पुस्तक II · अध्याय 8

नैतिक व्यवस्था की व्याख्या (भाग 1/3)

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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नैतिक व्यवस्था की व्याख्या (भाग 1/3)

अध्याय 8।

नैतिक व्यवस्था की व्याख्या।

इस अध्याय में चार भाग हैं। I. विषय को समझने के लिए आवश्यक कुछ सामान्य बातें भूमिका के रूप में कही गई हैं, खण्ड 1–5। II. नैतिक व्यवस्था का अर्थ निश्चित करने और समझाने में तीन बातों पर सदा ध्यान रखना चाहिए, खण्ड 6–12। III. नैतिक व्यवस्था, अर्थात् दस आज्ञाओं की व्याख्या, खण्ड 13–15। IV. वह उद्देश्य जिसके लिए सम्पूर्ण व्यवस्था दी गई है—अर्थात् केवल आरम्भिक सिद्धान्त ही नहीं, वरन् सिद्धता की शिक्षा देना, खण्ड 51 से अध्याय के अन्त तक।

खण्ड।

1. व्यवस्था इसलिए लिखित रूप में दी गई कि वह परमेश्वर और अपने विषय के उस ज्ञान की, जिसे स्वाभाविक व्यवस्था अल्प और धुँधले रूप में सिखाती है, अधिक पूर्णता और सिद्धता से शिक्षा दे। इसका प्रमाण नैतिक व्यवस्था के मुख्य अंगों की गणना से मिलता है; और सब के हृदयों में लिखी हुई स्वाभाविक व्यवस्था की उस आवाज़ से भी, जो पाप के कारण किसी न किसी रीति से मिट गई है।

2. कुछ सामान्य सूत्र। 1. व्यवस्था से मिले परमेश्वर के ज्ञान द्वारा हम सीखते हैं कि परमेश्वर हमारा पिता और शासक है। धार्मिकता उसे भाती है, अधर्म उसकी दृष्टि में घृणित है। इसलिए हम चाहे कितने ही निर्बल हों, हमारा कर्तव्य है कि एक को अपनाएँ और दूसरे से बचें।

3. व्यवस्था से मिले अपने ज्ञान द्वारा हम अपनी पूरी असमर्थता को पहचानना सीखते हैं, हम लज्जित होते हैं; और यह देखकर कि अपने में धार्मिकता खोजना व्यर्थ है, उसे कहीं और खोजने की ओर प्रेरित होते हैं।

4. इसीलिए परमेश्वर ने अपनी आज्ञाओं के साथ प्रतिज्ञाएँ और चेतावनियाँ जोड़ी हैं। ये वर्तमान जीवन तक सीमित नहीं हैं, वरन् स्वर्गीय और अनन्त बातों को भी समेटती हैं। इसके अतिरिक्त ये परमेश्वर की निष्कलंक पवित्रता, उसके धार्मिकता-प्रेम, और हम पर उसकी कृपा की साक्षी देती हैं।

5. व्यवस्था यह भी दिखाती है कि परमेश्वर को आज्ञाकारिता से बढ़कर कुछ प्रिय नहीं। इसलिए आराधना के सब अन्धविश्वासी और कपटपूर्ण प्रकार दोषी ठहराए गए हैं। अन्धविश्वासी आराधना और मनुष्य की धृष्टता का उपाय।

6. अध्याय का दूसरा भाग, जिसमें तीन अवलोकन या नियम हैं। पहला नियम: हमारा जीवन व्यवस्था के अनुसार केवल बाहरी भद्रता में ही नहीं, वरन् भीतरी और आत्मिक धार्मिकता में ढलना चाहिए। इस बात में परमेश्वर की व्यवस्था नागरिक व्यवस्थाओं से भिन्न है, क्योंकि वह आत्मिक व्यवस्था देनेवाला है, मनुष्य नहीं। यह नियम बहुत व्यापक है, और इस पर यथेष्ट ध्यान नहीं दिया जाता।

7. इस पहले नियम की पुष्टि मसीह के अधिकार से, और सोफ़िस्टों की उस झूठी मान्यता के खण्डन से, जो कहते हैं कि मसीह केवल एक दूसरा मूसा है।

8. दूसरा अवलोकन या नियम, जिस पर सावधानी से ध्यान देना है—अर्थात् आज्ञा के उद्देश्य की खोज तब तक करनी चाहिए जब तक यह मालूम न हो जाए कि व्यवस्था देनेवाला किसे स्वीकार करता है और किसे नहीं। उदाहरण। जहाँ व्यवस्था स्वीकार करती है, वहाँ उसका विपरीत दोषी ठहराया जाता है, और इसी प्रकार उलटे भी।

9. इस अन्तिम बात की पूरी व्याख्या। उदाहरण।

10. व्यवस्था प्रत्येक अपराध में सबसे अधिक अभक्ति की बात को बताती है, ताकि दिखाए कि अपराध कितना घृणित है। उदाहरण।

11. तीसरा अवलोकन या नियम व्यवस्था के दो पट्टियों में विभाजन से सम्बन्ध रखता है: पहली पट्टी में परमेश्वर के प्रति हमारा कर्तव्य है, दूसरी में अपने पड़ोसी के प्रति। इन दोनों का सम्बन्ध आवश्यक और अटूट है। उनका अटल क्रम। व्यवस्था का सार।

12. व्यवस्था का दस आज्ञाओं में विभाजन। उनके विषय में अनेक भेद किए गए हैं, परन्तु सबसे उत्तम भेद वह है जो उन्हें दो पट्टियों में बाँटता है। चार आज्ञाएँ पहली पट्टी की हैं, और छः दूसरी की।

13. अध्याय का तीसरा भाग, जिसमें दस आज्ञाओं की व्याख्या है। भूमिका व्यवस्था के अधिकार को स्थापित करती है। यह वह तीन प्रकार से करती है। पहला, अपनी महिमा की घोषणा द्वारा।

14. व्यवस्था की भूमिका उसके अधिकार को स्थापित करती है। दूसरा, परमेश्वर की पितृवत् कृपा का स्मरण दिलाकर।

15. तीसरा, मिस्र देश से छुटकारे का स्मरण दिलाकर। परमेश्वर अपने आपको कुछ विशेषणों से क्यों अलग बताता है। मिस्र से छुटकारे का उल्लेख क्यों किया गया है। उस छुटकारे का स्मरण अब भी किस रीति से और कहाँ तक हम पर प्रभाव डाले।

16. पहली आज्ञा की व्याख्या। उसका उद्देश्य। परमेश्वर को अपना ईश्वर रखना क्या है, और पराए ईश्वर रखना क्या है। इस आज्ञा में परमेश्वर के प्रति आराधना, भरोसा, प्रार्थना, धन्यवाद, और सच्ची भक्ति की माँग है। अन्धविश्वास, बहुदेववाद और नास्तिकता वर्जित हैं। “मेरे सामने” इन शब्दों का क्या अर्थ है।

17. दूसरी आज्ञा की व्याख्या। उसका उद्देश्य और सार। दो भाग। वर्जित आकारों की संक्षिप्त गणना।

18. चेतावनी क्यों जोड़ी गई है। गहरा प्रभाव डालने के लिए परमेश्वर पर चार उपाधियाँ लगाई गई हैं। वह सामर्थी, जलन रखनेवाला, बदला लेनेवाला और दयालु कहलाता है। जलन रखनेवाला क्यों कहा गया। समानता से निकाला गया कारण।

19. जोड़ी गई चेतावनी की व्याख्या। पहला, पितरों के अधर्म का दण्ड सन्तान पर डालने के विषय में। इस विषय में एक गलत व्याख्या का खण्डन, और चेतावनी का सच्चा अर्थ।

20. क्या माता-पिता के पापों का यह दण्ड ईश्वरीय न्याय के विरुद्ध है। प्रत्यक्ष में विरोधी लगनेवाले अंशों का मेल।

21. अन्तिम भाग की व्याख्या—अर्थात् हज़ारों पर दया दिखाने की। इस प्रतिज्ञा का उपयोग। प्रायः उठनेवाले एक अपवाद पर विचार। इस आशीष की सीमा।

22. तीसरी आज्ञा की व्याख्या। उसका उद्देश्य और सार। तीन भाग। इन पर विचार। परमेश्वर का नाम व्यर्थ लेना क्या है। शपथ खाना। इस आज्ञा और नौवीं आज्ञा में भेद।

23. शपथ की परिभाषा। यह ईश्वरीय आराधना का एक प्रकार है। इसकी व्याख्या।

24. इस आज्ञा के भंग होने के अनेक प्रकार। 1. जिस बात को हम झूठ जानते हैं उसके लिए परमेश्वर को साक्षी बनाना। इससे उसका जो अपमान होता है।

25. भंग होने के प्रकारों की निरन्तरता। 2. तुच्छ बातों में परमेश्वर को साक्षी बनाना। इससे जो तिरस्कार प्रकट होता है। शपथ कब और कैसे ली जानी चाहिए। 3. शपथ खाते समय परमेश्वर के स्थान पर उसके सेवकों को रखना।

26. पुनर्बपतिस्मावादियों का, जो सब शपथों की निन्दा करते हैं, खण्डन। 1. मसीह के अधिकार से, जो किसी बात में पिता का विरोधी नहीं हो सकता। पुनर्बपतिस्मावादियों द्वारा बिगाड़े गए एक अंश की व्याख्या। उस अंश में हमारे उद्धारकर्ता का अभिप्राय। वहाँ शपथों को वर्जित करने से उसका क्या तात्पर्य है।

27. शपथों की वैधता की पुष्टि मसीह और प्रेरितों से। कुछ लोग सार्वजनिक शपथों को तो मानते हैं, पर निजी शपथों को नहीं। निजी शपथों की वैधता का प्रमाण तर्क और उदाहरण दोनों से। पवित्रशास्त्र से उदाहरण।

28. चौथी आज्ञा की व्याख्या। उसका उद्देश्य। तीन प्रयोजन।

29. पहले प्रयोजन की व्याख्या—अर्थात् आत्मिक विश्राम की छाया। यही इस आज्ञा का मुख्य उद्देश्य है। इसमें परमेश्वर हमारे पवित्र करनेवाले के रूप में प्रस्तुत है; इसलिए हमें काम से रुकना चाहिए, ताकि हम में परमेश्वर का काम बाधित न हो।

30. पवित्रशास्त्र में सात की संख्या सिद्धता की सूचक है, इसलिए इस दृष्टि से यह आज्ञा विश्रामदिन की स्थायिता और अन्तिम दिन में उसकी पूर्ति को सूचित कर सकती है।

31. आज्ञा को अधिक सरल दृष्टि से देखें तो संख्या का कोई महत्त्व नहीं, बस इतना हो कि हम अपने सब कामों से स्थायी विश्राम की शिक्षा को बनाए रखें, और साथ ही दिनों के अन्धविश्वासी पालन से बचें। आज्ञा का रीति-विधि सम्बन्धी भाग मसीह के आगमन से रद्द हो गया।

32. आज्ञा के दूसरे और तीसरे प्रयोजन की व्याख्या। ये दोनों दोहरे और स्थायी हैं। इसकी पुष्टि। धार्मिक सभाओं के विषय में।

33. प्रभु के दिन के पालन के विषय में, उन लोगों के उत्तर में जो शिकायत करते हैं कि इस प्रकार मसीही लोगों को यहूदी रीति में ढाला जाता है। आपत्ति।

34. इस विधि का आधार। इसमें किसी प्रकार की अन्धविश्वासी अनिवार्यता नहीं है। आज्ञा का सार।

35. पाँचवीं आज्ञा (दूसरी पट्टी की पहली) की व्याख्या। उसका उद्देश्य और सार। माता-पिता का आदर कहाँ तक देय है। पिता शब्द किन पर लागू होता है।

36. इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि जिनसे यह आदर माँगा जाता है वे योग्य हैं या अयोग्य। यह आदर विशेषकर माता-पिता के लिए माँगा गया है। इसके तीन भाग हैं। 1. श्रद्धा।

37. माता-पिता के आदर की निरन्तरता। 2. आज्ञाकारिता। 3. कृतज्ञता। प्रतिज्ञा क्यों जोड़ी गई। उसे किस अर्थ में लेना चाहिए। वर्तमान जीवन ईश्वरीय आशीष की गवाही है। अपवाद पर विचार और उसकी व्याख्या।

38. इसके विपरीत, आज्ञा न माननेवाली सन्तान पर श्राप सुनाया गया है। माता-पिता और उनके स्थान पर रहनेवालों की आज्ञाकारिता कहाँ तक देय है।

39. छठी आज्ञा की व्याख्या। उसका उद्देश्य और सार। परमेश्वर, आत्मिक व्यवस्था देनेवाले के रूप में, हृदय की हत्या को भी वर्जित करता है, और माँग करता है कि हम अपने पड़ोसी के प्राण को बचाने की सच्ची इच्छा रखें।

40. इस आज्ञा का दोहरा आधार। 1. मनुष्य परमेश्वर का स्वरूप है। 2. वह हमारा अपना शरीर है।

41. सातवीं आज्ञा की व्याख्या। उसका उद्देश्य और सार। व्यभिचार से बचने का उपाय।

42. संयम एक उत्तम वरदान है, जब वह केवल परमेश्वर के वश में हो। कुछ लोगों को वह बिलकुल नहीं दिया गया; औरों को केवल कुछ समय के लिए दिया गया है। अविवाहित रहने के पक्ष के तर्क का खण्डन।

43. हर एक व्यक्ति तब तक विवाह से दूर रह सकता है जब तक वह अविवाहित रहने के योग्य है। सच्चा ब्रह्मचर्य और उसका उचित उपयोग। जिसे संयम का वरदान नहीं मिला, वह अविवाहित रहकर परमेश्वर से और उसके ठहराए हुए स्वभाव से युद्ध करता है। पवित्रता की परिभाषा।

44. विवाहित जीवन में ध्यान रखने योग्य सावधानियाँ। पवित्रता के विरुद्ध हर बात यहाँ दोषी ठहराई गई है।

45. आठवीं आज्ञा की व्याख्या। उसका उद्देश्य और सार। चोरी के चार प्रकार। इस आज्ञा के द्वारा दोषी ठहराए गए बुरे कार्य। चोरी के अन्य विशेष प्रकार।

46. इस आज्ञा का उचित पालन। चार शीर्षक। प्रयोग। 1. प्रजा और न्यायी के लिए। 2. कलीसिया के पासबानों और उनकी भेड़-बकरियों के लिए। 3. माता-पिता और सन्तान के लिए। 4. बूढ़ों और जवानों के लिए। 5. सेवकों और स्वामियों के लिए। 6. व्यक्तियों के लिए।

47. नौवीं आज्ञा की व्याख्या। उसका उद्देश्य और सार। आज्ञा का सत्त्व—झूठ से घृणा और सत्य का अनुसरण। झूठ के दो प्रकार। सार्वजनिक और निजी गवाही। इस आज्ञा की न्यायसंगतता।

48. इस आज्ञा के भंग होने के अनेक प्रकार। 1. निन्दा से। 2. बुरा बोलने से—जो मसीही प्रेम के कर्तव्यों के विपरीत है। 3. ठट्ठा या व्यंग्य से। 4. ताक-झाँक की जिज्ञासा और कठोर निर्णयों की प्रवृत्ति से।

49. दसवीं आज्ञा की व्याख्या। उसका उद्देश्य और सार। लालच शब्द का क्या अर्थ है। सलाह और यहाँ दोषी ठहराए गए लालच में भेद।

50. परमेश्वर इतनी पवित्रता क्यों माँगता है। आपत्ति। उत्तर। यहाँ पड़ोसी के प्रति प्रेम की विशेष रूप से सराहना की गई है। घर, पत्नी, दास, दासी, बैल और गधे आदि का उल्लेख क्यों किया गया है। इस आज्ञा का दो में अनुचित विभाजन।

51. अध्याय का अन्तिम भाग। व्यवस्था का उद्देश्य। प्रमाण। दस आज्ञाओं का सारांश। व्यवस्था केवल आरम्भिक बातें और प्रथम सिद्धान्त ही नहीं देती, वरन् धार्मिकता का एक सिद्ध मापदण्ड देती है, जो ईश्वरीय पवित्रता के साँचे में ढला है।

52. सुसमाचारों और पत्रियों में केवल दूसरी पट्टी का ही उल्लेख क्यों है, पहली का क्यों नहीं। भविष्यद्वक्ताओं में भी यही बात पाई जाती है।

53. पिछले खण्ड में कही गई बात पर उठनेवाली एक आपत्ति का निवारण।

54. ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार भली-भाँति नियन्त्रित आचरण की पहचान पड़ोसी के प्रति प्रेम है। जो लोग स्वार्थ-प्रेम को पहला स्थान देते हैं, वे इसे उलट देते हैं। उनके मत का खण्डन।

55. हमारा पड़ोसी कौन है। इस विषय में स्कूली धर्मशास्त्रियों की दोहरी भूल।

56. यह भूल इसमें है: I. आज्ञाओं को सलाह में बदल देना, जिन्हें केवल साधु पालन करें।

57. पवित्रशास्त्र और प्राचीन धर्मशास्त्रियों से इस भूल का खण्डन। चालाकी भरी आपत्ति का निवारण।

58. स्कूली धर्मशास्त्रियों की भूल यह है: II. छिपी हुई अभक्ति और लालच को साधारण पाप कहना। खण्डन, जो इनसे निकाला गया है: 1. सम्पूर्ण दस आज्ञाओं पर विचार से। 2. एक प्रेरित की गवाही से। 3. मसीह के अधिकार से। 4. परमेश्वर के स्वभाव और महिमा से। 5. पाप पर सुनाए गए दण्ड से। निष्कर्ष।

59. खण्डन, जो इनसे निकाला गया है: 1. सम्पूर्ण दस आज्ञाओं पर विचार से। 2. एक प्रेरित की गवाही से। 3. मसीह के अधिकार से। 4. परमेश्वर के स्वभाव और महिमा से। 5. पाप पर सुनाए गए दण्ड से। निष्कर्ष।

1. मेरा विश्वास है कि यहाँ व्यवस्था की दस आज्ञाओं को प्रस्तुत करके उनकी संक्षिप्त व्याख्या करना अनुचित न होगा। इस प्रकार यह अधिक स्पष्ट हो जाएगा कि जो आराधना परमेश्वर ने आरम्भ में ठहराई थी वह अब भी प्रभावी है (जिस बात की ओर मैं पहले संकेत कर चुका हूँ); और फिर एक दूसरी बात भी पक्की होगी—अर्थात् यह कि यहूदियों ने व्यवस्था से न केवल यह सीखा कि सच्ची भक्ति किसमें है, वरन् उसे पालन करने में अपनी असमर्थता का अनुभव करके न्यायदण्डों के भय से दबकर, अपनी इच्छा के विरुद्ध भी, मध्यस्थ की ओर खिंच गए। परमेश्वर के सच्चे ज्ञान का सार बताते समय190 हमने दिखाया था कि हम परमेश्वर के स्वभाव की कोई यथार्थ धारणा उसकी महिमा से भयभीत हुए बिना और उसकी सेवा के लिए बाध्य हुए बिना नहीं बना सकते। अपने ज्ञान के विषय में हमने दिखाया था कि वह मुख्यतः इसमें है कि हम अपनी सामर्थ्य का सारा विचार त्याग दें और अपनी धार्मिकता के सब भरोसे से अपने को रिक्त कर लें; और दूसरी ओर, अपनी घटियों के पूरे बोध में, सच्ची दीनता और आत्म-नम्रता सीखें। ये दोनों बातें प्रभु अपनी व्यवस्था के द्वारा पूरी करता है: पहले, जब वह हमारी आज्ञाकारिता पर अपने अधिकार का दावा करते हुए हमें अपनी महिमा का आदर करने को बुलाता है और वह आचरण ठहराता है जिससे यह आदर प्रकट होता है; और दूसरे, जब वह अपनी न्यायशीलता का मापदण्ड घोषित करता है (ऐसा मापदण्ड जिसकी खराई का हमारा स्वभाव, बिगड़ा और टेढ़ा होने के कारण, निरन्तर विरोध करता है, और जिसकी सिद्धता तक पहुँचना हमारी सामर्थ्य के लिए, भलाई के प्रति उसकी दुर्बलता और निर्बलता के कारण, बहुत दूर है), तब वह हम पर असमर्थता और अधर्म दोनों का दोष लगाता है। इसके अतिरिक्त, दोनों पट्टियों में जो बातें हैं वे एक प्रकार से उस भीतरी व्यवस्था द्वारा हमें सुझाई जाती हैं, जो, जैसा पहले कहा जा चुका है, एक प्रकार से हर हृदय पर लिखी और अंकित है। क्योंकि विवेक हमें अपनी संवेदनाओं को दबाने और बिना बाधा के सोए रहने नहीं देता, वरन् भीतरी साक्षी और चिताने वाले के रूप में काम करता है, हमें स्मरण दिलाता है कि हम पर परमेश्वर का क्या ऋण है, भले और बुरे का भेद बताता है, और इस प्रकार हमें कर्तव्य से भटकने का दोषी ठहराता है। परन्तु मनुष्य, भ्रम के अन्धकार में बन्द होने के कारण, उस स्वाभाविक व्यवस्था के द्वारा उस आराधना की जो परमेश्वर को स्वीकार्य है, कोई सहने योग्य धारणा भी मुश्किल से बना पाता है। किसी भी दशा में वह उसका कोई सही ज्ञान प्राप्त करने से बहुत दूर है। इसके अतिरिक्त, वह अहंकार और महत्त्वाकांक्षा से इतना फूला हुआ और स्वार्थ-प्रेम से इतना अन्धा है कि अपने भीतर झाँक नहीं पाता, और मानो उतर नहीं पाता, कि इस प्रकार अपने को दीन और नम्र करना और अपनी दुर्दशा को मानना सीखे। इसलिए हमारी मन्दता और हठ, दोनों के अनिवार्य उपाय के रूप में प्रभु ने हमें अपनी लिखित व्यवस्था दी है, जो अपनी निश्चित गवाहियों से स्वाभाविक व्यवस्था की अस्पष्टता को दूर करती है, और हमारी सुस्ती को झटककर हमारे मनों पर अधिक जीवित और स्थायी छाप डालती है।

2. अब व्यवस्था की शिक्षा को समझना सरल है—अर्थात् यह कि परमेश्वर, हमारे सृष्टिकर्ता होने के कारण, यह अधिकार रखता है कि हम उसे पिता और स्वामी मानें, और इसलिए हमसे भय, प्रेम, श्रद्धा और महिमा पाए; वरन् यह कि हम अपने नहीं हैं कि जो मार्ग वासना सुझाए उस पर चलें, परन्तु उसकी पूरी आज्ञा मानने और उसकी भली इच्छा में पूरी तरह सन्तुष्ट रहने के लिए बाध्य हैं। फिर, व्यवस्था सिखाती है कि न्याय और खराई उसे प्रिय हैं, और अन्याय उसके लिए घृणित है; इसलिए, ताकि हम अभक्ति-भरी कृतघ्नता से अपने सृजनहार से विद्रोह न करें, हमारा सारा जीवन धार्मिकता के अभ्यास में बीतना चाहिए। क्योंकि यदि हम उचित आदर तभी दिखाते हैं जब उसकी इच्छा को अपनी इच्छा से ऊपर रखते हैं, तो इससे यह निकलता है कि उसकी एकमात्र उचित सेवा न्याय, पवित्रता और भक्ति का अभ्यास है। न हम यह बहाना बना सकते हैं कि हममें सामर्थ्य नहीं, और उन ऋणियों के समान, जिनके साधन चुक गए हैं, हम चुकाने में असमर्थ हैं। हमें यह अनुमति नहीं कि हम परमेश्वर की महिमा को अपनी योग्यता से नापें; हम चाहे कैसे ही हों, वह सदा अपने समान ही रहता है, धार्मिकता का मित्र, अधार्मिकता का शत्रु; और वह हमसे जो कुछ भी माँगे, चूँकि वह केवल वही माँग सकता है जो उचित है, हम स्वभावतः आज्ञा मानने के बन्धन में हैं। ऐसा करने में हमारी असमर्थता हमारा अपना दोष है। यदि वासना, जिसमें पाप का प्रभुत्व है, हमें ऐसा जकड़ ले कि हम अपने पिता की आज्ञा मानने के लिए स्वतन्त्र न रहें, तो विवशता को बचाव के रूप में रखने का कोई आधार नहीं, क्योंकि यह बुरी विवशता भीतर की है, और इसका दोष हमारे ही सिर पर ठहरना चाहिए।

3. जब हम व्यवस्था के मार्गदर्शन में इतनी दूर बढ़ आए हैं, तो उसी मार्गदर्शन में हमें अपने भीतर उतरना भी चाहिए। इस प्रकार हम अन्त में दो परिणामों पर पहुँचते हैं: पहला, अपने आचरण की तुलना व्यवस्था की धार्मिकता से करके हम देखते हैं कि वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार होने से कितना दूर है, और इसलिए हम उसकी सृष्टि में अपना स्थान रखने के कितने अयोग्य हैं, उसके पुत्र गिने जाने की तो बात ही क्या; और दूसरा, अपनी सामर्थ्यों का सर्वेक्षण करके हम देखते हैं कि वे व्यवस्था को पूरा करने के लिए केवल असमान ही नहीं, वरन् सर्वथा शून्य हैं। इसका अनिवार्य परिणाम यह होता है कि अपनी योग्यता पर अविश्वास, और मन में चिन्ता और घबराहट उत्पन्न होती है। विवेक अपने दोष का बोझ अनुभव करते ही परमेश्वर के न्याय की ओर मुड़ जाता है, और इस न्याय का विचार मृत्यु का भय जगाए बिना नहीं रह सकता। इसी प्रकार हमारी पूरी निर्बलता के प्रमाण तुरन्त अपनी सामर्थ्य से निराशा उत्पन्न करते हैं। दोनों भावनाएँ दीनता और नम्रता उत्पन्न करती हैं, और इसलिए पापी, अनन्त मृत्यु की सम्भावना से भयभीत होकर (जिसे वह अपने अधर्म के कारण अपने ऊपर न्यायसंगत रूप से मँडराती देखता है), परमेश्वर की दया की ओर मुड़ता है, जो सुरक्षा का एकमात्र बन्दरगाह है। व्यवस्था का जो ऋण उस पर है उसे चुकाने में अपनी पूरी असमर्थता अनुभव करके, और इस प्रकार अपने से निराश होकर, वह सोचता है कि सहायता के लिए किसी और ओर देखे और उसका सहारा ले।

4. परन्तु प्रभु अपने न्याय के प्रति श्रद्धा उत्पन्न करना ही पर्याप्त नहीं समझता। हमारे हृदयों में अपने लिए प्रेम और साथ ही अधर्म के लिए घृणा भर देने के लिए उसने प्रतिज्ञाएँ और चेतावनियाँ जोड़ दी हैं। हमारे मन की आँख इतनी धुँधली है कि केवल भलाई के सौन्दर्य से आकर्षित नहीं होती, इसलिए हमारे परम दयालु पिता ने अपनी बड़ी कृपा में चाहा कि प्रतिफल की आशा से हमें भलाई से प्रेम करने और उसकी लालसा करने के लिए लुभाए। इसलिए वह घोषणा करता है कि पुण्य के प्रतिफल उसके पास संचित हैं, कि जो उसकी आज्ञाओं का पालन करेंगे उनमें से किसी का परिश्रम व्यर्थ नहीं जाएगा। दूसरी ओर, वह यह प्रकट करता है कि अधर्म उसकी दृष्टि में घृणित तो है ही, पर वह बिना दण्ड के नहीं छूटेगा, क्योंकि वह अपनी अपमानित महिमा का बदला लेनेवाला होगा। हर प्रकार से हमारा उत्साह बढ़ाने के लिए वह उन लोगों की आज्ञाकारिता के लिए, जो उसकी आज्ञाओं का पालन करेंगे, वर्तमान आशीषों की भी और अनन्त सुख की भी प्रतिज्ञा करता है, जबकि अपराधियों को वर्तमान दुःख की भी और अनन्त मृत्यु के दण्ड की भी चेतावनी देता है। यह प्रतिज्ञा, “इसलिए तुम मेरी विधियों और नियमों को मानना; जिस मनुष्य ने उन्हें माना वह उनके कारण जीवित रहेगा,” (लैव्यव्यवस्था 18:5), और इसके अनुरूप यह चेतावनी, “जो प्राणी पाप करे वही मरेगा,” (यहेजकेल 18:4, 20); निःसन्देह आनेवाले जीवन और मृत्यु की ओर संकेत करती हैं, जिनका कोई अन्त नहीं। परन्तु यद्यपि जहाँ कहीं परमेश्वर की कृपा या क्रोध का उल्लेख है, वहाँ पहली में अनन्त जीवन और दूसरे में अनन्त विनाश समाया है, फिर भी व्यवस्था साथ ही वर्तमान आशीषों और श्रापों की एक लम्बी सूची भी गिनाती है (लैव्यव्यवस्था 26:4; व्यवस्थाविवरण 28:1)। चेतावनियाँ परमेश्वर की उस निष्कलंक पवित्रता की साक्षी देती हैं जो अधर्म को सह नहीं सकती, जबकि प्रतिज्ञाएँ एक साथ उसके धार्मिकता-प्रेम की अनन्तता (जिसे वह बिना प्रतिफल के नहीं छोड़ सकता) और उसकी अद्भुत कृपा की साक्षी देती हैं। चूँकि हम पर अपना सब कुछ लेकर उसकी वन्दना करना बाध्य है, इसलिए वह पूरे अधिकार से जो कुछ हमसे माँगता है उसे ऋण के रूप में माँग सकता है; और ऋण के रूप में उसका चुकाना प्रतिफल के योग्य नहीं। इसलिए वह अपना अधिकार छोड़ देता है, जब वह ऐसी सेवाओं के लिए प्रतिफल दिखाता है जो स्वेच्छा से नहीं की जातीं, मानो वे हम पर देय ही न हों। इन सेवाओं का स्वरूप स्वयं कुछ-कुछ बताया जा चुका है और अपने स्थान पर और स्पष्ट होगा। इस समय इतना स्मरण रखना पर्याप्त है कि व्यवस्था की प्रतिज्ञाएँ धार्मिकता की कोई साधारण सराहना नहीं, क्योंकि वे दिखाती हैं कि परमेश्वर को उनके पालन से कितना आनन्द मिलता है, जबकि सुनाई गई चेतावनियाँ अधर्म के प्रति और अधिक घृणा उत्पन्न करने के लिए हैं, ऐसा न हो कि पापी पाप के मीठे बोलों में फँसा रहे और उस न्याय को भूल जाए जो ईश्वरीय व्यवस्था देनेवाले ने उसके लिए ठहरा रखा है।

5. प्रभु ने धार्मिकता का सिद्ध नियम देते हुए उसके सब अंगों को केवल अपनी इच्छा पर टिकाया है, और इस प्रकार दिखाया है कि उसे आज्ञाकारिता से बढ़कर कुछ प्रिय नहीं। इस पर ध्यान देना और भी आवश्यक है क्योंकि मानव मन, अपनी उच्छृंखलता में, उसकी कृपा पाने के साधन के रूप में बार-बार आराधना के भिन्न-भिन्न प्रकार गढ़ता रहता है। धर्म का यह अभक्तिपूर्ण दिखावा मानव मन में जन्मजात होने के कारण हर युग में प्रकट हुआ है, और अब भी हो रहा है, क्योंकि मनुष्य सदा परमेश्वर के वचन की किसी अनुमति के बिना धार्मिकता प्राप्त करने की कोई विधि गढ़ने को तरसते रहते हैं।191 इसलिए उन कार्यों में जो साधारणतः भले कर्म माने जाते हैं, व्यवस्था की आज्ञाओं के लिए बहुत थोड़ा स्थान है, और लगभग सारा स्थान मनुष्यों की इस अनगिनत टोली के आविष्कारों ने हड़प लिया है। परन्तु क्या यह वही स्वच्छन्दता नहीं थी जिसे मूसा रोकना चाहता था, जब व्यवस्था सुनाने के बाद उसने लोगों से यह कहा: “इन सब बातों को जो मैं तुझे सुनाता हूँ चौकसी से सुनता रह, इसलिए कि जब तू वह करे जो तेरे परमेश्वर यहोवा की दृष्टि में भला और ठीक है, तब तेरा और तेरे बाद तेरे वंश का सदा भला हो।” “जितनी बातों की मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ उन्हें चौकस होकर माना करना; न तो उनमें कुछ बढ़ाना और न उनमें से कुछ घटाना,” (व्यवस्थाविवरण 12:28–32)। इससे पहले, यह पूछकर कि “कौन ऐसी बड़ी जाति है जिसके पास ऐसी विधियाँ और नियम हैं जो इस सारी व्यवस्था के समान धर्ममय हैं, जिसे मैं आज तुम्हारे सामने रखता हूँ?” उसने यह जोड़ा था, “केवल अपने विषय में सावधान रह, और अपने प्राण की बड़ी चौकसी कर, ऐसा न हो कि जो बातें तेरी आँखों ने देखी हैं उन्हें तू भूल जाए, और वे जीवन भर तेरे मन से जाती रहें,” (व्यवस्थाविवरण 4:8, 9)। परमेश्वर ने पहले से देख लिया था कि इस्राएली शान्त न रहेंगे, वरन् व्यवस्था पाने के बाद, यदि कठोरता से रोके न गए, तो धार्मिकता के नए-नए प्रकार उत्पन्न करेंगे; इसलिए उसने घोषणा की कि व्यवस्था में सिद्ध धार्मिकता समाई है। यह एक अत्यन्त सशक्त रोक होनी चाहिए थी, तो भी वे उस घोर वर्जित धृष्ट मार्ग से न हटे। हम क्या करते हैं? हम निश्चय ही उन्हीं के समान बन्धन में हैं; क्योंकि इसमें कोई सन्देह नहीं कि जो पूर्ण सिद्धता का दावा परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था के लिए किया था, वह सदा के लिए प्रभावी है। फिर भी उससे सन्तुष्ट न होकर हम एक के बाद एक भले कर्मों की अनन्त विविधता गढ़ने और घड़ने में बड़ा परिश्रम करते हैं। इस दोष का सबसे उत्तम उपाय यह निरन्तर और गहरी बैठी हुई धारणा होगी कि व्यवस्था स्वर्ग से हमें सिद्ध धार्मिकता सिखाने के लिए दी गई थी; कि इस प्रकार सिखाई गई एकमात्र धार्मिकता वही है जिसकी आज्ञा ईश्वरीय इच्छा स्पष्ट रूप से देती है; और इसलिए आराधना के नए रूपों से परमेश्वर की कृपा पाने का प्रयत्न करना व्यर्थ है, क्योंकि उसकी सच्ची आराधना केवल आज्ञाकारिता में है; या यों कहें कि जो भले कर्म परमेश्वर की व्यवस्था में ठहराए नहीं गए, उनके पीछे भटकते फिरना सच्ची और ईश्वरीय धार्मिकता का असह्य उल्लंघन है। अगस्तीन एक स्थान पर ठीक ही कहता है कि जो आज्ञाकारिता परमेश्वर को दी जाती है वह जननी और रक्षिका है; और दूसरे स्थान पर कि वह सब गुणों का स्रोत है।192

6. जब हम ईश्वरीय व्यवस्था की व्याख्या कर चुकेंगे, तब उसके कार्य और उपयोग के विषय में पहले जो कहा गया है, वह अधिक सरलता से और अधिक लाभ के साथ समझा जाएगा। परन्तु प्रत्येक आज्ञा पर अलग-अलग विचार करने से पहले उचित होगा कि सम्पूर्ण पर एक सामान्य दृष्टि डाली जाए। आरम्भ में सिद्ध किया जा चुका है कि व्यवस्था में मानव जीवन को केवल बाहरी शिष्टता की नहीं, वरन् भीतरी आत्मिक धार्मिकता की शिक्षा दी गई है। यद्यपि कोई इससे इनकार नहीं कर सकता, तो भी बहुत थोड़े लोग इस पर उचित ध्यान देते हैं, क्योंकि वे व्यवस्था देनेवाले पर विचार नहीं करते, जिसके स्वभाव से व्यवस्था का स्वभाव भी निश्चित होना चाहिए। यदि कोई राजा हत्या, व्यभिचार और चोरी को वर्जित करनेवाली आज्ञा निकाले, तो मैं मानता हूँ कि जिस मनुष्य ने केवल इन पापों की मन में लालसा की है, पर उन्हें किया नहीं, वह दण्ड का भागी न होगा। कारण यह है कि मनुष्य व्यवस्था देनेवाला बाहरी व्यवस्था से आगे अपनी चिन्ता नहीं बढ़ाता, और इसलिए उसके आदेश बाहरी कार्यों के बिना भंग नहीं होते। परन्तु परमेश्वर, जिससे कुछ छिपा नहीं, और जो बाहरी रूप को उतना नहीं जितना हृदय की शुद्धता को देखता है, हत्या, व्यभिचार और चोरी के निषेध में क्रोध, घृणा, वासना, लालच और इसी स्वभाव की सब बातों को समाविष्ट करता है। आत्मिक व्यवस्था देनेवाला होने के कारण वह शरीर के समान आत्मा से भी बोलता है। आत्मा जो हत्या करती है वह क्रोध और घृणा है; जो चोरी करती है वह लालच और लोभ है; और जो व्यभिचार करती है वह वासना है। कहा जा सकता है कि मनुष्यों की व्यवस्थाएँ भी इरादों और इच्छाओं का विचार करती हैं, आकस्मिक घटनाओं का नहीं। मैं यह मानता हूँ, परन्तु इनका बाहर प्रकट होना आवश्यक है। वे उस आशय पर विचार करती हैं जिससे कार्य किया गया, परन्तु गुप्त विचारों की छानबीन नहीं करतीं। इसलिए उनकी माँग तब पूरी हो जाती है जब हाथ अपराध से रुका रहता है। इसके विपरीत, स्वर्ग की व्यवस्था हमारे मनों के लिए बनाई गई है, इसलिए व्यवस्था के उचित पालन के लिए सबसे पहले उन पर रोक लगाना आवश्यक है। परन्तु अधिकांश मनुष्य, जब व्यवस्था की अवहेलना को छिपाने के लिए सबसे अधिक चिन्तित होते हैं, तब भी केवल अपने हाथ-पैर और शरीर के अन्य अंगों को किसी प्रकार के पालन में ढालते हैं, परन्तु इस बीच हृदय को आज्ञाकारिता की हर बात से सर्वथा दूर रखते हैं। वे सोचते हैं कि जो कुछ वे परमेश्वर के सामने कर रहे हैं उसे मनुष्य से सावधानी से छिपा लेना ही पर्याप्त है। “तू हत्या न करना,” “तू व्यभिचार न करना,” “तू चोरी न करना” ये आज्ञाएँ सुनकर वे हत्या के लिए तलवार नहीं निकालते, न वेश्याओं से अपने शरीर अशुद्ध करते हैं, न दूसरों की सम्पत्ति की ओर हाथ बढ़ाते हैं। यहाँ तक तो ठीक है; परन्तु अपने पूरे प्राण से वे हत्या की साँस लेते हैं, वासना से उबलते हैं, अपने पड़ोसी की सम्पत्ति पर लालची दृष्टि डालते हैं, और इच्छा में उसे निगल जाते हैं। यहाँ वह मुख्य बात, जो व्यवस्था माँगती है, नहीं है। तो यह घोर मूढ़ता कहाँ से आती है, सिवाय इसके कि वे व्यवस्था देनेवाले को आँख से ओझल कर देते हैं, और धार्मिकता की धारणा अपने ही स्वभाव के अनुसार बना लेते हैं? इसके विरुद्ध पौलुस दृढ़ता से विरोध करता है, जब वह घोषणा करता है कि “व्यवस्था तो आत्मिक है” (रोमियों 7:14); अर्थात् वह न केवल प्राण, मन और इच्छा की वन्दना माँगती है, वरन् स्वर्गदूतों की सी शुद्धता माँगती है, जो शरीर की सब मलिनता से शुद्ध होकर केवल आत्मा का स्वाद लेती है।

190 यह अध्याय पुस्तक 1 के अध्याय 1 और 2, और पुस्तक 2 के अध्याय 1–6 से जुड़ा है। पुस्तक 2, अध्याय 2, खण्ड 22 भी देखें। 191 देखें कैल्विन, De Vera Ecclesiæ Reformandæ Ratione। 192 देखें अगस्तीन, De Civitate Dei, Lib. 4 c. 12, और Lib. 12 c. 20, और Lib. 14 c. 12। यह भी देखें Lib. De Bono Conjugali, और Lib. Contra Adversarios Legis et Prophetarum, Lib. 1 c. 14।

7. जब हम कहते हैं कि व्यवस्था का यही अर्थ है, तो हम अपनी कोई नई व्याख्या नहीं ला रहे; हम व्यवस्था के सर्वोत्तम व्याख्याकार मसीह का अनुसरण कर रहे हैं (मत्ती 5:22, 28, 44)। फरीसियों ने लोगों के मन में यह भ्रम बैठा दिया था कि जो मनुष्य बाहरी कार्य में व्यवस्था के विरुद्ध कुछ नहीं करता, वह व्यवस्था को पूरा कर देता है; मसीह इसे अत्यन्त खतरनाक भ्रम घोषित करता है, और कहता है कि अशुद्ध दृष्टि व्यभिचार है, और भाई से घृणा हत्या है। “जो कोई अपने भाई पर बिना कारण क्रोध करेगा, वह न्याय में दण्ड के योग्य होगा;” जो कोई फुसफुसाकर या बड़बड़ाकर नाराज़ होने का संकेत देता है, “वह महासभा में दण्ड के योग्य होगा;” जो कोई निन्दा और बुरे वचनों से खुले क्रोध में बह जाता है, “वह नरक की आग के दण्ड के योग्य होगा।” जिन्होंने यह नहीं समझा, उन्होंने यह मान लिया कि मसीह केवल दूसरा मूसा था, जिसने मूसा की व्यवस्था की कमी को पूरा करने के लिए सुसमाचारीय व्यवस्था दी। इसी से यह प्रचलित उक्ति निकली कि सुसमाचारीय व्यवस्था सिद्ध है और मूसा की व्यवस्था से बहुत श्रेष्ठ है। यह विचार अनेक रीति से अत्यन्त हानिकारक है। क्योंकि जब हम मूसा के आदेशों का सार देंगे, तब स्वयं मूसा से ही प्रकट हो जाएगा कि इस प्रकार ईश्वरीय व्यवस्था का बड़ा अपमान होता है। यह निश्चय ही यह संकेत देता है कि व्यवस्था के अधीन पितरों की पवित्रता कपट से कुछ ही अधिक थी, और हमें धार्मिकता के उस एक अपरिवर्तनीय नियम से दूर ले जाता है। परन्तु इस भूल का खण्डन करना बहुत सरल है, जो इस मान्यता पर चलती है कि मसीह ने व्यवस्था में कुछ जोड़ा, जबकि उसने तो उसे फरीसियों के झूठ से धुँधली और उनके खमीर से अशुद्ध हो जाने पर बनाए रखकर और शुद्ध करके केवल उसकी सम्पूर्णता में लौटाया।

8. अगला अवलोकन जो हम करना चाहते हैं, यह है कि व्यवस्था की माँगों और निषेधों में शब्दों में व्यक्त की गई बात से सदा अधिक होता है। परन्तु इसे ऐसा नहीं समझना चाहिए कि यह एक प्रकार का लेस्बियाई मापदण्ड193 बन जाए, और इस प्रकार पवित्रशास्त्र को स्वच्छन्दता से तोड़-मरोड़कर उसे वह अर्थ दिया जाए जो हम चाहें। पवित्रशास्त्र के साथ यह अत्यधिक स्वतन्त्रता बरतने से कुछ लोगों में उसका अधिकार घटता है, और दूसरे उसे समझने की सारी आशा छोड़ देते हैं। इसलिए यदि सम्भव हो तो हमें कोई ऐसा मार्ग खोजना चाहिए जो सीधे और दृढ़ कदमों से हमें परमेश्वर की इच्छा तक पहुँचाए। हमें विचार करना चाहिए, मैं कहता हूँ, कि व्याख्या शब्दों के शाब्दिक अर्थ से कहाँ तक आगे जा सकती है, और फिर भी यह प्रकट रहे कि ईश्वरीय व्यवस्था में मनुष्य की कोई टिप्पणी नहीं जोड़ी गई, वरन् व्यवस्था देनेवाले का शुद्ध और सच्चा अर्थ विश्वासयोग्यता से प्रस्तुत किया गया है। यह सच है कि लगभग सभी आज्ञाओं में अपूर्ण वाक्य-रचनाएँ हैं, और इसलिए जो कोई व्यवस्था की आत्मा को शब्दों के कड़े अक्षर में सीमित करने का प्रयत्न करे, वह अपने को हास्यास्पद बनाएगा। यह स्पष्ट है कि व्यवस्था की संयत व्याख्या को इनसे आगे जाना ही चाहिए, परन्तु कहाँ तक, यह संदिग्ध है, जब तक कोई नियम न अपनाया जाए। मेरे विचार में सबसे उत्तम नियम यह होगा कि आज्ञा के सिद्धान्त से मार्गदर्शन लिया जाए—अर्थात् हर एक में यह देखा जाए कि वह किस प्रयोजन के लिए दी गई है। उदाहरण के लिए, हर आज्ञा या तो कुछ माँगती है या वर्जित करती है; और हर एक का स्वरूप तुरन्त पहचाना जाता है जब हम आज्ञा के सिद्धान्त को उसके उद्देश्य के रूप में देखते हैं। इस प्रकार, पाँचवीं आज्ञा का उद्देश्य उन्हें आदर देना है जिन्हें परमेश्वर यह आदर देता है। इसलिए आज्ञा का सार यह है कि जिन्हें परमेश्वर ने कोई विशेषता दी है उनका आदर करना अपने में उचित और परमेश्वर को प्रिय है; और ऐसे लोगों को तुच्छ जानना और उनके विरुद्ध विद्रोह करना उसे अप्रिय है। पहली आज्ञा का सिद्धान्त यह है कि केवल परमेश्वर की आराधना की जाए। इसलिए आज्ञा का सार यह है कि सच्ची भक्ति, अर्थात् ईश्वर की आराधना, उसे स्वीकार्य है, और अभक्ति उसके लिए घृणित है। इसी प्रकार हर आज्ञा में हमें पहले यह देखना है कि वह किस विषय की चर्चा करती है, फिर उसके उद्देश्य पर विचार करना है, जब तक कि हम यह न जान लें कि व्यवस्था देनेवाला वास्तव में किस बात को अपने लिए प्रिय या अप्रिय बताता है। केवल इतना है कि हमें आज्ञा से उसके विपरीत की ओर इस प्रकार तर्क करना चाहिए: यदि यह परमेश्वर को भाता है, तो इसका विपरीत उसे नहीं भाता; यदि वह नहीं भाता, तो उसका विपरीत भाता है: यदि परमेश्वर यह आज्ञा देता है, तो वह उसके विपरीत को वर्जित करता है; यदि वह उसे वर्जित करता है, तो उसके विपरीत की आज्ञा देता है।

9. जो बात अब कुछ अस्पष्ट रूप से छुई गई है वह आगे बढ़ने और आज्ञाओं की व्याख्या के अभ्यस्त होने पर पूर्णतः स्पष्ट हो जाएगी। इस विषय का संकेत कर देना पर्याप्त है; परन्तु शायद हमारे अन्तिम कथन की संक्षेप में पुष्टि आवश्यक होगी, क्योंकि अन्यथा वह समझा न जाए, या समझे जाने पर भी, आरम्भ में शायद अनुचित प्रतीत हो। यह सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं कि जब भलाई की आज्ञा दी जाती है तो उसके विपरीत बुराई वर्जित होती है। इसे सब मानते हैं। यह भी बिना अधिक कठिनाई के माना जाएगा कि जब बुराई वर्जित होती है तो उसके विपरीत की आज्ञा दी जाती है। वस्तुतः यह एक प्रचलित कहावत है कि बुराई की निन्दा भलाई की प्रशंसा है। परन्तु हम इन अभिव्यक्तियों से साधारणतः जो समझा जाता है उससे कुछ अधिक माँगते हैं। जब किसी विशेष पाप के विपरीत किसी विशेष गुण की चर्चा होती है, तो साधारणतः केवल उस पाप से बचे रहने का अर्थ लिया जाता है। हम मानते हैं कि वह इससे आगे जाती है, और विपरीत कर्तव्यों और सकारात्मक कार्यों का अर्थ रखती है। इसलिए “तू हत्या न करना” इस आज्ञा को अधिकांश लोग केवल हर प्रकार की हानि और हानि पहुँचाने की हर इच्छा से बचने का आदेश मानेंगे। मैं मानता हूँ कि इसका यह अर्थ भी है कि हम अपने पड़ोसी के प्राण की अपनी सामर्थ्य के हर साधन से सहायता करें। और बिना कारण बताए कुछ कहने के बदले मैं इसे यों सिद्ध करता हूँ: परमेश्वर हमें भाई को हानि या चोट पहुँचाने से इसलिए रोकता है कि वह चाहता है कि उसका प्राण हमें प्रिय और मूल्यवान लगे; और इसलिए जब वह ऐसा वर्जित करता है, तो साथ ही प्रेम के उन सब कर्तव्यों की माँग करता है जो उसके बचाव में सहायक हो सकते हैं।

10. परन्तु परमेश्वर ने अपनी आज्ञाओं को मानो आधा-आधा क्यों दिया, ऐसी अपूर्ण वाक्य-रचनाओं का प्रयोग करके जिनका अर्थ वास्तव में कही गई बात से बड़ा है? दूसरे कारण भी बताए जाते हैं, परन्तु मुझे यह सबसे उत्तम लगता है:—चूँकि शरीर पाप की घृणितता को घटाने के लिए सदा सतर्क रहता है (जब तक कि उसे, मानो छूने योग्य न बना दिया जाए), और उसे सुन्दर बहानों से ढकता है, इसलिए प्रभु प्रत्येक प्रकार के अपराध में जो कुछ सबसे घिनौना और अधर्मी है उसे उदाहरण के रूप में सामने रखता है, ताकि इसके सुनाए जाने से सुननेवाले का रोम-रोम काँप उठे और उसके मन पर पाप के प्रति गहरी घृणा अंकित हो। पापों का मूल्यांकन करते समय हम प्रायः इस भ्रम में ठगे जाते हैं कि जितना अधिक छिपा हो उतना कम घृणित है। इस भ्रम को प्रभु इस प्रकार दूर करता है कि पापों की सारी भीड़ को हमें विशेष शीर्षकों के अन्तर्गत रखने का अभ्यास कराता है, जो उत्कृष्ट रीति से दिखाते हैं कि प्रत्येक में कितनी घृणितता है। उदाहरण के लिए, क्रोध और घृणा जब अपने ही नामों से पुकारे जाते हैं तो इतने बुरे नहीं लगते; परन्तु जब वे हत्या के नाम से वर्जित किए जाते हैं, तब हम बेहतर समझते हैं कि वे परमेश्वर की दृष्टि में कितने घिनौने हैं, जो उन्हें उसी भयानक अपराध की श्रेणी में रखता है। उसके निर्णय से प्रभावित होकर हम उन अपराधों की घृणितता का अधिक ठीक अनुमान लगाने के अभ्यस्त हो जाते हैं जो पहले तुच्छ लगते थे।

11. अब यह विचार करना उचित होगा कि ईश्वरीय व्यवस्था के दो पट्टियों में विभाजन का क्या अर्थ है। जिस औपचारिक रीति से इनका कभी-कभी उल्लेख होता है, उससे सब समझदार लोग यही निर्णय करेंगे कि यह बिना कारण या अकारण नहीं किया गया। वस्तुतः कारण इतना स्पष्ट है कि उसके विषय में हमें सन्देह में रहने की गुंजाइश नहीं। परमेश्वर ने अपनी व्यवस्था को, जिसमें धार्मिकता का सम्पूर्ण नियम है, इस प्रकार दो भागों में बाँटा कि पहला स्थान भक्ति के उन कर्तव्यों को दे जो विशेषकर उसकी आराधना से सम्बन्ध रखते हैं, और दूसरा प्रेम के उन कर्तव्यों को जो मनुष्य से सम्बन्ध रखते हैं। धार्मिकता की पहली नींव निःसन्देह परमेश्वर की आराधना है। जब वह उलट दी जाती है, तो धार्मिकता के अन्य सब भाग, फटी हुई और ध्वस्त इमारत की भाँति, टूट-फूटकर बिखर जाते हैं। उसे तुम कैसी धार्मिकता कहते हो कि चोरी और लूट न करो, यदि इस बीच तुम अभक्त अपवित्रता से परमेश्वर की महिमा लूटते हो? या व्यभिचार से अपना शरीर अशुद्ध न करो, यदि उसके पवित्र नाम की निन्दा से उसे अपवित्र करते हो? या मनुष्य का प्राण न लो, यदि परमेश्वर की स्मृति को काटने और मिटाने का यत्न करते हो? इसलिए धर्म से अलग धार्मिकता की बात करना व्यर्थ है। ऐसी धार्मिकता में उतनी ही शोभा है जितनी सिर कटे हुए धड़ में।194 और धर्म केवल मुख्य भाग ही नहीं है: वह वह प्राण है जिससे सारा शरीर जीता और साँस लेता है। परमेश्वर के भय के बिना मनुष्य आपस में न्याय और प्रेम का भी पालन नहीं करते। इसलिए हम कहते हैं कि परमेश्वर की आराधना धार्मिकता का आरम्भ और नींव है; और जहाँ वह नहीं है, वहाँ मनुष्यों में चाहे जितनी भी न्यायशीलता, या संयम, या मर्यादा हो, वह परमेश्वर की दृष्टि में खोखली और तुच्छ है। हम उसे धार्मिकता का स्रोत और प्राण इसलिए कहते हैं कि मनुष्य परमेश्वर को भले-बुरे का न्यायी जानकर उसका आदर करते हुए ही मर्यादा से और बिना हानि पहुँचाए साथ रहना सीखते हैं। इसलिए पहली पट्टी में वह हमें सिखाता है कि भक्ति को कैसे बढ़ाएँ, और धर्म के उन उचित कर्तव्यों को, जिनमें उसकी आराधना है; दूसरी में वह दिखाता है कि उसके नाम के भय में हम अपने संगी मनुष्यों के प्रति कैसा आचरण करें। इसलिए, जैसा सुसमाचार लेखक बताते हैं (मत्ती 22:37; लूका 10:27), हमारे उद्धारकर्ता ने सम्पूर्ण व्यवस्था का सार दो शीर्षकों में बताया—अर्थात् प्रभु से अपने सारे मन, सारे प्राण और सारी शक्ति से प्रेम करना, और अपने पड़ोसी से अपने समान। तुम देखते हो कि जिन दो भागों के अन्तर्गत उसने सम्पूर्ण व्यवस्था को समेटा है, उनमें से एक को वह परमेश्वर के लिए रखता है, और दूसरे को मनुष्यों के लिए ठहराता है।

12. परन्तु यद्यपि सम्पूर्ण व्यवस्था दो शीर्षकों में समाई है, फिर भी हर बहाने को दूर करने के लिए प्रभु ने उचित समझा कि दस आज्ञाओं में वह सब कुछ अधिक पूर्ण और स्पष्ट रूप से दे, जो उसके अपने आदर, भय और प्रेम से सम्बन्ध रखता है, और साथ ही वह सब जो उस प्रेम से सम्बन्ध रखता है जो वह अपने लिए हमें अपने संगी मनुष्यों के प्रति रखने की आज्ञा देता है। आज्ञाओं के विभाजन पर विचार करना निष्फल अध्ययन नहीं है, बशर्ते हम स्मरण रखें कि यह उन बातों में से है जिनमें हर मनुष्य को निर्णय की पूरी स्वतन्त्रता होनी चाहिए, और जिनके कारण मतभेद विवाद का रूप न ले। हमें यह टिप्पणी करना आवश्यक है, ऐसा न हो कि जो विभाजन हम अपनाने जा रहे हैं वह पाठक को नया या हाल का आविष्कार जानकर आश्चर्य या उपहास उत्पन्न करे।

193 “Ne sit nobis Lesbiæ regulæ,” फ्रांसीसी में छोड़ा गया है। 194 फ्रांसीसी में है, “Tout ainsi comme si quelcun vouloit faire une belle monstre d’un corps sans teste;” मानो कोई बिना सिर के शरीर की एक सुन्दर प्रदर्शनी (monstre) बनाने का यत्न करे।

इस तथ्य के विषय में विवाद की कोई गुंजाइश नहीं कि व्यवस्था दस शीर्षकों में बाँटी गई है, क्योंकि ईश्वरीय अधिकार से इसकी बार-बार पुष्टि हुई है। इसलिए प्रश्न भागों की संख्या का नहीं, वरन् उन्हें बाँटने की रीति का है। जो लोग ऐसा विभाजन अपनाते हैं जिसमें पहली पट्टी को तीन आज्ञाएँ और शेष सात दूसरी पट्टी में डाल दी जाती हैं, वे मूर्तियों सम्बन्धी आज्ञा को सूची से निकाल देते हैं, या कम से कम उसे पहली आज्ञा के नीचे छिपा देते हैं, यद्यपि इसमें कोई सन्देह नहीं कि प्रभु ने उसे स्पष्ट रूप से एक अलग आज्ञा के रूप में लिखा था; जबकि दसवीं आज्ञा को, जो अपने पड़ोसी की वस्तुओं का लालच करना वर्जित करती है, वे बेतुके ढंग से दो में तोड़ देते हैं। इसके अतिरिक्त, शीघ्र ही प्रकट होगा कि विभाजन की यह रीति अधिक शुद्ध युग में अज्ञात थी। अन्य लोग पहली पट्टी में हमारी ही तरह चार आज्ञाएँ गिनते हैं, परन्तु पहली के रूप में आज्ञा के बिना केवल आरम्भ की प्रतिज्ञा रख देते हैं। परन्तु क्योंकि जब तक स्पष्ट प्रमाण से मुझे दूसरी बात का विश्वास न दिलाया जाए, मुझे यही मानना है कि मूसा द्वारा उल्लिखित “दस वचन” दस आज्ञाएँ हैं, और क्योंकि मैं देखता हूँ कि वह संख्या अत्यन्त उत्तम क्रम में सजी है, इसलिए मुझे, उन्हें उनके अपने मत पर रहने देते हुए, उसी का अनुसरण करना चाहिए जो मुझे अधिक दृढ़ स्थापित प्रतीत होता है—अर्थात् जिसे वे पहली आज्ञा बनाते हैं वह सम्पूर्ण व्यवस्था की भूमिका के स्वरूप की है, कि उसके बाद पहली पट्टी में चार आज्ञाएँ आती हैं और दूसरी में छः, उसी क्रम में जिसमें उनकी यहाँ समीक्षा की जाएगी। इस विभाजन को ओरिजन बिना किसी चर्चा के अपनाता है, मानो उसके समय में यह सर्वत्र स्वीकृत था।195 इसे अगस्तीन भी बोनिफ़ेस को लिखी अपनी पुस्तक में अपनाता है, जिसमें आज्ञाओं की गणना करते हुए वह यह क्रम रखता है: एक परमेश्वर की भक्ति से आज्ञा मानी जाए, कोई मूर्ति न पूजी जाए, परमेश्वर का नाम व्यर्थ न लिया जाए; जबकि इससे पहले उसने विश्रामदिन की प्रतीकात्मक आज्ञा का अलग उल्लेख किया था। अन्यत्र, यह सच है कि वह पहले विभाजन की स्वीकृति व्यक्त करता है, पर बहुत कमज़ोर आधार पर, क्योंकि तीन की संख्या से (पहली पट्टी को तीन आज्ञाओं की मानने से) त्रिएकता का भेद अधिक अच्छी रीति से प्रकट होगा। फिर भी यहाँ भी वह इस मत को नहीं छिपाता कि अन्य बातों में हमारा विभाजन उसे अधिक पसन्द है।

इनके अतिरिक्त, मत्ती पर अधूरी रचना के लेखक का भी हमें समर्थन प्राप्त है।196 जोसीफ़स, निःसन्देह अपने युग की सामान्य सहमति के अनुसार, प्रत्येक पट्टी को पाँच आज्ञाएँ देता है। यह, तर्क के विरुद्ध होने के साथ कि यह भक्ति और प्रेम के भेद को मिटा देता है, हमारे उद्धारकर्ता के अधिकार से भी खण्डित होता है, जो मत्ती में माता-पिता का आदर करने की आज्ञा को दूसरी पट्टी की आज्ञाओं की सूची में रखता है (मत्ती 19:19)। अब हम सुनें कि परमेश्वर अपने ही शब्दों में क्या कहता है।

195 ओरिजन, in Exod. cap. 20 Homil. 8; अगस्तीन, contra duas Epist. Pelagii, Lib. 3 cap. 4; Quæst. in Vet. Test. Lib. 2 cap. 74; Epist cxix ad Januarium, cap. 11। जोसीफ़स का मत, और अगस्तीन का अन्तिम उल्लिखित मत, कैल्विन ने Exod. cap. 20 में, पाँचवीं आज्ञा की व्याख्या करते हुए, संक्षेप में खण्डित किए हैं।

196 फ्रांसीसी में है, “Nous avous aussi un autre ancien Pere qui accorde a nostre opinion, celui que a ecrit les Commentaires imparfaits sur Sainct Matthiue।” अर्थात्, हमारे पास एक और प्राचीन पिता भी है जो हमारे मत से सहमत है, वह जिसने सेंट मत्ती पर अधूरी टीकाएँ लिखीं।

पहली आज्ञा।

मैं तेरा परमेश्वर यहोवा हूँ, जो तुझे दासत्व के घर अर्थात् मिस्र देश से निकाल लाया हूँ। तू मेरे सामने किसी दूसरे को ईश्वर करके न मानना।

13. तुम पहले वाक्य को आज्ञा का भाग मानो या उसे अलग पढ़ो, मेरे लिए यह महत्त्वहीन है, बशर्ते तुम यह मानो कि वह सम्पूर्ण व्यवस्था की एक प्रकार की भूमिका है। व्यवस्थाएँ बनाते समय सबसे पहले इस बात से बचना होता है कि वे तिरस्कार के कारण तुरन्त रद्द न कर दी जाएँ। इसलिए प्रभु इस बात का ध्यान रखता है कि जो व्यवस्था दी जानेवाली है उसके साथ ऐसा न हो, और उसे तिहरे समर्थन के साथ आरम्भ करता है। वह अपने लिए आज्ञा देने की सामर्थ्य और अधिकार का दावा करता है, ताकि चुनी हुई प्रजा के मन पर आज्ञाकारिता की आवश्यकता अंकित करे; वह कृपा की प्रतिज्ञा सामने रखता है, ताकि उन्हें पवित्रता की लगन के लिए लुभाए; और वह उन्हें अपनी भलाई का स्मरण कराता है, ताकि यदि वे उचित प्रतिफल न दें तो उन्हें कृतघ्नता का दोषी ठहराए। प्रभु नाम से सामर्थ्य और वैध प्रभुता का संकेत मिलता है। यदि सब कुछ उसी से है और उसी के द्वारा स्थिर है, तो न्याय की रीति से सब कुछ उसी की ओर होना चाहिए, जैसा पौलुस कहता है (रोमियों 11:36)। इसलिए यह नाम अपने आप में हमें ईश्वरीय महिमा के अधिकार के अधीन करने के लिए पर्याप्त है: क्योंकि उसके राज्य से निकल जाना चाहना हमारे लिए अत्यन्त अनुचित होगा, जिसके बिना हमारा अस्तित्व भी नहीं हो सकता।

14. यह दिखाकर कि उसे आज्ञा देने और अपनी आज्ञा मनवाने का अधिकार है, वह फिर, ताकि ऐसा न लगे कि वह मनुष्यों को केवल विवशता से खींच रहा है, वरन् उन्हें लुभा रहा है, अनुग्रहपूर्वक घोषणा करता है कि वह कलीसिया का परमेश्वर है। क्योंकि इस कथन से यह सूचित होता है कि इस प्रतिज्ञा में पारस्परिक सम्बन्ध सम्मिलित है, “मैं उनका परमेश्वर ठहरूँगा, और वे मेरी प्रजा ठहरेंगे,” (यिर्मयाह 31:33)। इसी से मसीह इस तथ्य से अब्राहम, इसहाक और याकूब की अमरता का निष्कर्ष निकालता है कि परमेश्वर ने अपने आपको उनका परमेश्वर कहा था (मत्ती 22:32)। इसलिए यह वैसा ही है मानो उसने कहा हो, मैंने तुम्हें अपने लिए ऐसी प्रजा के रूप में चुना है जिसकी भलाई मैं केवल वर्तमान जीवन में ही नहीं, वरन् आनेवाले जीवन में भी सुख देकर करूँगा।

इसमें जो उद्देश्य है, उसका संकेत व्यवस्था में अनेक स्थानों पर मिलता है। क्योंकि जब प्रभु दया करके हमें इतना आदर देता है कि अपनी चुनी हुई प्रजा की सहभागिता में हमें स्वीकार करे, तब, जैसा मूसा कहता है, वह हमें “पवित्र प्रजा” होने के लिए, “अपनी निज प्रजा” होने के लिए, “उसकी सब आज्ञाओं का पालन करने” के लिए चुनता है, (व्यवस्थाविवरण 7:6; 14:2; 26:18)। इसीलिए यह उपदेश है, “तुम पवित्र बने रहो; क्योंकि मैं तुम्हारा परमेश्वर यहोवा पवित्र हूँ,” (लैव्यव्यवस्था 19:2)। ये दो बातें उस फटकार का आधार हैं, “पुत्र पिता का और दास अपने स्वामी का आदर करता है; यदि मैं पिता हूँ तो मेरा आदर कहाँ है? और यदि मैं स्वामी हूँ तो मेरा भय कहाँ है? सेनाओं का यहोवा यह कहता है,” (मलाकी 1:6)।

15. इसके बाद उसकी भलाई का स्मरण आता है, जिसका हम पर उतना ही गहरा प्रभाव पड़ना चाहिए जितनी घृणा से कृतघ्नता को मनुष्यों में भी देखा जाता है। यह सच है कि वह इस्राएल को उस छुटकारे की याद दिला रहा था जो तब हाल का था, परन्तु अपनी अद्भुत महानता के कारण वह दूर से दूर की पीढ़ियों के लिए सदा स्मरणीय होना था। इसके अतिरिक्त, यह प्रस्तुत विषय के लिए अत्यन्त उपयुक्त है।197 क्योंकि प्रभु यह जताता है कि वे दयनीय दासत्व से छुड़ाए गए, ताकि वे अपनी स्वतन्त्रता के कर्ता के रूप में उसके आगे तुरन्त समर्पण और आज्ञाकारिता सीखें। इसी प्रकार, हमें अपनी सच्ची आराधना में बनाए रखने के लिए, वह प्रायः अपने आपको कुछ विशेषणों से वर्णित करता है जो उसके पवित्र ईश्वरत्व को सब मूर्तियों और कल्पित देवताओं से अलग करते हैं। क्योंकि, जैसा मैंने पहले कहा था, हम व्यर्थता और धृष्टता की ओर इतने झुके हुए हैं कि जैसे ही परमेश्वर का नाम लिया जाता है, हमारा मन, भूल से बचने में असमर्थ होकर, तुरन्त किसी खोखले भ्रम की ओर उड़ जाता है। इस रोग का उपचार करते हुए परमेश्वर अपने ईश्वरत्व को कुछ उपाधियों से अलग करता है, और इस प्रकार हमें मानो निश्चित सीमाओं के भीतर रखता है, कि हम इधर-उधर भटककर, जीवित परमेश्वर को छोड़कर, अपने लिए कोई नया देवता न गढ़ें और मूर्ति खड़ी न करें। इसी कारण, जब कभी भविष्यद्वक्ता उसे उचित रूप से हमारे सामने लाना चाहते हैं, तो वे उसे उन गुणों से ढकते और मानो घेर देते हैं जिनमें उसने इस्राएल की प्रजा के सामने अपने आपको प्रकट किया था। जब वह अब्राहम का परमेश्वर, या इस्राएल का परमेश्वर कहलाता है, जब वह यरूशलेम के मन्दिर में करूबों के बीच स्थित बताया जाता है, तो ये और ऐसे अन्य कथन-प्रकार198 उसे किसी एक स्थान या एक प्रजा में सीमित नहीं करते, वरन् केवल हमारे विचारों को उसी परमेश्वर पर टिकाने के लिए प्रयोग किए गए हैं जिसने इस्राएल के साथ बाँधी वाचा में अपने आपको ऐसा प्रकट किया कि वहाँ दिए गए उसके स्वरूप के कठोर दृष्टिकोण से किसी भी कारण से हटना अवैध ठहरा। इसलिए यह समझ लिया जाए कि छुटकारे का उल्लेख इसलिए किया गया है कि यहूदी उस परमेश्वर के अधीन अधिक तत्परता से हों जो उचित रूप से उन्हें अपना ठहराता है। हम फिर, यह मान लेने के बदले कि यह बात हमसे सम्बन्ध नहीं रखती, यह विचार करें कि मिस्र में इस्राएल का दासत्व उस आत्मिक दासत्व का प्रतीक था, जिसकी बेड़ियों में हम सब तब तक बँधे हैं, जब तक स्वर्गीय बदला लेनेवाला अपनी भुजा की सामर्थ्य से हमें छुड़ाकर अपने स्वतन्त्र राज्य में नहीं पहुँचा देता। इसलिए, जैसे पुराने समय में, जब वह बिखरे हुए इस्राएलियों को अपने नाम की आराधना के लिए इकट्ठा करना चाहता था, तो उसने उन्हें फ़िरौन के असहनीय अत्याचार से छुड़ाया, वैसे ही अब जो उसे मानते हैं वे सब शैतान के घातक अत्याचार से छुड़ाए गए हैं, जिसका मिस्र का अत्याचार केवल एक प्रतीक था। इसलिए कोई ऐसा मनुष्य नहीं जिसका मन उस व्यवस्था पर ध्यान देने को न जागना चाहिए, जो, जैसा उसे बताया गया है, परम राजा से निकली, उससे जिसने सबको अस्तित्व दिया और उचित रीति से उन्हें उचित अन्त के रूप में अपनी ओर ठहराया और चलाता है। कोई ऐसा मनुष्य नहीं, मैं कहता हूँ, जो उस व्यवस्था देनेवाले को अपनाने में शीघ्रता न करे, जिसकी आज्ञाएँ मानने के लिए वह जानता है कि वह विशेष रूप से नियुक्त है, जिसकी कृपा से वह सब भलाई की भरपूरी और यहाँ तक कि धन्य अमरता की आशा रखता है, और जिसकी अद्भुत सामर्थ्य और दया का वह मृत्यु के जबड़ों से अपने छुटकारे के लिए ऋणी है।199

16. व्यवस्था का अधिकार स्थापित और दृढ़ हो जाने पर परमेश्वर अपनी पहली आज्ञा देता है—

तू मेरे सामने किसी दूसरे को ईश्वर करके न मानना।

इस आज्ञा का आशय यह है कि प्रभु अपनी प्रजा में अकेले ही ऊँचा किया जाना चाहता है, और उन्हें पूरी तरह अपना होने का दावा करता है। ऐसा हो, इसलिए वह हमें आज्ञा देता है कि हम हर प्रकार की अभक्ति और अन्धविश्वास से, जिनसे उसके ईश्वरत्व की महिमा घटती या धुँधली होती है, दूर रहें; और इसी कारण वह माँग करता है कि हम सच्चे भक्तिपूर्ण उत्साह से उसकी उपासना और आराधना करें। प्रयुक्त सरल शब्दों का स्पष्टतः यही अर्थ है। क्योंकि चूँकि हम परमेश्वर को तब तक नहीं पा सकते जब तक उसकी सब बातों को न अपनाएँ, इसलिए पराए ईश्वर रखने के निषेध का अर्थ यह है कि जो कुछ उसका है वह किसी और को न दिया जाए। परमेश्वर के प्रति हमारे कर्तव्य असंख्य हैं, परन्तु उन्हें चार शीर्षकों में समेटना अनुचित नहीं लगता: आराधना, जिसके साथ विवेक का आत्मिक समर्पण जुड़ा है, भरोसा, प्रार्थना, धन्यवाद।200 आराधना से मेरा अर्थ वह श्रद्धा और उपासना है जो हम उसे तब देते हैं जब उसकी महिमा के आगे नतमस्तक होते हैं; और इसलिए मैं इसका एक भाग यह मानता हूँ कि हम अपने विवेक को उसकी व्यवस्था के अधीन करें।201 भरोसा उसमें निश्चिन्त विश्राम है, उसकी सिद्धताओं को पहचानकर, जब उसे सब सामर्थ्य, बुद्धि, न्याय, भलाई और सत्य का स्वामी मानकर हम अपने को धन्य समझते हैं कि उसके साथ सहभागिता में लाए गए हैं। प्रार्थना की यह परिभाषा हो सकती है कि हर आवश्यकता में उसकी प्रतिज्ञा की हुई सहायता की शरण में जाना, जो एकमात्र उपाय है। धन्यवाद वह कृतज्ञता है जो हमारी सब आशीषों की स्तुति उसी को देती है। जैसे प्रभु इन्हें किसी और ओर से निकलने की अनुमति नहीं देता, वैसे ही वह माँग करता है कि वे पूरी तरह उसी की ओर लौटाई जाएँ। केवल दूसरे ईश्वरों से दूर रहना पर्याप्त नहीं। हमें साथ ही अपने आपको पूरी तरह उसे समर्पित करना है, कुछ अभक्त तिरस्कार करनेवालों के समान नहीं, जो सबसे छोटा मार्ग यह मानते हैं कि सब धार्मिक पालन का उपहास किया जाए। परन्तु यहाँ सच्चे धर्म को प्रथम स्थान देना चाहिए, जो हमारे मनों को जीवित परमेश्वर की ओर निर्देशित करेगा। जब उसके ज्ञान से उचित रूप से भर जाएँ, तब हमारे जीवन का सारा लक्ष्य यह होगा कि उसकी महिमा का आदर, भय और आराधना करें, उसकी आशीषों में भाग का आनन्द लें, हर कठिनाई में उसकी शरण लें, उसके कामों की भव्यता को मानें, सराहें और गुणगान करें, और उसे मानो हमारे सब कार्यों का एकमात्र लक्ष्य बना लें। इसके बाद हमें अन्धविश्वास से सावधान रहना है, जिसके द्वारा हमारे मन सच्चे परमेश्वर से मुड़कर अनेक देवताओं के पीछे इधर-उधर बहकाए जाते हैं। इसलिए यदि हम एक ही परमेश्वर से सन्तुष्ट हैं, तो उसका स्मरण करें जो पहले कहा गया था, कि सब कल्पित देवताओं को दूर भगा देना है, और जो आराधना वह अपने लिए माँगता है उसे अंग-भंग नहीं करना है। उसकी महिमा का एक कण भी रोका नहीं जाना है: जो कुछ उसका है वह सब का सब उसी के लिए सुरक्षित रखना है। शब्द “मेरे सामने” अपमान को और बढ़ा देते हैं, क्योंकि जब कभी हम उसके स्थान पर अपनी कल्पनाएँ रखते हैं, परमेश्वर में जलन भड़कती है; जैसे विश्वासघातिनी पत्नी अपने पति के हृदय को और गहरा घाव देती है जब उसका व्यभिचार उसकी आँखों के सामने खुलेआम किया जाता है। इसलिए परमेश्वर ने अपनी वर्तमान सामर्थ्य और अनुग्रह से यह घोषित करके कि उसने अपनी चुनी हुई प्रजा का ध्यान रखा, अब उन्हें विद्रोह की दुष्टता से रोकने के लिए चेतावनी देता है कि वे उसे साक्षी और दर्शक बनाए बिना पराए ईश्वर नहीं अपना सकते। ऐसा करने के दुस्साहस में यह अत्यन्त बड़ी अभक्ति और जुड़ जाती है कि वे अपने टालमटोल से परमेश्वर की आँख को धोखा दे सकते हैं। इससे कोसों दूर, प्रभु घोषणा करता है कि जो कुछ हम सोचते, योजना बनाते या पूरा करते हैं, वह सब उसकी दृष्टि के सामने खुला है। इसलिए हमारा विवेक विद्रोह के सबसे दूर के विचार से भी दूर रहे, यदि हम चाहते हैं कि हमारी आराधना प्रभु को स्वीकार्य हो। उसके ईश्वरत्व की महिमा पूरी और अखण्ड बनाए रखी जाए, केवल बाहरी अंगीकार से नहीं, वरन् उसकी दृष्टि के नीचे, जो हृदय के गहरे से गहरे कोनों को भेदती है।

197 “Præsenti causæ।”—फ्रांसीसी में है, “du temps que la loi devoit estre publiée;” अर्थात् उस समय के लिए जब व्यवस्था प्रकाशित होनेवाली थी।

198 निर्गमन 3:6; आमोस 1:2; हबक्कूक 2:20; भजन संहिता 80:2; 99:1; यशायाह 37:16। 199 “E faucibus mortis।”—फ्रांसीसी में, “du gouffre d’enfer;” अर्थात् नरक की खाई से।

200 देखें कैल्विन, Catechismo में तथा De Necessitate Reformandæ Ecclesiæ Ratio।

201 फ्रांसीसी में यह जोड़ा गया है, “Car c’est un hommage spirituel qui se rend a lui comme souverain Roy, et ayant toute superiorité sur nos ames।” अर्थात्, क्योंकि यह आत्मिक वन्दना है जो उसे परम राजा के रूप में दी जाती है, जिसकी हमारे प्राणों पर पूरी प्रभुता है।

दूसरी आज्ञा

तू अपने लिए कोई मूर्ति खोदकर न बनाना, न किसी की प्रतिमा बनाना, जो आकाश में, या पृथ्वी पर, या पृथ्वी के नीचे जल में है। तू उन्हें दण्डवत् न करना, और न उनकी उपासना करना।

17. जैसे पहली आज्ञा में प्रभु घोषणा करता है कि वह एक है, और उसके अतिरिक्त किसी देवता की न उपासना की जाए न कल्पना, वैसे ही यहाँ वह अधिक स्पष्ट रूप से घोषणा करता है कि उसका स्वरूप क्या है, और जिस प्रकार की आराधना से उसका आदर होना है वह क्या है, ताकि हम उसके विषय में कोई शारीरिक धारणा बनाने का साहस न करें। इसलिए आज्ञा का आशय यह है कि वह नहीं चाहता कि उसकी वैध आराधना अन्धविश्वासी रीतियों से अपवित्र की जाए। इसलिए सामान्यतः वह हमें उन शारीरिक और निरर्थक अनुष्ठानों से पूरी तरह हटा देता है, जो हमारे मूढ़ मन ईश्वरीय स्वभाव की कोई स्थूल धारणा बनाकर गढ़ने के आदी हैं, और साथ ही हमें उस आराधना की शिक्षा देता है जो वैध है, अर्थात् उसकी अपनी ठहराई हुई आत्मिक आराधना। यहाँ वर्जित सबसे घोर पाप बाहरी मूर्तिपूजा है। इस आज्ञा में दो भाग हैं। पहला उस स्वच्छन्द दुस्साहस को रोकता है जो अगम्य परमेश्वर को हमारी इन्द्रियों के अधीन करना चाहे, या उसे किसी दृश्य आकार में दिखाए। दूसरा किसी भी धार्मिक आधार पर प्रतिमाओं की पूजा को वर्जित करता है। इसके अतिरिक्त, उन सब रूपों की संक्षिप्त गणना है जिनमें अन्यजातियों और अन्धविश्वासी जातियों द्वारा सामान्यतः ईश्वरत्व का चित्रण किया जाता था। “जो कुछ ऊपर आकाश में है” से सूर्य, चन्द्रमा और तारों का अर्थ है, सम्भवतः पक्षियों का भी, जैसे व्यवस्थाविवरण में, जहाँ अर्थ समझाया गया है, तारों के साथ पक्षियों का भी उल्लेख है (व्यवस्थाविवरण 4:15)। मैं यह टिप्पणी न करता, यदि मैं न देखता कि कुछ लोग इसे बेतुके ढंग से स्वर्गदूतों पर लागू करते हैं। अन्य बातों को मैं छोड़ता हूँ, क्योंकि उन्हें व्याख्या की आवश्यकता नहीं। हम पहले ही यथेष्ट स्पष्टता से दिखा चुके हैं (पुस्तक 1, अध्याय 11, 12) कि ईश्वरत्व का जो भी दृश्य आकार मनुष्य गढ़ता है, वह ईश्वरीय स्वभाव के सर्वथा विपरीत है; और इसलिए जिस क्षण मूर्तियाँ प्रकट होती हैं, सच्चा धर्म बिगड़ जाता है और मिलावटी हो जाता है।

18. साथ जोड़ी गई चेतावनी का हमारी सुस्ती को झटकने में कम प्रभाव नहीं होना चाहिए। वह इन शब्दों में है:—

क्योंकि मैं यहोवा तेरा परमेश्वर जलन रखनेवाला202 ईश्वर हूँ, और जो मुझ से बैर रखते हैं उनके अधर्म का दण्ड उनकी सन्तान पर तीसरी और चौथी पीढ़ी तक देता हूँ; और जो मुझ से प्रेम रखते और मेरी आज्ञाएँ मानते हैं उन हज़ारों पर करुणा करता हूँ।

यहाँ अर्थ वही है मानो उसने कहा हो कि हमारा कर्तव्य केवल उसी से लिपटे रहना है। इसके लिए प्रेरित करने को वह अपना अधिकार घोषित करता है, जिसे वह बिना दण्ड के घटाया या तुच्छ ठहराया जाना नहीं सहेगा। यह सच है कि प्रयुक्त शब्द एल है, जिसका अर्थ परमेश्वर है; परन्तु क्योंकि वह उस शब्द से निकला है जिसका अर्थ सामर्थ्य है, मैंने बिना संकोच अर्थ को और पूर्ण रूप से व्यक्त करने के लिए उसका वही अनुवाद किया जो हाशिये में दिया है। दूसरा, वह अपने को जलन रखनेवाला कहता है, क्योंकि वह किसी साझेदार को सह नहीं सकता। तीसरा, वह घोषणा करता है कि यदि कोई उसकी महिमा और प्रताप को सृष्ट वस्तुओं या खोदी हुई मूर्तियों को दे दे, तो वह उसका बदला लेगा; और वह भी छोटे समय के साधारण दण्ड से नहीं, वरन् ऐसे दण्ड से जो उन लोगों की तीसरी और चौथी पीढ़ी तक पहुँचे जो अपने पूर्वजों की अभक्ति का अनुकरण करते हैं। इसी प्रकार, वह उन लोगों की दूर की सन्तान के प्रति, जो उससे प्रेम रखते और उसकी व्यवस्था मानते हैं, अपनी निरन्तर दया और कृपा की घोषणा करता है। प्रभु हमसे बहुत बार पति के रूप में बात करता है;203 वह सम्बन्ध जिससे जब वह हमें कलीसिया की गोद में लेता है, अपने साथ जोड़ता है, पवित्र विवाह से कुछ मिलता-जुलता है, क्योंकि वह पारस्परिक विश्वास पर टिका है। जैसे वह सच्चे और विश्वासयोग्य पति के सब कर्तव्य पूरे करता है, वैसे ही हमसे प्रेम और दाम्पत्य पवित्रता की शर्त रखता है; अर्थात् यह कि हम अपने प्राणों को शैतान के लिए व्यभिचारिणी न बनाएँ कि वे घृणित शारीरिक वासनाओं से अशुद्ध हों। इसलिए जब वह यहूदियों को उनके धर्मत्याग पर डाँटता है, तो शिकायत करता है कि उन्होंने पवित्रता त्याग दी और व्यभिचार से अपने आपको अशुद्ध किया। इसलिए, जैसे पति जितना शुद्ध और पवित्र हो, उतनी ही अधिक पीड़ा उसे तब होती है जब वह अपनी पत्नी को किसी प्रतिद्वन्द्वी की ओर झुकती देखता है; वैसे ही प्रभु, जिसने हमें सच्चाई में अपने लिए मँगनी किया है, घोषणा करता है कि वह तीव्रतम जलन से जल उठता है जब कभी हम अपने पवित्र विवाह की शुद्धता की उपेक्षा करके घिनौनी वासनाओं से अपने आपको अशुद्ध करते हैं, और विशेषकर तब जब उसके ईश्वरत्व की आराधना, जो बड़ी सावधानी से अखण्ड रखी जानी चाहिए थी, किसी और को दे दी जाती है, या किसी अन्धविश्वास से मिलावटी कर दी जाती है; क्योंकि इस प्रकार हम न केवल अपनी दी हुई वचनबद्धता का उल्लंघन करते हैं, वरन् व्यभिचारियों को प्रवेश देकर विवाह-शय्या को अशुद्ध करते हैं।

19. चेतावनी में हमें यह ध्यान देना है कि जब परमेश्वर घोषणा करता है कि वह पितरों के अधर्म का दण्ड सन्तान पर तीसरी और चौथी पीढ़ी तक देगा, तो उसका क्या अर्थ है। ऐसा प्रतीत होता है कि दूसरे के दोष के लिए निर्दोष को दण्ड देना ईश्वरीय व्यवहार की न्यायशीलता के विरुद्ध है; और प्रभु स्वयं घोषणा करता है कि “पुत्र पिता के अधर्म का भार न उठाएगा,” (यहेजकेल 18:20)। फिर भी हमें एक से अधिक बार इस कथन से भेंट होती है कि पितरों के पापों का दण्ड आनेवाली पीढ़ियों तक टाला जाता है। इस प्रकार मूसा बार-बार प्रभु को ऐसा कहकर सम्बोधित करता है जो “पितरों के अधर्म का दण्ड सन्तान पर तीसरी और चौथी पीढ़ी तक देता है,” (गिनती 14:18)। इसी प्रकार यिर्मयाह, “तू हज़ारों पर करुणा करता है, और पितरों के अधर्म का फल उनके बाद उनकी सन्तान की गोद में भर देता है,” (यिर्मयाह 32:18)। कुछ लोग इस कठिनाई को सुलझाने में बहुत उलझकर सोचते हैं कि इसे केवल सांसारिक दण्डों के विषय में समझना चाहिए, जिन्हें, कहा जाता है, पुत्र अपने माता-पिता के पापों के लिए उचित रीति से भोग सकते हैं, क्योंकि वे प्रायः उनकी अपनी भलाई के लिए दिए जाते हैं। यह वास्तव में सच है; क्योंकि यशायाह ने हिजकिय्याह से कहा कि उसके द्वारा किए गए एक पाप के लिए उसके पुत्र राज्य से वंचित किए जाएँगे और बन्धुआई में ले जाए जाएँगे (यशायाह 39:7); और फ़िरौन और अबीमेलेक के घरानों को अब्राहम के साथ किए गए अन्याय के लिए दुःख भोगना पड़ा (उत्पत्ति 12:17; 20:3–18)। परन्तु प्रश्न को इस रीति से सुलझाने का प्रयत्न सच्ची व्याख्या से अधिक टालमटोल है। क्योंकि यहाँ और ऐसे ही अंशों में सुनाया गया दण्ड इतना बड़ा है कि वर्तमान जीवन की सीमा के भीतर नहीं रखा जा सकता। इसलिए हमें इसका अर्थ यह समझना चाहिए कि प्रभु का श्राप न्यायपूर्वक न केवल दोषी व्यक्ति के सिर पर, वरन् उसके सारे वंश पर भी पड़ता है। जब वह पड़ चुका, तो इसके अतिरिक्त क्या आशा की जा सकती है कि पिता, परमेश्वर के आत्मा से वंचित होकर, अत्यन्त दुराचार में जीएगा; कि पुत्र, अपने पिता के अधर्म के कारण इसी प्रकार प्रभु द्वारा त्यागा जाकर, विनाश के उसी मार्ग पर चलेगा; और उसके बाद आनेवाली पीढ़ियाँ भी उसके पीछे चलेंगी, जो कुकर्मियों का बीज बनेंगी?

202 या “सामर्थी,” क्योंकि यह नाम सामर्थ्य को सूचित करनेवाले शब्द से निकला है। 203 2 कुरिन्थियों 11:2; इफिसियों 5:30; यिर्मयाह 62:5; होशे 2:9; यिर्मयाह 3:1, 2; होशे 2:2।

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