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परमेश्वर का रचा हुआ संसार, जिसे वह अब भी सम्भालता और सुरक्षित रखता है। उसके सब अंश और प्रत्येक अंश उसके विधान के अधीन
अध्याय 16।
परमेश्वर का रचा हुआ संसार, जिसे वह अब भी सम्भालता और सुरक्षित रखता है। उसके सब अंश और प्रत्येक अंश उसके विधान के अधीन।
इस अध्याय के विभाग ये हैं: I. सब प्राणियों पर, अलग-अलग और सामूहिक रूप से, परमेश्वर के विशेष विधान का सिद्धान्त, जो भाग्य और संयोगजन्य कारणों के विषय में एपिकूरियों के स्वप्नों के विपरीत है। II. परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता के विषय में सोफ़िस्टों की कल्पना और संसार के उलझे और अस्पष्ट शासन के विषय में दार्शनिकों की भूल, खण्ड 1-5। सब पशु, परन्तु विशेषकर मनुष्य, उन पर होनेवाली विशेष देखरेख के कारण परमेश्वर के विधान के प्रमाण, साक्षी और उदाहरण हैं, खण्ड 6, 7। III. नियति, भाग्य, संयोग, आकस्मिकता और अनिश्चित घटनाओं पर विचार (जिन पर यहाँ की चर्चा टिकी है)।
खण्ड।
1. दुष्ट भी, शारीरिक बुद्धि के मार्गदर्शन में, मानते हैं कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है। भक्त लोग केवल यही नहीं, वरन् यह भी मानते हैं कि वह सब सृजी हुई वस्तुओं का अति बुद्धिमान और सामर्थी शासक और रक्षक है। ऐसा करने में वे परमेश्वर के वचन पर टिके रहते हैं, जिसके कुछ अंश यहाँ दिए गए हैं।
2. एपिकूरियों का खण्डन, जो पवित्रशास्त्र में सिखाए गए ईश्वरीय विधान के विरुद्ध भाग्य और संयोगजन्य कारणों को खड़ा करते हैं। सूर्य ईश्वरीय विधान का उज्ज्वल प्रकाशन है।
3. आलसी विधान के विषय में सोफ़िस्टों की कल्पना का खण्डन। परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता पर उसके विधान के साथ मिलाकर विचार। ईश्वरीय सर्वशक्तिमत्ता को उचित रीति से स्वीकार करने से दोहरा लाभ। अविश्वास की कुतर्कें।
4. विधान की परिभाषा, जो दार्शनिकों के भ्रमपूर्ण सिद्धान्तों का खण्डन करती है। एपिकूरियों और पेरिपेटेटिकों के स्वप्न।
5. परमेश्वर के विशेष विधान की स्थापना और प्रमाण, ईश्वरीय न्याय और दया पर विचार से उठाए गए तर्कों द्वारा। आकाश, पृथ्वी और पशुओं से सम्बन्धित पवित्रशास्त्र के अंशों से भी प्रमाण।
6. विशेष विधान का प्रमाण मानव जाति से सम्बन्धित अंशों से, और विशेषकर इस बात से कि उसी के लिए संसार रचा गया।
7. विशेष विधान का प्रमाण, अन्त में, इस्राएलियों, योना और याकूब के इतिहास से लिए गए उदाहरणों से, और प्रतिदिन के अनुभव से।
8. विधान के विषय में भ्रमपूर्ण विचारों का खण्डन:—I. स्टोइकों का सम्प्रदाय। II. अन्यजातियों का भाग्य और संयोग।
9. वे बातें हमारे लिए संयोगवश कैसे कही जाती हैं, जबकि वे परमेश्वर की ठहराई हुई युक्ति से होती हैं। उदाहरण। आकस्मिकता और घटना को परमेश्वर की गुप्त, परन्तु न्यायी और अति बुद्धिमान युक्ति से अलग करने की भूल। दो उदाहरण।
1. परमेश्वर को क्षण-भर का सृष्टिकर्ता ठहराना, जिसने अपना काम एक ही बार पूरा किया और फिर उसे छोड़ दिया, नीरस और निर्जीव बात होगी। यहाँ विशेषकर हमें अपवित्र लोगों से मतभेद रखना चाहिए और यह मानना चाहिए कि ईश्वरीय सामर्थ्य की उपस्थिति संसार की निरन्तर दशा में उतनी ही प्रकट है जितनी उसकी प्रथम सृष्टि में। क्योंकि यद्यपि दुष्ट मनुष्य भी पृथ्वी और आकाश को देखते ही सृष्टिकर्ता तक पहुँचने को विवश होते हैं, तो भी सृष्टि की सारी स्तुति परमेश्वर को देने की विश्वास की अपनी एक रीति है। इसी आशय का प्रेरित का वह अंश है जो पहले उद्धृत हो चुका कि विश्वास ही से हम समझते हैं कि सृष्टि की रचना परमेश्वर के वचन से हुई (इब्रानियों 11:3); क्योंकि उसके विधान तक पहुँचे बिना हम पूरी रीति से नहीं समझ सकते कि परमेश्वर के सृष्टिकर्ता होने का क्या पूरा अर्थ है, चाहे हम उसे अपने मन से कितना ही समझते और अपनी जीभ से कितना ही मानते प्रतीत हों। शारीरिक मन, जब एक बार सृष्टि में परमेश्वर की सामर्थ्य को देख लेता है, तो वहीं रुक जाता है, और अधिक से अधिक ऐसे कार्य के कर्ता में प्रकट बुद्धि, सामर्थ्य और भलाई ही के विषय में सोचता और विचारता है (ये बातें अपने आप उठती हैं और अनिच्छुक लोगों का भी ध्यान खींचती हैं), या किसी सामान्य शक्ति के विषय में जिस पर गति की सामर्थ्य टिकी है, जो उसकी रक्षा और संचालन में प्रयुक्त होती है। संक्षेप में, वह कल्पना करता है कि सब वस्तुएँ उस शक्ति से भली-भाँति थमी हैं जो आरम्भ में उन में परमेश्वर की ओर से डाल दी गई थी। परन्तु विश्वास को और गहरा जाना चाहिए। यह जान लेने के बाद कि सृष्टिकर्ता है, उसे तुरन्त यह निष्कर्ष निकालना चाहिए कि वह शासक और रक्षक भी है, और वह इस प्रकार नहीं कि पृथ्वी-मण्डल की इस मशीन में, और उसके प्रत्येक अंश में, एक प्रकार की सामान्य गति उत्पन्न कर दे, वरन् एक विशेष विधान से अपनी रची हुई सब वस्तुओं को, छोटी से छोटी को, यहाँ तक कि एक गौरैया को भी, थामे, पालते और देखते हुए। इसी प्रकार दाऊद संक्षेप में यह भूमिका बाँधकर कि संसार परमेश्वर का रचा हुआ है, तुरन्त विधान की निरन्तर धारा में उतर आता है, “यहोवा के वचन से आकाशमण्डल बना, और उसके सारे गण उसके मुँह के श्वास से;” और तुरन्त जोड़ता है, “यहोवा स्वर्ग से दृष्टि करता है, वह सब मनुष्यों को निहारता है” (भजन संहिता 33:6, 13, आदि)। वह इसी आशय की और बातें भी जोड़ता है। क्योंकि यद्यपि सब इतनी सूक्ष्मता से तर्क नहीं करते, फिर भी, इसलिए कि यह विश्वास करने योग्य न होता कि मानवीय बातों की देखरेख परमेश्वर करता है, यदि वह संसार का रचनेवाला न होता; और कोई गम्भीरता से यह विश्वास नहीं कर सकता कि वह उसका सृष्टिकर्ता है, बिना इस प्रतीति के कि वह अपने कामों की चिन्ता करता है; इसलिए दाऊद उचित कारण से और अद्भुत क्रम में हमें एक से दूसरे तक ले जाता है। सामान्यतः तो दार्शनिक सिखाते हैं, और मानव मन समझता है, कि संसार के सब अंश परमेश्वर की गुप्त प्रेरणा से सजीव हैं। परन्तु वे उस ऊँचाई तक नहीं पहुँचते जहाँ दाऊद पहुँचता है और सब भक्तों को अपने साथ ले जाता है, जब वह कहता है, “इन सब को तेरा ही आसरा है, कि तू उनका आहार समय पर दिया करे। तू उन्हें देता है, वे चुन लेते हैं; तू अपनी मुट्ठी खोलता है और वे अच्छी वस्तुओं से तृप्त होते हैं। तू अपना मुँह फेर लेता है, और वे घबरा जाते हैं; तू उनकी साँस ले लेता है, और वे मर जाते हैं, और मिट्टी में मिल जाते हैं। फिर तू अपनी ओर से साँस भेजता है, और वे सिरजे जाते हैं; और तू धरती का रूप नया कर देता है” (भजन संहिता 104:27-30)। वरन् यद्यपि वे पौलुस के इस कथन से सहमत होते हैं कि परमेश्वर में “हम जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं” (प्रेरितों के काम 17:28), तो भी वे उस अनुग्रह को गम्भीरता से समझने से बहुत दूर हैं जिसकी वह प्रशंसा करता है, क्योंकि उन्हें उस विशेष देखरेख का तनिक भी स्वाद नहीं जिसमें अकेले परमेश्वर की पितृवत् कृपा पहचानी जाती है।
2. यह भेद और अधिक स्पष्ट हो, इसके लिए हमें विचार करना चाहिए कि पवित्रशास्त्र में सिखाया गया परमेश्वर का विधान भाग्य और संयोगजन्य कारणों के विरुद्ध है। सब युगों में प्रचलित एक भ्रमपूर्ण मत से, और हमारे दिनों में प्रायः सर्वत्र प्रचलित मत से—अर्थात् कि सब कुछ संयोग से होता है—विधान का सच्चा सिद्धान्त न केवल धुँधला हो गया है, वरन् लगभग दब गया है। यदि कोई डाकुओं या हिंसक पशुओं के बीच जा पड़े; यदि समुद्र में अचानक आँधी जहाज़ को डुबो दे; यदि कोई घर या पेड़ के गिरने से कुचला जाए; यदि कोई और जंगल के रास्तों में भटकते हुए बच निकले; या लहरों में थपेड़े खाकर बन्दरगाह तक पहुँचे, और मृत्यु से अद्भुत रीति से बाल-बाल बच जाए—इन सब घटनाओं को, सुखद हों या दुखद, शारीरिक बुद्धि भाग्य के सिर मढ़ेगी। परन्तु जिसने मसीह के मुख से सीखा है कि उसके सिर के सब बाल गिने हुए हैं (मत्ती 10:30), वह कारण को और आगे ढूँढ़ेगा, और यह मानेगा कि जो कुछ भी होता है वह परमेश्वर की गुप्त युक्ति से संचालित है। निर्जीव वस्तुओं के विषय में भी हमें यही मानना चाहिए कि यद्यपि प्रत्येक के अपने विशेष गुण हैं, तो भी वे अपनी शक्ति तभी तक काम में लाती हैं जब तक परमेश्वर का प्रत्यक्ष हाथ उन्हें चलाता है। इसलिए वे केवल साधन हैं, जिनमें परमेश्वर निरन्तर वह शक्ति भरता है जो उचित समझे, और जिन्हें अपनी इच्छा से किसी भी काम की ओर मोड़ता और बदलता है। सृजी हुई वस्तुओं में कोई सूर्य से अधिक अद्भुत या तेजस्वी नहीं दिखती। क्योंकि अपनी चमक से सारे संसार को प्रकाशित करने के अतिरिक्त, वह अपनी गर्मी से सब पशुओं को कैसी अद्भुत रीति से पालता और बल देता है, और अपनी किरणों से पृथ्वी को उपजाऊ बनाता है, अपनी गोद में अन्न के बीजों को गर्माकर हरी पत्ती को निकलने के लिए बुलाता है! उसे वह अतिरिक्त पोषण देकर थामता, बढ़ाता और दृढ़ करता है, जब तक वह डंठल बनकर ऊपर न उठे; और निरन्तर नमी से उसे तब तक पालता है जब तक फूल न आए; और फूल से फल तक, जिसे वह तब तक पकाता रहता है जब तक वह पक न जाए। इसी प्रकार उसकी गर्मी से वृक्ष और दाखलताएँ कलियाँ निकालती हैं, और पहले पत्ते, फिर फूल, फिर फल लाती हैं। और प्रभु ने, कि इन सब बातों की सारी महिमा अपनी ही ठहराए, यह चाहा कि सूर्य को बनाने से पहले प्रकाश हो, और पृथ्वी हर प्रकार की घास और फलों से भर जाए। इसलिए कोई भक्त मनुष्य सूर्य को उन वस्तुओं का आवश्यक या मुख्य कारण नहीं ठहराएगा जो सूर्य की सृष्टि से पहले विद्यमान थीं, वरन् केवल वह साधन जिसे परमेश्वर काम में लाता है क्योंकि उसे ऐसा भाता है; यद्यपि वह उसे अलग रखकर स्वयं भी वैसा ही भली-भाँति कर सकता है। फिर जब हम पढ़ते हैं कि यहोशू की प्रार्थना पर सूर्य अपनी गति में ठहर गया (यहोशू 10:13); कि हिजकिय्याह पर कृपा करके उसकी छाया दस अंश पीछे लौट गई (2 राजाओं 20:11); तो इन चमत्कारों से परमेश्वर ने घोषित किया कि सूर्य प्रकृति की अन्धी सहज प्रवृत्ति से प्रतिदिन उदय और अस्त नहीं होता, वरन् उसी के द्वारा अपनी गति में संचालित है, कि वह हमारे प्रति अपनी पितृवत् कृपा की स्मृति को नया करे। इससे अधिक स्वाभाविक कुछ नहीं कि बसन्त बारी-बारी से शीत के बाद, ग्रीष्म बसन्त के बाद, और शरद ग्रीष्म के बाद आए; परन्तु इस क्रम में परिवर्तन इतने बड़े और इतने असमान हैं कि यह बहुत प्रकट हो जाता है कि प्रत्येक वर्ष, प्रत्येक मास और प्रत्येक दिन परमेश्वर के एक नए और विशेष विधान से नियन्त्रित है।
3. और सचमुच परमेश्वर अपने लिए सर्वशक्तिमत्ता का दावा करता है, और चाहता है कि हम उसे स्वीकार करें,—वह व्यर्थ, आलसी, ऊँघती हुई सर्वशक्तिमत्ता नहीं जो सोफ़िस्ट गढ़ते हैं, वरन् जागरूक, प्रभावी, ऊर्जावान और सदा सक्रिय,—ऐसी सर्वशक्तिमत्ता नहीं जो केवल उलझी हुई गति के सामान्य सिद्धान्त के रूप में काम करे, जैसे किसी धारा को आदेश दिया जाए कि वह अपने ठहराए हुए पाट के भीतर बहती रहे, परन्तु ऐसी जो अलग-अलग और विशेष गतियों पर ध्यान लगाए रहती है। परमेश्वर सर्वशक्तिमान इसलिए नहीं माना जाता कि वह चाहे तो काम कर सकता है पर रुक या निठल्ला हो सकता है, या इसलिए कि वह किसी सामान्य सहज प्रवृत्ति से पहले से ठहराए गए प्रकृति के क्रम को चलाता रहता है; परन्तु इसलिए कि अपने विधान से स्वर्ग और पृथ्वी पर शासन करते हुए वह सब वस्तुओं का ऐसा संचालन करता है कि उसकी युक्ति के बिना कुछ नहीं होता। क्योंकि जब भजन संहिता में कहा गया है, “उसने जो चाहा वही किया है” (भजन संहिता 115:3), तो अर्थ उसका निश्चित और सोचा-समझा संकल्प है। भजनकार के शब्दों का दार्शनिक रीति से यह अर्थ करना फीका होगा कि परमेश्वर प्रथम कर्ता है, क्योंकि वही सब गति का आरम्भ और कारण है। विश्वासियों की विपत्ति में उनके लिए सान्त्वना तो यह है कि जो कुछ वे सहते हैं वह परमेश्वर की ठहराई हुई बात और आज्ञा से है, कि वे उसके हाथ के नीचे हैं। परन्तु यदि परमेश्वर का शासन उसके सब कामों तक इस प्रकार फैला है, तो उसे प्राकृतिक प्रवाह तक सीमित करना बचकानी कुतर्क है।129 फिर जो लोग परमेश्वर के विधान को तंग सीमाओं में बाँधते हैं, मानो वह सब वस्तुओं को प्रकृति के किसी नित्य नियम के अनुसार स्वतन्त्रता से बहने देता हो, वे परमेश्वर को उसकी महिमा से उतना वंचित नहीं करते जितना अपने आप को एक अति उपयोगी सिद्धान्त से; क्योंकि मनुष्य से अधिक अभागा कोई न होता, यदि वह आकाश, वायु, पृथ्वी और जल की सब सम्भव गतियों के सम्मुख खुला छोड़ दिया जाता। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि इस दृष्टिकोण से प्रत्येक जन के प्रति परमेश्वर की अद्वितीय भलाई अनुचित रीति से घट जाती है। दाऊद पुकारता है (भजन संहिता 8:3) कि माताओं की छाती से लगे हुए दुधमुँहे बच्चे परमेश्वर की महिमा गाने के लिए पर्याप्त वक्ता हैं, क्योंकि जन्म के उसी क्षण से वे अपने लिए स्वर्गीय देखभाल से तैयार किया गया आहार पाते हैं। वास्तव में, यदि हम इस तथ्य से अपनी आँखें और इन्द्रियाँ बन्द न कर लें, तो हमें दिखाई देगा कि कुछ माताओं के पास अपने बच्चों के लिए भरपूर सामग्री होती है, और कुछ के पास लगभग नहीं, जैसा परमेश्वर को एक बच्चे को अधिक उदारता से और दूसरे को कम पोषण देना भाता है। जो लोग परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता को उचित प्रशंसा देते हैं, उन्हें इससे दोहरा लाभ मिलता है। वह जिसका स्वर्ग और पृथ्वी है, और जिसके संकेत पर सब प्राणियों को चलना पड़ता है, उनकी उस आराधना का प्रतिफल देने में पूरी रीति से समर्थ है, और वे उसकी सुरक्षा में निश्चिन्त रह सकते हैं जिसके अधिकार में वह सब कुछ है जो उन्हें हानि पहुँचा सकता है, जिसके अधिकार से शैतान अपने सब क्रोध और यन्त्रों के साथ लगाम की भाँति रोका जाता है, और जिसकी इच्छा पर हमारी सुरक्षा के प्रतिकूल हर बात टिकी है। इसी रीति से, और किसी अन्य से नहीं, उन अत्यधिक और अन्धविश्वासी भयों को शान्त या वश में किया जा सकता है जो उन खतरों से उठते हैं जिनके बीच हम रहते हैं। मैं अन्धविश्वासी भय कहता हूँ। क्योंकि वे ऐसे ही हैं, जब कभी सृजी हुई वस्तुओं से मिलनेवाले खतरे हमें इतना भयभीत करते हैं कि हम काँपने लगें मानो उनमें अपने आप हानि पहुँचाने की सामर्थ्य हो, या वे संयोग से यों ही हानि पहुँचा सकती हों; या मानो उनके विरुद्ध हमारे लिए परमेश्वर में पर्याप्त सुरक्षा न हो। उदाहरण के लिए, यिर्मयाह परमेश्वर की सन्तानों को मना करता है कि वे “आकाश के चिह्नों से न घबराएँ, जैसे अन्यजातियाँ उनसे घबराती हैं” (यिर्मयाह 10:2)। वह निश्चय हर प्रकार के भय को दोषी नहीं ठहराता। परन्तु जैसे अविश्वासी संसार का शासन परमेश्वर से हटाकर तारों को दे देते हैं, और कल्पना करते हैं कि सुख या दुख परमेश्वर की इच्छा पर नहीं, उनके आदेशों या शकुनों पर टिका है, इसका परिणाम यह होता है कि उनका भय, जो केवल उसी की ओर होना चाहिए, तारों और पुच्छल तारों की ओर मुड़ जाता है। इसलिए जो इस अविश्वास से बचना चाहे, वह सदा स्मरण रखे कि सृजी हुई वस्तुओं में कोई अनिश्चित सामर्थ्य, या क्रिया, या गति नहीं है, जो परमेश्वर की गुप्त युक्ति से इस प्रकार शासित हैं कि कुछ नहीं होता सिवाय उसके जिसे उसने जानबूझकर और इच्छा से ठहराया है।130
4. इसलिए, पहले पाठक यह स्मरण रखे कि जिस विधान की हम बात करते हैं वह ऐसा नहीं जिससे परमेश्वर स्वर्ग में निठल्ला बैठा संसार में होनेवाली बातों को देखता रहे, वरन् ऐसा जिससे वह मानो पतवार थामे हुए सब घटनाओं का संचालन करता है। इसलिए उसका विधान हाथ तक उतना ही फैला है जितना आँख तक।131 जब अब्राहम ने अपने पुत्र से कहा, परमेश्वर आप ही प्रबन्ध करेगा (उत्पत्ति 22:8), तो उसका अर्थ केवल यह कहना न था कि भावी घटना परमेश्वर को पहले से मालूम है, वरन् एक अज्ञात कार्य का प्रबन्ध उसकी इच्छा के हवाले करना, जिसका काम उलझे और संदिग्ध मामलों को सुखद अन्त तक पहुँचाना है। इससे प्रकट है कि विधान क्रिया में निहित है। जिसे बहुत लोग केवल पूर्वज्ञान कहते हैं, वह निरी बकवास है। वे इतनी भारी भूल नहीं करते जो शासन परमेश्वर को देते हैं, परन्तु, जैसा मैंने कहा, एक उलझा और मिला-जुला शासन, जो पृथ्वी-मण्डल की इस मशीन को और उसके प्रत्येक अंश को एक प्रेरणा और सामान्य गति देने में है, पर प्रत्येक प्राणी की क्रिया को विशेष रूप से निर्देशित नहीं करता। परन्तु इस भूल को सहन करना असम्भव है। क्योंकि उसके समर्थकों के अनुसार इस विधान में, जिसे वे सार्वभौमिक कहते हैं, ऐसा कुछ नहीं जो सब प्राणियों को संयोग से चलने से रोके, या मनुष्य को अपनी इच्छा की निरी स्वतन्त्रता के अनुसार इस ओर या उस ओर मुड़ने से रोके। इस रीति से वे मनुष्य को परमेश्वर का सहभागी बना देते हैं,—परमेश्वर अपनी शक्ति से मनुष्य में वह गति डालता है जिससे वह अपने को दिए गए स्वभाव के अनुसार कार्य कर सके, जबकि मनुष्य स्वेच्छा से अपने कार्य स्वयं नियन्त्रित करता है। संक्षेप में, उनका सिद्धान्त यह है कि संसार, मनुष्यों के कार्य, और स्वयं मनुष्य परमेश्वर की सामर्थ्य से शासित हैं, परन्तु उसके आदेश से नहीं। मैं एपिकूरियों के विषय में कुछ नहीं कहता (जो ऐसी महामारी है जिससे संसार सदा पीड़ित रहा), जो एक निठल्ले और आलसी परमेश्वर की कल्पना करते हैं,132 और उनके विषय में भी जो रत्ती-भर अधिक स्वस्थ नहीं, जिन्होंने प्राचीनकाल में गढ़ा कि परमेश्वर वायु के ऊपरी भागों पर शासन करता है, पर निचले भागों को भाग्य के हाथ छोड़ देता है। ऐसे प्रत्यक्ष पागलपन के विरुद्ध गूँगे प्राणी भी आवाज़ उठाते हैं।
128 अगस्तीन की lib. 11, super Gen. cap. 7, 8, 9, और De Corrept. et Gratia ad Valent., cap. 11 देखें। 129 Hyperius की Methodo Theologiæ देखें। 130 कैल्विन की adversus Astrolog. Judiciariam देखें। अगस्तीन De Ordine, lib. 2 cap. 15।
131 फ्रांसीसी संस्करण जोड़ता है, “Cest à dire, que non seulement il voit, mais aussi ordonne ce qu’il veut estre fait;”—अर्थात् वह केवल देखता ही नहीं, वरन् जो वह चाहता है कि हो, उसका आदेश भी देता है।
132 Plin. lib. 2. c. 7. “Irridendum vero, agere curam rerum humanarum, illud, quicquid est summum. Anne tam tristi atque multiplici ministerio non pollui credamus dubitemusve?” 133 Forte. Forsan. Forsitan, Fortuito.
मेरा अभिप्राय अब एक ऐसे मत का खण्डन करना है जो बहुत व्यापक रूप से प्रचलित रहा है—ऐसा मत जो परमेश्वर को कोई अन्धी और अस्पष्ट गति तो देता है, पर मुख्य बात को रोक लेता है—अर्थात् अगम्य बुद्धि से प्रत्येक वस्तु को उसके उचित अन्त की ओर ठहराना और चलाना। शासन को रोककर वह परमेश्वर को संसार का शासक केवल नाम से बनाता है, वास्तव में नहीं। क्योंकि पूछता हूँ, शासन का अर्थ और क्या है, यदि वह नहीं कि जिस पर तुम शासन करते हो उसकी नियति को नियन्त्रित करने के लिए अध्यक्षता करो? फिर भी मैं सार्वभौमिक विधान के विषय में जो कहा जाता है उसे पूरी तरह अस्वीकार नहीं करता, बशर्ते दूसरी ओर मुझे यह माना जाए कि संसार परमेश्वर से शासित है, केवल इसलिए नहीं कि वह अपने ठहराए हुए प्रकृति के क्रम को बनाए रखता है, वरन् इसलिए कि वह अपने प्रत्येक काम का विशेष भार स्वयं उठाता है। यह सच है कि सृजी हुई वस्तुओं की प्रत्येक जाति प्रकृति की एक गुप्त सहज प्रवृत्ति से चलती है, मानो वे परमेश्वर की सनातन आज्ञा का पालन करती हों और जो मार्ग परमेश्वर ने आरम्भ में ठहराया उस पर स्वेच्छा से चलती हों। और इसी से हम अपने उद्धारकर्ता के उन शब्दों को जोड़ सकते हैं कि वह और उसका पिता आरम्भ से सदा काम करते आए हैं (यूहन्ना 5:17); और पौलुस के शब्द भी कि “उसी में हम जीवित रहते, और चलते-फिरते, और स्थिर रहते हैं” (प्रेरितों के काम 17:28); और इब्रानियों की पत्री के लेखक के शब्द भी, जो मसीह की ईश्वरता प्रमाणित करना चाहता हुआ कहता है कि वह “अपनी सामर्थ्य के वचन से सब वस्तुओं को संभालता है” (इब्रानियों 1:3)। परन्तु कुछ लोग सामान्य के बहाने उस विशेष विधान को छिपाते और धुँधला करते हैं जो पवित्रशास्त्र में ऐसे निश्चित और स्पष्ट रूप से सिखाया गया है कि आश्चर्य होता है कि कोई उस पर सन्देह करने को कैसे राज़ी हो सकता है। और वास्तव में जो लोग यह आवरण डालते हैं वे स्वयं अपना सिद्धान्त बदलने को विवश होते हैं, यह जोड़कर कि बहुत-सी बातें परमेश्वर की विशेष देखरेख से होती हैं। परन्तु इसे वे भूल से अलग-अलग कार्यों तक सीमित कर देते हैं। इसलिए जो सिद्ध करना है वह यह है कि एक-एक घटना परमेश्वर से ऐसे नियन्त्रित है, और सब घटनाएँ उसकी ठहराई हुई युक्ति से ऐसे निकलती हैं, कि कुछ भी संयोग से नहीं होता।
5. यह मानकर कि गति का आरम्भ परमेश्वर का है, पर सब वस्तुएँ अपने आप या संयोग से, उस प्रेरणा के अनुसार चलती हैं जो प्रकृति देती है, दिन और रात, ग्रीष्म और शीत का क्रम परमेश्वर का काम होगा; क्योंकि प्रत्येक का कार्य ठहराते हुए उसने एक निश्चित नियम बाँधा, कि वे सदा एकरस रीति से वही मार्ग चलें, रात के बाद दिन, मास के बाद मास, और वर्ष के बाद वर्ष आए। परन्तु जब एक समय अत्यधिक गर्मी और सूखा खेतों को जला देते हैं, किसी और समय अत्यधिक वर्षा से फसलें सड़ जाती हैं, और आँधी-तूफ़ान और ओलों से अचानक उजाड़ पड़ जाता है, तो ये परमेश्वर के काम न होंगे, सिवाय इस हद तक कि वर्षा या साफ़ मौसम, गर्मी या सर्दी तारों के संयोग और अन्य प्राकृतिक कारणों से उत्पन्न होते हैं। इस दृष्टिकोण के अनुसार न पितृवत् कृपा के लिए स्थान बचता है, न परमेश्वर के न्याय-दण्डों के लिए। यदि कहा जाए कि परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को भोजन उपजाने की साधारण शक्ति देकर मानव जाति के प्रति अपनी भलाई पूरी तरह दिखाता है, तो यह व्याख्या फीकी और अन्यजातीय है; मानो एक वर्ष की उर्वरता विशेष आशीष न हो, और दूसरे वर्ष की तंगी और अकाल परमेश्वर की ओर से विशेष दण्ड और श्राप न हो। परन्तु सब तर्कों को गिनाने में बहुत समय लगेगा, इसलिए परमेश्वर का अपना अधिकार ही पर्याप्त हो। व्यवस्था और भविष्यद्वक्ताओं में वह बार-बार घोषणा करता है कि जब-जब वह ओस और वर्षा से भूमि को सींचता है, तो अपनी कृपा दिखाता है, कि उसकी आज्ञा से आकाश लोहे सा कठोर हो जाता है, फसलें गेरुई और अन्य विपत्तियों से नष्ट हो जाती हैं, कि आँधी और ओले खेतों को उजाड़कर निश्चित और विशेष बदले के चिह्न हैं। यह मान लेने पर निश्चित है कि वर्षा की एक बूँद भी परमेश्वर की स्पष्ट आज्ञा के बिना नहीं गिरती। दाऊद ने निश्चय (भजन संहिता 146:9) कौवे के बच्चों को, जो उसे पुकारते हैं, भोजन देने में परमेश्वर के सामान्य विधान की प्रशंसा की है; परन्तु जब परमेश्वर स्वयं जीवित प्राणियों को अकाल की धमकी देता है, तो क्या वह स्पष्ट घोषणा नहीं करता कि वे सब उसी से पाले जाते हैं, कभी थोड़ी, कभी भरपूर मात्रा से? इसे अलग-अलग कार्यों तक सीमित करना, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, बचकानी बात है, जब मसीह बिना किसी अपवाद के कहता है कि एक गौरैया भी उसके पिता की इच्छा के बिना भूमि पर नहीं गिरती (मत्ती 10:29)। निश्चय, यदि पक्षियों की उड़ान परमेश्वर की युक्ति से नियन्त्रित है, तो हमें भविष्यद्वक्ता के साथ मानना चाहिए कि वह “ऊँचे पर विराजमान है,” पर “स्वर्ग और पृथ्वी की वस्तुओं को देखने के लिए अपने आप को नीचा करता है” (भजन संहिता 113:5, 6)।
6. परन्तु क्योंकि हम जानते हैं कि संसार मुख्यतः मनुष्य के लिए रचा गया, इसलिए हमें इसी को वह उद्देश्य मानना चाहिए जो परमेश्वर के सामने उसके शासन में है। भविष्यद्वक्ता यिर्मयाह पुकारता है, “हे यहोवा, मैं जान गया हूँ कि मनुष्य का मार्ग उसके वश में नहीं है, मनुष्य चलता तो है, परन्तु उसके डग उसके अधीन नहीं हैं” (यिर्मयाह 10:23)। सुलैमान भी कहता है, “मनुष्य की गति यहोवा की ओर से होती है, तब मनुष्य अपना मार्ग कैसे समझ सकेगा?” (नीतिवचन 20:24)। क्या अब कहा जाएगा कि मनुष्य परमेश्वर से उसके स्वभाव के झुकाव के अनुसार चलाया जाता है, पर गति को जो दिशा चाहे वह स्वयं मनुष्य देता है? यदि वास्तव में ऐसा होता, तो मनुष्य अपने मार्गों का पूर्ण स्वामी होता। इसके उत्तर में शायद कहा जाए कि मनुष्य परमेश्वर की सामर्थ्य के बिना कुछ नहीं कर सकता। परन्तु यह उत्तर काम न आएगा, क्योंकि यिर्मयाह और सुलैमान दोनों परमेश्वर को केवल सामर्थ्य ही नहीं, वरन् चुनाव और आदेश भी देते हैं। और सुलैमान अन्यत्र बड़ी सुन्दरता से मनुष्यों की उस उतावली को डाँटता है जो परमेश्वर का ध्यान किए बिना अपनी योजनाएँ बाँधते हैं, मानो वे उसके हाथ से चलाए न जाते हों। “मन की युक्ति मनुष्य के वश में रहती है, परन्तु मुँह से कहना यहोवा की ओर से होता है” (नीतिवचन 16:1)। अभागे मनुष्यों के लिए, जो परमेश्वर की इच्छा के बिना बोल भी नहीं सकते, उसके बिना काम आरम्भ करना निश्चय बड़ी विचित्र मूर्खता है! इसके अतिरिक्त पवित्रशास्त्र, यह भलीभाँति दिखाने के लिए कि संसार में जो कुछ होता है वह उसके आदेश के अनुसार है, घोषणा करता है कि जो बातें सबसे अधिक संयोग की लगती हैं वे भी उसके अधीन हैं। क्योंकि पेड़ से गिरी वह डाली जो राह चलते यात्री को मार डाले, उससे अधिक संयोग की बात क्या लगेगी? परन्तु प्रभु बहुत भिन्न रीति से देखता है, और घोषणा करता है कि उसने उसे मारनेवाले के हाथ में कर दिया (निर्गमन 21:13)। इसी प्रकार चिट्ठी को कौन भाग्य की अन्धता के सिर नहीं मढ़ता? प्रभु ऐसा नहीं मानता, जो निर्णय को अपना ठहराता है (नीतिवचन 16:33)। वह यह नहीं कहता कि उसकी सामर्थ्य से चिट्ठी गोद में डाली और निकाली जाती है, वरन् घोषणा करता है कि जो एकमात्र बात संयोग के सिर मढ़ी जा सकती थी वह उसी की ओर से है। सुलैमान के ये शब्द भी इसी आशय के हैं, “निर्धन और अन्धेर करनेवाला दोनों एक दूसरे से मिलते हैं; यहोवा दोनों की आँखों में ज्योति देता है” (नीतिवचन 29:13)। क्योंकि यद्यपि धनी और निर्धन संसार में मिले-जुले रहते हैं, तो भी यह कहकर कि प्रत्येक की दशा परमेश्वर की ठहराई हुई है, वह स्मरण दिलाता है कि परमेश्वर, जो सब को ज्योति देता है, अपनी आँख सदा खुली रखता है, और इस प्रकार निर्धनों को धीरज से सहने का उपदेश देता है, क्योंकि जो अपनी दशा से असन्तुष्ट हैं वे उस बोझ को उतार फेंकना चाहते हैं जो परमेश्वर ने उन पर डाला है। इसी प्रकार एक और भविष्यद्वक्ता उन अपवित्र लोगों को डाँटता है जो इस बात का श्रेय मनुष्य के परिश्रम या भाग्य को देते हैं कि कुछ लोग कीचड़ में लोटते हैं और कुछ आदर पाते हैं। “क्योंकि न तो पूरब से, न पश्चिम से, और न जंगल की ओर से बढ़ती होती है; परन्तु परमेश्वर ही न्यायी है, वह किसी को नीचा करता और किसी को ऊँचा करता है” (भजन संहिता 75:6, 7)। क्योंकि परमेश्वर अपने आप को न्यायी के पद से अलग नहीं कर सकता, इसलिए वह यह निष्कर्ष निकालता है कि कुछ का ऊँचा किया जाना और औरों का बिना आदर रह जाना उसकी गुप्त युक्ति से है।
7. वरन् मैं सामान्य रूप से कहता हूँ कि विशेष घटनाएँ परमेश्वर के विशेष विधान की साक्षी हैं। जंगल में परमेश्वर ने दक्षिणी हवा चलाई, और लोगों के पास बटेरों की भरपूर आपूर्ति पहुँचाई (निर्गमन 19:13)। जब उसने चाहा कि योना समुद्र में फेंका जाए, तो उसने बवण्डर भेजा। जो लोग इनकार करते हैं कि परमेश्वर शासन की बागडोर थामे है, कहेंगे कि यह साधारण रीति के विरुद्ध था, जबकि मैं इससे यह निष्कर्ष निकालता हूँ कि कोई हवा उसकी विशेष आज्ञा के बिना न उठती है न गरजती है। यह किसी रीति से सच न हो सकता कि “वह पवनों को अपने दूत और धधकती आग को अपने सेवक बनाता है;” कि “वह मेघों को अपना रथ बनाता है, और पवन के पंखों पर चलता है” (भजन संहिता 104:3, 4), यदि वह अपनी इच्छा से बादलों और पवनों को न हाँकता और उनमें अपनी सामर्थ्य की विशेष उपस्थिति प्रकट न करता। इसी प्रकार हमें अन्यत्र सिखाया गया है कि जब-जब समुद्र आँधी में उठता है, तो उसकी लहरें परमेश्वर की विशेष उपस्थिति की साक्षी हैं। “वह आज्ञा देता है, तब प्रचण्ड बयार उठकर तरंगों को उठाती है।” “वह आँधी को थमा देता है और तरंगें बैठ जाती हैं” (भजन संहिता 107:25, 29)। वह अन्यत्र यह भी घोषणा करता है कि उसने लोगों को लू और गेरुई से मारा था (आमोस 4:9)। फिर, जब कि मनुष्य को स्वभाव से अपनी जाति को बढ़ाने की सामर्थ्य है, परमेश्वर इसे अपनी विशेष कृपा का चिह्न बताता है कि कुछ निःसन्तान रहते हैं, जबकि औरों को सन्तान की आशीष मिलती है: क्योंकि गर्भ का फल उसी का दान है। इसी से याकूब के वे शब्द राहेल से, “क्या मैं परमेश्वर के स्थान पर हूँ, जिसने तुझे गर्भ के फल से वंचित रखा है?” (उत्पत्ति 30:2)। एक शब्द में निष्कर्ष यह कि प्रकृति में इससे अधिक साधारण कुछ नहीं कि हम रोटी से पोषण पाएँ। परन्तु आत्मा घोषणा करता है कि न केवल पृथ्वी की उपज परमेश्वर का विशेष दान है, वरन् “कि मनुष्य केवल रोटी ही से जीवित नहीं रहता” (व्यवस्थाविवरण 8:3), क्योंकि उसे केवल भरपूरी नहीं, परन्तु परमेश्वर की गुप्त आशीष पोषित करती है। और इसलिए, दूसरी ओर, वह धमकी देता है कि “सब प्रकार की रोटी का आसरा और सब प्रकार के जल का आसरा” छीन लेगा (यशायाह 3:1)। वास्तव में, हमारी दिन भर की रोटी की प्रार्थना में कोई गम्भीर अर्थ न होता, यदि परमेश्वर पितृवत् हाथ से हमें भोजन न देता। इसलिए विश्वासियों को निश्चय दिलाने के लिए कि परमेश्वर उन्हें खिलाने में सर्वोत्तम पिता का कार्य करता है, भविष्यद्वक्ता उन्हें स्मरण दिलाता है कि वह “सब प्राणियों को आहार देता है” (भजन संहिता 136:25)। अन्त में, जब हम एक ओर सुनते हैं कि “यहोवा की आँखें धर्मियों पर लगी रहती हैं, और उसके कान उनकी दुहाई की ओर लगे रहते हैं,” और दूसरी ओर कि “यहोवा बुराई करनेवालों के विमुख रहता है, कि उनका स्मरण पृथ्वी पर से मिटा डाले” (भजन संहिता 34:15, 16), तो हम निश्चय जानें कि ऊपर-नीचे के सब प्राणी उसकी सेवा के लिए तैयार हैं, कि वह उन्हें जिस रीति से चाहे काम में लाए। इसलिए हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि न केवल परमेश्वर का सामान्य विधान, प्रकृति के क्रम को बनाए रखते हुए, प्राणियों पर फैला है, वरन् उसकी अद्भुत युक्ति से वे एक निश्चित और विशेष उद्देश्य के लिए ठहराए गए हैं।
8. जो लोग इस सिद्धान्त पर कलंक लगाना चाहते हैं, वे इसे नियति के विषय में स्टोइकों का मत कहकर निन्दा करते हैं। यही आरोप पहले अगस्तीन पर भी लगाया गया था (lib. ad Bonifac. 2, c. 6 और अन्यत्र)। हम शब्दों पर विवाद नहीं करना चाहते; परन्तु हम नियति (Fate) शब्द को स्वीकार नहीं करते, इसलिए कि वह उस श्रेणी का है जिससे पौलुस हमें अपवित्र नई बातें समझकर बचना सिखाता है (1 तीमुथियुस 6:20), और इसलिए भी कि एक घृणित शब्द के द्वारा परमेश्वर के सत्य पर कलंक लगाने का प्रयत्न किया जाता है। परन्तु सिद्धान्त हम पर झूठ और बैर से थोपा जाता है। क्योंकि हम स्टोइकों के साथ कारणों की निरन्तर शृंखला और प्रकृति में निहित एक प्रकार की उलझी लड़ी से बनी आवश्यकता की कल्पना नहीं करते, परन्तु हम मानते हैं कि परमेश्वर सब वस्तुओं का ठहरानेवाला और शासक है,—कि सुदूर अनन्तकाल से, अपनी ही बुद्धि के अनुसार, उसने ठहराया कि वह क्या करेगा, और अब अपनी सामर्थ्य से वही पूरा करता है जो उसने ठहराया। इसलिए हम मानते हैं कि उसके विधान से न केवल स्वर्ग और पृथ्वी और निर्जीव प्राणी, वरन् मनुष्यों की युक्तियाँ और इच्छाएँ भी ऐसे शासित हैं कि ठीक उसी मार्ग पर चलें जो उसने उनके लिए ठहराया है। तो फिर, आप कहेंगे, क्या कुछ संयोग से नहीं होता, कुछ आकस्मिक नहीं होता? मैं उत्तर देता हूँ, बासिल महान का यह कथन सत्य था कि भाग्य और संयोग अन्यजातीय शब्द हैं; जिनके अर्थ से भक्त मनों को सरोकार नहीं होना चाहिए। क्योंकि यदि सब सफलता परमेश्वर की आशीष है, और विपत्ति और संकट उसका श्राप, तो मानवीय बातों में भाग्य और संयोग के लिए कोई स्थान नहीं बचता। हमें अगस्तीन के शब्दों से भी प्रभावित होना चाहिए (Retract. lib. 1 cap. 1), “अकादमीवादियों के विरुद्ध अपने लेखों में,” वह कहता है, “मुझे खेद है कि मैंने भाग्य शब्द का इतनी बार प्रयोग किया; यद्यपि मेरा अभिप्राय उससे किसी देवी का नहीं, वरन् बाहरी बातों में भली या बुरी घटनाओं के आकस्मिक परिणाम का था। इसी से ये शब्द भी, शायद, कदाचित्, संयोगवश,133 जिनके प्रयोग से कोई धर्म हमें नहीं रोकता, यद्यपि सब कुछ ईश्वरीय विधान से जोड़ना चाहिए। न ही मैंने यह कहना छोड़ा कि यद्यपि, शायद, जिसे साधारणतः भाग्य कहा जाता है वह भी किसी गुप्त क्रम से नियन्त्रित है, और जिसे हम संयोग कहते हैं वह और कुछ नहीं, केवल वही है जिसका कारण और हेतु गुप्त है। मैंने ऐसा कहा तो सही, परन्तु मुझे पछतावा है कि मैंने वहाँ भाग्य का उल्लेख उस रीति से किया, जब मैं देखता हूँ कि मनुष्यों में कितनी बुरी रीति पड़ी है कि वे, जैसा कहना चाहिए, ‘परमेश्वर को ऐसा भाया,’ नहीं कहते, परन्तु ‘भाग्य को ऐसा भाया।’” संक्षेप में, अगस्तीन सर्वत्र सिखाता है कि यदि कुछ भी भाग्य के भरोसे छोड़ दिया जाए, तो संसार संयोग से चलता है। और यद्यपि वह अन्यत्र घोषणा करता है (Quæstionum, lib. 83) कि सब कुछ अंशतः मनुष्य की स्वतन्त्र इच्छा से और अंशतः परमेश्वर के विधान से चलता है, तो भी थोड़ी ही देर बाद वह पर्याप्त स्पष्टता से दिखा देता है कि उसका आशय यह था कि मनुष्य भी विधान से शासित हैं, जब वह यह सिद्धान्त मानकर चलता है कि इससे बड़ा बेतुकापन नहीं हो सकता कि कुछ परमेश्वर के ठहराए बिना होता है; क्योंकि तब वह संयोग से होता। इसी कारण वह उस आकस्मिकता को भी निकाल देता है जो मनुष्य की इच्छा पर टिकी है, और थोड़ा आगे अधिक स्पष्ट शब्दों में जमाता है कि परमेश्वर की इच्छा के सिवा कोई कारण न खोजना चाहिए। जब वह अनुमति शब्द का प्रयोग करता है, तो उसका जो अर्थ वह लेता है, वह एक ही अंश से सबसे अच्छी रीति से प्रकट होगा (De Trinity. lib. 3 cap. 4), जहाँ वह प्रमाणित करता है कि परमेश्वर की इच्छा सब वस्तुओं का सर्वोच्च और प्रथम कारण है, क्योंकि उसके आदेश या अनुमति के बिना कुछ नहीं होता। वह निश्चय परमेश्वर को निठल्ला पहरे की मीनार पर बैठा नहीं दिखाता, जब वह कुछ अनुमति देना चुनता है। जिस इच्छा को वह बीच में आती हुई दिखाता है वह, यदि मैं ऐसा कह सकूँ, क्रियाशील (actualis) है, और इसके बिना कारण नहीं मानी जा सकती थी।
9. परन्तु क्योंकि हमारे सुस्त मन ईश्वरीय विधान की ऊँचाई से बहुत नीचे पड़े हैं, इसलिए हमें एक ऐसे भेद का सहारा लेना पड़ता है जो उन्हें ऊपर उठने में सहायता दे। इसलिए मैं कहता हूँ कि यद्यपि सब कुछ परमेश्वर की युक्ति और निश्चित व्यवस्था से चलता है, तो भी हमारे लिए वह संयोगवश है,—इसलिए नहीं कि हम कल्पना करते हैं कि भाग्य संसार और मनुष्यों पर शासन करता है और सब कुछ यों ही उलट-पुलट देता है (ऐसा हृदयहीन विचार हर मसीही के हृदय से दूर रहे); परन्तु इसलिए कि घटनाओं का क्रम, विधि, उद्देश्य और आवश्यकता प्रायः परमेश्वर की युक्ति में छिपे हैं, यद्यपि यह निश्चित है कि वे परमेश्वर की इच्छा से उत्पन्न होती हैं, वे संयोगवश प्रतीत होती हैं, क्योंकि वे हमारे सामने उसी रूप में आती हैं, चाहे उन्हें उनके अपने स्वभाव में देखा जाए, या हमारे ज्ञान और निर्णय के अनुसार आँका जाए। मान लें, उदाहरण के लिए, कि कोई व्यापारी विश्वासयोग्य लोगों के साथ किसी जंगल में प्रवेश करके असावधानी से अपने साथियों से भटक जाता है और घबराया हुआ तब तक भटकता है जब तक डाकुओं की माँद में जा गिरता और मारा जाता है। उसकी मृत्यु न केवल परमेश्वर की आँख से पहले देखी गई थी, वरन् उसके आदेश से ठहरा दी गई थी। क्योंकि कहा गया है, यह नहीं कि उसने पूर्वज्ञान से जाना कि प्रत्येक मनुष्य का जीवन कितनी दूर तक चलेगा, परन्तु कि उसने वे सीमाएँ ठहराईं और बाँधीं जिन्हें लाँघा नहीं जा सकता (अय्यूब 14:5)। फिर भी, हमारी समझने की क्षमता के सम्बन्ध में, ये सब बातें संयोगवश दिखाई देती हैं। मसीही कैसा अनुभव करेगा? यद्यपि वह मानेगा कि उस व्यक्ति की मृत्यु में जो-जो परिस्थिति घटी वह वास्तव में अपने स्वभाव में आकस्मिक थी, फिर भी उसे कोई सन्देह न होगा कि परमेश्वर के विधान ने उसे संचालित किया और भाग्य को अपने ही उद्देश्य की ओर चलाया। यही बात भावी आकस्मिक घटनाओं के विषय में भी है। हमारे लिए सब भावी घटनाएँ अनिश्चित हैं, और ऐसी लगती हैं मानो अधर में लटकी दोनों ओर में से किसी भी दिशा में जाने को तैयार हों। फिर भी हमारे हृदयों में यह छाप बैठी रहती है कि कुछ नहीं होगा जिसका प्रभु ने प्रबन्ध न किया हो। इसी अर्थ में सभोपदेशक में बार-बार घटना शब्द का प्रयोग हुआ है, क्योंकि पहली दृष्टि में मनुष्य उस प्रथम कारण तक नहीं पहुँचते जो छिपा हुआ है। और फिर भी, परमेश्वर के गुप्त विधान के विषय में पवित्रशास्त्र में जो सिखाया गया है वह मानव हृदय से कभी इतना पूरा मिटा नहीं कि अन्धकार में कुछ चिंगारियाँ सदा न चमकती रही हों। इसी प्रकार पलिश्तियों के भविष्य बतानेवाले, यद्यपि वे अनिश्चितता में डोलते हैं, प्रतिकूल घटना को अंशतः परमेश्वर और अंशतः संयोग के सिर मढ़ते हैं। वे कहते हैं, यदि सन्दूक “अपनी सीमा के मार्ग से बेतशेमेश को चढ़ जाए, तो उसी ने हम पर यह बड़ी विपत्ति डाली है; और यदि नहीं, तो हम जान लेंगे कि हमें मारनेवाला उसका हाथ नहीं, वह तो संयोग से हम पर आ पड़ा” (1 शमूएल 6:9)। निश्चय मूर्खता है कि जब उनका भविष्य बताना विफल होता है तो वे भाग्य की ओर भागते हैं। फिर भी हम देखते हैं कि वे इतने विवश हैं कि अपनी विपत्ति को संयोगवश मानने का साहस नहीं करते। परन्तु परमेश्वर अपने विधान की लगाम से घटनाओं को जिस दिशा में चाहे मोड़ता है, यह एक उल्लेखनीय उदाहरण से प्रकट होगा। ठीक उसी क्षण जब दाऊद माओन के जंगल में पकड़ा जाने को था, पलिश्ती देश पर चढ़ाई कर देते हैं, और शाऊल को लौटना पड़ता है (1 शमूएल 23:26, 27)। यदि परमेश्वर ने अपने सेवक की रक्षा का प्रबन्ध करने के लिए शाऊल के मार्ग में यह बाधा डाली, तो हम निश्चय नहीं कह सकते कि पलिश्तियों ने, मनुष्यों की आशा के विरुद्ध, यह चढ़ाई संयोग से की। जो हमें आकस्मिक लगता है, उसे विश्वास परमेश्वर की गुप्त प्रेरणा के रूप में पहचानेगा। कारण सदा समान रूप से प्रकट नहीं होता, परन्तु हमें निःसन्देह मानना चाहिए कि संसार में जो भी परिवर्तन होते हैं वे परमेश्वर के हाथ की गुप्त क्रिया से उत्पन्न होते हैं। साथ ही, जो परमेश्वर ने ठहराया है, यद्यपि वह अवश्य होगा, फिर भी ठीक-ठीक या अपने स्वभाव में आवश्यक नहीं है। हमारे उद्धारकर्ता की हड्डियों का उदाहरण इसका सुपरिचित प्रमाण है। चूँकि उसने हमारे जैसा शरीर धारण किया, कोई समझदार मनुष्य इनकार न करेगा कि उसकी हड्डियाँ टूट सकती थीं, और फिर भी यह असम्भव था कि वे टूटें (यूहन्ना 19:33, 36)। इसलिए, फिर, हम देखते हैं कि स्कूलमैन (मध्ययुगीन विद्वानों) ने जो भेद किया वह उचित आधार पर था, आवश्यकता secundum quid और निरपेक्ष आवश्यकता के बीच, और consequent तथा consequence की आवश्यकता के बीच भी। परमेश्वर ने अपने पुत्र की हड्डियों को टूटने योग्य बनाया, यद्यपि उन्हें वास्तविक टूटने से बचाया; और इस प्रकार अपनी युक्ति की आवश्यकता के अनुसार उसे असम्भव बना दिया जो स्वभावतः हो सकता था।
