पुस्तक III · अध्याय 23

उन निन्दाओं का खण्डन जिनसे इस सिद्धान्त पर सदा अन्यायपूर्वक आक्रमण किया जाता है

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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उन निन्दाओं का खण्डन जिनसे इस सिद्धान्त पर सदा अन्यायपूर्वक आक्रमण किया जाता है

अध्याय 23।

उन निन्दाओं का खण्डन जिनसे इस सिद्धान्त पर सदा अन्यायपूर्वक आक्रमण किया जाता है।

इस अध्याय में चार भाग हैं, जो इस सिद्धान्त पर की गई मुख्य आपत्तियों का, तथा इन आपत्तियों पर आधारित अनेक बहानों और अपवादों का खण्डन करते हैं। इनसे पहले उन लोगों का खण्डन आता है जो चुनाव को मानते हैं परन्तु त्याग को नकारते हैं, खण्ड 1। फिर आता है, I. त्याग और चुनाव के सिद्धान्त पर पहली आपत्ति का खण्डन, खण्ड 2-5। II. दूसरी आपत्ति का उत्तर, खण्ड 6-9। III. तीसरी आपत्ति का खण्डन। IV. चौथी आपत्ति का खण्डन; जिसके साथ एक उपयोगी और आवश्यक चेतावनी जोड़ी गई है, खण्ड 12-14।

खण्ड।

1. त्याग को नकारनेवालों की भूल। 1. चुनाव त्याग के विपरीत है। 2. त्याग को नकारनेवाले ढिठाई से परमेश्वर से विवाद करते हैं, जबकि उसकी युक्तियों की आराधना स्वर्गदूत भी करते हैं। 3. जब परमेश्वर प्रेरित के द्वारा अपनी युक्तियाँ प्रकट करता है तब वे उसके विरुद्ध कुड़कुड़ाते हैं। आपत्ति और उत्तर। अगस्तीन का एक अंश।

2. पहली आपत्ति, अर्थात् यह कि परमेश्वर उन लोगों से अन्यायपूर्वक अप्रसन्न होता है जिन्हें वह उनके अपने किसी दोष के बिना विनाश के लिए ठहराता है। पहला उत्तर, ईश्वरीय इच्छा पर विचार करने से। इस इच्छा का स्वरूप और उसे किस प्रकार देखा जाए।

3. दूसरा उत्तर। परमेश्वर मनुष्य का कुछ भी ऋणी नहीं। पाप से भ्रष्ट हुए लोगों के प्रति उसका बैर अत्यन्त न्यायसंगत है। त्यागे हुए लोग अपने ही विवेक में परमेश्वर के धर्ममय न्याय के विषय में दोषी ठहरते हैं।

4. आपत्ति, अर्थात् यह कि त्यागे हुए लोग पाप करने के लिए पहले से ठहराए गए प्रतीत होते हैं। उत्तर। प्रेरित का अंश निन्दा से बचाया गया।

5. उत्तर, अगस्तीन के अधिकार से पुष्ट। दृष्टान्त। अगस्तीन का एक अंश।

6. आपत्ति, कि परमेश्वर को उन पापों का दोष मनुष्य पर नहीं लगाना चाहिए जिन्हें उसकी पूर्वनियति ने अनिवार्य बना दिया है। प्राचीन लेखकों का पहला उत्तर। यह मान्य नहीं। दूसरा उत्तर भी अधूरा है। वल्ला द्वारा प्रस्तुत तीसरा उत्तर सुदृढ़ आधार पर है।

7. आपत्ति, कि परमेश्वर ने यह ठहराया ही नहीं था कि आदम अपने पतन से नाश हो, अनेक कारणों से खण्डित। अगस्तीन का एक उत्कृष्ट अंश।

8. आपत्ति, कि दुष्ट परमेश्वर की अनुमति से नाश होते हैं, उसकी इच्छा से नहीं। उत्तर। एक भक्तिपूर्ण उपदेश।

9. आपत्ति और उत्तर।

10. आपत्ति, कि पूर्वनियति के सिद्धान्त के अनुसार परमेश्वर मुँह देखकर पक्षपात करनेवाला ठहरता है। उत्तर।

11. आपत्ति, कि पापियों को समान दण्ड मिलना चाहिए, नहीं तो परमेश्वर का न्याय असमान है। उत्तर। अगस्तीन के अंशों से पुष्ट।

12. आपत्ति, कि पूर्वनियति का सिद्धान्त अहंकारी भरोसा और अधर्म उत्पन्न करता है। भिन्न-भिन्न उत्तर।

13. एक और आपत्ति, जो पिछली पर निर्भर है। उत्तर। पूर्वनियति के सिद्धान्त का प्रचार किया जाना चाहिए, उसे चुपचाप टाल नहीं देना चाहिए।

14. उसका प्रचार और लोगों में उसका वितरण किस प्रकार किया जाए। अगस्तीन के आधार पर पूर्वनियति के खरे सिद्धान्त का सार।

1. यह सिद्धान्त सुनकर मानव मन अपनी उद्दण्डता को रोक नहीं पाता, वरन तुरही के नाद से भड़के हुए के समान उबलता और क्रोध से भर उठता है। बहुत से लोग, जो परमेश्वर को एक द्वेषपूर्ण आरोप से बचाने की इच्छा जताते हैं, चुनाव को तो मान लेते हैं परन्तु इससे इनकार करते हैं कि कोई त्यागा भी जाता है (Bernard. in Die Ascensionis, Serm. 2)। यह वे अज्ञानता और बचपने से करते हैं, क्योंकि अपने विपरीत त्याग के बिना कोई चुनाव हो ही नहीं सकता। कहा जाता है कि परमेश्वर जिन्हें लेपालक बनाता है उन्हें उद्धार के लिए अलग करता है। यह कहना अत्यन्त बेतुका होगा कि वह औरों को संयोग से ग्रहण कर लेता है, या कि जो कुछ केवल चुनाव कुछ थोड़े लोगों को देता है उसे वे अपने परिश्रम से पा लेते हैं। इसलिए जिन्हें परमेश्वर छोड़ देता है उन्हें वह त्यागता है, और इसका कोई दूसरा कारण नहीं सिवाय इसके कि उसे यही भाया कि उन्हें उस मीरास से बाहर रखे जिसे वह अपने बच्चों के लिए पूर्वनियत करता है। न ही मनुष्यों की उस उद्दण्डता को सहा जा सकता है जो परमेश्वर की उस अगम्य युक्ति के विषय में, जिसकी आराधना स्वर्गदूत भी करते हैं, उसके वचन से रुकने को तैयार नहीं। हम पहले ही बता चुके हैं कि कठोर करना भी उतना ही परमेश्वर के सीधे हाथ में है जितना दया करना। पौलुस उन लोगों के समान, जिनका मैंने उल्लेख किया, झूठ की सहायता लेकर परमेश्वर का बचाव करने में चिन्तित परिश्रम नहीं करता; वह केवल यह स्मरण कराता है कि सृष्टि के लिए अपने सृष्टिकर्ता से झगड़ना उचित नहीं। तब जो लोग यह मानने से इनकार करते हैं कि परमेश्वर किसी को त्यागता है, वे मसीह के इन वचनों की व्याख्या कैसे करेंगे? “जो पौधा मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, वह उखाड़ा जाएगा” (मत्ती 15:13)। उन्हें स्पष्ट बताया गया है कि वे सब जिन्हें स्वर्गीय पिता ने अपनी बारी में पवित्र वृक्षों के रूप में लगाना नहीं चाहा, विनाश के लिए ठहराए और समर्पित हैं। यदि वे इनकार करें कि यह त्याग का चिह्न है, तो उन्हें कोई भी बात, चाहे कितनी ही स्पष्ट हो, प्रमाणित नहीं की जा सकती। परन्तु यदि वे फिर भी कुड़कुड़ाएँ, तो हम विश्वास की संयमशीलता में पौलुस की इस चेतावनी से सन्तुष्ट रहें कि इसमें शिकायत का कोई आधार नहीं कि परमेश्वर ने, “अपना क्रोध दिखाने और अपनी सामर्थ्य प्रगट करने की इच्छा से, क्रोध के उन बरतनों को जो विनाश के लिए तैयार किए गए थे बड़े धीरज से सहा; और इसलिए कि वह अपनी महिमा के धन को दया के उन बरतनों पर प्रगट करे जिन्हें उसने महिमा के लिए पहले से तैयार किया था” (रोमियों 9:22, 23)। मेरे पाठक ध्यान दें कि पौलुस कुड़कुड़ाने और निन्दा के सब बहाने काट देने के लिए परमेश्वर के क्रोध और सामर्थ्य को परम प्रभुता सौंपता है; क्योंकि यह अन्याय होता कि वे गहरे न्याय, जो हमारी सब परख-शक्ति से परे हैं, हमारी गणना के अधीन किए जाएँ। हमारे विरोधियों का यह उत्तर निरर्थक है कि जिन्हें परमेश्वर चंचलता से सहता है उन्हें वह पूरी तरह त्याग नहीं देता, परन्तु उनके विषय में अधर में रहता है कि कदाचित् वे पश्चाताप करें; मानो पौलुस परमेश्वर को उनके मन फिराव की धीरज से प्रतीक्षा करते हुए चित्रित कर रहा हो जिन्हें वह विनाश के लिए तैयार किया हुआ बताता है। क्योंकि अगस्तीन ने इस अंश की ठीक व्याख्या करते हुए कहा है कि जहाँ सामर्थ्य सहनशीलता के साथ जुड़ी है, वहाँ परमेश्वर अनुमति नहीं देता वरन शासन करता है (August. Cont. Julian., Lib. 5, c. 5)। वे यह भी कहते हैं कि क्रोध के बरतनों के विषय में बिना कारण नहीं कहा गया कि वे विनाश के लिए तैयार किए गए थे, और परमेश्वर के विषय में कहा गया कि उसने दया के बरतनों को तैयार किया, क्योंकि इस प्रकार उद्धार की स्तुति परमेश्वर के लिए ली जाती है, जबकि विनाश का दोष उन पर डाला जाता है जो उसे अपनी ही इच्छा से अपने ऊपर लाते हैं। परन्तु यदि मैं मान भी लूँ कि भाषा के इस भेद से पौलुस पहले वाक्यांश की कठोरता को कुछ कोमल करता है, तो भी इससे यह कदापि नहीं निकलता कि वह विनाश की तैयारी को परमेश्वर की गुप्त युक्ति के सिवाय किसी और कारण पर डालता है। यह तो पिछले सन्दर्भ में निश्चय ही कहा गया है, जहाँ कहा गया है कि परमेश्वर ने फ़िरौन को खड़ा किया, और जिसे चाहता है उसे कठोर करता है। इसलिए इससे यह निकलता है कि परमेश्वर की गुप्त युक्ति ही कठोर किए जाने का कारण है। मैं कम से कम अगस्तीन के साथ यही मानता हूँ कि जब परमेश्वर भेड़ियों को भेड़ें बनाता है, तब वह उन्हें अनुग्रह के शक्तिशाली प्रभाव से फिर रचता है, कि इस प्रकार उनकी कठोरता वश में की जाए; और जिन हठीलों को वह नहीं बदलता, उन्हें इसलिए नहीं बदलता कि वह वह अधिक सामर्थी अनुग्रह नहीं लगाता, जो उसके वश में है, यदि वह उसे काम में लाना चाहे (August. de Prædest. Sanct., Lib. 1, c. 2)।

2. ये बातें भक्तों और नम्र लोगों के लिए, और उनके लिए जो स्मरण रखते हैं कि वे मनुष्य हैं, भली-भाँति पर्याप्त होंगी। परन्तु क्योंकि ये उग्र कुत्ते परमेश्वर के विरुद्ध अनेक प्रकार की निन्दा उगलते हैं, इसलिए हम जहाँ तक विषय अनुमति दे, प्रत्येक का उत्तर देंगे। मूर्ख लोग परमेश्वर से झगड़ने के अनेक आधार खड़े करते हैं, मानो उसे अपने आरोपों के अधीन समझते हों। पहले वे पूछते हैं कि परमेश्वर अपनी सृष्टि से क्यों अप्रसन्न होता है, जिन्होंने उसे पहले किसी अपराध से नहीं भड़काया; क्योंकि जिसे चाहे उसे विनाश के लिए समर्पित कर देना न्यायी के विधिसम्मत दण्ड से अधिक किसी निरंकुश की सनक के समान है; और इसलिए परमेश्वर से शिकायत करने का कारण है, यदि केवल उसकी इच्छा से मनुष्य अपने किसी दोष के बिना अनन्त मृत्यु के लिए पूर्वनियत किए गए हों। यदि कभी भक्तों के मन में इस प्रकार के विचार आएँ, तो वे उन्हें दबाने के लिए पर्याप्त रूप से सुसज्जित होंगे, यह सोचकर कि ईश्वरीय इच्छा के कारण जानने का हठ करना कितना पापमय है, क्योंकि वह स्वयं ही जो कुछ अस्तित्व में है उस सब का कारण है, और उचित रूप से होना भी चाहिए। क्योंकि यदि उसकी इच्छा का कोई कारण है, तो उससे पहले कुछ होना चाहिए, और वह उसी से जुड़ा होना चाहिए; ऐसी कल्पना करना अधर्म होगा। परमेश्वर की इच्छा धार्मिकता का परम नियम है,499 इसलिए जो कुछ वह चाहता है उसे केवल इसी कारण कि वह उसे चाहता है धर्ममय माना जाना चाहिए। इसलिए जब पूछा जाए कि प्रभु ने ऐसा क्यों किया, तो हमें यह उत्तर देना चाहिए, क्योंकि उसे यही भाया। परन्तु यदि तुम आगे पूछो कि उसे यह क्यों भाया, तो तुम परमेश्वर की इच्छा से भी बड़ी और ऊँची कोई वस्तु माँग रहे हो, और ऐसी कोई वस्तु मिल नहीं सकती। इसलिए मानवीय ढिठाई चुप रहे, और उसे खोजना छोड़ दे जो है ही नहीं, ऐसा न हो कि वह उसे भी न पाए जो है। मैं कहता हूँ, यह उस हर एक को रोकने के लिए पर्याप्त होगा जो परमेश्वर की गुप्त बातों पर श्रद्धा से विचार करना चाहे। दुष्टों की उस धृष्टता के विरुद्ध, जो खुलेआम निन्दा करने में नहीं झिझकते, परमेश्वर हमारी सहायता के बिना अपनी ही धार्मिकता से अपना बचाव पर्याप्त रूप से करेगा, जब वह उनके विवेक से बच निकलने के सब उपाय छीनकर उन्हें दोषी ठहराएगा और उन्हें उनके दोष का अनुभव कराएगा। फिर भी हम निरंकुश सामर्थ्य की उस कल्पना को कोई समर्थन नहीं देते,500 जो जैसे अन्यजातीय है वैसे ही हमारे लिए उचित रूप से घृणा के योग्य होनी चाहिए। हम परमेश्वर को व्यवस्थाहीन नहीं मानते। वह स्वयं अपने लिए व्यवस्था है; क्योंकि, जैसा प्लेटो कहता है, जो मनुष्य वासना के प्रभाव में दबे हैं उन्हें व्यवस्था चाहिए; परन्तु परमेश्वर की इच्छा न केवल हर दोष से मुक्त है, वरन सिद्धता का परम मानक और सब व्यवस्थाओं की व्यवस्था है। परन्तु हम इनकार करते हैं कि वह अपनी कार्यविधि का लेखा देने को बाध्य है; और हम यह भी इनकार करते हैं कि हम अपनी सामर्थ्य से ऐसे विषय में निर्णय देने के योग्य हैं। इसलिए जब हम उससे आगे बढ़ने के लिए परखे जाएँ जितना हमें बढ़ना चाहिए, तो यह विचार हमें रोके, “तू बोलने में धर्मी और न्याय करने में निष्कलंक ठहरे” (भजन संहिता 51:4)।

3. इस प्रकार परमेश्वर अपने शत्रुओं को चुप्पी से शान्त कर सकता है। परन्तु ऐसा न हो कि हम उन्हें उसके पवित्र नाम का उपहास बिना दण्ड के करने दें, वह अपने वचन से हमें उनके विरुद्ध हथियार देता है। इसलिए जब हमसे इस प्रकार कहा जाए, परमेश्वर ने आरम्भ से ही कुछ को मृत्यु के लिए क्यों पूर्वनियत किया, जबकि वे अभी अस्तित्व में ही नहीं थे और इसलिए मृत्यु-दण्ड के योग्य हो ही नहीं सकते थे? तो उत्तर में हम भी बदले में पूछें, यदि परमेश्वर मनुष्य को उसके अपने स्वभाव के अनुसार आँकना चाहे, तो तुम्हारी समझ में परमेश्वर का मनुष्य पर क्या ऋण है? क्योंकि हम सब पाप से बिगड़े हुए हैं, इसलिए हम परमेश्वर के लिए घृणित हुए बिना नहीं रह सकते, और यह निरंकुश निर्दयता से नहीं वरन कठोरतम न्याय से है। परन्तु यदि वे सब जिन्हें प्रभु मृत्यु के लिए पूर्वनियत करता है, स्वभाव से ही मृत्यु-दण्ड के पात्र हैं, तो वे किस अन्याय की शिकायत करते हैं? यदि आदम की सारी सन्तानें अपने सृष्टिकर्ता से इस बात पर विवाद और झगड़ा करने आएँ कि उसके अनन्त विधान से वे जन्म से पहले ही सदा के विनाश के लिए ठहराई गई थीं, तो जब परमेश्वर उनसे हिसाब लेने आएगा, इस बचाव के विरुद्ध वे क्या बुड़बुड़ा सकेंगे? यदि सब एक भ्रष्ट पिण्ड में से लिए गए हैं, तो यह आश्चर्य की बात नहीं कि सब दण्ड-आज्ञा के अधीन हैं। इसलिए वे परमेश्वर पर अन्याय का आरोप न लगाएँ, यदि उसके अनन्त न्याय से वे उस मृत्यु के लिए ठहराए गए हैं जिसकी ओर वे स्वयं अनुभव करते हैं कि वे चाहें या न चाहें अपने ही स्वभाव से स्वेच्छा से खिंचे चले जाते हैं। इससे प्रकट होता है कि कुड़कुड़ाने का यह दिखावा कितना विकृत है, जब वे जान-बूझकर दण्ड के उस कारण को दबा देते हैं जिसे वे अपने ही भीतर पहचानने को विवश हैं, ताकि दोष परमेश्वर पर डाल सकें। परन्तु यदि मैं सौ बार भी मान लूँ कि परमेश्वर ही कर्ता है (और यह अत्यन्त निश्चित है कि वही है), तो भी वे इससे अपना दोष मिटा नहीं देते, जो उनके विवेक पर खुदा हुआ है और बार-बार उनकी आँखों के सामने आता रहता है।

499 यह अगस्तीन के De Gen. cont. Manich., Lib. 1 c. 3 से लिया गया है।

500 फ्रांसीसी में: “Toutesfois en parlant ainsi, nous n’approuvons pas la reverie des theologiens Papistes touchant la puissance absolue de Dieu;”—अर्थात् फिर भी ऐसा कहते हुए हम परमेश्वर की निरंकुश सामर्थ्य के विषय में पोप-पक्षीय धर्मशास्त्रियों की कल्पना का समर्थन नहीं करते।

4. वे फिर आपत्ति करते हैं, क्या मनुष्य परमेश्वर के विधान से उसी भ्रष्टता के लिए पूर्वनियत नहीं थे जो अब दण्ड के कारण के रूप में सामने रखी जाती है? यदि ऐसा है, तो जब वे अपनी भ्रष्टता में नाश होते हैं तो वे उसी विपत्ति का दण्ड भोगने के सिवाय और कुछ नहीं करते, जिसमें परमेश्वर की पूर्वनियति से आदम गिरा और अपनी सारी सन्तान को अपने साथ औंधे मुँह घसीट ले गया। तो क्या वह अपनी सृष्टि का इस प्रकार निर्दयता से उपहास करके अन्यायी नहीं ठहरता? मैं मानता हूँ कि परमेश्वर की इच्छा से आदम की सारी सन्तानें दुर्दशा की उस अवस्था में गिर गईं जिसमें वे अब फँसी हैं; और यही मैंने आरम्भ में कहा था कि हमें सदा ईश्वरीय इच्छा की केवल सुइच्छा की ओर लौटना होगा, जिसका कारण उसी में छिपा है। परन्तु इससे तुरन्त यह नहीं निकलता कि परमेश्वर इस आरोप का पात्र है। क्योंकि हम पौलुस के साथ इन शब्दों में उत्तर देंगे, “हे मनुष्य, भला तू कौन है जो परमेश्वर का सामना करता है? क्या गढ़ी हुई वस्तु गढ़नेवाले से कहेगी, तू ने मुझे ऐसा क्यों बनाया? क्या कुम्हार को मिट्टी पर अधिकार नहीं कि एक ही लोंदे में से एक बरतन आदर के लिए और दूसरा अनादर के लिए बनाए?” (रोमियों 9:20, 21)। वे इनकार करेंगे कि परमेश्वर के न्याय का इस प्रकार सच्चा बचाव होता है, और कहेंगे कि हम कोई बच निकलने की चाल खोज रहे हैं, जैसी वे लोग अपनाया करते हैं जिनके पास कोई अच्छा बहाना नहीं होता। क्योंकि यहाँ इसके सिवाय और क्या कहा गया प्रतीत होता है कि परमेश्वर की सामर्थ्य ऐसी है जो रोकी नहीं जा सकती, इसलिए वह जो चाहे कर सकता है? परन्तु बात इससे बिलकुल भिन्न है। क्योंकि इससे प्रबल कारण और क्या दिया जा सकता है कि हमें आज्ञा दी जाती है कि सोचें कि परमेश्वर कौन है? जो संसार का न्यायी है, वह कोई अधर्म कैसे कर सकता है? यदि न्याय करना परमेश्वर के स्वभाव का अंग है, तो वह स्वभाव से ही न्याय से प्रेम और अन्याय से घृणा करता होगा। इसलिए प्रेरित ने, मानो किसी कठिनाई में पकड़ा गया हो, बच निकलने की चाल का सहारा नहीं लिया; उसने केवल यह संकेत दिया कि ईश्वरीय न्याय की कार्यविधि इतनी ऊँची है कि मनुष्य के माप से नहीं नापी जा सकती, न मानवीय बुद्धि की दुर्बलता से समझी जा सकती है। प्रेरित सचमुच मानता है कि ईश्वरीय न्यायों में एक ऐसी गहराई है जिसमें सब मनुष्यों के मन डूब जाएँगे यदि वे उसमें प्रवेश करने का प्रयत्न करें। परन्तु वह यह भी दिखाता है कि परमेश्वर के कामों को ऐसे नियम के अधीन करना कितना अशोभनीय है कि जैसे ही वे हमारी बुद्धि से मेल न खाएँ हम उन्हें दोषी ठहराने का साहस करें।

सुलैमान की एक प्रसिद्ध उक्ति है (जिसे फिर भी थोड़े ही लोग ठीक समझते हैं), “महान परमेश्वर, जिसने सब वस्तुएँ रचीं, मूर्ख को भी प्रतिफल देता है और अपराधियों को भी” (नीतिवचन 26:10)। क्योंकि वह परमेश्वर की महानता की बात कर रहा है, जिसे यह भाता है कि मूर्खों और अपराधियों को दण्ड दे, यद्यपि उसे यह नहीं भाता कि उन्हें अपना आत्मा दे। मनुष्यों की यह भयानक मूढ़ता है कि जिसकी कोई सीमा नहीं उसे अपनी बुद्धि के छोटे से माप के अधीन करना चाहें। पौलुस उन स्वर्गदूतों को चुने हुए कहता है जिन्होंने अपनी खराई बनाए रखी। यदि उनकी दृढ़ता परमेश्वर की सुइच्छा के कारण थी, तो दूसरों का विद्रोह प्रमाणित करता है कि वे छोड़ दिए गए थे।501 इसका और कोई कारण नहीं दिया जा सकता सिवाय त्याग के, जो परमेश्वर की गुप्त युक्ति में छिपा है।

5. अब यदि कोई मनिकी या सेलेस्टीनस502 आकर परमेश्वर के विधान पर दोष लगाने लगे (देखिए खण्ड 8), तो मैं पौलुस के साथ कहता हूँ कि उसका कोई लेखा नहीं दिया जा सकता, क्योंकि अपनी महानता में वह हमारी समझ से बहुत परे है। क्या इसमें कोई अनोखी या बेतुकी बात है? क्या हम परमेश्वर की सामर्थ्य को इतना सीमित चाहेंगे कि वह उससे अधिक कुछ न कर सके जो हमारा मन समझ सकता है? मैं अगस्तीन के साथ कहता हूँ कि प्रभु ने उन्हें भी सृजा है जो, जैसा वह निश्चय ही पहले से जानता था, विनाश को जानेवाले थे, और उसने ऐसा इसलिए किया कि उसने यही चाहा। उसने यह क्यों चाहा, यह पूछना हमारा काम नहीं, क्योंकि हम इसे समझ नहीं सकते, और न हमें ईश्वरीय इच्छा के न्याय के विषय में विवाद उठाना भी शोभा देता है। जब कभी हम उसके विषय में बोलते हैं, तब हम न्याय के परम मानक के विषय में बोल रहे होते हैं। (देखिए August. Ep. 106)। परन्तु जब न्याय स्पष्ट दिखाई देता है, तब हम अन्याय का प्रश्न क्यों उठाएँ? इसलिए पौलुस के उदाहरण पर उनके मुँह बन्द करने में हम लज्जित न हों। जब कभी वे दोष निकालने का साहस करें, तब हम यह दोहराना आरम्भ करें: हे अभागे मनुष्यो, तुम कौन हो जो परमेश्वर पर दोष लगाते हो, और इसलिए लगाते हो कि वह अपने कामों की महानता को तुम्हारी तुच्छ बुद्धि के अनुरूप नहीं ढालता? मानो जो कुछ शरीर से छिपा है वह सब विकृत ही होना चाहिए। ईश्वरीय न्यायों की अथाहता तुम्हें स्पष्ट अनुभव से ज्ञात है। तुम जानते हो कि वे “बड़ा गहरा सागर” कहलाते हैं (भजन संहिता 36:6)। अब अपने मनों की संकीर्णता को देखो और कहो कि क्या वह परमेश्वर की आज्ञाओं को समझ सकता है। तब तुम मोहग्रस्त जिज्ञासा से अपने को उस गर्त में क्यों गिराते हो जिसके विषय में बुद्धि स्वयं बताती है कि वह तुम्हारा विनाश सिद्ध होगा? अय्यूब की पुस्तक और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकें परमेश्वर की अगम्य बुद्धि और भयानक सामर्थ्य के विषय में जो कहती हैं, उससे तुम कुछ तो भयभीत क्यों नहीं होते? यदि तुम्हारा मन व्याकुल है, तो अगस्तीन की यह सम्मति ग्रहण करने से मत कतराओ, “तुम मनुष्य होकर मुझसे उत्तर की आशा करते हो: मैं भी मनुष्य हूँ। इसलिए आओ हम दोनों उसकी सुनें जो कहता है, ‘हे मनुष्य, तू कौन है?’ विश्वास करनेवाला अज्ञान ढीठ ज्ञान से उत्तम है। पुण्य खोजो; तुम्हें दण्ड के सिवाय कुछ न मिलेगा। ओह, यह ऊँचाई! पतरस इनकार करता है, एक चोर विश्वास करता है। ओह, यह ऊँचाई! क्या तुम कारण पूछते हो? मैं तो उस ऊँचाई के आगे काँपूँगा। तुम तर्क करो, मैं आश्चर्य करूँगा; तुम विवाद करो, मैं विश्वास करूँगा। मैं ऊँचाई देखता हूँ; गहराई नाप नहीं सकता। पौलुस को विश्राम मिला, क्योंकि उसे आश्चर्य मिला। वह परमेश्वर के न्यायों को ‘अगम्य’ कहता है; और क्या तुम उन्हें खोजने आए हो? वह कहता है कि उसके मार्ग ‘अगोचर’ हैं, और क्या तुम उन्हें खोज निकालना चाहते हो?” (August. de Verb. Apost. Serm. 20)। आगे बढ़ने से हमें कुछ लाभ न होगा। क्योंकि न तो प्रभु इन लोगों की उद्दण्डता को सन्तुष्ट करेगा, न उसे उस बचाव के सिवाय किसी और बचाव की आवश्यकता है जिसका उपयोग उसने अपने आत्मा के द्वारा किया, जो पौलुस के मुँह से बोला। जब हम परमेश्वर के साथ बोलना छोड़ देते हैं तब हम भली-भाँति बोलने की कला भूल जाते हैं।

501 फ्रांसीसी में: “Si leur constance er fermeté a eté fondee au bon plasir de Dieu, la revolte des diables monstre qu’ils n’ont pas eté retenus, mais plustost delaisse;”—अर्थात् यदि उनकी दृढ़ता और स्थिरता परमेश्वर की सुइच्छा पर आधारित थी, तो शैतान-दूतों का विद्रोह दिखाता है कि वे रोके नहीं गए थे, वरन छोड़ दिए गए थे।

502 फ्रांसीसी में जोड़ा गया है, “ou autre heretique;”—अर्थात् या कोई और विधर्मी।

6. अधर्म एक और आपत्ति उठाता है, जो परमेश्वर पर दोष लगाने से अधिक पापी का बचाव करना चाहती है; यद्यपि जिसे परमेश्वर पापी ठहराता है वह न्यायी पर दोष लगाए बिना अन्ततः निर्दोष ठहराया नहीं जा सकता। तब, अपवित्र जीभें जो उपहास भरी बात कहती हैं वह यह है। परमेश्वर मनुष्यों को उन बातों के लिए क्यों दोषी ठहराए जिनकी अनिवार्यता उसने स्वयं अपनी पूर्वनियति से ठहरा दी है? वे क्या कर सकते थे? क्या वे उसकी आज्ञाओं से जूझ सकते थे? ऐसा करना उनके लिए व्यर्थ होता, क्योंकि वे सफल हो ही नहीं सकते थे। इसलिए उन्हें उन बातों के लिए दण्ड देना न्यायसंगत नहीं जिनका मुख्य कारण परमेश्वर की पूर्वनियति में है। यहाँ मैं उस बचाव से दूर रहूँगा जिसका सहारा कलीसियाई लेखक प्रायः लेते हैं, कि परमेश्वर के पूर्वज्ञान में ऐसा कुछ नहीं जो उसे मनुष्य को पापी देखने से रोके, क्योंकि जिन बुराइयों को वह पहले से देखता है वे मनुष्य की हैं, उसकी नहीं। यह दोष निकालनेवाले को नहीं रोकेगा, जो फिर भी अड़ा रहेगा कि परमेश्वर यदि चाहता तो उन बुराइयों को, जो उसने पहले से देखीं, रोक सकता था, और ऐसा न करने से अवश्य है कि उसने निश्चित युक्ति से मनुष्य को पृथ्वी पर ठीक इसी रीति से चलने के लिए सृजा। परन्तु यदि परमेश्वर के विधान से मनुष्य इस शर्त पर रचा गया कि वह आगे चलकर वह सब करे जो वह करता है, तो जिससे वह बच नहीं सकता, और जिसे करने के लिए वह परमेश्वर की इच्छा से विवश है, वह उस पर अपराध के रूप में आरोपित नहीं किया जा सकता। इसलिए आइए देखें कि इस कठिनाई को सुलझाने की उचित विधि क्या है। पहले, सब को वह मानना होगा जो सुलैमान कहता है, “यहोवा ने सब वस्तुएँ अपने ही लिए बनाई हैं, वरन दुष्ट को भी विपत्ति के दिन के लिए” (नीतिवचन 16:4)। अब, क्योंकि सब वस्तुओं की व्यवस्था परमेश्वर के हाथ में है, क्योंकि जीवन और मृत्यु का निपटारा उसी का है, इसलिए वह सब कुछ अपनी सर्वसत्ताधारी युक्ति से इस प्रकार ठहराता है कि ऐसे व्यक्ति जन्म लेते हैं जो गर्भ ही से निश्चित मृत्यु के लिए ठहराए गए हैं, और अपने विनाश के द्वारा उसकी महिमा करने के लिए हैं। यदि कोई कहे कि परमेश्वर के विधान से उन पर कोई अनिवार्यता नहीं डाली गई, वरन वे उसके द्वारा उस दशा में इसलिए रचे गए कि उसने उनकी भावी भ्रष्टता को पहले से देख लिया था, तो वह कुछ कहता तो है, परन्तु पर्याप्त नहीं कहता। प्राचीन लेखक सचमुच कभी-कभी इस हल का प्रयोग करते हैं, यद्यपि कुछ हिचकिचाहट के साथ। विद्वत्परम्परावादी (स्कूलमैन) फिर उसी में ऐसे टिके रहते हैं मानो उसका खण्डन हो ही न सके। मैं अपनी ओर से यह मानने को तैयार हूँ कि केवल पूर्वज्ञान प्राणियों पर कोई अनिवार्यता नहीं डालता; यद्यपि कुछ लोग इससे सहमत नहीं और मानते हैं कि वही वस्तुओं का कारण है। परन्तु वल्ला, जो पवित्र विषयों में अन्यथा अधिक निपुण नहीं था, मुझे अधिक चतुर और पैनी दृष्टि लेता प्रतीत होता है, जब वह दिखाता है कि यह विवाद व्यर्थ है, क्योंकि जीवन और मृत्यु पूर्वज्ञान के कार्य होने की अपेक्षा ईश्वरीय इच्छा के कार्य हैं। यदि परमेश्वर मनुष्य की घटनाओं को केवल पहले से देखता, और उन्हें अपनी इच्छा के अनुसार ठहराता और नियोजित भी न करता, तो इस प्रश्न को उठाने की गुंजाइश हो सकती थी कि उसका पूर्वज्ञान कहाँ तक अनिवार्यता के बराबर है; परन्तु क्योंकि वह भविष्य की बातों को केवल इसलिए पहले से देखता है कि उसने ठहरा दिया है कि वे वैसे ही हों, इसलिए पूर्वज्ञान पर बहस करना व्यर्थ है, जब यह स्पष्ट है कि सब घटनाएँ उसके सर्वसत्ताधारी ठहराव से होती हैं।

7. वे इनकार करते हैं कि कहीं स्पष्ट शब्दों में कहा गया है कि परमेश्वर ने ठहराया था कि आदम अपने विद्रोह से नाश हो।503 मानो वही परमेश्वर, जिसके विषय में पवित्रशास्त्र घोषित करता है कि वह जो चाहता है वही करता है, अपनी सृष्टि के सबसे श्रेष्ठ प्राणी को बिना किसी विशेष उद्देश्य के रच सका हो। वे कहते हैं कि स्वतंत्र इच्छा के अनुसार वह अपने भाग्य का स्वयं निर्माता होनेवाला था, कि परमेश्वर ने उसके विषय में इसके सिवाय कुछ नहीं ठहराया था कि उसके साथ उसके योग्य के अनुसार व्यवहार करे। यदि यह नीरस कल्पना स्वीकार की जाए, तो परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता कहाँ रहेगी, जिससे वह अपनी गुप्त युक्ति के अनुसार, जिस पर सब कुछ निर्भर है, सब पर शासन करता है? परन्तु चाहे वे मानें या न मानें, आदम की सन्तान में पूर्वनियति प्रकट है। यह स्वभाव के कारण नहीं था कि वे सब एक माता-पिता के दोष से उद्धार खो बैठे। एक मनुष्य के विषय में वह बात मानने से वे क्यों इनकार करें जो वे अपनी इच्छा के विरुद्ध सारी मानव जाति के विषय में मानते हैं? वे दोष निकालते हुए अपना परिश्रम क्यों खोएँ? पवित्रशास्त्र घोषित करता है कि सब एक में अनन्त मृत्यु के दायी ठहराए गए। क्योंकि यह स्वभाव के सिर नहीं मढ़ा जा सकता, इसलिए स्पष्ट है कि यह परमेश्वर की आश्चर्यजनक युक्ति के कारण है। परमेश्वर के न्याय के इन योग्य रक्षकों के लिए यह अत्यन्त बेतुका है कि वे मच्छर को छानते और ऊँट को निगल जाते हैं। मैं फिर पूछता हूँ कि आदम का पतन इतनी जातियों को उनके शिशुओं समेत बिना उपाय अनन्त मृत्यु में कैसे फँसा देता है, यदि इसलिए नहीं कि परमेश्वर को यही उचित लगा? यहाँ सबसे वाचाल जीभों को मौन रहना होगा। मैं मानता हूँ कि यह ठहराव भयानक है; फिर भी इससे इनकार करना असम्भव है कि परमेश्वर ने मनुष्य को बनाने से पहले जान लिया था कि मनुष्य का अन्त क्या होगा, और उसने इसलिए पहले से जाना क्योंकि उसने अपने ठहराव से ऐसा ही नियत किया था। यदि कोई यहाँ परमेश्वर के पूर्वज्ञान पर बरसे, तो वह उतावली और अविचार से ऐसा करता है। क्योंकि भला स्वर्गीय न्यायी पर यह दोष क्यों लगाया जाए कि जो होनेवाला था वह उससे अनजान न था? इस प्रकार, यदि कोई न्यायसंगत या विश्वसनीय शिकायत है, तो वह पूर्वनियति के विरुद्ध ही होनी चाहिए। और जब मैं कहता हूँ कि परमेश्वर ने न केवल पहले मनुष्य का पतन और उसमें उसकी सन्तान का विनाश पहले से देखा, वरन अपनी इच्छा से उसे नियोजित भी किया, तो यह बेतुका नहीं लगना चाहिए। क्योंकि जैसे सब भावी घटनाओं को पहले से जानना उसकी बुद्धि का काम है, वैसे ही उन पर अपने हाथ से शासन और संचालन करना उसकी सामर्थ्य का काम है। यह प्रश्न भी, औरों की तरह, अगस्तीन ने कुशलता से समझाया है: “हम सबसे बड़े लाभ के साथ वह मान लें जिसे हम सबसे बड़े सत्य के साथ मानते हैं, कि सब वस्तुओं के परमेश्वर और प्रभु ने, जिसने सब कुछ बहुत अच्छा बनाया, यह पहले से जाना कि भलाई में से बुराई उठेगी, और यह भी जाना कि अपनी सर्वशक्तिमान भलाई के अनुसार बुराई में से भलाई निकालना उसके लिए बुराई के होने की अनुमति न देने से कहीं उचित है; और इस प्रकार उसने स्वर्गदूतों और मनुष्यों के जीवन को ऐसा ठहराया कि उसमें पहले यह दिखाया जाए कि स्वतंत्र इच्छा क्या कर सकती है, और दूसरे यह कि उसके अनुग्रह और उसके धर्ममय न्याय का लाभ क्या कर सकता है” (August. Enchir. ad Laurent)।

8. यहाँ वे इच्छा और अनुमति के भेद का सहारा लेते हैं, जिसका उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि दुष्ट केवल परमेश्वर की अनुमति से नाश होते हैं, उसकी इच्छा से नहीं। परन्तु हम क्यों कहते हैं कि वह अनुमति देता है, सिवाय इसके कि वह चाहता है? न ही स्वयं बात में कोई सम्भावना है, अर्थात् यह कि मनुष्य ने केवल अनुमति से मृत्यु अपने ऊपर ली, परमेश्वर के नियत किए जाने से नहीं; मानो परमेश्वर ने ठहराया ही न हो कि वह अपनी सृष्टि के प्रधान की दशा क्या चाहता है। इसलिए मैं अगस्तीन के साथ सीधे मान लेने में नहीं हिचकूँगा कि परमेश्वर की इच्छा ही अनिवार्यता है, और जो कुछ उसने चाहा है वह अनिवार्य है; जैसे वे बातें निश्चय होंगी जिन्हें उसने पहले से देखा है (August. de Gen. ad Lit., Lib. 6, cap. 15)। अब, यदि अपने और अधर्मियों के बचाव में पेलागियस के अनुयायी, या मनिकी, या पुनर्बपतिस्मावादी, या एपिकुरस के अनुयायी (क्योंकि इन्हीं चार सम्प्रदायों से हमें इस विषय पर विवाद करना है) उस अनिवार्यता की आपत्ति उठाएँ जिससे वे ईश्वरीय पूर्वनियति के परिणामस्वरूप विवश हैं, तो वे कुछ ऐसा नहीं करते जो विषय से सम्बन्ध रखता हो। क्योंकि यदि पूर्वनियति ईश्वरीय न्याय के प्रबन्ध के सिवाय और कुछ नहीं, गुप्त तो अवश्य, परन्तु निर्दोष, क्योंकि यह निश्चित है कि उस दशा के लिए पूर्वनियत लोग उसके अयोग्य न थे, तो यह भी उतना ही निश्चित है कि पूर्वनियति के परिणामस्वरूप होनेवाला विनाश भी अत्यन्त न्यायसंगत है। इसके अतिरिक्त, यद्यपि उनका विनाश परमेश्वर की पूर्वनियति पर निर्भर है, उसका कारण और विषय उनके ही भीतर है। पहला मनुष्य इसलिए गिरा कि प्रभु ने उचित समझा कि वह गिरे: उसने क्यों उचित समझा, यह हम नहीं जानते। फिर भी यह निश्चित है कि वह न्यायसंगत था, क्योंकि उसने देखा कि इससे उसकी अपनी महिमा प्रकट होगी। जब तुम परमेश्वर की महिमा का उल्लेख सुनो, तो समझ लो कि उसका न्याय उसमें सम्मिलित है। 503 देखिए कैल्विन, De Prædestinatione।

क्योंकि जो प्रशंसा के योग्य है वह न्यायसंगत होना चाहिए। इसलिए मनुष्य गिरता है, ईश्वरीय विधान के ऐसा ठहराने से, परन्तु वह अपने ही दोष से गिरता है। प्रभु ने कुछ ही पहले घोषित किया था कि जो कुछ उसने बनाया था वह बहुत अच्छा था (उत्पत्ति 1:31)। तब मनुष्य की वह भ्रष्टता कहाँ से आई जिसने उसे परमेश्वर से विद्रोह करवाया? ऐसा न समझा जाए कि वह उसकी सृष्टि से थी, इसलिए परमेश्वर ने उस सब का, जो उससे निकला था, स्पष्ट अनुमोदन किया था। इसलिए मनुष्य की अपनी ही दुष्टता ने उस शुद्ध स्वभाव को बिगाड़ दिया जो उसने परमेश्वर से पाया था, और उसके विनाश ने उसकी सारी सन्तान का विनाश साथ ला दिया। इसलिए आइए हम मानव स्वभाव की भ्रष्टता में दण्ड का वह स्पष्ट कारण देखें (ऐसा कारण जो हमारे अधिक निकट आता है), बजाय इसके कि परमेश्वर की पूर्वनियति में छिपे और लगभग अगम्य कारण की खोज करें। न ही हम परमेश्वर की असीम बुद्धि के आगे अपने निर्णय को इस सीमा तक झुकाने से कतराएँ कि स्वीकार करें कि वह उसके अनेक भेदों को समझने के लिए अपर्याप्त है। जिन बातों को हम जान नहीं सकते, या जिन्हें जानना उचित नहीं, उनका अज्ञान विद्या है, जबकि उन्हें जानने की लालसा एक प्रकार का उन्माद है।

9. कोई शायद कहे कि इस निन्दापूर्ण बहाने का खण्डन करने के लिए मैंने अभी पर्याप्त नहीं कहा। मैं मानता हूँ कि अधर्म को कुड़कुड़ाने और आपत्ति करने से रोकना असम्भव है; परन्तु मुझे लगता है कि मैंने न केवल आधार हटाने के लिए, वरन परमेश्वर पर दोष डालने के बहाने को भी हटाने के लिए पर्याप्त कहा है। त्यागे हुए लोग अपने पापों का यह कहकर बहाना बनाएँगे कि वे पाप करने की अनिवार्यता से बच नहीं सकते, विशेषकर इसलिए कि इस प्रकार की अनिवार्यता उन पर परमेश्वर के ठहराव से डाली गई है। हम इनकार करते हैं कि वे इस प्रकार वैध रीति से क्षम्य ठहराए जा सकते हैं, क्योंकि परमेश्वर का वह ठहराव, जिससे वे शिकायत करते हैं कि वे विनाश के लिए ठहराए गए हैं, न्याय के अनुकूल है,—एक ऐसा न्याय जो हमारे लिए अज्ञात है पर अत्यन्त निश्चित है। इसलिए हम निष्कर्ष निकालते हैं कि जो भी बुराई वे सहते हैं वह परमेश्वर के अत्यन्त धर्ममय न्याय से उन पर डाली गई है। आगे हमने दिखाया है कि जब वे अपने दण्ड का मूल खोजते हुए ईश्वरीय युक्ति के गुप्त कोनों की ओर देखते हैं और स्वभाव की भ्रष्टता की ओर, जो सच्चा स्रोत है, आँखें मूँद लेते हैं, तो वे उलटा करते हैं। वे इस भ्रष्टता का आरोप परमेश्वर पर नहीं लगा सकते, क्योंकि वह उसकी सृष्टि की भलाई की गवाही देता है। क्योंकि यद्यपि परमेश्वर के अनन्त विधान से मनुष्य उस विपत्ति के लिए रचा गया जिसके नीचे वह पड़ा है, उसने उसका विषय अपने ही में से लिया, परमेश्वर से नहीं, क्योंकि उसके विनाश का एकमात्र कारण यही था कि वह अपनी सृष्टि की शुद्धता से गिरकर दोष और अशुद्धता की दशा में पहुँच गया।

10. एक तीसरी बेतुकी बात है जिससे पूर्वनियति के विरोधी उसे बदनाम करते हैं। क्योंकि हम पूरी तरह ईश्वरीय इच्छा की युक्ति को ही कारण ठहराते हैं कि जिन्हें परमेश्वर अपने राज्य के वारिस होने के लिए लेपालक बनाता है, वे सामान्य विनाश से बचाए जाते हैं, इसलिए वे निष्कर्ष निकालते हैं कि वह मुँह देखकर पक्षपात करनेवाला है; परन्तु पवित्रशास्त्र इसे सदा नकारता है: और इसलिए या तो पवित्रशास्त्र अपने ही विरोध में है, या चुनाव में पुण्य का ध्यान रखा जाता है। पहले, पवित्रशास्त्र जिस अर्थ में घोषित करता है कि परमेश्वर मुँह देखकर पक्षपात करनेवाला नहीं, वह उनके मान लिए अर्थ से भिन्न है: क्योंकि मुँह शब्द का अर्थ मनुष्य नहीं, वरन वे बातें हैं जो मनुष्य में दिखाई देने पर या तो कृपा, अनुग्रह और प्रतिष्ठा दिलाती हैं, या इसके विपरीत घृणा, तिरस्कार और अपमान उत्पन्न करती हैं। इनमें एक ओर धन, सम्पत्ति, सामर्थ्य, पद, पदवी, देश, सुन्दरता आदि हैं; और दूसरी ओर निर्धनता, अभाव, नीच कुल, मलिनता, तिरस्कार और ऐसी ही बातें। इस प्रकार पतरस और पौलुस कहते हैं कि प्रभु मुँह देखकर पक्षपात करनेवाला नहीं, क्योंकि वह यहूदी और यूनानी में कोई भेद नहीं करता; केवल देश की परिस्थिति को एक को ठुकराने या दूसरे को अपनाने का आधार नहीं बनाता (प्रेरितों के काम 10:34; रोमियों 2:10, गलातियों 3:28)। इसी प्रकार याकूब भी वही शब्द प्रयोग करता है, जब वह घोषित करना चाहता है कि परमेश्वर अपने न्याय में धन का कोई लिहाज़ नहीं करता (याकूब 2:5)। पौलुस एक और स्थान पर भी कहता है कि न्याय करने में परमेश्वर दासत्व या स्वतंत्रता का कोई लिहाज़ नहीं करता (इफिसियों 6:9; कुलुस्सियों 3:25)। जब हम कहते हैं कि परमेश्वर अपनी इच्छा की सुइच्छा के अनुसार, पुण्य का कोई ध्यान रखे बिना, जिन्हें चाहता है उन्हें पुत्र होने के लिए चुनता है, और औरों को ठुकराता और त्यागता है, तो इसमें इस बात से कोई विरोध नहीं। अधिक सन्तोष के लिए विषय को इस प्रकार समझाया जा सकता है (देखिए August. Epist. 115, et ad Bonif., Lib. 2, cap. 7)। पूछा जाता है कि ऐसा कैसे होता है कि दो व्यक्तियों में, जिनके पुण्य में कोई भेद नहीं, परमेश्वर चुनाव में एक को लेपालक बनाता है और दूसरे को छोड़ देता है? मैं बदले में पूछता हूँ, क्या जिसे लेपालक बनाया गया उसमें कुछ ऐसा है जो परमेश्वर को उसकी ओर झुकाए? यदि मानना पड़े कि कुछ नहीं है, तो इससे यह निकलेगा कि परमेश्वर मनुष्य को नहीं देखता, वरन पूरी तरह अपनी ही भलाई से प्रेरित होकर उसका भला करता है। इसलिए जब परमेश्वर एक को चुनता और दूसरे को ठुकराता है, तो यह किसी व्यक्ति के लिहाज़ से नहीं, वरन पूरी तरह उसकी अपनी दया के कारण है, जो जब और जहाँ वह चाहे प्रकट होने और काम करने के लिए स्वतंत्र है। क्योंकि हम कहीं और देख चुके हैं कि शरीर के घमण्ड को नीचा करने के लिए, “शरीर के अनुसार न बहुत बुद्धिमान, न बहुत सामर्थी, न बहुत कुलीन बुलाए गए” (1 कुरिन्थियों 1:26); इसलिए अपनी कृपा के प्रयोग में परमेश्वर का किसी का मुँह देखकर पक्षपात करना तो दूर की बात है।

11. इसलिए परमेश्वर पर यह आरोप लगाना कि वह न्याय को असमान रूप से बाँटता है, क्योंकि इस पूर्वनियति में वह सब के साथ एक-सा व्यवहार नहीं करता, झूठ और अत्यन्त दुष्टता है। यदि (वे कहते हैं) वह सब को दोषी पाता है, तो सब को समान दण्ड दे: यदि वह उन्हें निर्दोष पाता है, तो सब को न्याय की कठोरता से मुक्त कर दे। परन्तु वे परमेश्वर से ऐसे विवाद करते हैं मानो या तो उसे दया दिखाने से रोक दिया गया हो, या दया दिखाने पर उसे न्याय को पूरी तरह छोड़ देने को बाध्य होना पड़े। वे क्या माँगते हैं? यह कि यदि सब दोषी हैं तो सब को वही दण्ड मिले। हम मानते हैं कि दोष सामान्य है, परन्तु हम कहते हैं कि परमेश्वर दया करके कुछ की सहायता करता है। वे कहते हैं, वह सब की सहायता करे। हम आपत्ति करते हैं कि उसके लिए उचित है कि दण्ड देकर दिखाए कि वह धर्मी न्यायी है। जब वे इसे सह नहीं सकते, तो वे और क्या यत्न कर रहे हैं सिवाय इसके कि परमेश्वर से दया दिखाने की सामर्थ्य छीन लें; या कम से कम उसे वह केवल इस शर्त पर दें कि वह न्याय को पूरी तरह छोड़ दे? यहाँ अगस्तीन के ये शब्द अत्यन्त उत्तम रीति से लागू होते हैं: “क्योंकि पहले मनुष्य में सारी मानव जाति दण्ड-आज्ञा के अधीन आ गई, इसलिए वे बरतन जो उसमें से आदर के लिए बनाए जाते हैं, अपनी धार्मिकता के बरतन नहीं, वरन ईश्वरीय दया के बरतन हैं। जब दूसरे बरतन अनादर के लिए बनाए जाते हैं, तो इसका आरोप अन्याय पर नहीं, वरन न्याय पर आना चाहिए,” (August. Epist. 106, De Prædest. et Gratia; De Bone Persever., cap. 12)। क्योंकि परमेश्वर जिन्हें त्यागता है उन पर उचित दण्ड देता है, और जिन्हें बुलाता है उन पर अनर्जित कृपा करता है, इसलिए वह हर आरोप से मुक्त है; जैसे महाजन का अधिकार है कि एक का ऋण क्षमा कर दे और दूसरे से वसूल करे। इसलिए प्रभु जिस पर चाहे कृपा कर सकता है, क्योंकि वह दयालु है; सब पर नहीं करता, क्योंकि वह धर्मी न्यायी है। कुछ को वह देकर जिसके वे योग्य नहीं, वह अपनी स्वतंत्र कृपा दिखाता है; सब को न देकर वह घोषित करता है कि सब किसके योग्य हैं। क्योंकि जब पौलुस कहता है, “परमेश्वर ने सब को अविश्वास में बन्द कर रखा, कि वह सब पर दया करे,” तो यह भी जोड़ा जाना चाहिए कि वह किसी का ऋणी नहीं; क्योंकि “किसने पहले उसे कुछ दिया है कि उसे उसका बदला दिया जाए?” (रोमियों 11:32, 33)।

12. पूर्वनियति को उलटने के लिए वे एक और तर्क देते हैं कि यदि वह टिकी रही, तो भले काम करने की सारी चिन्ता और यत्न समाप्त हो जाएगा। क्योंकि (वे कहते हैं) कौन मनुष्य यह सुन सकता है कि जीवन और मृत्यु परमेश्वर के अनन्त और अटल ठहराव से निश्चित हैं, और तुरन्त यह निष्कर्ष न निकाले कि उसके चलने का ढंग कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि उसका कोई कर्म परमेश्वर की पूर्वनियति को न रोक सकता है न बढ़ा सकता है? इस प्रकार सब दौड़ पड़ेंगे और हताश मनुष्यों के समान जहाँ वासना ले जाए वहाँ औंधे मुँह कूद पड़ेंगे। और यह सच है कि यह पूरी तरह कल्पना नहीं; क्योंकि सूअरों के स्वभाव के ऐसे अनगिनत लोग हैं जो अपनी अपवित्र निन्दाओं से पूर्वनियति के सिद्धान्त को दूषित करते हैं और उसे हर चेतावनी और फटकार से बच निकलने के लिए आड़ बनाते हैं। “परमेश्वर जानता है कि हमारे विषय में उसने क्या करना ठहराया है: यदि उसने हमारा उद्धार ठहराया है, तो वह अपने समय पर हमें उस तक पहुँचा देगा; यदि उसने हमें मृत्यु के लिए ठहराया है, तो उससे लड़ना हमारे लिए व्यर्थ है।” परन्तु पवित्रशास्त्र, जहाँ वह हमें इस उच्च रहस्य पर कहीं अधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ सोचने की आज्ञा देता है, वहाँ भक्तों को बहुत भिन्न शिक्षा देता है, और अधर्मियों की शापित स्वच्छन्दता को उचित रूप से दोषी ठहराता है। क्योंकि वह हमें पूर्वनियति इसलिए स्मरण नहीं कराता कि हमारी ढिठाई बढ़े, और हम अधर्मी दुस्साहस से परमेश्वर की अगम्य युक्तियों में झाँकने को ललचाएँ, वरन इसलिए कि हम नम्र और दीन हों, कि उसके न्याय से थरथराएँ और उसकी दया की ओर देखना सीखें। यही वह लक्ष्य है जिसकी ओर विश्वासी ध्यान लगाएँगे। इन गन्दे सूअरों की घुरघुराहट पौलुस के द्वारा उचित रूप से चुप कर दी गई है। वे कहते हैं कि वे दुर्गुणों में सुरक्षित अनुभव करते हैं, क्योंकि यदि वे चुने हुओं की गिनती में हैं तो उनके दुर्गुण अन्ततः जीवन पाने में बाधा न होंगे। परन्तु पौलुस हमें स्मरण कराता है कि जिस उद्देश्य से हम चुने गए हैं वह यह है, “कि हम उसके सामने पवित्र और निष्कलंक हों” (इफिसियों 1:4)। यदि चुनाव का उद्देश्य जीवन की पवित्रता है, तो उसे आलस्य का बहाना बनने के बदले हमें उसकी लालसा के लिए जोश से जगाना और उकसाना चाहिए। इन दोनों बातों में कितना भारी अन्तर है: एक यह कि भले काम करना इसलिए छोड़ दिया जाए कि चुनाव उद्धार के लिए पर्याप्त है, और दूसरी यह कि चुनाव का उद्देश्य ही यह है कि हम भले कामों के अध्ययन में अपने को लगा दें। इसलिए उन निन्दाओं को छोड़ो जो दुष्टता से चुनाव के पूरे क्रम को उलट देती हैं। जब वे अपनी निन्दाओं को और आगे बढ़ाते हैं, और कहते हैं कि जिसे परमेश्वर ने त्याग दिया है वह यदि निर्दोषता और जीवन की खराई से उसे प्रसन्न करने का यत्न करे तो उसका श्रम व्यर्थ जाएगा, तो वे अत्यन्त निर्लज्ज झूठ के दोषी ठहरते हैं। क्योंकि चुनाव के सिवाय ऐसा कोई यत्न कहाँ से उठ सकता है? जैसे त्यागे हुओं की गिनती में सब अनादर के लिए रचे गए बरतन हैं, वैसे ही वे अपने निरन्तर अपराधों से अपने विरुद्ध परमेश्वर का क्रोध भड़काने से नहीं रुकते, और उस दण्ड-आज्ञा के स्पष्ट चिह्न देते हैं जो परमेश्वर उन पर पहले ही सुना चुका है; इसलिए यह कहना कि वे उसके विरुद्ध व्यर्थ ही लड़ते हैं, सत्य से कितना दूर है।

13. इस सिद्धान्त के विरुद्ध एक और ढीठ और द्वेषपूर्ण निन्दा यह है कि वह भक्तिमय जीवन के सब प्रोत्साहनों को नष्ट कर देता है। जिस बड़ी बदनामी का पात्र अगस्तीन एक समय इस विषय में बना, उसे उसने वलेन्तीनस को लिखी अपनी पुस्तक De Correptione et Gratia में धो डाला, जिसे पढ़ने से भक्त और सीखने को तैयार लोग सहज ही सन्तुष्ट हो जाएँगे। फिर भी यहाँ मैं कुछ बातों को छू सकता हूँ, जो, मुझे आशा है, उनके लिए पर्याप्त होंगी जो सच्चे हैं और झगड़ालू नहीं। हम पहले देख चुके हैं कि पौलुस स्वतंत्र चुनाव के सिद्धान्त का कितनी स्पष्टता और ऊँचे स्वर से प्रचार करता है: तो क्या वह चेतावनी देने और समझाने में ठण्डा है? वे भले उत्साही लोग उसकी तीव्रता की अपनी तीव्रता से तुलना करें, और वे पाएँगे कि वे बर्फ़ हैं जबकि वह पूरा ताप है। और निश्चय ही इस विषय पर हर सन्देह उन सिद्धान्तों से दूर हो जाना चाहिए जो वह स्थापित करता है, कि परमेश्वर ने हमें अशुद्धता के लिए नहीं बुलाया; कि हर एक अपने बरतन को आदर में रखे; कि हम परमेश्वर की रचना हैं, “मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहले से तैयार किया कि हम उन पर चलें” (1 थिस्सलुनीकियों 4:4, 7; इफिसियों 2:10)। एक शब्द में, जिन्हें पौलुस के लेखों से थोड़ा भी ठीक-ठाक परिचय है, वे बिना लम्बे प्रमाण के समझ लेंगे कि वह उन दो बातों का कितनी अच्छी रीति से मेल कराता है जिन्हें वे लोग एक-दूसरे के विरोधी बताने का ढोंग करते हैं। मसीह हमें अपने ऊपर विश्वास करने की आज्ञा देता है, और फिर भी इस आज्ञा में कुछ झूठा या विपरीत नहीं है उस कथन में जो वह आगे कहता है: “कोई मेरे पास नहीं आ सकता जब तक पिता की ओर से उसे यह न दिया गया हो” (यूहन्ना 6:65)। इसलिए प्रचार को स्वतंत्र मार्ग मिले, कि वह मनुष्यों को विश्वास तक पहुँचाए और उन्हें अटूट प्रगति के साथ स्थिर रहने के लिए तैयार करे। और साथ ही पूर्वनियति के ज्ञान में कोई बाधा न हो, ताकि आज्ञा माननेवाले अपनी किसी बात पर इतराएँ नहीं, वरन केवल प्रभु में घमण्ड करें। हमारा उद्धारकर्ता बिना कारण नहीं कहता, “जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले” (मत्ती 13:9)। इसलिए जब हम समझाते और प्रचार करते हैं, तो जिनके कान हैं वे स्वेच्छा से मानते हैं: और जिनके कान नहीं हैं उनमें वह पूरा होता है जो लिखा है: “सुनते तो रहो परन्तु समझो नहीं” (यशायाह 6:9)। “परन्तु (अगस्तीन कहता है) कुछ के कान क्यों हैं और दूसरों के क्यों नहीं? प्रभु का मन किसने जाना है? तो क्या हम जो स्पष्ट है उससे इसलिए इनकार करें कि जो छिपा है उसे हम समझ नहीं सकते?” यह अगस्तीन से ली गई सच्ची उद्धरण है; परन्तु क्योंकि उसके शब्दों का शायद मेरे शब्दों से अधिक अधिकार होगा, आइए हम उसकी पुस्तक De Bone Persever., cap. 15 से यह अंश प्रस्तुत करें।

“यदि कुछ लोग यह सुनकर आलस्य और सुस्ती की ओर मुड़ जाएँ, और सारा परिश्रम छोड़कर वासना में औंधे मुँह कूद पड़ें, तो क्या हम इसलिए मान लें कि परमेश्वर के पूर्वज्ञान के विषय में जो कहा गया है वह सच नहीं? यदि परमेश्वर ने पहले से जाना कि वे भले होंगे, तो क्या वे भले न होंगे, उनकी वर्तमान दुष्टता कितनी ही बड़ी क्यों न हो? और यदि परमेश्वर ने पहले से जाना कि वे दुष्ट होंगे, तो क्या वे दुष्ट न होंगे, उनमें अब दिखाई देनेवाली भलाई कितनी ही बड़ी क्यों न हो? क्या इस प्रकार के कारणों से ईश्वरीय पूर्वज्ञान के विषय में बताए गए सत्य को नकार दिया जाए या उसका उल्लेख न किया जाए? और विशेषकर तब, जब उसे न बताने पर अन्य भ्रम उठ खड़े होंगे?” सोलहवें अध्याय में वह कहता है, “सत्य का उल्लेख न करने का कारण एक बात है, और सत्य बताने की आवश्यकता दूसरी। चुप रहने के सब कारणों की जाँच करना लम्बा होगा। फिर भी एक यह है कि कहीं ऐसा न हो कि जो नहीं समझते वे और बुरे हो जाएँ, जबकि हम उन्हें जो समझते हैं, अधिक सिखाना चाहते हैं। अब ऐसे लोग, जब हम इस प्रकार की कोई बात कहते हैं, अधिक शिक्षित तो नहीं होते, परन्तु बुरे भी नहीं होते। परन्तु जब सत्य ऐसा हो कि जो उसे समझ नहीं सकता वह हमारे बताने से बुरा हो जाता है, और जो उसे समझ सकता है वह हमारे न बताने से बुरा हो जाता है, तो तुम क्या सोचते हो कि हमें क्या करना चाहिए? क्या हम सत्य न बताएँ कि जो समझ सके वह समझ ले, इसके बदले कि न बताएँ और इस प्रकार न केवल दोनों को समझने से रोकें, वरन दोनों में से अधिक समझदार को भी बुरा बना दें, जबकि यदि वह सुनता और समझता तो उसके द्वारा दूसरे सीख सकते थे? और जो कुछ पवित्रशास्त्र की गवाही के अनुसार कहना उचित है, उसे कहने की हम इच्छा नहीं करते। क्योंकि हम डरते हैं कि हमारे बोलने से जो नहीं समझ सकता वह ठोकर खाए; परन्तु हम इस बात से नहीं डरते कि हमारे चुप रहने से जो सत्य को समझ सकता है वह झूठ में फँस जाए।” बीसवें अध्याय में, उसी दृष्टिकोण पर फिर दृष्टि डालते हुए, वह उसे और स्पष्ट रूप से पुष्ट करता है। “इसलिए यदि प्रेरितों और उनके बाद आए कलीसिया के शिक्षकों ने दोनों किया; यदि उन्होंने परमेश्वर के अनन्त चुनाव के विषय में भक्ति से बात की, और साथ ही विश्वासियों को भक्तिमय जीवन के अनुशासन में रखा, तो हमारे दिनों के वे लोग, जब सत्य के अजेय बल से घिर जाते हैं, कैसे सोचते हैं कि वे यह कहने में ठीक हैं कि पूर्वनियति के विषय में जो कहा गया है, यद्यपि वह सच है, लोगों में प्रचार नहीं किया जाना चाहिए? वरन उसका प्रचार अवश्य होना चाहिए, कि जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले। और कान किसके हैं यदि उसने उसी से नहीं पाए जिसने देने की प्रतिज्ञा की है? निश्चय ही, जो नहीं पाता वह ठुकरा दे। जो पाता है वह ले और पिए, पिए और जीए। क्योंकि जैसे भक्ति का प्रचार किया जाना चाहिए ताकि परमेश्वर की यथोचित आराधना हो; वैसे ही पूर्वनियति का भी प्रचार किया जाना चाहिए, ताकि जिसके सुनने के कान हों वह ईश्वरीय अनुग्रह के विषय में अपने में नहीं, वरन परमेश्वर में घमण्ड करे।”

14. फिर भी, क्योंकि उस पवित्र जन में शिक्षा देने की एक अनोखी लालसा थी, इसलिए वह अपनी शिक्षा की विधि को ऐसे ध्यान से नियमित करता है कि जहाँ तक उससे हो सके ठोकर का कारण न बने। क्योंकि वह हमें स्मरण कराता है कि जो बातें सचमुच सत्य हैं उन्हें उचित रीति से भी कहा जाना चाहिए। यदि कोई लोगों से इस प्रकार कहे: यदि तुम विश्वास नहीं करते, तो इसका कारण यह है कि परमेश्वर ने तुम्हें पहले ही विनाश के लिए ठहरा दिया है: तो वह न केवल आलस्य को प्रोत्साहन देगा, वरन दुष्टता को भी समर्थन देगा। यदि कोई यही भाव भविष्यत् काल में कहे, कि जो सुनते हैं वे विश्वास नहीं करेंगे क्योंकि वे त्यागे हुए हैं, तो वह शिक्षा के बदले श्राप होगा। इसलिए अगस्तीन ऐसे लोगों को, जो निर्बुद्धि शिक्षक या सेवक और अपशकुन के भविष्यद्वक्ता हैं, कलीसिया से हट जाने का आदेश देता है, और यह अनुचित नहीं। वह सचमुच कहीं और सच्चाई से तर्क देता है कि “मनुष्य को सुधार से तभी लाभ होता है जब वह जो जिन्हें चाहे बिना सुधार के भी लाभ पहुँचाता है, दया करे और सहायता दे। परन्तु कुछ के साथ ऐसा और दूसरों के साथ भिन्न क्यों है? हम पर यह कहना दूर रहे कि निर्णय करना मिट्टी का काम है, कुम्हार का नहीं।” वह आगे कहता है, “जब मनुष्य सुधार से धार्मिकता के मार्ग पर आते या लौटते हैं, तब उनके हृदयों में उद्धार का कार्य कौन करता है सिवाय उसके जो बढ़ाता है, चाहे लगानेवाला और सींचनेवाला कोई भी हो? जब वह बचाना चाहता है, तब मनुष्य में विरोध करने की कोई स्वतंत्र इच्छा नहीं। इसलिए इसमें सन्देह नहीं हो सकता कि परमेश्वर की इच्छा (जिसने स्वर्ग और पृथ्वी में जो कुछ चाहा वही किया, और जिसने वे बातें भी कीं जो होनेवाली हैं) का मानवीय इच्छा विरोध नहीं कर सकती, न वह उसे वह करने से रोक सकती है जो वह चाहता है, क्योंकि वह मनुष्यों की इच्छाओं के द्वारा ही ऐसा करता है।” फिर, “जब वह मनुष्यों को अपने पास लाना चाहता है, तो क्या वह उन्हें शारीरिक बेड़ियों से बाँधता है? वह भीतर से काम करता है, भीतर से थामता है, भीतर से उनके हृदयों को प्रेरित करता है, और उस इच्छा के द्वारा उन्हें खींचता है जो उसने उनमें उत्पन्न की है।” जो वह तुरन्त जोड़ता है उसे छोड़ना नहीं चाहिए: “क्योंकि हम नहीं जानते कि कौन पूर्वनियत लोगों की गिनती में है और कौन नहीं, इसलिए हमारी इच्छा यह होनी चाहिए कि सब का उद्धार हो; और इसलिए जो भी व्यक्ति हमें मिले, हम चाहेंगे कि वह हमारे साथ शान्ति का भागी हो। परन्तु हमारी शान्ति शान्ति के पुत्रों पर ठहरेगी। इसलिए हमारी ओर से सुधार का प्रयोग सब के लिए एक कड़वी परन्तु हितकारी औषधि के रूप में किया जाए, कि वे न नाश हों, न दूसरों को नाश करें। जिन्हें उसने पहले से जाना और पूर्वनियत किया है, उनके लिए इसे कारगर बनाना परमेश्वर का काम होगा।”

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