पुस्तक I · अध्याय 15

जिस दशा में मनुष्य सृजा गया। आत्मा की शक्तियाँ—परमेश्वर का स्वरूप—स्वतंत्र इच्छा—आदि धार्मिकता

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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जिस दशा में मनुष्य सृजा गया। आत्मा की शक्तियाँ—परमेश्वर का स्वरूप—स्वतंत्र इच्छा—आदि धार्मिकता

अध्याय 15।

जिस दशा में मनुष्य सृजा गया। आत्मा की शक्तियाँ—परमेश्वर का स्वरूप—स्वतंत्र इच्छा—आदि धार्मिकता।

इस अध्याय का विभाजन इस प्रकार है:—I. पतन से पहले मनुष्य की दशा पर विचार करने में जिन आवश्यक नियमों का पालन करना चाहिए, उन्हें निर्धारित करने के पश्चात् सबसे पहले शरीर की सृष्टि पर विचार किया गया है, और इस बात से मिलनेवाली शिक्षा पर कि वह भूमि से रचा गया और उसमें जीवन फूँका गया, खण्ड 1। II. मानव आत्मा की अमरता विविध ठोस तर्कों से प्रमाणित की गई है, खण्ड 2। III. परमेश्वर के स्वरूप पर (जो आत्मा की अमरता का सबसे सशक्त प्रमाण है) विचार किया गया है, और अनेक बेतुकी कल्पनाओं का खण्डन किया गया है, खण्ड 3। IV. सत्य के प्रकाश को धुँधला करनेवाली अनेक भूलों को दूर करने के पश्चात्, पतन से पूर्व आत्मा की शक्तियों का दार्शनिक और धर्मवैज्ञानिक विवेचन आता है।

खण्ड।

1. परमेश्वर का दोहरा ज्ञान—अर्थात् पतन से पहले का और उसके बाद का। यहाँ पहले का विचार किया गया है। इस चर्चा में जिन विशेष नियमों या सावधानियों का ध्यान रखना चाहिए। मिट्टी से रचे और आत्मा के निवास बने हुए शरीर से हमें क्या शिक्षा मिलती है।

2. आत्मा की अमरता का प्रमाण इन बातों से: 1. विवेक की गवाही। 2. परमेश्वर का ज्ञान। 3. वे उत्कृष्ट शक्तियाँ जिनसे वह सम्पन्न है। 4. स्वप्न में उसकी सक्रियता और अद्भुत कल्पनाएँ। 5. पवित्रशास्त्र के असंख्य अंश।

3. परमेश्वर का स्वरूप आत्मा की अमरता के सबसे सशक्त प्रमाणों में से एक है। इस स्वरूप से क्या अभिप्राय है। परमेश्वर के स्वरूप के विषय में ओसिएंडर के स्वप्नों का खण्डन। क्या “स्वरूप” और “समानता” में कोई भेद है। ओसिएंडर की एक और आपत्ति का खण्डन। परमेश्वर का स्वरूप सम्पूर्ण आदम में प्रकट है।

4. परमेश्वर का स्वरूप आत्मा में है। उसका स्वभाव मसीह के द्वारा उसके नवीनीकरण से जाना जा सकता है। इस नवीनीकरण में क्या-क्या सम्मिलित है। पतन से पहले मनुष्य में परमेश्वर का स्वरूप क्या था। अब वह किन बातों में दिखाई देता है। वह कब और कहाँ अपनी सिद्धता में दिखाई देगा।

5. आत्मा की उत्पत्ति के विषय में मनिकीवादियों और सर्वेटस के स्वप्नों का खण्डन। साथ ही ओसिएंडर का भी, जो कहता है कि सारभूत धार्मिकता के बिना मनुष्य में परमेश्वर का कोई स्वरूप नहीं है।

6. आत्मा की शक्तियों के विषय में दार्शनिकों का सिद्धान्त प्रायः असंगत, संदिग्ध और अस्पष्ट है। आत्मा की श्रेष्ठता का वर्णन। प्रत्येक मनुष्य में केवल एक ही आत्मा है। आत्मा की शक्तियों के विषय में दार्शनिकों के मत की संक्षिप्त समीक्षा। इस मत के विषय में क्या सोचना चाहिए।

7. आत्मा की शक्तियों का बुद्धि और इच्छा में विभाजन मसीही सिद्धान्त के अधिक अनुकूल है।

8. पतन से पूर्व मनुष्य में बुद्धि और इच्छा की शक्ति और कार्य। मनुष्य की स्वतंत्र इच्छा। यह स्वतन्त्रता पतन में खो गई—एक ऐसा तथ्य जो दार्शनिकों को ज्ञात नहीं था। पिलागियसवादियों और पोप के अनुयायियों का भ्रम। स्वतंत्र अवस्था में मनुष्य के गिरने के विषय में आपत्ति का खण्डन।

1. अब हमें मनुष्य की सृष्टि के विषय में कहना है, केवल इस कारण से नहीं कि परमेश्वर के सब कामों में वह सबसे उत्तम है और उसके न्याय, बुद्धि और भलाई का सबसे आश्चर्यजनक नमूना है, परन्तु इसलिए भी कि, जैसा हमने आरम्भ में कहा था, जब तक हम अपने आप को भी न जानें, तब तक हम परमेश्वर को स्पष्ट और उचित रीति से नहीं जान सकते। यह ज्ञान दोहरा है—पहला, उस दशा से सम्बन्ध रखता है जिसमें हम आरम्भ में सृजे गए थे; और दूसरा, उस दशा से जो आदम के पतन के तुरन्त बाद हमारी हुई। क्योंकि यदि हम पतन के कारण अपने स्वभाव की भ्रष्टता और अधोगति से अनजान ही रहें, तो यह जान लेना कि हम कैसे सृजे गए थे, हमारे लिए थोड़े ही काम का होगा। परन्तु इस समय हम अपने विचार को अपने स्वभाव की मूल निर्दोष अवस्था तक ही सीमित रखते हैं। और निश्चय ही, उस दयनीय दशा में उतरने से पहले जिसमें मनुष्य गिर गया है, यह विचार करना महत्त्वपूर्ण है कि वह आरम्भ में क्या था। क्योंकि सावधानी की आवश्यकता है, ऐसा न हो कि हम मनुष्य की स्वाभाविक बुराइयों ही पर ध्यान दें, और इस प्रकार उन्हें प्रकृति के रचयिता के सिर मढ़ते दिखाई दें; क्योंकि अधर्म यह बहाना बना सके कि इसमें जो कुछ दूषित है वह किसी न किसी रूप में परमेश्वर ही से आया है, तो उसे अपनी रक्षा के लिए यही बहुत लगता है, और अभियोग लगाए जाने पर वह परमेश्वर ही के विरुद्ध दलील देने और अपने दोष का भार उसी पर डालने में संकोच नहीं करता। जो लोग चाहते हैं कि उन्हें परमेश्वरत्व के विषय में अधिक आदर से बोलनेवाला समझा जाए, वे भी अपनी भ्रष्टता के लिए प्रकृति से बहाना ढूँढ़ लेते हैं, और यह नहीं सोचते कि वे भी, यद्यपि अधिक छिपे रूप में, परमेश्वर पर दोष लगा रहे हैं, जिस पर यदि प्रकृति में कुछ दूषित सिद्ध हो जाए तो अपमान आ पड़ेगा। इसलिए, क्योंकि शरीर निरन्तर बहानों की ताक में रहता है, जिनसे वह समझता है कि अपनी दुष्टता का दोष अपने ऊपर से हटाकर किसी और पर डाल सकता है, हमें इस भ्रष्ट आचरण से सावधानी से बचना चाहिए, और मानव जाति की विपत्ति का वर्णन इस रीति से करना चाहिए कि हर प्रकार का टालमटोल कट जाए और जो कोई परमेश्वर के न्याय पर आक्षेप करे, उन सबके विरुद्ध उसकी निर्दोषता सिद्ध हो। हम आगे अपने उचित स्थान पर (पुस्तक 2, अध्याय 1, खण्ड 3) देखेंगे कि जो पवित्रता आदम को आरम्भ में दी गई थी, उससे मानव जाति अब कितनी दूर जा चुकी है। और सबसे पहले यह ध्यान देना चाहिए कि जब वह भूमि की मिट्टी से रचा गया तो उसके अभिमान पर लगाम लगा दी गई—क्योंकि इससे बढ़कर बेतुकी बात और क्या होगी कि वे लोग अपनी श्रेष्ठता पर घमण्ड करें जो न केवल मिट्टी के डेरों में रहते हैं, वरन् आप भी कुछ अंश में धूल और राख हैं। परन्तु परमेश्वर ने मिट्टी के पात्र में केवल प्राण ही डालना नहीं चाहा, वरन् उसे एक अमर आत्मा का निवास बनाया; इसलिए आदम अपने सृजनहार की इस बड़ी उदारता पर भली-भाँति घमण्ड कर सकता था।118

2. इसके अतिरिक्त, इसमें कोई सन्देह नहीं कि मनुष्य शरीर और आत्मा से मिलकर बना है; आत्मा से तात्पर्य एक अमर परन्तु सृजी हुई सत्ता है, जो उसका श्रेष्ठ भाग है। कभी-कभी उसे आत्मा (spirit) भी कहा जाता है। परन्तु यद्यपि जब ये दोनों शब्द साथ-साथ प्रयुक्त होते हैं तो उनके अर्थ भिन्न होते हैं, फिर भी जब “आत्मा” (spirit) अकेला प्रयुक्त होता है तो उसका अर्थ प्राण के बराबर ही है, जैसे जब सुलैमान मृत्यु के विषय में कहता है कि आत्मा परमेश्वर के पास लौट जाती है जिसने उसे दिया था (सभोपदेशक 12:7)। और जब मसीह अपनी आत्मा पिता को सौंपता है, और स्तिफनुस अपनी आत्मा मसीह को, तो उनका अर्थ केवल यही है कि जब आत्मा शरीर के कारागार से छूटती है, तब परमेश्वर उसका सदा का रखवाला होता है। जो लोग यह कल्पना करते हैं कि आत्मा इसलिए आत्मा कहलाती है कि वह शरीरों में परमेश्वर की ओर से फूँकी गई एक श्वास या शक्ति मात्र है, जिसमें कोई सत्ता नहीं, वे बहुत भारी भूल करते हैं, जैसा कि वस्तु के स्वभाव से और सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र के सार से प्रकट है। यह सच है कि मनुष्य पृथ्वी से बहुत चिपके रहने के कारण समझ में मन्द हैं, वरन् ज्योतियों के पिता से दूर हो जाने के कारण अन्धकार में ऐसे डूबे हैं कि सोचते हैं कि वे कब्र के पार जीवित न रहेंगे; फिर भी ज्योति अन्धकार में इस प्रकार पूरी तरह बुझ नहीं गई कि अमरता का सारा बोध मिट गया हो। विवेक, जो भले और बुरे में भेद करके परमेश्वर के न्याय को उत्तर देता है, एक अमर आत्मा का निःसन्देह चिह्न है। सत्ताहीन गति परमेश्वर के न्याय-आसन तक कैसे पहुँच सकती है, और दोष के बोध में अपने आप को भय से कैसे मार सकती है? शरीर पर आत्मिक दण्ड के किसी भय का प्रभाव नहीं पड़ सकता। यह तो केवल आत्मा ही के योग्य है, इसलिए उसे सत्ता से सम्पन्न होना अवश्य है। फिर परमेश्वर का केवल ज्ञान ही यह प्रमाणित करने को पर्याप्त है कि जो आत्माएँ संसार से ऊपर उठती हैं वे अवश्य अमर हैं, क्योंकि यह असम्भव है कि कोई क्षणभंगुर बल जीवन के स्रोत तक पहुँच सके। अन्त में, मानव मन जिन अनेक उत्कृष्ट शक्तियों से सम्पन्न है वे घोषणा करती हैं कि उस पर कुछ ईश्वरीय बात खुदी हुई है; वे अमर सत्ता के अनेक प्रमाण हैं। क्योंकि निचले प्राणियों में जो बोध पाया जाता है वह शरीर से आगे नहीं जाता, या कम से कम उन्हीं वस्तुओं से आगे नहीं जाता जो वास्तव में उनके सामने उपस्थित हों। परन्तु मानव मन जिस फुर्ती से स्वर्ग से पृथ्वी तक दृष्टि दौड़ाता है, प्रकृति के रहस्यों को टटोलता है, और सब युगों को समेटकर बुद्धि और स्मरण-शक्ति से प्रत्येक को उसके उचित क्रम में सजा लेता है, और बीते हुए में आनेवाले को पढ़ लेता है, वह स्पष्ट प्रमाणित करता है कि मनुष्य में शरीर से अलग कोई वस्तु छिपी है। हमारे पास बुद्धि है जिससे हम अदृश्य परमेश्वर और स्वर्गदूतों की धारणा कर सकते हैं—ऐसी बात जिसे शरीर बिलकुल नहीं कर सकता। हमारे पास सीधाई, न्याय और खरेपन की धारणाएँ हैं—ऐसी धारणाएँ जहाँ शारीरिक इन्द्रियाँ नहीं पहुँच सकतीं। इसलिए इन धारणाओं का निवास आत्मा ही होना चाहिए। वरन् नींद भी, जो मनुष्य को निश्चेष्ट करके मानो उसके जीवन को भी छीन लेती है, अमरता का कोई धुँधला प्रमाण नहीं है; वह न केवल ऐसी वस्तुओं के विचार सुझाती है जो कभी थीं ही नहीं, वरन् भविष्य की घटनाओं का पूर्वाभास भी देती है। मैं उन विषयों को संक्षेप में छूता हूँ जिनका वर्णन अपवित्र लेखक भी अधिक चमकीली भाषा में करते हैं। भक्त पाठकों के लिए तो केवल संकेत ही पर्याप्त है। यदि आत्मा शरीर से अलग कोई सत्ता न होती, तो पवित्रशास्त्र हमें यह न सिखाता119 कि हम मिट्टी के घरों में रहते हैं, और मृत्यु पर शरीर के डेरे से कूच करते हैं; कि हम नाशवान वस्तु को उतार देते हैं, ताकि अन्तिम दिन में हम उन कामों के अनुसार प्रतिफल पाएँ जो देह में किए गए। ये और इसी प्रकार के अंश, जो जगह-जगह मिलते हैं, न केवल आत्मा को शरीर से स्पष्ट अलग करते हैं, वरन् उसे “मनुष्य” का नाम देकर यह सूचित करते हैं कि वही उसका प्रधान भाग है। फिर, जब पौलुस विश्वासियों को उपदेश देता है कि वे अपने आप को शरीर और आत्मा की सब मलिनता से शुद्ध करें, तो वह दिखाता है कि दो भाग हैं जिनमें पाप का दाग बैठता है। पतरस ने भी मसीह को आत्माओं का रखवाला और अध्यक्ष कहा; यदि ऐसी आत्माएँ ही न होतीं जिनके प्रति वह यह कार्य निभाए, तो उसका बोलना निरर्थक होता। न ही उसके इस कथन का कोई आधार रहता जो वह आत्माओं के अनन्त उद्धार के विषय में कहता है, न आत्माओं को पवित्र करने की उसकी आज्ञा का, न इस कथन का कि शारीरिक अभिलाषाएँ आत्मा से लड़ती हैं; और न इब्रानियों की पत्री का लेखक यह कह सकता था कि रखवाले हमारे प्राणों के लिए ऐसे जागते हैं जैसे वे जिन्हें लेखा देना है, यदि आत्माओं में कोई सत्ता न होती। इसी अर्थ में पौलुस परमेश्वर को अपने प्राण पर गवाह ठहराता है, जो परमेश्वर के सम्मुख मुकदमे में लाया ही नहीं जा सकता यदि वह दण्ड भोगने के अयोग्य होता। यह बात हमारे उद्धारकर्ता ने और भी स्पष्ट कही है जब वह हमें आज्ञा देता है कि उससे डरो जो शरीर को मार डालने के बाद नरक की आग में डाल भी सकता है। फिर जब इब्रानियों की पत्री का लेखक हमारे शरीर के पिताओं को परमेश्वर से अलग करता है, जो अकेला हमारी आत्माओं का पिता है, तो वह आत्मा की सत्ता को इससे अधिक स्पष्ट शब्दों में नहीं कह सकता था। इसके अतिरिक्त, यदि आत्मा शरीर की बेड़ियों से छूटकर भी अस्तित्व में न बनी रहती, तो हमारे उद्धारकर्ता लाज़र की आत्मा को अब्राहम की गोद में आनन्द पाते हुए न दिखाते, जबकि इसके विपरीत धनवान की आत्मा भयंकर पीड़ाएँ भोग रही थी। पौलुस भी हमें यही निश्चय दिलाता है जब कहता है कि जब तक हम देह में हैं तब तक प्रभु से अलग हैं। जिस बात में अधिक अस्पष्टता नहीं, उस पर न रुककर मैं केवल इतना और जोड़ता हूँ कि लूका सदूकियों की भूलों में यह गिनाता है कि वे न स्वर्गदूत को मानते थे, न आत्मा को।

118 मनुष्य की प्रथम उत्पत्ति के विषय में कैल्विन की पिगियस के विरुद्ध रचना देखें; और आत्मा की अमरता के विषय में कैल्विन की Psychopannychia और Instructio adv. Libertinos, c. 9, 11, 12 देखें। यह देखना रोचक है कि प्लिनी का मत मसीही सिद्धान्त से कितना भिन्न है: “Omnibus a suprema die eadem quæ ante primam; hic magis a morte sensus ullus aut corpori aut animæ quam ante natales. Eadem enim vanitas in futurum etiam se propagat et in mortis quoque tempora ipsa sibi vitam mentitur.”—Plin. Hist. Nat. lib. 7 c. 56.

119 अय्यूब 4:19; 2 कुरिन्थियों 5:4; 2 पतरस 1:13, 14; 2 कुरिन्थियों 5:10; 7:1; 1 पतरस 2:25; 1:9; 2:11; इब्रानियों 13:17; 2 कुरिन्थियों 1:23; मत्ती 10:28; लूका 12:5; इब्रानियों 12:9; लूका 16:22; 2 कुरिन्थियों 5:6; 8; प्रेरितों के काम 23:8।

3. इस बात का एक सशक्त प्रमाण इस कथन से मिल सकता है कि मनुष्य परमेश्वर के स्वरूप में सृजा गया। क्योंकि यद्यपि मनुष्य के बाहरी रूप में भी ईश्वरीय महिमा प्रकट होती है, फिर भी इसमें सन्देह नहीं कि स्वरूप का उचित निवास आत्मा में है। मैं यह तो नहीं नकारता कि बाहरी आकार, जहाँ तक वह हमें निचले प्राणियों से अलग और भिन्न ठहराता है, हमें परमेश्वर के निकट लाता है; और जो लोग इसे भी परमेश्वर के स्वरूप में गिनना चाहें, उनका मैं उग्रता से विरोध नहीं करूँगा—अर्थात् यह कि:

“जहाँ मूक सृष्टि नीचे झुकाए रहती है दृष्टि,
और अपनी पार्थिव माता की ओर रहती है उसकी गति,
वहाँ मनुष्य ऊपर देखता है, आँखें उठाए हुए,
अपने पैतृक आकाश को निहारता है, सिर तान के।”120

बस इतना समझा जाए कि परमेश्वर का वह स्वरूप, जो इन बाहरी चिह्नों में देखा जाता या प्रकट होता है, आत्मिक है। क्योंकि ओसिएंडर (जिसके लेखों में व्यर्थ कल्पनाओं की ओर एक विकृत चतुराई दिखती है) परमेश्वर के स्वरूप को शरीर और आत्मा दोनों पर बिना भेद के फैलाकर स्वर्ग और पृथ्वी को गड्डमड्ड कर देता है। वह कहता है कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा ने मनुष्य में अपना स्वरूप इसलिए रखा कि यदि आदम स्थिर भी रहता तो भी मसीह मनुष्य बनता। इस प्रकार, उसके अनुसार, जो शरीर मसीह के लिए ठहराया गया था, वही उस देहाकार का नमूना और प्रतिरूप था जो तब रचा गया। परन्तु वह यह कहाँ पाता है कि मसीह आत्मा का स्वरूप है? मैं मानता हूँ कि मध्यस्थ के व्यक्तित्व में सम्पूर्ण ईश्वरत्व की महिमा प्रकट होती है; परन्तु वह अनन्त वचन, जो क्रम में आत्मा से पहले आता है, उसका स्वरूप कैसे कहा जा सकता है? संक्षेप में, जब पुत्र को आत्मा का स्वरूप ठहराया जाता है तब पुत्र और आत्मा का भेद ही नष्ट हो जाता है। फिर मैं जानना चाहता हूँ कि मसीह ने जिस देह को धारण किया, उसमें वह पवित्र आत्मा से किस बात में मिलता है, और किन चिह्नों या रूपरेखाओं से वह समानता प्रकट होती है। और क्योंकि “हम मनुष्य को अपने स्वरूप में बनाएँ” यह वाक्य पुत्र के व्यक्तित्व में भी कहा गया है, इसलिए इससे यह निकलता है कि वह अपना ही स्वरूप है—जो नितान्त बेतुकी बात है। इसके अतिरिक्त, ओसिएंडर की कल्पना के अनुसार121 आदम मनुष्य मसीह के नमूने या प्रतिरूप पर रचा गया। इसलिए मसीह, जो देह धारण करनेवाला था, वह आदर्श था जिसके अनुसार आदम रचा गया, जबकि पवित्रशास्त्र बहुत भिन्न शिक्षा देता है—कि वह परमेश्वर के स्वरूप में रचा गया। उन लोगों की कल्पना में अधिक मान्य बात है जो यह अर्थ करते हैं कि आदम परमेश्वर के स्वरूप में इसलिए रचा गया कि वह मसीह के अनुरूप था, जो परमेश्वर का एकमात्र स्वरूप है; परन्तु इसके लिए भी कोई ठोस आधार नहीं है। “स्वरूप” और “समानता” को लेकर कुछ कम विवाद नहीं हुआ; टीकाकार इन दोनों शब्दों में व्यर्थ ही भेद ढूँढ़ते रहे, जबकि “समानता” केवल व्याख्या के रूप में जोड़ा गया है। पहली बात, हम जानते हैं कि इब्रानी में पुनरुक्तियाँ आम हैं, जिसमें एक ही बात के लिए प्रायः दो शब्द दिए जाते हैं; और दूसरी बात, वस्तु में स्वयं कोई अस्पष्टता नहीं, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का स्वरूप इसीलिए कहा गया कि वह परमेश्वर के समान है। इसलिए उन लोगों की बात में स्पष्ट बेतुकापन है जो इन नामों के विषय में दार्शनिक चिन्तन में लगते हैं, और ज़ेलेम अर्थात् स्वरूप को आत्मा के सार में और देमूत अर्थात् समानता को उसके गुणों में रखते हैं, इत्यादि। परमेश्वर ने मनुष्य को अपने स्वरूप में रचने का निश्चय करके, उस शब्द की अस्पष्टता दूर करने के लिए व्याख्या के रूप में जोड़ा, अपनी समानता में, मानो वह कह रहा हो कि वह मनुष्य को ऐसा बनाएगा जिसमें वह मानो अपने आप को उस पर अंकित समानता के चिह्नों के द्वारा प्रतिबिम्बित करेगा। इसी कारण मूसा थोड़ी ही देर बाद वृत्तान्त को दोहराते हुए परमेश्वर का स्वरूप दो बार लिखता है और समानता का उल्लेख नहीं करता। ओसिएंडर व्यर्थ आपत्ति उठाता है कि मनुष्य का कोई अंश, या आत्मा अपनी शक्तियों सहित, परमेश्वर का स्वरूप नहीं कहलाता, परन्तु सम्पूर्ण आदम, जिसने अपना नाम उस मिट्टी से पाया जिससे वह लिया गया था। मैं इस आपत्ति को निरर्थक कहता हूँ, जैसा सब सुलझे पाठक समझेंगे। क्योंकि यद्यपि सम्पूर्ण मनुष्य नश्वर कहलाता है, तो भी आत्मा इस कारण मृत्यु के अधीन नहीं हो जाती, और न जब उसे विवेकशील प्राणी कहा जाता है तब बुद्धि या समझ शरीर पर आरोपित की जाती है। इसलिए, यद्यपि आत्मा ही मनुष्य नहीं है, फिर भी यह मानने में कोई बेतुकापन नहीं कि वह आत्मा के विषय में परमेश्वर का स्वरूप कहलाता है; यद्यपि मैं उस सिद्धान्त पर स्थिर हूँ जो मैंने अभी रखा, कि परमेश्वर का स्वरूप उस सब तक फैला है जिसमें मनुष्य का स्वभाव पशुओं की अन्य सब जातियों से श्रेष्ठ है। इसलिए इस शब्द से उस निर्दोषता का बोध होता है जिससे आदम सम्पन्न था, जब उसकी बुद्धि स्पष्ट थी, उसकी भावनाएँ विवेक के अधीन थीं, उसकी सब इन्द्रियाँ ठीक रीति से नियन्त्रित थीं, और वह अपनी सारी उत्कृष्टता का श्रेय अपने सृजनहार के अद्भुत वरदानों को सच्चे मन से देता था। और यद्यपि ईश्वरीय स्वरूप का मुख्य निवास मन और हृदय में, अर्थात् आत्मा और उसकी शक्तियों में था, फिर भी शरीर का कोई भाग ऐसा न था जिसमें महिमा की कुछ किरणें न चमकती हों। यह निश्चित है कि संसार के प्रत्येक भाग में ईश्वरीय महिमा की कुछ रूपरेखाएँ देखी जाती हैं; इससे हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि जब उसका स्वरूप मनुष्य में रखा गया, तो इसमें मानो एक मौन विरोधाभास है, जो मनुष्य को भीड़ से अलग करके अन्य सब प्राणियों से ऊँचा उठाता है। परन्तु इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि स्वर्गदूत भी परमेश्वर की समानता में रचे गए थे, क्योंकि जैसा मसीह घोषणा करता है (मत्ती 22:30), हमारी सर्वोच्च सिद्धता उन्हीं के समान होने में होगी। परन्तु मूसा हमें यह विशेष उपाधि देकर हमारे प्रति परमेश्वर की कृपा की प्रशंसा करता है, तो बिना उचित कारण के नहीं करता, विशेषकर इसलिए कि वह मनुष्य की तुलना केवल दृश्य सृष्टि से कर रहा था।

120 ओविद, Metam. Lib. I.—ड्राइडन का अनुवाद।

121 ओसिएंडर की बेतुकी कल्पना के विषय में पुस्तक 2, cap. 12, sec. 5 और आगे देखें। रोमियों 8:3 में कहा गया है कि मसीह पिता की ओर से पापमय शरीर की समानता में भेजा गया, परन्तु कहीं यह नहीं कहा गया कि आदम मसीह के भावी शरीर की समानता में रचा गया, यद्यपि टर्टुलियन कहीं ऐसा कहता है।

4. परन्तु स्वरूप की हमारी परिभाषा तब तक पूरी नहीं लगती जब तक यह अधिक स्पष्ट न हो जाए कि वे शक्तियाँ कौन-सी हैं जिनमें मनुष्य श्रेष्ठ है, और जिनमें उसे परमेश्वर की महिमा का दर्पण समझा जाना चाहिए। परन्तु यह उस उपाय से अधिक अच्छी रीति से नहीं जाना जा सकता जो स्वभाव की भ्रष्टता के लिए ठहराया गया है। इसमें सन्देह नहीं कि जब आदम ने अपनी पहली दशा खोई तो वह परमेश्वर से अलग हो गया। इसलिए, यद्यपि हम मानते हैं कि परमेश्वर का स्वरूप उसमें पूरी तरह मिटा और नष्ट नहीं हुआ, तो भी वह ऐसा बिगड़ गया कि जो कुछ बचा है वह भयानक कुरूपता है; और इसलिए हमारा छुटकारा उसी नवीनीकरण से आरम्भ होता है जो हमें मसीह से मिलता है, जो इसी कारण दूसरा आदम कहलाता है, क्योंकि वह हमें सच्ची और सारभूत निर्दोषता में लौटा देता है। क्योंकि यद्यपि पौलुस उस जीवनदायक आत्मा की, जो विश्वासियों को मसीह से मिलता है, उस जीवित प्राणी से तुलना करता है जो आदम सृजा गया था (1 कुरिन्थियों 15:45), और इस प्रकार नए जन्म में दिए गए अनुग्रह की अधिक प्रचुर मात्रा की प्रशंसा करता है, तो भी वह इस कथन का खण्डन नहीं करता कि नए जन्म का उद्देश्य हमें परमेश्वर के स्वरूप में नए सिरे से रचना है। इसी कारण वह अन्यत्र दिखाता है कि नया मनुष्य अपने सृजनहार के स्वरूप के अनुसार नया बनता जाता है (कुलुस्सियों 3:19)। इसी से मेल खाता एक और अंश है, “नए मनुष्य को पहिन लो, जो परमेश्वर के अनुसार सृजा गया है” (इफिसियों 4:24)। अब हमें देखना चाहिए कि पौलुस इस नवीनीकरण के अन्तर्गत कौन-कौन सी बातें लेता है। पहले वह ज्ञान का उल्लेख करता है, और दूसरे, सच्ची धार्मिकता और पवित्रता का। इससे हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि आरम्भ में परमेश्वर का स्वरूप बुद्धि के प्रकाश, हृदय की सीधाई और प्रत्येक अंग की स्वस्थता में प्रकट हुआ। क्योंकि यद्यपि मैं मानता हूँ कि ये अभिव्यक्तियाँ संक्षिप्त हैं, तो भी यह सिद्धान्त उलटा नहीं जा सकता—कि ईश्वरीय स्वरूप के नवीनीकरण की जो प्रमुख बात है, वही उसकी सृष्टि में भी सर्वोच्च स्थान रखती होगी। इसी अर्थ में पौलुस अन्यत्र कहता है कि हम खुले मुख से मसीह की महिमा को निहारते हुए उसी स्वरूप में बदलते जाते हैं। अब हम देखते हैं कि मसीह परमेश्वर का सबसे सिद्ध स्वरूप कैसे है, जिसमें हम ऐसे नए बनाए जाते हैं कि ज्ञान, पवित्रता, धार्मिकता और सच्ची पवित्रता में परमेश्वर का स्वरूप धारण करें। यह स्थापित हो जाने पर, देहाकार के विषय में ओसिएंडर की कल्पना अपने आप लोप हो जाती है। संत पौलुस के उस अंश के विषय में (1 कुरिन्थियों 11:7), जिसमें केवल पुरुष को, स्त्री को स्पष्टतः अलग रखते हुए, परमेश्वर का स्वरूप और महिमा कहा गया है, प्रसंग से प्रकट है कि वह केवल सामाजिक व्यवस्था की ओर संकेत करता है। मैं मानता हूँ कि यह पहले ही पर्याप्त रूप से प्रमाणित हो चुका है कि स्वरूप में वह सब सम्मिलित है जिसका आत्मिक और अनन्त जीवन से कोई सम्बन्ध है। यही बात, भिन्न शब्दों में, संत यूहन्ना यह कहकर घोषित करता है कि वह ज्योति जो आदि से परमेश्वर के अनन्त वचन में थी, मनुष्यों की ज्योति थी (यूहन्ना 1:4)। उसका उद्देश्य परमेश्वर के उस अद्वितीय अनुग्रह की महिमा करना है जिसने मनुष्य को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ बनाया; साथ ही वह दिखाता है कि वह परमेश्वर के स्वरूप में कैसे रचा गया, कि उसे साधारण समुदाय से अलग करे, क्योंकि उसका अस्तित्व साधारण पशु का नहीं, परन्तु ऐसा है जिसमें समझ का प्रकाश भी जुड़ा है। इसलिए, परमेश्वर का स्वरूप मानव स्वभाव की सम्पूर्ण उत्कृष्टता है; वह आदम में पतन से पहले चमकता था, परन्तु बाद में बिगड़ गया और लगभग नष्ट हो गया, ऐसा कि एक खण्डहर के सिवा कुछ न बचा—उलझा हुआ, विकृत, और अशुद्धता से दूषित; वही स्वरूप अब चुने हुए लोगों में अंशतः दिखाई देता है, जहाँ तक वे आत्मा से नया जन्म पा चुके हैं। परन्तु उसकी पूरी चमक स्वर्ग में प्रकट होगी। फिर भी, जिन विशेष गुणों में वह निहित है, उन्हें जानने के लिए आत्मा की शक्तियों पर विचार करना उचित होगा। क्योंकि अगस्तीन की उस कल्पना में कोई ठोसपन नहीं122 कि आत्मा त्रिएकता का दर्पण है, इस कारण कि उसमें बुद्धि, इच्छा और स्मृति तीनों समाई हैं। न उन लोगों के मत में कोई सम्भाव्यता है जो परमेश्वर की समानता को मनुष्य को दिए गए प्रभुत्व में रखते हैं, मानो वह परमेश्वर के समान केवल इसी में है कि वह सब वस्तुओं का स्वामी और अधिकारी ठहराया गया है। समानता भीतर होनी चाहिए, स्वयं उसी में। वह ऐसी वस्तु होनी चाहिए जो उसके बाहर नहीं, वरन् ठीक-ठीक आत्मा की भीतरी भलाई हो।

5. परन्तु आगे बढ़ने से पहले मनिकीवादियों के उस स्वप्न की ओर ध्यान दिलाना आवश्यक है जिसे हमारे दिनों में सर्वेटस ने फिर जीवित करने का यत्न किया है। क्योंकि कहा गया है कि परमेश्वर ने मनुष्य के नथुनों में जीवन का श्वास फूँका (उत्पत्ति 2:7), इसलिए उन्होंने समझा कि आत्मा परमेश्वर के सार का प्रवाह है; मानो असीम ईश्वरत्व का कोई अंश मनुष्य में चला आया हो। यह दिखाने में देर नहीं लगती कि इस शैतानी भूल के साथ कितनी भद्दी और घिनौनी बेतुकी बातें चली आती हैं। क्योंकि यदि मनुष्य की आत्मा परमेश्वर की सत्ता से आया हुआ एक अंश है, तो ईश्वरीय स्वभाव न केवल विकार और परिवर्तन के अधीन होना चाहिए, वरन् अज्ञान, बुरी अभिलाषाओं, दुर्बलता और सब प्रकार के दोषों के अधीन भी। मनुष्य से अधिक चंचल कोई नहीं, उसकी आत्मा को विरोधी गतियाँ झकझोरती और उलझाती रहती हैं। वह बार-बार कौशल की कमी से भटक जाता है, और छोटी-से-छोटी परीक्षा से भी हार जाता है; और हर कोई अनुभव करता है कि आत्मा स्वयं सब प्रकार की अशुद्धता का पात्र है। ये सब बातें ईश्वरीय स्वभाव पर आरोपित करनी पड़ेंगी, यदि हम मानें कि आत्मा परमेश्वर के सार की है, या ईश्वरत्व का कोई गुप्त प्रवाह है। ऐसी भयंकर बात पर कौन नहीं काँपेगा? पौलुस ने अरातस का उद्धरण देते हुए हमें बताया है कि हम उसकी सन्तान हैं (प्रेरितों के काम 17:28); परन्तु सार में नहीं, गुण में, इस अर्थ में कि उसने हमें ईश्वरीय वरदानों से सजाया है। इस बीच, सृजनहार के सार को चीर-फाड़कर प्रत्येक व्यक्ति को एक-एक अंश देना पागलपन की पराकाष्ठा है। इसलिए यह निश्चित मानना चाहिए कि आत्माएँ, यद्यपि उन पर परमेश्वर का स्वरूप अंकित है, वैसे ही सृजी गई हैं जैसे स्वर्गदूत। सृष्टि सार का स्थानान्तरण नहीं,123 वरन् शून्य से उसका आरम्भ है। और यद्यपि आत्मा परमेश्वर की ओर से दी जाती है, और जब वह शरीर को छोड़ती है तो उसी के पास लौट जाती है, तो भी इससे यह नहीं निकलता कि वह उसके सार से निकाला हुआ अंश है।124 यहाँ भी ओसिएंडर अपने भ्रमों में बहकर एक अधर्मी भूल में फँस गया, जब उसने इनकार किया कि मनुष्य में परमेश्वर का स्वरूप उसकी सारभूत धार्मिकता के बिना हो सकता है; मानो परमेश्वर अपनी आत्मा की सामर्थी शक्ति से हमें अपने अनुरूप न बना सकता, जब तक मसीह सारतः हम में उँडेला न जाए। इन भ्रमों पर कोई चाहे जो रंग चढ़ाए, वे समझदार पाठकों की आँखों को कभी ऐसा अन्धा नहीं कर सकते कि वे उनमें मनिकीवाद का पुनर्जीवन न पहचान लें। परन्तु पौलुस के शब्दों से, जब वह स्वरूप के नवीनीकरण की चर्चा करता है (2 कुरिन्थियों 3:18), यह निष्कर्ष स्पष्ट निकलता है कि मनुष्य परमेश्वर के अनुरूप सार के प्रवाह से नहीं, वरन् आत्मा के अनुग्रह और सामर्थ्य से था। वह कहता है कि मसीह की महिमा को निहारने से हम उसी स्वरूप में बदलते जाते हैं, जैसा प्रभु की आत्मा के द्वारा होता है; और निश्चय ही आत्मा हम में इस रीति से कार्य नहीं करता कि हमें परमेश्वर के सार का ही बना दे।

6. आत्मा की परिभाषा दार्शनिकों से खोजना व्यर्थ होगा, जिनमें से प्लेटो को छोड़ किसी ने उसकी अमरता को स्पष्ट रूप से नहीं माना। सुकरात के सम्प्रदाय के अन्य लोग भी निश्चय उसी ओर झुकते हैं, परन्तु ऐसे सिद्धान्त को स्पष्ट रूप से नहीं सिखाते जिसके विषय में उन्हें पूरा विश्वास न था। प्लेटो ने तो और आगे बढ़कर आत्मा को परमेश्वर का स्वरूप समझा। औरों ने उसकी शक्तियों और क्षमताओं को वर्तमान जीवन से ऐसा जोड़ दिया है कि शरीर से परे कुछ भी नहीं छोड़ते। इसके अतिरिक्त, पवित्रशास्त्र से पहले ही दिखा चुकने के बाद कि आत्मा का सार देहरहित है, अब हमें यह जोड़ना है कि यद्यपि वह ठीक अर्थ में स्थान से घिरी नहीं है, तो भी वह शरीर में एक प्रकार के निवास की भाँति रहती है, केवल उसके सब अंगों में प्राण फूँकने और इन्द्रियों को उनके कार्यों के योग्य और उपयोगी बनाने ही में नहीं, वरन् आचरण के नियन्त्रण में प्रथम स्थान रखने में भी। यह वह केवल पार्थिव जीवन के कर्तव्यों के विषय में ही नहीं, वरन् परमेश्वर की सेवा के विषय में भी करती है। यद्यपि हमारी भ्रष्ट दशा में यह स्पष्ट नहीं दिखता, तो भी इसकी छाप हमारे दोषों में भी दिखाई देती है। क्योंकि मनुष्यों में महिमा की ऐसी प्यास लज्जा के बोध के सिवा कहाँ से आती है? और यह लज्जा का बोध आदर के योग्य वस्तु के प्रति सम्मान के सिवा कहाँ से? इसका पहला सिद्धान्त और स्रोत यह चेतना है कि वे धार्मिकता का अभ्यास करने के लिए जन्मे हैं—ऐसी चेतना जो भक्ति की सगी है। परन्तु जैसे निःसन्देह मनुष्य स्वर्गीय जीवन पर मनन करने के लिए सृजा गया, वैसे ही यह निश्चित है कि उसका ज्ञान आत्मा पर खुदा हुआ था। और सचमुच, यदि मनुष्य अपने सुख को पहचानने में असमर्थ होता, जिसकी सिद्धता परमेश्वर से मिलने में है, तो उसकी समझ का मुख्य उपयोग ही उसमें न होता। इसलिए आत्मा का प्रधान कार्य वहीं पहुँचने की अभिलाषा करना है, और इसलिए मनुष्य जितना परमेश्वर के निकट पहुँचने का यत्न करता है, उतना ही वह प्रमाणित करता है कि वह विवेक से सम्पन्न है।

122 अगस्तीन की Lib. de Trin. 10, और Lib. de Civit. Dei, 11 देखें। आगे कैल्विन की Psychopannychia और Comment. in Genes. में भी देखें। 123 फ्रांसीसी संस्करण जोड़ता है, “comme si on tiroit le vin d’un vaisseau en une bouteille;”—मानो कोई मदिरा को एक मटके से निकालकर बोतल में उँडेले।

124 फ्रांसीसी संस्करण में है, “qu’il le coupe de sa substance comme une branche d’arbre;”—कि वह उसे अपने सार में से ऐसे काट लेता है जैसे पेड़ से डाली।

यद्यपि उन लोगों के मत में कुछ सम्भाव्यता है जो मानते हैं कि मनुष्य में एक से अधिक आत्माएँ हैं, अर्थात् एक संवेदनशील और एक विवेकशील, फिर भी, क्योंकि उनके तर्कों में कोई सार नहीं, हमें इसे अस्वीकार करना चाहिए, जब तक कि हम तुच्छ और निरर्थक बातों में अपने आप को न सताना चाहें। वे हमें बताते हैं (अध्याय 5, खण्ड 4 देखें) कि इन्द्रिय-गतियों और आत्मा के विवेकशील भाग में बड़ा विरोध है। मानो विवेक भी अपने आप से विरोध न करता हो, और उसकी सम्मतियाँ कभी-कभी शत्रु सेनाओं की भाँति आपस में न टकराती हों। परन्तु क्योंकि यह अव्यवस्था स्वभाव के बिगड़ने से उत्पन्न होती है, इसलिए यह निष्कर्ष निकालना कि दो आत्माएँ हैं, भूल है, क्योंकि शक्तियाँ उतने सामंजस्य से मेल नहीं खातीं जितना खाना चाहिए। परन्तु इन शक्तियों पर अधिक सूक्ष्मता से चर्चा करना मैं दार्शनिकों पर छोड़ता हूँ। भक्तों की उन्नति के लिए एक सरल परिभाषा पर्याप्त होगी। मैं मानता हूँ कि इस विषय में जो वे चतुराई से सिखाते हैं वह सच है, और जानने में न केवल सुखद, वरन् उपयोगी भी; और जो इस अध्ययन को आगे बढ़ाना चाहें, उन्हें मैं रोकता नहीं। पहले, मैं मानता हूँ कि पाँच इन्द्रियाँ हैं, जिन्हें प्लेटो (Theætetus में) अंग कहना अधिक पसन्द करता है, जिनके द्वारा सब वस्तुएँ एक साझा संवेदन-केन्द्र में, मानो किसी पात्र में, पहुँचा दी जाती हैं:125 उसके बाद कल्पना-शक्ति आती है (phantasia), जो संवेदन-केन्द्र में लाई गई वस्तुओं में भेद करती है: उसके बाद विवेक, जिसकी निर्णय की सामान्य शक्ति है: और अन्त में बुद्धि (intellect), जो स्थिर और शान्त दृष्टि से उसे निहारती है जिसे विवेक तर्क-वितर्क से घुमाता रहता है। इसी प्रकार,126 बुद्धि, कल्पना और विवेक की, जो आत्मा की तीन ज्ञानात्मक शक्तियाँ हैं, तीन अभिलाषात्मक शक्तियाँ अनुरूप हैं—अर्थात् इच्छा—जिसका काम उसे चुनना है जो विवेक और बुद्धि प्रस्तावित करें; क्रोध-शक्ति, जो उसे पकड़ती है जो विवेक और कल्पना उसके सामने रखें; और वासना, जो उसे थामती है जो इन्द्रिय और कल्पना प्रस्तुत करें।

यद्यपि ये बातें सच हैं, या कम से कम सम्भाव्य हैं, फिर भी, क्योंकि मुझे डर है कि वे हमारी सहायता करने से अधिक अपनी अस्पष्टता में उलझाने के योग्य हैं, इसलिए उन्हें छोड़ देना मुझे उचित जान पड़ता है। यदि कोई मन की शक्तियों को किसी और रीति से बाँटना चाहे, और एक को अभिलाषात्मक कहे, जो स्वयं विवेकरहित होकर भी विवेक का आज्ञापालन करती है यदि उसे दूसरी ओर से दिशा मिले, और दूसरी को बौद्धिक, क्योंकि वह स्वयं विवेक में सहभागी है, तो मुझे बड़ी आपत्ति नहीं। न ही मैं इस मत से झगड़ना चाहता हूँ कि क्रिया के तीन आरम्भ-स्रोत हैं—अर्थात् इन्द्रिय, बुद्धि और अभिलाषा। परन्तु हम ऐसा विभाजन अपनाएँ जो सब की समझ के अनुकूल हो—जो निश्चय ही दार्शनिकों से नहीं मिल सकता। क्योंकि वे,127 जब सबसे स्पष्ट बोलना चाहते हैं, तब आत्मा को अभिलाषा और बुद्धि में बाँटते हैं, पर दोनों को दो-दो भागों का बनाते हैं। बाद वाली को वे कभी चिन्तनात्मक नाम देते हैं, क्योंकि वह केवल ज्ञान से सन्तुष्ट रहती है और उसमें कर्म की शक्तियाँ नहीं होतीं (इसी कारण सिसरो उसे बुद्धि, ingenii, के नाम से पुकारता है) (De Fin. lib. 5)। और कभी वे उसे व्यावहारिक नाम देते हैं, क्योंकि वह भले या बुरे की धारणा से इच्छा को अनेक रीति से प्रेरित करती है। इसी श्रेणी में भली और न्यायपूर्ण रीति से जीने की कला भी आती है। पूर्व वाली—अर्थात् अभिलाषा—को वे इच्छा और वासना में बाँटते हैं, और जब अभिलाषा, जिसे वे उसका नाम देते हैं, विवेक की आज्ञा मानती है तब उसे इच्छा कहते हैं। परन्तु जब अभिलाषा विवेक का जूआ उतार फेंककर असंयम की ओर दौड़ती है, तब उसे वासना कहते हैं। इस प्रकार वे सदा मनुष्य में एक ऐसा विवेक मानकर चलते हैं जिससे वह अपने आप को ठीक रीति से चला सकता है।

125 फ्रांसीसी संस्करण में है “Et que par iceux comme par canaux, tous objects qui se presentent à la veuë, au goust, ou au flair, ou a l’attouchement distillent au sens commun, comme en une cisteren qui recoit d’un coté et d’autre.”—“और यह कि उनके द्वारा, मानो नालियों से, दृष्टि, स्वाद, गन्ध या स्पर्श के सामने आनेवाली सब वस्तुएँ साझा संवेदन-केन्द्र में टपकती हैं, मानो किसी ऐसे कुण्ड में जो दोनों ओर से भरता है।”

126 Arist. lib. 1 Ethic. cap. ult. देखें; और lib. 6 cap. 2। 127 Themist. lib. 3 De Anima, 49, De Dupl. Intellectu. देखें।

7. शिक्षा की इस रीति से हमें कुछ भिन्न मत रखना पड़ता है। क्योंकि दार्शनिक, जो स्वभाव की भ्रष्टता से अनजान हैं, जो विद्रोह का दण्ड है, मनुष्य की दो ऐसी अवस्थाओं को, जो एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं, भूल से एक में मिला देते हैं। इसलिए इस वर्तमान रचना के उद्देश्य से हम यह मानें कि आत्मा दो भागों से बनी है, बुद्धि और इच्छा (पुस्तक 2, अध्याय 2, खण्ड 2, 12),—बुद्धि का काम वस्तुओं में भेद करना है, कि कौन-सी स्वीकार या अस्वीकार के योग्य लगती है; और इच्छा का काम उसे चुनना और उसके पीछे चलना है जिसे बुद्धि भला ठहराए, और उसे ठुकराना और उससे बचना है जिसे वह बुरा ठहराए (प्लेटो, Phædro में)। हम अरस्तू की उस सूक्ष्मता पर नहीं रुकते कि मन में अपनी कोई गति नहीं होती, परन्तु गति देनेवाली शक्ति चुनाव है, जिसे वह अभिलाषात्मक बुद्धि भी कहता है। अनावश्यक प्रश्नों में न खोने के लिए इतना जान लेना पर्याप्त है कि बुद्धि हमारे लिए मानो आत्मा की मार्गदर्शक और शासक है; कि इच्छा सदा उसके संकेत का अनुसरण करती है, और अभिलाषा के विषयों में उसके निर्णय की प्रतीक्षा करती है। इसी कारण अरस्तू ने सच सिखाया कि अभिलाषा में खोज और ठुकराव है जो कुछ अंश में बुद्धि के स्वीकार और अस्वीकार के अनुरूप है (Aristot. Ethic. lib. 6 sec. 2)। इसके अतिरिक्त, यह किसी और स्थान पर देखा जाएगा (पुस्तक 2, अध्याय 2, खण्ड 12-26) कि बुद्धि इच्छा पर कितने निश्चित रूप से शासन करती है।

यहाँ हम केवल यह कहना चाहते हैं कि आत्मा में कोई ऐसी शक्ति नहीं जिसे इन दोनों अंगों में से किसी एक में ठीक-ठीक न गिना जा सके। और इस रीति से हम इन्द्रिय को बुद्धि के अन्तर्गत समझते हैं। औरों का भेद इस प्रकार है: वे कहते हैं कि इन्द्रिय सुख की ओर वैसे ही झुकती है जैसे बुद्धि भलाई की ओर; इसलिए इन्द्रिय की अभिलाषा वासना और कामना बन जाती है, जबकि बुद्धि की भावना इच्छा बन जाती है। अभिलाषा शब्द के स्थान पर, जिसे वे पसन्द करते हैं, मैं इच्छा शब्द का प्रयोग करता हूँ, क्योंकि वह अधिक प्रचलित है।

8. इसलिए परमेश्वर ने मनुष्य की आत्मा को बुद्धि दी, जिससे वह भले को बुरे से, न्यायी को अन्यायी से पहचान सके, और जान सके कि किसका अनुसरण करे और किससे बचे, जबकि विवेक अपना दीपक लिए आगे-आगे चलता है; इसी कारण दार्शनिकों ने उसकी मार्गदर्शक शक्ति को देखकर उसे अगुवा कहा है। इसके साथ उसने इच्छा को जोड़ा, जिसका सम्बन्ध चुनाव से है। मनुष्य अपनी आदि दशा में इन उत्कृष्ट वरदानों में श्रेष्ठ था, जब विवेक, समझ, बुद्धिमानी और निर्णय-शक्ति न केवल उसके पार्थिव जीवन के संचालन के लिए पर्याप्त थीं, वरन् उसे परमेश्वर और अनन्त सुख तक ऊपर उठने के योग्य भी बनाती थीं। उसके बाद चुनाव की शक्ति दी गई, कि अभिलाषाओं को निर्देशित करे और सब इन्द्रिय-गतियों को संयत रखे; इस प्रकार इच्छा विवेक के अधिकार के पूर्णतः अधीन थी। इस सीधी दशा में मनुष्य को इच्छा की स्वतन्त्रता प्राप्त थी, जिससे वह यदि चाहता तो अनन्त जीवन पा सकता था। यहाँ परमेश्वर की गुप्त पूर्वनियति के प्रश्न को लाना असामयिक होगा, क्योंकि हम यह विचार नहीं कर रहे कि क्या हो सकता था या नहीं, परन्तु यह कि मनुष्य का स्वभाव वास्तव में कैसा था। इसलिए आदम खड़ा रह सकता था यदि वह चाहता, क्योंकि वह केवल अपनी ही इच्छा से गिरा; परन्तु क्योंकि उसकी इच्छा दोनों ओर झुक सकती थी, और उसे अन्त तक टिके रहने की स्थिरता नहीं दी गई थी, इसीलिए वह इतनी सहजता से गिर गया। फिर भी भले और बुरे का स्वतन्त्र चुनाव उसके पास था; और केवल इतना ही नहीं, वरन् मन और इच्छा में सर्वोच्च सीधाई थी, और सब इन्द्रिय-अंग आज्ञापालन के लिए ठीक रीति से गढ़े गए थे, जब तक कि मनुष्य ने उसके गुणों को बिगाड़कर अपना नाश न कर लिया। इसी से दार्शनिकों का वह घोर अन्धकार है जिन्होंने खण्डहर में पूरा भवन और अव्यवस्था में उचित व्यवस्था ढूँढ़ी। उनका आरम्भ-सिद्धान्त यह था कि मनुष्य विवेकशील प्राणी हो ही नहीं सकता, यदि उसे भले और बुरे का स्वतन्त्र चुनाव न हो। उन्होंने यह भी कल्पना की कि गुण और दोष का भेद नष्ट हो जाता है, यदि मनुष्य अपने ही परामर्श से अपना जीवन न चलाए। यहाँ तक ठीक होता, यदि मनुष्य में कोई परिवर्तन न हुआ होता। यह उन्हें ज्ञात न था, इसलिए यदि वे सब कुछ गड़बड़ कर दें तो आश्चर्य नहीं। परन्तु जो लोग, मसीह के चेले होने का दावा करते हुए भी, मनुष्य में स्वतंत्र इच्छा ढूँढ़ते हैं, जबकि वह आत्मिक विनाश में खोया और डूबा हुआ है, वे अनेक प्रकार के भ्रम में पड़े हैं; वे प्रेरित शिक्षा और दार्शनिक मतों का बेमेल मिश्रण बनाते हैं, और दोनों के विषय में भटक जाते हैं। परन्तु इन बातों को उनके अपने स्थान के लिए छोड़ना ही अच्छा होगा (पुस्तक 2, अध्याय 2 देखें)। इस समय केवल इतना स्मरण रखना आवश्यक है कि मनुष्य अपनी पहली सृष्टि में अपनी सारी सन्तान से बहुत भिन्न था; जो उससे उसके भ्रष्ट हो जाने के बाद उत्पन्न हुई और विरासत में दोष पाया। आरम्भ में आत्मा का प्रत्येक भाग सीधाई के लिए गढ़ा गया था। मन की स्वस्थता थी और भले को चुनने के लिए इच्छा की स्वतन्त्रता थी। यदि कोई यह आपत्ति करे कि वह मानो फिसलनी जगह पर रखा गया था, क्योंकि उसकी शक्ति दुर्बल थी, तो मैं उत्तर देता हूँ कि जो मात्रा दी गई वह हर बहाना दूर करने के लिए पर्याप्त थी। क्योंकि निश्चय परमेश्वर को इस शर्त में बाँधा नहीं जा सकता था—कि वह मनुष्य को ऐसा बनाए कि वह पाप कर ही न सके या करना ही न चाहे। ऐसा स्वभाव अधिक उत्कृष्ट हो सकता था;128 परन्तु परमेश्वर से इस प्रकार शिकायत करना मानो वह यह स्वभाव मनुष्य को देने के लिए बँधा हुआ था, अन्याय से भी बढ़कर है, क्योंकि उसे पूरा अधिकार था कि वह निश्चय करे कि कम दे या अधिक। उसने उसे अन्त तक स्थिर रहने के गुण से क्यों नहीं सम्भाला, यह उसकी युक्ति में छिपा है; हमारा काम है कि संयम की सीमाओं के भीतर रहें। मनुष्य को शक्ति मिली थी, यदि उसमें इच्छा होती; परन्तु उसे वह इच्छा नहीं मिली थी जो शक्ति देती; क्योंकि इस इच्छा के पीछे दृढ़ता आती। फिर भी, इतना पा लेने के बाद, उसके स्वेच्छा से अपने ऊपर मृत्यु ले आने का कोई बहाना नहीं। परमेश्वर पर कोई आवश्यकता नहीं थी कि वह उसे उस मध्यवर्ती और क्षणिक इच्छा से अधिक दे, कि वह मनुष्य के पतन में से अपनी महिमा की सामग्री निकाल सके।

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