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सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर तक पहुँचने में मार्गदर्शक और शिक्षक के रूप में पवित्रशास्त्र की आवश्यकता
अध्याय 6।
सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर तक पहुँचने में मार्गदर्शक और शिक्षक के रूप में पवित्रशास्त्र की आवश्यकता।
खण्ड।
1. परमेश्वर अपने चुने हुओं को अपने ज्ञान के लिए एक उत्तम सहायता देता है—अर्थात् पवित्रशास्त्र। यह उसने आरम्भ से ही किया।
2. पहले, दर्शनों और ईश्वरीय वाणियों तथा कुलपतियों की सेवकाई के द्वारा। दूसरे, व्यवस्था के प्रकाशन और भविष्यद्वक्ताओं के प्रचार के द्वारा।
धर्म की शिक्षाएँ क्यों लिखित रूप में सौंपी गईं।
3. इस मत की पुष्टि: 1. हमारे स्वभाव की भ्रष्टता से, जिसके कारण परमेश्वर को जानने की इच्छा रखनेवाले प्रत्येक जन के लिए वचन की शरण लेना आवश्यक है; 2. भजन संहिता के उन अंशों से जिनमें परमेश्वर को राज्य करता हुआ दिखाया गया है।
4. भजन संहिता के कुछ सीधे कथनों से एक और पुष्टि। अन्त में, हमारे उद्धारकर्ता के वचनों से।
1. इसलिए, यद्यपि वह तेज जो आकाश और पृथ्वी में हर आँख के सामने प्रस्तुत है, मनुष्य की कृतघ्नता को निरुत्तर छोड़ देता है—क्योंकि परमेश्वर ने समस्त मानव-जाति को एक ही दण्ड के अधीन लाने के लिए अपने कामों में अपने ईश्वरत्व का दर्पण बिना किसी भेद के सब के सामने रख दिया है—फिर भी हमें सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर तक ठीक रीति से पहुँचाने के लिए एक और उत्तम सहायता दी जानी आवश्यक थी। इसलिए उसने व्यर्थ ही अपने वचन का प्रकाश नहीं जोड़ा, कि वह उद्धार के लिए अपने आप को प्रकट करे, और यह अधिकार उन्हें दिया जिन्हें उसने अपने निकट और अधिक घनिष्ठ सम्बन्ध में लाना चाहा। क्योंकि जब उसने देखा कि मनुष्यों के मन इधर-उधर भटकते हैं और कहीं कोई निश्चित विश्रामस्थान नहीं पाते, तब उसने यहूदियों को अपनी विशेष प्रजा चुना, और फिर उन्हें घेर कर सुरक्षित रखा कि वे औरों के समान भटक न जाएँ। और उसी उपाय से वह हमें भी अपने ज्ञान में थामे रखता है, यह व्यर्थ नहीं है; क्योंकि इसके बिना वे भी, जो औरों की तुलना में दृढ़ खड़े दिखाई देते हैं, शीघ्र ही गिर पड़ते। जैसे वृद्ध लोग, या जिनकी दृष्टि कमज़ोर है, उनके सामने कोई कितनी ही सुन्दर पुस्तक रखी जाए, तो वे देखते तो हैं कि कुछ लिखा है, पर लगातार दो शब्द भी कठिनाई से पढ़ पाते हैं; परन्तु चश्मे की सहायता से स्पष्ट पढ़ने लगते हैं; वैसे ही पवित्रशास्त्र, ईश्वरत्व के उन चिह्नों को, जो अब तक हमारे मन में अस्पष्ट पड़े थे, एकत्र करके अन्धकार को दूर कर देता है और सच्चे परमेश्वर को हमें स्पष्ट दिखाता है। इसलिए परमेश्वर एक अनुपम वरदान देता है जब वह कलीसिया की शिक्षा के लिए केवल मूक शिक्षकों को ही नहीं लगाता, वरन् अपना पवित्र मुख भी खोलता है; जब वह केवल यही घोषणा नहीं करता कि किसी परमेश्वर की उपासना करनी चाहिए, वरन् साथ ही यह भी बताता है कि वही वह परमेश्वर है जिसकी उपासना होनी चाहिए; जब वह अपने चुने हुओं को केवल परमेश्वर का आदर करना ही नहीं सिखाता, वरन् अपने आप को उस परमेश्वर के रूप में प्रकट करता है जिसका यह आदर होना चाहिए। परमेश्वर ने आरम्भ से ही अपनी कलीसिया के साथ यही मार्ग अपनाया कि इन साधारण प्रमाणों के साथ अपना वचन भी जोड़ दे, जो अपने आप को प्रकट करने का अधिक निश्चित और सीधा साधन है। और इसमें कोई सन्देह नहीं कि इसी सहायता से आदम, नूह, अब्राहम और अन्य कुलपतियों ने वह घनिष्ठ ज्ञान पाया जो एक प्रकार से उन्हें अविश्वासियों से अलग करता था। मैं अभी विश्वास की उन विशेष शिक्षाओं की बात नहीं कर रहा जिनके द्वारा वे अनन्त आनन्द की आशा तक उठाए गए थे। मृत्यु से जीवन में पार होने के लिए आवश्यक था कि वे परमेश्वर को केवल सृष्टिकर्ता के रूप में ही नहीं, वरन् छुड़ानेवाले के रूप में भी जानें; और ये दोनों प्रकार के ज्ञान उन्होंने निश्चय ही वचन से पाए। परन्तु क्रम की दृष्टि से, पहले वही ज्ञान दिया गया जिससे वे उस परमेश्वर से परिचित हुए जिसने जगत को बनाया और जो उसका शासन करता है। इस प्रथम ज्ञान में बाद में वह अधिक घनिष्ठ ज्ञान जोड़ा गया जो अकेला मरी हुई आत्माओं को जिलाता है, और जिससे परमेश्वर केवल जगतों के सृष्टिकर्ता और सब घटनाओं के एकमात्र कर्ता और संचालक के रूप में ही नहीं, वरन् मध्यस्थ के व्यक्तित्व में छुड़ानेवाले के रूप में भी जाना जाता है। परन्तु क्योंकि पतन और स्वभाव की भ्रष्टता पर अभी विचार नहीं हुआ है, इसलिए मैं उपचार पर विचार को अभी स्थगित रखता हूँ (इसके लिए देखें पुस्तक 2 अध्याय 6 आदि)। पाठक स्मरण रखे कि मैं अभी उस वाचा की चर्चा नहीं कर रहा जिससे परमेश्वर ने अब्राहम की सन्तान को गोद लिया, और न शिक्षा की उस शाखा की, जिससे, मसीह में स्थापित होने के कारण, विश्वासी सब युगों में अपवित्र अन्यजातियों से, ठीक अर्थ में, अलग किए गए हैं। मैं केवल यह दिखा रहा हूँ कि जगत के सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर को कल्पित देवताओं की सारी भीड़ से अलग करनेवाले निश्चित चिह्नों को जानने के लिए पवित्रशास्त्र की शरण लेना आवश्यक है। छुटकारे के कार्य पर हम आगे यथासमय विचार करेंगे। इस बीच, यद्यपि हम नए नियम से बहुत-से अंश, और व्यवस्था तथा भविष्यद्वक्ताओं से भी कुछ अंश प्रस्तुत करेंगे जिनमें मसीह का स्पष्ट उल्लेख है, तथापि हमारा एकमात्र उद्देश्य यह दिखाना होगा कि जगत का रचयिता परमेश्वर पवित्रशास्त्र में हम पर प्रकट होता है और उसका सच्चा स्वरूप समझाया गया है, ताकि हम किसी सन्देहास्पद देवता की खोज में भूलभुलैया की भाँति इधर-उधर भटकने से बच जाएँ।
2. चाहे परमेश्वर ने पूर्वजों पर अपने आप को दिव्य वाणियों और दर्शनों के द्वारा प्रकट किया हो,68 या मनुष्यों के साधन और सेवकाई के द्वारा उन्हें सुझाया हो कि उन्हें आनेवाली पीढ़ियों को क्या सौंपना है, इसमें कोई सन्देह नहीं कि जो कुछ उसने उन्हें सिखाया उसकी निश्चयता उनके हृदयों पर दृढ़ता से खुदी हुई थी, ऐसी कि उन्हें निश्चय था और वे जानते थे कि जो बातें उन्होंने सीखीं वे परमेश्वर की ओर से आई हैं, जो अपने वचन के साथ सदा ऐसी निश्चित गवाही देता था जो मात्र मत से अनन्त गुणा श्रेष्ठ थी। अन्त में, इसलिए कि जब शिक्षा निरन्तर बढ़ती जाए, तब भी उसका सत्य सब युगों में जगत में बना रहे, उसकी यह इच्छा हुई कि जो वाणियाँ उसने पूर्वजों को सौंपी थीं, वही मानो सार्वजनिक अभिलेखों में लिख दी जाएँ। इसी उद्देश्य से व्यवस्था प्रकाशित की गई, और बाद में भविष्यद्वक्ता उसके व्याख्याकार होकर जोड़े गए। क्योंकि यद्यपि व्यवस्था के उपयोग अनेक थे (पुस्तक 2 अध्याय 7 और 8), और मूसा तथा सब भविष्यद्वक्ताओं को सौंपा गया विशेष कार्य परमेश्वर और मनुष्य के बीच मेल-मिलाप की रीति सिखाना था (इसीलिए पौलुस मसीह को “व्यवस्था का अन्त” कहता है, रोमियों 10:4); तो भी मैं दोहराता हूँ कि विश्वास और पश्चाताप की उस उचित शिक्षा के अतिरिक्त, जिसमें मसीह मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत किया गया है, पवित्रशास्त्र कुछ चिह्नों और लक्षणों का प्रयोग करता है ताकि जगत के सृष्टिकर्ता और शासक के रूप में माने जानेवाले एकमात्र बुद्धिमान और सच्चे परमेश्वर को अलग पहचाना जाए, और इस प्रकार उसे झूठे देवताओं की भीड़ के साथ मिला दिए जाने से बचाया जाए। इसलिए यद्यपि मनुष्य को परमेश्वर के कामों को देखने में गम्भीरता से अपनी आँखें लगानी चाहिए, क्योंकि उसे इस परम महिमामय रंगमंच में स्थान दिया गया है कि वह उनका दर्शक हो, तथापि उसका विशेष कर्तव्य है कि वह वचन पर कान लगाए, ताकि अधिक लाभ उठा सके।69 इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि जो अन्धकार में जन्मे हैं वे अपनी जड़ता में और अधिक कठोर होते जाते हैं; क्योंकि अधिकतर लोग वचन को नम्रता से सुनकर उचित सीमा में रहने के बजाय अपनी ही व्यर्थता में मगन रहते हैं। यदि सच्चा धर्म हम पर चमकना है, तो हमारा सिद्धान्त यह होना चाहिए कि स्वर्गीय शिक्षा से आरम्भ करना आवश्यक है, और यह किसी मनुष्य के लिए असम्भव है कि वह पवित्रशास्त्र का शिष्य हुए बिना खरी और सही शिक्षा का छोटे-से-छोटा अंश भी पा सके। इसलिए सच्चे ज्ञान का पहला कदम तब उठता है जब हम श्रद्धा से उस गवाही को ग्रहण करते हैं जो परमेश्वर ने उसमें अपने विषय में देनी चाही है। क्योंकि केवल विश्वास—पूर्ण और सिद्ध विश्वास—ही नहीं, वरन् परमेश्वर का सब सही ज्ञान आज्ञाकारिता से उत्पन्न होता है। और निश्चय ही इस विषय में परमेश्वर ने अनुपम विधान से सब युगों में मनुष्य-जाति के लिए प्रबन्ध किया है।
68 फ्रांसीसी संस्करण जोड़ता है, “C’est à dire, temoignages celestes”—अर्थात् स्वर्ग से सन्देश।
69 देखें टर्टुलियन की पुस्तक Apologet. adv. Gentes, जहाँ वह लिखता है: “Quae plenius et impressius tam ipsum quam dispositiones ejus et voluntates adiremus, instrumentum adjecit literature,” इत्यादि।
3. क्योंकि यदि हम विचार करें कि मानव मन परमेश्वर को भूल जाने में कितना प्रवृत्त है, हर प्रकार की भूल की ओर कितना सरलता से झुकता है, और समय-समय पर नए और कल्पित धर्म गढ़ने पर कितना तुला रहता है, तो यह समझना सरल होगा कि शिक्षा का ऐसा भण्डार बनाना कितना आवश्यक था जो उसे उपेक्षा से नष्ट होने, भूलों में विलीन होने, या मनुष्यों के ढीठ दुस्साहस से बिगाड़े जाने से बचाए। जब यह प्रकट है कि परमेश्वर ने, यह पहले से देखकर कि सृष्टि के सुन्दर रूप पर अंकित उसका स्वरूप अपर्याप्त है, उन सब को जिन्हें उसने कभी प्रभावी रीति से शिक्षा देनी चाही अपने वचन की सहायता दी है, तो हमें भी यही सीधा मार्ग अपनाना चाहिए, यदि हम परमेश्वर के सच्चे चिन्तन की सचमुच अभिलाषा रखते हैं;—मैं कहता हूँ, हमें वचन के पास जाना चाहिए, जहाँ उसके कामों से लिया गया परमेश्वर का स्वरूप यथार्थ और जीवन्त रूप में वर्णित है; और इन कामों का मूल्यांकन हमारे बिगड़े हुए निर्णय से नहीं, वरन् अनन्त सत्य के मानक से होता है। यदि, जैसा मैंने अभी कहा, हम उससे हट जाएँ, तो हम चाहे कितनी ही गति से चलें, लक्ष्य तक कभी न पहुँचेंगे, क्योंकि हम मार्ग से बाहर हैं। हमें विचार करना चाहिए कि ईश्वरीय मुख का वह तेज, जिसे एक प्रेरित भी अगम्य कहता है (1 तीमुथियुस 6:16), एक प्रकार की भूलभुलैया है—हमारे लिए ऐसी भूलभुलैया जिससे निकलना असम्भव है, यदि वचन हमारे मार्ग को दिखानेवाले धागे का काम न करे; और यह कि मार्ग में लँगड़ाकर चलना उससे बाहर बड़ी से बड़ी तेज़ी से दौड़ने से उत्तम है। इसी कारण भजनकार, बार-बार यह घोषणा करने के बाद (भजन संहिता 93, 96, 97, 99, आदि) कि जगत से अन्धविश्वास दूर किया जाना चाहिए ताकि शुद्ध धर्म फले-फूले, परमेश्वर को राज्य करता हुआ प्रस्तुत करता है; इस शब्द से उसका अभिप्राय उस सामर्थ्य से नहीं है जो उसके पास है और जिसे वह समस्त प्रकृति के शासन में चलाता है, वरन् उस शिक्षा से है जिसके द्वारा वह अपनी उचित प्रभुता बनाए रखता है: क्योंकि भूल मनुष्य के हृदय से तब तक कभी नहीं मिटाई जा सकती जब तक उसमें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान रोपा न जाए।
4. इसी प्रकार वही भविष्यद्वक्ता, यह उल्लेख करने के बाद कि आकाश परमेश्वर की महिमा का वर्णन करता है, आकाशमण्डल उसके हाथों का काम प्रकट करता है, और दिन-रात का नियमित क्रम उसकी महिमा की घोषणा करता है, वचन की चर्चा करने लगता है:—“यहोवा की व्यवस्था खरी है,” वह कहता है, “वह प्राण को बहाल करती है; यहोवा की साक्षी विश्वासयोग्य है, वह भोलों को बुद्धिमान बनाती है। यहोवा के उपदेश सीधे हैं, वे हृदय को आनन्दित करते हैं; यहोवा की आज्ञा निर्मल है, वह आँखों में ज्योति ले आती है,” (भजन संहिता 19:1-9)। क्योंकि यद्यपि व्यवस्था के और भी उपयोग हैं (इसके लिए देखें पुस्तक 2 अध्याय 7, खण्ड 6, 10, 12), तथापि सामान्य अर्थ यह है कि वही परमेश्वर की सन्तान को प्रशिक्षित करने की उचित पाठशाला है; सब जातियों को आकाश और पृथ्वी में उसे देखने का जो बुलावा दिया गया है, वह निष्फल सिद्ध होता है। यही दृष्टिकोण 29वें भजन में भी लिया गया है, जहाँ भजनकार परमेश्वर की उस भयानक वाणी का वर्णन करता है जो मेघगर्जन, आँधी, वर्षा, बवण्डर और तूफ़ान में पृथ्वी को हिला देती है, पहाड़ों को कँपा देती है और देवदारों को तोड़ डालती है, और अन्त में कहता है, “उसके मन्दिर में हर एक जन उसकी महिमा का वर्णन करता है”; क्योंकि जब परमेश्वर के सब शब्द आकाश में गूँजते हैं, तब अविश्वासी उनके प्रति बहरे रहते हैं। इसी प्रकार एक और भजन, समुद्र की उफनती लहरों का वर्णन करने के बाद, यों समाप्त करता है, “तेरी चितौनियाँ अति विश्वासयोग्य हैं; हे यहोवा, पवित्रता तेरे भवन को सदा शोभा देती है,” (भजन संहिता 93:5)। यही आशय हमारे उद्धारकर्ता के उन शब्दों का भी है जो उसने सामरी स्त्री से कहे, जब उसने बताया कि उसकी जाति और अन्य सब जातियाँ वह उपासना करती हैं जिसे वे नहीं जानतीं, और केवल यहूदी ही सच्चे परमेश्वर की उपासना करते हैं (यूहन्ना 4:22)।
चूँकि मानव मन अपनी दुर्बलता के कारण परमेश्वर के पवित्र वचन की सहायता और टेक के बिना उसके पास आने में सर्वथा असमर्थ था, इसलिए अनिवार्य निष्कर्ष यह निकला कि यहूदियों को छोड़कर समस्त मनुष्य-जाति, क्योंकि वह वचन के बिना परमेश्वर को खोजती थी, व्यर्थता और भूल में भटक रही थी।
