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अध्यायों की सामान्य सूची
पहली पुस्तक।
सृष्टिकर्ता परमेश्वर के ज्ञान के विषय में।
अठारह अध्याय
1. परमेश्वर के ज्ञान और अपने ज्ञान का परस्पर सम्बन्ध। उस सम्बन्ध का स्वरूप।
2. परमेश्वर को जानना क्या है। इस ज्ञान की प्रवृत्ति।
3. मानव मन स्वभावतः परमेश्वर के ज्ञान से भरा है।
4. यह ज्ञान अज्ञानता या बैर के कारण दबा या बिगाड़ दिया गया है।
5. परमेश्वर का ज्ञान ब्रह्माण्ड की रचना और निरन्तर शासन में प्रकट हुआ है।
6. सृष्टिकर्ता के रूप में परमेश्वर तक पहुँचने में मार्गदर्शक और शिक्षक के रूप में पवित्रशास्त्र की आवश्यकता।
7. पवित्रशास्त्र को पूरा अधिकार देने के लिए आत्मा की गवाही आवश्यक है। यह दावा करना अधर्म है कि पवित्रशास्त्र की विश्वसनीयता कलीसिया के निर्णय पर टिकी है।
8. जहाँ तक स्वाभाविक बुद्धि मानती है, पवित्रशास्त्र की विश्वसनीयता पर्याप्त रूप से प्रमाणित की गई है।
9. उन उन्मादियों द्वारा, जो पवित्रशास्त्र के स्थान पर प्रकाशनों को रखते हैं, भक्ति के सब सिद्धान्त उलट दिए गए हैं।
10. पवित्रशास्त्र में सच्चा परमेश्वर अन्यजातियों के सब देवताओं के विरुद्ध अनन्य रूप से खड़ा किया गया है।
11. परमेश्वर को दृश्य आकार देना अधर्म है। मूर्तियाँ खड़ी करना सच्चे परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह है।
12. परमेश्वर को मूर्तियों से अलग किया गया है, ताकि वही उपासना का एकमात्र पात्र ठहरे।
13. जगत की नींव से ही पवित्रशास्त्र में सिखाई गई तीन व्यक्तियों में ईश्वरीय सार की एकता।
14. जगत और उसकी सब वस्तुओं की सृष्टि में सच्चा परमेश्वर कुछ चिह्नों के द्वारा कल्पित देवताओं से अलग किया गया है।
15. वह दशा जिसमें मनुष्य सृजा गया। आत्मा की क्षमताएँ—परमेश्वर का स्वरूप—स्वतंत्र इच्छा—आदि धार्मिकता।
16. परमेश्वर का सृजा हुआ जगत अब भी उसके द्वारा पोसा और सुरक्षित रखा जाता है। इसका एक-एक और सब अंग 32 उसके विधान से शासित है।
17. इस शिक्षा का उपयोग कैसे किया जाए।
18. परमेश्वर दुष्टों के साधन को काम में लाता है, फिर भी हर दाग से मुक्त रहता है।
दूसरी पुस्तक
मसीह में छुड़ानेवाले परमेश्वर के ज्ञान के विषय में—जैसा वह पहले पूर्वजों पर व्यवस्था के अधीन,
और फिर हम पर सुसमाचार के अधीन प्रकट हुआ
सत्रह अध्याय
1. आदम के पतन और विद्रोह के द्वारा सारी मानव जाति श्रापित और भ्रष्ट हो गई। मूल पाप के विषय में।
2. मनुष्य अब स्वतंत्र इच्छा से वंचित और दयनीय रूप से दास है।
3. मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निकला हर कार्य दण्ड के योग्य है।
4. परमेश्वर मनुष्यों के हृदयों में कैसे कार्य करता है।
5. स्वतंत्र इच्छा के समर्थन में प्रायः दिए जानेवाले तर्कों का खण्डन।
6. खोए हुए मनुष्य के लिए छुटकारा मसीह में ढूँढ़ना चाहिए।
7. व्यवस्था इसलिए नहीं दी गई कि किसी जाति को अपने लिए रखे, वरन् इसलिए कि मसीह के आगमन तक उसमें उद्धार की आशा को जीवित रखे।
8. नैतिक व्यवस्था की व्याख्या।
9. मसीह यहूदियों को व्यवस्था के अधीन ज्ञात तो था, परन्तु सुसमाचार के अधीन ही प्रकट हुआ।
10. पुराने और नए नियम की समानता।
11. दोनों नियमों का भेद।
12. मध्यस्थ का पद निभाने के लिए मसीह का मनुष्य बनना आवश्यक था।
13. मसीह ने मानव स्वभाव का सच्चा तत्त्व धारण किया।
14. दो स्वभाव मध्यस्थ का व्यक्तित्व कैसे बनाते हैं।
15. मसीह में मुख्यतः तीन बातों पर ध्यान देना है—अर्थात् उसके नबी, राजा और याजक के पद।
16. हमारा उद्धार प्राप्त कराने में मसीह ने छुड़ानेवाले का पद कैसे निभाया। मसीह की मृत्यु, पुनरुत्थान और स्वर्गारोहण।
17. यह कहना उचित और यथार्थ है कि मसीह ने हमारे लिए अनुग्रह और उद्धार कमाया।
तीसरी पुस्तक
मसीह का अनुग्रह पाने की रीति।
वह जो लाभ देता है, और उससे उत्पन्न होनेवाले प्रभाव।
पच्चीस अध्याय
1. आत्मा के गुप्त कार्य के द्वारा मसीह के लाभ हमें उपलब्ध कराए जाते हैं।
2. विश्वास के विषय में। उसकी परिभाषा। उसके विशिष्ट गुण।
3. विश्वास के द्वारा नया जन्म। पश्चाताप के विषय में।
4. विद्वत्तावादियों की छलभरी शब्दावली में समझाया गया पश्चाताप, सुसमाचार द्वारा माँगी गई शुद्धता से बहुत भिन्न है। पाप-स्वीकार और प्रायश्चित्त के विषय में।
5. प्रायश्चित्तों की पूर्ति के साधनों के विषय में—अर्थात् क्षमा-पत्र और शोधन-स्थान (पर्गेटरी)।
6. मसीही मनुष्य का जीवन। इसके लिए प्रेरित करनेवाले पवित्रशास्त्रीय तर्क।
7. मसीही जीवन का सारांश। आत्म-त्याग के विषय में।
8. क्रूस उठाने के विषय में—आत्म-त्याग की एक शाखा।
9. आनेवाले जीवन पर मनन के विषय में।
10. वर्तमान जीवन और उसके सुखों का उपयोग कैसे करें।
11. विश्वास से धर्मी ठहराए जाने के विषय में। नाम और वास्तविकता दोनों की परिभाषा।
12. मुफ़्त धर्मी ठहराए जाने की शिक्षा के प्रति गम्भीरता से आश्वस्त होने के लिए परमेश्वर के न्याय-आसन पर विचार करने की आवश्यकता।
13. मुफ़्त धर्मी ठहराए जाने में ध्यान देने योग्य दो बातें।
14. धर्मी ठहराए जाने का आरम्भ। किस अर्थ में वह क्रमिक है।
15. कर्मों का बखाना गया पुण्य परमेश्वर की महिमा को—जो धार्मिकता प्रदान करने में है—और उद्धार की निश्चितता को, दोनों को नष्ट करता है।
16. उन निन्दाओं का खण्डन जिनसे इस शिक्षा को बदनाम करने का प्रयत्न किया जाता है।
17. व्यवस्था और सुसमाचार की प्रतिज्ञाओं का मेल।
18. पुरस्कारों से कर्मों की धार्मिकता का अनुचित अनुमान।
19. मसीही स्वतंत्रता के विषय में।
20. प्रार्थना के विषय में—विश्वास का निरन्तर अभ्यास। इससे प्रतिदिन मिलनेवाले लाभ।
21. उस अनन्त चुनाव के विषय में जिसके द्वारा परमेश्वर ने कुछ को उद्धार के लिए और कुछ को विनाश के लिए पहले से ठहराया।
22. यह शिक्षा पवित्रशास्त्र के प्रमाणों से पुष्ट की गई।
23. उन निन्दाओं का खण्डन जिनसे इस शिक्षा पर सदा अन्यायपूर्वक आक्रमण किया जाता है।
24. चुनाव परमेश्वर की बुलाहट से पुष्ट होता है। त्यागे गए लोग अपने ऊपर वह धर्मी विनाश स्वयं लाते हैं जो उनके लिए ठहराया गया है।
34 25. अन्तिम पुनरुत्थान के विषय में।
चौथी पुस्तक
उन बाहरी साधनों या सहायताओं के विषय में जिनके द्वारा परमेश्वर हमें मसीह की सहभागिता में खींचता और उसमें हमें बनाए रखता है।
बीस अध्याय
1. सच्ची कलीसिया के विषय में। सब भक्तों की माता के रूप में उसके साथ एकता बढ़ाने का कर्तव्य।
2. झूठी कलीसिया और सच्ची कलीसिया की तुलना।
3. कलीसिया के शिक्षकों और सेवकों के विषय में। उनका चुनाव और पद।
4. आदिम कलीसिया की दशा, और पोप-पद से पहले प्रचलित शासन-विधि।
5. प्राचीन शासन-रूप पोप-पद के अत्याचार से पूरी तरह बिगाड़ दिया गया।
6. रोमी पीठ की प्रधानता के विषय में।
7. रोमी पोप-पद के आरम्भ और उत्थान के विषय में, जब तक वह उस ऊँचाई पर न पहुँच गया जिससे कलीसिया की स्वतंत्रता नष्ट हुई और सब सच्चा शासन उलट गया।
8. विश्वास के अनुच्छेदों में कलीसिया की शक्ति के विषय में। शिक्षा की शुद्धता को नष्ट करने में पोपीय कलीसिया की बेलगाम छूट।
9. सभाओं और उनके अधिकार के विषय में।
10. कानून बनाने की शक्ति के विषय में। इस विषय में आत्माओं को अत्याचार से कुचलने और नष्ट करने में पोप और उसके अनुयायियों की क्रूरता।
11. कलीसिया के न्याय-क्षेत्र और उसके दुरुपयोग के विषय में, जैसा पोप-पद में दिखाई देता है।
12. कलीसिया के अनुशासन के विषय में, और फटकार तथा बहिष्कार में उसका मुख्य उपयोग।
13. मन्नतों के विषय में। उतावली से मन्नत मानने से उत्पन्न दयनीय उलझनें।
14. संस्कारों के विषय में।
15. बपतिस्मा के विषय में।
16. शिशु बपतिस्मा। मसीह की ठहराई विधि और चिह्न के स्वभाव से उसकी संगति।
17. प्रभु-भोज के विषय में, और उससे मिलनेवाले लाभ।
18. पोपीय मिस्सा के विषय में। वह प्रभु-भोज को केवल अपवित्र ही नहीं करता, वरन् मिटा देता है।
19. झूठे नाम से कहे जानेवाले पाँच संस्कारों के विषय में। उनकी मिलावट प्रमाणित की गई और उनका सच्चा स्वरूप समझाया गया।
20. नागरिक शासन के विषय में।
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मसीही धर्म की संस्थाएँ
पहली पुस्तक।
सृष्टिकर्ता परमेश्वर के ज्ञान के विषय में
