकरण को उघाड़ने के काम आएगा। वास्तव में कोई चित्रकार उन्हें इससे अधिक सजीव रूप में नहीं बना सकता।
602 बर्नार्ड, Serm. 1 in die Paschæ में, अन्य लोगों के साथ राजाओं की भी निन्दा करता है कि चालीसा के समय में वे हमारे प्रभु के पुनरुत्थान के निकट आते पर्व की लालसा करते थे, कि अधिक स्वतन्त्रता से मौज उड़ा सकें।
603 121 D121 बर्नार्ड अन्य लोगों के साथ राजाओं की भी निन्दा करता है कि चालीसा के समय में वे हमारे प्रभु के पुनरुत्थान के निकट आते पर्व की लालसा करते थे, कि अधिक स्वतन्त्रता से मौज उड़ा सकें।
23. एक बात में वे अत्यधिक कठोर और अटल हैं—याजकों को विवाह करने की अनुमति न देने में। यह बताना व्यर्थ है कि उनके बीच व्यभिचार कितनी निर्दण्डता से फैला है, और अपने घिनौने अविवाहित रहने पर भरोसा करके वे हर प्रकार के अधर्म के प्रति कैसे कठोर-हृदय हो गए हैं। परन्तु यह निषेध स्पष्ट दिखाता है कि सब परम्पराएँ कितनी विनाशकारी हैं, क्योंकि इस एक ने न केवल कलीसिया को योग्य और खरे पासबानों से वंचित किया, वरन् अधर्म का एक भयानक नाला खोल दिया है और बहुत-सी आत्माओं को निराशा की खाई में डुबो दिया है। निश्चय ही जब याजकों के लिए विवाह निषिद्ध किया गया, तो यह अधर्मी अत्याचार से किया गया, न केवल परमेश्वर के वचन के विरुद्ध, वरन् सब न्याय के विरुद्ध। पहली बात, मनुष्यों को उसे वर्जित करने का कोई अधिकार नहीं था जिसे परमेश्वर ने स्वतन्त्र छोड़ा; दूसरी बात, यह इतना स्पष्ट है कि लम्बा प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं कि परमेश्वर ने अपने वचन में स्पष्ट रूप से यह प्रबन्ध किया है कि इस स्वतन्त्रता का उल्लंघन न किया जाए। मैं पौलुस की उस आज्ञा को छोड़ देता हूँ, जो उसने अनेक स्थानों पर दी, कि अध्यक्ष एक ही पत्नी का पति हो; परन्तु उसके इस कथन से बढ़कर और क्या दृढ़ हो सकता है कि अन्तिम दिनों में अधर्मी मनुष्य होंगे जो “विवाह करने से मना करेंगे”? (1 तीमुथियुस 4:3) ऐसे लोगों को वह केवल धोखेबाज़ ही नहीं, वरन् दुष्टात्मा कहता है। इसलिए हमारे पास एक भविष्यद्वाणी है, पवित्र आत्मा की एक पवित्र वाणी, जो कलीसिया को आरम्भ से ही खतरों से सावधान करने के लिए है, और घोषित करती है कि विवाह का निषेध दुष्टात्माओं की शिक्षा है। वे सोचते हैं कि जब वे इस अंश को तोड़-मरोड़कर मोंटानस, तातियानवादियों, एन्क्रातीवादियों और अन्य प्राचीन विधर्मियों पर लागू करते हैं, तो वे सुन्दरता से बच निकलते हैं। वे कहते हैं कि केवल इन्होंने विवाह की निन्दा की; हम उसकी किसी प्रकार निन्दा नहीं करते, केवल कलीसियाई श्रेणी को उससे वंचित करते हैं, जिनके लिए हम उसे उचित नहीं समझते। मानो, यह मान भी लें कि यह भविष्यद्वाणी पहले उन विधर्मियों में पूरी हुई, तो भी वह स्वयं उन पर भी लागू नहीं होती; या मानो कोई उस बचकानी चालाकी को सुन सकता है कि वे विवाह को वर्जित नहीं करते, क्योंकि वे उसे सब के लिए वर्जित नहीं करते। यह ठीक वैसा ही है जैसे कोई अत्याचारी तर्क करे कि कोई व्यवस्था अन्यायपूर्ण नहीं, क्योंकि उसका अन्याय केवल राज्य के एक भाग पर पड़ता है।
24. वे आपत्ति करते हैं कि पादरी-वर्ग और लोगों के बीच कोई भेद-चिन्ह होना चाहिए; मानो प्रभु ने उन आभूषणों का प्रबन्ध नहीं किया जिनमें याजकों को उत्कृष्ट होना चाहिए। इस प्रकार वे प्रेरित पर आरोप लगाते हैं कि उसने कलीसियाई श्रेणी को बिगाड़ा और उसका आभूषण नष्ट किया, जब उसने सिद्ध अध्यक्ष का चित्र खींचते हुए विवाह को उन अन्य गुणों के बीच गिनने का साहस किया जो उसने उनसे माँगे। मैं जानता हूँ कि वे इसकी व्याख्या किस रीति से करते हैं—अर्थात् यह कि जिसकी दूसरी पत्नी हो उसे अध्यक्ष नियुक्त न किया जाए। मैं मानता हूँ कि यह व्याख्या नई नहीं है; परन्तु इसकी अशुद्धता तुरन्त के सन्दर्भ से स्पष्ट है, जो यह ठहराता है कि अध्यक्षों और सेवकों की कैसी पत्नियाँ होनी चाहिए। पौलुस विवाह को अध्यक्ष के गुणों में गिनता है; वे लोग घोषित करते हैं कि कलीसियाई श्रेणी में विवाह असह्य दोष है; और वास्तव में इस सामान्य निन्दा से सन्तुष्ट न होकर वे अपने नियमों में उसे देह की अशुद्धता और मलिनता कहते हैं (Siric. ad Episc. Hispaniar.)। हर एक अपने मन में विचार करे कि ये बातें किस भट्टी से निकली हैं। मसीह विवाह को इतना आदर देना उचित समझता है कि उसे कलीसिया के साथ अपने पवित्र मिलन का प्रतिरूप बनाता है। विवाह की गरिमा की इससे बड़ी प्रशंसा और क्या हो सकती है? तो फिर वे किस साहस से उसे अशुद्ध और अपवित्र नाम देते हैं जो मसीह के आत्मिक अनुग्रह का उज्ज्वल चित्र प्रस्तुत करता है?
25. यद्यपि उनका निषेध इस प्रकार परमेश्वर के वचन के स्पष्ट विरुद्ध है, फिर भी वे पवित्रशास्त्र में उसके बचाव के लिए कुछ खोज निकालते हैं। लेवीय याजकों को, जब-जब उनकी सेवा की बारी लौटती, अपनी पत्नियों से अलग रहना पड़ता था, ताकि पवित्र वस्तुओं को सँभालने में वे शुद्ध और निष्कलंक रहें; और इसलिए यह बहुत अनुचित होगा कि हमारी पवित्र वस्तुएँ, जो अधिक उत्कृष्ट हैं और प्रतिदिन सँभाली जाती हैं, विवाहितों के हाथों से सँभाली जाएँ: मानो सुसमाचारीय सेवकाई लेवीय याजकपद के समान ही स्वभाव की हो। वे, प्रतीकों के रूप में, मसीह को दर्शाते थे, जिसे परमेश्वर और मनुष्यों के बीच मध्यस्थ के रूप में अपनी निष्कलंक पवित्रता से हमें पिता से मिलाना था। परन्तु चूँकि पापी लोग हर बात में उसकी पवित्रता का प्रतीक नहीं बन सकते थे, इसलिए, ताकि वे फिर भी कुछ रेखाओं से उसकी छाया दिखा सकें, उन्हें आज्ञा दी गई कि जब वे पवित्रस्थान के निकट आएँ तो मनुष्यों की साधारण रीति से बढ़कर अपने आप को शुद्ध करें, क्योंकि तब वे ठीक-ठीक मसीह को, जो स्वर्गीय न्यायासन के प्रतिरूप तम्बू में प्रकट हो रहा था, मेल करानेवालों के रूप में, मनुष्यों को परमेश्वर से मिलाने के लिए, पहले से दर्शाते थे। चूँकि कलीसियाई पासबान आज के दिन यह स्वरूप नहीं रखते, इसलिए यह तुलना व्यर्थ है। इसलिए प्रेरित स्पष्ट रूप से, बिना किसी शर्त के, घोषित करता है, “विवाह सब में आदर की बात समझी जाए, और बिछौना निर्मल रहे; क्योंकि परमेश्वर व्यभिचारियों और परस्त्रीगामियों का न्याय करेगा” (इब्रानियों 13:4)। और प्रेरितों ने अपने उदाहरण से दिखाया कि विवाह किसी भी सेवा की पवित्रता के अयोग्य नहीं, वह कितनी ही उत्कृष्ट क्यों न हो; क्योंकि पौलुस घोषित करता है कि उन्होंने न केवल अपनी पत्नियों को रखा, वरन् उन्हें अपने साथ लिए फिरते थे (1 कुरिन्थियों 9:5)।
26. फिर यह कितनी बड़ी ढिठाई है कि पवित्रता के इस आभूषण को आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत करते हुए वे आदि कलीसिया पर भारी कलंक लगाते हैं, जो अद्भुत ईश्वरीय विद्या में प्रचुर होते हुए पवित्रता में और भी बढ़कर थी। क्योंकि यदि वे प्रेरितों का कोई आदर नहीं करते (वे कभी-कभी उन्हें दृढ़ता से तुच्छ जानते हैं), तो मैं पूछता हूँ, वे सब प्राचीन पूर्वजों का क्या करेंगे, जिन्होंने निश्चय ही अध्यक्षीय श्रेणी में विवाह को न केवल सहा, वरन् उसे स्वीकार भी किया? वे तो, कहते हैं, पवित्र वस्तुओं के एक घिनौने अपवित्रीकरण को बढ़ावा देते थे, जब प्रभु के भेद उनसे इस प्रकार अनियमित रीति से किए जाते थे। नीकिया की महासभा में तो अविवाहित रहने की घोषणा करने का कुछ प्रश्न उठा था: क्योंकि अन्धविश्वासी मन के छोटे लोग कभी कम नहीं होते, जो सदा कोई नई बात गढ़ते रहते हैं कि अपने लिए प्रशंसा पाएँ। क्या ठहराया गया? पाफ्नूतियस की सम्मति स्वीकार की गई, जिसने वैध वैवाहिक सम्बन्ध को पवित्रता घोषित किया (Hist. Trip. Lib. 2 c. 14)। इसलिए याजकों का विवाह पवित्र बना रहा, और न उसे लज्जा की बात समझा गया, न यह माना गया कि उससे उनकी सेवकाई पर कोई धब्बा लगता है।
27. आगे के समयों में अविवाहित रहने की अत्यधिक अन्धविश्वासपूर्ण प्रशंसा फैल गई। इसलिए बार-बार कुँवारेपन की असीम प्रशंसाएँ की गईं, यहाँ तक कि साधारण लोगों का विश्वास बन गया कि कोई गुण उसकी बराबरी में मुश्किल से आता है। और यद्यपि विवाह की अशुद्धता के रूप में निन्दा नहीं की गई, तथापि उसकी गरिमा घटाई गई और उसकी पवित्रता धुँधली की गई; यहाँ तक कि जो उससे दूर न रहा, वह ऐसा माना गया मानो उसका मन सिद्धता की आकांक्षा करने के लिए इतना सशक्त न हो। इसलिए वे नियम बने जिनमें पहले यह ठहराया गया कि जो याजकपद पा चुके हों वे विवाह न करें; और फिर यह कि उस श्रेणी में अविवाहितों के सिवा, या उनके सिवा जो अपनी पत्नियों की सहमति से विवाह-शय्या का त्याग कर दें, किसी को स्वीकार न किया जाए। ये ठहराव, चूँकि याजकपद के लिए आदर दिलाते प्रतीत हुए, मैं मानता हूँ, प्राचीन काल में भी बड़ी वाहवाही से स्वीकार किए गए। परन्तु यदि मेरे विरोधी प्राचीनता की दुहाई दें, तो मेरा पहला उत्तर यह है कि प्रेरितों के अधीन भी और कई युगों बाद तक भी अध्यक्षों को पत्नियाँ रखने की स्वतन्त्रता थी: कि स्वयं प्रेरितों ने, और आदि अधिकारवाले अन्य पासबानों ने, जो उनके बाद आए, इस स्वतन्त्रता का प्रयोग करने में कोई कठिनाई नहीं पाई, और कि आदि कलीसिया के उदाहरण का इतना बल होना ही उचित है कि हम यह न सोचें कि जो तब प्रशंसा के साथ स्वीकार और प्रयोग किया जाता था वह या तो अवैध है या अनुचित। मेरा दूसरा उत्तर यह है कि वह युग, जो कुँवारेपन के प्रति अत्यधिक प्रेम के कारण विवाह के प्रति कम अनुकूल होने लगा, उसने याजकों पर अविवाहित रहने की व्यवस्था इस रूप में नहीं बाँधी मानो वह अपने आप में आवश्यक हो, वरन् अविवाहितों को विवाहितों से अधिक वरीयता दी। मेरा अन्तिम उत्तर यह है कि उन्होंने इसे इतनी कठोरता से नहीं माँगा कि जो इसके योग्य न थे उन पर संयम आवश्यक और अनिवार्य हो जाए। क्योंकि जबकि व्यभिचार के विरुद्ध कठोरतम नियम बनाए गए, विवाह करनेवालों के विषय में केवल यही ठहराया गया कि वे अपने पद से हटा दिए जाएँ।
28. इसलिए, जब-जब इस नए अत्याचार के पक्षधर अपने अविवाहित रहने के बचाव में प्राचीनता की दुहाई दें, तब-तब हमें उनसे आग्रह करना चाहिए कि वे अपने याजकों की प्राचीन पवित्रता को पुनः स्थापित करें, व्यभिचारियों और लम्पटों को निकाल दें, जिन्हें वे विवाह का आदरपूर्ण और पवित्र प्रयोग नहीं करने देते उन्हें हर प्रकार की वासना में निर्दण्ड दौड़ने की अनुमति न दें, उस अप्रचलित अनुशासन को लौटा लाएँ जिससे सब स्वच्छन्दता रोकी जाती है, और कलीसिया को उस घोर नीचता से मुक्त करें जिससे वह बहुत समय से विकृत है। जब वे यह मान लें, तब उन्हें आगे यह स्मरण दिलाना होगा कि जो अपने आप में स्वतन्त्र है और कलीसिया की उपयोगिता पर निर्भर है, उसे आवश्यक न ठहराएँ। फिर भी मैं यह इस प्रकार नहीं कहता मानो मैं सोचता हूँ कि किसी भी शर्त पर उन नियमों को प्रभावी किया जाना चाहिए जो कलीसियाई श्रेणी पर अविवाहित रहने का बन्धन डालते हैं, वरन् इसलिए कि अधिक सहृदय लोग समझ सकें कि हमारे शत्रु याजकों के पवित्र विवाह को बदनाम करने के लिए प्राचीनता का नाम लेने में कितने ढीठ हैं। जहाँ तक पूर्वजों का सम्बन्ध है जिनके लेख उपलब्ध हैं, उनमें से किसी ने भी, जब उन्होंने अपने मन की बात कही, जेरोम को छोड़कर, विवाह के आदर को इस प्रकार दुर्भावना से घटाया नहीं। हम क्राइसोस्टम के एक ही अंश से सन्तुष्ट रहेंगे, क्योंकि वह कुँवारेपन का विशेष प्रशंसक होने के कारण यह नहीं सोचा जा सकता कि वह दूसरों से अधिक विवाह की प्रशंसा में उदार होगा। क्राइसोस्टम यों कहता है: “पवित्रता की पहली श्रेणी शुद्ध कुँवारापन है; दूसरी, विश्वासयोग्य विवाह। इसलिए विवाह का पवित्र प्रेम कुँवारेपन का दूसरा प्रकार है” (Chrysost. Hom. de Invent. Crucis.)।
