पुस्तक II · अध्याय 1

आदम के पतन और विद्रोह के द्वारा सारी मानव जाति श्रापित और भ्रष्ट हो गई। मूल पाप के विषय में।

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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आदम के पतन और विद्रोह के द्वारा सारी मानव जाति श्रापित और भ्रष्ट हो गई। मूल पाप के विषय में।

अध्याय 1।

आदम के पतन और विद्रोह के द्वारा सारी मानव जाति श्रापित और भ्रष्ट हो गई। मूल पाप के विषय में।

I. अपने आप को जानना कितना आवश्यक है, उसका स्वरूप, भूल का संकट, और उसके प्रधान भाग, खण्ड 1, 2, 3। II. आदम के भयंकर पतन के कारण, खण्ड 4। III. पतन के प्रभाव जो आदम की सन्तान और सब सृजे हुए प्राणियों तक फैले, खण्ड 5 से अध्याय के अन्त तक, जहाँ मूल पाप के स्वरूप, प्रसार और प्रभाव पर विचार किया गया है।

खण्ड।

1. अपने आप का ज्ञान अत्यन्त आवश्यक है। उसका उचित उपयोग करने के लिए हमें अभिमान उतारकर सच्ची नम्रता धारण करनी होगी, जो हमें अपने पतन पर विचार करने और मसीह में परमेश्वर की दया को ग्रहण करने के योग्य बनाएगी।

2. यद्यपि जो भावना हमें आत्म-प्रशंसा के लिए उकसाती है उसमें मनभावनापन है, तो भी एकमात्र खरी भावना वही है जो हमें मन की सच्ची दीनता की ओर झुकाती है। अभिमान के बहाने। पापी मनुष्य की दयनीय घमण्ड-भरी व्यर्थता।

3. शारीरिक बुद्धि और विवेक के दृष्टिकोण भिन्न हैं; विवेक अपने मानदण्ड के लिए ईश्वरीय न्याय की दुहाई देता है। अपने आप का ज्ञान दो भागों में है, जिनमें पहले की चर्चा हो चुकी है; दूसरे पर यहाँ विचार किया गया है।

4. इस दूसरे भाग पर विचार करते समय दो बातें देखनी हैं: 1. आदम ने अपने आप को और सारी मानव जाति को इस भयानक विपत्ति में कैसे फँसाया। यह इन्द्रिय-असंयम का नहीं, वरन् अविश्वास का फल था (जो अन्य घोर पापों का स्रोत है), जिससे परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह हुआ, जबकि सब सच्चा सुख उसी से मिलना चाहिए। प्रथम मनुष्य के अविश्वास से उत्पन्न अन्य पापों की गणना।

5. दूसरी बात यह देखनी है कि पतन का संक्रामक प्रभाव कहाँ तक फैलता है। वह फैलता है, 1. सब सृजे हुए प्राणियों तक, यद्यपि वे निर्दोष हैं; और 2. आदम की सारी सन्तान तक। इसी से वंशागत भ्रष्टता, अर्थात् मूल पाप, और उस स्वभाव का बिगड़ जाना जो पहले शुद्ध और भला था। यह बिगाड़ आदम की सारी सन्तान को पहुँचा, परन्तु उस रीति से नहीं जैसा पेलागियस और सेलेस्टियस के अनुयायी मानते हैं।

6. बिगाड़ केवल अनुकरण से नहीं, वरन् वंश-परम्परा से पहुँचा। यह प्रमाणित है, 1. आदम और मसीह के बीच खींची गई तुलना से। पवित्रशास्त्र के अंशों से पुष्टि; 2. इस सामान्य घोषणा से कि हम क्रोध की सन्तान हैं।

7. आपत्ति कि यदि आदम का पाप उसकी सन्तान में फैलता है तो आत्मा भी वंश-परम्परा से आई होगी। उत्तर। एक और आपत्ति—कि भक्त माता-पिता से सन्तान भ्रष्टता नहीं पा सकती। उत्तर।

8. मूल पाप की परिभाषा। परिभाषा के दो भाग। उत्तर भाग की व्याख्या। मूल पाप हमें परमेश्वर के क्रोध का पात्र बनाता है। वह हम में शरीर के कर्म भी उत्पन्न करता है। अन्य परिभाषाओं पर विचार।

9. परिभाषा के पहले भाग की व्याख्या—अर्थात् वंशागत भ्रष्टता आत्मा की सब शक्तियों में फैली हुई है।

10. परिभाषा के दोनों भागों की व्याख्या से यह निष्कर्ष निकलता है कि परमेश्वर पाप का रचयिता नहीं है, क्योंकि सारी मानव जाति एक भीतरी दुष्टता से भ्रष्ट हो गई है।

11. यह, तथापि, स्वभाव से नहीं, वरन् ऊपर से आई हुई विशेषता है। इसलिए मानीवादियों का दो आदि-तत्त्वों का स्वप्न मिट जाता है।

1. प्राचीन कहावत ने मनुष्य को अपने आप को जानने का इतना आग्रह किया, तो यह निराधार नहीं था। क्योंकि यदि जीवन के व्यवहार से सम्बन्ध रखनेवाली बातों का अज्ञान लज्जास्पद माना जाता है, तो आत्म-अज्ञान कहीं अधिक लज्जास्पद है, जिसके कारण हम सबसे बड़े महत्त्व की बातों में अपने आप को दयनीय रूप से धोखा देते और आँखों पर पट्टी बाँधे चलते हैं। परन्तु यह शिक्षा जितनी उपयोगी है, उतनी ही सावधानी से हमें इसे अनुचित रीति से प्रयोग करने से बचना चाहिए, जैसा कि हम कुछ दार्शनिकों को करते देखते हैं। क्योंकि वे मनुष्य को अपने आप को जानने का उपदेश देते समय उसका कारण यह बताते हैं कि वह अपनी श्रेष्ठता और गरिमा से अनजान न रहे। वे चाहते हैं कि वह अपने भीतर केवल वही देखे जो उसे व्यर्थ आत्मविश्वास से भर दे और अभिमान से फुला दे। परन्तु आत्म-ज्ञान इसमें है कि पहला, जब हम उस पर विचार करते हैं जो परमेश्वर ने हमारी सृष्टि के समय हमें दिया, और जो वह अब भी अनुग्रहपूर्वक देता रहता है, तब हम देखें कि यदि हमारी निर्दोषता बनी रहती तो हमारे स्वभाव की श्रेष्ठता कितनी महान होती, और साथ ही स्मरण करें कि हमारा अपना कुछ भी नहीं है, वरन् हम पूरी तरह परमेश्वर पर निर्भर हैं, जिससे हम वह सब उसकी इच्छा से पाते हैं जो उसने देना उचित समझा; दूसरा, जब हम आदम के पतन के बाद की अपनी दयनीय दशा को देखते हैं, तो सारा भरोसा और घमण्ड ढह जाता है, हम लज्जा से लाल हो जाते हैं, और सचमुच दीन हो जाते हैं। क्योंकि जैसे परमेश्वर ने आरम्भ में हमें अपने स्वरूप में रचा, ताकि हमारे मन को सद्गुण की खोज और अनन्त जीवन के चिन्तन की ओर उठाए, वैसे ही उन उत्तम गुणों को, जो हमें निम्न प्राणियों से अलग करते हैं, उदासीनता से दबा न देने के लिए यह जानना आवश्यक है कि हमें बुद्धि और समझ इसलिए दी गई थी कि हम पवित्र और आदरणीय जीवन बिताएँ और धन्य अमरता को अपना ठहराया हुआ लक्ष्य मानें। साथ ही, अपनी आदि गरिमा का विचार करते हुए हमें तुरन्त अपनी लज्जा और भ्रष्टता का दुःखद दृश्य भी स्मरण हो आता है, क्योंकि हम अपने आदि पुरुष में अपनी मूल दशा से गिर गए। इस प्रकार हम अपने आप से असन्तुष्ट होते और सचमुच दीन बनते हैं, और साथ ही परमेश्वर को खोजने की नई लालसा से भर जाते हैं, जिसमें हर एक उन भले गुणों को फिर पा सकता है जिनसे सब पूरी तरह रिक्त पाए जाते हैं।

2. अपने आप को जाँचने में जो खोज ईश्वरीय सत्य हम से करवाता है और जो ज्ञान वह माँगता है, वह ऐसा है जो हमें अपनी शक्तियों पर हर प्रकार के भरोसे से विमुख कर दे, हमें घमण्ड के सब साधनों से रहित छोड़ दे, और इस प्रकार हमें अधीनता की ओर झुकाए। यही वह मार्ग है जिस पर हमें चलना चाहिए, यदि हम मनन और व्यवहार, दोनों में सच्चे लक्ष्य तक पहुँचना चाहें। मैं अनजान नहीं हूँ कि वह दृष्टिकोण कितना अधिक मनभावन है जो हमें अपने गुणों पर विचार करने को बुलाता है, बजाय इसके कि हम उस पर दृष्टि डालें जो हमें लज्जा से दबा देगा—अर्थात् हमारी दयनीय रिक्तता और अपमान। मानव मन को चापलूसी से अधिक प्रिय कुछ नहीं, और इसलिए जब उससे कहा जाता है कि उसके गुण ऊँचे दर्जे के हैं, तो वह अत्यधिक विश्वास कर लेने को तैयार रहता है। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं कि अधिकांश मनुष्य इस विषय में इतनी बुरी तरह भटक गए हैं। उस जन्मजात आत्म-प्रेम के कारण जिससे सब अन्धे हैं, हम बड़ी इच्छा से अपने आप को समझा लेते हैं कि हम में एक भी ऐसा गुण नहीं जो घृणा के योग्य हो; और इसीलिए बाहर से किसी समर्थन के बिना भी उस अत्यन्त मूर्खतापूर्ण विचार पर सामान्य विश्वास किया जाता है कि मनुष्य भले और सुखी जीवन के सब प्रयोजनों के लिए अपने आप में पूरी तरह पर्याप्त है। यदि कुछ लोग अधिक नम्र सोचने को तैयार होते हैं और परमेश्वर को कुछ श्रेय देते हैं ताकि वे सब कुछ अपना ही ठहराते न दिखें, तब भी बँटवारा करते समय वे बातों को ऐसे बाँटते हैं कि भरोसे और घमण्ड का मुख्य आधार सदा उन्हीं के पास रहे। फिर यदि कोई ऐसा प्रवचन दिया जाए जो मनुष्य के अन्तःकरण में अपने आप उपजनेवाले अभिमान की चापलूसी करे, तो उससे अधिक आनन्ददायक कुछ नहीं लगता। इसलिए हर युग में जो मानव स्वभाव की श्रेष्ठता का बखान करने में सबसे आगे होता है, उसका सबसे ऊँची तालियों से स्वागत किया जाता है। परन्तु मानव श्रेष्ठता का यह ढिंढोरा चाहे जैसा हो, मनुष्य को अपने ही ऊपर भरोसा रखना सिखाकर वह अपनी मिठास से मोह लेने के सिवा और कुछ नहीं करता, और साथ ही ऐसा भरमाता है कि जो भी उससे सहमत हो उसे विनाश में डुबो दे। क्योंकि इससे क्या लाभ कि हम व्यर्थ भरोसे के साथ आगे बढ़ें, जो हमें उद्देश्य के अनुकूल लगे उस पर विचार करें, निश्चय करें, योजना बनाएँ और प्रयत्न करें, और आरम्भ में ही खरी समझ और सच्चे सद्गुण, दोनों में अधूरे और रिक्त निकलें, फिर भी भरोसे के साथ अड़े रहें जब तक कि सिर के बल विनाश में न जा गिरें? परन्तु जो अपनी शक्तियों पर भरोसा रखते हैं, उनके साथ सबसे अच्छी बात यही हो सकती है। इसलिए जो कोई उन शिक्षकों की सुनता है जो हमें केवल अपने गुणों पर विचार करने में लगाए रखते हैं, वह आत्म-ज्ञान में प्रगति करना तो दूर, अत्यन्त घातक अज्ञान में जा डूबेगा।

3. प्रकट किया हुआ सत्य मनुष्य जाति की सामान्य सहमति के साथ इस शिक्षा में मेल खाता है कि बुद्धि का दूसरा भाग आत्म-ज्ञान में है, परन्तु इस विषय में उनमें बड़ा भेद है कि यह ज्ञान किस विधि से पाया जाए। शरीर के निर्णय में मनुष्य अपना आत्म-ज्ञान तब पूरा समझता है जब वह अपनी बुद्धि और सत्यनिष्ठा पर अत्यधिक भरोसा रखते हुए साहस बाँधता है, अपने आप को सद्कर्मों के लिए उभारता है, और बुराई के विरुद्ध युद्ध छेड़कर भले और सुन्दर को पाने का भरसक प्रयत्न करता है। परन्तु जो अपने आप को ईश्वरीय न्याय की कसौटी पर परखता है, उसे भरोसा दिलाने वाली कोई बात नहीं मिलती; इसलिए उसकी आत्म-परीक्षा जितनी गहरी होती है, उसकी निराशा उतनी ही बढ़ती है। अपने ऊपर से सारी निर्भरता छोड़कर वह अनुभव करता है कि वह अपने आचरण को ठीक रीति से चलाने में सर्वथा असमर्थ है। फिर भी परमेश्वर की यह इच्छा नहीं कि हम उस आदि गरिमा को भूल जाएँ जो उसने हमारे आदि माता-पिता को दी थी—वह गरिमा जो हमें भलाई और धार्मिकता की खोज में भली-भाँति उभार सकती है। हमारे लिए अपने आदि मूल, या अपनी सृष्टि के उद्देश्य का विचार करते हुए अमरता पर मनन करने और परमेश्वर के राज्य को खोजने के लिए प्रेरित हुए बिना रहना असम्भव है। परन्तु ऐसा मनन हमारे मन को ऊँचा उठाने के बजाय उसे गिराता और दीन बनाता है। क्योंकि हमारा मूल क्या है? वह जिससे हम गिर गए हैं। हमारी सृष्टि का उद्देश्य क्या है? वह जिससे हम बिलकुल भटक गए हैं, यहाँ तक कि अपनी दयनीय दशा से थककर हम कराहते हैं और कराहते हुए खोई हुई गरिमा के लिए आहें भरते हैं। जब हम कहते हैं कि मनुष्य को अपने भीतर कुछ ऐसा नहीं देखना चाहिए जो उसके मन को ऊँचा उठाए, तो हमारा आशय यह है कि उसके पास ऐसा कुछ नहीं जिस पर वह गर्व से इतरा सके। इसलिए, उस ज्ञान पर विचार करते हुए जो मनुष्य को अपने विषय में होना चाहिए, उसे इस प्रकार बाँटना उचित प्रतीत होता है, पहला, उस उद्देश्य पर विचार करना जिसके लिए वह सृजा गया, और उन गुणों पर—जो किसी भी प्रकार तुच्छ गुण नहीं—जिनसे वह सम्पन्न किया गया, जो उसे ईश्वरीय आराधना और भावी जीवन पर मनन करने के लिए प्रेरित करें; और दूसरा, उसकी क्षमताओं पर, या कहें क्षमताओं के अभाव पर विचार करना—ऐसा अभाव जो दिख जाने पर उसका सारा भरोसा मिटा देगा और उसे लज्जा से ढक देगा। पहले दृष्टिकोण का झुकाव उसे यह सिखाने की ओर है कि उसका कर्तव्य क्या है, और दूसरे का उसे यह जताने की ओर कि वह उसे निभाने में कहाँ तक समर्थ है। हम दोनों पर उचित क्रम से विचार करेंगे।

4. जिस कार्य को परमेश्वर ने इतनी कठोरता से दण्ड दिया, वह तुच्छ दोष नहीं, वरन् घोर अपराध रहा होगा; इसलिए उस पाप के विशेष स्वरूप पर ध्यान देना आवश्यक होगा जिससे आदम का पतन हुआ और जिसने परमेश्वर को सारी मानव जाति पर ऐसा भयंकर दण्ड उण्डेलने को उकसाया। इन्द्रिय-असंयम का जो सामान्य विचार है वह बचकाना है। सब सद्गुणों का सार और सारांश किसी एक फल से परहेज़ में नहीं हो सकता था, जबकि हर प्रकार का मनचाहा स्वादिष्ट भोजन भरपूर था और धरती सुखद उर्वरता से केवल बहुतायत ही नहीं, वरन् अनगिनत विविधता भी देती थी। इसलिए हमें इन्द्रिय-असंयम से गहरे देखना होगा। भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष को छूने की मनाही आज्ञाकारिता की परीक्षा थी, ताकि आदम उसका पालन करके परमेश्वर की आज्ञा के प्रति अपनी स्वेच्छा से अधीनता प्रमाणित करे। क्योंकि इसी शब्द से प्रकट होता है कि आज्ञा का उद्देश्य उसे अपनी दशा में सन्तुष्ट रखना था, और उसे घमण्ड से उससे ऊपर उठने की लालसा न करने देना। वह प्रतिज्ञा जो उसे अनन्त जीवन की आशा देती थी जब तक वह जीवन के वृक्ष का फल खाता रहे, और दूसरी ओर उस क्षण मृत्यु की भयंकर चेतावनी जब वह भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल चखे, उसके विश्वास को परखने और अभ्यास कराने के लिए थीं। इसलिए यह अनुमान लगाना कठिन नहीं कि आदम ने किस प्रकार परमेश्वर का क्रोध भड़काया। अगस्तीन (भजन 19 पर) जब कहता है कि अभिमान सब बुराई का आरम्भ था, तो वह सच्चाई से दूर नहीं है, क्योंकि यदि मनुष्य की महत्त्वाकांक्षा उसे उस ऊँचाई तक न ले जाती जो उसे दी नहीं गई थी, तो वह अपनी आदि दशा में बना रह सकता था। फिर भी एक और परिभाषा उस प्रकार की परीक्षा से निकालनी चाहिए जिसका वर्णन मूसा करता है। जब शैतान की चतुराई से स्त्री ने विश्वासघात करके परमेश्वर की आज्ञा छोड़ दी, तो स्पष्ट है कि उसके पतन का मूल आज्ञा-उल्लंघन में था। इसकी पुष्टि पौलुस यह कहकर करता है कि एक मनुष्य की आज्ञा-उल्लंघन से सब नाश हुए। साथ ही यह भी ध्यान देना चाहिए कि प्रथम मनुष्य ने परमेश्वर के अधिकार के विरुद्ध विद्रोह न केवल शैतान की चालों में फँस जाने में किया, वरन् सत्य को तुच्छ जानकर झूठ की ओर मुड़ जाने में भी किया। निश्चय ही जब परमेश्वर के वचन को तुच्छ जाना जाता है, तब उसके प्रति सारी श्रद्धा जाती रहती है। उसकी महिमा का हमारे बीच उचित सम्मान नहीं हो सकता, और न उसकी आराधना अपनी सम्पूर्णता में बनी रह सकती है, जब तक हम मानो उसके मुख पर टँगे न रहें। इसलिए विद्रोह की जड़ में अविश्वास था। फिर अविश्वास से महत्त्वाकांक्षा और अभिमान उपजे, और साथ ही कृतघ्नता भी; क्योंकि आदम ने जो उसके लिए ठहराया गया था उससे अधिक चाहकर उस बड़ी उदारता का तिरस्कार दिखाया जिससे परमेश्वर ने उसे समृद्ध किया था। यह निश्चय ही भयानक अभक्ति थी कि मिट्टी का पुत्र स्वरूप में रचे जाने को कम समझे, जब तक कि वह परमेश्वर के बराबर भी न बनाया जाए। यदि वह धर्मत्याग, जिससे मनुष्य अपने सृष्टिकर्ता के अधिकार से हट जाता है, वरन् चिढ़कर उसके प्रति अपनी निष्ठा को झटक देता है, घिनौना और घृणित अपराध है, तो आदम के पाप को हल्का करने का प्रयत्न व्यर्थ है। और वह केवल धर्मत्याग भी नहीं था। उसके साथ परमेश्वर का घोर अपमान भी था, क्योंकि दोषी जोड़े ने शैतान की उन निन्दाओं से सहमति दी जिनमें उसने परमेश्वर पर द्वेष, डाह और झूठ का आरोप लगाया था। संक्षेप में, अविश्वास ने महत्त्वाकांक्षा के लिए द्वार खोला, और महत्त्वाकांक्षा विद्रोह की जननी बनी, क्योंकि मनुष्य ने परमेश्वर का भय त्याग दिया और अपनी अभिलाषा को खुली छूट दे दी। इसलिए बर्नार्ड ठीक कहता है कि आज के दिन हमारे लिए उद्धार का द्वार तब खुलता है जब हम कानों से सुसमाचार को ग्रहण करते हैं, जैसे उसी प्रवेश-द्वार से, जब वह शैतान के लिए खुला, मृत्यु भीतर आई। आदम कभी परमेश्वर की आज्ञा के प्रति किसी प्रकार की अरुचि दिखाने का साहस न करता यदि वह उसके वचन के विषय में अविश्वासी न हुआ होता। अपनी सब भावनाओं को उचित नियन्त्रण में रखने का सबसे सशक्त लगाम यह विश्वास होता कि परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करके धार्मिकता का अभ्यास करने से अच्छा कुछ नहीं, और सबसे बड़ा सम्भव सुख उसका प्रेमपात्र होना है।141 इसलिए मनुष्य ने, शैतान की निन्दाओं में बहकर, परमेश्वर की सारी महिमा को मिटा देने का भरसक प्रयत्न किया।

5. जैसे आदम का आत्मिक जीवन अपने सृष्टिकर्ता से जुड़े और बँधे रहने में होता, वैसे ही उससे अलग हो जाना उसकी आत्मा की मृत्यु था। और यह आश्चर्य की बात नहीं कि जिसने स्वर्ग और पृथ्वी में प्रकृति की सारी व्यवस्था को बिगाड़ दिया, उसने अपने विद्रोह से अपने वंश को भी बिगाड़ दिया। पौलुस कहता है, “सारी सृष्टि कराहती है, क्योंकि वह अपनी इच्छा से नहीं, वरन् व्यर्थता के आधीन की गई” (रोमियों 8:20, 22)। यदि कारण पूछा जाए, तो इसमें सन्देह नहीं कि सृष्टि उस दण्ड का एक भाग उठाती है जो मनुष्य के योग्य था, जिसके उपयोग के लिए अन्य सब प्राणी बनाए गए थे। इसलिए, जब मनुष्य के दोष से श्राप ऊपर और नीचे, जगत के सब क्षेत्रों में फैल गया, तो उसका उसकी सारी सन्तान तक फैलना कुछ अनुचित नहीं। जब मनुष्य में स्वर्गीय स्वरूप मिट गया, तो वह न केवल स्वयं उन आभूषणों के छिन जाने से दण्डित हुआ जिनसे वह सजा था—अर्थात् बुद्धि, सद्गुण, न्याय, सत्य और पवित्रता—और उनके स्थान पर उन भयानक विपत्तियों के आ जाने से, अर्थात् अन्धापन, निर्बलता, व्यर्थता, अशुद्धता और अधर्म, वरन् उसने अपनी सन्तान को भी उसमें फँसाया और उसी दुर्दशा में डुबो दिया। यही वंशागत भ्रष्टता है जिसे प्राचीन मसीही लेखकों ने मूल पाप का नाम दिया, और इस शब्द से उनका अर्थ उस स्वभाव का बिगड़ जाना था जो पहले भला और शुद्ध था। इस विषय पर बहुत विवाद हुआ, क्योंकि साधारण समझ से इससे दूर कुछ नहीं कि एक का दोष सब को दोषी ठहराए और इस प्रकार सामान्य पाप बन जाए। ऐसा प्रतीत होता है कि इसी कारण कलीसिया के सबसे प्राचीन शिक्षक इस बात को केवल धुँधले ढंग से छूते हैं, या कम से कम इसे उतनी स्पष्टता से नहीं समझाते जितनी आवश्यक थी। परन्तु यह संकोच पेलागियस के उठ खड़े होने को न रोक सका, जिसकी अपवित्र कल्पना यह थी कि आदम ने पाप केवल अपनी हानि के लिए किया, पर अपनी सन्तान की कोई हानि नहीं की। इस प्रकार रोग को चतुराई से छिपाकर शैतान ने उसे असाध्य बनाने का प्रयत्न किया। परन्तु जब पवित्रशास्त्र से स्पष्ट प्रमाणित हो गया कि प्रथम मनुष्य का पाप उसकी सारी सन्तान को पहुँचा, तो यह तर्क-वितर्क ढूँढ़ा गया कि वह अनुकरण से पहुँचा, वंश-परम्परा से नहीं। इसलिए रूढ़िवादी लोगों ने, और विशेषकर अगस्तीन ने, यह दिखाने का परिश्रम किया कि हम अर्जित दुष्टता से भ्रष्ट नहीं होते, वरन् गर्भ ही से जन्मजात भ्रष्टता साथ लाते हैं। इसका इनकार करना सबसे बड़ी निर्लज्जता थी। परन्तु पेलागियस और सेलेस्टियस के अनुयायियों की धृष्टता पर वह कोई आश्चर्य नहीं करेगा जिसने उस पवित्र जन की रचनाओं से जाना है कि इन विधर्मियों की ढिठाई कितनी चरम सीमा की थी। निश्चय ही दाऊद के अंगीकार में कोई अस्पष्टता नहीं, “देख, मैं अधर्म के साथ उत्पन्न हुआ, और पाप के साथ मेरी माता ने मुझे गर्भ में धारण किया” (भजन संहिता 51:5)। इस अंश में उसका उद्देश्य अपने माता-पिता पर दोष डालना नहीं है; वरन् अपने प्रति परमेश्वर की भलाई को और अच्छी रीति से सराहने के लिए वह उचित रूप से अपने जन्म ही से अशुद्ध होने का अंगीकार दोहराता है। चूँकि स्पष्ट है कि दाऊद के मामले में कोई विशेषता नहीं थी, इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि वह सारी मानव जाति के सामान्य भाग्य का एक उदाहरण मात्र है। इसलिए हम सब, अशुद्ध बीज से उत्पन्न होकर, पाप की छूत से दूषित होकर जगत में आते हैं। वरन् सूर्य का प्रकाश देखने से पहले ही हम परमेश्वर की दृष्टि में अशुद्ध और अपवित्र हैं। अय्यूब की पुस्तक कहती है, “अशुद्ध वस्तु से शुद्ध वस्तु को कौन निकाल सकता है? कोई नहीं” (अय्यूब 14:4)।
141 इस वाक्य का अन्तिम खण्ड फ्रेंच में छोड़ दिया गया है।

6. इस प्रकार हम देखते हैं कि माता-पिता की अशुद्धता उनकी सन्तान को पहुँचती है, जिससे सब, बिना किसी अपवाद के, मूल रूप से भ्रष्ट हैं। इस भ्रष्टता का आरम्भ तब तक नहीं मिलेगा जब तक हम सब के आदि पिता तक, स्रोत के रूप में, न पहुँचें। इसलिए हमें निश्चित रूप से मानना चाहिए कि मानव स्वभाव के विषय में आदम केवल एक पूर्वज ही नहीं, वरन् मानो एक जड़ था, और इसलिए उसकी भ्रष्टता से सारी मानव जाति उचित रूप से दूषित हो गई। यह उस तुलना से स्पष्ट है जो प्रेरित आदम और मसीह के बीच करता है, “इसलिए जैसा एक मनुष्य के द्वारा पाप जगत में आया, और पाप के द्वारा मृत्यु आई, और इस रीति से मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, क्योंकि सब ने पाप किया; वैसे ही अनुग्रह भी धार्मिकता के द्वारा हमारे प्रभु यीशु मसीह के कारण अनन्त जीवन के लिए राज्य करे” (रोमियों 5:19–21)। पेलागियस के अनुयायी यहाँ किस कुतर्क का सहारा लेंगे? कि आदम का पाप अनुकरण से फैला! तो क्या मसीह की धार्मिकता हमारे लिए तभी तक लाभकारी है जब तक वह अनुकरण के लिए सामने रखा गया आदर्श मात्र है? क्या कोई ऐसी निन्दा सह सकता है? परन्तु यदि, बिना किसी विवाद के, मसीह की धार्मिकता, और उसके द्वारा जीवन, हमें सहभागिता से मिलती है, तो इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ये दोनों आदम में खो गए ताकि मसीह में फिर पाए जाएँ, जबकि पाप और मृत्यु आदम के द्वारा आए ताकि मसीह में मिटा दिए जाएँ। इन शब्दों में कोई अस्पष्टता नहीं, “जैसे एक मनुष्य की आज्ञा-उल्लंघन से बहुत लोग पापी ठहरे, वैसे ही एक की आज्ञाकारिता से बहुत लोग धर्मी ठहरेंगे।” अतः दोनों के बीच का सम्बन्ध यह है: जैसे आदम ने अपने विनाश में हमें फँसाकर नष्ट किया, वैसे ही मसीह ने अपने अनुग्रह से हमें उद्धार में पुनःस्थापित किया। सत्य के इस स्पष्ट प्रकाश में मुझे किसी लम्बे या अधिक परिश्रमी प्रमाण की आवश्यकता नहीं दिखती। इसी प्रकार कुरिन्थियों की पहली पत्री में, जब पौलुस विश्वासियों को पुनरुत्थान की निश्चित आशा में दृढ़ करना चाहता है, तो वह दिखाता है कि जो जीवन आदम में खोया गया वह मसीह में फिर पाया जाता है (1 कुरिन्थियों 15:22)। पहले यह घोषणा करके कि आदम में सब मरे, अब वह खुलकर यह भी गवाही देता है कि सब पाप के दाग से रंगे हुए हैं। दण्ड की आज्ञा तो उन पर नहीं पहुँच सकती थी जो सर्वथा दोष-मुक्त हैं। परन्तु उसका अर्थ उस वाक्य के दूसरे भाग से अधिक स्पष्ट नहीं हो सकता, जिसमें वह दिखाता है कि मसीह में जीवन की आशा फिर स्थापित होती है। सब जानते हैं कि यह केवल इसी रीति से होता है कि मसीह एक अद्भुत सहभागिता के द्वारा अपनी धार्मिकता की शक्ति हम में उँडेलता है, जैसा कि अन्यत्र कहा गया है, “आत्मा धार्मिकता के कारण जीवन है” (1 कुरिन्थियों 15:22)। इसलिए “आदम में सब मरे” इस कथन की एकमात्र व्याख्या जो दी जा सकती है, यह है कि उसने पाप करके न केवल अपने ऊपर विपत्ति और विनाश लाया, वरन् हमारे स्वभाव को भी वैसे ही विनाश में डुबो दिया; और केवल एक दोष में, एक ऐसे विषय में जो हम से सम्बन्ध नहीं रखता था, नहीं, वरन् उस भ्रष्टता से जिसमें वह स्वयं गिरा, उसने अपने सारे वंश को संक्रमित कर दिया। पौलुस कभी यह न कहता कि सब “स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान” हैं (इफिसियों 2:3), यदि वे गर्भ ही से श्रापित न होते। और यह स्पष्ट है कि वहाँ जिस स्वभाव की चर्चा है वह वह स्वभाव नहीं जैसा परमेश्वर ने रचा, वरन् जैसा आदम में बिगड़ गया; क्योंकि परमेश्वर को मृत्यु का रचयिता ठहराना अत्यन्त असंगत होता। इसलिए आदम ने जब अपने आप को भ्रष्ट किया, तो उसने यह छूत अपनी सारी सन्तान को पहुँचाई। क्योंकि स्वर्गीय न्यायी, हमारा उद्धारकर्ता स्वयं, घोषित करता है कि सब जन्म से दुष्ट और भ्रष्ट हैं, जब वह कहता है कि “जो शरीर से जन्मा है वह शरीर है” (यूहन्ना 3:6), और इसलिए जीवन का द्वार सब के लिए तब तक बन्द है जब तक वे नया जन्म न पा लें।

7. इस विषय को समझने के लिए उस चिन्ताभरी चर्चा की कोई आवश्यकता नहीं (जिसने प्राचीन शिक्षकों को बहुत उलझन में डाला) कि क्या बच्चे की आत्मा माता-पिता की आत्मा से वंश-परम्परा द्वारा आती है।142 हमारे लिए यह जान लेना पर्याप्त होना चाहिए कि आदम को उन वरदानों का भण्डारी बनाया गया था जो परमेश्वर ने मानव स्वभाव को देना चाहा, और इसलिए जब उसने जो पाया था उसे खोया, तो उसने न केवल अपने लिए, वरन् हम सब के लिए खोया। आत्मा के संचरण के विषय में चिन्ता क्यों करें, जब हम जानते हैं कि जो गुण आदम ने खोए वे उसने अपने लिए जितने, उतने ही हमारे लिए भी पाए थे, कि वे किसी एक व्यक्ति के वरदान नहीं, वरन् सारी मानव जाति के गुण थे? इसलिए इस विचार में कुछ बेतुका नहीं कि जब वह रिक्त किया गया, तब उसका स्वभाव नंगा और रिक्त छोड़ा गया, और उसके पाप से दूषित हो जाने पर वह अशुद्धता उसके सारे वंश तक फैलती है। इस प्रकार भ्रष्ट जड़ से निकली भ्रष्ट डालियाँ अपनी भ्रष्टता उन पौधों को पहुँचाती हैं जो उनसे फूटते हैं। सन्तान ने अपने जनक में बिगड़कर वह दाग पोतों को पहुँचाया; अर्थात् आदम में आरम्भ हुई भ्रष्टता निरन्तर वंश-परम्परा से पहले वालों से बाद वालों तक पहुँचती है। छूत का कारण न तो शरीर के सार में है, न आत्मा में, वरन् परमेश्वर ने यह ठहराना चाहा कि जो वरदान उसने प्रथम मनुष्य को दिए थे, उन्हें वह मनुष्य अपने वंशजों के लिए भी खोए, जितना अपने लिए। पेलागियस का यह कुतर्क कि भक्त माता-पिता से सन्तान का भ्रष्टता पाना असम्भाव्य है, जबकि उन्हें तो उनकी पवित्रता से पवित्र होना चाहिए, सहज ही खण्डित हो जाता है। सन्तान आत्मिक नया जन्म से नहीं, वरन् शारीरिक वंश से आती है।143 अतः, जैसा अगस्तीन कहता है, “दोषी ठहराया गया अविश्वासी और निर्दोष ठहराया गया विश्वासी, दोनों ऐसी सन्तान उत्पन्न करते हैं जो निर्दोष नहीं, वरन् दोषी है, क्योंकि जनक स्वभाव भ्रष्ट है।”144 इसके अतिरिक्त, यद्यपि भक्त माता-पिता किसी हद तक अपनी सन्तान की पवित्रता में योगदान देते हैं, यह परमेश्वर की आशीष से है; किन्तु वह आशीष सारी जाति के प्राथमिक और सार्वभौम श्राप को पहले से प्रभावी होने से नहीं रोकती। दोष स्वभाव से है, जबकि पवित्रीकरण अलौकिक अनुग्रह से।
142 फ्रेंच में है, “Assavoir, si l’ame du fils procede de la substance de l’ame paternelle, veu que c’est en l’ame que reside le peché originel.” अर्थात्, क्या पुत्र की आत्मा पिता की आत्मा के सार से निकली है, क्योंकि मूल पाप आत्मा में ही निवास करता है।

8. परन्तु ऐसा न हो कि जिस विषय की हम चर्चा कर रहे हैं वह अज्ञात या सन्देहपूर्ण रहे, मूल पाप की परिभाषा देना उचित होगा। (कैल्विन, Conc. Trident. 1, Dec. Sess. 5 में)। तथापि मेरा अभिप्राय उन सब परिभाषाओं पर चर्चा करने का नहीं जो भिन्न-भिन्न लेखकों ने अपनाई हैं, वरन् केवल वह प्रस्तुत करने का है जो मुझे सत्य के सबसे अनुकूल प्रतीत होती है। तो मूल पाप को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है: हमारे स्वभाव की वंशागत भ्रष्टता और बिगाड़, जो आत्मा के सब भागों में फैली हुई है, जो पहले हमें परमेश्वर के क्रोध का पात्र बनाती है, और फिर हम में वे कर्म उत्पन्न करती है जिन्हें पवित्रशास्त्र में शरीर के कर्म कहा गया है। इस भ्रष्टता को पौलुस बार-बार पाप शब्द से सूचित करता है145 (गलातियों 5:19); जबकि उससे निकलनेवाले कर्मों को, जैसे व्यभिचार, कामुकता, चोरी, घृणा, हत्या, रंगरलियाँ, वह उसी प्रकार पाप के फल कहता है, यद्यपि पवित्रशास्त्र के अनेक स्थलों में, और स्वयं पौलुस द्वारा भी, वे पाप भी कहलाते हैं। इसलिए दो बातों को भली-भाँति अलग देखना चाहिए—अर्थात् यह कि हमारे स्वभाव के सब भागों में इस प्रकार बिगड़े और भ्रष्ट होने के कारण ही, केवल इसी भ्रष्टता के लिए, हम परमेश्वर द्वारा उचित रूप से दोषी ठहराए जाते हैं, जिसे धार्मिकता, निर्दोषता और पवित्रता के सिवा कुछ स्वीकार्य नहीं। यह किसी दूसरे के दोष का दायित्व नहीं है। क्योंकि जब कहा जाता है कि आदम के पाप ने हमें परमेश्वर के न्याय के अधीन कर दिया, तो अर्थ यह नहीं कि हम, जो अपने आप में निर्दोष और निष्कलंक हैं, उसका दोष उठा रहे हैं, वरन् यह कि चूँकि उसके अपराध से हम सब श्राप के अधीन आ गए, इसलिए कहा जाता है कि उसने हमें बाध्य किया।146 परन्तु उसी के द्वारा न केवल दण्ड मिला, वरन् अशुद्धता भी उँडेली गई, जिसके लिए दण्ड उचित रूप से देय है। इसलिए अगस्तीन, यद्यपि वह इसे प्रायः दूसरे का पाप कहता है (ताकि और स्पष्ट दिखाए कि यह हम तक वंश से कैसे पहुँचता है), साथ ही यह भी दृढ़ता से कहता है कि यह हर एक का अपना पाप है।147 और प्रेरित अत्यन्त स्पष्ट गवाही देता है कि “मृत्यु सब मनुष्यों में फैल गई, क्योंकि सब ने पाप किया” (रोमियों 5:12); अर्थात् वे मूल पाप में फँसे और उसके दाग से अशुद्ध हैं। इसलिए शिशु भी, अपनी माता के गर्भ से अपना दण्ड साथ लाकर, दूसरे के नहीं, वरन् अपने ही दोष के कारण दुःख उठाते हैं। क्योंकि यद्यपि उन्होंने अभी अपने अधर्म के फल उत्पन्न नहीं किए, फिर भी उनमें बीज बोया हुआ है। वरन् उनका सारा स्वभाव मानो पाप की क्यारी है, और इसलिए परमेश्वर के लिए घृणित और घिनौना हुए बिना नहीं रह सकता। इससे निकलता है कि परमेश्वर की दृष्टि में उसे उचित रूप से पापमय माना जाता है; क्योंकि दोष के बिना दण्ड की आज्ञा नहीं हो सकती। फिर दूसरी बात आती है—अर्थात् यह कि हम में यह विकृति कभी थमती नहीं, वरन् निरन्तर नए फल उत्पन्न करती है, अर्थात् शरीर के वे कर्म जिनका वर्णन हम पहले कर चुके हैं; जैसे जलती भट्ठी चिंगारियाँ और लपटें छोड़ती है, या सोता बिना रुके जल उँडेलता रहता है। इसलिए जिन्होंने मूल पाप को उस आदि धार्मिकता का अभाव बताया जो हम में होनी चाहिए थी, उन्होंने यद्यपि सारी बात का सार समेट लिया, फिर भी उसकी शक्ति और सक्रियता को पर्याप्त रूप से प्रकट नहीं किया। क्योंकि हमारा स्वभाव न केवल भलाई से सर्वथा रिक्त है, वरन् सब प्रकार की बुराई में इतना उर्वर है कि वह कभी निष्क्रिय नहीं रह सकता। जो इसे वासना कहते हैं वे अनुचित नहीं कहते, बशर्ते यह भी जोड़ा जाए (जिसे, तथापि, बहुत से किसी प्रकार नहीं मानेंगे) कि मनुष्य में जो कुछ है, बुद्धि से लेकर इच्छा तक, आत्मा से लेकर शरीर तक, सब इस वासना से अशुद्ध और व्याप्त है; या, संक्षेप में कहें, कि सारा मनुष्य अपने आप में वासना के सिवा और कुछ नहीं।

143 फ्रेंच में है, “Les enfans ne descendent point de la generation spirituelle qui les serviteurs de Diu ont du S. Esprit, mais de la generation charnelle qu’ils ont d’Adam.” सन्तान उस आत्मिक वंश से नहीं उतरती जो परमेश्वर के सेवकों को पवित्र आत्मा से मिलता है, वरन् उस शारीरिक वंश से जो उन्हें आदम से मिलता है।

144 देखिए Lib. contra Pelag. Cœlest.; तथा यह भी देखिए: पत्र 157 (Ep. 157, ad Gregor.), और पुस्तक 7 का पत्र 53 (Lib. 7. Ep. 53)।

145 फ्रेंच में जोड़ा गया है, “Sans adjouster Originel:”—“मूल” जोड़े बिना।

146 फ्रेंच में है, “Car en ce qui est d’t, que par Adam nous sommes fait redevables au jugement de Dieu, ce ne’st pas a dire que nous soyons innocens, et que sans avoir merité aucune peine nous portions la folleenchere de son peché: mais pourceque par sa transgression nous sommes tous enveloppés de confusion, il est dit nous avoir tous obligez.” अर्थात्, जब कहा जाता है कि आदम के द्वारा हम परमेश्वर के न्याय के अधीन किए गए हैं, तो अर्थ यह नहीं कि हम निर्दोष हैं और बिना किसी दण्ड के योग्य हुए उसके पाप का भारी मूल्य चुका रहे हैं, वरन् इसलिए कि उसके अपराध से हम सब लज्जा में लिपट गए हैं, कहा जाता है कि उसने हम सब को बाध्य किया।

9. इसलिए मैंने कहा है कि जब से आदम धार्मिकता के स्रोत से विमुख हुआ, तब से आत्मा के सब भागों पर पाप का अधिकार हो गया। क्योंकि न केवल निम्न अभिलाषाओं ने उसे फुसलाया, वरन् घिनौनी अभक्ति ने मन के गढ़ ही पर अधिकार कर लिया, और अभिमान उसके अन्तःकरण की गहराई तक पैठ गया (रोमियों 7:12; पुस्तक 4, अध्याय 15, खण्ड 10–12), इसलिए उससे निकलनेवाली भ्रष्टता को केवल उन गतियों तक सीमित करना, जिन्हें इन्द्रिय-गतियाँ कहा जाता है, या उसे एक ऐसी उत्तेजना कहना जो उस एकमात्र भाग को, जिसे वे इन्द्रियपरता कहते हैं, फुसलाती, उकसाती और पाप में घसीटती है, मूर्खतापूर्ण और निरर्थक है। यहाँ पीटर लोम्बार्ड ने घोर अज्ञान दिखाया है (Lomb., lib. 2 Dist. 31)। भ्रष्टता का निवास खोजते हुए वह कहता है कि वह शरीर में है (जैसा पौलुस कहता है), ठीक अर्थ में नहीं, वरन् इसलिए कि वह शरीर में अधिक प्रकट है। मानो पौलुस का आशय यह था कि आत्मा का केवल एक भाग ही अलौकिक अनुग्रह का विरोधी है, सारा स्वभाव नहीं। पौलुस स्वयं सन्देह की गुंजाइश नहीं छोड़ता, जब वह कहता है कि भ्रष्टता केवल एक भाग में नहीं बसती, वरन् कोई भाग उसके घातक दाग से मुक्त नहीं। क्योंकि भ्रष्ट स्वभाव की चर्चा करते हुए वह न केवल अभिलाषाओं की अनुचित प्रकृति की निन्दा करता है, वरन् विशेष रूप से घोषित करता है कि बुद्धि अन्धेपन के और हृदय भ्रष्टता के अधीन है (इफिसियों 4:17, 18)। रोमियों की पत्री का तीसरा अध्याय मूल पाप के वर्णन के सिवा कुछ नहीं है; यही बात नवीनीकरण की रीति से और भी स्पष्ट दिखती है। क्योंकि आत्मा, जिसकी तुलना पुराने मनुष्यत्व और शरीर से की जाती है, न केवल उस अनुग्रह को सूचित करती है जिससे आत्मा के इन्द्रिय-सम्बन्धी या निम्न भाग को सुधारा जाता है, वरन् उसके सब भागों के पूर्ण सुधार को भी समेटती है (इफिसियों 4:23)। और इसलिए पौलुस न केवल यह आज्ञा देता है कि मोटी अभिलाषाएँ दबाई जाएँ, वरन् यह भी कि हम अपने मन के आत्मा में नए बनाए जाएँ (इफिसियों 4:23), जैसा वह अन्यत्र कहता है कि अपने मन के नए हो जाने से तुम्हारा रूप बदलता जाए (रोमियों 12:2)। इससे निकलता है कि आत्मा का वह भाग, जिसमें उसकी गरिमा और श्रेष्ठता सबसे प्रकट है, न केवल घायल हुआ, वरन् इतना भ्रष्ट हुआ कि केवल उपचार पर्याप्त नहीं। एक नया स्वभाव होना चाहिए। पाप ने मन और हृदय, दोनों को कहाँ तक जकड़ा है, यह हम शीघ्र देखेंगे। यहाँ मैं केवल संक्षेप में यह बताना चाहता था कि सारा मनुष्य, सिर की चोटी से पाँव के तलवे तक, मानो ऐसा जलमग्न है कि कोई भाग पाप से मुक्त नहीं रहा, और इसलिए उससे निकलने वाली हर बात पाप गिनी जाती है। इसी प्रकार पौलुस कहता है कि सब शारीरिक विचार और भावनाएँ परमेश्वर से बैर हैं, और इसलिए मृत्यु हैं (रोमियों 8:7)।
147 अनेक स्थलों में, और विशेषकर उसके ग्रन्थ De Peccatorum Merit. et Remiss Lib. 3 cap. 8 में।

10. तो उन लोगों से हमारा कोई सम्बन्ध न रहे जो इसलिए अपनी बुराइयों पर परमेश्वर का नाम लिखने का साहस करते हैं कि हम कहते हैं कि मनुष्य दुष्ट पैदा होते हैं। जिस ईश्वरीय कारीगरी को उन्हें आदम के स्वभाव में, जब वह अभी सम्पूर्ण और अभ्रष्ट था, खोजना चाहिए, उसे वे बेतुके ढंग से अपनी भ्रष्टता में पाने की आशा करते हैं। हमारे विनाश का दोष हमारी अपनी शारीरिकता पर है, परमेश्वर पर नहीं, जिसका एकमात्र कारण हमारी आदि दशा से हमारा गिर जाना है। और यहाँ कोई यह शोर न मचाए कि परमेश्वर आदम के पतन को रोककर हमारे उद्धार का बेहतर प्रबन्ध कर सकता था। यह आपत्ति, जो अपने भीतर की दुस्साहसी धृष्टता के कारण हर भक्त मन को घृणित लगती है, पूर्वनियति के भेद से सम्बन्ध रखती है, जिस पर आगे उसके उचित स्थान में विचार किया जाएगा (Tertull. de Præscript., Calvin, Lib. de Predest)। इस बीच हम स्मरण रखें कि हमारा विनाश हमारी अपनी भ्रष्टता के कारण है, ताकि हम स्वयं परमेश्वर पर, जो प्रकृति का रचयिता है, दोष लगाने का संकेत भी न दें। यह सच है कि स्वभाव ने मर्मभेदी घाव पाया है, परन्तु बाहर से लगे घाव और हमारी आदि दशा में निहित घाव में बड़ा अन्तर है। स्पष्ट है कि यह घाव पाप से लगा; और इसलिए हमारे पास अपने सिवा किसी और के विरुद्ध शिकायत का कोई आधार नहीं। पवित्रशास्त्र में यह सावधानी से सिखाया गया है। क्योंकि उपदेशक कहता है, “देखो, मैंने केवल यह पाया है कि परमेश्वर ने मनुष्य को सीधा बनाया, परन्तु उन्होंने बहुत सी युक्तियाँ निकाली हैं” (सभोपदेशक 7:29)। चूँकि मनुष्य परमेश्वर की कृपा से सीधा बनाया गया, पर अपनी ही मूर्खता से व्यर्थता की ओर गिर गया, इसलिए उसके विनाश का दोष स्पष्टतः केवल उसी का है (Athanas. in Orat. Cont. Idola)।

11. तो हम कहते हैं कि मनुष्य स्वाभाविक दुष्टता से भ्रष्ट है, परन्तु ऐसी दुष्टता से नहीं जो प्रकृति से निकली हो। यह कहने में कि वह प्रकृति से नहीं निकली, हमारा अर्थ यह है कि वह मनुष्य पर आ पड़ी बाहरी घटना थी, न कि आरम्भ से उसे सौंपा गया कोई सारभूत गुण।148 तथापि हम उसे स्वाभाविक इसलिए कहते हैं कि कोई यह न समझे कि हर व्यक्ति उसे बुरी आदत से अर्जित करता है, जबकि सब उसे वंशागत नियम से पाते हैं। और ऐसा कहने का हमारे पास अधिकार भी है। क्योंकि इन्हीं आधारों पर प्रेरित कहता है कि हम “स्वभाव ही से क्रोध की सन्तान” हैं (इफिसियों 2:3)। परमेश्वर, जो अपनी तुच्छतम रचनाओं में भी प्रसन्न रहता है, उन सब में श्रेष्ठतम से कैसे अप्रसन्न हो सकता था? अप्रसन्नता रचना से नहीं, वरन् रचना की भ्रष्टता से है। इसलिए यदि यह कहना अनुचित नहीं कि मानव स्वभाव की भ्रष्टता के कारण मनुष्य स्वभाव से परमेश्वर के लिए घृणित है, तो यह कहना भी अनुचित नहीं कि वह स्वभाव से दुष्ट और भ्रष्ट है। इसलिए हमारे भ्रष्ट स्वभाव को देखते हुए, अगस्तीन उन पापों को स्वाभाविक कहने में नहीं हिचकता जो जहाँ कहीं परमेश्वर का अनुग्रह नहीं, वहाँ शरीर में अनिवार्य रूप से राज्य करते हैं। इससे मानीवादियों की उस बेतुकी धारणा का निराकरण होता है, जिन्होंने यह कल्पना करके कि मनुष्य सारतः दुष्ट है, उसके लिए एक भिन्न सृष्टिकर्ता ठहराने तक की हद कर दी, ताकि वे बुराई का कारण और उत्पत्ति एक धर्मी परमेश्वर पर आरोपित करने के आभास से बच जाएँ।
148 फ्रेंच में है, “Nous nions qu’elle soit de nature, afin de monstrer que c’est plutot une qualité survenue ˆ l’homme qu’une proprieté de sa substance, laquelle ait eté dés le commencement enracinée en lui;”—हम इनकार करते हैं कि वह प्रकृति से है, यह दिखाने के लिए कि वह मनुष्य पर ऊपर से जुड़ी हुई विशेषता है, न कि उसके सार का कोई गुण जो आरम्भ से उसमें जड़ पकड़े हुए हो।

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