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पहली पुस्तक
1. मनुष्य की सच्ची बुद्धि सृष्टिकर्ता और छुड़ानेवाले परमेश्वर के ज्ञान में निहित है।
2. यह ज्ञान स्वभाव से हमारे भीतर बोया हुआ है, और इसका उद्देश्य परमेश्वर की सही रीति से की गई आराधना होना चाहिए, अर्थात् भय और प्रेम के साथ ईश्वरत्व के प्रति श्रद्धा।
3. परन्तु यह बीज अज्ञानता से बिगड़ जाता है, जिससे अन्धविश्वासी उपासना उत्पन्न होती है; और दुष्टता से, जिससे दासवत् भय और परमेश्वर के प्रति बैर उत्पन्न होता है।
4. यह ज्ञान एक और स्रोत से भी प्राप्त होता है, अर्थात् सारे जगत की रचना से और पवित्रशास्त्र से।
5. यह रचना हमें सिखाती है कि स्वर्ग और पृथ्वी की सब वस्तुओं की सृष्टि करने में, और साधारण तथा असाधारण शासन के द्वारा उनकी रक्षा करने में, जिससे उसका विधान और स्पष्ट रूप से प्रकट होता है, परमेश्वर की भलाई, सामर्थ, न्याय और बुद्धि क्या है। यह हमें यह भी सिखाती है कि हमारी आवश्यकताएँ क्या हैं, कि हम परमेश्वर की भलाई, सामर्थ और बुद्धि पर भरोसा रखना, उसकी आज्ञाओं का पालन करना, विपत्ति में उसकी शरण लेना, और जो दान हम भोगते हैं उनके लिये उसका धन्यवाद करना सीखें।
6. पवित्रशास्त्र के द्वारा भी सृष्टिकर्ता परमेश्वर जाना जाता है। हमें विचार करना चाहिए कि ये पवित्रशास्त्र क्या हैं; कि वे सत्य हैं और परमेश्वर के आत्मा से निकले हैं; जो पवित्र आत्मा की गवाही से, पवित्रशास्त्र के प्रभाव और प्राचीनता से, भविष्यद्वाणियों की निश्चितता से, व्यवस्था की चमत्कारिक सुरक्षा से, प्रेरितों की बुलाहट और लेखों से, कलीसिया की सहमति से, और शहीदों की दृढ़ता से प्रमाणित होता है; इससे प्रकट है कि भक्ति के सब सिद्धान्त उन उन्मादियों द्वारा उलट दिए गए हैं जो पवित्रशास्त्र को एक ओर रखकर प्रकाशनों की ओर भागते हैं।
7. फिर, वे क्या सिखाते हैं; अर्थात् परमेश्वर अपने आप में, और सब वस्तुओं की सृष्टि और शासन में कैसा है।
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* सौ सूक्तियाँ, विविध तालिकाओं और सूचियों सहित, जो सन्दर्भ देखने को बहुत सरल बनाएँगी और मसीही धर्म की संस्थाओं के इस अनुवाद की उपयोगिता और मूल्य को बढ़ाएँगी, ऑक्टरार्डर के रेव. विलियम प्रिंगल ने कृपापूर्वक उपलब्ध कराई हैं।
8. परमेश्वर अपने आप में अनन्त, अदृश्य, सनातन और सर्वशक्तिमान है; इससे यह निकलता है कि जो परमेश्वर को दृश्य आकार देते हैं वे भूल में हैं। उसकी एक ही सत्ता में तीन व्यक्ति हैं: पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा।
9. सब वस्तुओं की सृष्टि में मुख्यतः ये विचारणीय हैं: 1. स्वर्गीय और आत्मिक सत्ताएँ, अर्थात् स्वर्गदूत, जिनमें कुछ भले हैं और भक्तों के रक्षक हैं, और कुछ बुरे हैं, सृष्टि से नहीं, वरन् भ्रष्टता से; 2. पार्थिव सत्ताएँ, और विशेष रूप से मनुष्य, जिसकी सिद्धता आत्मा और शरीर दोनों में प्रकट होती है।
10. सब वस्तुओं के शासन में परमेश्वर का स्वभाव प्रकट होता है। उसका शासन एक दृष्टि से सार्वभौमिक है, जिससे वह सब प्राणियों को उन गुणों के अनुसार चलाता है जो उसने सृष्टि के समय उनमें से प्रत्येक को दिए।
11. दूसरी दृष्टि से वह विशेष है; जो आकस्मिक घटनाओं के विषय में प्रकट होता है, कि यदि किसी पर विपत्ति या कोई सुखद परिणाम आए, तो उसे उसका सारा श्रेय परमेश्वर को देना चाहिए; और जो वस्तुएँ प्रकृति के किसी निश्चित नियम के अनुसार कार्य करती हैं, यद्यपि उनके विशेष गुण उन्हें स्वभाव से दिए गए थे, फिर भी वे अपनी सामर्थ केवल उतना ही प्रयोग करती हैं जितना परमेश्वर का प्रत्यक्ष हाथ उन्हें चलाता है।
12. इसे बीते और आनेवाले समय के सम्बन्ध में भी देखा जाता है। बीता हुआ, कि हम सीखें कि सब कुछ परमेश्वर के ठहराव से होता है, जो साधनों से, या बिना साधनों के, या साधनों के विरुद्ध कार्य करता है; ताकि जो कुछ होता है वह भक्तों के लिये भला और दुष्टों के लिये बुरा ठहरे। आनेवाला, जिससे मनुष्यों के विचार-विमर्श जुड़े हैं, और जो दिखाता है कि हमें वैध साधनों का प्रयोग करना चाहिए; क्योंकि जिस विधान पर हम भरोसा रखते हैं वह अपने साधन आप जुटाता है।
13. अन्त में, उस लाभ पर ध्यान देने से जो भक्त इससे पाते हैं। क्योंकि हम निश्चय जानते हैं, 1. कि परमेश्वर सारी मानव जाति की, पर विशेष रूप से अपनी कलीसिया की, चिन्ता करता है। 2. कि परमेश्वर सब कुछ अपनी इच्छा से चलाता और अपनी बुद्धि से व्यवस्थित करता है। 3. कि भला करने की उसमें अत्यन्त प्रचुर सामर्थ है; क्योंकि स्वर्ग और पृथ्वी उसके हाथ में हैं, सब प्राणी उसके शासन के अधीन हैं, भक्त उसकी सुरक्षा में विश्राम करते हैं, और अधोलोक की सामर्थ उसके अधिकार से रोकी गई है। कि कुछ भी संयोग से नहीं होता, चाहे कारण छिपे हों, वरन् परमेश्वर की इच्छा से होता है; उसकी उस गुप्त इच्छा से जिसे हम जाँचने में असमर्थ हैं पर श्रद्धा से आराधना करते हैं, और उसकी उस इच्छा से जो हम तक व्यवस्था और सुसमाचार में पहुँचाई गई है।
