पुस्तक III · अध्याय 6

मसीही मनुष्य का जीवन। इसके लिए प्रेरित करनेवाले पवित्रशास्त्रीय तर्क

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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मसीही मनुष्य का जीवन। इसके लिए प्रेरित करनेवाले पवित्रशास्त्रीय तर्क

अध्याय 6।

मसीही मनुष्य का जीवन। इसके लिए प्रेरित करनेवाले पवित्रशास्त्रीय तर्क।

यह अध्याय और इसके बाद के चार अध्याय मसीही के जीवन का वर्णन करते हैं, और इस प्रकार सजाए गए हैं कि उन्हें दो मुख्य भागों में बाँटा जा सकता है।

पहला, यह एक सर्वमान्य बात माननी चाहिए कि कोई मनुष्य मसीही नहीं है जो धार्मिकता के प्रति कोई विशेष प्रेम अनुभव नहीं करता, अध्याय 6। दूसरा, उस मानक के विषय में जिसके अनुसार प्रत्येक मनुष्य को अपना जीवन नियमित करना चाहिए, यद्यपि केवल अध्याय 7 में ही उस पर विचार किया गया प्रतीत होता है, तो भी उसके बाद के तीन अध्याय भी उसी का उल्लेख करते हैं। क्योंकि वह दिखाता है कि मसीही के सामने दो कर्तव्य हैं। पहला, पालन इतना कठिन होने के कारण उसे अत्यधिक धीरज की आवश्यकता है। इसलिए अध्याय 8 विशेष रूप से क्रूस की उपयोगिता का वर्णन करता है, और अध्याय 9 आनेवाले जीवन पर मनन करने का निमन्त्रण देता है। अन्त में, अध्याय 10 स्पष्ट रूप से दिखाता है, जो इस उद्देश्य में कम सहायक नहीं है, कि हमें इस जीवन और इसकी सुविधाओं का दुरुपयोग किए बिना कैसे उपयोग करना चाहिए।

यह छठा अध्याय दो भागों से बना है—I. मसीही जीवन पर इस ग्रन्थ का नया जन्म और पश्चाताप के सिद्धान्त से सम्बन्ध। ग्रन्थ की रूपरेखा, खण्ड 1-3। II. जिन अतियों से बचना चाहिए; 1. अपने कर्मों से मसीह का इनकार करनेवाले झूठे मसीहियों की निन्दा, खण्ड 4। 2. मसीहियों को निराश नहीं होना चाहिए, भले ही उन्होंने सिद्धता प्राप्त न की हो, बशर्ते वे भक्ति और धार्मिकता में प्रतिदिन उन्नति करते जाएँ।

खण्ड।

1. इस अध्याय का नया जन्म के सिद्धान्त से सम्बन्ध। मसीही जीवन सम्बन्धी शिक्षा की आवश्यकता। इस ग्रन्थ की संक्षिप्तता। इसकी पद्धति। पवित्रशास्त्र की नैतिक व्यवस्था की सादगी और निराभरण सरलता।

2. दो विभाग। पहला, व्यक्तिगत पवित्रता। 1. क्योंकि परमेश्वर पवित्र है। 2. क्योंकि उसके पवित्र लोगों के साथ हमारी सहभागिता है।

3. दूसरा विभाग, जो हमारे छुटकारे से सम्बन्ध रखता है। पवित्रशास्त्र की अद्भुत नैतिक व्यवस्था। मसीही जीवन के लिए पाँच विशेष प्रेरणाएँ या उपदेश।

4. इस जीवन के विरोधी झूठे मसीहियों की निन्दा। 1. उन्होंने मसीह को सचमुच नहीं सीखा। 2. सुसमाचार उनके वचनों या कर्मों का मार्गदर्शक नहीं है। 3. वे गुरु मसीह का अनुकरण नहीं करते। 4. वे आत्मा को उसके वचन से अलग करना चाहते हैं।

5. मसीहियों को निराश नहीं होना चाहिए: बशर्ते 1. वे परमेश्वर के वचन को अपना मार्गदर्शक मानें। 2. सच्चाई से धार्मिकता का अभ्यास करें। 3. अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रभु के मार्गों पर चलें। 4. कुछ उन्नति करें। 5. अन्त तक डटे रहें।

1. हम कह चुके हैं कि नया जन्म का उद्देश्य विश्वासियों के जीवन को परमेश्वर की धार्मिकता के साथ मेल और सामंजस्य में लाना है, और इस प्रकार उस लेपालकपन को पक्का करना है जिसके द्वारा वे पुत्रों के रूप में ग्रहण किए गए हैं। परन्तु यद्यपि व्यवस्था में वह नया जीवन समाया हुआ है जिसके द्वारा हम में परमेश्वर का स्वरूप फिर से बहाल होता है, फिर भी हमारी सुस्ती को सहायताओं और प्रेरणाओं दोनों की बड़ी आवश्यकता है, इसलिए पवित्रशास्त्र में से इस सुधार का सच्चा वर्णन एकत्र करना उपयोगी होगा, ऐसा न हो कि पश्चाताप की हार्दिक इच्छा रखनेवाला कोई मनुष्य अपने उत्साह में भटक जाए। फिर, मैं यह भी भली-भाँति जानता हूँ कि मसीही के जीवन का वर्णन करने का काम हाथ में लेकर मैं एक विशाल और व्यापक विषय में प्रवेश कर रहा हूँ, ऐसा विषय जिसे उसके सब अंगों में पूरी तरह विचारा जाए तो वह एक बड़ा ग्रन्थ भर देने के लिए पर्याप्त है। हम देखते हैं कि पिता लोग अलग-अलग गुणों का वर्णन करते हुए अपने उपदेशों को कितना लम्बा खींच देते हैं। यह वे केवल वाचालता के कारण नहीं करते; क्योंकि जिस भी गुण की सिफ़ारिश करने का आप बीड़ा उठाएँ, विषय की प्रचुरता आपकी लेखनी को अपने आप इस प्रकार फैलाव की ओर ले जाती है कि यदि आपने उसे विस्तार से न किया हो तो ऐसा लगता है कि आपने उस पर ठीक से विचार ही नहीं किया। फिर भी जीवन की जो रूपरेखा मैं अब देने जा रहा हूँ, उसमें मेरा अभिप्राय उसे इतना बढ़ाना नहीं है कि प्रत्येक गुण पर अलग से विचार करूँ और उपदेश देता हुआ विस्तार करूँ। इसे दूसरों के लेखों में, और विशेषकर पिताओं की धर्मोपदेश-मालाओं में ढूँढ़ना चाहिए।387 मेरे लिए इतना ही पर्याप्त होगा कि वह पद्धति बता दूँ जिससे एक भक्त मनुष्य को सिखाया जा सके कि अपना जीवन ठीक प्रकार से कैसे गढ़े, और कोई ऐसा सर्वव्यापी नियम संक्षेप में रख दूँ जिससे वह अपने आचरण को अनुचित रीति से नहीं, बल्कि ठीक प्रकार से नियमित कर सके। सम्भव है किसी दिन मुझे और विस्तृत प्रवचन के लिए समय मिले, [या मैं वह काम दूसरों के लिए छोड़ दूँ जिसके लिए मैं इतना उपयुक्त नहीं हूँ। संक्षिप्तता मुझे स्वभाव से प्रिय है, और सम्भवतः विस्तार करने का मेरा कोई भी प्रयत्न सफल न होता। यदि अधिक लम्बा लिखकर मैं सबसे अधिक प्रशंसा भी पा सकता, तब भी मैं शायद ही ऐसा करने की इच्छा करता],388 जबकि मेरे वर्तमान ग्रन्थ का स्वरूप मुझसे यह माँग करता है कि सरल सिद्धान्त को यथासम्भव संक्षेप में छूता चलूँ। जिस प्रकार दार्शनिकों के पास सीधाई और ईमानदारी की कुछ परिभाषाएँ होती हैं, जिनसे वे विशेष कर्तव्यों और गुणों की सारी शृंखला निकालते हैं; उसी प्रकार इस विषय में पवित्रशास्त्र भी क्रमहीन नहीं है, बल्कि अत्यन्त सुन्दर व्यवस्था प्रस्तुत करता है, और वह भी ऐसी जो हर दृष्टि से दार्शनिकों की व्यवस्था से कहीं अधिक निश्चित है। अन्तर केवल इतना है कि वे महत्वाकांक्षा के वश में होकर निरन्तर व्यवस्था की ऐसी परिष्कृत स्पष्टता का दिखावा करते हैं जो उनकी प्रतिभा के प्रदर्शन के काम आए, जबकि परमेश्वर का आत्मा, जो बिना दिखावे के सिखाता है, सटीक क्रम का इतना निरन्तर ध्यान नहीं रखता, फिर भी बीच-बीच में उसका पालन करके पर्याप्त संकेत देता है कि उसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।

2. जिस पवित्रशास्त्रीय व्यवस्था की हम बात कर रहे हैं, वह मुख्यतः दो उद्देश्यों को लेकर चलती है। पहला यह कि धार्मिकता का प्रेम, जिसकी ओर हम स्वभाव से बिलकुल नहीं झुके हैं, हमारे मनों में बैठाया और रोपा जाए। दूसरा यह (देखिए अध्याय 7) कि एक ऐसा नियम ठहराया जाए जो हमें धार्मिकता का पीछा करते हुए भटकने से रोके। वह धार्मिकता की सिफ़ारिश करने के अनेक अद्भुत उपाय रखती है।389 इस ग्रन्थ के भिन्न-भिन्न स्थानों में बहुतों की ओर पहले ही संकेत किया जा चुका है; परन्तु यहाँ भी हम उनमें से कुछ का संक्षेप में उल्लेख करेंगे। इससे अच्छी नींव से वह और कहाँ से आरम्भ कर सकती थी कि हमें स्मरण दिलाए कि हमें पवित्र होना चाहिए, क्योंकि “परमेश्वर पवित्र है”? (लैव्यव्यवस्था 19:1; 1 पतरस 1:16)। क्योंकि जब हम खोई हुई भेड़ों की नाईं बिखरे हुए इस संसार की भूल-भुलैया में भटक रहे थे, तब उसने हमें फिर अपने ही बाड़े में लौटा लिया। जब परमेश्वर के साथ हमारे मेल का उल्लेख होता है, तब हम स्मरण रखें कि पवित्रता ही उसका बन्धन होनी चाहिए; इसलिए नहीं कि पवित्रता के पुण्य से हम उसकी सहभागिता में आते हैं (हमें तो पहले उससे लिपटना चाहिए, ताकि उसकी पवित्रता से ओतप्रोत होकर हम उसके पीछे चलें जहाँ वह बुलाता है), परन्तु इसलिए कि उसकी महिमा के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि उसका दुष्टता और अशुद्धता से कोई मेल न हो। इसीलिए वह हमें बताता है कि यही हमारी बुलाहट का उद्देश्य है, वह उद्देश्य जिस पर हमें सदा दृष्टि रखनी चाहिए, यदि हम परमेश्वर की बुलाहट का उत्तर देना चाहते हैं। क्योंकि जिस संसार में हम डूबे हुए थे, उसके अधर्म और अशुद्धता से हमें किसलिए छुड़ाया गया, यदि हम जीवन भर अपने आप को उसी में लोटने दें? इसके अतिरिक्त हमें साथ ही चेतावनी दी जाती है कि यदि हम प्रभु की प्रजा गिने जाना चाहते हैं, तो हमें पवित्र नगर यरूशलेम में बसना होगा (यशायाह प्रकाशितवाक्य 8, और अन्य स्थानों में); और जैसे उसने उसे अपने लिए पवित्र ठहराया है, वैसे ही उसके निवासियों का उसे अशुद्धता से अपवित्र करना अधर्म होगा। इसीलिए ये वचन हैं, “हे यहोवा, तेरे तम्बू में कौन रहेगा? तेरे पवित्र पर्वत पर कौन बसेगा? वही जो खराई से चलता और धर्म के काम करता है,” (भजन संहिता 15:1, 2; 24:3, 4); क्योंकि जिस पवित्रस्थान में वह वास करता है, वह निश्चय ही किसी अशुद्ध पशुशाला के समान नहीं होना चाहिए।

387 फ्रांसीसी संस्करण में जोड़ा गया है, “C’est a dire, sermons populaires;”—अर्थात् लोकप्रिय उपदेश।

388 कोष्ठक में दिया गया अंश फ्रांसीसी संस्करण में छोड़ दिया गया है। 389 फ्रांसीसी संस्करण में वाक्य का आरम्भ इस प्रकार है, “Quant est du premier poinct;”—जहाँ तक पहली बात का सम्बन्ध है।

3. हमें और अधिक जगाने के लिए, वह परमेश्वर पिता को दिखाता है, जिसने हमें अपने अभिषिक्त में अपने साथ मेल-मिलाप कराकर हम पर अपना स्वरूप अंकित किया है, और चाहता है कि हम उसके अनुरूप बनें (रोमियों 5:4)। तो आएँ, और जो दार्शनिक समझते हैं कि केवल उन्हीं के पास सुव्यवस्थित और क्रमबद्ध नैतिक दर्शन है, वे मुझे इससे उत्तम कोई व्यवस्था दिखाएँ। वे जब सद्गुण के लिए उत्तम उपदेश देना चाहते हैं, तो इतना ही कह पाते हैं कि प्रकृति के अनुसार जियो। पवित्रशास्त्र अपने उपदेश सच्चे स्रोत से लेता है,390 क्योंकि वह न केवल हमें आज्ञा देता है कि हम अपने जीवन को परमेश्वर की ओर दृष्टि रखकर नियमित करें, जो उसका रचयिता है और जिसका वह है; बल्कि यह दिखाने के बाद कि हम अपने सच्चे मूल अर्थात् अपने सृष्टिकर्ता की व्यवस्था से भटक गए हैं, यह भी जोड़ता है कि मसीह, जिसके द्वारा हम परमेश्वर के अनुग्रह में लौट आए हैं, हमारे सामने आदर्श के रूप में रखा गया है, जिसके स्वरूप को हमारे जीवनों को प्रकट करना चाहिए। इससे अधिक प्रभावशाली और क्या चाहिए? बल्कि, इसके अतिरिक्त और क्या चाहिए? यदि प्रभु हमें अपने पुत्र के रूप में इस शर्त पर अपनाता है कि हमारा जीवन मसीह का प्रतिरूप हो, जो हमारे लेपालकपन का बन्धन है,—तो जब तक हम अपने आप को धार्मिकता के लिए समर्पित और अर्पित न करें, हम न केवल अत्यन्त विश्वासघात के साथ अपने सृष्टिकर्ता से विद्रोह करते हैं, बल्कि स्वयं उद्धारकर्ता का भी इनकार करते हैं। फिर परमेश्वर की सब आशीषों की और हमारे उद्धार के प्रत्येक अंश की गणना से वह उपदेश के लिए सामग्री पाता है। जब से परमेश्वर ने अपने आप को हमारे सामने पिता के रूप में प्रकट किया है, तब से यदि हम बदले में अपने आप को उसके पुत्रों के रूप में प्रकट न करें तो हम घोर कृतघ्नता के दोषी ठहरेंगे। जब से मसीह ने हमें अपने लहू के स्नान से शुद्ध किया और बपतिस्मा के द्वारा यह शुद्धि हमें प्रदान की, तब से नई अशुद्धता से मलिन होना हमें शोभा नहीं देता। जब से उसने हमें अपनी देह में कलम की नाईं जोड़ लिया, तब से हमें, जो उसके अंग हैं, इस बात से बहुत सावधान रहना चाहिए कि कोई दाग या कलंक न लग जाए। जब से हमारा सिर स्वर्ग पर चढ़ गया, तब से हमारे लिए उचित है कि अपना मन पृथ्वी से हटा लें और अपने सारे प्राण से स्वर्ग की अभिलाषा करें। जब से पवित्र आत्मा ने हमें प्रभु के लिए मन्दिर ठहराकर समर्पित किया, तब से हमें यह यत्न करना चाहिए कि परमेश्वर की महिमा प्रकट करें, और पाप की अशुद्धता से अपवित्र होने से बचे रहें। जब से हमारी आत्मा और देह स्वर्गीय अविनाशिता और कभी न मुरझानेवाले मुकुट के लिए ठहराए गए हैं, तब से हमें गम्भीरता से यत्न करना चाहिए कि प्रभु के दिन के लिए उन्हें शुद्ध और अभ्रष्ट बनाए रखें। ये, मैं कहता हूँ, सुव्यवस्थित जीवन की सबसे पक्की नींवें हैं, और दार्शनिकों में, जो सद्गुण की प्रशंसा करते हुए मनुष्य की स्वाभाविक प्रतिष्ठा से ऊपर कभी नहीं उठते, इनके समान कोई वस्तु आप ढूँढ़ेंगे तो व्यर्थ ही।

390 मलाकी 1:6; इफिसियों 5:1; 1 यूहन्ना 3:1, 3; इफिसियों 5:26; रोमियों 6:1-4; 1 कुरिन्थियों 6:11; 1 पतरस 1:15, 19; 1 कुरिन्थियों 6:15; यूहन्ना 15:3; इफिसियों 5:2, 3; कुलुस्सियों 3:1, 2; 1 कुरिन्थियों 3:16, 5:17; 2 कुरिन्थियों 6:16; 1 थिस्सलुनीकियों 5:23
4. अब उनसे बात करने का स्थान यही है जिनके पास मसीह का केवल नाम और चिह्न है, फिर भी जो मसीही कहलाना चाहते हैं। वे इस पवित्र नाम पर घमण्ड करने का साहस कैसे करते हैं? मसीह से किसी का कोई सम्बन्ध नहीं सिवाय उनके जिन्होंने सुसमाचार से उसका सच्चा ज्ञान पाया है। प्रेरित इनकार करता है कि किसी मनुष्य ने सचमुच मसीह को सीखा है जिसने “पुराने मनुष्यत्व को, जो भरमानेवाली अभिलाषाओं के अनुसार भ्रष्ट होता जाता है,” उतार डालना और “मसीह को पहिन लेना” नहीं सीखा (इफिसियों 4:22)। इसलिए वे मसीह के ज्ञान का झूठा और अन्यायपूर्ण दावा करने के दोषी ठहरते हैं, चाहे वे सुसमाचार की बातें कितनी ही धाराप्रवाह और वाक्पटुता से कर लेते हों। सिद्धान्त जीभ का विषय नहीं, जीवन का विषय है; वह अन्य विद्याओं की नाईं केवल बुद्धि और स्मरण-शक्ति से ग्रहण नहीं किया जाता; बल्कि तभी ग्रहण होता है जब वह सारे प्राण को अपने अधिकार में ले ले और हृदय के गहनतम कोनों में अपना आसन और निवास बना ले। इसलिए वे या तो यह घमण्ड करके परमेश्वर का अपमान करना छोड़ दें कि वे वह हैं जो वे नहीं हैं, या अपने आप को अपने दिव्य गुरु के अयोग्य शिष्य न होने दें। जिस सिद्धान्त में हमारा धर्म समाया है, उसे हमने पहला स्थान दिया है, क्योंकि उसी से हमारा उद्धार आरम्भ होता है; परन्तु उसे हृदय में उतरना चाहिए और आचरण में बदलना चाहिए, और हमें अपने ही रूप में ऐसा ढाल लेना चाहिए कि वह निष्फल सिद्ध न हो। यदि दार्शनिक उचित ही क्रुद्ध होते हैं और उन लोगों को अपमान के साथ अपनी संगति से निकाल देते हैं जो ऐसी कला का दावा करते हैं जो उनके आचरण की स्वामिनी होनी चाहिए, पर उसे केवल वाचाल कुतर्क में बदल देते हैं, तो हम उन छिछले कुतर्कियों से कितने अधिक उचित रूप से घृणा करें जो सुसमाचार को केवल अपने होंठों पर खेलने देकर सन्तुष्ट हैं, जबकि उसकी सामर्थ्य के कारण उसे हृदय की गहनतम भावनाओं में पैठना, प्राण में अपना आसन जमाना, और दार्शनिकों के ठण्डे प्रवचनों से सौ गुना अधिक सारे मनुष्य में व्याप्त होना चाहिए?

5. मैं यह आग्रह नहीं करता कि मसीही का जीवन पूर्ण सुसमाचार के सिवा कुछ और साँस ही न ले, यद्यपि यह वांछनीय है और इसका प्रयत्न होना चाहिए। मैं सुसमाचारीय सिद्धता पर इतना कठोर आग्रह नहीं करता कि जिस किसी ने उसे प्राप्त नहीं किया उसे मसीही मानने से इनकार कर दूँ। इस प्रकार तो सब लोग कलीसिया से बाहर हो जाएँगे, क्योंकि कोई मनुष्य ऐसा नहीं जो इस सिद्धता से बहुत दूर न हो, जबकि बहुत से लोग, जिन्होंने थोड़ी ही उन्नति की है, अनुचित रूप से ठुकरा दिए जाएँगे। तो फिर क्या? हम इसे अपनी आँखों के सामने उस लक्ष्य के रूप में रखें जिस पर हमें निरन्तर निशाना साधना चाहिए। इसे उस सीमा-रेखा के रूप में समझा जाए जिसकी ओर हमें दौड़ना है। क्योंकि तुम परमेश्वर के साथ बँटवारा नहीं कर सकते, कि उसके वचन की आज्ञाओं का एक भाग अपनाओ और दूसरा भाग अपनी इच्छा से छोड़ दो। क्योंकि सबसे पहले, परमेश्वर सदा खराई को अपनी उपासना का मुख्य भाग बताता है, और खराई से उसका अर्थ है मन की सच्ची एकाग्रता, जो छल और बनावट से रहित हो, और इसके विपरीत दोहरा मन है; मानो यह कहा गया हो कि अच्छे जीवन का आत्मिक आरम्भ तब है जब भीतरी भावनाएँ पवित्रता और न्याय के अभ्यास में सच्चे मन से परमेश्वर को समर्पित हों। परन्तु क्योंकि देह के इस पार्थिव कारागार में किसी मनुष्य को इतना बल नहीं दिया गया कि वह उचित तत्परता से अपनी दौड़ में शीघ्रता करे, और अधिकांश इतनी दुर्बलता से दबे हैं कि हिचकिचाते, लँगड़ाते, यहाँ तक कि भूमि पर रेंगते हुए बहुत कम आगे बढ़ पाते हैं, इसलिए हम में से प्रत्येक अपनी विनम्र सामर्थ्य जहाँ तक ले जाए वहाँ तक जाए और आरम्भ की हुई यात्रा को आगे बढ़ाता रहे। कोई इतना बुरा नहीं चलेगा कि प्रतिदिन कुछ न कुछ आगे न बढ़े। इसलिए हम यह करना कभी न छोड़ें, कि प्रभु के मार्ग में प्रतिदिन आगे बढ़ते जाएँ; और सफलता की अल्प मात्रा के कारण निराश न हों। हमारी इच्छा के अनुसार सफलता कितनी ही थोड़ी क्यों न हो, हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं जाता जब आज का दिन कल से अच्छा हो, बशर्ते कि हम सच्चे एकाग्र मन से अपना लक्ष्य थामे रहें और सीमा-रेखा की अभिलाषा करें, अपने आप से चापलूसी की बातें न करें और अपने दोषों को प्रश्रय न दें, बल्कि निरन्तर यही यत्न करें कि अच्छे बनते जाएँ, जब तक कि हम स्वयं भलाई को प्राप्त न कर लें। यदि अपने सारे जीवन-काल में हम खोजते और पीछा करते रहें, तो अन्त में हम उसे पा लेंगे, जब शरीर की निर्बलता से छूटकर हम परमेश्वर की पूर्ण सहभागिता में प्रवेश पाएँगे।

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