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मसीही स्वतन्त्रता के विषय में
अध्याय 19।
मसीही स्वतन्त्रता के विषय में।
इस अध्याय के तीन विभाग हैं—I. मसीही स्वतन्त्रता के सिद्धान्त की आवश्यकता, खण्ड 1। इस स्वतन्त्रता के मुख्य अंगों की व्याख्या, खण्ड 2-8। II. एपिक्यूरियन और उन अन्य लोगों के विरुद्ध, जो दुर्बलों का कोई ध्यान नहीं रखते, इस स्वतन्त्रता का स्वरूप और प्रभाव, खण्ड 9 और 10। III. ठोकर देने और ठोकर खाने के विषय में। इस विषय पर एक लम्बी और अनावश्यक नहीं चर्चा, खण्ड 11-16।
खण्ड।
1. इस अध्याय का धर्मी ठहराए जाने सम्बन्धी पिछले अध्याय से सम्बन्ध। मसीही स्वतन्त्रता का सच्चा ज्ञान उपयोगी और आवश्यक है। 1. वह विवेक को शुद्ध करता है। 2. वह स्वच्छन्दता को रोकता है। 3. वह मसीह के गुणों, सुसमाचार की सच्चाई और आत्मा की शान्ति को बनाए रखता है।
2. इस स्वतन्त्रता के तीन अंग हैं। पहला, विश्वासी व्यवस्था की धार्मिकता को त्यागकर केवल मसीह की ओर देखते हैं। आपत्ति। उत्तर, जिसमें व्यावस्थिक और सुसमाचारीय धार्मिकता का भेद किया गया है।
3. यह पहला अंग गलातियों की पूरी पत्री से स्पष्ट रूप से प्रमाणित होता है।
4. मसीही स्वतन्त्रता का दूसरा अंग—अर्थात् यह कि विवेक, व्यवस्था के जूए से छूटकर, स्वेच्छा से परमेश्वर की इच्छा का पालन करता है। जब तक हम व्यवस्था के अधीन हैं, यह नहीं हो सकता। कारण।
5. जब हम व्यवस्था की कठोर माँगों से छूट जाते हैं, तब हम प्रसन्नता और बड़ी तत्परता से परमेश्वर की बुलाहट का उत्तर दे सकते हैं।
6. इस दूसरे अंग का एक प्रेरित से प्रमाण। इस स्वतन्त्रता का उद्देश्य।
457 फ्रांसीसी संस्करण में, “Mais touchant ce qu’ils semblent advis contrepoiser en une mesme balance les bonnes œuvres et les mauvaises, pour estimer la justice ou l’injustice de l’homme, en cela je suis contreint de leur repugner.”—परन्तु जहाँ तक वे भले और बुरे कर्मों को मनुष्य की धार्मिकता या अधार्मिकता का आकलन करने के लिए एक ही तराजू के विपरीत पलड़ों में रखने को तत्पर प्रतीत होते हैं, इसमें मैं उनसे असहमत होने को विवश हूँ।
7. स्वतन्त्रता का तीसरा अंग—अर्थात् तटस्थ बातों का स्वतन्त्र उपयोग। निराशा और अन्धविश्वास को दूर करने के लिए इस अंग का ज्ञान आवश्यक है। अन्धविश्वास का वर्णन।
8. इस तीसरे अंग का रोमियों की पत्री से प्रमाण। जो इसका पालन नहीं करते वे केवल बहाने बनाते हैं। 1. परमेश्वर को तुच्छ जाननेवाले। 2. निराश लोग। 3. कृतघ्न लोग। इस तीसरे अंग का उद्देश्य और क्षेत्र।
9. अध्याय का दूसरा भाग, जिसमें एपिक्यूरियनों के विरोध में मसीही स्वतन्त्रता का स्वरूप और प्रभाव दिखाया गया है। उनके स्वभाव का वर्णन। बहाना और दलील। तटस्थ बातों का उपयोग। दुरुपयोग का पर्दाफ़ाश। उसके सुधार की रीति।
10. उनके विरोध में इस स्वतन्त्रता की रक्षा जो दुर्बलों का कोई ध्यान नहीं रखते। इस वर्ग के लोगों की भूल का खण्डन। एक अत्यन्त हानिकारक भूल। आपत्ति। उत्तर।
11. मसीही स्वतन्त्रता के सिद्धान्त का ठोकरों के विषय पर प्रयोग। ये दो प्रकार की हैं। दी गई ठोकर। ली गई ठोकर। दी गई ठोकर, एक ऐसा विषय जिसे थोड़े ही लोग समझते हैं। फरीसी ठोकर, या ली गई ठोकर।
12. किन्हें दुर्बल और फरीसी समझना चाहिए। उदाहरणों और पौलुस की शिक्षा से प्रमाणित। मसीही स्वतन्त्रता का उचित संयम। उसकी रक्षा करने की आवश्यकता। कपटियों का कोई लिहाज़ नहीं करना है। अपने दुर्बल पड़ोसियों की उन्नति करने का कर्तव्य।
13. इस सिद्धान्त का तटस्थ बातों पर प्रयोग। जो बातें आवश्यक हैं उन्हें ठोकर के किसी भय से छोड़ना नहीं चाहिए।
14. मसीही स्वतन्त्रता सम्बन्धी भ्रमों का खण्डन। भक्तों के विवेक को तटस्थ विषयों में मनुष्यों की परम्पराओं से जकड़ा नहीं जाना चाहिए।
15. आत्मिक और नागरिक शासन में भेद करना चाहिए। इन्हें मिलाना नहीं चाहिए। मानवीय विधानों से विवेक कहाँ तक बँध सकता है। विवेक की परिभाषा। परिभाषा की प्रेरितीय लेखों के वचनों से व्याख्या।
16. विवेक का बाहरी आज्ञापालन से सम्बन्ध; पहला, भली और बुरी बातों में; दूसरा, तटस्थ बातों में।
1. अब हमें मसीही स्वतन्त्रता पर विचार करना है, जिसकी व्याख्या सुसमाचार के सिद्धान्त का संक्षिप्त सार देने की इच्छा रखनेवाले किसी भी व्यक्ति को निश्चय ही नहीं छोड़नी चाहिए। क्योंकि यह प्रथम आवश्यकता की बात है, ऐसी बात जिसके ज्ञान के बिना विवेक किसी भी काम को बिना हिचकिचाहट के करने का साहस मुश्किल से कर सकता है, बहुतों में वह अटकता और डगमगाता रहेगा, और सब में चंचलता और घबराहट के साथ आगे बढ़ेगा। विशेष रूप से, यह धर्मी ठहराए जाने का एक उचित परिशिष्ट है, और उसके बल को समझने में इसकी कुछ कम सहायता नहीं है। वरन् जो लोग सचमुच परमेश्वर का भय मानते हैं वे इससे उस सिद्धान्त के अतुलनीय लाभ को पहचानेंगे जिस पर दुष्ट ठट्ठा करनेवाले अपनी हँसी-ठट्ठों से निरन्तर आक्रमण करते रहते हैं; जिस मानसिक नशे में वे पड़े हैं वह उनकी उद्दण्डता को बेलगाम छोड़ देता है। इसलिए यही इस विषय पर विचार करने का उचित स्थान प्रतीत होता है। फिर, यद्यपि इसका उल्लेख पहले भी अवसर पर हो चुका है, इसके पूर्ण विचार को अब तक टालने में लाभ था, क्योंकि जैसे ही मसीही स्वतन्त्रता का कोई उल्लेख होता है, वासना उबलने लगती है, या उन्मत्त हलचलें उठ खड़ी होती हैं, यदि उन स्वच्छन्द आत्माओं पर, जिनके द्वारा उत्तम से उत्तम बातें निकृष्टतम बना दी जाती हैं, तुरन्त रोक न लगाई जाए। क्योंकि वे या तो इस स्वतन्त्रता के बहाने परमेश्वर की सारी आज्ञाकारिता को उतार फेंकते हैं और बेलगाम स्वच्छन्दता में फूट पड़ते हैं, या वे क्रोधित हो जाते हैं, यह सोचकर कि सारी पसन्द, व्यवस्था और संयम मिटा दिए गए हैं। जब हम इस प्रकार संकटों से घिरे हों तब क्या करें? क्या हम मसीही स्वतन्त्रता को विदा कर दें, ताकि ऐसे खतरनाक परिणामों का सारा अवसर ही काट दें? परन्तु जैसा हम कह चुके हैं, यदि यह विषय समझा न जाए तो न मसीह, न सुसमाचार की सच्चाई, न आत्मा की भीतरी शान्ति ही भली-भाँति जानी जाती है। इसके बजाय हमारा प्रयत्न यह होना चाहिए कि हम सिद्धान्त के इस अत्यन्त आवश्यक अंश को दबाए बिना उन बेतुकी आपत्तियों को दूर करें जो प्रायः इससे उठती हैं।
2. मुझे प्रतीत होता है कि मसीही स्वतन्त्रता के तीन अंग हैं। पहला, विश्वासियों के विवेक को, जब वे परमेश्वर के सामने अपने धर्मी ठहराए जाने की निश्चयता खोज रहे हों, व्यवस्था से ऊपर उठना चाहिए, और उसके द्वारा धर्मी ठहराए जाने की बात फिर न सोचनी चाहिए। क्योंकि जबकि व्यवस्था, जैसा पहले दिखाया जा चुका है (ऊपर, अध्याय 17, खण्ड 1), एक भी मनुष्य को धर्मी नहीं छोड़ती, तो या तो हम धर्मी ठहराए जाने की सारी आशा से बाहर कर दिए जाते हैं, या हमें व्यवस्था से छूटना होगा, और ऐसा छूटना कि कर्मों का कोई हिसाब ही न रहे। क्योंकि जो यह सोचता है कि धर्मी ठहराए जाने के लिए उसे कर्मों की कोई भी मात्रा लानी होगी, वह कोई सीमा या विधि निश्चित नहीं कर सकता, परन्तु अपने आप को पूरी व्यवस्था का देनदार बना लेता है। इसलिए धर्मी ठहराए जाने के विषय में हमें व्यवस्था के सारे उल्लेख और कर्मों की सारी धारणा को एक ओर रखकर केवल परमेश्वर की दया की शरण लेनी चाहिए; अपनी ओर से दृष्टि हटाकर हमें केवल मसीह की ओर देखना चाहिए। क्योंकि प्रश्न यह नहीं कि हम धर्मी कैसे हों, परन्तु यह कि अयोग्य और अधर्मी होते हुए भी हम धर्मी कैसे गिने जाएँ। यदि विवेक को इसकी कोई निश्चयता पानी है, तो उन्हें व्यवस्था को कोई स्थान नहीं देना चाहिए। फिर भी इससे यह उचित रूप से नहीं निकाला जा सकता कि विश्वासियों को व्यवस्था की आवश्यकता नहीं। वह उन्हें सिखाने, समझाने और भलाई के लिए उकसाने से नहीं रुकती, यद्यपि परमेश्वर के न्याय आसन के सामने उनके विवेक में उसकी मान्यता नहीं होती। ये दोनों बातें बहुत भिन्न हैं, और इन्हें भली-भाँति और ध्यान से अलग करना चाहिए। मसीहियों का सारा जीवन भक्ति की एक प्रकार की अभिलाषा होना चाहिए, क्योंकि वे पवित्रता के लिए बुलाए गए हैं (इफिसियों 1:4; 1 थिस्सलुनीकियों 4:5)। व्यवस्था का कार्य उन्हें उनके कर्तव्य का स्मरण दिलाकर शुद्धता और पवित्रता के अध्ययन के लिए उभारना है। परन्तु जब विवेक इस चिन्ता में हो कि परमेश्वर की कृपा कैसे प्राप्त हो, उसके न्याय आसन के सामने लाए जाने पर वह क्या उत्तर देगा, और कैसा भरोसा रखेगा, तब ऐसी स्थिति में व्यवस्था की माँगें सामने नहीं लानी चाहिए, परन्तु मसीह को, जो व्यवस्था की सारी सिद्धता से बढ़कर है, अकेला धार्मिकता के लिए प्रस्तुत करना चाहिए।
3. गलातियों की पत्री का लगभग पूरा विषय इसी पर टिका है; क्योंकि स्पष्ट वचनों से प्रमाणित किया जा सकता है कि वे व्याख्याकार बेतुके हैं जो सिखाते हैं कि पौलुस वहाँ केवल रीति-रिवाजों से स्वतन्त्रता के लिए तर्क करता है। इस प्रकार के वचन ये हैं: “मसीह ने जो हमारे लिए श्रापित बना, हमें मोल लेकर व्यवस्था के श्राप से छुड़ाया।” “इसलिए इस स्वतन्त्रता में, जिसके लिए मसीह ने हमें स्वतन्त्र किया है, स्थिर रहो, और दासत्व के जूए में फिर से न जुतो। देखो, मैं पौलुस तुम से कहता हूँ कि यदि तुम खतना कराओगे तो मसीह से तुम्हें कुछ लाभ न होगा। फिर मैं हर एक खतना करानेवाले को जता देता हूँ कि उसे सारी व्यवस्था माननी पड़ेगी। तुम जो व्यवस्था के द्वारा धर्मी ठहरना चाहते हो, मसीह से अलग हो गए; तुम अनुग्रह से गिर गए हो,” (गलातियों 3:13; 5:1-4)। ये शब्द निश्चय ही रीति-रिवाजों से स्वतन्त्रता से कहीं ऊँची बात की ओर संकेत करते हैं। मैं मानता हूँ कि पौलुस वहाँ रीति-रिवाजों की चर्चा करता है, क्योंकि वह झूठे प्रेरितों से जूझ रहा था, जो व्यवस्था की उन प्राचीन छायाओं को, जो मसीह के आगमन से समाप्त हो चुकी थीं, फिर से मसीही कलीसिया में लाने की चाल चल रहे थे। परन्तु इस प्रश्न पर चर्चा करते हुए उसके लिए ऊँची बातों को लाना आवश्यक था, जिन पर पूरा विवाद टिका है। पहला, क्योंकि सुसमाचार का तेज उन यहूदी छायाओं से धुँधला हो गया था, वह दिखाता है कि मसीह में हमें उन सब बातों का पूर्ण प्रकाशन मिला है जिनका मूसा के रीति-रिवाजों में पूर्वचित्रण था। दूसरा, क्योंकि उन छली लोगों ने लोगों के मन में यह अत्यन्त हानिकारक धारणा बैठा दी थी कि यह आज्ञाकारिता परमेश्वर का अनुग्रह पाने के लिए पर्याप्त पुण्य है, वह बड़े बल से कहता है कि विश्वासी यह न समझें कि वे किसी भी कर्म से, और उन तुच्छ पालनों से तो बिलकुल नहीं, परमेश्वर के सामने धर्मी ठहराए जा सकते हैं। साथ ही वह दिखाता है कि मसीह के क्रूस के द्वारा वे व्यवस्था के उस दण्ड से मुक्त हैं जिसके अधीन अन्यथा सब मनुष्य हैं, ताकि केवल मसीह में वे पूरी निश्चिन्तता से विश्राम पा सकें। यह तर्क वर्तमान विषय के लिए उपयुक्त है (गलातियों 4:5, 21, आदि)। अन्त में, वह विश्वासियों के विवेक की स्वतन्त्रता के अधिकार का दावा करता है, ऐसी स्वतन्त्रता जिसे आवश्यकता के बिना रोका नहीं जा सकता।
4. पहले अंग पर निर्भर एक और बात यह है कि विवेक व्यवस्था का पालन इस प्रकार नहीं करते मानो व्यावस्थिक आवश्यकता से विवश हों; परन्तु व्यवस्था के जूए से ही मुक्त होकर स्वेच्छा से परमेश्वर की इच्छा का पालन करते हैं। जब तक वे व्यवस्था के अधिकार में हैं, निरन्तर भय में रहते हैं, और जब तक उन्होंने पहले यह स्वतन्त्रता प्राप्त न कर ली हो, वे परमेश्वर की आज्ञा मानने को कभी तत्पर नहीं होते। हमारा अभिप्राय एक उदाहरण से अधिक संक्षेप में और स्पष्टता से समझाया जाएगा। व्यवस्था की आज्ञा है, “तू अपने परमेश्वर यहोवा से अपने सारे मन, और अपने सारे प्राण, और अपनी सारी शक्ति के साथ प्रेम रखना,” (व्यवस्थाविवरण 6:5)। इसे पूरा करने के लिए आत्मा को पहले हर दूसरे विचार और भावना से खाली होना होगा, हृदय अपनी सारी अभिलाषाओं से शुद्ध होना होगा, उसकी सारी शक्तियाँ इसी एक लक्ष्य पर एकत्र और एकाग्र होनी होंगी। जिन्होंने दूसरों की तुलना में प्रभु के मार्ग में बहुत उन्नति की है, वे भी इस लक्ष्य से अब भी बहुत दूर हैं। क्योंकि यद्यपि वे अपने मन से और हृदय के सच्चे स्नेह से परमेश्वर से प्रेम रखते हैं, फिर भी दोनों अब भी बहुत हद तक शरीर की अभिलाषाओं में उलझे हैं, जिनके कारण वे धीमे पड़ते हैं और तेज़ चाल से परमेश्वर की ओर बढ़ने से रोके जाते हैं। वे अवश्य बहुत प्रयत्न करते हैं, परन्तु शरीर कुछ तो उनका बल घटा देता है, और कुछ उन्हें अपने से बाँधे रखता है। जब वे अनुभव करते हैं कि व्यवस्था को पूरा करने से अधिक असमर्थ वे किसी बात में नहीं, तब वे क्या कर सकते हैं? वे चाहते हैं, अभिलाषा करते हैं, प्रयत्न करते हैं; परन्तु अपेक्षित सिद्धता से कुछ नहीं करते। यदि वे व्यवस्था की ओर देखें, तो देखते हैं कि जो भी काम वे करने का प्रयास या विचार करते हैं वह श्रापित है। और कोई यह निष्कर्ष निकालकर अपने आप को धोखा नहीं दे सकता कि काम केवल इसलिए कि वह अधूरा है, पूरी तरह बुरा नहीं है, और इसलिए उसमें जो भलाई है वह अब भी परमेश्वर को स्वीकार्य है। क्योंकि व्यवस्था सिद्ध प्रेम की माँग करती हुई हर अपूर्णता को दोषी ठहराती है, जब तक कि उसकी कठोरता को कम न किया जाए। इसलिए कोई भी मनुष्य अपने उस काम पर विचार करे जिसे वह आंशिक रूप से भला समझा जाना चाहता है, और वह पाएगा कि अपने अपूर्ण होने की इसी बात से वह व्यवस्था का उल्लंघन है।
5. देखो, यदि हमारे कर्मों को व्यवस्था के मानक पर परखा जाए तो वे व्यवस्था के श्राप के अधीन पड़े हैं। परन्तु अभागे प्राण उस काम में तत्परता से कैसे लग सकते हैं जिससे बदले में श्राप के सिवा कुछ पाने की आशा नहीं? दूसरी ओर, यदि वे इस कठोर माँग से, या कहें व्यवस्था की सारी कठोरता से छूटकर, सुनें कि परमेश्वर पितृ-तुल्य कोमलता से उन्हें बुला रहा है, तो वे प्रसन्नता और फुर्ती से उस बुलाहट का पालन करेंगे और उसके मार्गदर्शन पर चलेंगे। एक शब्द में, जो व्यवस्था के जूए से बँधे हैं वे उन सेवकों के समान हैं जिन्हें उनके स्वामी प्रतिदिन कुछ निश्चित कार्य सौंपते हैं। ऐसे सेवक समझते हैं कि कुछ भी नहीं किया गया; और जब तक परिश्रम की ठीक-ठीक मात्रा पूरी नहीं हो जाती वे अपने स्वामियों के सामने आने का साहस नहीं करते। परन्तु पुत्र, जिनके साथ उनके माता-पिता अधिक खुले और उदार ढंग से व्यवहार करते हैं, ऐसे कार्य भी, जो अभी आरम्भ ही हुए हैं या आधे ही पूरे हुए हैं, या जिनमें कोई दोष भी है, उन्हें भेंट करने में नहीं हिचकते, इस भरोसे से कि चाहे कार्य उतना ठीक न हुआ हो जितना चाहा गया था, उनकी आज्ञाकारिता और मन की तत्परता स्वीकार की जाएगी। हमारी भावना भी ऐसी ही होनी चाहिए, क्योंकि हमें निश्चय है कि हमारा अत्यन्त उदार पिता हमारी सेवाओं को, वे कितनी ही छोटी और कितनी ही अनगढ़ और अपूर्ण हों, स्वीकार करेगा। इसी प्रकार वह भविष्यद्वक्ता के द्वारा हमें घोषित करता है, “मैं उन पर ऐसी दया करूँगा जैसे कोई अपने सेवा करनेवाले पुत्र पर दया करता है,” (मलाकी 3:17); जहाँ दया करना शब्द का अर्थ स्पष्ट रूप से कृपा, या दोषों की अनदेखी है, जबकि साथ ही सेवा को स्मरण रखा जाता है। यह भरोसा कुछ कम आवश्यक नहीं, क्योंकि इसके बिना सब कुछ व्यर्थ ही किया जाएगा; क्योंकि परमेश्वर हमारे किसी काम को अपने लिए किया हुआ नहीं मानता जब तक वह सचमुच उसकी सेवा की इच्छा से न किया गया हो। परन्तु इन भयों के बीच यह कैसे हो सकता है, जब हम सन्देह में हैं कि हमारे काम से परमेश्वर अप्रसन्न होता है या उसकी सेवा होती है?
6. इसी कारण इब्रानियों की पत्री का लेखक उन सब भले कामों का श्रेय, जो पवित्र कुलपितरों के बताए गए हैं, विश्वास को देता है, और उन्हें केवल विश्वास के आधार पर आँकता है (इब्रानियों 11:2)। इस स्वतन्त्रता के विषय में रोमियों की पत्री में एक उल्लेखनीय वचन है, जहाँ पौलुस तर्क करता है, “तुम पर पाप की प्रभुता न होगी, क्योंकि तुम व्यवस्था के अधीन नहीं बल्कि अनुग्रह के अधीन हो,” (रोमियों 6:14)। क्योंकि विश्वासियों को यह समझाने के बाद, “इसलिए पाप को अपनी नश्वर देह में राज्य न करने दो कि तुम उसकी लालसाओं के अधीन रहो: और न अपने अंगों को अधर्म के हथियार होने के लिए पाप को सौंपो; परन्तु अपने आप को मरे हुओं में से जी उठे हुओं के समान परमेश्वर को सौंपो, और अपने अंगों को धार्मिकता के हथियार होने के लिए परमेश्वर को सौंपो;” वे यह आपत्ति कर सकते थे कि वे अब भी अपने साथ लालसाओं से भरी देह लिए फिरते हैं, कि पाप अब भी उनमें बसा है। इसलिए वह यह जोड़कर उन्हें सान्त्वना देता है कि वे व्यवस्था से छूटे हुए हैं; मानो उसने कहा हो, यद्यपि तुम अनुभव करते हो कि पाप अब तक बुझा नहीं है, और धार्मिकता स्पष्ट रूप से तुम में जीवित नहीं है, फिर भी तुम्हारे पास भय और निराशा का कोई कारण नहीं, मानो पाप के अवशेषों के कारण परमेश्वर सदा अप्रसन्न हो, क्योंकि अनुग्रह से तुम व्यवस्था से छूटे हुए हो, और तुम्हारे कामों को उसके मानक पर नहीं परखा जाता। फिर भी जो यह निष्कर्ष निकालते हैं कि वे पाप कर सकते हैं क्योंकि वे व्यवस्था के अधीन नहीं हैं, वे समझ लें कि उन्हें इस स्वतन्त्रता का कोई अधिकार नहीं, जिसका उद्देश्य हमें भले कामों में प्रोत्साहित करना है।
7. इस स्वतन्त्रता का तीसरा अंग यह है कि परमेश्वर के सामने हम बाहरी बातों के किसी भी पालन से बँधे नहीं हैं जो अपने आप में तटस्थ हैं, परन्तु अब हमें पूरी स्वतन्त्रता है कि उनका उपयोग करें या न करें। इस स्वतन्त्रता का ज्ञान हमारे लिए अत्यन्त आवश्यक है; जहाँ यह नहीं है वहाँ हमारे विवेक को चैन नहीं मिलेगा, अन्धविश्वास का कोई अन्त नहीं होगा। आज के दिन बहुत से लोग हमें इस प्रश्न को उठाने में बेतुका समझते हैं कि मांस स्वतन्त्रता से खाया जाए, वस्त्रों और पर्वों का स्वतन्त्र उपयोग हो, और ऐसी ही तुच्छ बातें, जैसा वे इन्हें समझते हैं; परन्तु ये उससे अधिक महत्त्व की हैं जितना सामान्यतः माना जाता है। क्योंकि जब एक बार विवेक जाल में उलझ जाता है, तो वह एक लम्बे और उलझे हुए भूलभुलैया में प्रवेश करता है, जिससे बाद में निकलना अत्यन्त कठिन होता है। जब कोई मनुष्य सन्देह करने लगता है कि चादरों, कमीज़ों, रुमालों और अँगोछों के लिए सन के कपड़े का उपयोग उसके लिए उचित है या नहीं, तो वह शीघ्र ही भांग के विषय में भी निश्चिन्त न रहेगा, और अन्त में सन के रेशे के विषय में भी सन्देह करेगा; क्योंकि वह मन में सोचेगा कि क्या वह बिना रुमाल के भोजन नहीं कर सकता, या अँगोछों के बिना काम नहीं चला सकता। यदि वह अधिक स्वादिष्ट भोजन को अनुचित समझे, तो बाद में मोटी रोटी और साधारण खाद्य पदार्थों का उपयोग करने में भी बेचैन होगा, क्योंकि वह सोचेगा कि उसका शरीर शायद और भी घटिया भोजन पर टिक सकता है। यदि वह अधिक अच्छी दाखमधु के विषय में हिचकिचाता है, तो घटिया से घटिया को भी शुद्ध विवेक से मुश्किल से पिएगा; अन्त में यदि पानी सामान्य से अधिक मीठा और शुद्ध हो तो उसे छूने का भी साहस न करेगा। सारांश यह कि वह इस निष्कर्ष पर पहुँचेगा कि अपने मार्ग में पड़े तिनके को रौंदना भी अपराध है। क्योंकि यहाँ जो विवाद आरम्भ होता है वह तुच्छ नहीं है, विवाद का बिन्दु यह है कि इस या उस वस्तु का उपयोग परमेश्वर की इच्छा के अनुसार है या नहीं, जिसे हमारे सब कामों और सम्मतियों में प्रथम स्थान मिलना चाहिए। यहाँ कुछ लोग निराशा से खाई में धकेल दिए जाएँगे, जबकि दूसरे, परमेश्वर को तुच्छ जानकर और उसका भय उतार फेंककर, बिना विनाश के अपने लिए मार्ग नहीं बना पाएँगे। जब मनुष्य ऐसे सन्देहों में उलझे हों, तब वे जिस ओर भी मुड़ें, जो कुछ वे देखते हैं वह उनके विवेक को ठेस पहुँचाएगा।
8. पौलुस कहता है, “मैं जानता हूँ, और प्रभु यीशु में मुझे निश्चय है कि कोई वस्तु अपने आप में अशुद्ध नहीं,” (अशुद्ध से अभिप्राय अपवित्र है); “परन्तु जो उसको अशुद्ध समझता है, उसके लिए वह अशुद्ध है,” (रोमियों 14:14)। इन शब्दों से वह सब बाहरी वस्तुओं को हमारी स्वतन्त्रता के अधीन कर देता है, बशर्ते उस स्वतन्त्रता का स्वरूप परमेश्वर के सामने हमारे मन को स्वीकार्य हो। परन्तु यदि कोई अन्धविश्वासी विचार शंकाएँ उठाए, तो जो वस्तुएँ अपने स्वभाव से शुद्ध थीं वे हमारे लिए दूषित हो जाती हैं। इसीलिए प्रेरित जोड़ता है, “धन्य है वह जो उस बात में, जिसे वह ठीक समझता है, अपने आप को दोषी नहीं ठहराता। परन्तु जो सन्देह करके खाता है वह दण्ड के योग्य ठहर चुका, क्योंकि वह विश्वास से नहीं खाता: और जो कुछ विश्वास से नहीं, वह पाप है,” (रोमियों 14:22, 23)। जब मनुष्य ऐसी कठिनाइयों के बीच अधिक निश्चिन्त होकर आगे बढ़ते हैं, और जो उन्हें अच्छा लगे उसे निडर होकर करते हैं, तो क्या वे उतने ही परमेश्वर से विद्रोह नहीं करते? जिनके हृदय पर परमेश्वर का कुछ भय गहराई से बैठा है, वे यदि अपने विवेक के विरुद्ध बहुत सी बातें करने को विवश किए जाएँ तो निराश और भय से भर जाते हैं। ऐसे सब लोग परमेश्वर के किसी भी दान को धन्यवाद के साथ ग्रहण नहीं करते, जिसके द्वारा ही, पौलुस घोषित करता है, सब वस्तुएँ हमारे उपयोग के लिए पवित्र ठहरती हैं (1 तीमुथियुस 4:5)। धन्यवाद से मेरा अभिप्राय वह है जो उस मन से निकलता है जो परमेश्वर के दानों में उसकी कृपा और भलाई को पहचानता है। क्योंकि बहुत से लोग वास्तव में समझते हैं कि जिन आशीषों का वे आनन्द ले रहे हैं वे परमेश्वर के दान हैं, और अपने शब्दों में परमेश्वर की स्तुति करते हैं; परन्तु इस बात के प्रति आश्वस्त न होने के कारण कि ये उन्हें दिए गए हैं, वे दाता के रूप में परमेश्वर को धन्यवाद कैसे दे सकते हैं? एक शब्द में, हम देखते हैं कि यह स्वतन्त्रता किस ओर ले जाती है—अर्थात् हमें परमेश्वर के दानों का उपयोग विवेक की किसी हिचकिचाहट के बिना, मन की किसी घबराहट के बिना, उसी उद्देश्य के लिए करना है जिसके लिए उसने उन्हें दिया: इस प्रकार हमारे प्राण उसके साथ शान्ति भी रख सकते हैं और हमारे प्रति उसकी उदारता को भी पहचान सकते हैं। क्योंकि यहाँ स्वतन्त्र पालन की सब रीतियाँ सम्मिलित हैं, ताकि जहाँ हमारे विवेक को उनके पालन की आवश्यकता में नहीं डालना है, वहाँ हमें यह भी स्मरण रखना है कि परमेश्वर की कृपा से उनका उपयोग उन्नति के काम में आता है।
9. फिर भी यह ध्यान से देखना चाहिए कि मसीही स्वतन्त्रता अपने सब अंगों में एक आत्मिक विषय है, जिसका सारा बल काँपते हुए विवेक को शान्ति देने में है, चाहे वे पापों की क्षमा के विषय में चिन्तित और बेचैन हों, या इस विषय में कि शरीर की दुर्बलताओं से दूषित उनके अपूर्ण काम परमेश्वर को भाते हैं या नहीं, या तटस्थ बातों के उपयोग के विषय में उलझन में हों। इसलिए उनके द्वारा इसकी विकृत व्याख्या की जाती है जो इसे अपनी वासनाओं का आवरण बनाते हैं, ताकि परमेश्वर के उत्तम दानों का स्वच्छन्द दुरुपयोग करें, या जो सोचते हैं कि कोई स्वतन्त्रता तब तक स्वतन्त्रता नहीं जब तक उसका प्रयोग मनुष्यों के सामने न किया जाए, और इसलिए इसका प्रयोग करते हुए अपने दुर्बल भाइयों का कुछ लिहाज़ नहीं करते। इस विषय में वर्तमान युग के पाप अधिक हैं। क्योंकि शायद ही कोई ऐसा हो जिसके साधन उसे ठाट-बाट से रहने देते हों और वह भोज, वस्त्र और अपने घर की विलासी भव्यता में आनन्द न लेता हो, जो हर प्रकार के स्वादिष्ट पदार्थों में अपने पड़ोसी से आगे निकलना न चाहता हो, और अपने वैभव पर अत्यधिक इतराता न हो। और ये सब बातें मसीही स्वतन्त्रता के बहाने से उचित ठहराई जाती हैं। वे कहते हैं कि ये तटस्थ बातें हैं: मैं मानता हूँ, बशर्ते उनका उपयोग तटस्थ भाव से किया जाए। परन्तु जब उनकी अत्यधिक उत्सुकता से लालसा की जाए, जब उन पर घमण्ड से डींग मारी जाए, जब उनमें विलासी बहुतायत से लिप्त हुआ जाए, तो वे बातें जो अन्यथा अपने आप में उचित थीं, निश्चय ही इन दोषों से दूषित हो जाती हैं। तटस्थ बातों के विषय में पौलुस एक सराहनीय भेद करता है: “शुद्ध लोगों के लिए सब वस्तुएँ शुद्ध हैं: पर अशुद्ध और अविश्वासियों के लिए कुछ भी शुद्ध नहीं; वरन् उनकी बुद्धि और विवेक दोनों अशुद्ध हैं” (तीतुस 1:15)। क्योंकि उन धनवानों पर हाय क्यों कही गई है जो अपनी शान्ति पा चुके हैं? (लूका 6:24), जो तृप्त हैं, जो अब हँसते हैं, जो “हाथीदाँत के पलंगों पर लेटते हैं और अपने बिछौनों पर पसरते हैं;” “घर से घर, और खेत से खेत जोड़ते हैं;” “और उनके भोजों में वीणा, सारंगी, डफ, बाँसुरी और दाखमधु होती है,” (आमोस 6:6; यशायाह 5:8, 10)। निश्चय ही हाथीदाँत, सोना और धन परमेश्वर की भली सृष्टि हैं, जो ईश्वरीय विधान से मनुष्य के उपयोग के लिए अनुमत, वरन् ठहराई गई हैं; और न कभी हँसना, या तृप्त होना, या पुरानी और पैतृक सम्पत्ति में नई जोड़ना, या संगीत से प्रसन्न होना, या दाखमधु पीना वर्जित किया गया। यह सच है, परन्तु जब साधन इसलिए जुटाए जाएँ कि विलासिता में लोटें-पोटें, मन और प्राण को वर्तमान सुख से मतवाला करें और सदा नए सुखों के पीछे पड़े रहें, तो यह परमेश्वर के दानों के उचित उपयोग से बहुत दूर है। इसलिए वे अनुचित लालसा, अनुचित बहुतायत, घमण्ड और अहंकार को दबाएँ, ताकि शुद्ध विवेक से परमेश्वर के दानों का शुद्धता से उपयोग कर सकें। जब उनका मन इस संयम की दशा में पहुँच जाएगा, तब वे उचित उपयोग को नियमित कर सकेंगे। दूसरी ओर, जब यह संयम न हो तो साधारण और मामूली स्वादिष्ट वस्तुएँ भी अति हैं। क्योंकि यह सच्ची कहावत है कि अहंकारी मन प्रायः मोटे और साधारण वस्त्रों में बसता है, जबकि सच्ची नम्रता महीन सन के वस्त्र और बैंगनी वस्त्र के नीचे छिपी रहती है। इसलिए हर एक अपनी अपनी स्थिति में रहे, चाहे गरीबी में, चाहे सामान्य दशा में, चाहे वैभव में; परन्तु सब स्मरण रखें कि जो भोजन परमेश्वर देता है वह जीवन के लिए है, विलासिता के लिए नहीं, और इसे मसीही स्वतन्त्रता की व्यवस्था मानें कि पौलुस के साथ यह सीखें कि जिस दशा में भी हों, “उसी में सन्तोष करें,” जानें “दीन होना भी और बढ़ना भी,” “तृप्त होना भी और भूखा रहना भी, बहुतायत में भी और घटी में भी रहना,” (फिलिप्पियों 4:11)।
10. बहुत से लोग इसमें भी भूल करते हैं: मानो उनकी स्वतन्त्रता तब तक सुरक्षित और पूर्ण नहीं जब तक उसके साक्षी मनुष्य न हों, वे उसका प्रयोग बिना भेद और बिना सोचे-समझे करते हैं, और इस प्रकार प्रायः दुर्बल भाइयों को ठोकर देते हैं। आज आप कुछ ऐसे लोगों को देख सकते हैं जो यह सोच ही नहीं सकते कि उनके पास स्वतन्त्रता है जब तक वे शुक्रवार को मांस खाकर उसे प्राप्त न करें। उनके खाने की मैं निन्दा नहीं करता, परन्तु यह झूठी धारणा उनके मन से निकालनी होगी: क्योंकि उन्हें सोचना चाहिए कि उनकी स्वतन्त्रता को मनुष्यों के देखने से कुछ नया लाभ नहीं मिलता, परन्तु उसका आनन्द परमेश्वर के सामने लेना है, और वह उपयोग करने में उतनी ही है जितनी परहेज़ करने में। यदि वे समझते हैं कि परमेश्वर की दृष्टि में इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता कि वे मांस खाएँ या अण्डे, लाल वस्त्र पहनें या काले, तो यही पर्याप्त से अधिक है। जिस विवेक को इस स्वतन्त्रता का लाभ मिलना था वह छूट गया। इसलिए चाहे वे बाद में जीवन भर मांस से परहेज़ करें और सदा एक ही रंग पहनें, वे कम स्वतन्त्र नहीं हैं। वरन् इसलिए कि वे स्वतन्त्र हैं, वे स्वतन्त्र विवेक से परहेज़ करते हैं। परन्तु वे बहुत बड़ी भूल करते हैं जब अपने भाइयों की दुर्बलता का कोई ध्यान नहीं रखते, जिसे सहना हमें शोभा देता है, ताकि हम उन्हें जल्दबाज़ी में ठोकर न दें। परन्तु458 कभी-कभी यह भी महत्त्व रखता है कि हम मनुष्यों के सामने अपनी स्वतन्त्रता का दावा करें। यह मैं मानता हूँ: फिर भी रीति में हमें बड़ी सावधानी बरतनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि हम उन दुर्बलों की चिन्ता छोड़ दें जिन्हें परमेश्वर ने विशेष रूप से हमारे सुपुर्द किया है।
458 फ्रांसीसी संस्करण में, “Mais quelcun dira”—परन्तु कोई कहेगा।
11. मैं यहाँ ठोकरों के विषय में कुछ बातें कहूँगा कि उनमें क्या भेद करने चाहिए, किस प्रकार की से बचना चाहिए और किसे अनदेखा करना चाहिए। इससे आगे हम निर्धारित कर सकेंगे कि मनुष्यों के बीच हमारी स्वतन्त्रता के लिए कितना क्षेत्र है। हमें वह सामान्य विभाजन पसन्द है, अर्थात् दी गई ठोकर और ली गई ठोकर, क्योंकि उसे पवित्रशास्त्र का स्पष्ट समर्थन प्राप्त है, और वह जो अभिप्रेत है उसे अनुचित रूप से व्यक्त नहीं करता। यदि असामयिक हल्केपन, या चंचलता, या उतावलेपन से आप कोई ऐसा काम करें जो क्रमहीन हो या अपने स्थान पर न हो, जिससे दुर्बल या अनजान लोग ठोकर खाएँ, तो कहा जा सकता है कि ठोकर आपके द्वारा दी गई, क्योंकि ठोकर का आधार आपके दोष में है। और सामान्यतः किसी भी बात में ठोकर दी गई कही जाती है जहाँ वह व्यक्ति दोषी है जिससे वह निकली। ठोकर ली गई तब कही जाती है जब कोई ऐसा काम, जो अन्यथा दुष्टता से या असामयिक रूप से नहीं किया गया, द्वेष या किसी बुरी भावना के कारण ठोकर का कारण बना लिया जाए। क्योंकि यहाँ ठोकर दी नहीं गई, परन्तु बुरी व्याख्या करनेवाले निरन्तर ठोकर खाते रहते हैं। पहली प्रकार से केवल दुर्बल, दूसरी से चिड़चिड़े और फरीसी स्वभाव के लोग ठोकर खाते हैं। इसलिए हम एक को दुर्बलों की ठोकर कहेंगे, दूसरी को फरीसियों की ठोकर, और हम अपनी स्वतन्त्रता के उपयोग को इस प्रकार संयमित करेंगे कि वह दुर्बल भाइयों की अज्ञानता के आगे झुके, परन्तु फरीसियों की कठोरता के आगे नहीं। दुर्बलता के प्रति जो कुछ देय है वह पौलुस ने बहुत से वचनों में पूरी तरह दिखाया है। “जो विश्वास में निर्बल है उसे अपनी संगति में ले लो।” फिर, “आओ, हम फिर एक दूसरे पर दोष न लगाएँ; पर तुम यह ठान लो कि कोई अपने भाई के सामने ठोकर या गिरने का कारण न रखे;” और उसी स्थान पर इसी आशय के और बहुत से वचन हैं, जिन्हें यहाँ उद्धृत करने के बजाय हम पाठक को वहीं देखने को कहते हैं। सार यह है, “हम बलवानों को चाहिए कि निर्बलों की निर्बलताओं को सहें, और अपने आप को प्रसन्न न करें। हम में से हर एक अपने पड़ोसी को उसकी भलाई के लिए, उन्नति के निमित्त प्रसन्न करे।” अन्यत्र वह कहता है, “सावधान रहो कि तुम्हारी यह स्वतन्त्रता कहीं निर्बलों के लिए ठोकर का कारण न बन जाए।” फिर, “जो कुछ कसाइयों की दुकान में बिकता है उसे विवेक के कारण बिना कुछ पूछे खाओ।” “विवेक, मैं कहता हूँ, तेरा अपना नहीं, परन्तु दूसरे का।” अन्त में, “न यहूदियों, न यूनानियों, न परमेश्वर की कलीसिया के लिए ठोकर का कारण बनो।” एक और स्थान पर भी, “हे भाइयो, तुम स्वतन्त्रता के लिए बुलाए गए हो, परन्तु केवल इतना ध्यान रखो कि यह स्वतन्त्रता शरीर के लिए अवसर न बने, वरन् प्रेम से एक दूसरे के दास बनो।”459 वास्तव में ऐसा ही है: हमारी स्वतन्त्रता हमारे दुर्बल पड़ोसियों के विरुद्ध नहीं दी गई, जिनकी सेवा प्रेम हमें सब बातों में करने की आज्ञा देता है, परन्तु इसलिए दी गई कि अपने मन में परमेश्वर के साथ शान्ति रखते हुए हम मनुष्यों के बीच शान्ति से रहें। फरीसियों की ठोकर का कितना मूल्य आँकना चाहिए, यह हम अपने प्रभु के उन शब्दों से सीखते हैं जिनमें वह कहता है, “उन्हें जाने दो: वे अन्धे मार्गदर्शक हैं और अन्धों के अगुवे हैं,” (मत्ती 15:14)। चेलों ने संकेत दिया था कि फरीसी उसकी बातों से ठोकर खाए हैं। वह उत्तर देता है कि उन्हें जाने दिया जाए, कि उनकी ठोकर पर ध्यान नहीं देना है।
12. जब तक हम यह न समझें कि दुर्बल कौन हैं और फरीसी कौन, तब तक विषय अनिश्चित रहता है: क्योंकि यदि यह भेद मिटा दिया जाए, तो मैं नहीं देखता कि ठोकरों के विषय में कोई भी स्वतन्त्रता निरन्तर बड़े से बड़े संकट में पड़े बिना कैसे बची रहेगी। परन्तु मुझे प्रतीत होता है कि पौलुस ने उदाहरण और शिक्षा दोनों से अत्यन्त स्पष्ट रूप से दिखाया है कि ठोकर की स्थिति में हमारी स्वतन्त्रता को कहाँ तक संयमित किया जाए या बनाए रखा जाए। जब वह तीमुथियुस को अपना साथी बनाता है, तो उसका खतना कराता है: कोई बात उसे तीतुस का खतना कराने के लिए प्रेरित नहीं कर सकती (प्रेरितों के काम 16:3; गलातियों 2:3)। कार्य भिन्न हैं, परन्तु उद्देश्य या अभिप्राय में कोई भिन्नता नहीं; तीमुथियुस का खतना कराने में, सब मनुष्यों से स्वतन्त्र होते हुए, उसने अपने आप को सब का दास बना लिया। वह इस प्रकार कहता है:
459 रोमियों 14:1, 13; 16:1; 1 कुरिन्थियों 8:9; 10:25, 29, 32; गलातियों 5:13।
“मैं यहूदियों के लिए यहूदी बना कि यहूदियों को खींच लाऊँ; जो व्यवस्था के अधीन हैं उनके लिए व्यवस्था के अधीन के समान बना, कि उन्हें जो व्यवस्था के अधीन हैं खींच लाऊँ; जो व्यवस्थारहित हैं उनके लिए व्यवस्थारहित के समान बना (परमेश्वर की ओर व्यवस्थारहित नहीं, परन्तु मसीह की व्यवस्था के अधीन), कि उन्हें जो व्यवस्थारहित हैं खींच लाऊँ। मैं निर्बलों के लिए निर्बल सा बना कि निर्बलों को खींच लाऊँ: मैं सब मनुष्यों के लिए सब कुछ बना हूँ कि किसी न किसी रीति से कुछ का उद्धार कराऊँ” (1 कुरिन्थियों 9:20-22)। यहाँ हमें स्वतन्त्रता का उचित संयम मिलता है, जब तटस्थ बातों में उसे कुछ लाभ के लिए रोका जा सकता है। तीतुस का खतना कराने का दृढ़ता से विरोध करने में उसका क्या उद्देश्य था, यह वह स्वयं इस प्रकार लिखकर साक्षी देता है: “परन्तु तीतुस भी, जो मेरे साथ था और यूनानी था, खतना कराने को विवश नहीं किया गया: और यह उन झूठे भाइयों के कारण हुआ जो चुपके से घुस आए थे, जो हमारी उस स्वतन्त्रता का, जो हमें मसीह यीशु में मिली है, भेद लेने को चोरी-छिपे आ गए थे, ताकि हमें दास बना लें: उनके आगे हम एक घड़ी भी अधीनता से न दबे, ताकि सुसमाचार की सच्चाई तुम में बनी रहे,” (गलातियों 2:3-5)। यहाँ हम अपनी स्वतन्त्रता की रक्षा करने की आवश्यकता देखते हैं, जब झूठे प्रेरितों की अन्यायपूर्ण माँगों से वह दुर्बल विवेक के साथ संकट में पड़ जाती है। सब बातों में हमें प्रेम का ध्यान रखना और अपने पड़ोसी की उन्नति की ओर देखना है। वह कहता है, “मेरे लिए सब वस्तुएँ उचित तो हैं, परन्तु सब वस्तुएँ लाभ की नहीं; मेरे लिए सब वस्तुएँ उचित हैं, परन्तु सब वस्तुओं से उन्नति नहीं होती। कोई अपनी ही भलाई को न ढूँढ़े, वरन् औरों की,” (1 कुरिन्थियों 10:23, 24)। इस नियम से अधिक स्पष्ट कुछ नहीं कि यदि स्वतन्त्रता का प्रयोग पड़ोसी की उन्नति के लिए है तो हमें उसका प्रयोग करना है, परन्तु यदि वह पड़ोसी के लिए हितकर नहीं तो हमें उससे परहेज़ करना है। कुछ लोग हैं जो स्वतन्त्रता से परहेज़ करके पौलुस की इस विवेकशीलता की नकल करने का दिखावा करते हैं, जबकि वे उसका उपयोग प्रेम के प्रयोजनों के लिए सब से कम करते हैं। अपनी सुविधा का ध्यान रखते हुए वे चाहेंगे कि स्वतन्त्रता का सारा उल्लेख दफ़ना दिया जाए, यद्यपि पड़ोसियों के हित और उन्नति के लिए स्वतन्त्रता का प्रयोग करना उनके लाभ के लिए कभी-कभी उसे संयमित करने से कम हितकर नहीं है। यह भक्त जन का काम है कि वह सोचे कि बाहरी बातों में जो स्वतन्त्र अधिकार उसे दिया गया है, वह इसलिए है कि वह प्रेम के सब कर्तव्यों में अधिक तत्पर हो।
13. ठोकरों से बचने के विषय में जो कुछ मैंने कहा है, उसे मैं तटस्थ बातों से सम्बन्धित समझा जाना चाहता हूँ।460 जो बातें करनी आवश्यक हैं उन्हें ठोकर के किसी भय से छोड़ा नहीं जा सकता। क्योंकि जैसे हमारी स्वतन्त्रता को प्रेम के अधीन होना है, वैसे ही प्रेम को अपनी बारी में विश्वास की शुद्धता के अधीन होना चाहिए। यहाँ भी प्रेम का ध्यान रखना है, परन्तु वह वेदी तक ही जाए; अर्थात् हमें अपने पड़ोसी के लिए परमेश्वर को अप्रसन्न नहीं करना है। हम उन लोगों की असंयमिता का समर्थन नहीं करते जो सब कुछ हड़बड़ी में करते हैं, और एक-एक कदम बढ़ने के बजाय एक ही बार में सारे बन्धनों को तोड़ देना पसन्द करेंगे। परन्तु उनकी भी नहीं सुननी चाहिए जो हज़ार प्रकार की भक्तिहीनता में अगुवाई करते हुए यह बहाना बनाते हैं कि वे पड़ोसी को ठोकर देने से बचने के लिए ऐसा करते हैं, मानो इस बीच वे अपने पड़ोसियों के विवेक को बुराई में प्रशिक्षित नहीं कर रहे, विशेषकर जब वे सदा उसी कीचड़ में अटके रहते हैं और निकलने की कोई आशा नहीं। जब किसी पड़ोसी को सिखाना हो, चाहे शिक्षा से, चाहे उदाहरण से, तब मीठी बातें बनानेवाले लोग कहते हैं कि उसे दूध पिलाना चाहिए, जबकि वे उसके मन में निकृष्टतम और अत्यन्त हानिकारक धारणाएँ बैठा रहे होते हैं। पौलुस कुरिन्थियों से कहता है, “मैं ने तुम्हें दूध पिलाया, अन्न नहीं,” (1 कुरिन्थियों 3:2); परन्तु यदि तब उनके बीच पोप का मिस्सा होता, तो क्या वह दूध पिलाने की रीतियों में से एक के रूप में बलिदान चढ़ाता? कदापि नहीं: दूध विष नहीं है। इसलिए यह कहना झूठ है कि वे उनका पोषण करते हैं जिन्हें वे सान्त्वना के दिखावे में निर्दयता से मार डालते हैं। परन्तु मान लें कि ऐसा छल कुछ समय के लिए प्रयोग किया जा सकता है, तो वे अपने शिष्यों को कब तक इस प्रकार का दूध पिलाते रहेंगे? यदि वे कभी इतने बड़े नहीं होते कि कम से कम कुछ हल्का भोजन सह सकें, तो निश्चय है कि वे कभी दूध पर पाले ही नहीं गए।461 दो कारण मुझे इन लोगों से अब और आगे विवाद करने से रोकते हैं, पहला, उनकी मूर्खताएँ खण्डन के योग्य भी मुश्किल से हैं, क्योंकि सब समझदार लोगों को उनसे घिन आनी चाहिए; और दूसरा, विशेष ग्रन्थों में उनका पहले ही भली-भाँति खण्डन कर चुका होने के कारण, मैं उसे फिर से करना नहीं चाहता।462 मेरे पाठक केवल इतना स्मरण रखें, पहला, कि शैतान और संसार हमें परमेश्वर की व्यवस्था से हटाने का प्रयास जिन भी ठोकरों के द्वारा करें, तब भी हमें उस मार्ग में जो उसने निर्धारित किया है, दृढ़ता से आगे बढ़ना है; और दूसरा, कि चाहे कैसे ही संकट मँडराएँ, हमें परमेश्वर की आज्ञा से एक नाखून भर भी हटने की स्वतन्त्रता नहीं है, कि किसी बहाने से उसके अनुमत कार्य के सिवा और कुछ करने का प्रयास करना उचित नहीं।
14. चूँकि हमारे वर्णित स्वतन्त्रता के इस विशेषाधिकार के द्वारा विश्वासियों ने मसीह से यह अधिकार पाया है कि वे उन बातों के पालन में न उलझें जिनमें वह उन्हें स्वतन्त्र रखना चाहता था, इसलिए हम निष्कर्ष निकालते हैं कि उनके विवेक सब मानवीय अधिकार से मुक्त हैं। क्योंकि यह शोभा न देगा कि मसीह की उदार देन के लिए जो कृतज्ञता देय है वह नष्ट हो जाए, या विश्वासियों के विवेक को उससे कोई लाभ न मिले। जब हम देखते हैं कि हमारे उद्धारकर्ता को इसकी कितनी कीमत चुकानी पड़ी, जो चाँदी या सोने से नहीं, परन्तु उसके अपने लहू से मोल ली गई (1 पतरस 1:18, 19), तो हम इसे तुच्छ बात न समझें; यहाँ तक कि पौलुस यह कहने में नहीं हिचकता कि यदि हम अपने प्राणों को मनुष्यों की अधीनता में रखें तो मसीह व्यर्थ मरा (गलातियों 5:1, 4; 1 कुरिन्थियों 7:23)। गलातियों की पत्री के कई अध्याय पूरी तरह यह दिखाने में लगे हैं कि मसीह हमारे लिए धुँधला हो जाता है, या कहें बुझ जाता है, यदि हमारे विवेक अपनी स्वतन्त्रता बनाए न रखें; जिससे वे निश्चय ही गिर चुके हैं, यदि उन्हें मनुष्यों की इच्छा से व्यवस्थाओं और विधानों की जंजीरों में बाँधा जा सके। परन्तु जैसे इस विषय का ज्ञान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है, वैसे ही यह एक लम्बी और अधिक स्पष्ट व्याख्या की माँग करता है। क्योंकि जैसे ही मानवीय विधानों के समाप्त किए जाने का उल्लेख होता है, बड़ी से बड़ी हलचलें उठाई जाती हैं, कुछ तो विद्रोहियों द्वारा, और कुछ निन्दकों द्वारा, मानो हर प्रकार की आज्ञाकारिता भी साथ ही समाप्त और उलट दी जाती हो।
15. इसलिए, ताकि यह किसी के लिए ठोकर का कारण न बने, हम ध्यान दें कि मनुष्य में शासन दो प्रकार का है: एक आत्मिक, जिसके द्वारा विवेक को भक्ति और ईश्वरीय आराधना में प्रशिक्षित किया जाता है; दूसरा नागरिक, जिसके द्वारा व्यक्ति को उन कर्तव्यों की शिक्षा दी जाती है जो मनुष्य और नागरिक होने के नाते हमें निभाने हैं (देखिए पुस्तक 4, अध्याय 10, खण्ड 3-6)। इन दोनों रूपों को सामान्यतः आत्मिक और सांसारिक अधिकार-क्षेत्र के अनुचित नहीं नाम दिए जाते हैं, जिनसे यह संकेत मिलता है कि पहले प्रकार का सम्बन्ध प्राण के जीवन से है, जबकि दूसरे का वर्तमान जीवन की बातों से, केवल भोजन और वस्त्र से नहीं, परन्तु उन विधानों के बनाने से भी जो मनुष्य से माँग करते हैं कि वह अपने संगियों के बीच शुद्ध रूप से सम्माननीय और शालीन जीवन बिताए। पहले का स्थान प्राण के भीतर है, दूसरा केवल बाहरी आचरण को नियमित करता है। हम एक को आत्मिक राज्य और दूसरे को नागरिक राज्य कह सकते हैं। अब ये दोनों, जैसे हमने इन्हें बाँटा है, सदा एक दूसरे से अलग देखे जाने चाहिए। जब एक पर विचार किया जाए, तो हमें अपने मन को दूसरे से हटा लेना चाहिए, और उसे दूसरे के विषय में सोचने नहीं देना चाहिए। क्योंकि मनुष्य में मानो दो संसार हैं, जिन पर भिन्न-भिन्न राजा और भिन्न-भिन्न विधान शासन कर सकते हैं। इस भेद पर ध्यान देने से हम आत्मिक स्वतन्त्रता के विषय में सुसमाचार की शिक्षा को नागरिक व्यवस्था में भूल से नहीं ले जाएँगे, मानो बाहरी शासन के विषय में मसीही मानवीय विधानों के कम अधीन हैं क्योंकि परमेश्वर के सामने उनके विवेक बन्धनमुक्त हैं, मानो वे सारी शारीरिक सेवा से मुक्त हैं क्योंकि आत्मा के विषय में वे स्वतन्त्र हैं। फिर, क्योंकि उन विधानों में भी जो आत्मिक राज्य से सम्बन्ध रखते प्रतीत होते हैं, कोई भ्रम हो सकता है, इसलिए आवश्यक है कि उनमें भेद किया जाए जिन्हें परमेश्वर के वचन के अनुकूल होने के कारण वैध माना जाना चाहिए, और दूसरी ओर उनमें जिन्हें भक्तों के बीच कोई स्थान नहीं होना चाहिए। नागरिक शासन के विषय में हमें अन्यत्र बोलने का अवसर मिलेगा (देखिए पुस्तक 4, अध्याय 20)। अभी के लिए, मैं कलीसियाई व्यवस्थाओं की चर्चा को भी टालता हूँ, क्योंकि उस विषय पर चौथी पुस्तक में, जब हम कलीसिया की सामर्थ्य पर विचार करेंगे, अधिक पूर्ण चर्चा होगी। इस प्रकार हम वर्तमान चर्चा को समाप्त करेंगे। प्रश्न, जैसा मैं कह चुका हूँ, स्वयं में बहुत अस्पष्ट या उलझा हुआ नहीं है, तो भी बहुतों के लिए कठिनाई उत्पन्न करता है, क्योंकि वे उसमें पर्याप्त सटीकता से भेद नहीं करते जिसे बाहरी अधिकार-क्षेत्र (forum) कहा जाता है, और विवेक का अधिकार-क्षेत्र। कठिनाई को जो बात बढ़ाती है वह यह है कि पौलुस हमें आज्ञा देता है कि हम हाकिम की आज्ञा मानें, “केवल क्रोध के डर से नहीं, वरन् विवेक के कारण भी,” (रोमियों 13:1, 5)। इससे यह निकलता है कि नागरिक विधान भी विवेक को बाँधते हैं। यदि ऐसा हो, तो जो हमने अभी कहा, और आत्मिक शासनों के विषय में जो अभी कहना है, वह गिर जाएगा। इस कठिनाई को हल करने के लिए पहली महत्त्वपूर्ण बात यह समझना है कि विवेक से क्या अभिप्राय है। परिभाषा शब्द की व्युत्पत्ति में खोजनी चाहिए। क्योंकि जैसे मनुष्य, जब वे मन और बुद्धि से वस्तुओं का ज्ञान ग्रहण करते हैं, तो जानना कहलाता है, और इसी से ज्ञान या विज्ञान (science) शब्द उत्पन्न हुआ है, वैसे ही जब उन्हें ईश्वरीय न्याय का बोध साक्षी के रूप में जुड़ा हुआ मिलता है, जो उन्हें अपने पाप छिपाने नहीं देता, परन्तु उन्हें अपराधी के रूप में परमेश्वर के न्यायालय के सामने घसीट लाता है, तो वह बोध विवेक कहलाता है। क्योंकि वह मानो परमेश्वर और मनुष्य के बीच खड़ा है, मनुष्य को वह दबाने नहीं देता जो वह अपने भीतर जानता है; परन्तु उसके पीछे-पीछे उसे दोषी ठहराए जाने तक चलता है। पौलुस का यही अभिप्राय है जब वह कहता है, “उनका विवेक भी गवाही देता है, और उनके विचार परस्पर या तो दोष लगाते हैं या उत्तर देते हैं,” (रोमियों 2:15)। साधारण ज्ञान मनुष्य में मानो बन्द पड़ा हो सकता है; इसलिए यह बोध, जो मनुष्य को परमेश्वर के न्यायालय के सामने खड़ा करता है, उस पर एक प्रकार के पहरेदार के रूप में नियुक्त है कि उसके सब रहस्यों को देखे और खोजे, ताकि कुछ भी अन्धकार में दबा न रह जाए। इसी से प्राचीन कहावत है, विवेक हज़ार साक्षी है। इसी कारण पतरस भी “भले विवेक के उत्तर” (1 पतरस 3:21) की बात करता है, मन की शान्ति के लिए; जब मसीह के अनुग्रह का निश्चय हो, तो हम निडर होकर परमेश्वर के सामने उपस्थित होते हैं। और इब्रानियों की पत्री का लेखक कहता है कि हमें “पापों का फिर कोई विवेक न रहा,” (इब्रानियों 10:2), अर्थात् हम छूटे हुए या निर्दोष ठहराए गए माने जाते हैं, ताकि पाप अब हम पर दोष न लगाए।
461 फ्रांसीसी संस्करण में, “de bon laict;”—अच्छा दूध।
462 देखिए Epist. de Fugiendis Impiorum Illicitis Sacris. साथ ही Epist. de Abjiciendis vel Administrandis Sacerdotiis. साथ ही लघु ग्रन्थ, De Vitandis Superstitionibus.
16. इसलिए जैसे कर्मों का सम्बन्ध मनुष्यों से है, वैसे ही विवेक का सम्बन्ध परमेश्वर से है, क्योंकि भला विवेक हृदय की भीतरी खराई के सिवा और कुछ नहीं। इसी अर्थ में पौलुस कहता है कि “आज्ञा का सारांश उस प्रेम से है जो शुद्ध हृदय, और भले विवेक, और निष्कपट विश्वास से उत्पन्न होता है” (1 तीमुथियुस 1:5)। इसी अध्याय में आगे चलकर वह दिखाता है कि वह बुद्धि से कितना भिन्न है, जब वह “विश्वास और भले विवेक को थामे रहने” की बात करता है, “जिसे कुछ लोगों ने दूर कर दिया और उनके विश्वास का जहाज़ डूब गया,” (1 तीमुथियुस 1:19)। क्योंकि इन शब्दों से वह संकेत देता है कि वह परमेश्वर की सेवा के प्रति जीवित झुकाव, भक्ति और पवित्रता में जीने की सच्ची अभिलाषा है। कभी-कभी वास्तव में वह मनुष्यों तक भी फैलता है, जैसे पौलुस साक्षी देता है, “इसलिए मैं आप भी यत्न करता हूँ कि परमेश्वर की और मनुष्यों की ओर मेरा विवेक सदा निर्दोष रहे,” (प्रेरितों के काम 24:16)। वह ऐसा इसलिए कहता है क्योंकि भले विवेक के फल बाहर निकलकर मनुष्यों तक भी पहुँचते हैं। परन्तु जैसा मैं कह चुका हूँ, ठीक अर्थ में उसका सम्बन्ध केवल परमेश्वर से है। इसलिए कहा जाता है कि व्यवस्था विवेक को बाँधती है, क्योंकि वह व्यक्ति को केवल बाँधती है, मनुष्यों की ओर देखे बिना, या उनका कोई हिसाब लिए बिना। उदाहरण के लिए, परमेश्वर हमें न केवल यह आज्ञा देता है कि अपने मन को पवित्र और वासना से शुद्ध रखें, परन्तु हर प्रकार की बाहरी कामुकता या अश्लील बोली का निषेध भी करता है। मेरा विवेक इस व्यवस्था के पालन के अधीन है, चाहे संसार में दूसरा कोई मनुष्य न हो, और जो इसे तोड़ता है वह न केवल अपने भाइयों को बुरा उदाहरण देकर पाप करता है, परन्तु परमेश्वर के सामने अपने विवेक में दोषी ठहरता है। तटस्थ बातों में यही नियम लागू नहीं होता। हमें हर उस बात से परहेज़ करना चाहिए जो ठोकर उत्पन्न करती हो, परन्तु स्वतन्त्र विवेक से। इस प्रकार पौलुस मूर्तियों को चढ़ाए गए मांस के विषय में कहता है, “यदि कोई तुम से कहे, यह मूर्तियों को बलि किया हुआ है, तो उस बतानेवाले के कारण और विवेक के कारण न खाओ:” “विवेक, मैं कहता हूँ, तेरा अपना नहीं, परन्तु दूसरे का,” (1 कुरिन्थियों 10:28, 29)। एक विश्वासी, पहले से चेतावनी पाने के बाद, यदि ऐसे चढ़ाए गए मांस को फिर भी खाए तो पाप करेगा। परन्तु यद्यपि भाई के कारण उसके लिए परहेज़ करना आवश्यक है, जैसा परमेश्वर ने ठहराया है, फिर भी वह विवेक की स्वतन्त्रता बनाए रखना नहीं छोड़ता। हम देखते हैं कि व्यवस्था बाहरी कार्य को बाँधती हुई विवेक को बन्धनमुक्त छोड़ती है।
