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सार
पिछली पुस्तकों में प्रेरितों के विश्वास-सूत्र के तीन भागों की व्याख्या दी गई है, जो सृष्टिकर्ता, छुड़ानेवाले और पवित्र करनेवाले परमेश्वर के विषय में हैं। अब इस अन्तिम पुस्तक में कलीसिया और पवित्र लोगों की सहभागिता का वर्णन करना शेष है, अर्थात् उन बाहरी साधनों या सहायताओं का, जिनके द्वारा परमेश्वर हमें मसीह की सहभागिता में बुलाता है और उसमें हमें बनाए रखता है।
इसके बीस अध्यायों को सुविधा से तीन विशेष शीर्षकों में समेटा जा सकता है—अर्थात् I. कलीसिया के विषय में। II. संस्कारों के विषय में। III. नागरिक शासन के विषय में।
पहला शीर्षक पहले तेरह अध्यायों में आता है; परन्तु इन सबको चार में समेटा जा सकता है—अर्थात् I. कलीसिया के चिह्नों के विषय में, या उन साधनों के विषय में जिनसे कलीसिया पहचानी जा सकती है, क्योंकि कलीसिया के साथ एकता बनाए रखना आवश्यक है। इस पर अध्याय 1 और 2 में विचार किया गया है—II. कलीसिया के नियम या शासन के विषय में। शासन की व्यवस्था, अध्याय 3। आदिम कलीसिया में प्रचलित रूप, अध्याय 4। पोप-तन्त्र में इस समय विद्यमान रूप, अध्याय 5। पोप की प्रधानता, अध्याय 6। उसके अनधिकार हड़पने का क्रमिक उदय, अध्याय 7—III. कलीसिया की सामर्थ्य के विषय में। शिक्षा के सम्बन्ध में सामर्थ्य, जैसी वह या तो व्यक्तियों में है, अध्याय 8; या महासभाओं में सार्वभौमिक रूप से, अध्याय 9। व्यवस्थाएँ बनाने की सामर्थ्य, अध्याय 10। कलीसियाई अधिकार-क्षेत्र का विस्तार, अध्याय 11—IV. कलीसिया के अनुशासन के विषय में। अनुशासन का मुख्य उपयोग, अध्याय 12। उसका दुरुपयोग, अध्याय 13।
दूसरा सामान्य शीर्षक, संस्कारों के विषय में, तीन विशेष बातों को समाविष्ट करता है—I. सामान्य रूप से संस्कारों के विषय में, अध्याय 14—II. विशेष रूप से दो संस्कारों के विषय में। बपतिस्मा के विषय में, अध्याय 15। शिशु बपतिस्मा के विषय में, अध्याय 16। प्रभु-भोज के विषय में, अध्याय 17। प्रभु-भोज को अपवित्र करने के विषय में, अध्याय 18। झूठे नाम से कहे जानेवाले पाँच संस्कारों के विषय में, अध्याय 19।
तीसरा सामान्य शीर्षक, नागरिक शासन के विषय में। इस पर पहले सामान्य रूप से और फिर न्यायियों, व्यवस्थाओं और प्रजा के अलग-अलग शीर्षकों के अन्तर्गत विचार किया गया है।
