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प्रार्थना—विश्वास का निरन्तर अभ्यास। उससे प्राप्त होनेवाले दैनिक लाभ (भाग 1/4)
अध्याय 20।
प्रार्थना—विश्वास का निरन्तर अभ्यास। उससे प्राप्त होनेवाले दैनिक लाभ।
इस अध्याय के मुख्य विभाजन ये हैं—I. प्रार्थना के विषय का पिछले अध्यायों से सम्बन्ध। प्रार्थना का स्वरूप और मसीही अभ्यास के रूप में उसकी आवश्यकता, खण्ड 1, 2। II. प्रार्थना किससे की जानी चाहिए। एक ऐसी आपत्ति का खण्डन जो मन में बहुत सहजता से उठ खड़ी होती है, खण्ड 3। III. प्रार्थना में पालन किए जानेवाले नियम, खण्ड 4-16। IV. प्रार्थना किसके द्वारा की जाए, खण्ड 17-19। V. हमारे मध्यस्थ और बिनती करनेवाले के सिद्धान्त के विषय में एक भूल का खण्डन, तथा पवित्र जनों की मध्यस्थता के समर्थन में दिए जानेवाले मुख्य तर्कों के उत्तर, खण्ड 20-27। VI. प्रार्थना का स्वरूप और उसकी कुछ आनुषंगिक बातें, खण्ड 28-33। VII. पुकार का एक सिद्ध रूप, अर्थात् प्रभु की प्रार्थना की व्याख्या, खण्ड 34-50। VIII. प्रार्थना के विषय में पालन करने योग्य कुछ नियम, जैसे समय, धीरज, मन की दशा और विश्वास की निश्चयता, खण्ड 50-52।
खण्ड।
1. इस ग्रन्थ के पिछले भाग में जो कुछ कहा गया है उसका सामान्य सारांश। प्रार्थना के सिद्धान्त की ओर संक्रमण। विश्वास के विषय से उसका सम्बन्ध।
2. प्रार्थना की परिभाषा। उसकी आवश्यकता और उपयोगिता।
3. आपत्ति कि प्रार्थना व्यर्थ प्रतीत होती है, क्योंकि परमेश्वर हमारी आवश्यकताओं को पहले से जानता है। उत्तर, प्रार्थना की स्थापना और उसके उद्देश्य से। उदाहरण द्वारा पुष्टि। उसकी आवश्यकता और औचित्य। वह हमें हमारे कर्तव्य का निरन्तर स्मरण कराती है और परमेश्वर के विधान पर मनन की ओर ले जाती है। निष्कर्ष। प्रार्थना एक अत्यन्त उपयोगी अभ्यास है। यह पवित्रशास्त्र के तीन अंशों से प्रमाणित किया गया है।
4. प्रार्थना में पालन किए जानेवाले नियम। पहला, परमेश्वर के प्रति श्रद्धा। मन को किस प्रकार स्थिर होना चाहिए।
5. मन की सब चंचलता दूर की जाए और हमारी सारी भावनाएँ गम्भीरता से लगाई जाएँ। इसकी पुष्टि प्रार्थना में हाथ उठाने की रीति से। हमें केवल उतना ही माँगना चाहिए जितनी परमेश्वर अनुमति देता है। हमारी दुर्बलता की सहायता के लिए परमेश्वर प्रार्थना में हमारे मार्गदर्शक होने के लिए आत्मा को देता है। इस विषय में आत्मा का क्या काम है। फिर भी हमें हृदय और होठों दोनों से प्रार्थना करनी चाहिए।
6. प्रार्थना का दूसरा नियम, अपनी आवश्यकता का बोध। इस नियम का उल्लंघन, 1. औपचारिक और रस्मी प्रार्थना से। 2. उन कपटियों से जिन्हें अपने पापों का कोई बोध नहीं। 3. प्रार्थना में चंचलता से। उपचार।
7. आपत्ति कि प्रार्थना करने की आवश्यकता हम पर सदा एक-सी नहीं रहती। उत्तर, हमें सदा प्रार्थना करनी चाहिए। इस उत्तर की पुष्टि उन संकटों की जाँच से जिनसे हमारा जीवन और हमारा उद्धार प्रति क्षण घिरा रहता है। और आगे परमेश्वर की आज्ञा और अनुमति से, सच्चे पश्चाताप के स्वरूप से और अपश्चाताप पर विचार से। निष्कर्ष।
8. तीसरा नियम, सब अभिमान का दमन। उदाहरण: दानिय्येल, दाऊद, यशायाह, यिर्मयाह, बारूक।
9. इस प्रकार अभिमान का दमन करने का लाभ। वह क्षमा के लिए गम्भीर बिनती की ओर ले जाता है, जिसके साथ नम्र अंगीकार और ईश्वरीय दया पर दृढ़ भरोसा होता है। यह सदा शब्दों में व्यक्त किया जाना आवश्यक नहीं। यह भक्त पश्चाताप करनेवालों की विशेषता है। हमारी प्रार्थनाओं के लिए अनुग्रह दिलानेवाली एक सामान्य भूमिका कभी छोड़ी नहीं जानी चाहिए।
10. प्रार्थना के तीसरे नियम पर आपत्ति। पवित्र जनों के घमण्ड करने के विषय में। उत्तर। उत्तर की पुष्टि।
11. प्रार्थना का चौथा नियम—सुनी जाने का दृढ़ भरोसा, जो हमें प्रार्थना के लिए उत्साहित करे। किस प्रकार का भरोसा अपेक्षित है—अर्थात् अपनी दुर्दशा का गम्भीर बोध, जो दृढ़ आशा से जुड़ा हो। इन्हीं से सच्ची प्रार्थना उत्पन्न होती है। अविश्वास प्रार्थना को कैसे बिगाड़ता है। सामान्यतः विश्वास अपेक्षित है।
12. हमारे विरोधी इस विश्वास और दृढ़ आशा को अत्यन्त बेतुका मानते हैं। उनकी भूल का वर्णन और पवित्रशास्त्र के अनेक अंशों से उसका खण्डन, जो दिखाते हैं कि ग्रहण-योग्य प्रार्थना में ये गुण होते हैं। इस निश्चयता और अपनी दीनता की स्वीकृति के बीच कोई विरोध नहीं।
13. अपनी अयोग्यता के विरुद्ध हम रखते हैं, 1. परमेश्वर की आज्ञा। 2. प्रतिज्ञा। विद्रोहियों और कपटियों पर पूरा दण्डादेश। प्रार्थना की आज्ञा की पुष्टि करनेवाले पवित्रशास्त्र के अंश।
14. उन प्रतिज्ञाओं के विषय में अन्य अंश जो भक्तों के लिए हैं जब वे परमेश्वर को पुकारते हैं। ये प्रतिज्ञाएँ तब भी पूरी होती हैं जब हम में वह पवित्रता नहीं जो परमेश्वर के अन्य प्रतिष्ठित सेवकों में थी, यदि हम व्यर्थ भरोसा न रखें और सच्चाई से परमेश्वर की दया की शरण लें। जो लोग अत्यावश्यकता में परमेश्वर को नहीं पुकारते वे मूर्तिपूजकों से अच्छे नहीं। भय और भरोसे का यह मेल पवित्रशास्त्र के उन भिन्न अंशों में सामंजस्य लाता है जो प्रार्थना में अपने आप को दीन करने और अपनी प्रार्थनाओं को ऊपर उठाने के विषय में हैं।
15. कुछ उदाहरणों पर आधारित आपत्ति—अर्थात् कि प्रार्थनाएँ बताए गए रूप के अनुसार न होने पर भी प्रभावशाली सिद्ध हुई हैं। उत्तर। ऐसे उदाहरण, यद्यपि हमारे अनुकरण के लिए नहीं दिए गए, फिर भी अत्यन्त उपयोगी हैं। आपत्ति, विश्वासियों की प्रार्थनाएँ कभी-कभी प्रभावशाली नहीं होतीं। अगस्तीन के एक उत्तम अंश से उत्तर की पुष्टि। सही प्रार्थना का नियम।
16. प्रार्थना के उपर्युक्त चार नियम इतनी कठोरता से नहीं माँगे जाते कि जो प्रार्थना किसी बात में उनसे कम पड़ जाए उसे परमेश्वर ठुकरा दे। यह उदाहरणों से दिखाया गया है। निष्कर्ष, अथवा इस खण्ड का सारांश।
17. परमेश्वर को किसके द्वारा पुकारा जाए—अर्थात् यीशु मसीह के द्वारा। यह ईश्वरीय महिमा पर विचार और स्वयं परमेश्वर की आज्ञा और प्रतिज्ञा पर आधारित है। इसलिए परमेश्वर को केवल मसीह के नाम से पुकारना चाहिए।
18. आरम्भ से सब विश्वासियों की सुनवाई केवल उसी के द्वारा हुई; फिर भी यह विशेष रूप से उसके स्वर्गारोहण के पश्चात् के समय तक सीमित है। इस सीमा का आधार।
19. जो मसीह को मध्यस्थ के रूप में ठुकराते हैं उन पर परमेश्वर का क्रोध रहता है। यह पृथ्वी पर पवित्र जनों की परस्पर मध्यस्थता को नहीं रोकता।
20. मसीह की मध्यस्थता में बाधा डालनेवाली भूलों का खण्डन। 1. मसीह छुटकारे का मध्यस्थ है; पवित्र जन बिनती के मध्यस्थ हैं। पवित्रशास्त्र की स्पष्ट गवाही और अगस्तीन के एक अंश से उत्तर की पुष्टि। मसीह की मध्यस्थता का स्वरूप।
21. स्वर्ग में मसीह के साथ जीवित पवित्र जनों की मध्यस्थता के विषय में। इस विषय में पोप के अनुयायियों की कल्पना। उसका खण्डन। 1. उसकी असंगति। 2. पवित्रशास्त्र में उसका कहीं उल्लेख नहीं। 3. अन्धविश्वासियों के विवेक से अपील। 4. उसकी निन्दा। अपवाद। उत्तर।
22. इस कल्पना से उत्पन्न भयानक भूलें। खण्डन। इस कल्पना के समर्थकों की आपत्ति। उत्तर।
23. पवित्र जनों की मध्यस्थता के लिए पोप के अनुयायियों के तर्क। 1. स्वर्गदूतों के कर्तव्य और सेवा से। उत्तर। 2. मूसा और शमूएल के विषय में यिर्मयाह के एक कथन से। उत्तर, तर्क को उन्हीं पर लौटाकर। 3. भविष्यद्वक्ता के अर्थ की पुष्टि यहेजकेल के एक समान अंश और एक प्रेरित की गवाही से।
24. 4. पोप के अनुयायियों का चौथा तर्क, प्रेम के स्वभाव से, जो महिमा पाए हुए पवित्र जनों में अधिक सिद्ध है। उत्तर।
25. मूसा के एक अंश पर आधारित तर्क। उत्तर।
26. इस कथन से तर्क कि पवित्र जनों की प्रार्थनाएँ सुनी जाती हैं। उत्तर, पवित्रशास्त्र से पुष्ट और उदाहरणों से स्पष्ट किया गया।
27. निष्कर्ष कि पवित्र जनों को बिना अधर्म के नहीं पुकारा जा सकता। 1. यह परमेश्वर को उसकी महिमा से वंचित करता है। 2. मसीह की मध्यस्थता को नष्ट करता है। 3. परमेश्वर के वचन के विरुद्ध है। 4. प्रार्थना की उचित रीति के विपरीत है। 5. इसका कोई मान्य उदाहरण नहीं। 6. यह अविश्वास से उपजता है। अन्तिम आपत्ति। उत्तर।
28. प्रार्थना के प्रकार। मन्नतें। गिड़गिड़ाहट। बिनतियाँ। धन्यवाद। इनका परस्पर सम्बन्ध, इनका निरन्तर उपयोग और आवश्यकता। विशेष व्याख्या, जो तर्क, पवित्रशास्त्र और उदाहरण से पुष्ट की गई। गिड़गिड़ाहट और धन्यवाद का नियम।
29. प्रार्थना की आनुषंगिक बातें—अर्थात् निजी और सार्वजनिक, निरन्तर, निश्चित समयों पर, आदि। आवश्यकता के समय अपवाद। निरन्तर प्रार्थना। उसका स्वरूप। पोप के अनुयायियों और कपटियों की बकवाद का खण्डन। प्रार्थना का उद्देश्य और उसके अंग। गुप्त प्रार्थना। सब स्थानों में प्रार्थना। निजी और सार्वजनिक प्रार्थना।
30. सार्वजनिक स्थानों अथवा कलीसियाओं के विषय में जिनमें सामूहिक प्रार्थनाएँ चढ़ाई जाती हैं। कलीसियाओं का उचित उपयोग। दुरुपयोग।
31. वाणी और गायन के विषय में। यदि ये हृदय से न हों तो किसी काम के नहीं। वाणी का उपयोग निजी प्रार्थना की अपेक्षा सार्वजनिक प्रार्थना से अधिक सम्बन्ध रखता है।
32. गायन अत्यन्त प्राचीन है, पर सार्वभौमिक नहीं। उसे किस प्रकार किया जाए।
33. सार्वजनिक प्रार्थनाएँ किसी विदेशी भाषा में नहीं, बल्कि जनसाधारण की भाषा में होनी चाहिए। कारण, 1. कलीसिया का स्वभाव। 2. एक प्रेरित का अधिकार। सच्चा भाव सदा आवश्यक है। जीभ सदा आवश्यक नहीं। घुटने टेकना और सिर खुला रखना।
34. मसीह की दी हुई प्रार्थना की रीति हमारे स्वर्गीय पिता की असीम भलाई को प्रकट करती है। इससे मिलनेवाली बड़ी शान्ति।
35. प्रभु की प्रार्थना छः बिनतियों में विभाजित है। दो मुख्य भागों में उपविभाजन, पहला परमेश्वर की महिमा से और दूसरा हमारे उद्धार से सम्बन्ध रखता है।
36. “पिता” शब्द के प्रयोग का अर्थ है, 1. कि हम परमेश्वर से केवल मसीह के नाम में प्रार्थना करते हैं। 2. कि हम सब अविश्वास को त्याग देते हैं। 3. कि हम हर उस बात की आशा रखते हैं जो हमारे हित में है।
37. आपत्ति कि हमारे पाप हमें उसकी उपस्थिति से दूर रखते हैं जिसे हमने पिता नहीं, न्यायी बना लिया है। उत्तर, परमेश्वर के स्वभाव से, जैसा एक प्रेरित ने वर्णन किया है, उड़ाऊ पुत्र के दृष्टान्त से और “हमारे पिता” इस वाक्यांश से। मसीह हमारे लेपालकपन का बयाना है, पवित्र आत्मा उसका गवाह।
38. परमेश्वर को सामान्य रूप से “हमारा पिता” क्यों कहा जाता है।
39. हम विशेष रूप से अपने लिए और कुछ दूसरों के लिए प्रार्थना कर सकते हैं, बशर्ते कि हमारे मन में सब के प्रति एक सामान्य दृष्टि बनी रहे।
40. किस अर्थ में परमेश्वर को स्वर्ग में कहा जाता है। हमारी शान्ति के लिए इस सिद्धान्त का तीन प्रकार का उपयोग। तीन चेतावनियाँ। प्रभु की प्रार्थना की भूमिका का सारांश।
41. पहली बिनती की आवश्यकता हमारी अधार्मिकता का प्रमाण है। परमेश्वर के नाम से क्या अर्थ है। वह किस प्रकार पवित्र ठहराया जाता है। इस पवित्र ठहराने के अंग। उन पापों से बचने की प्रार्थना जिनसे परमेश्वर का नाम अपवित्र किया जाता है।
42. पहली और दूसरी बिनती में भेद। परमेश्वर का राज्य क्या है। वह किस प्रकार आता कहा जाता है। इस बिनती की विशेष व्याख्या। वह हमें तीन बातों का स्मरण कराती है। संसार में परमेश्वर के राज्य का आगमन।
43. दूसरी और तीसरी बिनती में भेद। यहाँ इच्छा से अभिप्राय परमेश्वर की गुप्त इच्छा या उसकी भली मनसा से नहीं, बल्कि उससे है जो वचन में प्रकट की गई है। पहली तीन बिनतियों का निष्कर्ष।
44. प्रभु की प्रार्थना के दूसरे भाग का सारांश। तीन बिनतियाँ। पहली में क्या है। वह परमेश्वर की अत्यधिक कृपा और हमारे अविश्वास को प्रकट करती है। रोटी से क्या अभिप्राय है। रोटी की बिनती पापों की क्षमा की बिनती से पहले क्यों आती है। उसे “हमारी” क्यों कहा गया। उसे आज अथवा प्रतिदिन क्यों माँगना है। इस बिनती से निकलनेवाला सिद्धान्त, एक उदाहरण से स्पष्ट किया गया। दो प्रकार के मनुष्य इस बिनती के विषय में पाप करते हैं। किस अर्थ में उसे “हमारी रोटी” कहा जाता है। हम परमेश्वर से उसे हमें देने के लिए क्यों माँगते हैं।
45. इस और अगली बिनती के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध। हमारे पापों को ऋण क्यों कहा जाता है। यह बिनती भंग होती है, 1. उनसे जो समझते हैं कि वे अपनी या दूसरों की योग्यताओं से परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं। 2. उनसे जो ऐसी सिद्धता का स्वप्न देखते हैं जिसके कारण क्षमा अनावश्यक हो जाती है। चुने हुए लोग इस जीवन में सिद्धता क्यों नहीं पा सकते। सिद्धता का स्वप्न देखनेवाले स्वेच्छाचारियों का खण्डन। आपत्ति का खण्डन। किस अर्थ में कहा जाता है कि हम उन्हें क्षमा करते हैं जिन्होंने हमारे विरुद्ध पाप किया है। शर्त को कैसे समझा जाए।
46. छठी बिनती तीन शीर्षकों में समेटी गई। 1. परीक्षा के विविध रूप। हमारे मन की बिगड़ी हुई कल्पनाएँ। शैतान की चालें, दाएँ और बाएँ। 2. परीक्षा में पड़ने से क्या अभिप्राय है। हम यह नहीं माँगते कि परमेश्वर हमारी परीक्षा न करे। बुराई, अथवा उस दुष्ट से क्या अभिप्राय है। इस बिनती का सारांश। वह कितनी आवश्यक है। वह अन्धविश्वासियों के अभिमान की निन्दा करती है। उसमें अनेक उत्तम गुण समाए हैं। किस अर्थ में कहा जा सकता है कि परमेश्वर हमें परीक्षा में ले जाता है।
47. अन्तिम तीन बिनतियाँ दिखाती हैं कि मसीहियों की प्रार्थनाएँ सार्वजनिक होनी चाहिए। प्रभु की प्रार्थना का समापन। “आमीन” शब्द क्यों जोड़ा गया है।
48. प्रभु की प्रार्थना में वह सब कुछ है जो हम परमेश्वर से माँग सकते या माँगना चाहिए। जो इससे आगे बढ़ते हैं वे तीन प्रकार से पाप करते हैं।
49. पवित्र जनों के उदाहरण पर हम अपनी प्रार्थनाओं को भिन्न शब्दों में ढाल सकते हैं, बशर्ते अर्थ में कोई भेद न हो।
50. ध्यान में रखने योग्य कुछ परिस्थितियाँ। प्रार्थना के विशेष समय ठहराने के विषय में। किस पर लक्ष्य रखना चाहिए और किससे बचना चाहिए। परमेश्वर की इच्छा हमारी प्रार्थनाओं का नियम है।
51. प्रार्थना में धीरज की आज्ञा और उदाहरण दोनों से विशेष रूप से सिफ़ारिश की गई है। उन पर दण्डादेश जो परमेश्वर के लिए सुनने का समय और रीति ठहराते हैं।
52. उस विश्वास की गरिमा के विषय में जिसके द्वारा हम प्रार्थना के उत्तर में सदा वही पाते हैं जो हमारे लिए सबसे हितकर है। इसका ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है।
1. इस ग्रन्थ के पिछले भाग से हम स्पष्ट देखते हैं कि मनुष्य सब भलाई से कितना रहित है और अपने उद्धार को पाने के हर साधन से कितना वंचित है। इसलिए यदि उसे अपनी आवश्यकता में सहायता पानी है तो उसे अपने से बाहर जाना और उसे किसी और स्थान से प्राप्त करना होगा। यह भी दिखाया जा चुका है कि प्रभु कृपापूर्वक और स्वेच्छा से मसीह में अपने आप को प्रकट करता है, जिसमें वह हमारी दुर्दशा के बदले सब सुख, हमारे अभाव के बदले सब भरपूरी प्रदान करता है, और स्वर्ग के भण्डार हमारे लिए खोल देता है, ताकि हम पूरे विश्वास से उसके प्रिय पुत्र की ओर फिरें, पूरी अपेक्षा से उस पर निर्भर रहें, उसी में विश्राम पाएँ और पूरी आशा से उससे लिपटे रहें। निश्चय यही वह गुप्त और छिपी हुई बुद्धि है जो तर्कवाक्यों से सीखी नहीं जा सकती; यह उन्हीं को भली-भाँति समझ में आती है जिनकी आँखें परमेश्वर ने ऐसी खोल दी हैं कि वे उसकी ज्योति में ज्योति देखें (भजन संहिता 36:9)। परन्तु जब हम विश्वास से यह जान चुके कि जो कुछ हमारे लिए आवश्यक है या हम में घटता है वह परमेश्वर में और हमारे प्रभु यीशु मसीह में पूरा किया जाता है, जिसमें पिता को यह अच्छा लगा कि सारी परिपूर्णता वास करे, ताकि हम वहाँ से मानो कभी न सूखनेवाले सोते से भर सकें, तो हमारे लिए यही शेष रह जाता है कि जो कुछ हमने सीखा कि उसमें है, उसे हम प्रार्थना में उससे ढूँढ़ें और माँगें। परमेश्वर को सब भलाई का सर्वोच्च प्रदाता जानना, जो हमें अपनी बिनतियाँ प्रस्तुत करने को बुलाता है, और फिर भी न उसके पास जाना न उससे माँगना, हमारे किसी काम का होना तो दूर रहा, ठीक ऐसा ही होगा जैसे कोई किसी गड़े हुए धन का समाचार सुनकर उसे भूमि में ही पड़ा रहने दे। इसी कारण प्रेरित ने यह दिखाने के लिए कि जो विश्वास परमेश्वर से प्रार्थना के साथ न हो वह सच्चा नहीं हो सकता, यह क्रम बताया है: जैसे विश्वास सुसमाचार से उत्पन्न होता है, वैसे ही विश्वास से हमारे हृदय परमेश्वर का नाम लेने के लिए ढाले जाते हैं (रोमियों 10:14)। और यही बात उसने कुछ पहले कही थी—अर्थात् कि लेपालकपन की आत्मा, जो हमारे हृदयों पर सुसमाचार की गवाही पर मुहर लगाती है, हमें साहस देती है कि हम अपनी बिनतियाँ परमेश्वर के सामने प्रस्तुत करें, वह ऐसी आहें उठाती है जो वर्णन से बाहर हैं, और हमें “अब्बा, हे पिता” पुकारने के योग्य बनाती है (रोमियों 8:26)। इस अन्तिम बात को, जिसे हमने अब तक केवल चलते-चलते हल्के से छुआ है, अब अधिक विस्तार से समझाना आवश्यक है।
2. तब प्रार्थना ही के द्वारा हम उन धनों में पैठ पाते हैं जो हमारे स्वर्गीय पिता के पास हमारे लिए संचित हैं। क्योंकि परमेश्वर और मनुष्यों के बीच एक प्रकार का सम्पर्क है, जिसके द्वारा वे ऊपरी पवित्रस्थान में प्रवेश करके उसके सम्मुख उपस्थित होते हैं और उसकी प्रतिज्ञाओं को सामने रखते हैं, कि आवश्यकता पड़ने पर वे अनुभव से सीखें कि जिस पर उन्होंने केवल उसके वचन के अधिकार से विश्वास किया था, वह व्यर्थ नहीं था। इसीलिए हम देखते हैं कि प्रभु से अपेक्षा रखने के लिए हमारे सामने ऐसा कुछ नहीं रखा गया जिसे प्रार्थना में उससे माँगने की आज्ञा हमें न दी गई हो; इतना सच है कि प्रार्थना उन भण्डारों को खोद निकालती है जिन्हें हमारे प्रभु का सुसमाचार विश्वास की आँख को दिखाता है। प्रार्थना के इस अभ्यास की आवश्यकता और उपयोगिता को कोई शब्द पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सकते। निश्चय ही बिना कारण नहीं कि हमारा स्वर्गीय पिता घोषणा करता है कि हमारी एकमात्र सुरक्षा उसके नाम को पुकारने में है; क्योंकि उसके द्वारा हम उसके विधान की उपस्थिति को बुलाते हैं कि वह हमारे हितों की रखवाली करे, उसकी सामर्थ्य को कि वह हमें, जब हम दुर्बल और मूर्छित-से हों, सम्भाले, उसकी भलाई को कि वह हमें, यद्यपि हम पाप के बोझ से दयनीय रूप से दबे हैं, अनुग्रह में ग्रहण करे; सारांश यह कि हम उसे पुकारते हैं कि वह अपनी सारी सिद्धताओं में हम पर प्रकट हो। इसी से हमारे विवेक को अद्भुत शान्ति और चैन मिलता है; क्योंकि जिन संकटों से हम दबे थे उन्हें प्रभु के सामने रखकर हम इस निश्चय से पूरी तरह सन्तुष्ट विश्राम करते हैं कि हमारी कोई भी विपत्ति उससे छिपी नहीं, और वह हमारे लिए सर्वोत्तम प्रबन्ध करने में समर्थ भी है और इच्छुक भी।
3. परन्तु कोई कहेगा, क्या वह बिना किसी याद दिलानेवाले के नहीं जानता कि हमारी कठिनाइयाँ क्या हैं और हमारे हित में क्या उचित है, ताकि हमारी प्रार्थनाओं से उसे मनाना किसी प्रकार अनावश्यक-सा प्रतीत होता है, मानो वह आँखें मूँदे हो, या सो रहा हो, जब तक हमारी आवाज़ की ध्वनि से जगा न दिया जाए?463 ऐसा तर्क देनेवाले उस उद्देश्य पर ध्यान नहीं देते जिसके लिए प्रभु ने हमें प्रार्थना करना सिखाया। यह उसके अपने लिए उतना नहीं था जितना हमारे लिए। वह निश्चय चाहता है, और यह उचित भी है, कि उसका यथोचित आदर इस स्वीकारोक्ति के द्वारा हो कि जो कुछ मनुष्य चाहते या उपयोगी जानते हैं और पाने को प्रार्थना करते हैं, वह सब उसी से मिलता है। परन्तु इस प्रकार जो आदर हम उसे देते हैं उसका लाभ भी हम ही को मिलता है। इसी कारण पवित्र पितरों ने जितने अधिक भरोसे से परमेश्वर की दया की घोषणा अपने और दूसरों के लिए की, उतनी ही प्रबल प्रेरणा प्रार्थना के लिए पाई। एलिय्याह का उदाहरण देना पर्याप्त होगा, जिसे परमेश्वर की मनसा का निश्चय था और जिसके पास अहाब से वर्षा की प्रतिज्ञा करने का पक्का आधार था, फिर भी वह घुटनों के बल गम्भीरता से प्रार्थना करता है और अपने सेवक को सात बार देखने भेजता है (1 राजाओं 18:42); इसलिए नहीं कि वह परमेश्वर के वचन पर अविश्वास करता था, पर इसलिए कि वह जानता था कि अपनी इच्छाएँ परमेश्वर के सामने रखना उसका कर्तव्य है, ऐसा न हो कि उसका विश्वास ऊँघने या सुन्न होने लगे। इसलिए, यद्यपि यह सच है कि जब हम सुस्त हैं या अपनी दुर्दशा के प्रति संवेदनहीन हैं तब भी वह हमारे लिए जागता और निगरानी करता है और कभी-कभी बिन माँगे भी हमारी सहायता करता है; तौभी हमारे हित में यही बहुत है कि हम निरन्तर उससे बिनती करते रहें; पहला, इसलिए कि हमारा हृदय सदा उसे खोजने, प्रेम करने और उसकी सेवा करने की गम्भीर और उत्कट इच्छा से प्रज्वलित रहे, जब हम हर आवश्यकता में उसकी ओर लौटने को एक पवित्र लंगर के समान अपने अभ्यास में लाते हैं; दूसरा, इसलिए कि हमारे मन में कोई ऐसी इच्छा या लालसा न आने पाए जिसके लिए उसे साक्षी बनाने में हमें लज्जा आए, क्योंकि हम अपनी सब कामनाओं को उसकी दृष्टि के सामने रखना और इस प्रकार अपना हृदय उसके सम्मुख उँडेलना सीखते हैं; और अन्त में, इसलिए कि हम सच्ची कृतज्ञता और धन्यवाद के साथ उसके सब उपकारों को ग्रहण करने के लिए तैयार रहें, क्योंकि हमारी प्रार्थनाएँ हमें स्मरण दिलाती हैं कि वे उसी के हाथ से आते हैं। फिर, जो माँगा था उसे पाकर और यह निश्चय करके कि उसने हमारी प्रार्थनाएँ सुन लीं, हम उसके अनुग्रह की और भी उत्कट अभिलाषा करने लगते हैं, और साथ ही उन आशीषों का स्वागत अधिक आनन्द से करते हैं जिन्हें हम अपनी प्रार्थनाओं से प्राप्त हुआ देखते हैं। अन्त में, उपयोग और अनुभव हमारे मन में उसके विधान की धारणा को हमारी दुर्बलता के अनुकूल रीति से दृढ़ करते हैं, जब हम समझते हैं कि वह न केवल प्रतिज्ञा करता है कि वह हमें कभी नहीं छोड़ेगा और आवश्यकता के हर समय स्वयं हमें अपने पास आने की पहुँच देता है, पर उसका हाथ अपने लोगों की सहायता के लिए सदा बढ़ा रहता है, उन्हें शब्दों से बहलाता नहीं पर अपने आप को उपस्थित सहायक प्रमाणित करता है। इन कारणों से, यद्यपि हमारा परम दयालु पिता न कभी ऊँघता है न सोता है, फिर भी वह प्रायः ऐसा प्रतीत होता है मानो सो रहा हो, ताकि इस प्रकार वह हमें, जो अन्यथा सुस्त और आलसी हो जाते, माँगने, बिनती करने और गिड़गिड़ाकर उससे प्रार्थना करने का अभ्यास कराए, जो हमारे बड़े हित में है। इसलिए यह कहकर मनुष्यों को प्रार्थना से विमुख करना अत्यन्त बेतुका है कि ईश्वरीय विधान, जो सदा समस्त विश्व के शासन की रखवाली करता है, हमारी बिनतियों से व्यर्थ तंग किया जाता है; जबकि इसके विपरीत प्रभु स्वयं घोषणा करता है कि वह “उन सब के निकट रहता है जो उसे पुकारते हैं, उन सब के जो सच्चाई से उसे पुकारते हैं” (भजन संहिता 145:18)। दूसरों का यह तुच्छ आरोप भी इससे अच्छा नहीं कि उन बातों के लिए प्रार्थना करना अनावश्यक है जिन्हें प्रभु स्वयं अपनी इच्छा से देने को तैयार रहता है; क्योंकि यह उसकी इच्छा है कि जो बातें उसकी स्वतः उदारता से बहती हैं, वे ही हमारी प्रार्थनाओं के उत्तर में दी हुई मानी जाएँ। इसकी गवाही भजन संहिता का वह स्मरणीय वचन देता है जिससे और भी बहुत-से वचन मेल खाते हैं: “यहोवा की आँखें धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान उनकी दोहाई की ओर लगे रहते हैं,” (भजन संहिता 34:15)। यह वचन उस चिन्ता की बड़ाई करते हुए जो ईश्वरीय विधान विश्वासियों की सुरक्षा के लिए स्वतः करता है, उस विश्वास के अभ्यास को नहीं छोड़ता जिसके द्वारा मन आलस्य से जगाया जाता है। परमेश्वर की आँखें अन्धों की आवश्यकता में उनकी सहायता के लिए जागती रहती हैं, पर वह हमारी कराहें सुनना भी पसन्द करता है, ताकि अपने प्रेम का हमें और अच्छा प्रमाण दे। और इस प्रकार दोनों बातें सच हैं, “इस्राएल का रक्षक न ऊँघेगा और न सोएगा,” (भजन संहिता 121:4); और फिर भी जब कभी वह हमें गूँगा और सुन्न देखता है तो ऐसे हट जाता है मानो हमें भूल गया हो।
463 फ्रांसीसी में: “Dont il sembleroit que ce fust chose superflue de le soliciter par prieres; veu que nous avons accoustumé de soliciter ceux qui ne pensent à nostre affaire, et qui sont endormis.”—जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि उससे प्रार्थना द्वारा बिनती करना अनावश्यक बात है; क्योंकि हम उन्हीं से बिनती करने के आदी हैं जो हमारे काम की चिन्ता नहीं करते और ऊँघ रहे हैं।
4. तब सही प्रार्थना का पहला नियम यह हो कि हमारा हृदय और मन वैसा ढला हुआ हो जैसा परमेश्वर से वार्तालाप में प्रवेश करनेवालों के लिए उचित है। मन के विषय में हम यह तब पूरा करेंगे जब वह शारीरिक विचारों और चिन्ताओं को, जो परमेश्वर के सीधे और शुद्ध ध्यान में बाधा डाल सकती हैं, एक ओर रखकर न केवल पूरी तरह प्रार्थना में लगे, पर यथासम्भव अपने से ऊपर उठाया और ले जाया जाए। मैं यहाँ ऐसे मन पर बल नहीं दे रहा जो इतना निश्चिन्त हो कि चिन्ता की कुतरन कुछ भी महसूस न करे; इसके विपरीत, प्रार्थना की उत्कटता बहुत चिन्ता से ही प्रज्वलित होती है। इसी प्रकार हम देखते हैं कि परमेश्वर के पवित्र सेवक, जब वे गहरे गड्ढे और मृत्यु के जबड़ों से प्रभु की ओर विलाप का स्वर उठाते हैं, तब बड़ी पीड़ा, यहाँ तक कि व्याकुलता, प्रकट करते हैं। मैं यह कहता हूँ कि सब पराई और बाहरी चिन्ताएँ दूर की जानी चाहिए जिनसे मन अनिश्चय में इधर-उधर डोलता, स्वर्ग से नीचे खींचा जाता और पृथ्वी पर रेंगता रहता है। जब मैं कहता हूँ कि उसे अपने से ऊपर उठना चाहिए, तो मेरा अर्थ यह है कि वह परमेश्वर की उपस्थिति में उन बातों में से कुछ भी न लाए जिन्हें हमारी अन्धी और मूढ़ बुद्धि गढ़ने की आदी है, और न अपने आप को अपनी व्यर्थता के छोटे-से दायरे में बन्द रखे, पर परमेश्वर के योग्य शुद्धता तक उठे।
5. दोनों बातें विशेष ध्यान देने योग्य हैं। पहली, प्रार्थना करने का दावा करते समय हर एक अपने सारे विचार और भावनाएँ उसी ओर लगाए, और (जैसा सामान्यतः होता है) भटकते विचारों से विचलित न हो; क्योंकि परमेश्वर के प्रति जो श्रद्धा चाहिए उसके इतना विपरीत कुछ नहीं जितनी वह हल्कापन है जो ऐसे मन का सूचक है जो बहुत स्वच्छन्द और भय से रहित है। इस विषय में हमें जितना यह कठिन अनुभव हो उतना ही अधिक गम्भीरता से परिश्रम करना चाहिए; क्योंकि कोई मनुष्य प्रार्थना में इतना एकाग्र नहीं होता कि अनुभव न करे कि अनेक विचार रेंगकर भीतर आ रहे हैं और या तो उसकी प्रार्थना की धारा तोड़ रहे हैं, या किसी मोड़ या भटकाव से उसे धीमा कर रहे हैं। यहाँ विचार करें कि जब परमेश्वर हमें अपने साथ घनिष्ठ वार्तालाप में स्वीकार करता है तब उसकी इस बड़ी कृपा का दुरुपयोग करके पवित्र और अपवित्र बातों को मिलाना कितना अशोभनीय है, जब उसके प्रति श्रद्धा हमारे मन को वश में नहीं रखती; बल्कि मानो प्रार्थना में हम अपने ही जैसे किसी से बात कर रहे हों, उसे भुलाकर अपने विचारों को इधर-उधर दौड़ने देते हैं। तो जान लें कि प्रार्थना के लिए यथोचित तैयारी वही करते हैं जो परमेश्वर की महिमा से इतने प्रभावित हों कि सब सांसारिक चिन्ताओं और लगावों से मुक्त होकर उसमें प्रवृत्त हों। प्रार्थना में हाथ उठाने की रीति का उद्देश्य हमें स्मरण दिलाना है कि यदि हमारे विचार ऊपर न उठें तो हम परमेश्वर से बहुत दूर हैं; जैसा भजन में कहा गया है, “हे यहोवा, मैं अपना मन तेरी ओर उठाता हूँ,” (भजन संहिता 25:1)। और पवित्रशास्त्र बार-बार अपनी प्रार्थना को ऊपर उठाने की अभिव्यक्ति का प्रयोग करता है, जिसका अर्थ है कि जो परमेश्वर से सुने जाना चाहते हैं वे कीचड़ में न लोटें। सार यह है कि परमेश्वर जितनी उदारता से हमारे साथ व्यवहार करता है, कृपापूर्वक हमें अपनी चिन्ताएँ अपनी गोद में उतार देने को बुलाता है, उतना ही हम निरुत्तर हैं यदि यह अद्भुत और अतुल्य आशीष हमारी दृष्टि में सब दूसरी बातों से अधिक मूल्यवान न हो और हमारे स्नेह को न जीते, कि प्रार्थना हमारे हर विचार और भावना को गम्भीरता से लगाए। यह तब तक नहीं हो सकता जब तक हमारा मन सब बाधाओं के विरुद्ध पूरे प्रयत्न से ऊपर न उठे। हमारा दूसरा प्रस्ताव यह था कि हमें केवल उतना ही माँगना चाहिए जितनी परमेश्वर अनुमति देता है। क्योंकि यद्यपि वह हमें अपने हृदय उँडेलने को कहता है (भजन संहिता 62:8), फिर भी वह मूर्ख और बिगड़ी हुई भावनाओं को बिना भेद के खुली छूट नहीं देता; और जब वह प्रतिज्ञा करता है कि वह विश्वासियों की इच्छा पूरी करेगा, तब उसकी कृपा यहाँ तक नहीं जाती कि वह उनकी सनक के आगे झुक जाए। दोनों बातों में सब कहीं घोर चूकें की जाती हैं। क्योंकि बहुत-से लोग न केवल बिना लज्जा और बिना श्रद्धा के अपनी तुच्छ बातों के लिए परमेश्वर को पुकारने का साहस करते हैं, पर ढिठाई से अपने स्वप्न, चाहे वे कैसे भी हों, परमेश्वर के न्यायालय के सामने ले आते हैं। उन पर ऐसी मूर्खता या जड़ता सवार है कि वे परमेश्वर पर ऐसी नीच इच्छाएँ थोपने का दुस्साहस करते हैं जिन्हें अपने संगी मनुष्यों को बताने में वे बहुत लज्जित होते। संसारी लेखकों ने इस धृष्टता का उपहास किया और इससे घृणा भी प्रकट की है, फिर भी यह दोष सदा से प्रबल रहा है। इसलिए जैसे महत्त्वाकांक्षियों ने बृहस्पति को अपना संरक्षक चुना; लोभियों ने बुध को; विद्या के अभिलाषियों ने अपोलो और मिनर्वा को; योद्धाओं ने मंगल को; विलासियों ने शुक्र को: वैसे ही आज, जैसा मैंने अभी कहा, लोग प्रार्थना में अपनी अनुचित कामनाओं को उससे अधिक छूट देते हैं जितनी वे अपने बराबरवालों में हँसी-ठट्ठे की कहानियाँ सुनाते समय देते। परमेश्वर अपनी कृपा का इस प्रकार उपहास होने नहीं देता, पर अपने ज्योतिर्मय अधिकार का दावा करके हमारी इच्छाओं को अपने अधिकार के अंकुश में रखता है। इसलिए हमें यूहन्ना के इस कथन पर ध्यान देना चाहिए, “हमें उसके सम्मुख जो साहस होता है वह यह है कि यदि हम उसकी इच्छा के अनुसार कुछ माँगते हैं तो वह हमारी सुनता है,” (1 यूहन्ना 5:14)। परन्तु हमारी शक्तियाँ ऐसी उच्च सिद्धता तक पहुँचने से बहुत दूर हैं, इसलिए हमें उनकी सहायता के लिए कोई साधन खोजना चाहिए। जैसे हमारे मन की आँख परमेश्वर पर लगी रहनी चाहिए, वैसे ही हमारे हृदय का स्नेह भी उसी मार्ग पर चले। परन्तु दोनों इससे बहुत नीचे गिरते हैं, या यों कहें कि मूर्छित और विफल हो जाते हैं और विपरीत दिशा में बह जाते हैं। इस दुर्बलता की सहायता के लिए परमेश्वर हमारी प्रार्थनाओं में आत्मा का मार्गदर्शन देता है कि वह जो उचित है उसे सुझाए और हमारी भावनाओं को नियन्त्रित करे। क्योंकि “हम नहीं जानते कि जैसा चाहिए वैसी प्रार्थना क्यों करें,” “आत्मा आप ही ऐसी आहें भर-भरकर जो बयान से बाहर हैं, हमारे लिए बिनती करता है,” (रोमियों 8:26) इसलिए नहीं कि वह सचमुच प्रार्थना करता या कराहता है, पर इसलिए कि वह हम में ऐसी आहें, इच्छाएँ और भरोसा उत्पन्न करता है जिनकी कल्पना हमारी स्वाभाविक शक्तियाँ बिलकुल नहीं कर सकतीं। और बिना कारण नहीं कि पौलुस उन प्रार्थनाओं को, जो विश्वासी आत्मा के मार्गदर्शन में उठाते हैं, ऐसी आहें जो बयान से बाहर हैं नाम देता है। क्योंकि जो सचमुच प्रार्थना का अभ्यास करते हैं वे अनजान नहीं कि अन्धी चिन्ताएँ उन्हें ऐसा जकड़ती और उलझाती हैं कि उन्हें मुश्किल से मिलता है कि क्या कहना उचित है; वरन् तुतलाने के प्रयत्न में वे लड़खड़ाते और हिचकिचाते हैं। इससे प्रकट होता है कि ठीक प्रार्थना करना एक विशेष दान है। हम यह अपने आलस्य को प्रश्रय देने के लिए नहीं कहते, मानो हम प्रार्थना का काम पवित्र आत्मा पर छोड़कर उस लापरवाही को ढील दें जिसकी ओर हम बहुत झुके रहते हैं। इसी प्रकार हम कभी-कभी यह अधर्मी बात सुनते हैं कि हमें अनिश्चित प्रतीक्षा करनी है जब तक कि वह हमारे मन पर तब अधिकार न कर ले जब हम किसी और काम में लगे हों। हमारा अर्थ यह है कि अपने हृदय की शिथिलता और आलस्य से थककर हमें आत्मा की सहायता की तीव्र लालसा करनी चाहिए। और जब पौलुस हमें आत्मा में प्रार्थना करने की आज्ञा देता है (1 कुरिन्थियों 14:15), तब भी वह जागरूकता का आग्रह नहीं छोड़ता, यह जताते हुए कि जहाँ आत्मा की प्रेरणा प्रार्थना के निर्माण में प्रभावशाली है, वहाँ वह हमारे अपने प्रयत्नों में कदापि बाधा या विलम्ब नहीं डालती; क्योंकि इस विषय में परमेश्वर यह परखना चाहता है कि हमारे हृदयों पर विश्वास कितना प्रभावशाली है।
6. प्रार्थना का एक और नियम यह है कि माँगते समय हम अपनी आवश्यकताओं को सदा सचमुच अनुभव करें, और गम्भीरता से विचार करें कि जो कुछ हम माँगते हैं वह सब हमें चाहिए, और प्रार्थना के साथ उसे पाने की सच्ची, वरन् उत्कट अभिलाषा रखें। बहुत-से लोग एक बँधे हुए रूप से प्रार्थनाएँ औपचारिक रीति से दोहराते हैं, मानो परमेश्वर के लिए कोई काम निपटा रहे हों; और यद्यपि वे मानते हैं कि उनकी दशा की बुराइयों का यह एक आवश्यक उपचार है, क्योंकि जिस ईश्वरीय सहायता की वे प्रार्थना करते हैं उसके बिना छूट जाना घातक होगा, फिर भी प्रकट होता है कि वे यह कर्तव्य आदत के कारण निभाते हैं, क्योंकि इस बीच उनके मन ठण्डे हैं और वे विचार नहीं करते कि क्या माँग रहे हैं। उनकी आवश्यकता का एक सामान्य और धुँधला बोध उन्हें प्रार्थना की ओर ले जाता है, पर वह उन्हें ऐसा चिन्तित नहीं करता जैसा किसी तात्कालिक महत्त्व की बात में होता है, कि वे अपनी आवश्यकता की पूर्ति पाएँ। इसके अतिरिक्त, क्या हम परमेश्वर की दृष्टि में इससे अधिक घृणित या यहाँ तक कि निन्दनीय किसी बात की कल्पना कर सकते हैं कि पापों की क्षमा माँगने का यह ढोंग किया जाए, जबकि माँगनेवाला उसी समय या तो समझता है कि वह पापी नहीं, या कम से कम यह नहीं सोच रहा कि वह पापी है; दूसरे शब्दों में, ऐसा ढोंग जिससे परमेश्वर का स्पष्ट उपहास किया जाता है? परन्तु मनुष्य, जैसा मैंने अभी कहा, भ्रष्टता से भरे हैं, इसलिए औपचारिक सेवा के रूप में वे प्रायः परमेश्वर से बहुत-सी ऐसी बातें माँगते हैं जो वे सोचते हैं कि उसकी भलाई के बिना, या किसी और स्थान से, उन्हें मिलती हैं, या निश्चय ही उनके पास पहले से हैं। एक और दोष है जो कम घृणित प्रतीत होता है, पर सहने योग्य नहीं। कुछ लोग बिना मनन के प्रार्थनाएँ बुदबुदा देते हैं, उनका एकमात्र सिद्धान्त यह है कि परमेश्वर को प्रार्थना से प्रसन्न करना है। विश्वासियों को विशेष रूप से सावधान रहना चाहिए कि वे परमेश्वर की उपस्थिति में कभी कोई बिनती प्रस्तुत करने के विचार से न आएँ जब तक कि वे किसी गम्भीर प्रभाव में न हों और साथ ही उसे पाने के इच्छुक न हों। वरन्, यद्यपि जिन बातों को हम केवल परमेश्वर की महिमा के लिए माँगते हैं उनमें पहली दृष्टि में हम अपनी आवश्यकता का विचार करते नहीं दिखते, फिर भी हमें उन्हें कम उत्साह और इच्छा की तीव्रता से नहीं माँगना चाहिए। उदाहरणार्थ, जब हम प्रार्थना करते हैं कि उसका नाम पवित्र माना जाए—तो उस पवित्र ठहराए जाने के लिए, यों कहें, हमें उत्कटता से भूखा और प्यासा होना चाहिए।
7. यदि आपत्ति की जाए कि जो आवश्यकता हमें प्रार्थना के लिए प्रेरित करती है वह सदा समान नहीं होती, तो मैं इसे मानता हूँ, और याकूब हमें यह भेद लाभदायक रीति से सिखाता है: “क्या तुम में कोई दुःखी है? तो वह प्रार्थना करे। क्या कोई आनन्दित है? तो वह भजन गाए,” (याकूब 5:13)। इसलिए स्वयं सामान्य बुद्धि यह कहती है कि हम बहुत सुस्त हैं, इसलिए जब कभी अवसर माँगे हमें परमेश्वर की ओर से उत्कटता से प्रार्थना करने को उभारा जाना चाहिए। इसी को दाऊद वह समय कहता है जब परमेश्वर “मिल सकता है,” (अर्थात् अनुकूल समय); क्योंकि, जैसा वह अनेक अन्य स्थानों में घोषणा करता है, जितने अधिक कठोरता से दुःख, कष्ट, भय और अन्य प्रकार की परीक्षाएँ हम पर दबाव डालती हैं, उतनी ही परमेश्वर तक हमारी पहुँच अधिक खुली है, मानो वह हमें अपने पास बुला रहा हो। फिर भी पौलुस की यह आज्ञा कि “सदा” प्रार्थना करो (इफिसियों 6:18), उतनी ही सच्ची है; क्योंकि हमारी दृष्टि में कार्य चाहे कितनी ही समृद्धि से चल रहे हों और हम चारों ओर से आनन्द के कारणों से घिरे हों, फिर भी समय का एक क्षण भी ऐसा नहीं जिसमें हमारा अभाव हमें प्रार्थना की ओर प्रेरित न करे। कोई मनुष्य गेहूँ और दाखमधु से भरपूर है; परन्तु क्योंकि वह परमेश्वर की निरन्तर उदारता के बिना रोटी का एक टुकड़ा भी नहीं खा सकता, उसके अन्न-भण्डार या तहखाने उसे दिन भर की रोटी माँगने से नहीं रोकेंगे। फिर, यदि हम विचार करें कि प्रति क्षण कितने संकट सिर पर लटके हैं, तो भय ही हमें सिखाएगा कि कोई समय प्रार्थना से रहित न होना चाहिए। परन्तु आत्मिक बातों में यह और अच्छी तरह जाना जा सकता है। क्योंकि जिन अनेक पापों का हमें बोध है, वे हमें कब निश्चिन्त बैठने देंगे कि हम दोष और दण्ड से छुटकारे के लिए गिड़गिड़ाकर बिनती न करें? परीक्षा हमें कब विश्राम देगी कि सहायता के लिए दौड़ना अनावश्यक हो? इसके अतिरिक्त, परमेश्वर के राज्य और महिमा के लिए जोश हम पर रुक-रुककर नहीं आना चाहिए, पर बिना विराम हमें प्रेरित करे, ताकि हर समय अनुकूल जान पड़े। इसलिए बिना कारण नहीं कि प्रार्थना में लगे रहने की इतनी बार आज्ञा दी गई है। मैं अब धीरज की बात नहीं कर रहा, जिस पर आगे विचार किया जाएगा; पर पवित्रशास्त्र निरन्तर प्रार्थना की आवश्यकता स्मरण दिलाकर हम पर आलस्य का आरोप लगाता है, क्योंकि हम अनुभव नहीं करते कि हमें इस चिन्ता और लगन की कितनी आवश्यकता है। इस नियम से कपट और परमेश्वर से झूठ बोलने की युक्ति रोकी जाती है, वरन् प्रार्थना से बिलकुल निकाल दी जाती है। परमेश्वर प्रतिज्ञा करता है कि वह उनके निकट रहेगा जो सच्चाई से उसे पुकारते हैं, और घोषणा करता है कि जो अपने पूरे मन से उसे ढूँढ़ते हैं वे उसे पाएँगे: इसलिए जो अपनी ही अशुद्धता में मगन हैं वे निश्चय उस तक नहीं पहुँच सकते। उचित प्रार्थना की एक आवश्यकता पश्चाताप है। इसी से पवित्रशास्त्र का यह सामान्य कथन है कि परमेश्वर दुष्टों की नहीं सुनता; उनकी प्रार्थनाएँ, उनके बलिदानों के समान, उसके लिए घृणित हैं। क्योंकि उचित है कि जो अपने हृदय बन्द कर लेते हैं वे परमेश्वर के कान अपने लिए बन्द पाएँ, और जो अपनी कठोरता से उसकी कठोरता को भड़काते हैं वे उसे अटल पाएँ। यशायाह में वह यों धमकाता है: “जब तुम बहुत प्रार्थना करो, तौभी मैं नहीं सुनूँगा; तुम्हारे हाथ लहू से भरे हैं,” (यशायाह 1:15)। इसी प्रकार यिर्मयाह में, “चाहे वे मुझे पुकारें, तौभी मैं उनकी न सुनूँगा,” (यिर्मयाह 11:7, 8, 11); क्योंकि वह इसे दुष्ट की सबसे बड़ी निन्दा समझता है कि वह उसकी वाचा पर घमण्ड करे जबकि अपने सारे जीवन से उसके पवित्र नाम को अपवित्र करता है। इसी कारण वह यशायाह में शिकायत करता है: “ये लोग मुँह से तो मेरा आदर करते हैं और होठों से मेरी महिमा करते हैं, परन्तु अपना मन मुझ से दूर रखते हैं” (यशायाह 29:13)। वास्तव में वह इसे केवल प्रार्थनाओं तक सीमित नहीं रखता, पर घोषणा करता है कि वह अपनी सेवा के हर भाग में पाखण्ड से घृणा करता है। इसी से याकूब के ये शब्द हैं, “तुम माँगते हो और पाते नहीं, इसलिए कि बुरी इच्छा से माँगते हो, ताकि अपने भोग-विलास में उड़ा दो,” (याकूब 4:3)। यह सच है (जैसा हम थोड़ी देर में फिर देखेंगे) कि भक्त जन अपनी उठाई हुई प्रार्थनाओं में अपनी योग्यता पर भरोसा नहीं रखते; फिर भी यूहन्ना की चेतावनी अनावश्यक नहीं: “जो कुछ हम माँगते हैं वह उससे पाते हैं, क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं,” (1 यूहन्ना 3:22); बुरा विवेक हमारे विरुद्ध द्वार बन्द कर देता है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर के सच्चे आराधकों के सिवा कोई ठीक प्रार्थना नहीं करता, न सुना जाता है। इसलिए हर कोई जो प्रार्थना की तैयारी करता है, अपनी दशा की बुराई से असन्तुष्ट हो, और, जो बिना पश्चाताप के वह नहीं कर सकता, एक दीन बिनती करनेवाले का स्वभाव और भाव धारण करे।
8. जोड़ा जानेवाला तीसरा नियम यह है: जो परमेश्वर की उपस्थिति में प्रार्थना करने आता है उसे सब घमण्डी विचारों से अपने को रिक्त करना, योग्यता का सारा विचार त्याग देना; संक्षेप में, सब आत्मविश्वास छोड़ देना चाहिए, और पूरी महिमा नम्रता से परमेश्वर को देनी चाहिए, ऐसा न हो कि अपने लिए थोड़ा-सा भी हथियाने से व्यर्थ गर्व उसे अपना मुख फेर लेने पर विवश कर दे। इस अधीनता के, जो सब अहंकार को गिरा देती है, हमें परमेश्वर के सेवकों में अनेक उदाहरण मिलते हैं। वे जितने पवित्र हैं, प्रभु की उपस्थिति में आते समय उतनी ही नम्रता से दण्डवत् करते हैं। इसी प्रकार दानिय्येल, जिसकी प्रभु ने स्वयं इतनी बड़ी प्रशंसा की, कहता है, “हम अपनी बिनतियाँ तेरे सामने अपने धार्मिकता के कारण नहीं, पर तेरी बड़ी दया के कारण प्रस्तुत करते हैं। हे प्रभु, सुन; हे प्रभु, क्षमा कर; हे प्रभु, ध्यान दे और कर; हे मेरे परमेश्वर, अपने नाम के निमित्त विलम्ब न कर: क्योंकि तेरा नगर और तेरे लोग तेरे नाम से कहलाते हैं।” यह वह परोक्ष रूप से, सामान्य रीति के अनुसार, भीड़ में से एक के समान नहीं करता: वह बल्कि अपना दोष अलग से मानता है, और बिनती करनेवाले के रूप में क्षमा के शरणस्थान में जाकर स्पष्ट घोषणा करता है कि वह अपना पाप और अपने इस्राएली लोगों का पाप मान रहा था (दानिय्येल 9:18-20)। दाऊद भी हमारे सामने इस नम्रता का उदाहरण रखता है: “अपने दास का न्याय न कर: क्योंकि तेरी दृष्टि में कोई मनुष्य जीवित नहीं जो धर्मी ठहरे,” (भजन संहिता 143:2)। इसी प्रकार यशायाह प्रार्थना करता है, “देख, तू क्रोधित हुआ, क्योंकि हम ने पाप किया: उनमें स्थिरता है, और हम बचाए जाएँगे। हम तो सब के सब अशुद्ध मनुष्य के समान हैं, और हमारे सब धर्म-कर्म मैले चिथड़ों के समान हैं; हम सब के सब पत्ते के समान मुरझा जाते हैं, और हमारे अधर्म के कामों ने हमें वायु के समान उड़ा दिया है। कोई भी तेरा नाम नहीं लेता, और न कोई तुझे पकड़े रहने के लिए उठता है: क्योंकि तू ने हम से अपना मुख छिपा लिया है, और हमारे अधर्म के कारण हमें गला दिया है। तौभी, हे यहोवा, तू हमारा पिता है; हम तो मिट्टी हैं, और तू हमारा कुम्हार है; हम सब तेरे हाथ के काम हैं। हे यहोवा, अत्यन्त क्रोधित न हो, और अधर्म को सदा स्मरण न रख: देख, हम बिनती करते हैं, हम सब तेरी प्रजा हैं।” (यशायाह 64:5-9)। तुम देखते हो कि वे किसी बात पर भरोसा नहीं रखते सिवाय इसके: यह विचार करके कि वे प्रभु के हैं, वे उसकी चिन्ता का पात्र होने से निराश नहीं होते। इसी प्रकार यिर्मयाह कहता है, “हे यहोवा, यद्यपि हमारे अधर्म के काम हमारे विरुद्ध साक्षी देते हैं, तौभी अपने नाम के निमित्त कुछ कर,” (यिर्मयाह 14:7)। क्योंकि उस अनिश्चित लेखक ने (वह जो भी रहा हो) जिसने वह पुस्तक लिखी जो बारूक भविष्यद्वक्ता की ठहराई जाती है,464 अत्यन्त सत्य और भक्तिपूर्वक लिखा है, “परन्तु वह प्राण जो बहुत दुःखी है, जो झुका और दुर्बल चलता है, और वे आँखें जो धुँधली हो रही हैं, और भूखा प्राण, हे प्रभु, तेरी स्तुति और धार्मिकता का बखान करेगा। इसलिए, हे प्रभु हमारे परमेश्वर, हम अपने पूर्वजों की धार्मिकता के कारण तेरे सामने अपनी दीन बिनती नहीं करते, और न अपने राजाओं की।” “हे प्रभु, सुन और दया कर; क्योंकि तू दयालु है: और हम पर तरस खा, क्योंकि हम ने तेरे सामने पाप किया है,” (बारूक 2:18, 19; 3:2)।
464 फ्रांसीसी में: “Pourtant ce qui est escrit en la prophetie qu’on attribue à Baruch, combien que l’autheur soit incertain, est tres sainctement dit;”—तो भी जो उस भविष्यवाणी में लिखा है जो बारूक की ठहराई जाती है, यद्यपि लेखक अनिश्चित है, वह अत्यन्त पवित्रता से कहा गया है।
9. सारांश यह कि क्षमा की बिनती, दोष के नम्र और निष्कपट अंगीकार के साथ, सही प्रार्थना की तैयारी भी है और आरम्भ भी। क्योंकि सबसे पवित्र मनुष्य भी परमेश्वर से कुछ पाने की आशा नहीं कर सकता जब तक कि वह उसके साथ मुफ़्त में मेल-मिलाप न कर लिया जाए। परमेश्वर उन्हीं पर प्रसन्न हो सकता है जिन्हें वह क्षमा करता है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि यही वह कुंजी है जिससे विश्वासी प्रार्थना का द्वार खोलते हैं, जैसा हम भजन संहिता के कई अंशों से जानते हैं। दाऊद, जब किसी और विषय पर बिनती प्रस्तुत करता है, कहता है, “मेरी जवानी के पापों और मेरे अपराधों को स्मरण न कर; अपनी दया के अनुसार, हे यहोवा, अपनी भलाई के निमित्त मुझे स्मरण कर,” (भजन संहिता 25:7)। फिर, “मेरे दुःख और मेरे कष्ट पर दृष्टि कर, और मेरे सब पाप क्षमा कर,” (भजन संहिता 25:18)। यहाँ भी हम देखते हैं कि प्रति दिन के पापों का लेखा लेना ही पर्याप्त नहीं; हमें उन्हें भी याद करना है जो बहुत पहले दबकर भुला दिए गए प्रतीत हों। क्योंकि दूसरे स्थान में वही भविष्यद्वक्ता, एक घोर अपराध का अंगीकार करते हुए, अपने जन्म तक लौट जाता है, “देख, मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, और पाप के साथ मेरी माता ने मुझे गर्भ में धारण किया,” (भजन संहिता 51:5); इसलिए नहीं कि वह अपने स्वभाव की भ्रष्टता को आड़ बनाकर दोष को हल्का करे, पर मानो अपने सारे जीवन के पापों को इकट्ठा करने के लिए, कि वह अपने आप को दोषी ठहराने में जितना कठोर हो, परमेश्वर उतना ही अधिक शान्त हो सके। परन्तु यद्यपि पवित्र जन सदा स्पष्ट शब्दों में पापों की क्षमा नहीं माँगते, फिर भी यदि हम पवित्रशास्त्र में दी गई उन प्रार्थनाओं पर ध्यान से विचार करें तो मेरी बात की सच्चाई सहज ही प्रकट हो जाएगी; अर्थात् कि उनके प्रार्थना करने का साहस केवल परमेश्वर की दया से आया, और वे सदा उसे शान्त करने से आरम्भ करते थे। क्योंकि जब मनुष्य अपने विवेक से पूछताछ करता है, तब वह अपनी चिन्ताओं को परमेश्वर के सामने घनिष्ठता से रखने का साहस करना तो दूर, यदि वह दया और क्षमा पर भरोसा न रखे तो उसके पास जाने के विचार ही से काँप उठे। एक और विशेष अंगीकार भी है। जब विश्वासी दण्ड से छुटकारे की लालसा करते हैं, तब वे साथ ही प्रार्थना करते हैं कि उनके पाप क्षमा हों;465 क्योंकि यह चाहना बेतुका होगा कि कारण बना रहे और प्रभाव हटा दिया जाए। क्योंकि हमें उन मूर्ख रोगियों की नक़ल करने से बचना चाहिए जो केवल आकस्मिक लक्षणों को ठीक करने की चिन्ता करते हैं और रोग की जड़ की उपेक्षा करते हैं।466 वरन् हमारा प्रयत्न यह हो कि परमेश्वर हम पर प्रसन्न हो, इससे पहले कि वह बाहरी चिह्नों से अपनी कृपा प्रमाणित करे, क्योंकि यही वह क्रम है जो उसने स्वयं चुना है, और उसकी भलाई का अनुभव करने से थोड़ा ही लाभ होगा यदि विवेक अनुभव न करे कि वह शान्त हो गया है, और इस प्रकार हमें उसे पूर्णतः प्रिय समझने के योग्य न बनाए। इसका स्मरण हमें हमारे उद्धारकर्ता के उत्तर से भी होता है। लकवे के मारे को चंगा करने का निश्चय करके वह कहता है, “तेरे पाप क्षमा हुए;” दूसरे शब्दों में, वह हमारे विचारों को उस वस्तु की ओर उठाता है जो विशेष रूप से चाहने योग्य है—अर्थात् परमेश्वर के अनुग्रह में प्रवेश, और तब हमें सहायता पहुँचाकर मेल-मिलाप का फल देता है। परन्तु वर्तमान दोष के उस विशेष अंगीकार के अतिरिक्त जो विश्वासी हर दोष और दण्ड की क्षमा की बिनती करने में करते हैं, वह सामान्य भूमिका जो हमारी प्रार्थनाओं के लिए अनुग्रह दिलाती है कभी छोड़ी नहीं जानी चाहिए, क्योंकि प्रार्थनाएँ कभी परमेश्वर तक नहीं पहुँचेंगी जब तक वे मुफ़्त दया पर आधारित न हों। इसी की ओर हम यूहन्ना के शब्दों को ले जा सकते हैं, “यदि हम अपने पापों को मान लें तो वह हमारे पापों को क्षमा करने और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है,” (1 यूहन्ना 1:9)। इसी कारण व्यवस्था के अधीन प्रार्थनाओं को लहू के प्रायश्चित्त से पवित्र करना आवश्यक था, इसलिए कि वे ग्रहण की जाएँ, और इसलिए कि लोगों को चेतावनी मिले कि वे इस उच्च अधिकार के योग्य नहीं हैं जब तक कि अपनी अशुद्धताओं से शुद्ध होकर वे प्रार्थना में अपना भरोसा पूरी तरह परमेश्वर की दया पर न रखें।
465 फ्रांसीसी में: “il recognoissent le chastiement qu’ils ont merité;”—वे उस दण्ड को स्वीकार करते हैं जिसके वे योग्य हुए हैं।
466 फ्रांसीसी में आगे जोड़ा है: “Ils voudront qu’on leur oste le mal de teste et des reins, et seront contens qu’on ne touche point a la fievre;”—वे चाहेंगे कि उनके सिर और कमर का दर्द दूर हो जाए, और सन्तुष्ट रहेंगे कि ज्वर को छुआ न जाए।
10. कभी-कभी, फिर भी, पवित्र जन परमेश्वर से बिनती करते हुए अपनी ही धार्मिकता का सहारा लेते प्रतीत होते हैं, जैसे जब दाऊद कहता है, “मेरे प्राण की रक्षा कर, क्योंकि मैं भक्त हूँ,” (भजन संहिता 86:2)। हिजकिय्याह भी, “हे यहोवा, मैं बिनती करता हूँ, स्मरण कर कि मैं कैसे सच्चाई और खरे मन से तेरे सम्मुख चलता रहा और जो तेरी दृष्टि में भला है वही करता आया,” (यशायाह 38:2)। ऐसी अभिव्यक्तियों से उनका केवल यह अर्थ है कि नया जन्म उन्हें उन सेवकों और सन्तानों में प्रकट करता है जिन से परमेश्वर वचन देता है कि वह अनुग्रह करेगा। हम पहले देख चुके हैं कि वह भजनकार के द्वारा कैसे घोषणा करता है कि उसकी आँखें “धर्मियों पर हैं, और उसके कान उनकी दोहाई की ओर लगे रहते हैं,” (भजन संहिता 34:16) और फिर प्रेरित के द्वारा, कि “जो कुछ हम उससे माँगते हैं वह हमें मिलता है, क्योंकि हम उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं,” (यूहन्ना 3:22)। इन अंशों में वह प्रार्थना को गुणवान कार्य के रूप में मूल्य नहीं देता, पर उन लोगों का भरोसा दृढ़ करना चाहता है जिन्हें निष्कपट खराई और निर्दोषता का बोध है, जैसी सब विश्वासियों में होनी चाहिए। क्योंकि जिस अन्धे को दृष्टि मिली थी उसका यह कथन ईश्वरीय सत्य से पूरी तरह मेल खाता है, कि परमेश्वर पापियों की नहीं सुनता (यूहन्ना 9:31); बशर्ते हम “पापियों” शब्द को उस अर्थ में लें जिसमें पवित्रशास्त्र सामान्यतः उसे प्रयोग करता है, अर्थात् उनके लिए जो धार्मिकता की किसी इच्छा के बिना अपने पापों में निश्चिन्त सो रहे हैं; क्योंकि कोई हृदय सच्ची प्रार्थना तक कभी नहीं उठेगा जो साथ ही पवित्रता की लालसा न करे। वे बिनतियाँ जिनमें पवित्र जन अपनी शुद्धता और खराई की ओर संकेत करते हैं, ऐसी प्रतिज्ञाओं के अनुरूप हैं, ताकि उन्हें अपने अनुभव में उस बात का प्रकटीकरण मिले जिसकी अपेक्षा परमेश्वर के सब सेवकों को कराई जाती है। इसी कारण वे प्रार्थना की यह रीति लगभग सदा तब प्रयोग करते हैं जब वे परमेश्वर के सामने अपनी तुलना अपने शत्रुओं से करते हैं, जिनके अन्याय से वे उसके हाथ से छुड़ाए जाने की लालसा करते हैं। ऐसी तुलना करते समय आश्चर्य नहीं कि वे अपने हृदय की खराई और सीधाई को सामने रखते हैं, ताकि इस प्रकार अपने मामले की न्यायसंगतता से प्रभु उन्हें सहायता देने को अधिक प्रवृत्त हो। हम भक्त हृदय से यह विशेषाधिकार नहीं छीनते कि वह प्रभु के सामने शुद्धता का बोध रखे और इस प्रकार उन प्रतिज्ञाओं के विषय में निश्चिन्त हो जिनसे वह अपने सच्चे आराधकों को सान्त्वना और सहारा देता है, पर हम चाहते हैं कि वे अपनी योग्यताओं का सारा विचार त्याग दें और प्रार्थना में सफलता का भरोसा केवल ईश्वरीय दया पर रखें।
11. प्रार्थना का चौथा नियम यह है कि हमारे इस प्रकार दीन और सचमुच नम्र किए जाने पर भी हमें सफलता की निश्चित आशा के साथ प्रार्थना करने को उत्साहित होना चाहिए। निस्सन्देह इन दोनों बातों के बीच, परमेश्वर के न्यायपूर्ण प्रतिशोध के बोध और उसके अनुग्रह पर दृढ़ भरोसे के बीच, विरोध का आभास है, फिर भी वे पूरी तरह एक-दूसरे के अनुरूप हैं, यदि यह परमेश्वर की केवल भलाई है जो अपने ही पापों से दबे हुओं को उठाती है। क्योंकि जैसा हमने पहले दिखाया (अध्याय 3, खण्ड 1, 2) कि पश्चाताप और विश्वास साथ-साथ चलते हैं, अटूट बन्धन से जुड़े हुए, एक भय उत्पन्न करता है, दूसरा आनन्द, वैसे ही प्रार्थना में दोनों का उपस्थित होना आवश्यक है। इस मेल को दाऊद थोड़े शब्दों में व्यक्त करता है: “परन्तु मैं तो तेरी अपार करुणा के कारण तेरे भवन में आऊँगा, और तेरा भय मानकर तेरे पवित्र मन्दिर की ओर दण्डवत् करूँगा,” (भजन संहिता 5:7)। परमेश्वर की भलाई के अन्तर्गत वह विश्वास को सम्मिलित करता है, साथ ही भय को बाहर नहीं रखता; क्योंकि न केवल उसकी महिमा हमसे श्रद्धा करवाती है, पर हमारी अपनी अयोग्यता भी हमें सब अभिमान और भरोसे से रिक्त करके भय में रखती है। जिस भरोसे की मैं बात करता हूँ वह ऐसा नहीं जो मन को सब चिन्ता से मुक्त कर दे और उसे मीठे और पूर्ण विश्राम से सुला दे; ऐसा विश्राम उन्हीं का होता है जिनके सब काम मनचाहे बहते हैं, जिन्हें कोई चिन्ता नहीं सताती, कोई पछतावा नहीं चुभता, कोई भय नहीं हिलाता। परन्तु पवित्र जनों को प्रार्थना के लिए सबसे उत्तम प्रेरणा तब मिलती है जब अपनी आवश्यकताओं के कारण वे सबसे अधिक बेचैनी अनुभव करते हैं और लगभग निराशा तक पहुँचा दिए जाते हैं, जब तक कि विश्वास समय पर उनकी सहायता को न आए; क्योंकि ऐसे संकटों में परमेश्वर की भलाई उन पर ऐसी चमकती है कि वे वर्तमान विपत्तियों के भार से दबे और बड़ी विपत्तियों के भय से पीड़ित होकर कराहते हुए भी इस भलाई पर भरोसा रखते हैं, और इस प्रकार सहने की कठिनाई को हल्का करते और अन्तिम छुटकारे की आशा में शान्ति पाते हैं। इसलिए आवश्यक है कि विश्वासी की प्रार्थना दोनों भावनाओं का परिणाम हो और दोनों का प्रभाव प्रकट करे; अर्थात् जब वह वर्तमान बुराइयों के नीचे कराहता और नई बुराइयों से चिन्तापूर्वक डरता है, तब भी वह साथ ही परमेश्वर की शरण ले, इसमें बिलकुल सन्देह न करते हुए कि परमेश्वर उसकी ओर सहायता का हाथ बढ़ाने को तैयार है। क्योंकि यह कहना सरल नहीं कि जब हम वह माँगते हैं जिसकी आशा उसकी भलाई से नहीं रखते तब हमारे अविश्वास से परमेश्वर कितना अप्रसन्न होता है। इसलिए प्रार्थना के स्वभाव के इससे अधिक अनुरूप कुछ नहीं कि यह निश्चित नियम माना जाए कि वह अनायास नहीं निकलनी चाहिए, पर विश्वास के पदचिह्नों पर चलनी चाहिए। इसी सिद्धान्त की ओर मसीह हम सब को इन शब्दों में निर्देशित करता है, “इसलिए मैं तुम से कहता हूँ, जो कुछ तुम प्रार्थना में माँगो, विश्वास कर लो कि तुम्हें मिल गया, और तुम्हें मिल जाएगा,” (मरकुस 11:24)। यही बात वह दूसरे स्थान में घोषित करता है, “जो कुछ तुम प्रार्थना में विश्वास करके माँगोगे वह सब तुम को मिलेगा,” (मत्ती 21:22)। इसी के अनुसार याकूब के शब्द हैं, “यदि तुम में से किसी को बुद्धि की घटी हो तो परमेश्वर से माँगे, जो बिना उलाहना दिए सब को उदारता से देता है, और उसको दी जाएगी। पर विश्वास से माँगे, और कुछ सन्देह न करे,” (याकूब 1:5)। वह विश्वास की सामर्थ्य को सन्देह के विपरीत रखकर अत्यन्त उपयुक्त रीति से व्यक्त करता है। उसका यह अतिरिक्त कथन भी उतना ही ध्यान देने योग्य है कि जो शंकालु, हिचकिचाते मन से परमेश्वर के पास आते हैं, यह निश्चय किए बिना कि वे सुने जाएँगे या नहीं, वे अपनी प्रार्थनाओं से कुछ नहीं पाते। ऐसों की तुलना वह समुद्र की उस लहर से करता है जो हवा से घसीटी और उछाली जाती है। इसी कारण वह दूसरे स्थान में सच्ची प्रार्थना को “विश्वास की प्रार्थना” कहता है (याकूब 5:15)। फिर, क्योंकि परमेश्वर इतनी बार घोषणा करता है कि वह हर मनुष्य को उसके विश्वास के अनुसार देगा, वह जताता है कि हम बिना विश्वास कुछ नहीं पा सकते। संक्षेप में, यह विश्वास ही है जो प्रार्थना का दिया हुआ सब कुछ प्राप्त करता है। यही पौलुस का अर्थ है उस प्रसिद्ध अंश में जिस पर मन्द लोग बहुत कम ध्यान देते हैं, “फिर जिस पर उन्होंने विश्वास नहीं किया, वे उसको कैसे पुकारें? और जिसकी नहीं सुनी उस पर कैसे विश्वास करें?” “अतः विश्वास सुनने से होता है, और सुनना मसीह के वचन से,” (रोमियों 10:14, 17)। प्रार्थना का मूल क्रमशः विश्वास से निकालते हुए वह स्पष्ट दावा करता है कि परमेश्वर को सच्चाई से केवल वे ही पुकार सकते हैं जिन्हें सुसमाचार के प्रचार द्वारा उसकी दया और इच्छा का ज्ञान कराया गया है, वरन् जिन्हें वह घनिष्ठता से समझाई गई है।
12. इस आवश्यकता पर हमारे विरोधी बिलकुल विचार नहीं करते। इसलिए जब हम कहते हैं कि विश्वासियों को दृढ़ निश्चय अनुभव करना चाहिए, तो वे सोचते हैं कि हम संसार की सबसे बेतुकी बात कह रहे हैं। परन्तु यदि उन्हें सच्ची प्रार्थना का कुछ अनुभव होता तो वे निश्चय समझ जाते कि ईश्वरीय कृपा के इस दृढ़ बोध के बिना परमेश्वर को यथोचित नहीं पुकारा जा सकता। परन्तु जब कोई मनुष्य विश्वास की सामर्थ्य को भली-भाँति नहीं समझ सकता जब तक कि साथ ही उसे अपने हृदय में अनुभव न करे, तब ऐसे लोगों से बहस करने में क्या लाभ जो स्पष्ट दिखाते हैं कि उन्हें व्यर्थ कल्पना से अधिक कभी कुछ नहीं हुआ? उस निश्चयता का मूल्य और आवश्यकता, जिसके लिए हम तर्क करते हैं, मुख्यतः प्रार्थना से सीखी जाती है। जो कोई इसे नहीं देखता वह बहुत जड़ विवेक का प्रमाण देता है। इसलिए इन अन्धों को छोड़कर आइए हम पौलुस के शब्दों पर ध्यान लगाएँ कि परमेश्वर को केवल वे ही पुकार सकते हैं जिन्होंने सुसमाचार से उसकी दया का ज्ञान पाया है और दृढ़ निश्चय अनुभव करते हैं कि वह दया उन्हें दिए जाने को तैयार है। वह कैसी प्रार्थना होगी? “हे प्रभु, मैं निश्चय सन्देह में हूँ कि तू मेरी सुनने को प्रवृत्त है या नहीं; पर चिन्ता से दबा हुआ मैं तेरी ओर भागता हूँ कि यदि मैं योग्य हूँ तो तू मेरी सहायता करे।” जिन पवित्र जनों की प्रार्थनाएँ पवित्रशास्त्र में दी गई हैं उनमें से किसी ने ऐसी बिनती नहीं की। न ही हमें पवित्र आत्मा से ऐसी शिक्षा मिलती है, जो हमें कहता है कि “हियाव बाँधकर अनुग्रह के सिंहासन के निकट चलें, कि हम पर दया हो और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करे,” (इब्रानियों 4:16); और अन्यत्र सिखाता है कि “मसीह पर विश्वास करने से हमें हियाव और भरोसे के साथ निकट आने का अधिकार है,” (इफिसियों 3:12)। यह भरोसा कि जो हम माँगते हैं वह पाएँगे, जिसकी प्रभु आज्ञा देता है और सब पवित्र जन अपने उदाहरण से सिखाते हैं, इसलिए हमें दोनों हाथों से थामे रखना चाहिए, यदि हम कुछ लाभ से प्रार्थना करना चाहते हैं। परमेश्वर को ग्रहणयोग्य प्रार्थना केवल वही है जो (यदि मैं यों कहूँ) विश्वास की इस निर्भीकता से उपजती है और आशा के पूर्ण निश्चय पर आधारित है। वह केवल “विश्वास” के सादे नाम से सन्तुष्ट हो सकता था, पर वह न केवल भरोसा, पर स्वतन्त्रता या हियाव भी जोड़ता है, ताकि इस चिह्न से हमें अविश्वासियों से अलग करे, जो हमारे समान परमेश्वर से प्रार्थना तो करते हैं, पर अनायास करते हैं। इसी कारण सारी कलीसिया यों प्रार्थना करती है “हे यहोवा, तेरी करुणा हम पर हो, जैसी हमने तुझ पर आशा रखी है,” (भजन संहिता 33:22)। यही शर्त भजनकार दूसरे स्थान में रखता है, “जिस समय मैं तुझे पुकारूँ, उसी समय मेरे शत्रु पीछे हट जाएँगे; यह मैं जानता हूँ कि परमेश्वर मेरी ओर है,” (भजन संहिता 56:9)। फिर, “भोर को मैं तेरे लिए प्रार्थना करके बाट जोहूँगा,” (भजन संहिता 5:3)। इन शब्दों से हम निष्कर्ष निकालते हैं कि प्रार्थनाएँ व्यर्थ हवा में उँडेली जाती हैं जब तक कि विश्वास के साथ न हों, जिसमें, मानो पहरे के बुर्ज से, हम शान्ति से परमेश्वर की बाट जोह सकते हैं। इसके अनुरूप पौलुस की उपदेश-क्रम भी है। क्योंकि विश्वासियों से आत्मा में सदा जागरूकता और लगन से प्रार्थना करने का आग्रह करने से पहले वह उन्हें “विश्वास की ढाल,” “उद्धार का टोप, और आत्मा की तलवार जो परमेश्वर का वचन है,” लेने की आज्ञा देता है (इफिसियों 6:16-18)। पाठक यहाँ वह स्मरण करे जो मैंने पहले कहा, कि विश्वास कदापि विफल नहीं होता चाहे उसके साथ हमारी दुर्दशा, दरिद्रता और अशुद्धता की स्वीकृति हो। विश्वासी चाहे जितना अनुभव करें कि वे अधर्म के भारी बोझ से दबे हैं, और न केवल हर उस वस्तु से रिक्त हैं जो परमेश्वर का अनुग्रह उनके लिए पा सके, पर उन अनेक पापों से न्यायोचित रूप से लदे हैं जो उसे भय का पात्र बनाते हैं, फिर भी वे अपने आप को उसके सम्मुख प्रस्तुत करना नहीं छोड़ते, यह भावना उन्हें उसकी उपस्थिति में आने से नहीं रोकती, क्योंकि उस तक पहुँचने का कोई और मार्ग नहीं। सच्ची प्रार्थना वह नहीं जिसमें हम परमेश्वर के सामने अहंकार से अपनी बड़ाई करें, या अपनी किसी बात का बड़ा मूल्य आँकें, पर वह जिसमें अपना दोष मानते हुए हम परमेश्वर के सामने अपने दुःख कहें, जैसे बच्चे अपने माता-पिता के सामने घनिष्ठता से अपनी शिकायतें रखते हैं। वरन् हमारे पापों का विशाल ढेर हमें प्रार्थना की ओर प्रेरित और उत्तेजित करे। इसका उदाहरण भजनकार देता है, “मेरे प्राण को चंगा कर, क्योंकि मैं ने तेरे विरुद्ध पाप किया है,” (भजन संहिता 41:4)। मैं स्वीकार करता हूँ कि ये चुभन प्राणघातक तीर सिद्ध होतीं यदि परमेश्वर सहायता न देता; परन्तु हमारे स्वर्गीय पिता ने अवर्णनीय कृपा से एक उपचार जोड़ दिया है, जिसके द्वारा वह सब उथल-पुथल को शान्त करके, हमारी चिन्ताओं को सहलाकर और हमारे भय को दूर करके, कृपापूर्वक हमें अपनी ओर खींचता है; वरन् सब सन्देहों को, बाधाओं की तो बात ही क्या, हटाकर हमारे आगे मार्ग समतल बना देता है।
13. और पहले तो, हमें प्रार्थना करने की आज्ञा देकर, वह उसी आज्ञा से हमें अधर्मी हठ का दोषी ठहराता है यदि हम न मानें। वह इससे अधिक सटीक आज्ञा नहीं दे सकता था जो भजन संहिता में है: “संकट के दिन मुझे पुकार” (भजन संहिता 50:15)। परन्तु पवित्रशास्त्र में भक्ति का कोई कर्तव्य इससे अधिक बार नहीं बताया गया, इसलिए यहाँ और देर तक रुकने की आवश्यकता नहीं। हमारा ईश्वरीय स्वामी कहता है, “माँगो, तो तुम्हें दिया जाएगा; ढूँढ़ो, तो तुम पाओगे; खटखटाओ, तो तुम्हारे लिए खोला जाएगा,” (मत्ती 7:7)। यहाँ निस्सन्देह आज्ञा के साथ प्रतिज्ञा जोड़ी गई है, और यह आवश्यक है। क्योंकि यद्यपि सब मानते हैं कि हमें आज्ञा का पालन करना चाहिए, फिर भी अधिकांश लोग परमेश्वर के निमन्त्रण से बचते यदि वह प्रतिज्ञा न करता कि वह सुनेगा और उत्तर देने को तैयार रहेगा। इन दो बातों के ठहराए जाने पर यह निश्चित है कि जो सब कुतर्क से कहते हैं कि हमें सीधे परमेश्वर के पास नहीं आना चाहिए, वे न केवल विद्रोही और अवज्ञाकारी हैं, पर अविश्वास के भी दोषी ठहरे हैं, क्योंकि वे प्रतिज्ञाओं पर सन्देह करते हैं। इस पर ध्यान देने की और भी आवश्यकता है क्योंकि कपटी लोग नम्रता और विनय के बहाने अभिमान से आज्ञा का तिरस्कार करते हैं, साथ ही परमेश्वर के कृपापूर्ण निमन्त्रण पर सारा विश्वास अस्वीकार करते हैं; वरन् उसकी आराधना का एक मुख्य भाग उससे छीन लेते हैं। क्योंकि जब उसने बलिदानों को ठुकराया, जिनमें तब सारी पवित्रता मानी जाती थी, तब उसने घोषणा की कि मुख्य बात, जो सब से बढ़कर उसकी दृष्टि में मूल्यवान है, आवश्यकता के दिन में उसे पुकारा जाना है। इसलिए जब वह वह माँगता है जो उसका अपना है, और हमें आज्ञा-पालन में तत्परता के लिए उकसाता है, तब सन्देह के कोई बहाने, चाहे कितने ही आकर्षक हों, हमें क्षमा नहीं कर सकते। इसलिए पवित्रशास्त्र भर में जितने अंशों में हमें प्रार्थना करने की आज्ञा दी गई है, वे सब हमारी आँखों के सामने मानो झण्डों के समान खड़े किए गए हैं, कि हम में भरोसा उत्पन्न करें। परमेश्वर की उपस्थिति में आगे बढ़ना ढिठाई होता यदि वह स्वयं अपने निमन्त्रण से हमसे पहले न आता। इसी कारण वह अपनी ही वाणी से हमारे लिए मार्ग खोलता है, “मैं कहूँगा, ये मेरी प्रजा हैं: और वे कहेंगे, यहोवा हमारा परमेश्वर है,” (जकर्याह 13:9)। हम देखते हैं कि वह अपने आराधकों से आगे बढ़कर उनकी अगवानी करता है, और चाहता है कि वे पीछे चलें, इसलिए हम यह भय नहीं कर सकते कि जो राग वह स्वयं सुझाता है वह अप्रिय होगा। विशेष रूप से हम परमेश्वर के स्वभाव का वह उत्तम वर्णन स्मरण करें, जिस पर भरोसा करके हम हर बाधा सहज ही पार कर लेंगे: “हे प्रार्थना के सुननेवाले, सब प्राणी तेरे पास आएँगे,” (भजन संहिता 65:2)। इससे अधिक प्रिय या सुखद क्या हो सकता है कि परमेश्वर को ऐसी उपाधि से विभूषित देखें जो हमें निश्चय दिलाती है कि बिनती करनेवालों की प्रार्थनाओं को सुनने से अधिक उसके स्वभाव के अनुकूल कुछ नहीं? इसी से भजनकार निष्कर्ष निकालता है कि पहुँच केवल कुछ व्यक्तियों को नहीं, पर सब मनुष्यों को दी गई है, क्योंकि परमेश्वर सब को इन शब्दों में सम्बोधित करता है, “संकट के दिन मुझे पुकार: मैं तुझे छुड़ाऊँगा, और तू मेरी महिमा करेगा,” (भजन संहिता 50:15)। इसलिए दाऊद, जो माँगता है उसे पाने के लिए, इस प्रकार दी गई प्रतिज्ञा का सहारा लेता है: “हे सेनाओं के यहोवा, इस्राएल के परमेश्वर, तू ने अपने दास पर प्रकट करके कहा है, कि मैं तेरा घर बनाऊँगा: इसी कारण तेरे दास को यह प्रार्थना तुझ से करने का हियाव हुआ है” (2 शमूएल 7:27)। यहाँ हम निष्कर्ष निकालते हैं कि प्रतिज्ञा न होती जिसने उसे साहस दिया तो वह डरता। इसी प्रकार दूसरे स्थान में वह सामान्य सिद्धान्त से अपने आप को दृढ़ करता है, “वह अपने डरवैयों की इच्छा पूरी करेगा,” (भजन संहिता 145:19)। वरन्, हम भजन संहिता में देख सकते हैं कि प्रार्थना की निरन्तरता कैसे टूटती है, और कभी परमेश्वर की सामर्थ्य की ओर, कभी उसकी भलाई की ओर, कभी उसकी प्रतिज्ञाओं की विश्वासयोग्यता की ओर मोड़ ले ली जाती है। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि दाऊद इन भावों को लाकर अपनी प्रार्थनाओं को असमय खण्डित करता है; परन्तु विश्वासी अनुभव से भली-भाँति जानते हैं कि जब तक नया ईंधन न डाला जाए तब तक उनकी उमंग शिथिल हो जाती है, और इसलिए प्रार्थना के समय परमेश्वर के स्वभाव और वचन दोनों पर मनन करना कदापि अनावश्यक नहीं। आइए हम दाऊद के उदाहरण का अनुकरण करने से न कतराएँ, और ऐसे विचार लाएँ जो हमारे शिथिल मनों को नई शक्ति से पुनर्जीवित करें।
