पुस्तक II · अध्याय 3

मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निकलनेवाली हर बात दण्ड के योग्य है

Institutes of the Christian Religion · John Calvin

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मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निकलनेवाली हर बात दण्ड के योग्य है

अध्याय 3।

मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव से निकलनेवाली हर बात दण्ड के योग्य है।

इस अध्याय के मुख्य विषय ये हैं: I. पिछले अध्याय का पुनर्कथन, जिसमें पवित्रशास्त्र के अंशों से प्रमाणित किया गया है कि मनुष्य की बुद्धि और इच्छा इतनी भ्रष्ट हो चुकी हैं कि उसमें अब न कोई खराई, न परमेश्वर का कोई ज्ञान या भय पाया जा सकता है, खण्ड 1 और 2। II. इस सिद्धान्त पर वे आपत्तियाँ, जो कुछ अन्यजातियों में चमकनेवाले सद्गुणों के आधार पर उठाई जाती हैं, खण्डित, खण्ड 3 और 4। III. पाप के दास मनुष्य में किस प्रकार की इच्छा शेष रह गई है, खण्ड 5। इसका उपचार और चंगाई, खण्ड 6। IV. इच्छा की तैयारी और प्रभावशीलता के विषय में, और साथ ही अन्त तक स्थिर रहने तथा सहकारी अनुग्रह के विषय में, नव-पेलाजियन तर्कशास्त्रियों का मत, जो तर्क और पवित्रशास्त्र दोनों से खण्डित किया गया है, खण्ड 7–12। V. अगस्तीन के कुछ अंश जो इस सिद्धान्त की सच्चाई की पुष्टि करते हैं, खण्ड 13 और 14।

खण्ड।

1. सम्पूर्ण मनुष्य की बुद्धि और इच्छा भ्रष्ट है। शरीर शब्द केवल इन्द्रिय-सम्बन्धी भाग पर ही नहीं, वरन् आत्मा के उच्चतर भाग पर भी लागू होता है। यह पवित्रशास्त्र से प्रमाणित किया गया है।

2. हृदय भी भ्रष्टता में सम्मिलित है, और इसलिए मनुष्य के किसी भी भाग में न खराई, न ज्ञान, न परमेश्वर का भय पाया जा सकता है।

3. आपत्ति: कुछ अन्यजातियों में प्रशंसनीय गुण थे, अतः मनुष्य का स्वभाव पूर्णतः भ्रष्ट नहीं है। उत्तर: भ्रष्टता पूरी तरह दूर नहीं की गई है, केवल भीतर से रोकी गई है। इस उत्तर की व्याख्या।

4. आपत्ति फिर भी उठाई जाती है कि अन्यजातियों में सद्गुणी और दुर्गुणी को एक ही स्तर पर रखना होगा, या फिर सद्गुणी यह प्रमाणित करें कि उचित रूप से संवारा गया मानव स्वभाव सद्गुण से रहित नहीं है। उत्तर: ये मानव स्वभाव के साधारण गुण नहीं, वरन् परमेश्वर के विशेष वरदान हैं। ये वरदान महत्वाकांक्षा से दूषित हो जाते हैं, और इसलिए इनसे उत्पन्न कार्य, मनुष्य की दृष्टि में चाहे कितने ही आदरणीय हों, परमेश्वर के सम्मुख कोई पुण्य नहीं रखते।

5. यद्यपि मनुष्य में अब भी इच्छा करने की क्षमता है, फिर भी उसमें कोई खरापन नहीं है। वह अनिवार्य रूप से, फिर भी स्वेच्छा से, पाप की दासता में पड़ता है। अनिवार्यता और बाध्यता में भेद करना चाहिए। प्राचीन धर्मविज्ञानी इस अनिवार्यता को जानते थे। कुछ अंश जो लोम्बार्ड की डाँवाडोल स्थिति की निन्दा करते हैं।

6. परमेश्वर की ओर फिरना ही मानव इच्छा का उपचार या खरापन है। यह न केवल आरम्भ किया जाता, वरन् निभाया और पूरा भी किया जाता है; आरम्भ, निरन्तरता और पूर्ति तीनों पूर्ण रूप से परमेश्वर के माने गए हैं। यह यहेजकेल के पत्थर के हृदय के वर्णन से और पवित्रशास्त्र के अन्य अंशों से प्रमाणित है।

7. विविध आपत्तियाँ।—1. इच्छा परमेश्वर द्वारा फेरी जाती है, किन्तु एक बार तैयार हो जाने पर वह मन-परिवर्तन के कार्य में अपना भाग निभाती है। उत्तर अगस्तीन से। 2. अनुग्रह बिना इच्छा के कुछ नहीं कर सकता, और इच्छा बिना अनुग्रह के कुछ नहीं। उत्तर। अनुग्रह स्वयं इच्छा को उत्पन्न करता है। परमेश्वर अनिच्छुक से आगे बढ़कर उसे इच्छुक बनाता है, और इस पूर्वगामी अनुग्रह के पीछे-पीछे चलता है कि वह व्यर्थ इच्छा न करे। अगस्तीन के विविध अंशों से एकत्र किया गया एक और उत्तर।

8. दूसरी आपत्ति का उत्तर जारी। चुने हुए लोगों को छोड़ किसी में भलाई की ओर झुकी हुई इच्छा नहीं है। चुनाव का कारण मनुष्य से बाहर है। इसलिए सही इच्छा, चुनाव के समान ही, परमेश्वर की सुइच्छा से है। भली इच्छा और भले कार्य का आरम्भ विश्वास से है; विश्वास फिर परमेश्वर का दान है; अतः हमारे भली इच्छा करने के आरम्भ का कारण केवल अनुग्रह है। यह पवित्रशास्त्र से प्रमाणित है।

9. भली इच्छा का केवल अनुग्रह से होना सन्तों की प्रार्थनाओं से प्रमाणित है। तीन सिद्धान्त: 1. परमेश्वर मनुष्य के हृदय को इस प्रकार तैयार नहीं करता कि वह बाद में अपने आप कुछ भला कर सके, वरन् खराई की हर अभिलाषा, हर झुकाव और उसे पाने का हर प्रयत्न उसी की ओर से है। 2. यह अभिलाषा, झुकाव और प्रयत्न बीच में नहीं रुकते, वरन् फल उत्पन्न करने तक बने रहते हैं। 3. यह प्रगति निरन्तर है। विश्वासी अन्त तक स्थिर रहता है। तीसरी आपत्ति और उसके तीन उत्तर।

10. चौथी आपत्ति। उत्तर। पाँचवीं आपत्ति। उत्तर। उत्तर की पुष्टि पवित्रशास्त्र के अनेक अंशों से की गई है, और अगस्तीन के एक अंश से समर्थन किया गया है।

11. अन्त तक स्थिर रहना हमारी ओर से नहीं, परमेश्वर की ओर से है। आपत्ति। आपत्ति में दो भूलें। दोनों का खण्डन।

12. सहकारी अनुग्रह के भेद पर आधारित आपत्ति। उत्तर। उत्तर की पुष्टि अगस्तीन और बर्नार्ड की साक्षी से।

13. अध्याय का अन्तिम भाग, जिसमें अगस्तीन के अनेक अंशों से प्रमाणित किया गया है कि वह यहाँ सिखाए गए सिद्धान्त को ही मानता था।

14. वह आपत्ति दूर की गई जो अगस्तीन को स्वयं से और अन्य धर्मविज्ञानियों से असहमत दिखाती है। स्वतंत्र इच्छा पर अगस्तीन के सिद्धान्त का सार।

1. मनुष्य का स्वभाव, उसकी आत्मा के दोनों भागों—अर्थात् बुद्धि और इच्छा—में, इससे अच्छी रीति से नहीं जाना जा सकता कि पवित्रशास्त्र में उस पर लागू किए गए विशेषणों पर ध्यान दिया जाए। यदि वह हमारे उद्धारकर्ता के इन शब्दों में पूरी तरह चित्रित हुआ है (और यह सरलता से प्रमाणित किया जा सकता है कि हुआ है), “जो शरीर से जन्मा है वह शरीर है” (यूहन्ना 3:6), तो वह अवश्य ही अत्यन्त दयनीय प्राणी होगा। क्योंकि जैसा एक प्रेरित घोषणा करता है, “शरीर पर मन लगाना तो मृत्यु है” (रोमियों 8:8), “क्योंकि शरीर पर मन लगाना परमेश्वर से बैर रखना है, क्योंकि वह न तो परमेश्वर की व्यवस्था के अधीन है, और न हो सकता है।” क्या यह सच है कि शरीर इतना विकृत है कि वह निरन्तर अपनी सारी शक्ति से परमेश्वर से लड़ता रहता है? कि वह परमेश्वर की व्यवस्था की धार्मिकता से मेल नहीं खा सकता? कि संक्षेप में वह मृत्यु की सामग्री के सिवा और कुछ उत्पन्न नहीं कर सकता? मान लो कि मानव स्वभाव में शरीर के सिवा कुछ नहीं है, और तब उसमें से कुछ भला निकाल सको तो निकालो। परन्तु कहा जाएगा कि शरीर शब्द केवल इन्द्रिय-सम्बन्धी भाग पर लागू होता है, आत्मा के उच्चतर भाग पर नहीं। परन्तु मसीह और उसके प्रेरित दोनों के शब्द इसका पूरी तरह खण्डन करते हैं। हमारे प्रभु का कथन है कि मनुष्य को नए सिरे से जन्म लेना अवश्य है, क्योंकि वह शरीर है। उसे देह के सम्बन्ध में नया जन्म लेने की आवश्यकता नहीं। परन्तु मन का नया जन्म इसमें नहीं कि उसके किसी अंश का सुधार हो जाए। उसका पूरी तरह नया किया जाना अवश्य है। इसकी पुष्टि दोनों अंशों में प्रयुक्त विरोधाभास से होती है। आत्मा और शरीर के इस अन्तर में कोई मध्यवर्ती स्वभाव शेष नहीं रहता। इस प्रकार मनुष्य में जो कुछ आत्मिक नहीं है, वह सब शारीरिक कहलाता है। परन्तु हम में आत्मा का कुछ भी नहीं है सिवाय नए जन्म के द्वारा। इसलिए जो कुछ हमें स्वभाव से मिला है, वह सब शरीर है। इस विषय में जो भी सम्भावित सन्देह हो सकता था, वह पौलुस के शब्दों से (इफिसियों 4:23) दूर हो जाता है, जहाँ पुराने मनुष्य का वर्णन करके, जो उसके अनुसार “भरमानेवाली अभिलाषाओं के कारण भ्रष्ट होता जाता है,” वह हमें अपने मन के आत्मा में “नये बनते जाने” की आज्ञा देता है। तू देखता है कि वह अनुचित और भ्रष्ट अभिलाषाओं को केवल इन्द्रिय-सम्बन्धी भाग में नहीं, वरन् मन में ही रखता है, और इसीलिए उसके नए किए जाने की माँग करता है। वास्तव में, उसने थोड़ा पहले मानव स्वभाव का ऐसा चित्र खींचा था जो दिखाता है कि उसका कोई भाग ऐसा नहीं जो विकृत और भ्रष्ट न हो। क्योंकि जब वह कहता है कि “अन्यजातियाँ अपने मन की अनर्थता में चलती हैं, और उनकी बुद्धि अन्धेरी हो गई है, और उस अज्ञानता के कारण जो उनमें है, और उनके मन की कठोरता के कारण वे परमेश्वर के जीवन से अलग किए हुए हैं” (इफिसियों 4:17, 18), तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसके शब्द उन सब पर लागू होते हैं जिन्हें प्रभु ने अब तक बुद्धि और धार्मिकता दोनों में नए सिरे से नहीं गढ़ा है। यह उस तुलना से और भी स्पष्ट हो जाता है जो तुरन्त आगे आती है, जिसमें वह विश्वासियों को स्मरण दिलाता है कि उन्होंने “मसीह की ऐसी शिक्षा नहीं पाई”—इन शब्दों का अर्थ यह है कि उस अन्धेपन और उसके बुरे परिणामों का एकमात्र उपचार मसीह का अनुग्रह है। इसी प्रकार यशायाह ने भी मसीह के राज्य के विषय में भविष्यद्वाणी की थी, जब प्रभु ने कलीसिया से प्रतिज्ञा की कि यद्यपि अन्धकार “पृथ्वी को और घोर अन्धकार देश-देश के लोगों को ढाँपेगा,” तथापि वह उस पर “उदय होगा,” और उसकी “महिमा” उस पर दिखाई देगी (यशायाह 40:2)। जब यह कहा गया है कि दिव्य ज्योति केवल कलीसिया पर उदय होगी, तब कलीसिया से बाहर के सब लोग अन्धेपन और अन्धकार में छोड़ दिए गए हैं। मैं उस सब को गिनाऊँगा नहीं जो पवित्रशास्त्र में, और विशेषकर भजनों और भविष्यद्वक्ताओं की पुस्तकों में, मनुष्य की व्यर्थता के विषय में आता है। दाऊद के इस कथन में बहुत कुछ है: “निश्चय सब नीच लोग तो अस्थिर हैं, और बड़े लोग झूठे हैं; तौलने में वे सब के सब मिलकर साँस से भी हल्के निकलते हैं” (भजन संहिता 62:10)। जब मानव मन से निकले सब विचारों का यह कहकर उपहास किया जाता है कि वे मूर्खतापूर्ण, ओछे, विकृत और पागलपन-भरे हैं, तब मानव मन को एक विनम्र करनेवाला आघात लगता है।

2. हृदय की निन्दा भी किसी रीति से कम कठोर नहीं है, जब उसे “सब वस्तुओं से अधिक धोखेबाज़ और असाध्य रोगी” कहा गया है (यिर्मयाह 17:9)। परन्तु मैं संक्षेप का ध्यान रखते हुए एक ही अंश से सन्तुष्ट हो जाऊँगा, ऐसा अंश जिसमें, मानो एक उज्ज्वल दर्पण में, हम अपने स्वभाव की सम्पूर्ण छवि देख सकते हैं। प्रेरित, जब वह मनुष्य के अभिमान को नीचा करना चाहता है, ये शब्द कहता है: “कोई धार्मिक नहीं, एक भी नहीं; कोई समझदार नहीं, कोई परमेश्वर को खोजनेवाला नहीं। सब भटक गए हैं, सब के सब निकम्मे बन गए हैं; कोई भलाई करनेवाला नहीं, एक भी नहीं। उनका गला खुली हुई कब्र है; उन्होंने अपनी जीभों से छल किया है; उनके होंठों में साँपों का विष है। उनका मुँह श्राप और कड़वाहट से भरा है; उनके पाँव लहू बहाने को फुर्तीले हैं; उनके मार्गों में नाश और क्लेश हैं; उन्होंने शान्ति का मार्ग नहीं जाना; उनकी आँखों के सामने परमेश्वर का भय नहीं” (रोमियों 3:10–18)। इस प्रकार वह कुछ व्यक्तियों के विरुद्ध नहीं, वरन् आदम की सारी सन्तान के विरुद्ध गरजता है—किसी एक युग के भ्रष्ट आचरण के विरुद्ध नहीं, वरन् स्वभाव की स्थायी भ्रष्टता के विरुद्ध। इस अंश में उसका उद्देश्य केवल मनुष्यों को डाँटना नहीं है कि वे पश्चाताप करें, वरन् यह सिखाना है कि सब लोग अनिवार्य विपत्ति में दबे हुए हैं, और उससे केवल परमेश्वर की दया के द्वारा ही छुड़ाए जा सकते हैं। चूँकि यह प्रमाणित नहीं किया जा सकता था जब तक पहले स्वभाव का पतन और विनाश प्रमाणित न किया जाए, इसलिए उसने ये अंश इसलिए प्रस्तुत किए कि दिखाए कि उसका विनाश सम्पूर्ण है।

तो यह बात निश्चित मान ली जाए कि मनुष्य ऐसे ही हैं जैसा यहाँ वर्णित है, बुरी रीति के कारण नहीं, वरन् स्वभाव की भ्रष्टता के कारण। प्रेरित का यह तर्क कि मनुष्य के लिए परमेश्वर की दया के सिवा कोई उद्धार नहीं, क्योंकि वह अपने आप में निराश और नष्ट है, अन्यथा टिक नहीं सकता। मैं यहाँ यह प्रमाणित करने का परिश्रम नहीं करूँगा कि ये अंश यहाँ ठीक बैठते हैं, कि जो लोग यह सोचें कि ये अंश अनुपयुक्त स्थान पर उद्धृत हुए हैं उनके सन्देह दूर हों। मैं इन्हें ऐसे लूँगा मानो पौलुस ने इन्हें पहली बार प्रयोग किया हो, और भविष्यद्वक्ताओं से न लिया हो। पहले तो वह मनुष्य को धार्मिकता से, अर्थात् खराई और पवित्रता से, वंचित करता है; और दूसरे, उसे सही समझ से वंचित करता है। वह तर्क देता है कि समझ की कमी परमेश्वर से विमुख हो जाने से प्रमाणित होती है। उसे खोजना बुद्धि का आरम्भ है, और इसलिए यह कमी उन सब में अवश्य है जो उससे फिर गए हैं। वह आगे जोड़ता है कि सब भटक गए हैं और मानो केवल भ्रष्टता बन गए हैं; कि कोई भलाई करनेवाला नहीं। फिर वह उन अपराधों को गिनाता है जिनसे वे लोग, जिन्होंने एक बार अपनी दुष्टता को खुली छूट दे दी, अपने शरीर के हर अंग को अशुद्ध करते हैं। अन्त में वह घोषित करता है कि उनमें परमेश्वर का भय नहीं, जिसके नियम के अनुसार हमारे सब कदम निर्देशित होने चाहिए। यदि ये मानव जाति के वंशागत गुण हैं, तो हमारे स्वभाव में कुछ भला ढूँढ़ना व्यर्थ है। मैं मानता हूँ कि ये सब अधर्म हर व्यक्ति में फूट नहीं निकलते। फिर भी इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि हर हृदय में हाइड्रा छिपा बैठा है। क्योंकि जैसे कोई शरीर, जब तक वह रोग का कारण और सामग्री अपने भीतर रखता और पालता है, स्वस्थ नहीं कहा जा सकता, चाहे पीड़ा वास्तव में अनुभव न हो रही हो; वैसे ही कोई आत्मा, जब तक वह ऐसे दोष के बीजों से भरी है, खरी नहीं कही जा सकती। परन्तु यह उपमा पूरी तरह लागू नहीं होती। किसी शरीर में, चाहे वह कितना ही रोगी हो, जीवन के कार्य चलते रहते हैं; परन्तु आत्मा, जब वह उस घातक गड्ढे में डूब जाती है, तब न केवल दोष से पीड़ित होती है, वरन् सर्वथा भलाई से रहित होती है।

3. यहाँ फिर हमारे सामने वैसा ही एक प्रश्न आता है जैसा पहले सुलझाया जा चुका है। हर युग में कुछ ऐसे लोग हुए हैं जो स्वभाव के मार्गदर्शन में जीवन भर सद्गुण में लगे रहे। इसका कोई महत्व नहीं कि उनके आचरण में अनेक दाग पाए जा सकते हैं; सद्गुण के प्रति मात्र उनकी लगन ने प्रकट किया कि उनके स्वभाव में कुछ पवित्रता थी। इस प्रकार के सद्गुणों का परमेश्वर की दृष्टि में क्या मूल्य है, इस पर कर्मों के पुण्य की चर्चा करते समय अधिक विस्तार से विचार किया जाएगा। फिर भी जहाँ तक विचाराधीन विषय की व्याख्या के लिए आवश्यक है, उस पर यहाँ भी विचार करना उचित होगा। ऐसे उदाहरण हमें यह सोचने से सावधान करते प्रतीत होते हैं कि मनुष्य का स्वभाव सर्वथा दुष्ट है, क्योंकि उसके मार्गदर्शन में कुछ लोगों ने न केवल प्रसिद्ध कार्यों में उत्कृष्टता पाई, वरन् अपने सारे जीवन में अत्यन्त आदरणीय आचरण किया। परन्तु हमें यह विचार करना चाहिए कि हमारे स्वभाव की भ्रष्टता के होते हुए भी दिव्य अनुग्रह के लिए कुछ स्थान है, ऐसा अनुग्रह जो उसे शुद्ध किए बिना भीतर से रोक सके। क्योंकि यदि प्रभु हर मन को अपनी अभिलाषाओं में स्वच्छन्द दौड़ने के लिए खुला छोड़ दे, तो निःसन्देह कोई ऐसा मनुष्य न होगा जो यह प्रकट न कर दे कि उसका स्वभाव उन सब अपराधों में सक्षम है जिनका पौलुस उस पर आरोप लगाता है (रोमियों 3 की तुलना भजन संहिता 14:3 आदि से करो)। क्या? क्या तू अपने आप को उन लोगों की गिनती से बाहर कर सकता है जिनके पाँव लहू बहाने को फुर्तीले हैं; जिनके हाथ लूट और हत्या से मैले हैं; जिनके गले खुली कब्र जैसे हैं; जिनकी जीभें छली हैं; जिनके होंठ विषैले हैं; जिनके कार्य निकम्मे, अन्यायी, सड़े हुए और घातक हैं; जिनकी आत्मा परमेश्वर से रहित है; जिनके भीतरी अंग दुष्टता से भरे हैं; जिनकी आँखें छल की ताक में रहती हैं; जिनके मन अपमान के लिए तैयार हैं; जिनका हर अंग, संक्षेप में, अनन्त दुष्कर्मों के लिए गढ़ा गया है? यदि हर आत्मा ऐसे घृणित कार्यों में सक्षम है (और प्रेरित यह साहस के साथ घोषित करता है), तो यह देखना सरल है कि यदि प्रभु मानवीय वासनाओं को अपनी प्रवृत्ति के अनुसार चलने देता तो परिणाम क्या होता। कोई हिंसक पशु इतने क्रोध से न झपटता, कोई धारा, चाहे कितनी ही तेज़ और प्रचण्ड हो, इतने वेग से अपने किनारे न तोड़ती। चुने हुए लोगों में परमेश्वर इन रोगों को उस रीति से चंगा करता है जिसकी व्याख्या शीघ्र की जाएगी; अन्य लोगों में वह उन्हें केवल इतना रोक देता है कि वे इस सीमा तक न फूट निकलें जो स्थापित व्यवस्था के बनाए रखने से मेल न खाती हो। इसलिए, मनुष्य अपनी अशुद्धता को कितना ही छिपाएँ, कुछ लोग केवल लज्जा के कारण, कुछ व्यवस्थाओं के भय के कारण, अनेक प्रकार की दुष्टता में फूट निकलने से रुके रहते हैं। कुछ लोग भले जीवन की अभिलाषा करते हैं, क्योंकि वे उसे अपने हित के लिए अत्यन्त लाभकारी समझते हैं, जबकि कुछ को साधारण स्तर से ऊपर उठाया जाता है कि अपने पद की गरिमा से वे अपने से नीचे के लोगों को उनके कर्तव्य में बनाए रखें। इस प्रकार परमेश्वर अपने विधान के द्वारा स्वभाव की कुटिलता पर लगाम लगाता है और उसे कर्म में फूट निकलने से रोकता है, तथापि उसे भीतर से शुद्ध नहीं करता।

4. फिर भी आपत्ति अभी हल नहीं हुई है। क्योंकि या तो हमें कैटिलाइन को कैमिलस के समान स्तर पर रखना होगा, या फिर कैमिलस को इस बात का उदाहरण मानना होगा कि स्वभाव, जब सावधानी से संवारा जाए, तब सर्वथा भलाई से रहित नहीं होता। मैं मानता हूँ कि कैमिलस में जो आकर्षक गुण थे वे दिव्य वरदान थे, और अपने आप में देखने पर प्रशंसा के योग्य दिखाई देते हैं। परन्तु वे किस प्रकार सद्गुणी स्वभाव के प्रमाण होंगे? क्या हमें मन तक नहीं लौटना चाहिए, और उसी से आरम्भ करके इस प्रकार तर्क नहीं करना चाहिए? यदि कोई स्वाभाविक मनुष्य आचरण में ऐसी खराई रखता है, तो स्वभाव सद्गुण के लिए यत्न करने की क्षमता से रहित नहीं है। परन्तु यदि उसका मन भ्रष्ट और विकृत हो, और खराई को छोड़ और किसी भी वस्तु का अनुसरण करता हो तो? निःसन्देह वह ऐसा ही था, यदि तुम मानते हो कि वह केवल स्वाभाविक मनुष्य था। तब तुम भलाई के लिए मानव स्वभाव की सामर्थ्य की प्रशंसा कैसे करोगे, यदि खराई के सबसे अधिक आभास में भी सदा एक भ्रष्ट झुकाव पाया जाता है? इसलिए जैसे तुम किसी मनुष्य की सद्गुण के लिए प्रशंसा नहीं करोगे जिसके दोष सद्गुण के दिखावे से तुम्हें धोखा देते हैं, वैसे ही तुम उस मानव इच्छा को, जो भ्रष्टता में जड़ पकड़े हुए है, खराई को चुनने की सामर्थ्य का श्रेय नहीं दोगे (देखिए अगस्तीन, lib. 4, Cont. Julian)। फिर भी आपत्ति का सबसे निश्चित और सरल उत्तर यह है कि वे स्वभाव के साधारण गुण नहीं, वरन् परमेश्वर के विशेष वरदान हैं, जिन्हें वह नाना रूपों में और निश्चित मात्रा में अन्यथा अधर्मी लोगों को बाँटता है। इसी कारण हम साधारण बोलचाल में यह कहने से नहीं हिचकते कि एक का स्वभाव अच्छा है और दूसरे का बुरा; यद्यपि हम यह मानना नहीं छोड़ते कि दोनों मानव भ्रष्टता की सार्वभौमिक दशा के अधीन हैं। हमारा केवल इतना ही अर्थ है कि परमेश्वर ने एक को वह विशेष अनुग्रह दिया है जो उसने दूसरे को देना उचित नहीं समझा। जब उसे शाऊल को राज्य पर बैठाना भाया, तब उसने उसे मानो एक नया मनुष्य बना दिया। प्लेटो का यही अभिप्राय है, जब वह इलियड के एक अंश की ओर संकेत करते हुए कहता है कि राजाओं की सन्तानें जन्म से ही कुछ विशेष गुणों से भिन्न होती हैं—परमेश्वर, मानव जाति पर दया करके, प्रायः उन्हें वीरता का आत्मा देता है जिन्हें वह शासन के लिए ठहराता है। इसी रीति से इतिहास में प्रसिद्ध महान नेता गढ़े गए। निजी व्यक्तियों के विषय में भी यही निर्णय देना चाहिए। परन्तु क्योंकि सबसे बड़ी प्रतिभा से सम्पन्न लोग सदा सबसे बड़ी महत्वाकांक्षाओं से प्रेरित होते रहे (यह ऐसा दाग है जो सब सद्गुणों को दूषित करता और उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में सारा अनुग्रह खो देने वाला बना देता है), इसलिए हम अधर्मी लोगों में जो कुछ प्रशंसनीय दिखाई देता है उसका कोई मूल्य नहीं आँक सकते। हम यह भी जोड़ सकते हैं कि खराई का मुख्य भाग तब अनुपस्थित होता है जब परमेश्वर की महिमा के लिए कोई उत्साह नहीं होता, और उन लोगों में ऐसा उत्साह नहीं होता जिन्हें उसने अपने आत्मा से नया जन्म नहीं दिया। यशायाह में यह भी बिना कारण नहीं कहा गया कि मसीह पर “ज्ञान और यहोवा के भय की आत्मा” ठहरेगी (यशायाह 11:2); क्योंकि इससे हमें यह सिखाया जाता है कि जो सब मसीह के लिए अजनबी हैं वे परमेश्वर के उस भय से रहित हैं जो बुद्धि का आरम्भ है (भजन संहिता 111:10)। जो गुण खोखले दिखावे से हमें धोखा देते हैं, वे नागरिक समाज में और जीवन के साधारण व्यवहार में प्रशंसा पा सकते हैं, परन्तु परमेश्वर के न्याय-आसन के सामने वे धार्मिकता का दावा स्थापित करने में किसी मूल्य के न होंगे।

5. जब इच्छा पाप की दासी बनकर जंजीरों में जकड़ी हो, तब वह भलाई की ओर एक कदम भी नहीं बढ़ा सकती, उसका स्थिरता से अनुसरण करना तो दूर की बात है। ऐसा प्रत्येक कदम परमेश्वर की ओर फिरने का पहला क़दम है, जो पवित्रशास्त्र में पूर्ण रूप से दिव्य अनुग्रह का ही कार्य बताया गया है। इसी प्रकार यिर्मयाह प्रार्थना करता है, “मुझे फेर, तब मैं फिरूँगा” (यिर्मयाह 31:18)। इसी कारण उसी अध्याय में, विश्वासियों के आत्मिक छुटकारे का वर्णन करते हुए, भविष्यद्वक्ता कहता है, “यहोवा ने याकूब को छुड़ा लिया, और उसको उससे अधिक बलवन्त के हाथ से मुक्त किया है” (यिर्मयाह 31:11); इससे यह संकेत मिलता है कि पापी जब तक प्रभु द्वारा त्यागा हुआ है और शैतान के जूए के नीचे कार्य करता है, तब तक वह कितनी कसकर बेड़ियों में बँधा है। तथापि एक इच्छा बनी रहती है जो पाप की ओर अत्यन्त प्रबल आवेग से झुकती और दौड़ती है; इस दासता में रखा गया मनुष्य इच्छा से नहीं, वरन् इच्छा की खराई से वंचित है। बर्नार्ड का यह कहना अनुचित नहीं कि हम सब में इच्छा है; परन्तु भली इच्छा करना उन्नति है और बुरी इच्छा करना दोष है। इस प्रकार केवल इच्छा करना मनुष्य का अंश है, बुरी इच्छा करना भ्रष्ट स्वभाव का, और भली इच्छा करना अनुग्रह का। फिर, जब मैं कहता हूँ कि स्वतंत्रता से वंचित इच्छा अनिवार्यता से बुराई की ओर ले जाई या घसीटी जाती है, तब यह आश्चर्य की बात है कि कोई इस कथन को कठोर समझे, क्योंकि इसमें कोई असंगति नहीं है, और यह भक्तिपूर्ण प्रयोग के विरुद्ध भी नहीं है। फिर भी यह उन्हें खटकता है जो अनिवार्यता और बाध्यता में भेद करना नहीं जानते। यदि कोई उनसे पूछे, क्या परमेश्वर अनिवार्य रूप से भला नहीं है, क्या शैतान अनिवार्य रूप से दुष्ट नहीं है, तो वे क्या उत्तर देंगे? परमेश्वर की भलाई उसके ईश्वरत्व से ऐसी जुड़ी है कि उसका परमेश्वर होना भला होने से अधिक अनिवार्य नहीं; जबकि शैतान अपने पतन के कारण भलाई से इतना दूर हो गया कि वह बुराई के सिवा कुछ कर ही नहीं सकता। यदि कोई यह अपवित्र ठट्ठा करे (देखिए कैल्विन, Adv. Pighium) कि जिस भलाई को करने के लिए परमेश्वर विवश है, उसके लिए उसकी प्रशंसा कम ही होनी चाहिए, तो क्या हर मनुष्य के लिए यह उत्तर देना स्पष्ट नहीं कि वह बुराई नहीं कर सकता तो यह किसी बलपूर्वक प्रेरणा के कारण नहीं, वरन् उसकी असीम भलाई के कारण है? इसलिए यदि परमेश्वर की भलाई करने की स्वतंत्र इच्छा में बाधा नहीं पड़ती, यद्यपि उसे अनिवार्य रूप से भलाई ही करनी है; यदि शैतान, जो बुराई के सिवा कुछ कर नहीं सकता, फिर भी स्वेच्छा से पाप करता है; तो क्या यह कहा जा सकता है कि मनुष्य पाप करने की अनिवार्यता में होने के कारण कम स्वेच्छा से पाप करता है? इस अनिवार्यता की घोषणा अगस्तीन सदा करता है, जिसने सेलेस्टियस की ईर्ष्या-भरी कुतर्कना के दबाव में भी इसे इन शब्दों में कहने में संकोच नहीं किया: “मनुष्य स्वतंत्रता के द्वारा पापी बना, परन्तु दण्ड के रूप में आई भ्रष्टता ने स्वतंत्रता को अनिवार्यता में बदल दिया” (अगस्तीन, lib. de Perf. Justin)। जब भी इस विषय की चर्चा होती है, वह पाप की अनिवार्य दासता के विषय में इसी प्रकार बोलने में संकोच नहीं करता (अगस्तीन, de Nature et Gratia, et alibi)। तो इस भेद का सार यही माना जाए। मनुष्य, जब से वह पतन के द्वारा भ्रष्ट हुआ, पाप करता है, विवश या अनिच्छुक होकर नहीं, वरन् स्वेच्छा से, मन के अत्यन्त उतावले झुकाव से; बलपूर्वक बाध्यता या बाहरी शक्ति से नहीं, वरन् अपनी ही वासना की गति से; और फिर भी उसके स्वभाव की भ्रष्टता ऐसी है कि वह बुराई की दिशा के सिवा और किसी ओर गति और कार्य नहीं कर सकता। यदि यह सत्य है, तो जो बात स्पष्ट रूप से कही गई है वह यह है कि वह पाप करने की अनिवार्यता में है। बर्नार्ड, अगस्तीन से सहमत होकर, इस प्रकार लिखता है: “पशुओं में केवल मनुष्य ही स्वतंत्र है, और फिर भी पाप के बीच में आ जाने पर वह एक प्रकार की बाध्यता सहता है, परन्तु ऐसी बाध्यता जो उसकी इच्छा से आती है, स्वभाव से नहीं, जिससे वह उसे जन्मजात स्वतंत्रता से भी वंचित नहीं करती” (बर्नार्ड, Sermo. super Cantica, 81)। क्योंकि जो स्वेच्छा से होता है वह स्वतंत्र भी है। थोड़ा आगे वह जोड़ता है, “इस प्रकार किसी विचित्र और दुष्ट रीति से इच्छा स्वयं, पाप से बिगड़कर, अनिवार्यता उत्पन्न करती है; परन्तु ऐसी कि अनिवार्यता, जहाँ तक वह स्वैच्छिक है, इच्छा को निर्दोष नहीं ठहरा सकती, और इच्छा, जहाँ तक वह लुभाई गई है, अनिवार्यता को बाहर नहीं कर सकती।” क्योंकि यह अनिवार्यता किसी रीति से स्वैच्छिक है। फिर वह कहता है कि “हम एक जूए के नीचे हैं, परन्तु वह स्वैच्छिक दासता के सिवा और कोई जूआ नहीं; इसलिए दासता के विषय में हम अभागे हैं, और इच्छा के विषय में निरुत्तर; क्योंकि इच्छा ने स्वतंत्र रहते हुए अपने आप को पाप का दास बना लिया।” अन्त में वह निष्कर्ष निकालता है, “इस प्रकार आत्मा किसी विचित्र और बुरी रीति से इस प्रकार की स्वैच्छिक, फिर भी दुःखद रूप से स्वतंत्र अनिवार्यता के अधीन रखी गई है, बन्धन में भी और स्वतंत्र भी; अनिवार्यता के विषय में बन्धन में, इच्छा के विषय में स्वतंत्र: और जो इससे भी अधिक विचित्र और इससे भी अधिक दुःखद है, वह स्वतंत्र होने के कारण दोषी है, दोषी होने के कारण दास है, और इसलिए स्वतंत्र होने के कारण ही दास है।” इससे मेरे पाठक देखते हैं कि जो सिद्धान्त मैं प्रस्तुत करता हूँ वह नया नहीं, वरन् वही है जो प्राचीन काल में अगस्तीन ने सब भक्तों की सहमति से दिया, और जो बाद में लगभग एक हज़ार वर्ष तक भिक्षुओं के मठों में बन्द पड़ा रहा। लोम्बार्ड ने, अनिवार्यता और बाध्यता में भेद करना न जानकर, एक घातक भूल को अवसर दिया।167 6. दूसरी ओर यह विचार करना भी उचित होगा कि स्वाभाविक भ्रष्टता के सुधार और चंगाई के लिए दिव्य अनुग्रह कौन-सा उपचार प्रदान करता है। क्योंकि प्रभु, सहायता लाकर, हमारी घटी को पूरा करता है, इसलिए उस सहायता का स्वरूप तुरन्त उसके विपरीत को—अर्थात् हमारी दरिद्रता को—प्रकट कर देगा। जब प्रेरित फिलिप्पियों से कहता है, “मुझे इस बात का भरोसा है कि जिसने तुम में अच्छा काम आरम्भ किया है, वही उसे यीशु मसीह के दिन तक पूरा करेगा” (फिलिप्पियों 1:6), तब इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि इस प्रकार आरम्भ किए गए अच्छे काम से उसका अर्थ इच्छा में मन-परिवर्तन के आरम्भ से ही है। अतः परमेश्वर हम में अच्छा काम इस प्रकार आरम्भ करता है कि हमारे हृदयों में धार्मिकता की अभिलाषा, प्रेम और लगन जगाता है, या (अधिक ठीक कहें तो) हमारे हृदयों को धार्मिकता की ओर फेरता, सधाता और चलाता है; और वह इस अच्छे काम को हमें अन्त तक स्थिर रहने में दृढ़ करके पूरा करता है। परन्तु कोई यह छल-भरी आपत्ति न उठाए कि प्रभु द्वारा आरम्भ किया गया यह अच्छा काम उस इच्छा की सहायता में है जो अपने आप में निर्बल है, इसलिए आत्मा अन्यत्र बताता है कि इच्छा, जब अपने आप पर छोड़ दी जाए, तब क्या कर सकती है। उसके शब्द ये हैं: “मैं तुम को नया हृदय दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और तुम्हारी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर तुम्हें माँस का हृदय दूँगा। और मैं अपना आत्मा तुम्हारे भीतर दूँगा, और तुम से अपनी विधियों पर चलवाऊँगा, और तुम मेरे नियमों को मानकर उनके अनुसार करोगे” (यहेजकेल 36:26, 27)। यह कैसे कहा जा सकता है कि मानव इच्छा की निर्बलता को इस प्रकार सहायता दी जाती है कि वह भलाई के चुनाव की ओर प्रभावशाली रूप से अभिलाषा कर सके, जब सच्चाई यह है कि उसे पूर्णतः बदला और नया किया जाना है? यदि पत्थर में कुछ कोमलता हो; यदि तुम उसे कोमल और किसी भी आकार में ढलने योग्य बना सको, तब कहा जा सकता है कि मानव हृदय खराई के लिए गढ़ा जा सकता है, यदि उसमें जो अधूरा है उसे दिव्य अनुग्रह पूरा कर दे। परन्तु यदि आत्मा ने उपर्युक्त उपमा के द्वारा यह दिखाना चाहा कि हमारे हृदय से कभी कोई भलाई नहीं निकाली जा सकती जब तक वह सर्वथा नया न किया जाए, तो हम उसके साथ वह बाँटने का प्रयत्न न करें जिसका दावा वह केवल अपने लिए करता है। यदि जब परमेश्वर हमें खराई की लगन की ओर फेरता है, तो वह पत्थर को माँस में बदलने के समान है, तो हमारी अपनी इच्छा का सब कुछ मिटा दिया जाता है, और उसके स्थान पर जो आता है वह पूर्ण रूप से परमेश्वर का है। मैं कहता हूँ कि इच्छा मिटा दी जाती है, परन्तु इस अर्थ में नहीं कि वह इच्छा है, क्योंकि मन-परिवर्तन में हमारे मूल स्वभाव का सब आवश्यक अंश बना रहता है: मैं यह भी कहता हूँ कि वह नए सिरे से रची जाती है, इसलिए नहीं कि इच्छा तब अस्तित्व में आने लगती है, वरन् इसलिए कि वह बुराई से भलाई की ओर फेर दी जाती है। यह, मैं मानता हूँ, पूर्ण रूप से परमेश्वर का कार्य है, क्योंकि, जैसा प्रेरित साक्षी देता है, हम “अपने आप से किसी बात का विचार करने के योग्य” नहीं हैं (2 कुरिन्थियों 3:5)। इसलिए वह अन्यत्र कहता है कि परमेश्वर केवल निर्बल की सहायता नहीं करता या भ्रष्ट इच्छा का सुधार नहीं करता, वरन् वह हम में इच्छा करने का कार्य करता है (फिलिप्पियों 2:13)। इससे सरलता से यह निष्कर्ष निकलता है, जैसा मैंने कहा है, कि इच्छा में जो कुछ भला है वह पूर्ण रूप से अनुग्रह का परिणाम है। इसी अर्थ में प्रेरित अन्यत्र कहता है, “परमेश्वर वही है जो सब में सब कुछ करता है” (1 कुरिन्थियों 12:6)। क्योंकि वह वहाँ सार्वभौमिक शासन की चर्चा नहीं कर रहा, वरन् यह घोषित कर रहा है कि विश्वासियों में जो भी भले गुण हैं वे परमेश्वर के कारण हैं। “सब” शब्द का प्रयोग करके वह निश्चय ही परमेश्वर को आत्मिक जीवन का आदि से अन्त तक रचयिता ठहराता है। यही उसने पहले भिन्न शब्दों में सिखाया था, जब उसने कहा कि “एक ही प्रभु यीशु मसीह है, जिसके द्वारा सब कुछ है, और हम भी उसी के द्वारा हैं” (1 कुरिन्थियों 8:6); इस प्रकार वह उस नई सृष्टि की स्पष्ट महिमा करता है जिसके द्वारा हमारे साधारण स्वभाव की हर वस्तु नष्ट हो जाती है। यहाँ आदम और मसीह के बीच एक मौन विरोधाभास है, जिसे वह अन्यत्र अधिक स्पष्टता से समझाता है जब वह कहता है, “हम उसकी कारीगरी हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने पहले से ठहराया कि हम उन पर चलें” (इफिसियों 2:10)। इस प्रकार उसका अभिप्राय यह दिखाना है कि हमारा उद्धार सेंत-मेंत है, क्योंकि भलाई का आरम्भ उस दूसरी सृष्टि से है जो मसीह में प्राप्त होती है। यदि हमारे अपने में कोई, चाहे अत्यन्त सूक्ष्म, सामर्थ्य होती, तो कुछ पुण्य भी होता। परन्तु हमारी पूर्ण रिक्तता दिखाने के लिए वह तर्क देता है कि हम कुछ भी पुण्य नहीं कमाते, क्योंकि हम मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए जिन्हें परमेश्वर ने तैयार किया; इन शब्दों से वह फिर यह संकेत करता है कि भले कामों के सब फल मूल रूप से और सीधे परमेश्वर से हैं। इसलिए भजनकार, यह कहकर कि प्रभु ने “हमें बनाया,” हमें कार्य में सब भाग से वंचित करने के लिए तुरन्त जोड़ता है, “और हम आप नहीं।” कि वह नए जन्म की चर्चा कर रहा है, जो आत्मिक जीवन का आरम्भ है, प्रसंग से स्पष्ट है, जिसमें अगले शब्द ये हैं, “हम उसकी प्रजा, और उसकी चराई की भेड़ें हैं” (भजन संहिता 100:3)। हमारे उद्धार की स्तुति परमेश्वर को देने से ही सन्तुष्ट न होकर, वह हमें उसमें हर भाग से स्पष्ट रूप से बाहर कर देता है, मानो उसने कहा हो कि मनुष्य के पास घमण्ड का आधार बनने के लिए एक कण भी नहीं बचा। सब कुछ परमेश्वर का है।

167 फ्रेंच में जोड़ा गया है: “Qui a esté une peste mortelle à l’Eglise, d’estimer que l’homme pouvoit eviter le peché pource qu’il peche franchement;” अर्थात् जो कलीसिया के लिए एक घातक महामारी रही है—यह मानना कि मनुष्य पाप से बच सकता है, क्योंकि वह खुली रीति से पाप करता है।

7. परन्तु शायद कुछ लोग होंगे जो यह तो मानते हैं कि इच्छा अपने स्वभाव में धार्मिकता से विमुख है और केवल परमेश्वर की सामर्थ्य से फेरी जाती है, फिर भी यह मानेंगे कि एक बार तैयार हो जाने पर वह कार्य करने में अपना भाग निभाती है। इसका आधार वे अगस्तीन के इन शब्दों को बनाते हैं कि अनुग्रह हर भले कार्य से पहले चलता है; इच्छा साथ चलती है, अगुवाई नहीं करती; वह दासी है, मार्गदर्शक नहीं (अगस्तीन, ad Bonifac. Ep. 106)। इस पवित्र लेखक द्वारा ठीक ही प्रयोग किए गए इन शब्दों को लोम्बार्ड उपर्युक्त अर्थ में बेतुके ढंग से खींचता है (लोम्बार्ड, lib. 2, Dist. 25)। परन्तु मैं कहता हूँ कि जो भजनकार के शब्द मैंने उद्धृत किए हैं उनमें, और पवित्रशास्त्र के अन्य अंशों में भी, दो बातें स्पष्ट सिखाई गई हैं—अर्थात् यह कि प्रभु हमारी भ्रष्ट इच्छा को सुधारता है, या कहें नष्ट करता है, और साथ ही अपनी ओर से एक भली इच्छा उसके स्थान पर रखता है। जहाँ तक वह अनुग्रह से पहले से ही प्रेरित की गई है, मुझे उसे दासी कहने में कोई आपत्ति नहीं; परन्तु जहाँ तक वह, पुनः रची जाने पर, प्रभु का कार्य है, यह कहना भूल है कि वह पूर्वगामी अनुग्रह के साथ स्वैच्छिक परिचारिका के रूप में चलती है। इसलिए क्राइसोस्टम का यह कहना अशुद्ध है कि अनुग्रह बिना इच्छा के कुछ नहीं कर सकता, और न इच्छा बिना अनुग्रह के कुछ (Serm. de Invent. Sanct. Crucis); मानो पौलुस से अभी उद्धृत अंश के अनुसार अनुग्रह स्वयं इच्छा को उत्पन्न न करता हो। अगस्तीन का, मानव इच्छा को अनुग्रह की दासी कहने में, यह अभिप्राय नहीं था कि भले कार्यों के करने में उसे अनुग्रह के बाद एक प्रकार का द्वितीय स्थान दे। उसका उद्देश्य केवल पेलाजियस के उस घातक मत का खण्डन करना था जिसने मानवीय पुण्य को उद्धार का प्रथम कारण बनाया। जैसा उस समय उसके उद्देश्य के लिए पर्याप्त था, वह यह तर्क देता है कि अनुग्रह सब पुण्य से पहले है, और इस बीच अनुग्रह के स्थायी प्रभाव के दूसरे प्रश्न के विषय में कुछ नहीं कहता, जिसे वह अन्य स्थानों पर उत्कृष्ट रीति से सँभालता है। क्योंकि यह कहकर, जो वह प्रायः कहता है, कि प्रभु अनिच्छुक से आगे बढ़कर उसे इच्छुक बनाता है, और इच्छुक के पीछे चलता है कि वह व्यर्थ इच्छा न करे, वह उसे भले कार्यों का एकमात्र रचयिता बनाता है। वास्तव में, इस विषय में उसके विचार इतने स्पष्ट हैं कि लम्बी व्याख्या की आवश्यकता नहीं। वह कहता है, “मनुष्य हमारी इच्छा में कुछ ऐसा ढूँढ़ने का परिश्रम करते हैं जो हमारा अपना हो, परमेश्वर का नहीं; वे उसे कैसे पाते हैं, यह मैं नहीं जानता” (अगस्तीन, de Remiss. Peccat., lib. 2 c. 18)। पेलाजियस और सेलेस्टियस के विरुद्ध अपनी प्रथम पुस्तक में, मसीह के इस वचन की व्याख्या करते हुए, “जिस किसी ने पिता से सुना और सीखा है, वह मेरे पास आता है” (यूहन्ना 6:45), वह कहता है, “इच्छा को सहायता केवल इसलिए नहीं दी जाती कि वह जाने कि क्या करना चाहिए, वरन् इसलिए भी कि वह जो जानती है उसे करे।” और इस प्रकार, जब परमेश्वर व्यवस्था के अक्षर से नहीं, वरन् आत्मा के अनुग्रह से सिखाता है, तब वह इस प्रकार सिखाता है कि हर कोई जिसने सीखा है, वह केवल जानता और देखता ही नहीं, वरन् इच्छा करता हुआ अभिलाषा करता और कार्य करता हुआ पूरा भी करता है।

8. क्योंकि अब हम उस मुख्य बिन्दु में लगे हैं जिस पर विवाद टिका है, इसलिए हम पाठक को पवित्रशास्त्र के थोड़े-से, और अत्यन्त स्पष्ट, अंशों में बात का सार दें; तत्पश्चात् इसलिए कि कोई हम पर पवित्रशास्त्र को तोड़ने-मरोड़ने का आरोप न लगाए, हम दिखाएँ कि जिस सत्य को हम पवित्रशास्त्र से प्राप्त बताते हैं, उसे इस पवित्र पुरुष (मेरा अभिप्राय अगस्तीन से है) की साक्षी का भी समर्थन प्राप्त है। मैं अपने सिद्धान्त की पुष्टि में पवित्रशास्त्र का हर एक अंश प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं समझता। चुने हुए उत्तम अंशों का संग्रह उन सब अंशों को समझने का मार्ग खोल देगा जो पवित्र ग्रन्थ में इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। दूसरी ओर, मैंने यह अनुचित नहीं समझा कि उस पुरुष से अपनी सहमति दिखाऊँ जिसका अधिकार मसीही जगत में ठीक ही इतना भारी है। यह प्रमाणित करना निश्चय ही सरल है कि भलाई का आरम्भ केवल परमेश्वर से है, और केवल चुने हुए लोगों की ही इच्छा भलाई की ओर झुकी है। परन्तु चुनाव का कारण मनुष्य से बाहर ढूँढ़ा जाना चाहिए; और इसलिए यह निष्कर्ष निकलता है कि सही इच्छा स्वयं मनुष्य से नहीं, वरन् उसी सुइच्छा से है जिससे हम जगत की सृष्टि से पहले चुने गए। एक और तर्क, जो इसी से बहुत मिलता-जुलता है, जोड़ा जा सकता है। सही इच्छा और कार्य का आरम्भ विश्वास से है, इसलिए हमें देखना चाहिए कि विश्वास स्वयं कहाँ से है। परन्तु जब पवित्रशास्त्र सर्वत्र घोषणा करता है कि वह परमेश्वर का सेंत-मेंत दान है, तो यह निष्कर्ष निकलता है कि जब वे मनुष्य जो अपनी सारी आत्मा से स्वभावतः बुराई की ओर झुके हैं, भली इच्छा करने लगते हैं, तो यह केवल अनुग्रह के कारण है। इसलिए जब प्रभु, अपने लोगों के मन-परिवर्तन में, ये दो बातें करने योग्य ठहराता है—अर्थात् पत्थर का हृदय निकाल लेना और माँस का हृदय देना—तब वह खुले रूप से घोषित करता है कि हमारे धार्मिकता की ओर फिरने के लिए जो हमारा है उसे हटाना आवश्यक है, और उसके स्थान पर जो रखा जाता है वह उसी की ओर से है। और वह यह केवल एक ही अंश में नहीं कहता। क्योंकि यिर्मयाह में वह कहता है, “मैं उन्हें एक ही मन और एक ही चाल दूँगा, कि वे सदा मेरा भय मानते रहें;” और थोड़ा आगे वह कहता है, “मैं अपना भय उनके मन में उपजाऊँगा, कि वे मुझ से अलग न हों” (यिर्मयाह 32:39, 40)। फिर यहेजकेल में, “मैं उन्हें एक ही हृदय दूँगा, और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूँगा; और उनकी देह में से पत्थर का हृदय निकालकर उन्हें माँस का हृदय दूँगा” (यहेजकेल 11:19)। वह इससे अधिक स्पष्ट रीति से हमारी इच्छा की हर भली और सही बात को अपना और हमारे लिए अस्वीकृत नहीं कह सकता था, इससे कि वह घोषित करे कि हमारे मन-परिवर्तन में नई आत्मा और नए हृदय की सृष्टि है। इससे सदा दोनों बातें निकलती हैं: कि जब तक हमारी इच्छा पुनः न रची जाए तब तक उससे कुछ भला नहीं निकल सकता, और यह कि पुनः रची जाने के बाद, जहाँ तक वह भली है, वह परमेश्वर की है, हमारी नहीं।

9. इसी दृष्टिकोण के अनुरूप सन्तों की प्रार्थनाएँ भी हैं। इस प्रकार सुलैमान प्रार्थना करता है कि प्रभु “हमारे मन को अपनी ओर फेरे, कि हम उसके सब मार्गों पर चलें, और उसकी आज्ञाओं को मानें” (1 राजाओं 8:58); इससे यह संकेत मिलता है कि हमारा हृदय कुटिल है, और जब तक वह फेरा न जाए, स्वभाव से दिव्य व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह में लिप्त रहता है। फिर भजनों में कहा गया है, “मेरे मन को अपनी चितौनियों की ओर फेर दे” (भजन संहिता 119:36)। क्योंकि हमें सदा हृदय की विद्रोही गति और उस सुधार के बीच के विरोधाभास पर ध्यान देना चाहिए जिससे वह आज्ञाकारिता के अधीन किया जाता है। दाऊद, यह अनुभव करके कि वह कुछ समय के लिए मार्गदर्शक अनुग्रह से वंचित हो गया था, प्रार्थना करता है, “हे परमेश्वर, मेरे भीतर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे अन्तःकरण में स्थिर आत्मा को नये सिरे से डाल” (भजन संहिता 51:10)। क्या यह इस बात की स्वीकृति नहीं कि हृदय के सब भाग अशुद्धता से भरे हैं, और आत्मा में ऐसा मोड़ आ गया है जिसने उसे सीधे से टेढ़ा बना दिया है? और फिर, उस शुद्धि का वर्णन करते हुए, जिसकी वह परमेश्वर द्वारा सृजी जाने वाली वस्तु के रूप में गम्भीरता से माँग करता है, क्या वह कार्य को पूर्णतः उसी का नहीं ठहराता? यदि यह आपत्ति की जाए कि प्रार्थना स्वयं भक्तिपूर्ण और पवित्र भावना का लक्षण है, तो उत्तर देना सरल है कि यद्यपि दाऊद कुछ अंश में पहले ही पश्चाताप कर चुका था, तथापि यहाँ वह उस दुःखद पतन की तुलना अपनी पूर्व दशा से कर रहा था जो उसने अनुभव किया। इसलिए, परमेश्वर से अलग हुए मनुष्य के रूप में बोलते हुए, वह उचित रीति से उन आशीषों के लिए प्रार्थना करता है जो परमेश्वर अपने चुने हुओं को नए जन्म में देता है। इसलिए, मृतक के समान, वह नए सिरे से रचे जाने की अभिलाषा करता है, कि शैतान का दास होने के स्थान पर पवित्र आत्मा का साधन बन जाए। हमारे अभिमान की लालसाएँ विचित्र और भयानक हैं। प्रभु जिस बात की सबसे कठोरता से आज्ञा देता है वह अपने विश्रामदिन का धार्मिक पालन है, अर्थात् हमारे कामों से विश्राम करना; परन्तु जिस बात में हम सबसे अधिक अनिच्छा दिखाते हैं वह अपने कामों को त्यागना और परमेश्वर के कामों को उचित स्थान देना है। यदि अहंकार बीच में न आता, तो हम उस स्पष्ट साक्षी की अनदेखी न कर सकते जो मसीह ने अपने अनुग्रह की प्रभावशीलता के विषय में दी है। उसने कहा, “सच्ची दाखलता मैं हूँ, और मेरा पिता किसान है।” “जैसे डाली यदि दाखलता में बनी न रहे तो अपने आप से नहीं फल सकती, वैसे ही तुम भी यदि मुझ में बने न रहो तो नहीं फल सकते” (यूहन्ना 15:1, 4)। यदि हम अपने आप से उससे अधिक फल नहीं ला सकते जितना जड़ से उखाड़ी हुई और नमी से वंचित दाखलता कली निकाल सकती है, तो अब यह पूछने का स्थान नहीं रहता कि हमारे स्वभाव में भलाई के लिए कितनी योग्यता है। इस निष्कर्ष में कोई अस्पष्टता नहीं, “क्योंकि मुझ से अलग होकर तुम कुछ भी नहीं कर सकते।” वह यह नहीं कहता कि हम अपने लिए पर्याप्त होने से अधिक निर्बल हैं; वरन् हमें कुछ नहीं ठहराकर वह इस विचार को बाहर कर देता है कि हम में कोई, चाहे अत्यन्त अल्प, सामर्थ्य भी है। यदि मसीह में कलम लगाए जाने पर हम उस दाखलता के समान फल लाते हैं जो अपनी बढ़ने की शक्ति भूमि की नमी, आकाश की ओस और सूर्य की पोषक गर्मी से खींचती है, तो मुझे किसी भले कार्य में ऐसा कुछ नहीं दिखता जिसे हम अपना कह सकें, और जो परमेश्वर के हक को न छुए। यह ओछी कुतर्क का सहारा लेना व्यर्थ है कि रस और उत्पन्न करने की शक्ति दाखलता में पहले से विद्यमान है, और इसलिए सब कुछ भूमि या मूल जड़ से लेने के बदले वह अपनी ओर से भी कुछ देती है। हमारे उद्धारकर्ता के शब्दों का अर्थ केवल यह है कि जब हम उससे अलग होते हैं तब हम सूखी, निकम्मी लकड़ी के सिवा कुछ नहीं, क्योंकि जब इस प्रकार अलग होते हैं तब हम में भला करने की सामर्थ्य नहीं रहती, जैसा वह अन्यत्र कहता है, “हर एक पौधा जो मेरे स्वर्गीय पिता ने नहीं लगाया, उखाड़ा जाएगा” (मत्ती 15:13)। इसी प्रकार प्रेरित पौलुस से पहले उद्धृत अंश में वह सारा कार्य परमेश्वर का ठहराता है, “परमेश्वर ही है, जिसने अपनी सुइच्छा निमित्त तुम्हारे मन में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डाला है” (फिलिप्पियों 2:13)। भले कार्य का पहला भाग इच्छा है, दूसरा उसे करने का सशक्त प्रयत्न है।168 परमेश्वर दोनों का रचयिता है। इसलिए अपने लिए कुछ भी हड़पना, चाहे इच्छा में या कार्य में, परमेश्वर से लूट है। यदि कहा जाता कि परमेश्वर निर्बल इच्छा को सहायता देता है, तो हमारे पास कुछ बच सकता था; परन्तु जब कहा जाता है कि वह इच्छा को बनाता है, तब उसकी हर भली बात हमसे बाहर रखी गई है। इसके अतिरिक्त, क्योंकि भली इच्छा भी देह के भार से दबी रहती और उठने से रोकी जाती है, इसलिए यह जोड़ा गया है कि संघर्ष की कठिनाइयों का सामना करने के लिए परमेश्वर तब तक स्थिर प्रयत्न देता है जब तक परिणाम प्राप्त न हो। वास्तव में प्रेरित अन्यथा वह नहीं कह सकता था जो वह अन्यत्र कहता है कि “परमेश्वर वही है जो सब में सब कुछ करता है” (1 कुरिन्थियों 12:6); ये शब्द, जैसा हम पहले देख चुके हैं (खण्ड 6), आत्मिक जीवन की सारी गति को समेटते हैं। इसी कारण दाऊद, यह प्रार्थना करने के बाद, “हे यहोवा, मुझे अपना मार्ग सिखा, तब मैं तेरे सत्य मार्ग पर चलूँगा” यह जोड़ता है, “मेरे हृदय को एक कर कि मैं तेरे नाम का भय मानूँ” (भजन संहिता 86:11); इन शब्दों से यह संकेत करता है कि जो भले मनोभाव के हैं वे भी इतनी विघ्न-बाधाओं के अधीन हैं कि सरलता से व्यर्थ हो जाते और गिर पड़ते हैं, यदि अन्त तक स्थिर रहने के लिए दृढ़ न किए जाएँ। और इसी कारण, एक और अंश में, यह प्रार्थना करने के बाद, “मेरे पाँवों को अपने वचन में दृढ़ कर,” वह माँगता है कि युद्ध चलाने के लिए भी उसे बल दिया जाए, “कोई अनर्थ मुझ पर प्रभुता न करने पाए” (भजन संहिता

119:133)। इस प्रकार प्रभु हम में भले कार्य को आरम्भ भी करता है और पूरा भी, ताकि यह उसी का कार्य हो: पहले, कि इच्छा खराई के लिए प्रेम जन्माए, अभिलाषा की ओर झुके, और उसका अनुसरण करने के लिए प्रेरित और उत्तेजित हो; दूसरे, कि यह चुनाव, अभिलाषा और प्रयत्न असफल न हों, वरन् परिणाम तक आगे बढ़ते रहें; और अन्त में, कि हम बिना रुके चलते रहें और अन्त तक स्थिर रहें।

10. यह इच्छा की गति उस प्रकार की नहीं है जो अनेक युगों तक सिखाई और मानी जाती रही—अर्थात् ऐसी गति जो उसके बाद हमें उसकी आज्ञा मानने या उसका विरोध करने का चुनाव छोड़ देती है, वरन् वह है जो हम पर प्रभावशाली रूप से कार्य करती है। इसलिए हमें क्राइसोस्टम के बार-बार दोहराए गए इस कथन को अस्वीकार करना चाहिए, “जिसे वह खींचता है, उसे स्वेच्छा से खींचता है;” जिससे यह संकेत मिलता है कि प्रभु केवल अपना हाथ बढ़ाता है, और प्रतीक्षा करता है कि देखे हम उसकी सहायता लेना पसन्द करते हैं या नहीं। हम मानते हैं कि जैसा मनुष्य आरम्भ में रचा गया था, वह दोनों ओर झुक सकता था, परन्तु क्योंकि उसने अपने उदाहरण से हमें सिखा दिया है कि यदि परमेश्वर हम में इच्छा और काम करने का प्रभाव न डाले तो स्वतंत्र इच्छा कितनी दयनीय वस्तु है, तो इतनी अल्प मात्रा में दिया गया अनुग्रह हमारे किस काम का होता? वरन्, अपनी ही कृतघ्नता से हम दिव्य अनुग्रह को धुँधला और क्षीण करते हैं। प्रेरित का सिद्धान्त यह नहीं है कि भली इच्छा का अनुग्रह हमें इस शर्त पर दिया जाता है कि हम उसे स्वीकार करें, वरन् यह कि परमेश्वर स्वयं हम में इस प्रकार कार्य करना चाहता है कि हमारे हृदय को अपने आत्मा से चलाए, फेरे और शासित करे, और उस पर अपनी ही सम्पत्ति के रूप में राज्य करे। यहेजकेल प्रतिज्ञा करता है कि चुने हुओं को नई आत्मा दी जाएगी, केवल इसलिए नहीं कि वे उसकी आज्ञाओं पर चल सकें, वरन् इसलिए कि वे वास्तव में उन पर चलें (यहेजकेल 11:19; 36:27)। और हमारे उद्धारकर्ता के इन शब्दों को, “जिस किसी ने पिता से सुना और सीखा है, वह मेरे पास आता है” (यूहन्ना 6:45), केवल यही अर्थ दिया जा सकता है कि परमेश्वर का अनुग्रह अपने आप में प्रभावशाली है। इसे अगस्तीन अपनी पुस्तक De Prædestinatione Sancta में स्थापित करता है। यह अनुग्रह सबको बिना भेद के नहीं दिया जाता, उस प्रचलित सूक्ति के अनुसार (यदि मैं भूलता नहीं तो ऑकैम की), कि वह ऐसे किसी को अस्वीकार नहीं किया जाता जो अपनी ओर से जो कुछ बन पड़े करता है। मनुष्यों को निश्चय ही यह सिखाया जाना चाहिए कि परमेश्वर की कृपा बिना किसी अपवाद के उन सब को दी जाती है जो उसे माँगते हैं; परन्तु क्योंकि केवल वे ही माँगने लगते हैं जिन्हें स्वर्ग अनुग्रह से प्रेरित करता है, इसलिए प्रशंसा का यह अल्पतम अंश भी उससे रोका न जाए। परमेश्वर के आत्मा से नया जन्म पाना और फिर उसके मार्गदर्शन और शासन के अधीन रखा जाना चुने हुओं का विशेषाधिकार है। इसीलिए अगस्तीन उन लोगों का उचित उपहास करता है जो अपने लिए इच्छा करने की कोई सामर्थ्य हड़पते हैं, और उनकी भी निन्दा करता है जो कल्पना करते हैं कि जो सेंत-मेंत चुनाव का विशेष प्रमाण है वह सब को दिया जाता है (अगस्तीन, de Verbis Apost. Serm. 21)। वह कहता है, “स्वभाव सब के लिए समान है, परन्तु अनुग्रह नहीं;” और वह इसे ऐसी दिखावटी चतुराई कहता है “जो केवल घमण्ड से चमकती है, जब वह जो परमेश्वर जिसे चाहता है उसे देता है, सामान्य रूप से सब का माना जाता है।” अन्यत्र वह कहता है, “तू कैसे आया? विश्वास करने से। डर, कि सही मार्ग पाने का पुण्य अपने ऊपर लेकर तू सही मार्ग से नष्ट न हो जाए। तू कहता है, मैं स्वतंत्र चुनाव से आया, अपनी इच्छा से आया। तू घमण्ड क्यों करता है? क्या तू जानना चाहता है कि यह भी तुझे दिया गया? मसीह को पुकारते सुन, ‘कोई मेरे पास नहीं आ सकता जब तक पिता, जिसने मुझे भेजा है, उसे खींच न ले।’ ” और यूहन्ना के शब्दों से (6:44) वह इसे एक निर्विवाद तथ्य ठहराता है कि विश्वासियों के हृदय ऊपर से इतने प्रभावशाली रूप से शासित होते हैं कि वे बिना डिगे हुए स्नेह के साथ चलते हैं। “जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; क्योंकि उसका बीज उसमें बना रहता है” (1 यूहन्ना 3:9)। वह मध्यवर्ती गति जिसकी कल्पना तर्कशास्त्री करते हैं, ऐसी गति जिसे मानने या ठुकराने के लिए हर कोई स्वतंत्र है, प्रभावशाली स्थिरता के सिद्धान्त द्वारा स्पष्ट रूप से बाहर कर दी जाती है।169

168 फ्रेंच में: “La premiere partie des bonnes œuvres est la volonté; l’autre est de s’efforcer a l’executer et le pouvoir faire.”—अर्थात् भले कार्यों का पहला भाग इच्छा है; दूसरा उसे पूरा करने का प्रयत्न करना और ऐसा करने की सामर्थ्य है।

11. अन्त तक स्थिर रहने के विषय में, निश्चय ही उसे परमेश्वर का सेंत-मेंत दान माना गया होता, यदि वह अत्यन्त घातक भूल प्रचलित न होती कि वह मानवीय पुण्य के अनुपात में दिया जाता है, उस स्वागत के अनुसार जो प्रत्येक व्यक्ति प्रथम अनुग्रह को देता है। इससे यह विचार उत्पन्न हुआ कि परमेश्वर के प्रस्तुत किए गए अनुग्रह को ग्रहण करना या ठुकराना पूर्णतः हमारे अपने अधिकार में है; यह विचार ज्यों ही ध्वस्त होता है, उस पर आधारित भूल भी गिर जानी चाहिए। यह भूल वास्तव में दुहरी है। क्योंकि यह सिखाने के अतिरिक्त कि प्रथम अनुग्रह के लिए हमारी कृतज्ञता और उसके हमारे वैध उपयोग का प्रतिफल अनुग्रह की आगामी आपूर्तियों से मिलता है, उसके समर्थक यह जोड़ते हैं कि इसके बाद अनुग्रह अकेला कार्य नहीं करता, वरन् केवल हमारे साथ सहकार्य करता है। पहली बात के विषय में हमें यह मानना चाहिए कि प्रभु, जब वह अपने सेवकों को प्रतिदिन समृद्ध करता और उन पर अपने अनुग्रह के नए दान लादता है, तो इसलिए कि वह उस कार्य को स्वीकार करता और उससे प्रसन्न होता है जो उसने आरम्भ किया है, और उन में ऐसा कुछ पाता है जिसके पीछे वह अनुग्रह का और बड़ा माप दे सके। इसी आशय के ये वचन हैं, “जिसके पास है उसे दिया जाएगा।” “धन्य, हे भले और विश्वासयोग्य दास: तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत वस्तुओं का अधिकारी बनाऊँगा” (मत्ती 25:21, 23, 29; लूका 19:17, 26)। परन्तु यहाँ दो सावधानियाँ आवश्यक हैं। यह नहीं कहा जाना चाहिए कि प्रथम अनुग्रह के वैध उपयोग का प्रतिफल अनुग्रह के आगामी मापों से मिलता है, मानो मनुष्य अपने परिश्रम से परमेश्वर के अनुग्रह को प्रभावशाली बनाता हो, और न यह सोचा जाना चाहिए कि ऐसा कोई प्रतिफल है जिससे वह परमेश्वर का सेंत-मेंत अनुग्रह न रहे। इसलिए मैं मानता हूँ कि विश्वासी परमेश्वर से आशीष के रूप में यह आशा कर सकते हैं कि जितना अच्छा वे पिछले अनुग्रह का उपयोग करेंगे, उतनी ही बड़ी आपूर्ति उन्हें भावी अनुग्रह की मिलेगी; परन्तु मैं कहता हूँ कि यह उपयोग भी प्रभु की ओर से है, और यह प्रतिफल केवल सुइच्छा से सेंत-मेंत दिया जाता है। क्रियाशील और सहकारी अनुग्रह का घिसा-पिटा भेद उतना ही अनुचित और अभागा रूप से प्रयुक्त होता है। अगस्तीन ने निश्चय ही इसका प्रयोग किया, परन्तु उपयुक्त परिभाषा से इसे नरम कर दिया—अर्थात् यह कि परमेश्वर सहकार्य करके उसे पूरा करता है जिसे उसने कार्य करके आरम्भ किया था,—कि दोनों अनुग्रह एक ही हैं, परन्तु अपने प्रभाव उत्पन्न करने की भिन्न रीति के कारण भिन्न नाम पाते हैं। इससे निकलता है कि वह परमेश्वर और मनुष्य के बीच कोई बँटवारा नहीं करता, मानो दोनों की ओर से उचित गति परस्पर सहमति उत्पन्न करती हो। वह केवल अनुग्रह के गुणन को चिह्नित करता है। इसी आशय से वह अन्यत्र कहता है कि मनुष्य में भली इच्छा परमेश्वर के अनेक दानों से पहले आती है; परन्तु इन दानों में यही भली इच्छा भी है। (अगस्तीन, Enchiridion ad Laurent. cap. 32)। इससे निकलता है कि इच्छा के लिए अपना कहकर हड़पने को कुछ नहीं बचता। इसे पौलुस ने स्पष्ट रूप से कहा है। क्योंकि यह कहने के बाद, “परमेश्वर ही है जो तुम में इच्छा और काम, दोनों बातों के करने का प्रभाव डालता है,” वह तुरन्त जोड़ता है, “अपनी सुइच्छा निमित्त” (फिलिप्पियों 2:13); इस अभिव्यक्ति से यह संकेत करता है कि आशीष सेंत-मेंत है। जहाँ तक इस प्रचलित कथन का प्रश्न है कि जब हम प्रथम अनुग्रह को प्रवेश दे चुके, तो हमारे प्रयत्न आगामी अनुग्रह के साथ सहकार्य करते हैं, तो मेरा उत्तर यह है:—यदि अर्थ यह है कि जब प्रभु की सामर्थ्य हमें एक बार धार्मिकता की आज्ञाकारिता के अधीन कर चुकी, तब हम स्वेच्छा से आगे बढ़ते हैं और अनुग्रह की गति का अनुसरण करने की ओर झुके रहते हैं, तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। क्योंकि यह अत्यन्त निश्चित है कि जहाँ परमेश्वर का अनुग्रह राज्य करता है, वहाँ आज्ञा मानने की यह तत्परता भी होती है। और यह तत्परता कहाँ से, सिवाय इसके कि परमेश्वर का आत्मा सर्वत्र अपने से संगत रहते हुए, आज्ञाकारिता का आदि सिद्धान्त उत्पन्न करने के बाद, उसे अन्त तक स्थिर रहने के लिए पालता और दृढ़ करता है? यदि फिर यह अर्थ है कि मनुष्य अपने आप परमेश्वर के अनुग्रह का सहकर्मी होने में समर्थ है, तो मैं इसे अत्यन्त घातक भ्रम मानता हूँ।

169 फ्रेंच में है: “Nous voyons que ce mouvement sans vertu, lequel imaginent les sophistes, est exclus; J’entend ce qu’ils disent, qu Dieu offre seulement sa grace, a telle condition que chacun la refuse ou accepte selon que bon lui semble. Telle reverie, di-je, qui n’est ne chair ne poisson, est exclue, quand il est dit que Dieu nous fait tellement perseverer que nous sommes hors de danger de decliver.”—अर्थात् हम देखते हैं कि यह निर्बल गति, जिसकी कल्पना तर्कशास्त्री करते हैं, बाहर कर दी गई है; मेरा अभिप्राय उनके उस मत से है कि परमेश्वर अपना अनुग्रह केवल इस शर्त पर प्रस्तुत करता है कि हर कोई अपनी इच्छानुसार उसे ठुकराए या स्वीकार करे। ऐसी कल्पना, मैं कहता हूँ, जो न मांस है न मछली, बाहर कर दी जाती है, जब कहा गया है कि परमेश्वर हमें इस प्रकार स्थिर रखता है कि हम गिरने के संकट से बाहर हैं।

12. इस मत के समर्थन में कुछ लोग प्रेरित के इन शब्दों का अज्ञानतापूर्ण और झूठा प्रयोग करते हैं: “मैंने उन सब से बढ़कर परिश्रम किया: तौभी मैंने नहीं, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह ने जो मुझ पर था” (1 कुरिन्थियों 15:10)। वे इनका यह अर्थ बताते हैं कि जैसे पौलुस अन्य सब प्रेरितों से अपने आप को बढ़कर ठहराने में कुछ ढिठाई से बोलता प्रतीत हो सकता था, तो वह इस अभिव्यक्ति को परमेश्वर के अनुग्रह को प्रशंसा देकर सुधारता है, परन्तु साथ ही अपने आप को अनुग्रह का सहकर्मी कहता है। यह आश्चर्य की बात है कि यह इतने लेखकों के लिए ठोकर का कारण बना है, जो अन्यथा आदरणीय हैं। प्रेरित यह नहीं कहता कि परमेश्वर के अनुग्रह ने उसके साथ परिश्रम किया ताकि वह उसे परिश्रम में सहभागी बना दे। वरन् वह अपने प्रथम कथन को इस प्रकार बदलकर परिश्रम का सारा पुण्य अनुग्रह ही को सौंप देता है, “मैंने नहीं,” वह कहता है, “परिश्रम किया, परन्तु परमेश्वर के अनुग्रह ने जो मेरे साथ था।” जिन्होंने भ्रमपूर्ण व्याख्या अपनाई है वे अभिव्यक्ति की एक अस्पष्टता से, या कहें एक बेतुके अनुवाद से बहके हैं, जिसमें यूनानी निश्चयवाचक शब्द का बल अनदेखा कर दिया गया है। क्योंकि शब्दशः लें तो प्रेरित यह नहीं कहता कि अनुग्रह उसके साथ सहकर्मी था, वरन् यह कि वह अनुग्रह जो उसके साथ था, अकेला कार्य करनेवाला था। और यह संक्षेप में, परन्तु अस्पष्ट रूप से नहीं, अगस्तीन ने सिखाया है जब वह कहता है, “मनुष्य में भली इच्छा परमेश्वर के अनेक दानों से पहले आती है, परन्तु सब दानों से पहले नहीं, क्योंकि जो इच्छा पहले आती है वह स्वयं उन दानों की गिनती में है।” वह कारण जोड़ता है, “क्योंकि लिखा है, ‘मेरा परमेश्वर करुणामय है, वह मुझ से पहले आएगा,’ (भजन संहिता 59:10), और ‘निश्चय भलाई और करुणा जीवन भर मेरे साथ-साथ बनी रहेंगी,’ (भजन संहिता 23:6); वह अनिच्छुक से आगे बढ़कर उसे इच्छुक बनाता है; वह इच्छुक के पीछे-पीछे चलता है कि वह व्यर्थ इच्छा न करे।” इससे बर्नार्ड सहमत है, जो कलीसिया को इस प्रकार प्रार्थना करते हुए प्रस्तुत करता है, “मुझे खींच, जो कुछ अंश में अनिच्छुक हूँ, और मुझे इच्छुक बना; मुझे खींच, जो आलस्य से पीछे घिसट रही हूँ, और मुझे दौड़ने वाली बना” (Serm. 2 in Cantic)।

13. अब हम अगस्तीन को उसके अपने शब्दों में सुनें, ऐसा न हो कि हमारे युग के पेलाजियन, मेरा अभिप्राय सोरबोन के तर्कशास्त्रियों से है, अपनी आदत के अनुसार हम पर सारी प्राचीनता के विरोध का आरोप लगाएँ। इसमें वे वास्तव में अपने पिता पेलाजियस का अनुकरण करते हैं, जिसने प्राचीन काल में अगस्तीन पर ऐसा ही आरोप लगाया था। वैलेन्टिनस को सम्बोधित अपने ग्रन्थ De Correptione et Gratia के दूसरे अध्याय में अगस्तीन विस्तार से वह समझाता है जिसे मैं संक्षेप में, परन्तु उसी के शब्दों में कहूँगा: कि आदम को भलाई में स्थिर रहने का अनुग्रह दिया गया था यदि वह इच्छा करता; हमें इच्छा करने का अनुग्रह दिया गया है, और इच्छा के द्वारा वासना पर जय पाने का: कि आदम में, इसलिए, सामर्थ्य थी यदि वह इच्छा करता, परन्तु उसने सामर्थ्य रखने की इच्छा न की, जबकि हमें इच्छा और सामर्थ्य दोनों दी गई हैं; कि मनुष्य की मूल स्वतंत्रता यह थी कि वह पाप न कर सके, परन्तु हमारी स्वतंत्रता कहीं अधिक बड़ी है—अर्थात् पाप कर ही न सकना। और ऐसा न समझा जाए, जैसा लोम्बार्ड भूल से करता है (lib. 2 Dist. 25), कि वह भावी दशा की सिद्धता की बात कर रहा है, इसलिए वह थोड़ी ही देर बाद सब सन्देह दूर कर देता है जब वह कहता है, “क्योंकि सन्तों की इच्छा पवित्र आत्मा से इतनी प्रज्वलित है कि वे समर्थ हैं क्योंकि वे इच्छुक हैं; और इच्छुक हैं क्योंकि परमेश्वर उनमें इस प्रकार इच्छा करने का कार्य करता है।” क्योंकि यदि ऐसी निर्बलता में (जिसमें, फिर भी, अभिमान को दबाने के लिए, “सामर्थ्य” “सिद्ध” की जानी है) उनकी अपनी इच्छा उनके पास इस अर्थ में छोड़ दी गई हो कि परमेश्वर की सहायता से वे, यदि इच्छा करें, तो समर्थ हैं, जबकि साथ ही परमेश्वर उनमें इस प्रकार कार्य नहीं करता कि वे इच्छा करें; तो इतने प्रलोभनों और दुर्बलताओं के बीच इच्छा स्वयं ही हार मान लेती, और फलस्वरूप वे स्थिर रहने में समर्थ न होते। इसलिए मानव इच्छा की दुर्बलता का सामना करने और उसे असफल होने से रोकने के लिए, वह चाहे कितनी ही निर्बल हो, दिव्य अनुग्रह को उस पर अविभाज्य और निरन्तर कार्य करनेवाला बनाया गया। अगस्तीन (उसी ग्रन्थ में, अध्याय 14) आगे इस प्रश्न में पूरी तरह उतरता है कि जब परमेश्वर हमारे हृदयों को प्रभावित करता है तब वे गति का अनुसरण कैसे करते हैं, और वास्तव में अनिवार्य रूप से कहता है कि प्रभु मनुष्यों को उनकी अपनी इच्छाओं के द्वारा खींचता है; परन्तु ऐसी इच्छाओं के द्वारा जिन्हें उसने स्वयं उत्पन्न किया है। अब हमारे पास अगस्तीन की वह साक्षी है जो उस सत्य के लिए है जिसे हम विशेष रूप से स्थापित करना चाहते हैं—अर्थात् यह कि प्रभु द्वारा प्रस्तुत अनुग्रह केवल ऐसा नहीं जिसे ग्रहण या अस्वीकार करने का पूर्ण स्वतंत्र चुनाव हर व्यक्ति के पास हो, वरन् ऐसा अनुग्रह है जो हृदय में चुनाव और इच्छा दोनों उत्पन्न करता है: ताकि जितने भले कार्य आगे चलते हैं वे सब उसके फल और प्रभाव हों; वह एकमात्र इच्छा जो आज्ञा मानती है वही इच्छा है जिसे अनुग्रह ने स्वयं रचा है। एक अन्य स्थान पर अगस्तीन ये शब्द प्रयोग करता है, “हम में हर भला कार्य केवल अनुग्रह से सम्पन्न होता है” (अगस्तीन, Ep. 105)।

14. अन्यत्र यह कहने में कि अनुग्रह के द्वारा इच्छा हटाई नहीं जाती, वरन् बुरी से भली में बदली जाती है, और भली हो जाने के बाद सहायता पाती है,—उसका अभिप्राय केवल यह है कि मनुष्य को हृदय की गति के बिना, मानो किसी बाहरी आवेग से,170 नहीं खींचा जाता, वरन् वह भीतर से इस प्रकार प्रभावित किया जाता है कि हृदय से आज्ञा माने। यह घोषित करते हुए कि अनुग्रह विशेष रूप से और सेंत-मेंत चुने हुओं को दिया जाता है, वह बोनिफेस को इस प्रकार लिखता है: “हम जानते हैं कि दिव्य अनुग्रह सब मनुष्यों को नहीं दिया जाता, और जिन्हें दिया जाता है उन्हें वह न कर्मों के पुण्य के अनुसार, न इच्छा के पुण्य के अनुसार, वरन् सेंत-मेंत अनुग्रह से दिया जाता है: जिन्हें नहीं दिया जाता उनके विषय में हम जानते हैं कि उसका न दिया जाना परमेश्वर का धर्ममय न्याय है” (अगस्तीन, ad Bonifac. Ep. 106)। उसी पत्र में वह उन लोगों के मत के विरुद्ध ज़ोरदार तर्क करता है जो मानते हैं कि आगामी अनुग्रह प्रथम अनुग्रह को न ठुकराने के प्रतिफल के रूप में मानवीय पुण्य को दिया जाता है। क्योंकि वह पेलाजियस पर दबाव डालता है कि वह मान ले कि हमें हर कार्य के लिए सेंत-मेंत अनुग्रह आवश्यक है, और यह कि केवल इसी तथ्य से कि वह सचमुच अनुग्रह है, वह कर्मों का प्रतिफल नहीं हो सकता। परन्तु इस विषय को उससे अधिक संक्षेप में नहीं समेटा जा सकता जितना उसके ग्रन्थ De Correptione et Gratia के आठवें अध्याय में है, जहाँ वह दिखाता है, पहला, कि मानव इच्छा स्वतंत्रता के द्वारा अनुग्रह नहीं पाती, वरन् अनुग्रह के द्वारा स्वतंत्रता पाती है। दूसरा, कि उसी अनुग्रह के द्वारा, हृदय पर आनन्द की अनुभूति अंकित हो जाने से, वह स्थिर रहने के लिए सधाया जाता है और अजेय धैर्य से दृढ़ किया जाता है। तीसरा, कि जब तक अनुग्रह इच्छा को शासित करता है तब तक वह कभी नहीं गिरती; परन्तु जब अनुग्रह उसे त्याग देता है, तब वह तुरन्त गिर पड़ती है। चौथा, कि परमेश्वर की सेंत-मेंत दया से इच्छा भलाई की ओर फेरी जाती है, और फेरी जाने पर स्थिर रहती है। पाँचवाँ, कि इच्छा का भलाई की ओर निर्देश, और इस प्रकार निर्देशित होने के बाद उसकी स्थिरता, पूर्णतः परमेश्वर की इच्छा पर निर्भर है, किसी मानवीय पुण्य पर नहीं। इस प्रकार वह इच्छा (स्वतंत्र इच्छा, यदि तुम उसे ऐसा कहना चाहो), जो मनुष्य के पास छोड़ी गई है, वैसी है जैसा वह एक अन्य स्थान पर (Ep. 46) उसका वर्णन करता है, ऐसी इच्छा जो अनुग्रह के बिना न परमेश्वर की ओर फेरी जा सकती है, न परमेश्वर में बनी रह सकती है; ऐसी इच्छा जो, उसकी योग्यता जो भी हो, अपनी सारी योग्यता अनुग्रह से पाती है।

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