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प्रस्तुत ग्रन्थ का विषय
[1545 में जिनेवा में प्रकाशित फ़्रांसीसी संस्करण के आरम्भ में जोड़ा गया।]
ताकि मेरे पाठक प्रस्तुत ग्रन्थ से अधिक लाभ उठा सकें, मैं संक्षेप में उस लाभ की ओर संकेत करना चाहता हूँ जो वे इससे पा सकते हैं। क्योंकि ऐसा करके मैं उन्हें वह लक्ष्य दिखाऊँगा जिसे उन्हें इसे पढ़ते समय सामने रखना और जिस पर ध्यान लगाना चाहिए।
यद्यपि पवित्रशास्त्र में सिद्ध शिक्षा है, जिसमें कुछ जोड़ा नहीं जा सकता—क्योंकि हमारे प्रभु ने उसमें अपनी बुद्धि के अनन्त भण्डार खोल देना चाहा—फिर भी जो उससे भली-भाँति परिचित नहीं है, उसे कुछ मार्गदर्शन और निर्देश की आवश्यकता रहती है कि वह उसमें क्या ढूँढ़े, ताकि वह इधर-उधर न भटके, परन्तु निश्चित मार्ग पर चलकर उस लक्ष्य तक पहुँचे जिसकी ओर पवित्र आत्मा उसे बुलाता है।
इसलिए जिन्हें परमेश्वर से दूसरों की अपेक्षा अधिक ज्योति मिली है, उनका कर्तव्य है कि वे इस विषय में सीधे-सादे लोगों की सहायता करें, और मानो उन्हें हाथ बढ़ाकर मार्ग दिखाएँ, ताकि वे उस सार को पा सकें जो परमेश्वर ने अपने वचन में हमें सिखाना चाहा है। और इसे लिखकर इससे उत्तम रीति से नहीं किया जा सकता कि मसीही ज्ञान-विद्या में सम्मिलित मुख्य विषयों का क्रम से वर्णन किया जाए। क्योंकि जो इन्हें समझ लेता है, वह परमेश्वर की पाठशाला में एक दिन में उतनी उन्नति करने के योग्य हो जाता है जितनी कोई और तीन महीने में करेगा; क्योंकि वह बहुत हद तक जानता है कि प्रत्येक वाक्य को किससे जोड़ना है, और उसके पास हर प्रस्तुत बात को परखने की एक कसौटी होती है।
सो यह देखकर कि उद्धार की शिक्षा पाने के इच्छुक लोगों की इस रीति से सहायता करना कितना आवश्यक था, मैंने परमेश्वर से मिली सामर्थ्य के अनुसार इसी में स्वयं को लगाने का यत्न किया, और इसी उद्देश्य से प्रस्तुत पुस्तक लिखी। पहले मैंने इसे लैटिन में लिखा, कि यह सब विद्यार्थियों के काम आए, चाहे वे किसी भी जाति के हों; फिर अपने फ़्रांसीसी देशवासियों तक इसका जो भी फल पहुँचाना चाहा, उसके लिए इसे अपनी ही भाषा में अनुवाद किया। मैं इसके पक्ष में अधिक गवाही देने, या यह घोषित करने का साहस नहीं करता कि इसे पढ़ना कितना लाभदायक होगा, ऐसा न हो कि मैं अपनी रचना को बहुत ऊँचा आँकता दिखाई दूँ। तथापि इतना मैं वचन दे सकता हूँ कि यह परमेश्वर की सब सन्तानों के लिए पवित्र ग्रन्थ को समझने का सही और सरल प्रवेश खोलनेवाली एक कुंजी के समान होगी। 23 इसलिए यदि हमारा प्रभु आगे मुझे टीकाएँ लिखने का साधन और अवसर दे, तो मैं यथासम्भव संक्षिप्तता बरतूँगा, क्योंकि लम्बी विषयान्तर चर्चाओं की आवश्यकता नहीं रहेगी, इसलिए कि मैंने मसीहियत से जुड़े सब अनुच्छेदों को इसमें एक प्रकार से विस्तार से निकाल दिया है।
और चूँकि हमें मानना पड़ता है कि सब सत्य और खरी शिक्षा परमेश्वर से ही आती है, इसलिए इस पुस्तक के विषय में अपना विचार मैं निडर होकर कहूँगा: मैं इसे अपना नहीं, परमेश्वर का कार्य स्वीकार करता हूँ। इसकी जो प्रशंसा बनती है, वह उसी को दी जानी चाहिए। इस रचना के विषय में मेरा मत यह है: जो प्रभु के वचन का आदर करते हैं, उन सबसे मेरा आग्रह है कि इसे पढ़ें और परिश्रम से अपनी स्मृति में बैठा लें—यदि वे पहले तो मसीही शिक्षा का सारांश, और दूसरे पुराने और नए नियम को लाभ के साथ पढ़ने की भूमिका पाना चाहते हों। जब वे ऐसा कर चुकेंगे, तब अनुभव से जान लेंगे कि मैंने उन्हें शब्दों से बहकाना नहीं चाहा। यदि कोई इसमें जो कुछ है उसे पूरा न समझ सके, तब भी वह निराश होकर इसे न छोड़े; वरन् इस आशा में कि एक अनुच्छेद दूसरे की अधिक सुपरिचित व्याख्या कर देगा, सदा आगे पढ़ता रहे। सब बातों से बढ़कर मैं यह सलाह दूँगा कि जो प्रमाण मैं उसमें से देता हूँ, उन पर विचार करते समय पवित्रशास्त्र की ही शरण ली जाए।
