पुस्तक I · अध्याय 1

परमेश्वर का ज्ञान और अपना ज्ञान: दोनों का परस्पर सम्बन्ध—इस सम्बन्ध का स्वरूप

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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परमेश्वर का ज्ञान और अपना ज्ञान: दोनों का परस्पर सम्बन्ध—इस सम्बन्ध का स्वरूप

अध्याय 1।

परमेश्वर का ज्ञान और अपना ज्ञान: दोनों का परस्पर सम्बन्ध।—इस सम्बन्ध का स्वरूप।

खण्ड।

1. सच्चे ज्ञान का सार—अर्थात् परमेश्वर का ज्ञान और अपना ज्ञान। दूसरे ज्ञान के प्रभाव।

2. परमेश्वर के ज्ञान के प्रभाव: वह हमारे अभिमान को नम्र करता है, हमारे कपट को उघाड़ता है, परमेश्वर की पूर्ण सिद्धताओं को और हमारी पूर्ण असहायता को प्रकट करता है।

3. परमेश्वर के ज्ञान के प्रभावों का उदाहरणों द्वारा स्पष्टीकरण: 1. पवित्र पूर्वजों के उदाहरण से; 2. पवित्र स्वर्गदूतों के उदाहरण से; 3. सूर्य और चन्द्रमा के उदाहरण से।

1. हमारी बुद्धि, जहाँ तक उसे सच्ची और ठोस बुद्धि गिना जाना चाहिए, लगभग पूरी तरह दो भागों से मिलकर बनी है: परमेश्वर का ज्ञान और अपना ज्ञान। परन्तु ये दोनों अनेक बन्धनों से एक-दूसरे से जुड़े हैं, इसलिए यह निश्चित करना सरल नहीं कि दोनों में से कौन पहले आता है और दूसरे को जन्म देता है। क्योंकि पहली बात यह है कि कोई मनुष्य अपने को देखते ही तुरन्त उस परमेश्वर की ओर विचार किए बिना नहीं रह सकता, जिसमें वह जीवित रहता और चलता-फिरता है; क्योंकि यह बिलकुल प्रकट है कि जो गुण हमारे पास हैं वे हमारे अपने से कदापि नहीं हो सकते; वरन् हमारा अस्तित्व केवल परमेश्वर में टिके रहने के सिवा और कुछ नहीं है। दूसरी बात यह है कि जो आशिषें स्वर्ग से निरन्तर हम पर टपकती रहती हैं, वे उन धाराओं के समान हैं जो हमें स्रोत तक पहुँचाती हैं। यहाँ भी हमारी दरिद्रता से परमेश्वर में निवास करनेवाली भलाई की अनन्तता और अधिक प्रकट होती है। विशेषकर उस दयनीय विनाश ने, जिसमें प्रथम मनुष्य के विद्रोह ने हमें गिरा दिया है, हमें अपनी आँखें ऊपर उठाने को विवश कर दिया है; केवल इसलिए नहीं कि भूखे और तरसते हुए हम वहाँ से अपनी आवश्यकता की वस्तुएँ माँगें, वरन् इसलिए भी कि भय से जागकर हम नम्रता सीखें। क्योंकि जैसे मनुष्य में दुःख का मानो एक संसार बसा हुआ है, और जब से हम दिव्य वस्त्र से वंचित किए गए तब से हमारी नग्न लज्जा लज्जास्पद गुणों की एक अपार श्रृंखला प्रकट करती है, वैसे ही हर मनुष्य अपनी दुर्दशा के बोध से बिंधकर इस रीति से अनिवार्यतः परमेश्वर का कुछ-न-कुछ ज्ञान पा लेता है। इस प्रकार हमारी अज्ञानता, व्यर्थता, अभाव, दुर्बलता, संक्षेप में हमारी भ्रष्टता और बिगाड़ का बोध हमें स्मरण दिलाता है (देखें यूहन्ना 4:10 पर कैल्विन की टीका) कि सच्ची बुद्धि का प्रकाश, ठोस सद्गुण और भरपूर भलाई केवल प्रभु में हैं, उसके सिवा और किसी में नहीं। इसलिए हमारी अपनी बुराइयाँ हमें परमेश्वर की भली वस्तुओं पर विचार करने को प्रेरित करती हैं; और सच तो यह है कि जब तक हम अपने से अप्रसन्न होना आरम्भ न करें, तब तक हम गम्भीरता से उसकी ओर अभिलाषा नहीं कर सकते। क्योंकि कौन मनुष्य अपने ही में सन्तुष्ट रहने को तैयार नहीं रहता? और वास्तव में जब तक वह अपने को नहीं जानता, अर्थात् जब तक वह अपने गुणों से सन्तुष्ट है और अपनी दुर्दशा से अनजान या बेसुध है, तब तक कौन इस प्रकार सन्तुष्ट नहीं रहता? इसलिए प्रत्येक व्यक्ति, अपने को जान लेने पर, न केवल परमेश्वर को खोजने के लिए प्रेरित होता है, वरन् मानो हाथ पकड़कर उसे पाने की ओर भी ले जाया जाता है।

2. दूसरी ओर यह प्रकट है कि मनुष्य कभी सच्चा आत्म-ज्ञान तब तक नहीं पाता जब तक वह पहले परमेश्वर के मुख का दर्शन न कर ले, और उस दर्शन के बाद नीचे उतरकर अपने भीतर न झाँके। क्योंकि (हमारा जन्मजात अभिमान ऐसा ही है) हम सदा अपनी दृष्टि में धर्मी, सीधे, बुद्धिमान और पवित्र दिखाई देते हैं, जब तक कि स्पष्ट प्रमाण से हमें अपने अधर्म, नीचता, मूर्खता और अशुद्धता का निश्चय न करा दिया जाए। परन्तु यदि हम केवल अपनी ओर देखें और प्रभु की ओर भी न देखें, तो हमें यह निश्चय नहीं होता—क्योंकि वही एकमात्र मापदण्ड है जिसके प्रयोग से यह निश्चय उत्पन्न हो सकता है। क्योंकि हम सब स्वभाव से कपट की ओर झुके हुए हैं, इसलिए धार्मिकता का कोई खोखला दिखावा ही हमें धार्मिकता के स्थान पर सन्तुष्ट करने के लिए बहुत है। और जब हमारे भीतर या आस-पास कुछ ऐसा दिखाई नहीं देता जो अत्यन्त बड़ी अशुद्धता से कलंकित न हो, तो जब तक हम अपने मन को मानवीय मलिनता की सीमाओं के भीतर रखते हैं, तब तक जो वस्तु थोड़ी-सी भी कम मैली हो, वह हमें ऐसे आनन्द देती है मानो अत्यन्त शुद्ध हो—जैसे वह आँख जिसे पहले केवल काला रंग ही दिखाया गया हो, किसी हल्के सफ़ेद या भूरे-से रंग की वस्तु को भी बिलकुल श्वेत समझ लेती है। वरन् मन की शक्तियों के आकलन में हम कितने धोखे में रहते हैं, इसका और भी प्रबल दृष्टान्त शारीरिक इन्द्रिय दे सकती है। यदि हम दोपहर को या तो भूमि की ओर देखें, या अपने सामने खुली आस-पास की वस्तुओं पर, तो हम समझते हैं कि हमारी दृष्टि बहुत तेज़ और भेदनेवाली है; परन्तु जब हम सूर्य की ओर आँख उठाकर उसे बिना आड़ के निहारते हैं, तो जो दृष्टि पृथ्वी के लिए बहुत अच्छी थी वह उसकी चकाचौंध से तुरन्त चौंधिया जाती और घबरा जाती है, यहाँ तक कि हमें मानना पड़ता है कि पार्थिव वस्तुओं को पहचानने की हमारी तीक्ष्णता सूर्य के सामने केवल धुँधलापन है। हमारे आत्मिक गुणों के आकलन में भी ऐसा ही होता है। जब तक हम पृथ्वी से परे नहीं देखते, तब तक हम अपनी धार्मिकता, बुद्धि और सद्गुण से भली-भाँति प्रसन्न रहते हैं; हम अपने को अत्यन्त चापलूसी के शब्दों से सम्बोधित करते हैं, और केवल अर्द्ध-देवताओं से कुछ ही कम जान पड़ते हैं। परन्तु जैसे ही हम अपने विचारों को परमेश्वर की ओर उठाना आरम्भ करें, और यह सोचें कि वह कैसा प्रभु है, और उस धार्मिकता, बुद्धि और सद्गुण की सिद्धता कितनी पूर्ण है, जिसके अनुरूप होने के लिए हम मापदण्ड के रूप में बँधे हैं, तो जो पहले अपनी झूठी धार्मिकता के दिखावे से हमें भाता था वह घोर अधर्म से मलिन ठहरेगा; जिसने बुद्धि के नाम से हमें विचित्र रीति से भरमाया था वह अपनी चरम मूर्खता से घृणा उत्पन्न करेगा; और जो सद्गुणी सामर्थ्य का रूप दिखाता था वह अत्यन्त दयनीय निर्बलता ठहराकर दोषी ठहराया जाएगा। हमारे जो गुण सबसे सिद्ध जान पड़ते हैं, वे ईश्वरीय पवित्रता के अनुरूप होने से इतने दूर हैं।

3. इसी से वह भय और विस्मय उपजा, जिससे, जैसा पवित्रशास्त्र सदा बताता है, पवित्र जन तब-तब मारे गए और दब गए जब-जब उन्होंने परमेश्वर की उपस्थिति देखी। जब हम उन्हें, जो पहले दृढ़ और निश्चिन्त खड़े थे, इस प्रकार भय से काँपते देखते हैं कि मृत्यु का भय उन्हें जकड़ लेता है, वरन् वे किसी रीति से निगल लिए गए और मिटा दिए गए से हो जाते हैं, तो यही निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य अपनी तुच्छता के बोध से तब तक ठीक रीति से प्रभावित और प्रेरित नहीं होते जब तक वे अपने को परमेश्वर की महिमा के सामने रखकर न देख लें। न्यायियों की पुस्तक में और भविष्यद्वक्ताओं के लेखों में इस घबराहट के बारंबार उदाहरण मिलते हैं;53 यहाँ तक कि परमेश्वर के लोगों में यह कहावत प्रचलित हो गई थी, “हम अवश्य मर जाएँगे, क्योंकि हमने प्रभु को देखा है।” इसी कारण अय्यूब की पुस्तक भी, मनुष्यों को उनकी मूर्खता, दुर्बलता और मलिनता के बोध के नीचे नम्र करते समय, अपना मुख्य तर्क सदा परमेश्वर की बुद्धि, सामर्थ्य और पवित्रता के वर्णनों से ही निकालती है। और यह निराधार नहीं: क्योंकि हम देखते हैं कि अब्राहम प्रभु की महिमा को देखने के जितना निकट पहुँचता है, उतना ही अपने को मिट्टी और राख मात्र स्वीकार करने को तत्पर होता है; और एलिय्याह उसके आगमन की प्रतीक्षा खुले मुँह से नहीं कर सका; दृश्य ऐसा भयानक है। और मनुष्य क्या कर सकता है—वह मनुष्य जो सड़ाहट और कीड़ा मात्र है—जब करूब तक भय के मारे अपने मुँह ढाँपने को विवश हैं? निःसन्देह इसी का संकेत भविष्यद्वक्ता यशायाह करता है जब वह कहता है (यशायाह 24:23), “जब सेनाओं का यहोवा राज्य करेगा, तब चन्द्रमा घबरा जाएगा और सूर्य लज्जित होगा;” अर्थात्, जब वह अपना तेज प्रकट करेगा और उसे निकट से दिखाएगा, तब सबसे उज्ज्वल वस्तुएँ भी उसकी तुलना में अन्धकार से ढँक जाएँगी।

53 न्यायियों 13:22; यशायाह 6:5; यहेजकेल 1:28, 3:14; अय्यूब 9:4, आदि; उत्पत्ति 17:27; 1 राजाओं 19:13।

परन्तु यद्यपि परमेश्वर का ज्ञान और अपना ज्ञान परस्पर बन्धन से बँधे हैं, तथापि उचित क्रम यह माँगता है कि हम पहले पहले का वर्णन करें, और तब दूसरे की ओर उतरें।

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