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कर्मों की गर्व की जानेवाली योग्यता, जो परमेश्वर की महिमा को, धार्मिकता देने में, और उद्धार की निश्चयता को, दोनों को नष्ट करती है
अध्याय 15।
कर्मों की गर्व की जानेवाली योग्यता, जो परमेश्वर की महिमा को, धार्मिकता देने में, और उद्धार की निश्चयता को, दोनों को नष्ट करती है।
इस अध्याय के विभाग ये हैं,—I. मुफ़्त धर्मी ठहराए जाने के सिद्धान्त के विरुद्ध यह प्रश्न उठाया जाता है कि क्या कर्म परमेश्वर की कृपा के योग्य ठहरते हैं या नहीं, खण्ड 1। इस प्रश्न का उत्तर, खण्ड 2 और 3। II. योग्यता के भ्रामक सिद्धान्त के समर्थन में प्रस्तुत किए जानेवाले पवित्रशास्त्र के कुछ अंशों की व्याख्या, खण्ड 4 और 5। III. अर्ध-पेलागीय स्कूली धर्मशास्त्रियों की कुतर्कणा का खण्डन, खण्ड 6 और 7। IV. निष्कर्ष, जिसमें प्रमाणित किया गया है कि रूढ़िवादी सिद्धान्त पर्याप्त है, खण्ड 8।
खण्ड।
1. संक्षिप्त पुनरावृत्ति के बाद इस प्रश्न पर विचार कि क्या भले कर्म परमेश्वर की कृपा के योग्य ठहरते हैं या नहीं।
2. पहला उत्तर, जिसमें योग्यता शब्द का अर्थ निश्चित किया गया है। यह शब्द कर्मों पर अनुचित रीति से लागू किया जाता है, परन्तु अगस्तीन, क्राइसोस्टम और बर्नार्ड ने इसे अच्छे अर्थ में प्रयोग किया।
3. प्रश्न का दूसरा उत्तर। पहले नकारात्मक रूप में, फिर एक स्वीकृति के रूप में। कर्मों को प्रतिफल देने में परमेश्वर का कितना भाग माना जाए और मनुष्य का कितना। भले कर्म परमेश्वर को क्यों भाते हैं और उन्हें करनेवालों के लिए क्यों लाभदायक हैं। कर्मों के द्वारा धार्मिकता खोजने की कृतघ्नता। यह दो उपमाओं से दिखाया गया है।
4. सिराख की पुस्तक से पहली आपत्ति। इब्रानियों की पत्री से दूसरी आपत्ति। दोनों आपत्तियों के दो उत्तर। एक निर्बल भेद का खण्डन।
429 फ्रांसीसी में, “Brief, en toutes ces facons de parler, ou il est fait mention de bonnes œuvres, il n’est pas question de la cause pourquoy Dieu fait bien aux siens, mais seulement de l’ordre qu’il y tient;”—संक्षेप में, उन सब अभिव्यक्तियों में जिनमें भले कर्मों का उल्लेख है, यह प्रश्न नहीं है कि परमेश्वर अपने लोगों का भला क्यों करता है, बल्कि केवल यह कि वह उसमें किस क्रम का पालन करता है।
5. तीसरा और सबसे पूर्ण उत्तर, जो हमें मसीह की ओर, उद्धार की एकमात्र नींव के रूप में, लौटाता है। मसीह किस प्रकार हमारी धार्मिकता है। इससे स्पष्ट है कि हमारे पास मसीह में सब कुछ है और उसके पास हम में कुछ नहीं।
6. जो कुतर्क मसीह की योग्यता को नष्ट करके मनुष्य की योग्यता स्थापित करता है, उससे हमें घृणा करनी चाहिए। इस अभक्ति का पवित्रशास्त्र के स्पष्ट अंशों से खण्डन।
7. लोम्बार्ड से निकाली गई नवीनतर सोफ़िस्टों की भूलें। अगस्तीन से उनका खण्डन। पवित्रशास्त्र से भी।
8. निष्कर्ष, जिसमें दिखाया गया है कि जो नींव डाली गई है वह शिक्षा, उपदेश और सान्त्वना के लिए पर्याप्त है। धर्मी ठहराए जाने के रूढ़िवादी सिद्धान्त का सारांश।
1. इस विषय का प्रमुख बिन्दु अब समझाया जा चुका है: यदि धर्मी ठहराया जाना कर्मों पर निर्भर हो, तो वह परमेश्वर की दृष्टि में कभी टिक नहीं सकता, इसलिए वह केवल परमेश्वर की दया और मसीह की सहभागिता पर, और इसलिए केवल विश्वास पर निर्भर होना चाहिए। परन्तु आइए हम उस बिन्दु पर सावधानी से ध्यान दें जिस पर सारा विषय टिका है, ताकि हम उस सामान्य भ्रम में न उलझ जाएँ जो न केवल साधारण लोगों में, बल्कि विद्वानों में भी है। क्योंकि जैसे ही विश्वास से या कर्मों से धर्मी ठहराए जाने का प्रश्न उठता है, वे उन अंशों की ओर दौड़ पड़ते हैं जो कर्मों को परमेश्वर की दृष्टि में कुछ योग्यता का श्रेय देते प्रतीत होते हैं, मानो कर्मों से धर्मी ठहराया जाना तभी प्रमाणित हो जाता है जब यह प्रमाणित हो कि परमेश्वर के पास कर्मों का कुछ मूल्य है। ऊपर हमने स्पष्ट दिखाया है कि कर्मों से धर्मी ठहराया जाना केवल व्यवस्था की सिद्ध और पूर्ण पूर्ति में है, और इसलिए कोई मनुष्य कर्मों से धर्मी नहीं ठहरता जब तक कि वह सिद्धता के शिखर तक न पहुँचा हो, और सबसे छोटे अपराध का भी दोषी न ठहराया जा सके। परन्तु एक और अलग प्रश्न है: यद्यपि कर्म किसी प्रकार धर्मी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं हैं, तो क्या वे परमेश्वर की कृपा के योग्य नहीं ठहरते?
2. पहले, योग्यता (Merit) शब्द के विषय में मुझे यह कहना है कि जिसने भी, जो कोई भी था, सबसे पहले इसे मानवीय कर्मों पर, ईश्वरीय न्याय-आसन के सन्दर्भ में लागू किया, उसने विश्वास की शुद्धता के लिए बहुत बुरा परामर्श दिया। मैं शब्दों के विवादों से स्वेच्छा से दूर रहता हूँ, परन्तु मैं चाहता हूँ कि मसीही लेखकों ने सदा यह संयम रखा होता कि जब आवश्यकता न थी तब पवित्रशास्त्र के लिए पराए शब्दों का प्रयोग करने का विचार भी न करते—ऐसे शब्द जो बहुत ठोकर तो उत्पन्न कर सकते थे, परन्तु फल बहुत कम। मैं पूछता हूँ, योग्यता शब्द को लाने की क्या आवश्यकता थी, जबकि कर्मों का मूल्य किसी दूसरे शब्द से, बिना ठोकर के, पूरी तरह व्यक्त हो सकता था? उसमें कितनी ठोकर भरी है, यह संसार अपनी बड़ी हानि के साथ दिखा रहा है। यह निश्चित है कि वह ऊँचा सुनाई देनेवाला शब्द होने के कारण केवल परमेश्वर के अनुग्रह को धुँधला कर सकता है और मनुष्यों में हानिकारक अभिमान जगा सकता है। मैं मानता हूँ कि प्राचीन कलीसियाई लेखकों ने इसका प्रयोग किया, और मैं चाहता हूँ कि उन्होंने एक शब्द के दुरुपयोग से आनेवाली पीढ़ियों को विधर्म की सामग्री न दी होती, यद्यपि कुछ अंशों में वे स्वयं दिखाते हैं कि वे सत्य को हानि पहुँचाना नहीं चाहते थे। क्योंकि अगस्तीन कहते हैं, “मनुष्य की योग्यताएँ, जो आदम में नष्ट हो गईं, यहाँ चुप रहें, और परमेश्वर का अनुग्रह यीशु मसीह के द्वारा राज्य करे” (अगस्तीन, de Prædest. Sanct.)। फिर, “पवित्र लोग अपनी योग्यताओं को कुछ नहीं मानते; हे परमेश्वर, वे सब कुछ केवल तेरी दया का श्रेय देंगे” (अगस्तीन, Psal. 139 में)। फिर, “और जब मनुष्य देखता है कि जो भी भलाई उसमें है वह उसकी अपनी नहीं, बल्कि उसके परमेश्वर की है, तब वह देखता है कि उसमें जो कुछ भी सराहा जाता है वह उसकी अपनी योग्यताओं का नहीं, बल्कि ईश्वरीय दया का है” (अगस्तीन, Psal. 88 में)। आप देखते हैं कि वे मनुष्य को भला करने की सामर्थ्य से इनकार करते हैं और इस प्रकार योग्यता को धूल में मिला देते हैं। क्राइसोस्टम कहते हैं, “यदि हमारे कुछ कर्म परमेश्वर की मुफ़्त बुलाहट के पीछे आते हैं, तो वे प्रतिदान और ऋण हैं; परन्तु परमेश्वर के दान अनुग्रह, कृपा और बड़ी उदारता हैं।” परन्तु नाम के विषय में और कुछ न कहकर, आइए हम वस्तु पर ध्यान दें। मैंने पहले बर्नार्ड का एक अंश उद्धृत किया था: “जैसे योग्यता के लिए योग्यता पर भरोसा न करना पर्याप्त है, वैसे ही दण्ड के लिए योग्यता से रहित होना पर्याप्त है” (बर्नार्ड, Cantic. Serm. 98 में)। वे तुरन्त एक व्याख्या जोड़ते हैं जो कथन की कठोरता को कम करती है, जब वे कहते हैं, “इसलिए योग्यताएँ पाने में सावधान रहो; जब वे तुम्हारे पास हों, तो जानो कि वे दी गई थीं; ईश्वरीय दया से फल की आशा रखो, और तुम दरिद्रता, कृतघ्नता और अभिमान के सब संकटों से बच गए। धन्य है वह कलीसिया जो न अभिमान के बिना योग्यता की कमी रखती है, न योग्यता के बिना अभिमान।” कुछ पहले उन्होंने भरपूरी से दिखाया था कि उन्होंने शब्दों का प्रयोग खरे अर्थ में किया, यह कहकर, “कलीसिया योग्यताओं के विषय में क्यों चिन्तित हो? परमेश्वर ने उसे घमण्ड का अधिक दृढ़ और निश्चित आधार दिया है। परमेश्वर अपने आप का इनकार नहीं कर सकता; जो उसने प्रतिज्ञा की है वह करेगा। इसलिए यह पूछने का कोई कारण नहीं कि हम किन योग्यताओं से आशिषों की आशा करें; विशेषकर जब तुम सुनते हो, ‘प्रभु यहोवा यों कहता है; हे इस्राएल के घराने, मैं यह तुम्हारे निमित्त नहीं, परन्तु अपने पवित्र नाम के निमित्त करता हूँ,’ (यहेजकेल 36:22)। योग्यता के लिए यह जानना पर्याप्त है कि योग्यताएँ पर्याप्त नहीं हैं।” 3. हमारे सब कर्म क्या योग्यता पा सकते हैं, यह पवित्रशास्त्र तब दिखाता है जब वह घोषणा करता है कि वे परमेश्वर की दृष्टि के सामने ठहर नहीं सकते, क्योंकि वे अशुद्धता से भरे हैं; आगे वह दिखाता है कि व्यवस्था का सिद्ध पालन (यदि वह कहीं मिल सके) क्या योग्यता पाएगा, जब वह आज्ञा देता है, “इसी रीति से तुम भी, जब उन सब कामों को कर चुको जिनकी आज्ञा तुम्हें दी गई थी, तो कहो, हम निकम्मे दास हैं; जो हमें करना चाहिए था वही हमने किया है” (लूका 17:10); क्योंकि हम परमेश्वर को कोई स्वेच्छा की भेंट नहीं देते, केवल वह देय सेवा चुकाते हैं जिससे कोई कृपा अर्जित नहीं होती। और फिर भी वे भले कर्म जो प्रभु ने हमें दिए हैं, उन्हें वह हमारे भी गिनता है, और घोषणा करता है कि वे न केवल उसे स्वीकार्य हैं, बल्कि वह उनका प्रतिफल देगा। बदले में हमारा काम यह है कि हम इस बड़ी प्रतिज्ञा से उत्साहित हों और अपना साहस बनाए रखें, कि हम भला करने में थकें नहीं, बल्कि परमेश्वर की बड़ी कृपा के लिए उचित कृतज्ञता अनुभव करें। इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमारे कर्मों में जो कुछ भी प्रशंसा के योग्य है वह ईश्वरीय अनुग्रह के कारण है, और उसका एक कण भी ऐसा नहीं जिसे हम उचित रूप से अपना ठहरा सकें। यदि हम इसे सच्चाई और गम्भीरता से मान लें, तो न केवल भरोसा, बल्कि योग्यता का हर विचार ही मिट जाता है। मैं कहता हूँ कि हम सोफ़िस्टों की तरह कर्मों की प्रशंसा को परमेश्वर और मनुष्य में नहीं बाँटते, बल्कि उसे प्रभु के लिए पूर्ण और अक्षुण्ण रखते हैं। हम मनुष्य के लिए केवल यही ठहराते हैं कि वह अपनी अशुद्धता से उन कर्मों को भी जो भले थे, दूषित और अपवित्र कर देता है। मनुष्य से निकलनेवाली सबसे सिद्ध वस्तु भी सदा किसी न किसी दाग से दूषित होती है। इसलिए यदि प्रभु मानवीय कर्मों में से सर्वोत्तम को न्याय में लाए, तो वह उनमें अपनी धार्मिकता तो देखेगा, परन्तु मनुष्य का अपमान और लज्जा भी देखेगा। इस प्रकार भले कर्म परमेश्वर को भाते हैं, और उनके कर्ताओं के लिए निष्फल नहीं हैं, क्योंकि प्रतिफल के रूप में वे परमेश्वर से और भी अधिक आशिषें पाते हैं, इसलिए नहीं कि वे इसके योग्य हैं, बल्कि इसलिए कि ईश्वरीय कृपालुता स्वयं ही उन पर यह मूल्य रखना चाहती है। फिर भी हमारी दुष्टता ऐसी है कि परमेश्वर की इस उदारता से सन्तुष्ट न होकर, जो उन कर्मों को भी प्रतिफल देती है जो उसके योग्य बिलकुल नहीं हैं, हम अपवित्र महत्त्वाकांक्षा से यह मानते हैं कि जो पूरी तरह ईश्वरीय दानशीलता का देय है वह कर्मों की योग्यता के कारण चुकाया जाता है। यहाँ मैं हर मनुष्य की सामान्य बुद्धि से पूछता हूँ। यदि कोई मनुष्य जिसे दूसरे की उदारता से किसी खेत की उपज का उपभोग मिला है, उस खेत के स्वामित्व का दावा खड़ा कर दे, तो क्या वह अपनी कृतघ्नता के कारण पहले दी गई उस सुविधा को खोने के योग्य नहीं है? इसी प्रकार यदि कोई दास, जो स्वतन्त्र किया गया है, अपनी मुक्त किए गए दास की दीन दशा को छिपाए और यह प्रचार करे कि वह स्वतन्त्र जन्मा था, तो क्या वह अपनी पहली दासता में लौटाए जाने के योग्य नहीं है? कोई उपकार तभी उचित रूप से भोगा जा सकता है जब हम न तो अपने लिए उससे अधिक दावा करें जितना दिया गया है, न उसके कर्ता को उसकी उचित स्तुति से वंचित करें; बल्कि जब हम इस प्रकार आचरण करें कि यह प्रकट हो कि दिया हुआ उपकार किसी रीति से अब भी देनेवाले ही का है। परन्तु यदि मनुष्यों के प्रति यही संयम रखना चाहिए, तो हर कोई अपने मन में सोचे और विचार करे कि परमेश्वर का क्या देय है।
4. मैं जानता हूँ कि सोफ़िस्ट कुछ अंशों का दुरुपयोग यह प्रमाणित करने के लिए करते हैं कि पवित्रशास्त्र परमेश्वर के सन्दर्भ में योग्यता शब्द का प्रयोग करता है। वे सिराख की पुस्तक का एक अंश उद्धृत करते हैं: “दया हर मनुष्य को उसके कर्मों की योग्यता के अनुसार स्थान देगी” (सिराख 16:14); और इब्रानियों की पत्री से: “भलाई करना और उदारता न भूलो; क्योंकि ऐसे बलिदानों से परमेश्वर प्रसन्न होता है” (इब्रानियों 13:16)। मैं अब सिराख की पुस्तक के अधिकार को अस्वीकार करने का अपना अधिकार छोड़ता हूँ; परन्तु मैं इनकार करता हूँ कि सिराख के शब्द, चाहे उसका लेखक कोई भी रहा हो, विश्वसनीयता से उद्धृत किए गए हैं। यूनानी पाठ यह है: “वह सब दया के लिए स्थान बनाएगा: क्योंकि हर एक अपने कर्मों के अनुसार पाएगा।” यही सही पाठ है, और लैटिन अनुवाद में बिगाड़ दिया गया है, यह वाक्य की बनावट से भी और पिछले सन्दर्भ से भी स्पष्ट है। इब्रानियों की पत्री में एक छोटे-से शब्द पर उनकी कुतर्कणा के लिए कोई स्थान नहीं, क्योंकि यूनानी में प्रेरित केवल यह कहता है कि ऐसे बलिदान प्रसन्न करनेवाले और परमेश्वर को ग्रहणयोग्य हैं। यही अकेला हमारे अभिमान की धृष्टता को शान्त करने और दबाने तथा हमें पवित्रशास्त्र के नियम से परे कर्मों को मूल्य देने से रोकने के लिए पर्याप्त होना चाहिए। इसके अतिरिक्त पवित्रशास्त्र की शिक्षा यह है कि हमारे भले कर्म निरन्तर अनेक दागों से ढँके रहते हैं, जिनसे परमेश्वर उचित रूप से अप्रसन्न होता और हम पर क्रोधित होता है, इसलिए वे उसे मनाने और उसकी कृपा को हमारी ओर बुलाने से बहुत दूर हैं; और फिर भी, अपनी सहनशीलता के कारण वह उन्हें पूरी कठोरता से नहीं जाँचता, बल्कि उन्हें ऐसे स्वीकार करता है मानो वे अत्यन्त शुद्ध हों; और इसलिए अयोग्य होने पर भी उन्हें वर्तमान और भविष्य, दोनों की असंख्य आशिषों से प्रतिफल देता है। क्योंकि मैं उस भेद को नहीं मानता जो अन्यथा विद्वान और भक्त मनुष्यों ने ठहराया है, कि भले कर्म इस जीवन में हमें दी जानेवाली कृपाओं के योग्य ठहरते हैं, जबकि अनन्त जीवन केवल विश्वास का प्रतिफल है। हमारे परिश्रमों का प्रतिदान और हमारे संघर्ष का मुकुट हमारा प्रभु प्रायः सदा स्वर्ग में रखता है। दूसरी ओर, इस बात का श्रेय कर्मों की योग्यता को देना, और अनुग्रह को न देना, कि हम प्रभु के दूसरे दानों से लादे जाते हैं, पवित्रशास्त्र की शिक्षा के विपरीत है। क्योंकि यद्यपि मसीह कहता है, “जिसके पास है उसे और दिया जाएगा;” “तू थोड़े में विश्वासयोग्य रहा, मैं तुझे बहुत का अधिकारी बनाऊँगा,” (मत्ती 25:29, 21), तथापि वह साथ ही दिखाता है कि विश्वासियों को सब अतिरिक्त दान उसकी मुफ़्त कृपालुता से हैं: “अहो, सब प्यासे लोगो, पानी के पास आओ; और जिसके पास रुपया न हो, तुम भी आकर मोल लो और खाओ; हाँ, आकर बिना रुपए और बिना दाम दाखमधु और दूध मोल लो” (यशायाह 55:1)। इसलिए विश्वासियों को दी जानेवाली उद्धार की हर सहायता, और स्वयं धन्यता, पूर्णतः परमेश्वर का दान है, और फिर भी दोनों में प्रभु गवाही देता है कि वह कर्मों का हिसाब रखता है, क्योंकि हमारे प्रति अपने प्रेम की महानता प्रकट करने के लिए वह न केवल हमें, बल्कि उन दानों को भी, जो उसने हमें दिए हैं, इस प्रकार बहुत आदर देता है।
5. यदि बीते युगों में इन बातों को ठीक रीति से सँभाला और पचाया गया होता, तो इतने उपद्रव और मतभेद कभी न उठते। पौलुस कहता है कि मसीही सिद्धान्त की रचना में उस नींव को बनाए रखना आवश्यक है जो उसने कुरिन्थियों के बीच डाली थी, “उस नींव को छोड़ जो पड़ी है, और वह यीशु मसीह है, कोई दूसरी नींव नहीं डाल सकता” (1 कुरिन्थियों 3:11)। तो मसीह में हमारी नींव क्या है?
क्या यह कि वह उद्धार को आरम्भ करता है और उसे पूरा करना हम पर छोड़ देता है? क्या यह कि उसने केवल मार्ग खोल दिया और हमें अपनी ही सामर्थ्य से उस पर चलने को छोड़ दिया? बिलकुल नहीं, बल्कि जैसा पौलुस ने कुछ पहले घोषित किया था, यह मानना है कि वह हमें धार्मिकता के लिए दिया गया है। इसलिए जिस मनुष्य के पास मसीह में पूरी धार्मिकता नहीं है, वह उसमें भली-भाँति स्थापित नहीं है, क्योंकि प्रेरित यह नहीं कहता कि वह हमारी धार्मिकता प्राप्त करने में सहायता करने के लिए भेजा गया, बल्कि कहता है कि वह स्वयं हमारी धार्मिकता होने को था। इसी प्रकार कहा गया है कि परमेश्वर ने “जगत की उत्पत्ति से पहले हमें उसमें चुन लिया,” हमारी योग्यता के अनुसार नहीं, बल्कि “अपनी इच्छा के भले अभिप्राय के अनुसार;” कि उसमें “हमें उसके लहू के द्वारा छुटकारा, अर्थात् अपराधों की क्षमा मिली है;” कि “उसके क्रूस के लहू के द्वारा” मेल-मिलाप हुआ है; कि हम उसके लहू से मेल-मिलाप पाए हैं; कि उसकी सुरक्षा में रखे जाकर हम अन्त में नाश होने के संकट से छुड़ाए गए हैं; कि इस प्रकार उसमें कलम लगाए जाकर हम अनन्त जीवन के भागी बनाए गए हैं, और परमेश्वर के राज्य में प्रवेश की आशा रखते हैं।430 बात यहीं समाप्त नहीं होती। उसकी सहभागिता में लिए जाने पर, यद्यपि हम अब भी मूर्ख हैं, वह हमारी बुद्धि है; यद्यपि हम अब भी पापी हैं, वह हमारी धार्मिकता है; यद्यपि हम अशुद्ध हैं, वह हमारी शुद्धता है; यद्यपि हम निर्बल, निहत्थे और शैतान के सामने खुले हैं, फिर भी वह सामर्थ्य हमारी है जो उसे स्वर्ग और पृथ्वी पर दी गई है, कि शैतान को हमारे पाँवों तले कुचले और नरक के फाटकों को तोड़ दे (मत्ती 28:18); यद्यपि हम अब भी मृत्यु की देह लिए फिरते हैं, वह हमारा जीवन है; संक्षेप में, उसकी सब वस्तुएँ हमारी हैं, हमारे पास उसमें सब कुछ है, उसके पास हम में कुछ नहीं। मैं कहता हूँ, इसी नींव पर हमें बनाया जाना चाहिए, यदि हम प्रभु में एक पवित्र मन्दिर के रूप में बढ़ना चाहते हैं।
6. बहुत समय से संसार को इससे बहुत भिन्न शिक्षा दी गई है। एक प्रकार के भले कर्म, जिन्हें नैतिक कहा जाता है, गढ़ लिए गए हैं, जिनसे मनुष्य मसीह में कलम लगाए जाने से पहले परमेश्वर को प्रिय बनाए जाते हैं; मानो पवित्रशास्त्र झूठ बोलता हो जब वह कहता है, “जिसके पास पुत्र है, उसके पास जीवन है; और जिसके पास परमेश्वर का पुत्र नहीं, उसके पास जीवन नहीं है” (1 यूहन्ना 5:12)। यदि वे मरे हुए हैं तो जीवन की सामग्री कैसे उत्पन्न कर सकते हैं? क्या इस कथन का कोई अर्थ नहीं कि “जो कुछ विश्वास से नहीं, वह पाप है?” (रोमियों 14:23); या क्या बुरे वृक्ष से अच्छा फल उत्पन्न हो सकता है? इन अत्यन्त महामारी जैसे सोफ़िस्टों ने मसीह के लिए ऐसा क्या छोड़ा है जिस पर वह अपनी सामर्थ्य दिखाए? वे कहते हैं कि उसने हमारे लिए पहला अनुग्रह मोल लिया, अर्थात् योग्यता पाने का अवसर, और हमारा काम यह है कि इस प्रकार दिए गए अवसर को हाथ से न जाने दें। अरे, अभक्ति की कैसी ढिठाई! कौन सोचता कि मसीह का नाम माननेवाले मनुष्य उसे इस प्रकार उसकी सामर्थ्य से वंचित करेंगे, और उसे लगभग पाँवों तले रौंद डालेंगे? पवित्रशास्त्र में उसके विषय में सदा यही गवाही दी गई है कि जो कोई उस पर विश्वास करता है वह धर्मी ठहरता है; इन लोगों का सिद्धान्त यह है कि उससे केवल यही लाभ मिलता है कि हर एक को अपने आप को धर्मी ठहराने का मार्ग खुल जाता है। मैं चाहता हूँ कि वे इन अंशों के अर्थ का कुछ स्वाद ले सकें: “जिसके पास पुत्र है, उसके पास जीवन है।” “जो मेरा वचन सुनकर मेरे भेजनेवाले पर विश्वास करता है,” “वह मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।” जो कोई उस पर विश्वास करता है, वह “मृत्यु से पार होकर जीवन में प्रवेश कर चुका है।” “उसके अनुग्रह से, उस छुटकारे के द्वारा जो मसीह यीशु में है, सेंतमेंत धर्मी ठहराए जाते हैं।” “जो उसकी आज्ञाओं को मानता है वह उसमें बना रहता है, और वह उसमें।” परमेश्वर ने “हमें मसीह यीशु में उसके साथ जिलाया, और स्वर्गीय स्थानों में उसके साथ बैठाया।” “उसी ने हमें अन्धकार के वश से छुड़ाकर अपने प्रिय पुत्र के राज्य में प्रवेश कराया।”431 ऐसे ही असंख्य अंश हैं। उनका अर्थ यह नहीं कि मसीह में विश्वास के द्वारा हमें धर्मी ठहराए जाने को प्राप्त करने या उद्धार पाने का एक अवसर दिया जाता है, बल्कि यह कि दोनों हमें दिए जाते हैं। इसलिए जैसे ही आप विश्वास के द्वारा मसीह में कलम लगाए जाते हैं, आप परमेश्वर के पुत्र, स्वर्ग के वारिस, धार्मिकता के भागी, जीवन के अधिकारी बना दिए जाते हैं, और (इन लोगों की झूठी शिक्षाओं को और अच्छी तरह प्रकट करने के लिए) आपने योग्यता पाने का अवसर नहीं पाया, बल्कि मसीह की सारी योग्यताएँ पाई हैं, क्योंकि वे आपको सौंपी गई हैं।
431 यूहन्ना 5:12; यूहन्ना 5:24; रोमियों 3:24; यूहन्ना 3:24; इफिसियों 2:6; कुलुस्सियों 1:13
430 1 कुरिन्थियों 1:30; इफिसियों 1:3-5; कुलुस्सियों 1:14, 20; यूहन्ना 1:12; 10:28।
7. इस प्रकार सोरबोन की पाठशालाओं ने, जो सब विधर्मों की जननी हैं, हमसे विश्वास से धर्मी ठहराए जाने का सिद्धान्त छीन लिया है, जो सारी भक्ति की जड़ में है। वे शब्दों में तो मानते हैं कि मनुष्य रूपित विश्वास से धर्मी ठहरते हैं, परन्तु बाद में इसकी व्याख्या यह करते हैं कि विश्वास के कारण उनके पास भले कर्म हैं जो धर्मी ठहराए जाने में काम आते हैं, जिससे लगभग ऐसा लगता है कि वे विश्वास शब्द का प्रयोग उपहास में करते हैं, क्योंकि पवित्रशास्त्र में इसके इतनी बार दोहराए जाने के कारण वे बहुत निन्दा उठाए बिना इसे चुपचाप टाल नहीं सकते थे। और फिर भी इतने से सन्तुष्ट न होकर वे भले कर्मों की प्रशंसा के द्वारा वह मनुष्य को सौंप देते हैं जो परमेश्वर से चुराते हैं। और चूँकि भले कर्म घमण्ड का बहुत कम आधार देते हैं, और यदि उन्हें ईश्वरीय अनुग्रह के फल माना जाए तो उचित रूप से योग्यता भी नहीं कहे जाते, इसलिए वे उन्हें स्वतंत्र इच्छा की सामर्थ्य से निकालते हैं; दूसरे शब्दों में पत्थर से तेल निकालते हैं। वे इनकार नहीं करते कि प्रमुख कारण अनुग्रह में है; परन्तु वे तर्क करते हैं कि स्वतंत्र इच्छा का, जिसके द्वारा सारी योग्यता आती है, कोई बहिष्कार नहीं है। यह केवल परवर्ती सोफ़िस्टों का नहीं, बल्कि उनके पाइथागोरस लोम्बार्ड का भी सिद्धान्त है (Sent. Lib. 2, Dist. 28), जिसे उनकी तुलना में खरा और संयमी कहा जा सकता है। यह निश्चय ही आश्चर्यजनक अन्धापन था कि जबकि अगस्तीन उसके मुँह में इतनी बार थे, वह यह न देख सका कि उन्होंने भले कर्मों के कारण मनुष्य को प्रशंसा का एक कण भी देने से कितनी सावधानी से बचाव किया है। ऊपर, स्वतंत्र इच्छा पर चर्चा करते समय, हमने इस आशय के उनके कुछ अंश उद्धृत किए थे, और उनके लेखों में ऐसे अंश बार-बार आते हैं (देखें Psal. 104 में; Ep. 105), जैसे जब वे हमें अपनी योग्यताओं पर कभी घमण्ड करने से रोकते हैं, क्योंकि वे भी परमेश्वर के दान हैं, और जब वे कहते हैं कि हमारी सब योग्यताएँ केवल अनुग्रह से हैं, हमारी पर्याप्तता से प्रदान नहीं की गईं, बल्कि पूर्णतः अनुग्रह की उपज हैं, इत्यादि। यह कम आश्चर्य की बात है कि लोम्बार्ड पवित्रशास्त्र के प्रकाश के प्रति अन्धा था, जिसमें स्पष्ट है कि वह बहुत सफल विद्यार्थी नहीं रहा था।432 फिर भी उसके और उसके चेलों के विरुद्ध प्रेरित के उन शब्दों से अधिक प्रबल कोई घोषणा नहीं हो सकती, जो सब मसीहियों को घमण्ड करने से रोकने के बाद घमण्ड के अनुचित होने का कारण जोड़ता है: “क्योंकि हम उसके बनाए हुए हैं, और मसीह यीशु में उन भले कामों के लिए सृजे गए हैं जिन्हें परमेश्वर ने पहले से तैयार किया, कि हम उन में चलें” (इफिसियों 2:10)। इसलिए, चूँकि हम से कोई भलाई नहीं निकलती सिवाय इसके कि हम नया जन्म पाए हुए हैं—और हमारा नया जन्म बिना किसी अपवाद के पूर्णतः परमेश्वर की ओर से है—इसलिए भले कर्मों में एक कण का भी अपने लिए दावा करने का कोई आधार नहीं। अन्त में, जबकि ये लोग निरन्तर भले कर्मों का आग्रह करते हैं, वे साथ ही विवेक को इस प्रकार सधाते हैं कि वह यह भरोसा करने का साहस न करे कि कर्म परमेश्वर को कृपालु और प्रसन्न करेंगे। इसके विपरीत हम, योग्यता का उल्लेख किए बिना, विश्वासियों को अनोखी सान्त्वना देते हैं जब उन्हें सिखाते हैं कि अपने कर्मों में वे परमेश्वर को प्रसन्न करते हैं, और निःसन्देह उसके द्वारा स्वीकार किए जाते हैं। बल्कि यहाँ हम इस पर भी बल देते हैं कि कोई मनुष्य विश्वास के बिना कोई कर्म आरम्भ या हाथ में न ले, अर्थात् जब तक उसे पहले दृढ़ निश्चय न हो कि वह परमेश्वर को प्रसन्न करेगा।
432 फ्रांसीसी में, “d’autant qu’il n’y estoit gueres exercité;”—क्योंकि उसमें वह बहुत अभ्यस्त नहीं था।
8. इसलिए हम किसी भी कारण से अपने आप को उस एकमात्र नींव से एक कील भर भी433 हटने न दें। उसके डाले जाने के बाद बुद्धिमान राजमिस्त्री उस पर ठीक रीति से और क्रम से बनाते हैं। क्योंकि चाहे शिक्षा की आवश्यकता हो या उपदेश की, वे हमें स्मरण दिलाते हैं कि “परमेश्वर का पुत्र इसलिए प्रगट हुआ कि शैतान के कामों को नष्ट करे;” कि “जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता;” कि “अन्यजातियों की इच्छा के अनुसार काम करने के लिए हमारे जीवन का बीता हुआ समय बहुत है;” कि परमेश्वर के चुने हुए दया के पात्र हैं, “आदर” के लिए ठहराए गए, शुद्ध किए गए, “पवित्र किए गए, और स्वामी के काम के योग्य, और हर भले काम के लिए तैयार।” सब कुछ एक साथ तब व्यक्त हो जाता है जब मसीह अपने चेलों का वर्णन इस प्रकार करता है, “यदि कोई मेरे पीछे आना चाहे, तो अपने आप का इनकार करे, और प्रतिदिन अपना क्रूस उठाए, और मेरे पीछे हो ले।”434 जिसने अपने आप का इनकार किया है उसने सब बुराइयों की जड़ काट दी है, ताकि वह फिर अपना ही स्वार्थ न खोजे; जिसने अपना क्रूस उठाया है उसने अपने आप को सब नम्रता और सहनशीलता के लिए तैयार कर लिया है। मसीह का उदाहरण इसमें और भक्ति तथा पवित्रता के सब कर्तव्यों में समाया हुआ है। उसने अपने पिता की आज्ञा मृत्यु तक मानी; उसका सारा जीवन परमेश्वर के कामों को करने में बीता; उसका सारा मन अपने पिता की महिमा में लगा था; उसने भाइयों के लिए अपना प्राण दिया; उसने अपने शत्रुओं की भलाई की और उनके लिए प्रार्थना की। और जब सान्त्वना की आवश्यकता होती है, तब वह इन शब्दों में उत्तम रीति से दी गई है: “हम चारों ओर से क्लेश तो भोगते हैं, पर संकट में नहीं पड़ते; निरुपाय तो हैं, पर निराश नहीं होते; सताए तो जाते हैं, पर त्यागे नहीं जाते; गिराए तो जाते हैं, पर नाश नहीं होते; और सदा यीशु की मृत्यु को अपनी देह में लिए फिरते हैं, कि यीशु का जीवन भी हमारी देह में प्रगट हो।” “क्योंकि यदि हम उसके साथ मरे हैं तो उसके साथ जीएँगे भी; यदि हम धीरज से सहते हैं तो उसके साथ राज्य भी करेंगे;” “उसके दुखों में सहभागी होकर, उसकी मृत्यु की समानता को प्राप्त होकर;” पिता ने हमें पहले से ठहराया कि हम “उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत भाइयों में पहिलौठा ठहरे।” इसी से यह है कि “न मृत्यु, न जीवन, न स्वर्गदूत, न प्रधानताएँ, न वर्तमान, न भविष्य, न सामर्थ्य, न ऊँचाई, न गहराई, और न कोई और सृष्टि, हमें परमेश्वर के प्रेम से जो हमारे प्रभु मसीह यीशु में है, अलग कर सकेगी;”435 बल्कि सब बातें मिलकर हमारी भलाई ही के लिए काम करेंगी। देखिए कि हम मनुष्यों को परमेश्वर के सामने कर्मों से धर्मी नहीं ठहराते, बल्कि कहते हैं कि वे सब जो परमेश्वर के हैं, नया जन्म पाए हुए और नई सृष्टि बनाए गए हैं, जिससे वे पाप के राज्य से धार्मिकता के राज्य में पार हो जाते हैं। इस प्रकार वे अपनी बुलाहट को पक्का करते हैं, और वृक्षों की तरह अपने फलों से परखे जाते हैं।
