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परमेश्वर का ज्ञान स्वभावतः मानव मन में बोया गया है
अध्याय 3।
परमेश्वर का ज्ञान स्वभावतः मानव मन में बोया गया है।
खण्ड।
1. परमेश्वर का ज्ञान सब पर प्रकट होने के कारण त्यागे हुओं को निरुत्तर कर देता है। परमेश्वर के अस्तित्व में सार्वभौमिक विश्वास और स्वीकृति।
2. आपत्ति—कि धर्म और ईश्वरत्व का विश्वास चतुर राजनीतिज्ञों के आविष्कार हैं। इस आपत्ति का खण्डन। दुष्ट मनुष्यों और नास्तिकों के उदाहरणों से इस सार्वभौमिक विश्वास की पुष्टि।
3. दुष्टों के उन व्यर्थ प्रयत्नों से भी इसकी पुष्टि, जो वे अपने मन से परमेश्वर के सारे भय को निकाल फेंकने के लिए करते हैं। निष्कर्ष: परमेश्वर का ज्ञान स्वभावतः मानव मन में बोया गया है।
1. यह कि मानव मन में, और वह भी स्वाभाविक सहज बोध से, ईश्वरत्व का कुछ बोध है, इसे हम निर्विवाद मानते हैं; क्योंकि परमेश्वर ने स्वयं, इसलिए कि कोई मनुष्य अनजान होने का बहाना न कर सके, सब मनुष्यों को अपने ईश्वरत्व का कुछ विचार दिया है, जिसकी स्मृति को वह निरन्तर नया करता और कभी-कभी बढ़ाता रहता है, ताकि सब के सब यह जानते हुए कि परमेश्वर है और वही उनका सृजनहार है, जब वे न उसकी आराधना करें और न अपने जीवन उसकी सेवा के लिए समर्पित करें, तो अपने ही विवेक से दोषी ठहराए जाएँ। निश्चय ही, यदि कोई ऐसा स्थान है जहाँ यह माना जा सके कि परमेश्वर अनजाना है, तो ऐसे उदाहरण के सबसे सम्भव होने का स्थान सभ्यता से सबसे दूर बसी सबसे जड़ जातियाँ हैं। परन्तु जैसा एक अन्यजाति का लेखक हमें बताता है,54 ऐसा कोई राष्ट्र इतना असभ्य नहीं, कोई जाति इतनी पशुवत् नहीं, जो इस धारणा से रची-बसी न हो कि परमेश्वर है। जो अन्य बातों में निम्न पशुओं से सबसे कम भिन्न दिखाई देते हैं, वे भी धर्म का कुछ बोध निरन्तर बनाए रखते हैं; यह साझा धारणा मन पर इतनी पूर्ण रीति से छाई हुई है, और सब मनुष्यों के हृदयों पर इतनी दृढ़ता से अंकित है। इसलिए, क्योंकि आरम्भ ही से पृथ्वी का कोई भाग, कोई नगर, यहाँ तक कि कोई घराना भी धर्म से रहित नहीं रहा है, यह इस बात की मौन स्वीकृति के समान है कि ईश्वरत्व का बोध हर हृदय पर लिखा हुआ है। वरन् मूर्तिपूजा भी इस तथ्य का भरपूर प्रमाण है। क्योंकि हम जानते हैं कि मनुष्य अपने को नीचा करके दूसरी सृष्टि को अपने से ऊपर बैठाने में कितना हिचकिचाता है। इसलिए जब वह यह समझा जाना सहन करने की अपेक्षा कि उसका कोई परमेश्वर नहीं है, लकड़ी और पत्थर की उपासना करना चुनता है, तो प्रकट है कि परमेश्वर की धारणा की यह छाप कितनी प्रबल होगी; क्योंकि इसे मनुष्य के मन से मिटाना उसके स्वभाव की भावनाओं को तोड़ देने से भी कठिन है,—और ये भावनाएँ निश्चय ही तब टूट जाती हैं जब वह अपने स्वाभाविक अहंकार के विरुद्ध, परमेश्वर के प्रति श्रद्धा के कार्य के रूप में, अपनी इच्छा से अत्यन्त तुच्छ वस्तु के सामने झुक जाता है।
54 “Intelligi necesse est deos, quoniam insitas eorum vel potius innatas cognitiones habemus.—Quae nobis natura informationem deorum ipsorum dedit, eadem insculpsit in mentibus ut eos aeternos et beatos haberemus.”—Cic. de Nat. Deor. lib. 1 c. 17.—“Itaque inter omnes omnium gentium summa constat; omnibus enim innatum est, et in animo quasi insculptum esse deos.”—Lib. 2. c. 4. यह भी देखें Lact. Inst. Div. lib. 3 c. 10।
2. इसलिए जैसा कुछ लोग मानते हैं, यह कहना अत्यन्त बेतुका है कि धर्म को कुछ थोड़े व्यक्तियों की चतुराई और चालाकी ने साधारण लोगों को उचित अधीनता में रखने के उपाय के रूप में गढ़ा, जबकि वे ही व्यक्ति, दूसरों को परमेश्वर की आराधना करना सिखाते हुए, किसी बात पर इतना कम विश्वास नहीं करते थे जितना परमेश्वर के अस्तित्व पर। मैं सहर्ष मानता हूँ कि चालाक लोगों ने जन-साधारण में श्रद्धा उत्पन्न करने या उन्हें भय से डराने, और इस प्रकार उन्हें अधिक आज्ञाकारी बनाने के लिए धर्म में बहुत-सी कल्पित बातें घुसा दी हैं; परन्तु वे इसमें कभी सफल न हो पाते, यदि मनुष्यों के मन परमेश्वर में उस एकसमान विश्वास से पहले ही रचे-बसे न होते, जिससे, जैसे बीज से, धार्मिक प्रवृत्ति उगती है। और यह सर्वथा अविश्वसनीय है कि जिन्होंने धर्म के विषय में अपने अधिक अशिक्षित पड़ोसियों को चतुराई से धोखा दिया, वे स्वयं परमेश्वर के ज्ञान से बिलकुल रहित थे। क्योंकि यद्यपि प्राचीन काल में कुछ ऐसे थे, और आज भी बहुत-से ऐसे मिलते हैं जो परमेश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं, तो भी वे चाहें या न चाहें, जिस सत्य को वे जानना नहीं चाहते उसे कभी-कभी अनुभव करते हैं। हम किसी ऐसे मनुष्य के विषय में नहीं पढ़ते जो गयुस कालिगुला से अधिक निरंकुश और ढीठ रीति से परमेश्वर का तिरस्कार करने पर उतरा हो,55 फिर भी जब भी ईश्वरीय क्रोध का कोई चिह्न प्रकट हुआ, तो किसी ने उससे अधिक भय नहीं दिखाया। इस प्रकार, अनिच्छा से ही सही, वह उस परमेश्वर के सामने भय से थरथराया जिसे दोषी ठहराने का वह खुले रूप से यत्न करता था। अपने आधुनिक अनुकरणकर्ताओं में तुम प्रतिदिन यही बात होती देख सकते हो। परमेश्वर का सबसे ढीठ तिरस्कार करनेवाला ही सबसे आसानी से घबरा जाता है, गिरते पत्ते की आहट पर भी काँप उठता है। यह क्यों, यदि ईश्वरीय प्रताप की रक्षा में नहीं, जो उनके विवेक पर उतना ही अधिक प्रबल प्रहार करता है जितना वे उससे भागने का यत्न करते हैं? वे सब छिपने के स्थान तो ढूँढ़ते हैं जहाँ वे प्रभु की उपस्थिति से अपने को छिपा सकें और उसे फिर अपने मन से मिटा दें; परन्तु अपने सब प्रयत्नों के बाद भी वे जाल में फँसे रहते हैं। यद्यपि यह धारणा कभी-कभी क्षण भर के लिए लुप्त होती दिखाई दे, तो भी वह तुरन्त लौट आती है, और नए वेग से टूट पड़ती है, इसलिए विवेक की कुतरन से राहत का कोई भी अन्तराल मतवालों या पागलों की नींद के समान है, जो नींद में भी चैन से नहीं सोते, वरन् निरन्तर भयंकर डरावने स्वप्नों से सताए जाते हैं। इसलिए दुष्ट लोग स्वयं भी इस बात के उदाहरण हैं कि परमेश्वर का कोई-न-कोई विचार सदा हर मानव मन में बना रहता है।
3. इसलिए सब सुबुद्धि मनुष्य यही मानेंगे कि ईश्वरत्व का बोध मानव हृदय पर मिटाए न मिटनेवाली रीति से खुदा हुआ है। और यह कि यह विश्वास सब में स्वभावतः उत्पन्न होता है और मानो हमारी हड्डियों तक दृढ़ता से जमा हुआ है, इसका प्रबल प्रमाण दुष्टों की हठधर्मिता है, जो प्रचण्ड संघर्ष करने पर भी अपने को परमेश्वर के भय से छुड़ा नहीं पाते। यद्यपि दियागोरस56 और उसके जैसे अन्य लोग धर्म के विषय में सब युगों में जो कुछ माना गया है उसका उपहास करके प्रसन्न होते हैं, और दियोनिसियस स्वर्ग के न्याय पर हँसी उड़ाता है, तो भी वह केवल सार्दिनिया की-सी विकृत हँसी है; क्योंकि विवेक का कीड़ा, जलते लोहे से भी अधिक तीखा, उन्हें भीतर से कुतर रहा है। मैं सिसरो के साथ यह नहीं कहता कि भ्रम समय के साथ मिट जाते हैं, और धर्म दिन-प्रतिदिन बढ़ता और सुधरता जाता है। क्योंकि संसार (जैसा शीघ्र ही दिखाया जाएगा) परमेश्वर के सारे ज्ञान को झटक देने के लिए जितना बन पड़े परिश्रम करता है, और उसकी आराधना को असंख्य रीतियों से बिगाड़ता है। मैं केवल इतना कहता हूँ कि जब वह जड़ कठोरता, जिसे दुष्ट लोग परमेश्वर का तिरस्कार करने के साधन के रूप में लालसा से अपनाते हैं, ढीली पड़ती है, तब ईश्वरत्व का वह बोध, जिसे वे सब वस्तुओं से बढ़कर बुझा देना चाहते थे, तब भी बलवन्त रहता है और समय-समय पर फूट निकलता है। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि यह कोई ऐसी शिक्षा नहीं जो पहली बार पाठशाला में सीखी जाती हो, वरन् ऐसी है जिसके विषय में हर मनुष्य गर्भ ही से अपना स्वयं गुरु है; ऐसी जिसे प्रकृति स्वयं किसी भी व्यक्ति को भूलने नहीं देती, यद्यपि बहुत-से लोग अपनी सारी शक्ति से इसे भूलने का यत्न करते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि सब मनुष्य परमेश्वर को जानना सीखने के विशेष उद्देश्य से ही जन्म लेते और जीते हैं, और यदि परमेश्वर का ज्ञान, जहाँ तक वह यह फल उत्पन्न करने में विफल रहता है, क्षणभंगुर और व्यर्थ है, तो प्रकट है कि वे सब लोग जो अपने जीवन के सारे विचारों और कार्यों को इसी लक्ष्य की ओर नहीं लगाते, अपने अस्तित्व की व्यवस्था को पूरा करने में चूकते हैं। यह दार्शनिकों की दृष्टि से भी नहीं छूटा। क्योंकि प्लेटो का यही आशय था (Phœd. et Theact. में), जब वह, जैसा वह प्रायः करता है, यह सिखाता था कि आत्मा का परम भला परमेश्वर की समानता में है; अर्थात्, जब वह उसे जानने के द्वारा पूरी रीति से उसी में रूपान्तरित हो जाती है। इसी प्रकार प्लूटार्क में ग्रिल्लुस (lib. guod bruta anim. ratione utantur) अत्यन्त कुशलता से तर्क करता है, जब वह कहता है कि यदि धर्म को एक बार मनुष्यों के जीवन से निकाल दिया जाए, तो वे किसी बात में श्रेष्ठ तो रहते नहीं, वरन् अनेक बातों में पशुओं से कहीं अधिक दयनीय हो जाते हैं, क्योंकि अनेक प्रकार की बुराइयों के सामने खुले होने के कारण वे निरन्तर व्याकुल और बेचैन अस्तित्व को घसीटते रहते हैं: कि इसलिए उन्हें श्रेष्ठ बनानेवाली एकमात्र वस्तु परमेश्वर की आराधना है, जिसके द्वारा ही वे अमरता की अभिलाषा करते हैं।
55 Suet. Calig. c. 51.। 56 Cic. De Nat. Deor. lib. 1 c. 23. Valer. Max. lib. 1. c. 1।
