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विश्वास के विषय में: उसकी परिभाषा और उसके विशेष गुण (भाग 1/3)
अध्याय 2।
विश्वास के विषय में: उसकी परिभाषा और उसके विशेष गुण।
इस अध्याय के तीन मुख्य भाग हैं।—I. विश्वास के सिद्धान्त से सम्बन्ध रखनेवाली कुछ बातों की संक्षिप्त व्याख्या, खण्ड 1-14। पहला, विश्वास का विषय, खण्ड 1। दूसरा, निहित विश्वास, खण्ड 2-6। तीसरा, विश्वास की परिभाषा, खण्ड 7। चौथा, “विश्वास” शब्द के नाना अर्थ, खण्ड 8-13। II. सातवें खण्ड में दी गई परिभाषा की पूर्ण व्याख्या, खण्ड 14-40। III. एक प्रेरित के अधिकार से इस परिभाषा की संक्षिप्त पुष्टि। विश्वास, आशा और प्रेम का पारस्परिक सम्बन्ध, खण्ड 41-43।
खण्ड।
276 फ्रेंच में यह और जुड़ा है: “qui vaut autant a dire comme la predication ayant avec soy vivacité spirituelle;”—अर्थात् ऐसा प्रचार जो अपने साथ आत्मिक जीवनदायी सामर्थ्य लिए हुए हो।
1. सम्पूर्ण विवेचन के मुख्य बिन्दुओं का संक्षिप्त पुनःस्मरण। इस अध्याय का उद्देश्य। विश्वास के सिद्धान्त की आवश्यकता। विद्वत्तावादियों ने इस सिद्धान्त को धुँधला कर दिया है; वे मसीह का उल्लेख किए बिना परमेश्वर को विश्वास का विषय ठहराते हैं। विद्वत्तावादियों का विभिन्न मार्गों से खण्डन।
2. निहित विश्वास के मत का खण्डन। यह विश्वास को नष्ट कर देता है, जो परमेश्वर की इच्छा के ज्ञान में स्थित है। यह इच्छा क्या है और उसका ज्ञान कितना आवश्यक है।
3. बहुत-सी बातों को निहित रूप से माना जाता है और माना जाता रहेगा। फिर भी विश्वास परमेश्वर और मसीह के ज्ञान में स्थित है, कलीसिया के प्रति श्रद्धा में नहीं। इस मत से उत्पन्न होनेवाली असंगतियों के द्वारा एक और खण्डन।
4. किस अर्थ में हमारे विश्वास को निहित कहा जा सकता है। प्रेरितों में, पवित्र स्त्रियों में और सब विश्वासियों में इसके उदाहरण।
5. कुछ लोगों में विश्वास निहित होता है, क्योंकि वह विश्वास की एक तैयारी मात्र है। परन्तु यह विद्वत्तावादियों के निहित विश्वास से बहुत भिन्न है।
6. परमेश्वर के वचन का विश्वास से वैसा ही सम्बन्ध है, क्योंकि वचन मानो विश्वास का स्रोत और आधार है, और वह दर्पण है जिसमें वह परमेश्वर को देखता है। पवित्रशास्त्र के अनेक अंशों से पुष्टि। वचन के ज्ञान के बिना विश्वास हो ही नहीं सकता। निहित विश्वास के विद्वत्तावादी सिद्धान्त पर विवेचन का सार।
7. परमेश्वर के वचन में विश्वास का सही लक्ष्य क्या है, अर्थात् मसीह में दिए गए अनुग्रह की वह प्रतिज्ञा, जिसे विश्वास के साथ ग्रहण किया जाए। विश्वास की यथार्थ परिभाषा।
8. रूपित और अरूपित विश्वास का विद्वत्तावादी भेद, विश्वास के स्वभाव पर विचार करके, खण्डित किया गया है; क्योंकि वह आत्मा का दान होने के कारण भक्तिपूर्ण भावना से अलग हो ही नहीं सकता।
9. पौलुस के एक अंश से आपत्ति। उसका उत्तर। विश्वास के केवल एक ही अर्थ मानने में विद्वत्तावादियों की भूल, जबकि उसके अनेक अर्थ हैं। विश्वास की गवाही का दो प्रकार के लोगों पर अनुचित रूप से आरोपित किया जाना।
10. इस विषय को किस दृष्टि से देखा जाए। जो थोड़े समय के लिए विश्वास करते हैं वे कौन हैं। कपटियों का विश्वास। उनकी तुलना किससे की जा सकती है।
11. त्यागे हुओं को विश्वास क्यों दिया हुआ कहा जाता है। आपत्ति। उत्तर। त्यागे हुओं में अनुग्रह का बोध कैसा होता है। चुने हुए लोग त्यागे हुओं से कैसे अलग किए जाते हैं।
12. त्यागे हुओं में विश्वास क्षणिक, और चुने हुओं में दृढ़ और स्थायी क्यों होता है। त्यागे हुओं के विषय में कारण। उदाहरण। परमेश्वर अपनी सन्तानों से क्यों क्रोधित होता है। किस अर्थ में कहा जाता है कि बहुत-से लोग विश्वास से गिर जाते हैं।
13. “विश्वास” शब्द के नाना अर्थ। 1. विश्वास की खराई के अर्थ में। 2. कभी किसी विशेष विषय तक सीमित। 3. उस सेवकाई या गवाही का सूचक जिसके द्वारा हमें विश्वास की शिक्षा दी जाती है।
14. विश्वास की परिभाषा की छह मुख्य बातों के अधीन व्याख्या। 1. परिभाषा में ज्ञान से क्या अभिप्राय है।
15. यह ज्ञान निश्चित और दृढ़ क्यों होना चाहिए। हमारी निर्बलता पर विचार से तर्क। परमेश्वर की प्रतिज्ञाओं की निश्चयता से एक और कारण।
16. इस निश्चयता का मुख्य बिन्दु। उसके फल। सच्चे विश्वासी का वर्णन।
17. इस निश्चयता पर आपत्ति। उत्तर। दाऊद के उदाहरण से उत्तर की पुष्टि। इसका विस्तार, विपरीत उदाहरण अहाब से। साथ ही विश्वासियों के सामान्य अनुभव और प्रार्थनाओं से।
18. इसी कारण विश्वासी की आत्मा में शरीर और आत्मा के बीच के संघर्ष का वर्णन। इस संघर्ष का परिणाम, विश्वास की विजय।
19. सब बातों को देखते हुए, चुने हुओं का विश्वास निश्चित और सन्देह से परे है। सादृश्य से पुष्टि।
20. एक प्रेरित की गवाही से एक और पुष्टि, जिससे प्रकट होता है कि यद्यपि चुने हुओं का विश्वास अभी अपूर्ण है, तथापि वह दृढ़ और निश्चित है।
21. विश्वास के स्वभाव की और पूर्ण व्याख्या। 1. जब विश्वासी भय से हिल जाता है तब वह दयालु परमेश्वर की गोद में शरण लेता है। 2. वह क्रोधित परमेश्वर से भी नहीं भागता, परन्तु उसी पर आशा रखता है। 3. वह अविश्वास को अपने हृदय में राज्य नहीं करने देता। 4. वह अविश्वास का सामना करता है और अन्त में कभी नष्ट नहीं होता। 5. विश्वास पर चाहे कितनी ही बार आक्रमण हो, अन्त में वह विजयी ही निकलता है।
22. भय का एक और प्रकार, जो दुष्टों पर परमेश्वर के न्याय पर विचार से उत्पन्न होता है। इसे भी विश्वास जीत लेता है। इस प्रकार के उदाहरण, जो विश्वासियों की आँखों के सामने रखे गए हैं, ढिठाई को रोकते हैं और उनके विश्वास को परमेश्वर में स्थिर करते हैं।
23. प्रेरित की इस आज्ञा में कि हम भय और काँपते हुए अपने उद्धार का कार्य पूरा करें, इसके विरुद्ध कुछ नहीं है। भय और विश्वास का परस्पर सम्बन्ध। एक भविष्यद्वक्ता के शब्दों से पुष्टि।
24. यह शिक्षा उन लोगों की भूल को कोई सहारा नहीं देती जो अविश्वास से मिले हुए भरोसे के सपने देखते हैं। हममें बसे मसीह की महिमा पर विचार से इस भूल का खण्डन। तर्क को उन्हीं पर लौटाना। प्रेरित के अधिकार से खण्डन की पुष्टि। इस प्रश्न पर हमें क्या मानना चाहिए।
25. बर्नार्ड के एक अंश से पिछले निष्कर्ष की पुष्टि।
26. सच्चा भय दो प्रकार से उत्पन्न होता है, अर्थात् जब हमें परमेश्वर का पिता के रूप में आदर करने और साथ ही उसका प्रभु के रूप में भय मानने को कहा जाता है।
27. प्रेरित यूहन्ना के एक अंश से आपत्ति। सन्तानोचित और दासोचित भय के भेद पर आधारित उत्तर।
28. विश्वास को परमेश्वर की भली इच्छा से सम्बन्धित कैसे कहा जाता है। इस भली इच्छा में क्या-क्या सम्मिलित है। दाऊद और पौलुस से पुष्टि।
29. उस सेंतमेंत की प्रतिज्ञा के विषय में जो विश्वास की नींव है। कारण। पुष्टि।
30. सुसमाचार में सेंतमेंत की प्रतिज्ञा खोजने से विश्वास बँटता नहीं। कारण। एक और कारण से निष्कर्ष की पुष्टि।
31. परमेश्वर का वचन विश्वास का आधार और जड़ है। वचन परमेश्वर की भलाई और दया की गवाही देता है। किस अर्थ में विश्वास का सम्बन्ध परमेश्वर की सामर्थ्य से है। यशायाह के कई अंश, जो भक्तों को परमेश्वर की सामर्थ्य देखने के लिए बुलाते हैं, समझाए गए हैं। दाऊद के अन्य अंश। हमें वचन की निर्धारित सीमाओं से आगे जाने से सावधान रहना चाहिए, ऐसा न हो कि झूठा उत्साह हमें भटका दे, जैसा उसने सारा, रिबका और इसहाक को भटकाया। इस प्रकार विश्वास धुँधला पड़ जाता है, यद्यपि बुझता नहीं। हमें परमेश्वर के वचन से एक मात्रा भर भी हटना नहीं चाहिए।
32. सब प्रतिज्ञाएँ मसीह में समाई हुई हैं। दो आपत्तियों का उत्तर। उदाहरण से तीसरी आपत्ति। नामान, कुरनेलियुस और खोजे के विश्वास की व्याख्या करते हुए उत्तर।
33. विश्वास पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे मन पर प्रकट किया और हमारे हृदयों पर मुहर किया जाता है। 1. मन शुद्ध किया जाता है कि उसे ईश्वरीय सत्य का स्वाद आए। 2. इस प्रकार पवित्र आत्मा के कार्य से मन सत्य में स्थिर किया जाता है।
34. पहली बात का प्रमाण। 1. तर्क से। 2. पवित्रशास्त्र से। 3. उदाहरण से। 4. सादृश्य से।
35. 5. विश्वास के उत्तम गुणों से। 6. अगस्तीन के एक प्रसिद्ध अंश से।
36. दूसरी बात का प्रमाण a minore ad majus के तर्क से। आत्मा को मुहर, बयाना और प्रतिज्ञा का आत्मा क्यों कहा गया है।
37. विश्वासी कभी-कभी हिल जाते हैं, परन्तु इस प्रकार नहीं कि अन्त में नष्ट हो जाएँ। वे अन्त में अपनी परीक्षाओं पर जयवन्त होते और स्थिर बने रहते हैं। पवित्रशास्त्र से प्रमाण।
38. विद्वत्तावादियों की आपत्ति। उत्तर। सभोपदेशक के एक अंश से आपत्ति को सहारा देने का प्रयत्न। उस अंश का अर्थ समझाते हुए उत्तर।
39. एक और आपत्ति, जो मसीह में चुने हुओं पर उतावलेपन और ढिठाई का दोष लगाती है। उत्तर। प्रेरित पौलुस के विभिन्न अंशों से, और यूहन्ना तथा यशायाह से भी, उत्तर की पुष्टि।
40. तीसरी आपत्ति, जो चुने हुओं के अन्त तक स्थिर रहने पर प्रहार करती है। एक प्रेरित के द्वारा उत्तर। खण्डन का सारांश।
41. विश्वास की परिभाषा उस परिभाषा से मेल खाती है जो प्रेरित ने इब्रानियों में दी है। इस परिभाषा की व्याख्या। इस विद्वत्तावादी भूल का खण्डन कि प्रेम विश्वास और आशा से पहले आता है।
42. आशा सच्चे विश्वास की अविभाज्य साथी है। कारण। विश्वास और आशा का सम्बन्ध। वे एक-दूसरे को थामे रहते हैं। परीक्षा के नाना रूपों से प्रकट है कि विश्वास को स्थिर करने के लिए आशा की सहायता आवश्यक है।
43. “विश्वास” और “आशा” शब्द कभी-कभी आपस में उलझा दिए जाते हैं। उन विद्वत्तावादियों का खण्डन जो आशा की दोहरी नींव मानते हैं, अर्थात् परमेश्वर का अनुग्रह और कर्मों का पुण्य।
1. जब हम विश्वास की अधिक स्पष्ट परिभाषा दे देंगे, ताकि पाठक उसके स्वभाव और सामर्थ्य को समझ सकें, तब ये सब बातें सरलता से समझ में आ जाएँगी। यहाँ यह स्मरण करना आवश्यक है जो पहले सिखाया गया था: पहला यह कि परमेश्वर अपनी व्यवस्था के द्वारा जो हमें करना चाहिए उसे ठहराता है, और किसी एक बात में भी चूकना हमें अनन्त मृत्यु के उस भयंकर न्याय के अधीन कर देता है जिसकी वह घोषणा करती है। दूसरा, क्योंकि यदि हम केवल अपनी ओर देखें और यह विचारें कि हमारे पुण्य के अनुसार क्या ठहरता है, तो व्यवस्था की माँगें पूरी करना केवल कठिन ही नहीं, वरन् हमारे बल और सामर्थ्य से सर्वथा परे है, इसलिए आशा का कोई आधार नहीं रह जाता, और हम परमेश्वर से त्यागे हुए अनन्त मृत्यु में पड़े रहते हैं। तीसरा, इस दयनीय विपत्ति से छुड़ानेवाला केवल एक ही उपाय है, अर्थात् जब छुड़ानेवाला मसीह प्रकट होता है, जिसके हाथ से हमारे स्वर्गीय पिता ने अपनी अपार भलाई और दया से हमारी सहायता करना चाहा है, यदि हम सच्चे विश्वास से इस दया को ग्रहण करें और दृढ़ आशा से उसमें विश्राम करें। अब इस विश्वास के स्वभाव पर विचार करना उचित है, जिसके द्वारा वे लोग, जो परमेश्वर के परिवार में लेपालक किए गए हैं, स्वर्ग के राज्य के अधिकारी होते हैं। इतने बड़े उद्देश्य की पूर्ति के लिए यह प्रकट है कि कोई केवल मत या धारणा पर्याप्त नहीं। और विश्वास के सच्चे स्वभाव की विवेचना में और भी अधिक सावधानी और परिश्रम की आवश्यकता इसलिए है कि आजकल बहुत-से लोग इसके विषय में घातक भ्रमों में पड़े हैं। बहुत-से लोग यह शब्द सुनकर समझते हैं कि इसका अर्थ केवल सुसमाचार के इतिहास के प्रति कोई साधारण सहमति है; वरन् जब पाठशालाओं में विश्वास के विषय की चर्चा होती है, तब वे केवल परमेश्वर को उसका विषय बताकर, जैसा हमने अन्यत्र कहा है (पुस्तक 2, अध्याय 6, खण्ड 4), अपने खोखले चिन्तन से अभागी आत्माओं को सही लक्ष्य की ओर चलाने के बजाय उससे दूर ले जाते हैं। क्योंकि परमेश्वर तो अगम्य ज्योति में बसता है, इसलिए बीच में मसीह का आना आवश्यक है। इसीलिए वह अपने को “जगत की ज्योति” कहता है; और दूसरी जगह, “मार्ग, सत्य और जीवन।” कोई उसके बिना पिता के पास नहीं आता (जो जीवन का सोता है); क्योंकि “कोई नहीं जानता कि पिता कौन है, केवल पुत्र, और वह जिस पर पुत्र उसे प्रकट करना चाहे।” इसी कारण पौलुस घोषणा करता है, “मैं अपने प्रभु मसीह यीशु की पहचान की उत्तमता के कारण सब बातों को हानि समझता हूँ।” प्रेरितों के काम के बीसवें अध्याय में वह बताता है कि उसने “हमारे प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास” का प्रचार किया; और दूसरी जगह वह मसीह को उससे इस प्रकार कहते हुए प्रस्तुत करता है: “मैंने तुझे इसलिए दर्शन दिया है कि तुझे सेवक और गवाह ठहराऊँ;” “और मैं तुझे इन लोगों और अन्यजातियों से बचाता रहूँगा, जिनके पास मैं अब तुझे भेजता हूँ,”—“कि वे पापों की क्षमा और उन लोगों के साथ जो मुझ पर विश्वास करने से पवित्र किए गए हैं, मीरास पाएँ।” पौलुस आगे घोषणा करता है कि मसीह के व्यक्तित्व में परमेश्वर की महिमा हमारे सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुई है, अथवा, जो एक ही बात है, हमें “यीशु मसीह के चेहरे में परमेश्वर की महिमा की पहचान की ज्योति” मिली है।277 यह सच है कि विश्वास केवल परमेश्वर से सम्बन्ध रखता है; परन्तु इसमें हमें यह और जोड़ना चाहिए कि वह यीशु मसीह को भी पहचानता है जिसे उसने भेजा है। यदि हम मसीह के तेज से प्रकाशित न किए जाते तो परमेश्वर दूर और हमसे छिपा ही रहता। पिता का जो कुछ था, वह उसने अपने एकलौते पुत्र के पास रख दिया, ताकि वह उसमें अपने को प्रकट करे, और इस प्रकार आशिषों के बाँटे जाने से अपनी महिमा का सच्चा प्रतिरूप प्रकट करे। जैसा कहा जा चुका है, हमें आत्मा के द्वारा चलाया जाना और इस प्रकार मसीह को खोजने के लिए प्रेरित होना है; वैसे ही हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि अदृश्य पिता को इसी प्रतिरूप के सिवा और कहीं नहीं खोजना चाहिए। इसी कारण अगस्तीन, विश्वास के विषय की चर्चा करते हुए (De Civitate Dei, lib. 11, ch. 2), सुन्दर रीति से कहते हैं, “जानने की बात यह है कि हमें कहाँ जाना है और किस मार्ग से;” और तुरन्त निष्कर्ष निकालते हैं कि “सब भूलों से बचने का सबसे निश्चित मार्ग उसे जानना है जो परमेश्वर भी है और मनुष्य भी। हम परमेश्वर की ओर जाते हैं, और मनुष्य के द्वारा जाते हैं; और ये दोनों केवल मसीह में पाए जाते हैं।”278 जब पौलुस परमेश्वर पर विश्वास का प्रचार करता है, तो निश्चय ही वह उस बात को गिराना नहीं चाहता जिस पर वह बार-बार बल देता है, अर्थात् कि विश्वास की सारी स्थिरता मसीह में है। पतरस दोनों को बहुत उचित रीति से जोड़ता है, यह कहकर कि उसी के द्वारा “हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं” (1 पतरस 1:21)।
277 1 तीमुथियुस 6:16; यूहन्ना 8:12; 14:6; लूका 10:22; 1 कुरिन्थियों 2:2; प्रेरितों के काम 20:21; 26:17, 18; 2 कुरिन्थियों 4:6।
2. इसलिए यह बुराई, असंख्य अन्य बुराइयों की तरह, विद्वत्तावादियों279 के सिर मढ़ी जानी चाहिए, जिन्होंने मानो मसीह पर परदा डाल दिया है; यदि हमारी दृष्टि सीधी उसकी ओर न फिरे, तो हमें सदा अनेक भूलभुलैयों में भटकना पड़ता है। परन्तु अपनी धुँधली परिभाषा से विश्वास को क्षीण और लगभग मिटा देने के अतिरिक्त, उन्होंने निहित विश्वास की कल्पना गढ़ ली है, और इस नाम से घोर अज्ञान को सजाकर अभागी जनता को उसके बड़े विनाश के लिए भरमाते हैं।280 वरन् बात को अधिक सच्चाई और स्पष्टता से कहें तो यह कल्पना सच्चे विश्वास को केवल गाड़ती ही नहीं, उसे सर्वथा नष्ट कर देती है। क्या कुछ भी न समझना और अपनी धारणाओं को केवल कलीसिया के प्रति निहित रूप से समर्पित कर देना विश्वास है? विश्वास अज्ञान में नहीं, ज्ञान में स्थित है—केवल परमेश्वर के ज्ञान में नहीं, वरन् ईश्वरीय इच्छा के ज्ञान में। हमारा उद्धार इसलिए नहीं होता कि हम कलीसिया की हर आज्ञा को सच मान लेने को तैयार हैं, या खोज और निर्णय का काम कलीसिया पर छोड़ देते हैं; परन्तु तब होता है जब हम मसीह के द्वारा हुए मेल-मिलाप के कारण परमेश्वर को अनुग्रहकारी पिता के रूप में, और मसीह को धार्मिकता, पवित्रीकरण और जीवन के लिए हमें दिए गए के रूप में पहचानते हैं। मैं कहता हूँ कि इसी ज्ञान से, न कि अपनी समझ के समर्पण से, हमें स्वर्ग के राज्य में प्रवेश मिलता है। क्योंकि जब प्रेरित कहता है, “मन से विश्वास करने से धार्मिकता प्राप्त होती है, और मुँह से अंगीकार करने से उद्धार प्राप्त होता है” (रोमियों 10:10), तब वह संकेत करता है कि बिना समझे, या खोजे भी बिना, निहित रूप से मान लेना पर्याप्त नहीं। आवश्यक बात परमेश्वर की भलाई की स्पष्ट पहचान है, जिसमें हमारी धार्मिकता स्थित है।
3. मैं यह तो नहीं नकारता (हम अज्ञान में इस प्रकार लिपटे हैं) कि हमारे लिए बहुत-सी बातें अब भी पूरी तरह उलझी हुई हैं और तब तक उलझी रहेंगी जब तक हम शरीर का यह बोझ उतारकर परमेश्वर की उपस्थिति के निकट न पहुँचें। ऐसे मामलों में सबसे उचित मार्ग यह है कि अपना निर्णय रोक रखें और कलीसिया के साथ एकता बनाए रखने का निश्चय करें। परन्तु इस बहाने नम्रता से तनिक कोमल हुए अज्ञान को विश्वास का नाम देकर आदर देना अत्यन्त मूर्खतापूर्ण है। विश्वास परमेश्वर और मसीह के ज्ञान में स्थित है (यूहन्ना 17:3), कलीसिया के प्रति श्रद्धा में नहीं। और हम देखते हैं कि उन्होंने इस निहित विश्वास से कैसी भूलभुलैया बना ली है—सब कुछ, कभी-कभी अत्यन्त भयंकर भूलें भी, अज्ञानियों द्वारा बिना किसी विवेक के दैववाणी के समान ग्रहण कर ली जाती हैं, बशर्ते उन्हें कलीसिया के नाम से सुझाया जाए। यह अविवेकी सुगमता, यद्यपि विनाश की सबसे निश्चित खाई है, फिर भी इस आधार पर क्षमा योग्य ठहराई जाती है कि वह किसी बात को निश्चित रूप से नहीं मानती, केवल इस जुड़ी हुई शर्त के साथ मानती है कि यदि कलीसिया का विश्वास यही है। इस प्रकार वे भूल में सत्य, अन्धकार में ज्योति, और अज्ञान में सच्चा ज्ञान पाने का ढोंग करते हैं। इन मतों का खण्डन करने में अधिक समय न लगाकर, हम पाठक को केवल यही सलाह देते हैं कि उनकी तुलना हमारे मत से कर ले। सत्य की स्पष्टता ही उनके खण्डन के लिए पर्याप्त होगी। क्योंकि उनका उठाया हुआ प्रश्न यह नहीं कि अज्ञान के बहुत-से अवशेषों के साथ भी कोई निहित विश्वास हो सकता है या नहीं, परन्तु वे यह दावा करते हैं कि जो लोग जड़ अज्ञान में जीते हैं, वरन् उसमें मग्न रहते हैं, वे भी ठीक विश्वास करते हैं, बशर्ते अनजानी बातों के विषय में वे कलीसिया के अधिकार और निर्णय से सहमत हों: मानो पवित्रशास्त्र सर्वत्र यह नहीं सिखाता कि विश्वास के साथ समझ जुड़ी रहती है।
278 फ्रेंच में है: “Car nous tendons a Dieu, et par l’humanité de Jesus Christ, nous y sommes conduits;”—क्योंकि हम परमेश्वर की ओर जाते हैं, और यीशु मसीह की मानवता के द्वारा उसके पास पहुँचाए जाते हैं।
279 फ्रेंच में, “Theologiens Sorboniques;”—सोरबोन के धर्मशास्त्री। 280 इस अज्ञान के विरोध में देखें Chrysostom in Joann. Homil. 16।
4. हम मानते हैं कि जब तक हम संसार में यात्री हैं तब तक विश्वास निहित है, न केवल इसलिए कि अभी बहुत-सी बातें हमसे छिपी हैं, वरन् इसलिए भी कि भूल के कुहरे में लिपटे होने के कारण हम सब बातों तक नहीं पहुँचते। सबसे बड़ी पूर्णता प्राप्त किए हुए मनुष्य की भी सबसे उच्च बुद्धि यही है कि आगे बढ़े, और शान्त और सीखने को तत्पर मन से और आगे प्रगति करने का प्रयत्न करे। इसीलिए पौलुस विश्वासियों को उपदेश देता है कि जिस किसी बात में उनमें मतभेद हो उसमें और प्रकाश की प्रतीक्षा करें, फिलिप्पियों 3:15)।281 और निश्चय ही अनुभव सिखाता है कि जब तक हम शरीर में हैं, हमारी उपलब्धियाँ वांछित से कम ही रहती हैं। अपने प्रतिदिन के पठन में हमारा सामना बहुत-से धुँधले अंशों से होता है जो हमें अपने अज्ञान का दोषी ठहराते हैं। इस लगाम से परमेश्वर हमें नम्र बनाए रखता है, और हर एक को विश्वास का एक नाप देता है, कि हर शिक्षक, चाहे कितना ही उत्तम हो, फिर भी सीखने को तैयार रहे। इस निहित विश्वास के प्रभावशाली उदाहरण मसीह के चेलों में देखे जा सकते हैं, जब तक वे पूरी तरह प्रकाशित नहीं हुए थे। हम देखते हैं कि वे आरम्भिक बातें ग्रहण करने में कितनी कठिनाई पाते हैं, छोटी-से-छोटी बातों में कैसे हिचकिचाते हैं, अपने स्वामी के मुँह की ओर ताकते रहने पर भी कोई बड़ी प्रगति नहीं करते; वरन् स्त्रियों के समाचार पर कब्र की ओर दौड़ जाने के बाद भी उन्हें अपने स्वामी का पुनरुत्थान स्वप्न-सा लगता है। क्योंकि मसीह ने पहले ही उनके विश्वास की गवाही दी थी, हम नहीं कह सकते कि वे उससे सर्वथा रहित थे; वरन् यदि उन्हें विश्वास न होता कि मसीह फिर जी उठेगा, तो उनका सारा उत्साह बुझ गया होता। और स्त्रियों को एक मृत देह के लेपन के लिए सुगन्धित द्रव्य तैयार करने के लिए किसी अन्धविश्वास ने प्रेरित नहीं किया था, जिसके पुनर्जीवित होने की उन्हें कोई आशा न थी; परन्तु यद्यपि वे उसके वचनों पर, जिसे वे सच्चा जानती थीं, विश्वास करती थीं, फिर भी उनके मन पर जो अज्ञान अब भी छाया हुआ था उसने उनके विश्वास को अन्धकार में लपेट दिया, और उन्हें विस्मय में छोड़ दिया। इसीलिए कहा जाता है कि उन्होंने तभी विश्वास किया जब उन्होंने वास्तविकता से देखा कि मसीह की कही बात सच थी; ऐसा नहीं कि तब उन्होंने विश्वास करना आरम्भ किया, परन्तु छिपे हुए विश्वास का वह बीज, जो उनके हृदयों में मानो मरा पड़ा था, तब सामर्थ्य के साथ फूट निकला। इस प्रकार उनका विश्वास सच्चा तो था, पर निहित था, क्योंकि उन्होंने मसीह को एकमात्र शिक्षक के रूप में श्रद्धा से ग्रहण किया था। फिर उससे शिक्षा पाकर वे निश्चित हो गए कि वही उद्धार का कर्ता है; अन्त में, उन्होंने विश्वास किया कि वह स्वर्ग से आया है कि चेलों को इकट्ठा करे और पिता के अनुग्रह से उन्हें वहाँ पहुँचाए। इसका इससे अधिक परिचित प्रमाण नहीं हो सकता कि सब मनुष्यों में विश्वास सदा अविश्वास से मिला रहता है।
5. हम उनके विश्वास को निहित भी कह सकते हैं, क्योंकि वह यथार्थ में विश्वास की तैयारी मात्र है। सुसमाचार लेखक बहुत-से लोगों के विषय में बताते हैं कि उन्होंने विश्वास किया, यद्यपि वे केवल आश्चर्यकर्मों से विस्मित हुए थे, और इससे आगे नहीं गए थे कि विश्वास करें कि मसीह प्रतिज्ञा किया हुआ मसीहा है, बिना इसके कि वे सुसमाचार की शिक्षा से तनिक भी सींचे गए हों। जिस श्रद्धा ने उन्हें वश में किया और स्वेच्छा से मसीह के अधीन कर दिया, उसे विश्वास का नाम दिया गया है, यद्यपि वह उसका आरम्भ मात्र था। इस प्रकार वह राजकर्मचारी, जिसने अपने पुत्र के चंगे होने की प्रतिज्ञा पर विश्वास किया था, घर लौटने पर सुसमाचार लेखक द्वारा (यूहन्ना 4:53) फिर से विश्वास करनेवाला कहा गया है; अर्थात् पहले उसने मसीह के मुँह से निकले वचनों को दैववाणी के समान ग्रहण किया, और बाद में उसके अधिकार के अधीन हुआ और उसकी शिक्षा ग्रहण की। यद्यपि ध्यान देने की बात यह है कि वह सीखने को तैयार और इच्छुक था, फिर भी पहले अंश में “विश्वास किया” शब्द एक विशेष विश्वास का सूचक है, और दूसरे में उसे उन चेलों में स्थान देता है जिन्होंने अपने को मसीह के लिए समर्पित कर दिया था। इससे मिलता-जुलता उदाहरण यूहन्ना उन सामरियों का देता है जिन्होंने स्त्री की बात पर विश्वास किया और उत्सुकता से मसीह के पास दौड़े; परन्तु उसे सुनने के बाद वे इस प्रकार कहते हैं, “अब हम तेरे कहने से विश्वास नहीं करते, क्योंकि हमने आप ही सुन लिया और जानते हैं कि यह सचमुच जगत का उद्धारकर्ता मसीह है” (यूहन्ना 4:42)। इन अंशों से प्रकट है कि जो लोग अभी आरम्भिक सिद्धान्तों से भी नहीं सींचे गए, वे भी, यदि आज्ञा मानने को तत्पर हों, विश्वासी कहलाते हैं, यथार्थ अर्थ में तो नहीं, परन्तु इस अर्थ में कि परमेश्वर अपनी कृपा से उनकी भक्तिपूर्ण भावना को इतना सम्मान देना चाहता है। परन्तु आगे बढ़ने की इच्छा के साथ यह सीखने की तत्परता उस घोर अज्ञान से बहुत भिन्न है जिसमें वे लोग आलस्य से पड़े रहते हैं जो पोप के अनुयायियों के निहित विश्वास से सन्तुष्ट हैं। यदि पौलुस उन लोगों को कड़ाई से दोषी ठहराता है जो “सदा सीखते तो रहते हैं पर सत्य की पहचान तक कभी नहीं पहुँच सकते,” तो उन्हें कितनी अधिक कड़ाई से डाँटा जाना चाहिए जो खुल्लमखुल्ला कुछ भी न जानने का ढोंग करते हैं?
281 देखें Augustin. Ep. 102, “Si propter eos solos Christus mortuus est, qui certa intelligentia possunt ista discernera, pæne frustra in ecclesia laboramus,” आदि;—यदि मसीह केवल उन्हीं के लिए मरा जो सच्ची समझ के साथ इन बातों में भेद कर सकते हैं, तो कलीसिया में हमारा परिश्रम लगभग व्यर्थ है।
6. मसीह का सच्चा ज्ञान उसे उसी रूप में ग्रहण करने में है जैसा पिता ने उसे प्रस्तुत किया है, अर्थात् अपने सुसमाचार से सुसज्जित। क्योंकि जैसे वह हमारे विश्वास का लक्ष्य ठहराया गया है, वैसे ही हम सुसमाचार के मार्गदर्शन के बिना सीधे उसकी ओर नहीं बढ़ सकते। उसमें ही अनुग्रह के भण्डार हमारे सामने खोले गए हैं। यदि वे बन्द रहते, तो मसीह से हमें थोड़ा ही लाभ होता। इसीलिए पौलुस इन शब्दों में विश्वास को शिक्षा का अविभाज्य साथी बनाता है, “तुमने मसीह की ऐसी शिक्षा नहीं पाई; यदि तुमने उसकी सुनी और उसमें सिखाए गए हो, जैसा यीशु में सत्य है” (इफिसियों 4:20, 21)। फिर भी मैं विश्वास को सुसमाचार तक इस प्रकार सीमित नहीं करता कि यह न मानूँ कि मूसा और भविष्यद्वक्ताओं को विश्वास की नींव डालने के लिए पर्याप्त दिया गया था; परन्तु क्योंकि सुसमाचार मसीह का अधिक पूर्ण प्रकाशन करता है, पौलुस उसे उचित ही विश्वास की शिक्षा कहता है (1 तीमुथियुस 4:6)। इसी कारण वह अन्यत्र कहता है कि विश्वास के आने से व्यवस्था रद्द हो गई (रोमियों 10:4), इस कथन में शिक्षा देने की एक नई और अनोखी रीति सम्मिलित करते हुए, जिसके द्वारा मसीह ने, महान शिक्षक के रूप में अपने प्रकट होने के समय से, पिता की दया को और अधिक स्पष्ट किया और हमारे उद्धार की और अधिक निश्चित गवाही दी। परन्तु अधिक सरल और उपयुक्त रीति यह होगी कि सामान्य से विशेष की ओर उतरें। पहले हमें स्मरण रखना चाहिए कि विश्वास और वचन के बीच अटूट सम्बन्ध है, और ये एक-दूसरे से उतना ही अलग नहीं किए जा सकते जितना सूर्य से उसकी किरणें। इसलिए यशायाह में प्रभु पुकारता है, “सुनो, तो तुम जीवित रहोगे” (यशायाह 4:3)। और यूहन्ना विश्वास के इसी सोते की ओर इन शब्दों में संकेत करता है, “ये इसलिए लिखे गए हैं कि तुम विश्वास करो” (यूहन्ना 20:31)। भजनकार भी लोगों को विश्वास के लिए उकसाते हुए कहता है, “यदि आज तुम उसका शब्द सुनो” (भजन संहिता 95:7), जहाँ सुनने का अर्थ सदा विश्वास करना लिया गया है। अन्त में, यशायाह में प्रभु कलीसिया के सदस्यों को परायों से इस चिह्न द्वारा अलग करता है, “तेरे सब पुत्र यहोवा के सिखाए हुए होंगे,”
(यशायाह 54:13); क्योंकि यदि यह लाभ बिना भेद के सबको मिलता, तो वह अपने शब्द केवल थोड़ों से क्यों कहता? इसी के अनुरूप, सुसमाचार लेखक विश्वासियों और चेलों शब्दों को सदा समानार्थक रूप में प्रयोग करते हैं। यह विशेषकर लूका प्रेरितों के काम के कई स्थानों में करता है। वह चेली शब्द एक स्त्री के लिए भी प्रयोग करता है (प्रेरितों के काम 9:36)। इसलिए यदि विश्वास अपने लक्ष्य से, जिसकी ओर उसे बढ़ना चाहिए, तनिक भी हट जाए, तो वह अपना स्वभाव नहीं रखता, वरन् अनिश्चित भोलापन और मन की अस्थिर भटकन बन जाता है। वही वचन वह आधार है जिस पर वह टिकता और थमा रहता है। उससे हटकर वह गिर जाता है। इसलिए वचन को हटा दो, तो कोई विश्वास नहीं रहेगा। यहाँ हम इस पर विचार नहीं कर रहे कि परमेश्वर के उस वचन को फैलाने के लिए, जिससे विश्वास उत्पन्न होता है, मनुष्य की सेवकाई आवश्यक है या नहीं (इस पर अन्यत्र विचार होगा); परन्तु हम कहते हैं कि वचन स्वयं, चाहे जिस रीति से वह हम तक पहुँचाया जाए, एक प्रकार का दर्पण है जिसमें विश्वास परमेश्वर को देखता है। इसलिए इसमें, चाहे परमेश्वर मनुष्य के माध्यम से काम करे, चाहे सीधे अपनी सामर्थ्य से, वह उन पर जिन्हें वह अपनी ओर खींचना चाहता है, सदा अपने वचन के द्वारा ही अपने को प्रकट करता है। इसीलिए पौलुस विश्वास को उस आज्ञाकारिता का नाम देता है जो सुसमाचार को दी जाती है (रोमियों 1:5); और फिलिप्पियों को लिखते हुए वह उनके विश्वास की आज्ञाकारिता की प्रशंसा करता है (फिलिप्पियों 2:17)। क्योंकि विश्वास में केवल यह ज्ञान सम्मिलित नहीं कि परमेश्वर है, वरन्, मुख्यतः, हमारे प्रति उसकी इच्छा का बोध भी। हमारे लिए केवल यह जानना आवश्यक नहीं कि वह अपने आप में क्या है, वरन् यह भी कि वह किस रूप में अपने को हमारे सामने प्रकट करना चाहता है। इसलिए अब हम देखते हैं कि विश्वास हमारे विषय में ईश्वरीय इच्छा का वह ज्ञान है जो उसके वचन से निश्चित किया गया है। और उसकी नींव परमेश्वर की सच्चाई की पहले से बैठी हुई प्रतीति है। जब तक तुम्हारा मन वचन की निश्चयता के विषय में कोई शंका रखता है, तब तक उसका अधिकार निर्बल और सन्देहास्पद रहेगा, या यों कहें कि उसका कोई अधिकार ही न रहेगा। और केवल यह मान लेना भी पर्याप्त नहीं कि परमेश्वर सच्चा है और झूठ नहीं बोल सकता या धोखा नहीं दे सकता, जब तक तुम्हें दृढ़ प्रतीति न हो कि उसके मुँह से निकला हर वचन पवित्र और अटल सत्य है।
7. परन्तु क्योंकि मनुष्य का हृदय परमेश्वर के हर वचन से विश्वास की ओर नहीं लाया जाता, इसलिए हमें अब भी विचार करना है कि वचन में विश्वास का यथार्थ लक्ष्य क्या है। आदम से परमेश्वर की घोषणा थी, “तू अवश्य मर जाएगा” (उत्पत्ति 2:17); और कैन से, “तेरे भाई का लहू भूमि में से मेरी ओर चिल्लाता है” (उत्पत्ति 4:10); परन्तु ये विश्वास को स्थापित करने के योग्य होने से दूर, उसे केवल हिलाने का काम करते हैं। फिर भी हम यह नहीं नकारते कि परमेश्वर जब भी, जो भी, और जिस रीति से भी बोले, उसके सत्य को मान लेना विश्वास का काम है: हम केवल यह पूछ रहे हैं कि परमेश्वर के वचन में विश्वास को टिकने और विश्राम करने के लिए क्या मिल सकता है। जब विवेक केवल क्रोध और रोष ही देखता है, तब वह काँपे और भयभीत हुए बिना कैसे रह सकता है? और जिस परमेश्वर से वह इस प्रकार डरता है, उससे कैसे भागने से बच सकता है? परन्तु विश्वास को परमेश्वर को खोजना चाहिए, उससे भागना नहीं। इसलिए प्रकट है कि हमें अभी तक विश्वास की पूर्ण परिभाषा नहीं मिली, क्योंकि ईश्वरीय इच्छा के हर प्रकार के ज्ञान को यह नाम देना असम्भव है। तो क्या हम “इच्छा” के स्थान पर, जो प्रायः बुरे समाचार का दूत और भय का अग्रदूत होती है, परमेश्वर की भली इच्छा या दया को रख दें? इस प्रकार निस्सन्देह हम विश्वास के स्वभाव के और निकट पहुँचते हैं। क्योंकि जब हमें बताया जाता है कि हमारा कल्याण उसी में सुरक्षित है तब हम उसे खोजने को लुभाए जाते हैं; और जब वह घोषणा करता है कि वह हमारे कल्याण की चिन्ता करता और उसमें रुचि लेता है, तब हम इसमें दृढ़ किए जाते हैं। इसलिए उस अनुग्रहपूर्ण प्रतिज्ञा की आवश्यकता है, जिसमें वह गवाही देता है कि वह दयालु पिता है; क्योंकि उसके निकट पहुँचने का और कोई मार्ग नहीं, प्रतिज्ञा ही एकमात्र वस्तु है जिस पर मनुष्य का हृदय टेक लगा सकता है। इसी कारण दया और सच्चाई, ये दोनों बातें भजनों में सदा एक साथ जोड़ी गई हैं, मानो उनका आपस में परस्पर सम्बन्ध हो। क्योंकि यदि वह दया करके हमें अपनी ओर न खींचता, तो यह जानना कि परमेश्वर सच्चा है, हमारे किसी काम न आता; और यदि वह स्पष्ट रूप से उसे न बढ़ाता, तो हम अपने आप उसकी दया को ग्रहण नहीं कर सकते थे। “मैंने तेरी सच्चाई और तेरे उद्धार की चर्चा की है; मैंने तेरी करुणा और तेरी सच्चाई को बड़ी सभा से छिपा नहीं रखा। हे यहोवा, तू भी अपनी दया मुझ से न रोक; तेरी करुणा और तेरी सच्चाई से सदा मेरी रक्षा होती रहे” (भजन संहिता 40:10, 11)। “हे यहोवा, तेरी करुणा स्वर्ग में है, तेरी सच्चाई आकाशमण्डल तक पहुँचती है” (भजन संहिता 36:5)। “जो उसकी वाचा और चितौनियों को मानते हैं, उनके लिए यहोवा के सब मार्ग करुणा और सच्चाई हैं” (भजन संहिता 25:10)। “क्योंकि हम पर उसकी करुणा बड़ी है, और यहोवा की सच्चाई सदा की है” (भजन संहिता 117:2)। “मैं तेरी करुणा और सच्चाई के कारण तेरे नाम का धन्यवाद करूँगा” (भजन संहिता 138:2)। भविष्यद्वक्ताओं में जो यह कहा गया है कि परमेश्वर अपनी प्रतिज्ञाओं में दयालु और विश्वासयोग्य है, उसे मुझे उद्धृत करने की आवश्यकता नहीं। यह मानना हमारी ढिठाई होगी कि परमेश्वर हम पर अनुग्रहकारी है, यदि हमारे पास उसकी अपनी गवाही न होती, और वह अपने निमन्त्रण से हमसे पहले न आता, जो उसकी इच्छा के विषय में कोई सन्देह या अनिश्चितता नहीं छोड़ता। यह पहले देखा जा चुका है कि मसीह ही प्रेम की एकमात्र प्रतिभूति है, क्योंकि उसके बिना ऊपर और नीचे की सब वस्तुएँ घृणा और क्रोध की बात करती हैं। हमने यह भी देखा है कि क्योंकि परमेश्वर की भलाई का ज्ञान तब तक बहुत महत्त्व का नहीं हो सकता जब तक वह हमें उस पर भरोसा रखने की ओर न ले जाए, इसलिए हमें सन्देह से मिला हुआ ज्ञान, जो दृढ़ होने से दूर निरन्तर डगमगाता रहता है, छोड़ देना चाहिए। परन्तु मानव मन, जब अन्धा और अन्धकारमय है, ईश्वरीय इच्छा के उचित ज्ञान तक उठने से बहुत दूर है; और न ही सतत सन्देह से डगमगाता हृदय ऐसे ज्ञान में निश्चिन्त विश्राम कर सकता है। इसलिए, कि परमेश्वर के वचन को पूरा विश्वास मिल सके, मन का प्रकाशित किया जाना और हृदय का दृढ़ किया जाना किसी और स्रोत से होना आवश्यक है। अब हमें विश्वास की पूर्ण परिभाषा282 मिल जाएगी यदि हम कहें कि वह हमारे प्रति ईश्वरीय अनुग्रह का दृढ़ और निश्चित ज्ञान है, जो मसीह में दी गई सेंतमेंत की प्रतिज्ञा की सच्चाई पर आधारित है, और पवित्र आत्मा के द्वारा हमारे मन पर प्रकट किया और हमारे हृदयों पर मुहर किया गया है।
8. परन्तु आगे बढ़ने से पहले कुछ प्रारम्भिक टिप्पणियाँ करना आवश्यक है, ताकि वे कठिनाइयाँ दूर हो जाएँ जो अन्यथा पाठक के मार्ग में बाधा डालतीं। और पहले मुझे रूपित और अरूपित विश्वास के विषय में विद्वत्तावादियों के निरर्थक भेद का खण्डन करना है।283 क्योंकि वे कल्पना करते हैं कि जिन लोगों में परमेश्वर का भय और भक्ति का कोई बोध नहीं, वे भी वह सब मान सकते हैं जो उद्धार के लिए जानना आवश्यक है; मानो पवित्र आत्मा हमारे हृदयों को विश्वास के लिए प्रकाशित करके हमारे लेपालक होने का गवाह न होता हो। फिर भी, यद्यपि सारा पवित्रशास्त्र उनके विरुद्ध है, वे हठपूर्वक परमेश्वर के भय से रहित धारणा को विश्वास का नाम देते हैं। उनकी परिभाषा के खण्डन में इससे आगे जाना आवश्यक नहीं कि हम केवल इतना बता दें कि परमेश्वर के वचन में विश्वास का स्वभाव कैसा बताया गया है। इससे स्पष्ट हो जाएगा कि वे इस विषय पर विवेचन करने के बजाय कितनी अनाड़ीपन और मूर्खता से बड़बड़ाते हैं। यह मैं कुछ अंश में पहले ही कर चुका हूँ, और शेष उचित स्थान पर आगे जोड़ूँगा। अभी मैं यह कहता हूँ कि उनकी कल्पना से अधिक बेतुकी बात की कल्पना नहीं की जा सकती। वे आग्रह करते हैं कि विश्वास वह सहमति है जिससे परमेश्वर का कोई भी तिरस्कार करनेवाला वह ग्रहण कर सकता है जो पवित्रशास्त्र में दिया गया है। परन्तु पहले हमें देखना चाहिए कि कोई अपने बल से विश्वास प्राप्त कर सकता है या नहीं, या पवित्र आत्मा उसके द्वारा लेपालकपन का गवाह बनता है। इसलिए उनका यह पूछना बचकानी बकवास है कि प्रेम के ऊपर से जुड़नेवाले गुण से रूपित हुआ विश्वास वही है या कोई भिन्न और नया विश्वास। इस प्रकार बोलकर वे स्पष्ट दिखा देते हैं कि उन्होंने आत्मा के विशेष दान के विषय में कभी सोचा ही नहीं; क्योंकि विश्वास के पहले तत्त्वों में से एक वह मेल-मिलाप है जो मनुष्य के परमेश्वर के निकट आने में निहित है। यदि वे पौलुस के इस कथन पर ठीक विचार करते, “मन से विश्वास करने से धार्मिकता प्राप्त होती है” (रोमियों 10:10), तो उस ठण्डे गुण के सपने देखना छोड़ देते। एक विचार ऐसा है जो इस वाद-विवाद को तुरन्त समाप्त कर देना चाहिए, अर्थात् यह कि सहमति स्वयं (जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, और आगे अधिक पूर्णता से समझाऊँगा) बुद्धि का नहीं, हृदय का, समझ का नहीं, भावना का विषय है। इसी कारण उसे “विश्वास की आज्ञाकारिता” कहा गया है (रोमियों 1:5), जिसे प्रभु अन्य सब सेवा से बढ़कर मानता है, और उचित ही, क्योंकि उसे अपने सत्य से अधिक बहुमूल्य कुछ नहीं, जिस पर, जैसा यूहन्ना बपतिस्मा देनेवाला घोषणा करता है, विश्वासी मानो मुहर लगाकर हस्ताक्षर कर देते हैं (यूहन्ना 3:33)। क्योंकि इस विषय में कोई सन्देह नहीं हो सकता, हम एक ही शब्द में निष्कर्ष निकालते हैं कि वे बेतुकी बात कहते हैं जब यह दावा करते हैं कि सहमति के साथ सहायक के रूप में भक्तिपूर्ण भावना जुड़ने से विश्वास रूपित होता है, क्योंकि सहमति स्वयं, कम से कम वैसी जैसी पवित्रशास्त्र उसका वर्णन करता है, भक्तिपूर्ण भावना में ही स्थित है। परन्तु हमें और भी स्पष्ट तर्क मिलता है। क्योंकि विश्वास मसीह को उसी रूप में ग्रहण करता है जैसे पिता ने उसे प्रस्तुत किया है, और वह केवल धर्मी ठहराए जाने, पापों की क्षमा और शान्ति के लिए ही नहीं, वरन् पवित्रीकरण के लिए भी, जीवित जल के सोते के रूप में प्रस्तुत किया गया है, इसलिए निश्चित है कि कोई भी मनुष्य उसे ठीक-ठीक तब तक नहीं जानेगा जब तक वह साथ ही आत्मा का पवित्रीकरण भी ग्रहण न करे; अथवा, बात को और स्पष्ट कहें तो, विश्वास मसीह के ज्ञान में स्थित है; मसीह को उसके आत्मा के पवित्रीकरण के बिना जाना नहीं जा सकता: इसलिए विश्वास भक्तिपूर्ण भावना से अलग हो ही नहीं सकता।
282 इस परिभाषा की व्याख्या इस अध्याय के खण्ड 14, 15, 28, 29, 32, 33, 31 में की गई है।
283 देखें Lombard, Lib. 3 Dist. 23। खण्ड 41, 42, 43 के मध्य में खण्डन देखें, जहाँ दिखाया गया है कि विश्वास आशा और प्रेम को उत्पन्न करता है और उनसे अलग नहीं हो सकता।
9. विश्वास को प्रेम से रहित करके बिगाड़ने के प्रयत्न में वे पौलुस के इन शब्दों पर बल देने के आदी हैं, “यदि मुझे ऐसा पूरा विश्वास हो कि मैं पहाड़ों को हटा दूँ, परन्तु प्रेम न रखूँ, तो मैं कुछ भी नहीं” (1 कुरिन्थियों 13:2)। परन्तु वे यह नहीं सोचते कि प्रेरित वहाँ किस विश्वास की चर्चा कर रहा है। पिछले अध्याय में आत्मा के नाना दानों की चर्चा करके (1 कुरिन्थियों 12:10), जिनमें भाँति-भाँति की भाषाएँ, आश्चर्यकर्म और भविष्यद्वाणी सम्मिलित हैं, और कुरिन्थियों को उत्तम दानों की खोज में रहने का उपदेश देकर, अर्थात् उन दानों की जिनसे कलीसिया की पूरी देह को अधिक लाभ मिले, वह आगे कहता है, “मैं तुम्हें और भी उत्तम मार्ग दिखाता हूँ” (1 कुरिन्थियों 12:30)। अन्य सब दान, अपने आप में चाहे कितने ही उत्तम हों, किसी काम के नहीं यदि वे प्रेम के अधीन न हों। वे कलीसिया की उन्नति के लिए दिए गए थे, और यदि इस प्रकार प्रयोग न हों तो अपना उद्देश्य खो देते हैं। इसे सिद्ध करने के लिए वह एक विभाजन अपनाता है, वही दान दोहराता है जिनका उसने पहले उल्लेख किया था, परन्तु भिन्न नामों से। आश्चर्यकर्म और विश्वास एक ही बात के लिए प्रयोग हुए हैं, अर्थात् आश्चर्यकर्म करने की सामर्थ्य। इसलिए, क्योंकि यह चमत्कारी सामर्थ्य या विश्वास परमेश्वर का विशेष दान है, जिसे कोई दुष्ट मनुष्य भी पा सकता और उसका दुरुपयोग कर सकता है, जैसे भाषाओं, भविष्यद्वाणी या अन्य दानों का, तो यह आश्चर्य की बात नहीं कि वह उसे प्रेम से अलग करता है। उनकी सारी भूल इसमें है कि “विश्वास” शब्द के अनेक अर्थ होते हुए भी, इस विविधता को अनदेखा करके वे ऐसा तर्क करते हैं मानो उसका अर्थ सदा एक ही हो। याकूब का वह अंश, जिससे वे अपनी भूल का बचाव करने का प्रयत्न करते हैं, आगे अन्यत्र विचारा जाएगा (infra, अध्याय 17, खण्ड 11)। यद्यपि विश्वास की चर्चा में हम मानते हैं कि उसके अनेक रूप हैं, फिर भी जब हमारा उद्देश्य यह दिखाना है कि दुष्टों के पास परमेश्वर का कौन-सा ज्ञान होता है, तब हम पवित्रशास्त्र के अनुसार मानते और दृढ़ता से कहते हैं कि विश्वास केवल भक्तों में है। निस्सन्देह अनगिनत लोग विश्वास करते हैं कि परमेश्वर है, और सुसमाचार के इतिहास और पवित्रशास्त्र के अन्य भागों की सच्चाई को उसी प्रकार मानते हैं जैसे वे बीती घटनाओं या अपनी आँखों देखी घटनाओं के वृत्तान्त को मानते हैं। कुछ ऐसे हैं जो इससे भी आगे जाते हैं: वे परमेश्वर के वचन को अचूक दैववाणी मानते हैं; वे उसकी आज्ञाओं को पूरी तरह तुच्छ नहीं जानते, वरन् उसकी चेतावनियों और प्रतिज्ञाओं से कुछ अंश तक प्रभावित भी होते हैं। इन्हें विश्वास की गवाही दी जाती है, परन्तु catachresis के रूप में; क्योंकि वे परमेश्वर के वचन का खुली अधर्मिता से विरोध, तिरस्कार या निन्दा नहीं करते, वरन् आज्ञाकारिता का कुछ आभास दिखाते हैं।
10. परन्तु जैसे विश्वास की यह छाया या प्रतिमा किसी महत्त्व की नहीं, वैसे ही वह उस नाम के योग्य भी नहीं। यह सच्चे विश्वास से कितनी भिन्न है, यह शीघ्र ही विस्तार से समझाया जाएगा। फिर भी यहाँ हम इसकी ओर सरसरी तौर पर संकेत कर सकते हैं। शमौन जादूगर के विषय में कहा गया है कि उसने विश्वास किया, यद्यपि शीघ्र ही उसने अपने अविश्वास का प्रमाण दे दिया (प्रेरितों के काम 8:13-18)। उसे दिए गए विश्वास के विषय में हम कुछ लोगों की तरह यह नहीं समझते कि उसने केवल ऐसे विश्वास का ढोंग किया जो उसके हृदय में था ही नहीं: हम तो यह मानते हैं कि सुसमाचार की महिमा से वश में होकर उसने किसी प्रकार की सहमति दी, और इस हद तक मसीह को जीवन और उद्धार का कर्ता माना कि स्वेच्छा से उसका नाम धारण कर लिया। इसी प्रकार लूका के सुसमाचार में, जिनमें वचन का बीज फल लाने से पहले दबा दिया जाता है, या जिनमें, गहरी मिट्टी न होने के कारण, वह शीघ्र सूख जाता है, उनके विषय में कहा गया है कि वे थोड़ी देर के लिए विश्वास करते हैं। हमें सन्देह नहीं कि ऐसे लोग वचन को उत्सुकता से, एक प्रकार के स्वाद के साथ, ग्रहण करते हैं और उसकी ईश्वरीय सामर्थ्य का कुछ अनुभव भी करते हैं, इतना कि वे न केवल लोगों को विश्वास के झूठे आभास से धोखा देते हैं, वरन् अपने आप को भी धोखा देते हैं। वे समझते हैं कि वचन के प्रति उनकी श्रद्धा सच्ची भक्ति है, क्योंकि उन्हें खुले और घोषित तिरस्कार के सिवा किसी और अधर्म का बोध ही नहीं। परन्तु वह सहमति चाहे जैसी हो, वह किसी प्रकार हृदय तक नहीं पहुँचती कि वहाँ स्थिर आसन जमा सके। यद्यपि कभी-कभी लगता है कि उसने जड़ें जमा ली हैं, फिर भी इन जड़ों में प्राण नहीं होता। मानव हृदय में व्यर्थता के लिए इतने कोने, झूठ के लिए छिपने के इतने ठिकाने हैं, और वह छल और कपट से इतना ढका है कि प्रायः अपने आप को धोखा देता है। जो लोग विश्वास के ऐसे आभासों पर घमण्ड करते हैं, वे जान लें कि इस विषय में वे शैतानों से तनिक भी श्रेष्ठ नहीं। एक वर्ग तो उनसे घटकर भी है, क्योंकि वे उन बातों को बिना विचलित हुए सुन और समझ सकते हैं जिनके ज्ञान से शैतान काँपते हैं (याकूब 2:19)। दूसरा वर्ग इसमें उनके बराबर है कि उन पर जो भी प्रभाव पड़े, उसका एकमात्र परिणाम आतंक और घबराहट है।
11. मैं जानता हूँ कि कुछ लोगों को यह अव्याख्येय लगता है कि त्यागे हुओं को विश्वास कैसे दिया हुआ कहा जाता है, जबकि पौलुस उसे चुनाव के फलों में से एक घोषित करता है;284 फिर भी कठिनाई सरलता से सुलझ जाती है: क्योंकि यद्यपि उन्हें छोड़कर, जो उद्धार के लिए पूर्वनिर्धारित हैं, कोई विश्वास के लिए प्रकाशित नहीं होता और सचमुच सुसमाचार की प्रभावशाली सामर्थ्य का अनुभव नहीं करता, फिर भी अनुभव दिखाता है कि त्यागे हुए कभी-कभी चुने हुओं से इतने मिलते-जुलते ढंग से प्रभावित होते हैं कि स्वयं उनके अपने निर्णय में दोनों के बीच कोई अन्तर नहीं रहता। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि प्रेरित उन्हें स्वर्गीय दानों के स्वाद का, और स्वयं मसीह उन्हें क्षणिक विश्वास का अधिकारी बताता है। ऐसा नहीं कि वे सचमुच आत्मिक अनुग्रह की सामर्थ्य और विश्वास की निश्चित ज्योति को समझते हैं; परन्तु प्रभु, उन्हें और अच्छी तरह दोषी ठहराने और निरुत्तर करने के लिए, उनके मन में अपनी भलाई का ऐसा बोध डालता है जिसका अनुभव लेपालकपन के आत्मा के बिना भी हो सकता है। यदि यह आपत्ति उठाई जाए कि विश्वासियों के पास अपने लेपालकपन का भरोसा दिलाने के लिए इससे अधिक सशक्त गवाही नहीं है, तो मैं उत्तर देता हूँ कि यद्यपि परमेश्वर के चुने हुओं और उनमें, जिन पर कुछ समय के लिए ढल जानेवाला विश्वास अंकित होता है, बहुत समानता और सगोत्रता है, फिर भी पूर्ण निश्चयता, जिसकी पौलुस प्रशंसा करता है और जिससे वे “अब्बा, हे पिता” पुकार सकते हैं, केवल चुने हुओं के पास ही है। इसलिए, जैसे परमेश्वर केवल चुने हुओं को ही अविनाशी बीज से सदा के लिए नया जन्म देता है, जैसे उनके हृदयों में एक बार बोया गया जीवन का बीज कभी नष्ट नहीं होता, वैसे ही वह उनमें अपने लेपालकपन के अनुग्रह पर प्रभावशाली रीति से मुहर करता है, कि वह निश्चित और अटल रहे। परन्तु इसमें कोई बाधा नहीं कि आत्मा का एक निम्न कार्य त्यागे हुओं में अपना क्रम चलाए। इस बीच विश्वासियों को सिखाया जाता है कि वे अपनी सावधानी और नम्रता से जाँच करें, ऐसा न हो कि शारीरिक निश्चिन्तता घुस आए और विश्वास की निश्चयता का स्थान ले ले। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि त्यागे हुओं को अनुग्रह का कभी कोई और नहीं, बस धुँधला-सा बोध होता है, वे सार के बजाय छाया को थामते हैं, क्योंकि आत्मा पापों की क्षमा पर यथार्थ में केवल चुने हुओं में ही मुहर करता है, और विशेष विश्वास के द्वारा उसे उनके अपने काम में लाता है। फिर भी यह ठीक ही कहा जाता है कि त्यागे हुए विश्वास करते हैं कि परमेश्वर उन पर अनुग्रहकारी है, क्योंकि वे मेल-मिलाप का दान स्वीकार करते हैं, यद्यपि धुँधले ढंग से और उचित विवेक के बिना; इसलिए नहीं कि वे परमेश्वर की सन्तानों के साथ उसी विश्वास या नए जन्म के सहभागी हैं; परन्तु इसलिए कि कपट के आवरण के नीचे उन्हें उनके साथ विश्वास का कोई सामान्य आरम्भ प्राप्त प्रतीत होता है। न मैं यह नकारता हूँ कि परमेश्वर उनके मन को इस हद तक प्रकाशित करता है कि वे उसके अनुग्रह को पहचानते हैं; परन्तु वह उस प्रतीति को उस विशेष गवाही से अलग रखता है जो वह अपने चुने हुओं को देता है, इस बात में कि त्यागे हुए कभी पूर्ण परिणाम या उपभोग तक नहीं पहुँचते। जब वह उन पर अनुग्रहकारी दिखता है, तो ऐसा नहीं कि उसने सचमुच उन्हें मृत्यु से छुड़ाकर अपनी सुरक्षा में ले लिया हो। वह उन्हें केवल अपनी वर्तमान दया का प्रकाशन देता है।285 विश्वास की जीवित जड़ वह केवल चुने हुओं में ही बोता है, कि वे अन्त तक स्थिर बने रहें। इस प्रकार हम उस आपत्ति का समाधान करते हैं कि यदि परमेश्वर सचमुच अपना अनुग्रह दिखाता है, तो वह सदा बना रहना चाहिए। इसमें इस तथ्य से कोई असंगति नहीं कि वह कुछ को वर्तमान अनुग्रह के बोध से प्रकाशित करता है जो आगे चलकर क्षणिक सिद्ध होता है।
284 1 थिस्सलुनीकियों 1:3, 4; 2 थिस्सलुनीकियों 2:13; तीतुस 1।
12. यद्यपि विश्वास हमारे प्रति ईश्वरीय अनुग्रह का ज्ञान और उसकी सच्चाई की पूर्ण प्रतीति है, तथापि यह आश्चर्य की बात नहीं कि ईश्वरीय प्रेम का वह बोध, जो विश्वास का सगोत्र होकर भी उससे बहुत भिन्न है, उन लोगों में लुप्त हो जाता है जो क्षणिक रूप से प्रभावित होते हैं। मैं मानता हूँ कि परमेश्वर की इच्छा अटल है, और उसका सत्य सदा अपने से संगत रहता है; परन्तु मैं नकारता हूँ कि त्यागे हुए कभी इतनी दूर बढ़ते हैं कि उस गुप्त प्रकाशन में प्रवेश कर सकें जिसे पवित्रशास्त्र केवल चुने हुओं के लिए रखता है। इसलिए मैं नकारता हूँ कि वे उसकी इच्छा को अटल मानकर समझते हैं, या उसके सत्य को स्थिरता से ग्रहण करते हैं, क्योंकि वे एक क्षणिक प्रभाव से सन्तुष्ट रहते हैं; ठीक वैसे ही जैसे पर्याप्त गहरा न रोपा गया वृक्ष जड़ तो पकड़ सकता है, परन्तु समय बीतते सूख जाएगा, यद्यपि कई वर्ष तक वह न केवल पत्ते और फूल निकाले, वरन् फल भी लाए। संक्षेप में, जैसे प्रथम मनुष्य के विद्रोह से परमेश्वर का स्वरूप उसके मन और आत्मा से मिट सकता था, वैसे ही इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वह त्यागे हुओं पर अनुग्रह की कुछ किरणें डाले और फिर उन्हें बुझ जाने दे। इसमें कोई बाधा नहीं कि वह कुछ को अपने सुसमाचार का हल्का-सा ज्ञान दे, और औरों को उससे पूरी तरह सींच दे। इस बीच हमें स्मरण रखना चाहिए कि चुने हुओं का विश्वास चाहे कितना ही निर्बल और क्षीण हो, फिर भी चूँकि परमेश्वर का आत्मा उनके लिए उनके लेपालकपन का निश्चित बयाना और मुहर है, एक बार खुदी हुई छाप उनके हृदयों से कभी नहीं मिट सकती, जबकि त्यागे हुओं में जो ज्योति टिमटिमाती है वह बाद में बुझा दी जाती है।286 और न यह कहा जा सकता है कि आत्मा इसलिए धोखा देता है कि वह उनके हृदयों में पड़े बीज को इस प्रकार जीवित नहीं करता कि वह चुने हुओं के समान सदा अविनाशी बना रहे। मैं और आगे जाता हूँ: क्योंकि पवित्रशास्त्र की शिक्षा और प्रतिदिन के अनुभव से प्रकट है कि त्यागे हुओं पर कभी-कभी ईश्वरीय अनुग्रह का बोध अंकित होता है, इसलिए परस्पर प्रेम की कोई इच्छा उनके हृदयों में अवश्य जाग उठती होगी। इस प्रकार शाऊल में कुछ समय के लिए भक्तिपूर्ण भावना प्रबल हुई, जिसने उसे परमेश्वर से प्रेम करने की ओर प्रवृत्त किया। यह जानकर कि उससे पिता जैसी कृपा का व्यवहार किया जा रहा है, वह कुछ अंश तक उससे खिंचा। परन्तु जैसे त्यागे हुओं को परमेश्वर के पितृवत् प्रेम की कोई जड़ पकड़ी हुई प्रतीति नहीं होती, वैसे ही वे बदले में सन्तानों जैसा प्रेम नहीं देते, परन्तु किसी प्रकार की भाड़े की भावना से चलाए जाते हैं। प्रेम का आत्मा केवल मसीह को दिया गया था, इसी स्पष्ट उद्देश्य से कि वह इस आत्मा को अपने अंगों को दे; और इसमें कोई सन्देह नहीं कि पौलुस के ये शब्द केवल चुने हुओं पर ही लागू होते हैं: “परमेश्वर का प्रेम पवित्र आत्मा के द्वारा, जो हमें दिया गया है, हमारे मन में डाला गया है” (रोमियों 5:5); अर्थात् वह प्रेम जो प्रार्थना में उस भरोसे को उत्पन्न करता है जिसका मैंने ऊपर उल्लेख किया है। दूसरी ओर, हम देखते हैं कि परमेश्वर अपनी सन्तानों से रहस्यमय रीति से अप्रसन्न होता है, यद्यपि वह उनसे प्रेम करना नहीं छोड़ता। वह निश्चय उनसे घृणा नहीं करता, परन्तु अपने क्रोध के बोध से उन्हें चौंकाता है, कि शरीर का घमण्ड नम्र करे, उन्हें आलस्य से जगाए, और पश्चाताप की ओर प्रेरित करे। इसलिए वे उसी क्षण अनुभव करते हैं कि वह उनसे या उनके पापों से क्रोधित है, और साथ ही उनके व्यक्तियों पर अनुग्रहकारी भी। वे कल्पित भय से उसके क्रोध को टालने की प्रार्थना नहीं करते, और फिर भी शान्त भरोसे के साथ उसी की शरण लेते हैं। इससे प्रकट होता है कि कुछ लोगों का विश्वास, यद्यपि सच्चा विश्वास नहीं, केवल ढोंग भी नहीं है। वे उत्साह के किसी अचानक आवेग में बह जाते हैं और भ्रमवश अपने आप को धोखा देते हैं, क्योंकि आलस्य निस्सन्देह उन्हें अपने हृदयों की यथोचित सावधानी से जाँच करने से रोकता है। सम्भवतः उन लोगों की दशा ऐसी ही थी जिनके विषय में यूहन्ना बताता है कि उन्होंने मसीह पर विश्वास किया; परन्तु जिनके विषय में वह कहता है, “यीशु ने अपने आप को उनके भरोसे पर नहीं छोड़ा, क्योंकि वह सब को जानता था, और उसे प्रयोजन न था कि कोई मनुष्य के विषय में गवाही दे, क्योंकि वह आप जानता था कि मनुष्य के मन में क्या है” (यूहन्ना 2:24, 25)। यदि यह सच न होता कि बहुत-से लोग सामान्य विश्वास से गिर जाते हैं (मैं इसे सामान्य इसलिए कहता हूँ कि क्षणिक और जीवित, सदा बना रहनेवाले विश्वास में बहुत समानता है), तो मसीह अपने चेलों से यह न कहता, “यदि तुम मेरे वचन में बने रहोगे, तो सचमुच मेरे चेले ठहरोगे; और सत्य को जानोगे, और सत्य तुम्हें स्वतंत्र करेगा” (यूहन्ना 8:31, 32)। वह उनसे बोल रहा है जिन्होंने उसकी शिक्षा को ग्रहण किया था, और उन्हें विश्वास में आगे बढ़ने को प्रेरित करता है, ऐसा न हो कि अपने आलस्य से वे प्राप्त की हुई ज्योति को बुझा दें। इसी प्रकार पौलुस विश्वास को चुने हुओं का विशेष अधिकार ठहराता है, और संकेत करता है कि बहुत-से लोग ठीक जड़ न पकड़ने के कारण गिर जाते हैं (तीतुस 1:1)। इसी रीति से मत्ती में हमारा उद्धारकर्ता कहता है, “हर एक पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा” (मत्ती 16:13)। कुछ लोग, जिन्हें परमेश्वर और मनुष्य का अपमान करने में लज्जा नहीं आती, और भी अधिक घोर रीति से झूठे हैं। इस प्रकार के मनुष्यों के विरुद्ध, जो अधर्मी और झूठे ढोंग से विश्वास को अपवित्र करते हैं, याकूब कठोर वचन कहता है (याकूब 2:14)। और न पौलुस विश्वासियों के विश्वास को निष्कपट होने की माँग करता (1 तीमुथियुस 1:5), यदि ऐसे बहुत-से न होते जो ढिठाई से अपने ऊपर वह आरोपित करते हैं जो उनके पास नहीं है, और दूसरों को, और कभी-कभी अपने आप को भी, खोखले दिखावे से धोखा देते हैं। इसीलिए वह भले विवेक की तुलना उस जहाज़ से करता है जिसमें विश्वास सुरक्षित रखा जाता है, क्योंकि बहुत-से लोगों ने गिरकर उसके विषय में जहाज़ डुबो दिया है।
285 फ्रेंच में जोड़ा गया है, “Comme par une bouffee,”—मानो झोंकों में, रुक-रुककर। 286 देखें खण्ड 13, जहाँ कहा गया है कि त्यागे हुओं में कभी-कभी रहनेवाली इस छाप को विश्वास कहा जाता है, परन्तु अनुचित रूप से।
13. इस शब्द के द्विअर्थी प्रयोग पर ध्यान देना आवश्यक है: क्योंकि विश्वास का अर्थ प्रायः खरी शिक्षा के समान होता है, जैसे उस अंश में जिसे हमने अभी उद्धृत किया, और उसी पत्री में जहाँ पौलुस सेवकों को आज्ञा देता है कि वे “विश्वास के भेद को शुद्ध विवेक से सुरक्षित रखें;” वैसे ही जब वह कुछ लोगों के विश्वास से फिर जाने की निन्दा करता है। अर्थ फिर वही है जब वह कहता है कि तीमुथियुस विश्वास की बातों में पाला गया था; और वैसे ही जब वह कहता है कि अपवित्र बकवाद और झूठे नामवाले ज्ञान के विरोध बहुतों को विश्वास से भटका देते हैं। ऐसे लोगों को वह अन्यत्र विश्वास के विषय में निकम्मे कहता है। दूसरी ओर, जब वह तीतुस को आज्ञा देता है, “उन्हें कड़ाई से सुधार, कि वे विश्वास में पक्के हो जाएँ;”287 तो पक्के होने से उसका अभिप्राय शिक्षा की शुद्धता है, जो सरलता से बिगड़ जाती है और मनुष्यों की चंचलता से भ्रष्ट हो जाती है। और वास्तव में, चूँकि मसीह में, जो विश्वास से पाया जाता है, “बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हुए हैं” (कुलुस्सियों 1:2, 3), इसलिए विश्वास शब्द उचित ही स्वर्गीय शिक्षा के पूरे सार तक बढ़ाया जाता है, जिससे उसे अलग नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर, वह कभी-कभी किसी विशेष विषय तक सीमित हो जाता है, जैसे जब मत्ती उन लोगों के विषय में कहता है जिन्होंने लकवे के मारे हुए को छत में से उतारा कि यीशु ने उनका विश्वास देखा (मत्ती 9:2); और यीशु स्वयं सूबेदार के विषय में कहता है, “मैंने इस्राएल में भी ऐसा विश्वास नहीं पाया” (मत्ती 8:10)। अब यह सम्भव है कि सूबेदार केवल अपने पुत्र के चंगे होने की सोच रहा था, जिसमें उसका पूरा मन डूबा हुआ था;288 परन्तु क्योंकि वह मसीह के सीधे-से उत्तर और आश्वासन से सन्तुष्ट है और उससे शारीरिक रूप से आने की प्रार्थना नहीं करता, इसी बात से उसके विश्वास की प्रशंसा हुई। और हमने अभी दिखाया है कि पौलुस विश्वास शब्द को आश्चर्यकर्मों के दान के लिए कैसे प्रयोग करता है—ऐसा दान जो उन लोगों के पास भी था जो न परमेश्वर के आत्मा से नया जन्म पाए थे, न सच्चाई से उसका आदर करते थे। एक और अंश में वह विश्वास का प्रयोग उस शिक्षा के लिए करता है जिसके द्वारा हमें विश्वास में शिक्षा दी जाती है। क्योंकि जब वह कहता है कि “जो अधूरा है वह मिट जाएगा” (1 कुरिन्थियों 13:10), तो इसमें सन्देह नहीं कि संकेत कलीसिया की सेवकाई की ओर है, जो हमारी वर्तमान अपूर्ण दशा में आवश्यक है; इन कथन-रूपों में सादृश्य प्रत्यक्ष है। परन्तु जब विश्वास का नाम अनुचित रूप से किसी झूठे अंगीकार या झूठे दिखावे पर लगा दिया जाता है, तब यह catachresis उससे अधिक कठोर नहीं लगना चाहिए जितना तब, जब परमेश्वर का भय बुरी और बिगड़ी हुई उपासना के लिए प्रयोग होता है; जैसे जब पवित्र इतिहास में बार-बार कहा गया है कि वे परदेशी जातियाँ, जो सामरिया और आसपास के प्रदेशों में लाकर बसाई गई थीं, झूठे देवताओं का और इस्राएल के परमेश्वर का भी भय मानती थीं: अर्थात् स्वर्ग और पृथ्वी को गड्डमड्ड करती थीं। परन्तु हम अब यह खोज रहे थे कि वह विश्वास क्या है जो परमेश्वर की सन्तानों को अविश्वासियों से अलग करता है, वह विश्वास जिससे हम परमेश्वर पिता को पुकारते हैं, जिससे हम मृत्यु से पार होकर जीवन में आते हैं, और जिससे हमारा अनन्त उद्धार और जीवन मसीह हममें बसता है। आशा है कि उसकी सामर्थ्य और स्वभाव संक्षेप में और स्पष्टता से समझा दिए गए हैं।
287 1 तीमुथियुस 3:9; 4:1, 6; 2 तीमुथियुस 2:15; 3:18; तीतुस 1:13; 2:2।
288 फ्रेंच में जोड़ा गया है, “Comme il montre par ses propos quel souci il en avoit;”—जैसा कि वह अपनी बातों की तत्परता से दिखाता है कि उसे कितनी चिन्ता थी।
14. अब हम परिभाषा के अंगों को फिर अलग-अलग देखें: मुझे लगता है कि उनकी सावधानी से जाँच के बाद कोई सन्देह शेष नहीं रहेगा। ज्ञान से हमारा अभिप्राय बोध नहीं, जैसा हमें उन वस्तुओं का होता है जो मानवीय इन्द्रियों के अधीन आती हैं। क्योंकि वह ज्ञान इतना श्रेष्ठ है कि मानव मन को उस तक पहुँचने के लिए अपने आप से बहुत ऊपर उठना और आगे बढ़ना पड़ता है। और पहुँचकर भी वह जो अनुभव करता है उसे पूरी तरह नहीं समझ पाता, परन्तु जिसे समझ नहीं पाता उसकी प्रतीति से, केवल प्रतीति की निश्चयता के कारण, वह किसी मानवीय विषय को अपनी क्षमता से जितना पहचान सकता है उससे अधिक समझता है। इसीलिए पौलुस ने इसका सुन्दर वर्णन किया है कि सब पवित्र लोगों के साथ “समझ सकें कि उसकी चौड़ाई, लम्बाई, ऊँचाई और गहराई कितनी है; और मसीह के उस प्रेम को जान सकें जो ज्ञान से परे है” (इफिसियों 3:18, 19)। उसका उद्देश्य यह संकेत करना था कि जिसे हमारा मन विश्वास से ग्रहण करता है वह हर प्रकार से अनन्त है, कि इस प्रकार का ज्ञान सारी समझ से बहुत परे है। परन्तु क्योंकि वह “भेद जो समयों और पीढ़ियों से गुप्त रहा” अब “पवित्र लोगों पर प्रकट हुआ” (कुलुस्सियों 1:26), इसलिए विश्वास को पवित्रशास्त्र में कभी-कभी उचित रूप से समझ कहा जाता है (कुलुस्सियों 2:2); और ज्ञान भी, जैसे यूहन्ना के द्वारा (1 यूहन्ना 3:2), जब वह घोषणा करता है कि विश्वासी जानते हैं कि वे परमेश्वर की सन्तान हैं। और निश्चय वे जानते हैं, परन्तु तर्क के किसी प्रमाण से सिखाए जाने की अपेक्षा ईश्वरीय सत्यता की प्रतीति से दृढ़ किए जाने के कारण। यही पौलुस भी संकेत करता है जब वह कहता है कि “जब तक हम देह में रहते हैं, तब तक प्रभु से अलग हैं: (क्योंकि हम रूप को देखकर नहीं, पर विश्वास से चलते हैं)” (2 कुरिन्थियों 5:6, 7); इस प्रकार दिखाता है कि जिसे हम विश्वास से समझते हैं वह अभी हमसे दूर है और हमारी दृष्टि से ओझल है। इसलिए हम निष्कर्ष निकालते हैं कि विश्वास का ज्ञान विवेचन से अधिक निश्चयता में स्थित है।
